कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

नाक नज़र



चार दिन पहले.
शांति दफ़्तर से लौट रही थी। सड़क पर ट्रैफ़िक रोज़ की तुलना में वाक़ई ज़्यादा था या उसकी अपनी किसी उलझन के चलते शांति को ज़्यादा लग रहा था- ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। बात जो भी रही हो- शांति ने सड़कर वो सड़क छोड़ दी और नयागंज वाला रास्ता ले लिया। नयागंज में जाम तब होता है जब सड़क के दोनों तरफ़ हाथ ठेलेवाले रुककर माल उतारने लगते हैं। या फिर तब, जब गायों की एक गोष्ठी पूरी सड़क घेरकर पगुराने बैठ जाय और कितना भी हॉर्न बजाने पर न उठे। उस दिन भी हाथ ठेले वाले बोरियों में भरा अनाज और मसाले दुकानों के बाहर उतार रहे थे और सड़क पर विरक्त भाव से बैठे गाय और साँड भी पगुरा रहे थे मगर आम जनता पर इस तरह मेहरबान होकर कि गति भले धीमी हो जाय पर जाम न लगे। मन्थर गति के उस प्रवाह में अपनी तेज़ी का संचार करने के इरादे से शांति ने अपनी स्कूटी इधर-उधर लहराई और एक साँड से लगभग जा टकराई। साँड से बचने के चक्कर में स्कूटी का हैण्डल जिधर घुमाया, उधर लाल मिर्च पाउडर का एक थाल था। बचाते-बचाते भी टक्कर खा गया और शांति के आँखों के आगे पलटा गया।

तीन दिन पहले.
पन्द्रह-सोलह घंटे बीत चुके हैं। डॉक्टर ने इंजेक्शन दे दिया है, मलहम लगा दिया है, गोलियां खिला दी हैं और आँखों पर पट्टियां बांध दी है। फिर शांति की आँखें जल रही हैं और दिमाग़ उबल रहा है।शांति की आँखों के आगे से एक पनियाला अंधेरा रिसता रहा और उसके भीतर एक अजब बेचैनी मथता रहा। अजय काम पर चला गया, बच्चे स्कूल और सासू माँ अपने कमरे में। उनके टीवी की आवाज़ बाहर के शोर के साथ मिलकर शांति को और भड़काती रही। कोई राहत नहीं, कोई रस्ता नहीं। शांति को लगता रहा कि उसके भीतर लाल मिर्च का एक पहाड़ है। अन्दर जाने वाली हर सांस लाल मिर्च की गंध में धुलकर बाहर आती।

दो दिन पहले.
जलन कम है। मन पहले से बेचैन कम है। आँखों पर पट्टियां बनी हुई हैं। आंखों का काम कानों ने सम्हाल लिया और सूचनाएं मिलने लगीं। कानों के ज़रिये दीवारों, खिड़की, दरवाज़ों जैसी स्थायी चीज़ों का एक मानचित्र बन गया। उनके बीच में से कोनों और मोड़ों से भरा रस्ता बन गया। और शांति उस पर बच-बचकर चलने लगी है।

उस दिन.
घर में बैठे-बैठे ऊब गई शांति। तो बाहर का दरवाज़ा खोलकर खड़ी हो बाहर की आवाज़ें सुनने लगी। कोई नई आवाज़ नहीं थी- बस ज़रा तेज़ आवाज़ें थीं। हवा अच्छी चल रही थी और चेहरे पर लग रही थी। फिर वही हवा अपनी तरंगो पर एक गंध लेकर आई। मछली की गंध। साथ में कड़वे तेल और तड़कती हुई राई का भी कुछ पैग़ाम था। कहीं मछली तली जा रही थी। शांति ने पता लगाने की कोशिश की कि कहाँ से आ रही है गंध। सामने वाले घर के दरवाज़े की तरफ़ गई पर उस दिशा से एक अमानुषी गंध उठ रही थी- उनके कुत्ते पेप्सी की गंध। दरवाज़े का अधिक क़रीब जाने पर पेप्सी भौंकने लगा। शांति की गंध उस की सुरक्षा सीमा के अन्दर पहुँच गई थी शायद। शांति पीछे हट गई और नीचे उतर गई। नीचे के तल पर बाएं वाले घर से साबुन पाउडर के सिंथेटिक फूलों की महक आ रही थी। शांति ने थोड़ी मशक़्कत के बाद समझा कि गुप्ता जी की बाई कपड़े धो रही थी। और नीचे उतरी तो एक तेज़ परफ़्यूम का झोंका आया। फिर एक आवाज़ - हलो मिसेज़ शर्मा। ये पालीवाल जी थे- रिटायर हो चुके हैं और अपने बेटे-बहू के साथ रहते हैं। शांति पहले भी उनसे मिली है पर उनके पर्फ़्यूम से पहली बार मिली जो रिटायर नहीं हुआ था।

धरातल पर आ जाने के बाद शांति अपने को थोड़ा सा असुरक्षित महसूस करने लगी। न तो सीढ़ियों की तरह एकरैखीय रस्ता था और न ही सहारे के लिए कोई रेलिंग। मछली की गंध अभी भी आ रही थी लेकिन पहले जितनी तेज़ नहीं। फिर पैट्रोल की गंध आई और एक स्कूटर की गुरार्हट पास आकर बग़ल से निकल गई। उसके निकलने के बाद गीली मिट्टी की सौंधी महक उसके नासापुटों पर दस्तक देने लगी। और पानी गिरने के बहुत हलके सुर से उसे पता लग गया कि वो क्यारियों के किनारे खड़ी है और माली अपने काम पर लगा है। बेला, चमेली, गेंदे की कई क़िस्मों और गुलाब की अलग-अलग गंधों का आस्वादन करते हुए वो धीरे-धीरे, क्यारी-क्यारी चलती रही। शांति को पता था उन फूलों के बारे में- रोज़ आते-जाते वहीं से गुज़रती थी, नज़र उनको देखती भी थी पर देख नहीं पाती थी, उनकी महक सूंघ नहीं पाती थी।

तीसरी मोटरसायकिल के गुज़र जाने के बाद अचानक फिर से बहुत तेज़ मछली और सरसों के तेल की गन्ध आई। क्यारियों के पार, सड़क की तरफ़ से। अपने कानों और नाक पर आश्वस्त हो चली शांति ने बेझिझक सड़क पार की और सोसायटी की सलाखों वाली दीवार के पार, कढाई में मछलियों के टुकड़ों के तले जाने की हलकी छन-छन की आवाज़ को सुना। उसके पीछे सड़क के अविरल शोर के बीच कुछ लोगों के हलके-हलके बतियाने के स्वर भी सुने। यह एक एकदम नई खोज थी। सोसायटी की इमारत से बिलकुल लगा हुआ एक खोमचा जिसके बारे मे ना तो उसे कुछ पता था और ना ही अजय को। शांति के आँखों वाले संसार मे बड़े-बड़े छेद थे जिसमें ये खोमचा शायद छिप कर खड़ा हुआ था। जिसे आँखों से न देखा जा सका, कानों से ना पाया जा सका, उसे नाक ने सूँघ लिया था।

दो दिन बाद.
डॉक्टर घर पर आया और पट्टियां खोल गया। मगर उसके पहले शांति के आगे गन्धों और आवाज़ों की एक ऐसी दुनिया उजागर होती गई जो पहले उसके लिये सोयी पड़ी हुई थी। उसमें अपनी गन्ध से लोग पहचाने जाते। अजय, अचरज और पाखी, दीवार के पीछे से भी नज़र आ जाते और चुप रहकर भी पकड़े जाते। गन्धों के सोते थे, मंज़िलें और मक़ाम थे। पट्टियां खोलने के बाद उसे गंध नज़र आती रहीं।

दस दिन बाद.
आँखों की जलन पूरी तरह से जाती रही। शांति ने फिर से दफ़्तर आना जाना शुरु कर दिया। स्कूटर चलाते हुए सारे रास्ते जैसे रौशनी आती, जैसे हवा पर चलकर आवाज़ आती, वैसे ही गंधों के भी सन्देश आकर उसकी साँसों से टकराते रहे।

तीन मास बाद.
आँखों के रास्ते लगातार आ रहे संदेसों की चकाचौंध से दिमाग फिर से चकमा खाने लगा। गंधों का समांतर संसार शांति के लिये धीरे-धीरे धुंधला होकर फिर से पृष्ठभूमि में चला गया। कभी किसी तेज़ लाल मिरच की झार से या फिर सरसों के तेल वाली मछली की चरपरार आती तो शांति को फिर से नाक से नज़र आने लगता.. कुछ देर के लिये बस।

***

(इस इतवार दैनिक भास्कर में शाया हुई)

शनिवार, 23 जुलाई 2011

फ़रीद प्यारे..



फ़रीद आज पटने में दूल्हा बना हुआ है। कुछ मेरी तबियत ख़राब है और कुछ क़िस्मत ख़राब है जो उसके निकाह में शामिल नहीं हो पा रहा हूँ।  फ़रीद और आज से आधिकारिक तौर पर उसकी ज़िन्दगी में शरीक़ हो रही शीमा फ़ातिमा के सुखी और सम्पन्न वैवाहिक जीवन के लिए मैं शुभकामनाएं देता हूँ।

कविता पर केन्द्रित प्रियंकर भाई की पत्रिका अक्षर के प्रवेशांक में फ़रीद के ऊपर मेरी यह छोटी सी टिप्पणी भी छपी थी, उसे साथ में चस्पां कर रहा हूँ। 




फ़रीद का कविकर्म

रीद की कविताओं में स्मृति है। उस स्मृति में एक दुर्लभ पारदर्शिता है। जिसमें रंग, भाव और विचार चटक धूप की तरह खिले रहते हैं। और चूंकि कहा ही गया है कि ताप या धूप से बेहतर रुजनाशक दूसरा नहीं होता इसलिए फ़रीद की कविताओं में एक ऐसी निर्दोषता है जो किसी छोटे मासूम बच्चे की तरह आप का मन मोह लेती है।

फ़रीद को मैं एक दशक से अधिक समय से जानता हूँ। वो पेशेवर कवि नहीं है। कवि बनने की महत्वाकांक्षा भी कभी नहीं थी उसमें और न अभी भी उसमें इस प्रकार का कोई दबाव मैं देख पाया हूँ। कविता लिखना उसका अभी दो-तीन बरस का विकास है। २००७ में फ़रीद ने पानी पर एक कविता लिखी थी, जो मैंने अपने निजी ब्लौग पर चस्पां की थी। तमाम वाहवाही के बावजूद फ़रीद ने न तो थोक में कविता लिखना शुरु किया और न ही अपना ब्लौग ही बनाने की तरफ़ क़दम बढ़ाया। ज़ाहिरन कविता लिखने की उसकी प्रेरणा छपास और वाहवाही से जुदा, भावना के उद्वेलन में दबी हुई रही है; जैसा कि होना भी चाहिये। 

लेकिन वो भी अपने काल से स्वतंत्र नहीं है क्योंकि कोई नहीं होता। हिन्दी कविता में जो नैतिक कार्यकर्तावाद या मौरल एक्टिविज़्म का रोग लगा हुआ है फ़रीद भी कहीं-कहीं उस से ग्रस्त नज़र आते हैं और किसी सामाजिक मसले पर अपने नैतिक उच्चबोध की क्रूर दृष्टि का प्रक्षेपण करते हैं। ये राजनैतिक शुचिता या पोलिटिकल करेक्टेडनेस का कीड़ा है। जो अपनी निजी विवेक पर भरोसा करने के बजाय हरदम स्थापित नैतिकता के मार्ग पर चलने की क़वायद करने लगता है। यह बड़ा भयंकर रोग है और अच्छे-अच्छे कवियों को अनुभूति की राह से उखाड़ फेंकने में ये कामयाब रहा है। नैतिक कार्यकर्तावाद के चलते कवि अपनी सहज अनूभूति को लगातार स्थापित नैतिकता पर जाँचता-परखता हुआ इस क़दर सशंकित और भयाकुल प्राणी में तब्दील होने लगता है कि बहुत जल्द वो विचार के नाम पर नारेबाज़ी और सरलीकृत समीकरण परोसकर अनुमोदन बटोरने में ही अपनी कविता की सफलता मानने लगता है और भूल जाता है कि अपने भावनात्मक अस्तित्व के साथ एकता किसी कवि की ही नहीं हर मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत होती है। वैचारिक परिष्कार करने को मैं ग़लत नहीं मानता लेकिन कविता में आया हुआ विचार अगर अनुभूति का हमज़ाद नहीं है तो उसका नुक़्सान कविता को ही उठाना पड़ता है क्योंकि वह पाठक के पास भी अपनी विभक्त अवस्था के साथ ही उपस्थित होती है।

जो आप ने देखा नहीं उसकी कल्पना असम्भव है। कल्पना की उड़ान भी वास्तविकता से सीमित रहती है। आम तौर पर देखा गया है कि जो कविता अनुभूति की ज़मीन में उगती है, और कवि की अपनी निजी अनुभूति में कल्पना की पेंगे भर रही होती है वही कविता असरदार बनी रहती है लेकिन फ़रीद में यह अनोखी बात है कि जो कविता उसके जिये हुए सच से नहीं भी पनप रही, और जो राजनैतिक शुचिताबोध और नैतिक कार्यकर्तावाद के घेरे से संचालित मालूम देती है, वह भी मारक प्रभाव छोड़ने में कामयाब हो जाती है। यह बड़ा विरल हुनर है इसमें विचार की प्रधानता है और अनुभूति सहायक की भूमिका में है। अक्सर ऐसे प्रयोग असफल साबित होते हैं, मगर फ़रीद अब तक सफल है। 

कविता से वैचारिकता को निकाल पाना अब लगभग असम्भव है। जैसे कि एक बार शिशु  में झूठ बोलने की कला ने प्रवेश कर लिया तो उससे पहले की अबोधता को तब तक पाना सम्भव नहीं होता जब तक कि वह बुद्ध के बोधिभाव में उपलब्ध न हो जाय। एक बार विचार से भ्रष्ट हुई कविता, तमाम वैचारिक झंझावात से गुज़रकर, एक दूसरे स्तर पर जाकर ही निर्दोषता हासिल कर सकती है और किसी सम्यक संबुद्ध की तरह शुद्ध बोध की वाहक बन सकती है। कविता का क्षण इसी सम्बोधि का क्षण है। कवि की कला सम्बोधि के उस विरल क्षण को भाषा में पकड़ लेने की है। मुश्किल बस यही है कि अधिकतर कवि तमाम महत्वाकांक्षाओं के बावजूद सम्बोधि के उस स्तर तक पहुँचते नहीं, और जो कुछ पहुँचते भी हैं वो निरन्तर वहाँ टिक नहीं पाते, फ़िसलते रहते हैं। प्रेम की तरह सम्बोधि भी कभी होता है, कभी नहीं होता, वो स्थिर नहीं क्षणिक है।   

फ़रीद की कविताओं में सम्बोधि के वे क्षण दिखते हैं। लेकिन साथ ही फ़िसलने की सम्भावनाएं भी। क्योंकि सम्बोधि, लगभग सभी प्राकृतिक तत्वों की तरह अपने को पुनुरुत्पादित करना चाहती है और सम्भवतः कवि को फिर-फिर उसे हासिल करने के लिए उकसाती है। वेदों की अपौरुषेय़ता की जो बात है उसे इसी सन्दर्भ में समझे जाने की ज़रूरत है, वे पराक्रम से हासिल नहीं होते, उनका इलहाम होता है। सच्ची कविता और इलहाम में कोई अन्तर नहीं। कवि का मूल अर्थ प्रज्ञावान ही है और ऋचाएं रचने वाला ही ऋषि है।

फ़रीद वेदान्त का विद्यार्थी है और उसने सम्बोधि की क्षणिक उपलब्धि की है। अगर वह अपनी ही उपलब्धि से भ्रष्ट न हुआ तो वह सच्चे अर्थों में कवि या ऋषि हो सकता है।

*** 

[नीचे की सारी कविताएं मेरी इस टिप्पणी के बाद लिखी गईं हैं.. और किसी में भी राजनैतिक कार्यकर्तावाद की कोई झलक नहीं है। :) ]

अल्लाह मियाँ

अल्लाह मियाँ कभी मुझसे मिलना
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा, तेरा,
वक़्त निकाल के।

घूम के आओ गांव हमारे।
देख के आओ नद्दी नाले।
फटी पड़ी है वहाँ की धरती।
हौसले हिम्मत पस्त हमारे।
चाहो तो ख़ुद ही चल जाओ।
वरना चलना संग हमारे।

अल्लाह मियाँ कभी नींद से जगना
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा, तेरा,
वक़्त निकाल के।

झांक के देखो,
खिड़की आंगन,
मेरा घर,
सरकार का दामन। 
ख़ाली बर्तन, ख़ाली बोरी,
ख़ाली झोली जेब है मेरी।

अल्लाह मियाँ ज़रा इधर भी देखो,  
मेहर तेरी उस ओर है।
भर कर रखा अन्न वहाँ पर,
पहरा जहाँ चहुँ ओर है।

अल्लाह मियाँ कभी ठीक से सोचो
थोड़ा वक़्त निकाल के।
मालिश कंघी सब कर दूंगा,
तेरा, वक़्त निकाल के।

बकरी

खेत में घास चरती बकरी
पास से गुज़रती हर ट्रेन को यूँ सिर उठा कर देखती है,
मानो पहली बार देख रही हो ट्रेन।
जैसे कोई देखता है गुज़रती बारात,
जैसे खिड़की से सिर निकाल कर कोई देखता है बारिश,  
जैसे एकाग्र हो कर सुनता है कोई तान। 

ट्रेन गुज़र जाने के बाद,
उस दृश्य आनन्द से निर्लिप्त वह,
चरने लग जाती है घास नये सिरे से।

क्यों लगता है ऐसा

पता नहीं क्यों हर बार लगता है,
रेल पर सफ़र करते हुए
कि टीटी आएगा और टिकट देख कर कहेगा
कि आपका टिकट ग़लत है
या आप ग़लत गाड़ी में चढ़ गये हैं,
आपकी गाड़ी का समय तो कुछ और है,
तारीख़ भी ग़लत है,
आपने ग़लत प्लेटफ़ॉर्म से ग़लत गाड़ी पकड़ ली है,
आप उल्टी तरफ़ जा रहे हैं।
और वह चेन खींच कर उतार देगा
मुझे निर्जन खेतों के बीच।


शनिवार, 15 जनवरी 2011

कुछ नहीं खलता मुझे मैं कौन हूँ

कुछ नहीं खलता मुझे मैं कौन हूँ
सूरते हैरत हूँ या शक्ले जुनूँ

इश्क़ है सरमायाए दीवानगी
सिह्‌र कब पाता है उसको और फ़ुसूँ

आहो नाला ने मुझे रुस्वा किया
वरना पिन्हा था मेरा राज़े दरुँ

गर ना बहते लख़्ते दिल आँखों की राह
रंगे अश्क ऐसा न होता रश्के खूँ

हुस्ने जानां जलवागर हर शै में है
दीद में अपने नहीं कोई ज़बूँ

कौन पा सकता है मुझ गुमगश्तः को
दीन ढूंढे है आ के या दुनियाए दूँ

जिस ने पहचाना है अपने आप को
है नियाज़ अपने क़दम पर सर निगूँ


१. जादू
२. इन्द्रजाल
३. छिपा हुआ
४. दिल का राज़
५. दिल के टुकड़े
६. दूषित
७. खोया हुआ
८. अधम, नीच
९. सर झुकाए हुए



सोमवार, 20 दिसंबर 2010

राम-राम हरे-हरे



बोधिसत्त्व की एक ताज़ी कविता:




घरे-घरे दौपदी, दुस्सासन घरे-घरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

गली-गली कुरुक्षेत्र, मरघट दरे-दरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

देस भा अंधेर नगर, राजा चौपट का करे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

सीता भई लंकेस्वरी, राम रोवें अरे-अरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

राजा दसरथ भुईं लोटैं, राज करे मंथरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

आम गा महुवा गा, अब त बस बैर फरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

कोयल मोर मूक भए, दादुर टर-टर टरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

ऊपर से कुछ बात, और कुछ बा तरे-तरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे-हरे॥

- बोधिसत्त्व

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

छोटा आदमी

पिछले दिनों बोधिसत्व का नया संग्रह 'ख़त्म नहीं होती बात' प्रकाशित हुआ, उस में से एक कविता छोटा आदमी-

रविवार, 4 अप्रैल 2010

एक पागल का प्रलाप


मेरे दोस्त फ़रीद ख़ान ने दो नई कविताएं लिखी हैं, उर्दू में लिखते तो कहा जाता कि कही हैं, लेकिन हिन्दी में हैं इसलिए लिेखी ही हैं।

हिन्दी में कविता मुख्य विधा है फिर भी ऐसी कविताएं विरल हैं।

मुलाहिज़ा फ़र्माएं:





एक पागल का प्रलाप


कम्बल ओढ़ कर वह और भी पगला गया,
कहने लगा मेरा ईश्वर लंगड़ा है.... काना है, लूला है, गूंगा है।
'निराकार' बड़ा निराकार होता है, नीरस, बेरंग, बेस्वाद होता है।
कट्टर और निरंकुश होता है।

वह कहता है, हर आदमी का अपना ख़ुदा होता है।
जैसे उसका अपना जूता होता है, कपड़ा होता है।
घर में या फ़ुटपाथ पर उसकी जगह होती है। उसी तरह उसका अपना ख़ुदा होता है।

जितने तरह के आदमी,
जितने तरह के पेड़, पौधे, पहाड़, और जानवर, उतने तरह के ईश्वर तो होने ही चाहिए।
इतना तो अपना हक़ बनता है।

जो ईश्वर को दुरदुराते रहते हैं, उनका भी ईश्वर होता है,
नंगे पांव, नंगे बदन, गरियाते, गपियाते।

पागल को सभी ढेला मारते हैं।
ईश्वर कभी लंगड़ा होता है क्या ?
काना होता है क्या ?
लूला होता है क्या ?
गूंगा होता है क्या ?

वह अचरज में इतना ही पूछ पाता है
कि हम लंगड़े, काने, लूले, गूंगे हो सकते हैं तो ईश्वर के लिए मुश्किल है क्या ?



मेरा ईश्वर

मेरा और मेरे ईश्वर का जन्म एक साथ हुआ था।

हम घरौन्दे बनाते थे,
रेत में हम सुरंग बनाते थे।

वह मुझे धर्म बताता है,
उसकी बात मानता हूँ,
कभी कभी नहीं मानता हूँ।

भीड़ भरे इलाक़े में वह मेरी तावीज़ में सो जाता है,
पर अकेले में मुझे सम्भाल कर घर ले आता है।

मैं सोता हूँ,
रात भर वह जगता है।

उसके भरोसे ही मैं अब तक टिका हूँ, जीवन में तन कर खड़ा हूँ।

बुधवार, 31 मार्च 2010

अरुंधति का रूमान

अरुंधति अपने दांतेवाड़ा यात्रा वृत्तान्त का अंत एक ऐसे शाएर की एक मशहूर नज़्म के एक टुकड़े से करती है, जो अपनी रुमानी क्रांतिकारिता के लिए प्रसिद्ध है- फ़ैज़।

वहाँ पाया गया अंश यह है :

हम अहले-सफ़ा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे

नज़्म के इसी तेवर के चलते पाकिस्तान में इस पर लम्बे समय तक बंदिश रही। लेकिन क्या अरुंधति को आभास है कि यह नज़्म इस्लामी क़यामत की धारणा में गहरे तक धंसी हुई है? यह पूरी नज़्म क़यामत के रोज़ होने वाले इंसाफ़ को समर्पित है जिसे ख़ुदा ने अपनी विशालकाय पट्टी (लौहे अज़ल) पर पहले से ही लिख रखा है। इस नज़र से नज़्म में एक तरह का नियतिवाद है। मगर तख़्त ओ ताज उछालने की बात भर से इंक़लाबी बेहद भावुक हो कर अपनी रुमानियत में और उतराने लगते हैं।

फ़ैज़ की रूमानियत को ऐसे और समझा जाया कि उनकी वफ़ात हुए चौथाई सदी गुज़र गई है। तख़्त ओ ताज कई उछले और गिरे लेकिन जो नारा गूंज रहा है पाकिस्तान की फ़िज़ाओं में, वो अनल हक़ का नहीं है। (अनल हक़-अह्म ब्रह्मास्मि- फ़ारस के प्रसिद्ध सूफ़ी मंसूर हल्लाज का वो नारा था जिसकी उद्घोषणा के लिए उसे अनेक यातना देने के बाद मौत के घाट उतार दिया गया था)

क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि अरुंधति का दांतेवाड़ा वृतान्त एक रूमानियत पर अंत होता है?

फ़ैज़ की पूरी नज़्म कुछ यूं है:

हम देखेंगे
लाज़िम है के हम भी देखेंगे
वो दिन की जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल पे लिखा है

जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे-गरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़े-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहले-सफ़ा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेग अल्लाह का
जो ग़ायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़े-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

सोमवार, 11 जनवरी 2010

बँटा हुआ सत्य

बहुत-बहुत पहले सोचा हुआ होता था सत्य
फिर बोला हुआ हो जाता था सत्य
अभी हाल तक लिखा हुआ तो निश्चित होता था सत्य
अब समय ये है
कि सोचा हुआ सत्य नहीं
कहा हुआ सत्य नहीं
लिखा हुआ भी सत्य नहीं
तो क्या है सत्य?
मेधा के नए प्रवीण कहते हैं कि सत्य बँटा हुआ है
सब में सब जगह थोड़ा-थोड़ा
...
क्या सत्य भी बँट सकता है?

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

बनी-बनाई कविता

उदय प्रकाश ने चमत्कारिक कहानियाँ लिखी हैं.. और हिन्दी साहित्य की दुनिया में उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। मैं खुद उनकी कहानी-कला का प्रशंसक रहा हूँ, हूँ। मगर उदय जी कवि भी हैं और मैंने अपने छात्र जीवन में उदय प्रकाश की कविताओं को पढ़ा और महसूस करने की भी कोशिश की थी।

उनकी एक कविता-एक शहर को छोड़ते हुए आठ कविताएं- एक अन्तराल तक मेरे मानस पर क़ायम रही थी। उस कविता में वैयक्तिक प्रेम और सामाजिक स्वीकृति के बीच के तनाव के ताने-बाने को उन्होने अपनी भाषाई चमत्कार से अच्छे से गढ़ा था। पर उनकी कई अन्य कविताओं में मुझे कभी कोई खास तत्व नहीं नज़र आया। मुझे उन में अनुभूति से अधिक अतिश्योक्ति और एक नाटकीयता ही समझ आई।

आज अचानक अफ़लातून भाई के ब्लॉग पर उदय जी की एक कविता दिखी। जो अफ़लातून भाई ने छापी तो जनवरी २००७ में थी मगर मैं आज ही देख सका। समाजवादी जनपरिषद पर एक नया लेख पढ़ते हुए संयोगवश साइडबार में मैंने उदय जी का नाम देखा .. जिज्ञासा हुई.. क्लिक किया तो पहले कमेंट पढ़ने को मिले।

सभी पाठक कविता से अभिभूत थे.. उदय जी का भी कमेंट था. वे इस इतने आत्मीय और प्रेरणास्पद स्वीकार से गदगद थे। प्रतिक्रियाओं को पढ़ने के बाद कविता पढ़ी..। वैसे तो मैं कविताएं अब नहीं पढ़ता हूँ लेकिन युवावस्था में उदय जी के लिए जो श्रद्धाभाव बना था उसके दबाव में एक बहुत लम्बे समय के बाद कोई कविता पढ़ी.. कविता शुरु होती है ऐसे..

एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ ‘आँसू’ से मिलता-जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार

पहली ही पंक्ति ग़ालिब के मिसरे- 'जब आँख ही से न टपका तो लहू क्या है'- का कठिन रूपान्तर है.. ऐतराज़ रूपान्तर से नहीं है.. अगर कोई छवि, रूपक आप के भाव के सादृश्य हो तो पाठक गप्प से निगल लेने को तैयार रहता है मगर मुझ से गप्प हुआ नहीं क्योंकि यहाँ कोशिश वही चमत्कार खड़ा करने की है। खैर.. आगे पढ़ा..


वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएँ

तो क्या जो पागल नहीं हुए वे ईमानदार नहीं है..? जिस जमात में स्वयं उदय प्रकाश भी शामिल हैं? और यहाँ पर यह भी याद कर लिया जाय कि ये वही उदय प्रकाश हैं जिन्होने प्रेम और क्रांति के जज़्बों के बीच झूलने वाले और अपनी इसी ईमानदारी के चलते विक्षिप्त हो जाने वाले कवि गोरख पाण्डेय का विद्रूप करते हुए एक कहानी भी रची थी-राम सजीवन की प्रेम कथा। जिसमें गोरख जी कभी कभी सहानूभूति के पात्र मगर अधिकतर हास्यास्पद चित्रित किए गए थे।

ईश्वर ‘ कहते आने लगती है अकसर बारूद की गंध..

इस तरह की पंक्तियाँ बेहद असरदार हैं और उदय जी की उसी चमत्कारिक भाषा का प्रदर्शन है..जो उनकी पहचान है। पाठक इनको पढ़ कर कवि की प्रतिभा के आगे ढेर हो सकता है.. हो जाता है.. मगर क्या यही कविता है? ज़रा इन जुमलों पर भी गौर किया जाय..

सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक

सबसे ज्यादा लोकप्रिय


सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर

सबसे गरीब और सबसे खूंख्वार

सबसे काहिल और सबसे थके - लुटे

सबसे उत्पीड़ित और विकल

ये जुमले अतिश्योक्ति के एक ऐसे संसार की ओर इशारा करते हैं जिसमें अपना दुख ही सबसे बड़ा है.. और दुख देने वाला सबसे खतरनाक। ऐसी मोटी समझ से किसी महीन अनुभूति की अपेक्षा की जा सकती है क्या? मगर हम करते हैं.. क्योंकि उदय जी हिन्दी साहित्य के आकाश के प्रतिभावान सितारे हैं।

भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दंडनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन से संबंधित विमर्श
प्रतिबंधित है जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियाँ
वर्जित है विचार

उदय जी के दिमाग में एक कल्पित तानाशाह है और है एक कल्पित विद्रोही। उस के अन्तरविरोध की तनी हुई रस्सी पर ही उदय जी अपनी सीली हुई कविता की भाषा सुखा रहे हैं। मेरा कहना है कि भई रस्सी है कि नहीं है.. है तो किस हाल में है.. ज़रा बीच-बीच में जाँच लिया जाय। कम से कम इस तरह की पंक्ति लिखने के पहले तो ज़रूर ही..

वह भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसकी लिपियाँ स्वीकार करने से इनकार करता है इस दुनिया का
समूचा सूचना संजाल

हो सकता है कि ये वाक्य उन्होने नेट पर लिपियों के इस स्वातंत्र्य के पहले लिखें हों.. तो भी ये वाक्य कवि की 'दृष्टा' और 'जहाँ न रवि पहुँचे' वाली उक्तियों को पछाड़ कर उदय जी की वास्तविकता के आकलन क्षमता के प्रति कोई अनुकूल मत नहीं बनाती।

बहुत काल से हम हिन्दी वाले सत्ता की मुखालफ़त करते हुए अपने समाज की सारी कमियों का ठीकरा सत्ता पर फोड़ते जाते हैं। हम विज्ञान और संज्ञान में पिछड़े हैं क्योंकि हमारे भीतर न तो वैज्ञानिक सोच है और न ही औरतों की छातियों और कूल्हों को देखने से फ़ुरसत। इसका दोष सत्ता को देने से क्या सबब?

ये बात ही हास्यास्पद है कि सत्ता लोगों को औरतों के कूल्हे देखने के लिए मजबूर कर रही है। हिन्दी की तमाम छोटी-छोटी पत्रिकाओं में असहमति के आलेख छापे जाते हैं.. लेकिन लोग उन्हे न खरीद के ‘आज तक’ पर ‘सैफ़ ने करीना की चुम्मी क्यों ली’ देखना ही पसन्द करते हैं। क्या इसमें लोगों का कोई क़सूर नहीं? आगे लिखते हैं..

अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और
पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियाँ

इन वाक्यों में ईमानदारी भी है और अनुभूति भी.. पर इस पर वे ज़्यादा देर टिकते नहीं, वे वापस अपनी हिन्दी कवियों की चिर-परिचित नाटकीयता के रथ पर सवार हो कर किसी दायोनीसियस को फटकारने लगते हैं..

सुनो दायोनीसियस , कान खोल कर सुनो
यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल,एक अपराजेय हत्यारे
तुम फिलहाल मालिक हो कटी हुई जीभों,गूँगे गुलामों और दोगले एजेंटों के
विराट संग्रहालय के ,

एक दायोनीसियस प्राचीन काल में यूनान का तानाशाह था। जो खा-खा कर इतना मोटा हो गया था कि बाद में उसे खाना खिलाने के लिए अप्राकृतिक तरीक़े इस्लेमाल किए गए.. आखिरकार वो अपने ही मोटापे में घुट कर मर गया। एक दूसरा दायोसीनियस अशोक के दरबार में यूनानी राजदूत था जिसने बहुत शक्ति और सम्पदा जुटा ली थी। तमाम और दायोनीसियस भी हैं.. ऐसी ही एक मिलते जुलते नाम का मिथकीय चरित्र दायनाइसस (बैकस) भी है जो मद, मदिरा और मस्ती का ग्रीक देवता है। उदय जी किस दायोनीसियस की बात कर रहे हैं? क्या इशारा है ये? किन बाहर से आए लोगों ने भाषा की दुर्गत कर दी है?

हिन्दी भाषा की दुर्गति और इस दायोनीसियस का क्या गूढ़ सम्बन्ध है यह मुझे समझ में नहीं आया। हो सकता है सामान्य समझ के परे होना ही दायोनीसियस जैसे नाम की विशेषता हो। आप को नहीं पता-उदय जी को पता है- वे आप से विद्वान हैं-सीधा निष्कर्ष निकलता है। तमाम विषेषणों से दायोसीनियस का चेहरा भली भाँति लाल कर चुकने के बाद उदय जी आशा के लाल सूरज पर ला कर कविता का अंत कर देते हैं।

लेकिन देखो
हर पाँचवे सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी

और
कहता है - ‘ माँ ! ‘

नया बच्चा पैदा हो रहा है.. और मातृभाषा में बोल रहा है.. उद्धार की उम्मीद बनी हुई है। ये कविता का वैसे ही अंत है जैसे सत्तर और अस्सी के दशक में एक चेज़ के साथ फ़िल्म का क्लाईमेक्स होता था या तमाम प्रेम कथाओं का अंत हॉलीवुड की प्रेरणा से, आजकल एअरपोर्ट पर होने लगा है।

कविता, कहानी, तमाम कला और कलाकारों को तय करने का मेरा पैमाना उसकी सच्चाई ही रहा है.. बहुत साथियों को उदय जी की कविता सच का आईना लग सकती है मुझे वह अपनी तमाम भाषाई चमचमाहटों के बावजूद अतिश्योक्ति, और थके हुए-घिसे हुए शिल्प का एक प्रपंच लगती है।

एक पहले से तय ढांचा, पहले से तय मुहावरे, पहले से तय निशानों पर वार, पहले से तय बातों के प्रति उत्साह.. लगता नहीं कि कुछ नया लिखा जा रहा है.. नया रचा जा रहा है.. कम से कम मुझे तो नहीं लगता कि कुछ भी नया पढ़ रहा हूँ। ऐसा लगता है कि बने-बनाए खांचों में फ़िट हुआ जा रहा है। विद्रोह का भी एक बना-बनाया स्पेस है हिन्दी और हिन्दी कविता में। जिसे ओढ़कर आप बड़े कवि बन सकते हैं और पुरुस्कार, सम्मान आदि पा सकते हैं।

बुधवार, 28 नवंबर 2007

मैं चुप रहा..

जीवन मे अधिकतर दो खराब वस्‍तुओ मे से कम खराब वस्‍तु को चुनना पडता है। भारत के हिसाब से कम खराब अमेरिका लगता है। ऐसा मेरी पिछली पोस्ट पर कपिल ने कहा और संजय बेंगाणी इस बात से सहमत हो गए। उनकी इस सहमति से मुझे एक जर्मन कविता 'मैं चुप रहा' की याद हो आई.. कविता नाज़ियों के बारे में है पर मुझे प्रासंगिक लगती है क्योंकि तीस के दशक के यूरोप में जर्मनी ने जो भूमिका निभाई आज दुनिया में वह अमरीका निभा रहा है..

मैं चुप रहा

नाज़ी जब कम्यूनिस्टों के लिए आए
तो मैं चुप रहा
मैं तो कम्यूनिस्ट नहीं था

फिर जब उन्होने समाजवादियों को सलाखों में डाला
तो मैं चुप रहा
मैं समाजवादी नहीं था

फिर जब मज़दूरों की धर-पकड़ हुई
तो भी मैं चुप रहा
मैं मज़दूर नहीं था

जब यहूदियों को घेरा गया
तो फिर मैं चुप रहा
मैं यहूदी भी नहीं था

और जब वे मुझे पकड़ने आए
तो बोलने के लिए कोई नहीं बचा था बाकी़..

- मार्टिन नाइमोलर

(ग़लती से इस कविता को बर्तोल्त ब्रेख्त (बेर्टोल्ट ब्रेष्ट) द्वारा रचित समझा जाता है)

(अनुवाद खाकसार का..)

शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

मेरी माँ का अपना ब्लॉग


मेरी माँ की पारम्परिक शिक्षा सुव्यवस्थित तरह से नहीं हुई.. जो भी पढ़ा-जाना..स्वयं-शिक्षा से सम्भव हुआ.. एक पुरुषवादी समाज में एक स्त्री को जो हमेशा दोयम दरज़े पर धकेला जाता रहा है.. इस प्रवृत्ति के प्रति वे हमेशा सचेत रही हैं.. कहने का अर्थ यह नहीं कि मेरे पिता कोई राक्षस थे.. बस एक पुरुषवादी समाज में एक पुरुष थे.. और क्रांतिकारी नहीं थे.. फिर भी उन्होने अपने स्तर पर मेरी माँ की प्रतिभा को एक सामाजिक मंच देने की कोशिशें की.. पर वह उनके जीवन का उद्देश्य नहीं था.. मम्मी की प्रतिभा को दुनिया के सामने प्रकाशित कर देना मेरा भी जीवन उद्देश्य नहीं.. बस अपने स्तर पर जो कर सकता हूँ कर रहा हूँ..


काफ़ी दिनों से मम्मी की कविताओं का ब्लॉग खोलना चाह रहा था.. मगर मैं मुम्बई से निकल नहीं पा रहा था.. फोन पर मम्मी से कविताओं को लेना सम्भव नहीं था.. अब वे उमर के उस मकाम पर पहुँच गई हैं जहाँ आप को दूसरों की आवाज़े स्पष्ट नहीं सुनाई देतीं.. तो इस दफ़े कानपुर जा कर उनकी कविताओं को सहेज लाया हूँ और धीरे धीरे उनके अपने ब्लॉग पर चढ़ाता रहूँगा.. उम्मीद है आप लोग मेरी माँ के भीतर के कवि का उत्साह-वर्धन करेंगे.. अपने ब्लॉग का नाम उन्होने स्वयं चुना है.. जीवन जैसा मैंने देखा.. आप देखें और टिप्पणी अवश्य करें..

शनिवार, 1 सितंबर 2007

कुछ छुट्टे शेर

ब्लॉग की दुनिया में हम लिखने वाले ही एक दूसरे के पाठक भी हैं.. जो हाल कमोबेश हिन्दी साहित्य का भी है.. भाई बोधिसत्व हिन्दी के प्रतिष्टित कवि हैं.. मेरा उनको पढ़ना स्वाभाविक है.. पर वो मेरे एक नियमित पाठक हैं..और वो ही नहीं उनकी पत्नी आभा भी मेरी नियमित पाठक हैं.. वे खुद एक ब्लॉग खोल कर अपने लेखन को पुनर्जीवित करना चाहती हैं.. मैं और बोधि उनका उत्साहवर्धन करते ही रहते हैं.. मित्रों से निवेदन है कि आप भी देखें उनके ब्लॉग अपना घर को और उनके हौसले को बढा़एं..

कल आभा ने मेरे काव्य-लेखन के बारे में जिज्ञासा ज़ाहिर की.. यूँ तो मैंने इस ब्लॉग का बिस्मिल्लाह एक कविता से ही किया था.. पर काव्य मैं वैसे ही लिखता बहुत कम हूँ.. आजकल तो बिलकुल ही नहीं.. और जो पहले का लिखा है उसे लेकर हमेशा बहुत शर्मसार रहा हूँ.. मुझे वह बहुत ही दो कौड़ी का लगता रहा है.. मगर आज 'क्या लिखूँ' की दुविधा से बचने के लिए, और आभा के आग्रह का मान रखते हुए.. ये छाप रहा हूँ.. आप की गालियों का स्वागत है..

न मतला है.. न मक़ता है.. न रदीफ़, न क़ाफ़िया.. मीटर भी नहीं.. बस कुछ छुट्टे शेर समझें..

खुद को बेचकर मैंने भी क्या-क्या खरीदा है।
मुझ से अब मक़सद मेरा, इस बाज़ार में पोशीदा है॥(छिपा हुआ)

सबके लिए रात का, शहर में अलग एक वक्त है।
नींद कम है और चैन आता नहीं, कमबख्त है॥

शराब-शबाब सब है और नंगे खड़े हैं हम्माम में।
नश्शा नदारद मगर, और ईमान सर उठाता है॥

खूबसूरत कपड़े उतारने को, तैयार है सब लड़कियाँ।
मगर दिल अपना देखो कहाँ उलझा जाता है॥

साँस अटकती है, टूटती है फिर भी नहीं छूटती है।
आदमी मरता बाद में है, बहुत पहले मारा जाता है॥

छुटपन से जवानी तक, जिन्हे पोसा-पाला था।
आँसू नहीं ये सपने हैं, जलने का धुँआ आता है॥

रात है बस शहर में, सूरज उगता है न डूबता है।
और चाँद भी गोवा- गंगटोक में नज़र आता है॥




चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: चिठेरी, कविता, परिचय,

रविवार, 19 अगस्त 2007

रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

कविता क्या है?.. इस पर लोग लगातार बतियाते ही रहे हैं.. कला मूलतः जीवन की पुनर्रचना है.. जीवन को देख समझ कर उसके बारे में जो राय बनती है वह कला/कविता में झलकती है.. फिर कविता को देख समझ कर जो राय बनती है.. वह आलोचना में झलकती है.. एक तरह से वह जीवन की पुनर्रचना की पुनर्रचना है..

पिछले दिनों मोहल्ले पर छपी एक कविता को लेकर 'कविता क्या है' पर खूब ज़ोर-आज़माईश हुई.. मेरी एक दो कौड़ी की टिप्पणी और उस पर प्रियंकर भाई के बचाव से अविनाश मियाँ दुखी भी हुए..बात आई-गई हुई.. कुछ रोज़ पहले प्रमोदजी ने अपने टाँड़ पर दफ़नाई हुई कुछ पुस्तकों को दुबारा जीवन दिया.. उसमें से एक को मुझे भी पढ़ने की रुचि हुई..अशोक वाजपेयी की कवि कह गया है.. घर ले आ कर पलटा तो उसमें कुछ कवियों पर दिलचस्प विश्लेषण पढ़ने को मिला.. मेरे प्रिय लेखक और कवि विनोद कुमार शुक्ल के बारे में कुछ बेहद हसीन बातें वाजपेयी जी ने लिखी हैं.. जो 'कविता क्या है' पर भी एक राय बनाने में मदद करती हैं.. देखें..

एक बेहद सामान्य स्थिति के बखान को विनोद कुमार शुक्ल बहुत शांति और बिना किसी नाटकीयता के ऐसा मोड़ दे देते हैं कि कुछ अप्रत्याशित सामने आ जाता है, पर वह फिर सामान्य की ओर चले जाते हैं। सामान्य और असामान्य के बीच एक द्वंदात्मक सम्बन्ध उनके यहाँ बराबर मिलता है, लेकिन कभी भी फ़ैंटेसी और यथार्थ के बीच एक महीन अंतर से अधिक कुछ नहीं होता। दिलचस्प यह है कि फ़ैंटेसी किसी तरह के इच्छित विश्वास या क्षतिपूर्ति की इच्छा का संस्करण नहीं बनती। विनोद कुमार शुक्ल फ़ैंटेसी औए सामान्य के ऐसे तीव्रीकरण को कि वह असामान्य लगेकभी चौंकाने के लिए इस्तेमाल नहीं करते। उनका काव्यशास्त्र चौंकाने का है ही नहीं: वह विचलित करने का है, हमारे समय की ऐसी सचाई दिखाने समझने का है, जो अन्यथा अदृश्य रहती है और जिसे कविता में देखना कहीं गहरे विचलित होना है।

कविता का काम जहाँ चीज़ों के बीच नए सम्बन्ध खोजना है, वहाँ चीज़ों को उनकी स्वतंत्र सत्ता में देखना भी है। अगर विनोद कुमार शुक्ल को 'गरीब का लड़का प्रतीकों के बाबा-सूट में कहीं जाने को तैयार दिखाई पड़ता है तो यह एक और प्रमाण उनके उस आग्रह का है जिसमें वह एक चीज़ को ठीक उसी चीज़ के रूप में निषेध करते हैं। चीज़ों और उनके सम्बन्धों के प्रति यह सम्मान ही उन्हे गरीब लड़के को गरीबी का उदाहरण मानने की आसान प्रवृत्ति से मुक्त रखता है। हिन्दी में हर चीज़ को किसी दूसरी चीज़ का प्रतीक मानने की इतनी भयानक रूढ़ि है कि चीज़ों और उनकी स्वतंत्रता के प्रति आदर और संवेदनशीलता का यह पुनर्वास मूल्यवान और कुछ मायनों में ऐतिहासिक है।

===

विनोद कुमार शुक्ल की कविता एक ठोस, जाना पहचाना लेकिन अप्रत्याशित और विचलित करने वाला संसार हमारे लिए खोजती-रचती चलती है जो प्रामाणिकता और व्यापकता रखते हुए भी उनका है, अद्वितीय है और उदाहरण होने से बचा हुआ है। वह निश्चय ही हमारा भी है लेकिन अपनी पूरी सघनता, निर्ममता, वस्तुपरकता और ऐंद्रिकता के साथ एक संसार है, इस-उसका उदाहरण नहीं।

यहाँ पढ़िये 'अतिरिक्त नहीं' में संकलित एक कविता--



रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

रहने के प्रसंग में कहीं एक घर था

उसी तरह प्यास के प्रसंग में उसमें

एक छोटे घडे़ में पानी भरा था

बहुत दिन से बचा था के कारण

घड़ा पुराना हो चुका था

पता नहीं क्या था के कारण

कुछ था जो याद नहीं आ रहा था

जो याद आ रहा था वह इतना था

कि उसके प्रसंग भी बहुत थे

आसपास था, दूर था

बीते हुए रात दिन का समय हो चुका था

बीतने वाले रात दिन का समय था

सब तरफ़ जीवन था

संसार के प्रसंग में घड़ा छोटा था

कोई किसी के घर पानी पीने आ सकता है

इसलिए छोटे घड़े के बदले

बड़े घड़े होने का एक प्रसंग था।


'अतिरिक्त नहीं ': वाणी प्रकाशन द्वारा २००० में प्रकाशित; मूल्य १२५/-

अशोक वाजपेयी की पुस्तक 'कवि कह गया है' का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ ने किया है; मूल्य ५५/-


गुरुवार, 16 अगस्त 2007

चित्त जहाँ भयमुक्त हो..

जिस कवि की पहचान उसकी नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित रचना गीतांजलि है.. जिसमें वह परमपिता परमेश्वर की आराधना के गीत गाता है.. उसे उसकी रचनाओं की आध्यात्मिक अन्तर्वस्तु के कारण मनस्वी और आधुनिक ऋषि की तरह जाना जाता है..उसके ऊपर आरोप है कि उसने अपने एक गीत में विधाता, पिता, राजेश्वर के सम्बोधन देकर जार्ज पंचम की स्तुति की है.. जबकि यही सम्बोधन वह अपनी दूसरी रचनाओं में ईश्वर के लिए करता रहा है..

वह गीत आज इस देश का राष्ट्रगीत है.. आरोप लगाने वाले वे हैं जिनकी राजनैतिक धारा का स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना देना तक नहीं रहा.. और उन आरोपों पर विश्वास करने वाले यह तक भूल जाते हैं कि १९११ के कांगेस के उस अधिवेशन के पहले दिन वन्दे मातरम भी गाया गया था.. मेरी नज़र में यह हमारी विचारों की सीमाएँ ही है.. जो हम कवि के विराट कृतित्व को अपने क्षुद्र पैमानो से नापते हैं..

यहाँ कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक और कविता छाप रहा हूँ जो उन्होने १९१२ में लिखी और गीतांजलि में संकलित की.. जैसे जनगणमन में उस अधिनायक को एक जगह माता कहकर सम्बोधित कहने के बावजूद लोगों का प्रबोधन नहीं हुआ.. ऐसे संशयजीवी यहाँ प्रयुक्त पिता को भी उसी संकीर्ण अर्थों में समझेंगे..

पहले देवनागरी लिपि में मूल बंगला.. और फिर अंग्रेज़ी में स्वयं कवि द्वारा किया हुआ अनुवाद..


चित्त जेथा भयशून्य

चित्त जेथा भयशून्य उच्च जेथा शिर, ज्ञान जेथा मुक्त, जेथा गृहेर प्राचीर

आपन प्रांगणतले दिवस-शर्वरी वसुधारे राखे नाइ थण्ड क्षूद्र करि।

जेथा वाक्य हृदयेर उतसमूख हते उच्छसिया उठे जेथा निर्वारित स्रोते,

देशे देशे दिशे दिशे कर्मधारा धाय अजस्र सहस्रविध चरितार्थाय।

जेथा तूच्छ आचारेर मरू-वालू-राशि विचारेर स्रोतपथ फेले नाइ ग्रासि-

पौरूषेरे करेनि शतधा नित्य जेथा तूमि सर्व कर्म चिंता-आनंदेर नेता।

निज हस्ते निर्दय आघात करि पितः, भारतेरे सेइ स्वर्गे करो जागृत॥


Where the mind is without fear

Where the mind is without fear and the head is held high

Where knowledge is free

Where the world has not been broken up into fragments

By narrow domestic walls

Where words come out from the depth of truth

Where tireless striving stretches its arms towards perfection

Where the clear stream of reason has not lost its way

Into the dreary desert sand of dead habit

Where the mind is led forward by thee

Into ever-widening thought and action

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


इसके बाद भी देश की आज़ादी और ईश्वर की सत्ता के सम्बन्ध के विषय में रवीन्द्रनाथ के आशय पर किसी को शुबहा हो तो उस व्यक्ति को किसी भी तरह विश्वास नहीं दिलाया जा सकता..


बुधवार, 15 अगस्त 2007

लोहे का स्वाद

लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिस के मुँह में लगाम है


ये मुहावरा है..? सुभाषित है..? या आर्य सत्य है..?
ये
सुदामा पांडे 'धूमिल' द्वारा लिखी हुई आखिरी पँक्ति है..

१४/१/१९७५ का दिन.. धूमिल भीषण सरदर्द से पीड़ित थे.. दृष्टि एकदम कमज़ोर हो चुकी थी.. छोटे भाई लोकनाथ पांडे से बोले—“ज़रा कागज़ पेंसिल लाओ, देखें-दृष्टि कमज़ोर हो गई है, चश्मा बगैर लिख पाता हूँ या नहीं। कागज़ पेंसिल मँगाकर यह पँक्तियाँ लिखीं..



शब्द किस तरह

कविता बनते हैं

इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए

आदमी को पढ़ो

क्या तुमने सुना कि यह

लोहे की आवाज़ है या

मिट्टी में गिरे हुए खून

का रंग।


लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिस के मुँह में लगाम है।


आज़ादी के साठ साल बाद किस को कितनी आज़ादी मिली यह किससे पूछा जाय यह ज़रा अच्छे से सोचने की ज़रूरत है?

धूमिल को मरे बत्तीस साल हो गए.. मोबाइल फोन है.. इंटरनेट है.. हेमा मालिनी के गाल जैसी सड़क है..शॉपिंग मॉल है..शहरों-कस्बों की रंगत बदल गई है.. पर कुछ तो है जो इन सजावटों के पीछे इस देश में अभी भी नहीं बदला है..?

पढ़िये धूमिल की एक और कविता..


एक कविता: कुछ सूचनाएँ

सबसे अधिक हत्याएँ

समन्वयवादियों ने की।

दार्शनिकों ने

सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।

भीड़ ने कल बहुत पीटा

उस आदमी को

जिस का मुख ईसा से मिलता था।


वह कोई और महीना था।

जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,

किंतु इस बार तो

मौसम बिना बरसे ही चला गया

न कहीं घटा घिरी

न बूँद गिरी

फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु

कई प्रतिशत बढ़ गए


कई बौखलाए हुए मेंढक

कुएँ की काई लगी दीवाल पर

चढ़ गए,

और सूरज को धिक्कारने लगे

--व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है

सूरज कितना मजबूर है

कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।


हवा बुदबुदाती है

बात कई पर्तों से आती है

एक बहुत बारीक पीला कीड़ा

आकाश छू रहा था,

और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर

शौचालयों के सामने

पँक्तिबद्ध खड़े हैं।


आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं

लोग खोई हुई आवाज़ों में

एक दूसरे की सेहत पूछते हैं

और बेहद डर गए हैं।


सब के सब

रोशनी की आँच से

कुछ ऐसे बचते हैं

कि सूरज को पानी से

रचते हैं।


बुद्ध की आँख से खून चू रहा था

नगर के मुख्य चौरस्ते पर

शोकप्रस्ताव पारित हुए,

हिजड़ो ने भाषण दिए

लिंग-बोध पर,

वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं

आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ

अध्यापिकाएँ बन गई हैं

और रिटायर्ड बूढ़े

सर्वोदयी-

आदमी की सबसे अच्छी नस्ल

युद्धों में नष्ट हो गई,

देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य

विद्यालयों में

संक्रामक रोगों से ग्रस्त है


(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को

सड़को पर

किश्तियों की खोज में

भटकते हुए देखा है)


संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ

भीतर ही भीतर

एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है


पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ

प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं

सबसे अच्छे मस्तिष्क,

आरामकुर्सी पर

चित्त पड़े हैं।


वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'कल सुनना मुझे 'से साभार


मंगलवार, 31 जुलाई 2007

भागी हुई लड़कियाँ

आलोक धन्वा ने गिनी चुनी कविताएं लिखी है.. पर सारी की सारी अविस्मरणीय हैं.. गोली दागो पोस्टर, जनता का आदमी, पतंग, भागी हुई लड़कियाँ, ब्रूनों की बेटियाँ..आलोक धन्वा की उमर पचपन साठ से कम क्या होगी.. मगर कुल जमा उनका एक ही संग्रह छपा है..दुनिया रोज़ बनती है.. आज ही देखने को मिला .. कई कविताएं ऐसी कि साफ़ लगता है कि वे संग्रह की पृष्ठ संख्या को सैकड़े के करीब धकेलने के लिए लिखीं गईं हैं.. पुरानी वाली राय संकट में आ गई.. रायों के साथ ये बहुत होता है.. कुछ नया तथ्य मिलते ही उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है.. क्या करूँ.. राय बनाना ही छोड़ दूँ क्या..?

पिछले दिनों आलोक धन्वा अपनी कविता के कारण नहीं अपने निजी प्रसंगों के चलते चर्चा में रहे.. साथ ही उनकी कविता 'भागी हुई लड़कियाँ' का भी ज़िक्र होता रहा.. कविता मेरी पढ़ी हुई थी पर पास में नहीं थी.. मेरे निवेदन पर मेरे पुराने अज़ीज़ इरफ़ान ने यतन से आलोक जी के संग्रह की एक प्रति मुझे सप्रेम प्रेषित कर दी .. इरफ़ान इस तरह के कामों के लिए हमेशा प्रसिद्ध भी रहे हैं दोस्तों के बीच.. वो जिन दूसरे तरह के कामों के लिए भी प्रसिद्ध रहे हैं.. उनकी बात मैं यहाँ नहीं करूंगा..

वापस आलोक जी पर लौटते हुए पढ़ने वालों से मेरा आग्रह यही रहेगा कि वे कविता को कवि के निजी जीवन की छाया से स्वतंत्र करके पढ़े.. बावजूद इसके भागी हुई लड़कियां वास्तविक से ज़्यादा एक रूमानी दुनिया का खाका खींचती सी लगती है... मेरी ये राय कविता के शब्दों को कुंजी पटल पर पीटते हुए बनी है.. इसे बहुत कान न दें.. राय ही तो है..



भागी हुई लड़कियाँ

एक

घर की ज़ंजीरें
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फ़िल्मों में बार बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भागती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने-भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपर्दों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले?

क्या तुम यह सोचते थे कि
वे गाने सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए थे?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी ज़िंदगियों में फैल जाता था?

दो

तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं
कभी वह ख़त
जिसे भागने से पहले वह
अपनी मेज़ पर रख गई
तुम तो छिपाओगे पूरे ज़माने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा, उसका पारा,
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफ़ी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची खुची चीज़ों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूँज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहाँ से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहाँ से भी
मैं जानता हूँ
कुलीनता की हिंसा!

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवन चक्कियों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियाँ होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों में ग़ुम होती हुई
तारों में ग़ुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में


चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा ज़रूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे टैंक जैसे बन्द और मज़बूत
घर से बाहर
लड़कियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हे यह इजाज़त नहीं दूँगा
कि तुम अब
उनकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
ग़लतियाँ भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी
शुरु से अन्त तक
अपना अन्त भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पाँच

लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दूल्हों से कितनी धूल उठती है!

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ़ भटकती है
ढूँढ़ती हुई अपना व्यक्तितव
एक ही साथ वेश्याओ और पत्नियों
और प्रेमिकाओं में!

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा!

छह

कितनी कितनी लड़कियाँ
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे, अपनी डायरी में
सचमुच की भागी हुई लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हे दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताक़त से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें!

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
तुम से नहीं कहा किसी स्त्री ने

सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
कितनी कितनी बार कहा कितनी
स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाज़ों तक दौड़ती हुई आईं वे
सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ़ आज की रात रहेगी।

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
'दुनिया रोज़ बनती है' से साभार
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...