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गुरुवार, 7 जून 2012

रुपया



शांति नहा रही थी। बाहर से अजय की आवाज़ आई- ये क्या है शांति? आवाज़ में बेसब्री थी और हैरानी भी और शायद थोड़ा ग़ुस्सा भी। अन्दर से शांति ने जानना चाहा कि अजय किस चीज़ की बात कर रहा है। मगर उसका जवाब कुछ ऐसा लम्बा, उलझा और चिड़चिड़ाहट से भरा हुआ था कि शांति को कुछ समझ नहीं आया। उसने बाथरूम से बाहर आने तक उस संवाद को मुल्तवी कर दिया। 

अजय बेड पर बैठा बाथरूम के दरवाज़े की ओर देख रहा था जब शांति उस दरवाज़े में आई। अजय ने अपनी नज़रें गद्दे की ओर उचकाई और पूछा- ये क्या है? बेड पर पाँच सौ और हज़ार के नोटों की कुछ गड्डियाँ पड़ी थीं। साथ में एक काग़ज़ का मुचड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा भी सुस्ता रहा था। शांति उन गड्डियों को और उस लिफ़ाफ़े को पहचानती थी। वो ठीक-ठीक कितने रुपये थे, शांति नहीं जानती थी। सबसे पहले शांति ने उन्हे अपनी डेस्क पर पड़े देखा था। बाद में वो कुछ देर उसके पर्स में रहे और एक लम्बे समय तक उसके लॉकर में। और इन सन जगहों के अलावा वो शांति के ज़ेहन में भी बने रहे, लगातार। कभी जागते में उनका ख़याल आया और कभी सपनों में विचित्र स्थितियों में वो शांति के सामने उपस्थित होते रहे। 

'कहाँ से आए ये पैसे?' अजय पूछ रहा था। सवाल पाँच शब्दों का ही था मगर उन पाँच शब्दों के वाक्य में और भी दूसरे सवाल छिपे थे जो अजय ने नहीं पूछे; मसलन- क्या ये पैसे हमारे हैं, जो तुमने घर के तमाम खर्चों में से पाई-पाई जोड़कर बचा के रखे और मुझे बताया तक नहीं? या फिर तुम्हारे पास इतने पैसे पड़े हैं और तुमने परसों दस हज़ार के लिए मुझे डेढ़ मील एटीएम तक दौड़ाया क्योंकि अगली सुबह आने वाले मकानमालिक की बात न सुननी पड़े? या फिर कहाँ से आए ये पैसे?  अपना एक घर होने की जो बरसों की तुम्हारी अभिलाषा है, उसे पूरी करने के लिए किससे उधार लिए हैं तुमने ये पैसे? और अगर उधार लिए हैं तो मुझे बताया क्यों नहीं?  

और क्यों न होते इतने सारे सवाल? रुपया चीज़ ही ऐसी है। जितना सरल और समतल दिखता है वैसा है नहीं। रुपया एक ऐसी आभासी शै है जिस के ज़रिये आदमी अपने भौतिक अरमानों का संसार गढ़ता है। रुपये को न खाया जा सकता है, न पहना जा सकता है, न ओढ़ा और बिछाया जा सकता है मगर खाने, पहनने, ओढ़ने, बिछाने से लेकर आकांक्षाओं की सारी सम्भावनाओं अपने भीतर समाए रहता है। 

अपने मूल चरित्र में अरूप होते हुए भी रुपया त्रिआयामी जगत के सारे रूप और गति प्राप्त कर सकता है और यही नहीं काल नामक चौथे आयाम में यात्रा का सामर्थ्य भी रखता है। भूत और वर्तमान के अलावा भविष्यकाल में हाज़िर होने वाला रुपया भी आदमी के भौतिक और आध्यात्मिक तल में गुणात्मक परिवर्तन करने में सक्षम होता है। रुपया रूप बदलता है, और आदमी को भी बदलता है। चाहे जेब में हो चाहे बैंक के खाते में, रुपये की उपस्थिति आदमी का किरदार बदल देती है, चेहरे की चमक बदल देती है।अजय के पूछे और अनपूछे सवाल उन सारे सम्भावित बदलावों की बेचैनी से आक्रान्त थे। लेकिन शांति ने अजय के उन सारे अनपूछे सवालों को किनारे कर दिया- 'असीम के हैं..'  
असीम शांति का चचेरा भाई है जो रहता तो शाहाबाद में है लेकिन अपने काम के सिलसिले में साल छै महीने में उसका एकाध चक्कर इधर लग जाता है। 
असीम के..? अजय का स्वर पहले से बदल गया था। उनमें मौजूद सम्भावनाएं इस बार कहीं दूर पीछे चली गई थीं। 
दो लाख रुपये.. असीम के.. तुम्हारे पास क्या कर रहे हैं? 
दो लाख हैं? शांति ने हैरत व्यक्त की।
क्यों.. तुम्हें नहीं मालूम? 
'मैंने कभी गिने नहीं..!' 

तक़रीबन दो महीने पहले अचानक एक रोज़ असीम शांति के दफ़्तर आ गया। इधर-उधर की बातों के बीच शांति अपना काम भी करती रही। फिर उसका एक फ़ोन आया। और फ़ोन पर बात करते-करते वो कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और दफ़्तर की तमाम कुर्सियों के बीच इधर से उधर टहलने भी लगा। शांति ने बहुत ध्यान नहीं दिया, वो अपने काम में लौट गई.. दो-तीन मिनट भी ज़ाया करने से क्या फ़ायदा। पर जब वो फ़ोन पर बात ख़त्म करके कुर्सी पर वापस बैठा तो वो कुछ बेचैन और परेशान नज़र आया। शांति ने चाय मँगाई थी, वो आ गई। मगर असीम ने चाय की तरफ़ देखा तक नहीं। वो उठकर खड़ा हो गया और कहा कि कुछ प्राबलम हो गई है उसे जाना होगा। और इतना कहकर उसने शांति के कुछ कहने का इंतज़ार भी नहीं किया और लगभग दौड़ता हुआ सा वहाँ सा चला गया। उसके जाने के काफ़ी बाद शांति जब मेज़ का सामान समेट रही थी, तब उसने देखा उस प्लास्टिक की थैली को। वो शांति की नहीं थी, किसी और की भी नहीं थी।  शांति ने ज़ोर देकर सोचा तो उसे याद आया कि जब असीम आया था तो उसके हाथ में वो थैली थी और उसने वो मेज़ पर रख दी थी। शांति ने खोलकर देखा तो थैली के अन्दर एक काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा था और उसके अन्दर से नोटों की कई गड्डियां बेशर्मी से बाहर झांक रही थी। शांति ने तुरंत असीम को फ़ोन किया। कई बार घंटी जाती रही पर असीम ने फ़ोन नहीं लिया। पहले शांति ने सोचा कि दफ़्तर की दराज़ में ही छोड़ दे। उन रुपयों के असली हक़दार के ग़ैर-हाज़िरी में उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी न चाहते हुए भी शांति पर आ पड़ी थी। और इसलिए उस भार को दराज़ में असुरक्षित छोड़ने का विकल्प ठुकरा कर अपने पर्स में डालकर घर तक ले आई। घर आकर भी शांति ने कई बार असीम को फ़ोन मिलाया पर बात नहीं हुई। और जब बात हुई उसके पहले शांति  को उस दिन अचानक असीम के परेशान हो जाने की वजह मालूम चल चुकी थी। असीम के शाहाबाद वाले घर पर सी बी आई वालों ने छापा मारा था। और एक मामूली सरकारी कर्मचारी के घर से करोड़ों की रक़म, ज़ेवर और अचल सम्पत्ति के ब्योरे बरामद किए थे। जब असीम शांति के पास था, छापा ठीक उसी वक़्त मारा गया था। ये जानकारी मिलने के बाद वो रुपये शांति के ज़ेहन में और खलबली मचाने लगे जैसे किसी अपराध में वो भागीदार बन गई हो।  

किसी तरह जब शांति से असीम की बात हुई, तो वो अपने वक़ील के साथ था। और उसने उन रुपयों से बिलकुल कन्नी काटते हुए कहा कि शांति रख ले, और खर्च करना चाहे तो खर्च कर दे। शायद वो सीबीआई द्वारा और माल की बरामदगी से डरा हुआ था। जब शांति उसके प्रस्ताव पर राजी नहीं हुई तो उसने कहा कि वो बाद में कभी ले लेगा। शांति उन रुपयों को अपने पास रखने को क़तई तैयार नहीं थी मगर दे तो किसको दे। असीम की पत्नी दो साल से बच्चों को लेकर अलग रह रही है, वो लेगी भी या नहीं, और उसे देना ठीक होगा कि नहीं- यह सब सोचकर उसने असीम के पिताजी को फ़ोन किया और खुद शाहाबाद आकर रुपये देने की पेशकश की। लेकिन चाचा जी ने असीम की काली कमाई को अपने लिए गुनाह बताया और लेने से इंकार कर दिया। तब से असीम के वो अनगिने रुपये जिन्हे अजय ने गिनकर दो लाख बताया, शांति के लॉकर में उसे मुचड़े लिफ़ाफ़े में पड़े रहे, अचल। हालांकि शांति के मन को वो लगातार विचलित करते रहे। 
तुमने मुझे क्यों नहीं बताया- शांति के पूरे बयान को सुनने के बाद अजय ने पूछा। 
'देखो अजय.. ये रुपये हैं.. और बहुत सारे रुपये हैं.. एक तरह के लावारिस रुपये.. मैं इन्हे वापस लौटाने के लिए बेचैन हूँ.. क्योंकि कहीं न कहीं मेरे भीतर एक लोभ है.. मैं तो उस से लड़ ही रही थी.. नहीं चाहती थी कि तुम भी.. '  

अजय ने कुछ नहीं कहा। उसने नज़र घुमा के देखा, दो लाख रुपये अपनी पूरी बेशर्मी के साथ बिस्तर पर पड़े हुए थे। अजय और उनके बीच एक अदृश्य डोरी थी जिसके एक सिरे पर ईमान था तो दूसरे पर लोभ। 

*** 

(दैनिक भास्कर में छपी.. शायद पिछले हफ़्ते)

रविवार, 13 मई 2012

दोस्त


उस दिन शांति के सर में तेज़ दर्द था। शायद गर्मी की वजह से।  शांति आँख बंद करके लेटी ही थी कि एस एम एस की घंटी बजी। लेटे-लेटे ही शांति ने फ़ोन की खिड़की पर देखा- आरती का मेसेज था- उसकी माँ नहीं रही। शांति का मन दो मिनट तक उस के दर्द से भरे सर और हाथ में पकड़े फ़ोन के बीच झूलता रहा। आरती शांति के सामने वाली इमारत में रहती है। उसका बेटा पीयूष, अचरज के ही क्लास में है और दोनों की अच्छी दोस्ती भी है। दो-एक बार आरती और पंकज, शांति के घर आए हैं और दो-एक बार शांति और अजय उनके घर गए हैं। आरती की माँ और पिताजी शांति की इमारत के दूसरे विंग में रहते थे। और शांति का घर उनके लिए आरती के घर से भी पास पड़ता था। मगर उनका कहीं आना-जाना कम ही होता था। आंटी को वैसे भी गठिया था और चलने-फिरने में तकलीफ़ होती थी और अंकल वैसे तो स्वस्थ हैं मगर बहुत मिलनसार नहीं। नमस्ते करने पर मुस्करा कर जवाब ज़रूर देते हैं पर उससे ज़्यादा नज़दीकियों की कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। न बच्चों का हाल पूछते, और न मौसम के हाल पर बिसूरते। बस आंटी के बगल में खड़े होकर उनकी बातों के खतम होने का इन्तज़ार करते। और अक्सर उस इंतज़ार में उनकी भंगिमा बिगड़ सी जाती। मगर आंटी उनपर ज़रा ध्यान नहीं देती- वो सूचनाओं के पर्याप्त आदान-प्रदान के बाद ही हिलतीं। वैसे भी उनकी हड्डियों को हिलने में तक़्लीफ़ थी तो वो हर क़दम का भरपूर लाभ लेकर ही आगे बढ़ना चाहतीं। अंकल बेचारे, जो शायद किसी भी आम पुरुष की तरह चलने में नहीं पहुँचने में यक़ीन रखते थे, उतनी देर कसमसाते रहते। अब आंटी चली गईं.. अब उन्हे कभी इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा- शांति ने सोचा। सर दर्द से बोझिल हो रहा था। खड़े-खड़े उसे उठाए रखना भारी पड़ रहा था, इसीलिए शांति लेट गई थी। मगर इस नई सूचना न उसका लेटे रहना मुश्किल हो गया। उसे आरती के पास जाना ही होगा- सोचकर शांति उठ गई। पहले अजय को मेसेज किया, फिर पाखी को बताया, और निकल पड़ी। 

घर के बाहर जूते-चप्पलों की ढेरी लगी हुई थी। दरवाज़ा खुला था। और बाहर के कमरे में ही आंटी का शव कमरे के बीचो-बीच रखा था।  शांति ने पिछली बार जब आंटी को देखा था उसके मुक़ाबले काफ़ी कम वजन लग रहा था। अस्पताल में बिताए अन्तिम दिनों में शायद ये बदलाव आया होगा।  शांति की नज़रें आरती को खोजने लगीं। कुछ पहचाने हुए और कुछ अनजान चेहरे भी उस कमरे में मौजूद थे। सबके चेहरे गम्भीर और उदास। पर उनमें आरती नहीं थी। आंटी के शव के साथ उन अनजान लोगों के बीच खड़े रहना शांति को अजीब सा लगने लगा। शांति अन्दर चली गई।  आरती रसोई में पंकज और एक दो अन्य लोगों के साथ थी-  दाह-संस्कार के बारे में बात हो रही थी। कब होगा, कैसे होगा.. किस-किस को खबर हो गई, कौन रह गया आदि। जैसे ही शांति और आरती की नज़रें मिलीं। दोनों स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के गले लग गईं। शांति ने आरती की पीठ पर एक-दो दफ़े दिलासा के लिए हाथ फेरा। आरती ने भी हलके से शांति की पीठ थपथपाई.. कुछ पल वे इसी मुद्रा में रहे और फिर अलग हो गए। आरती वापस अपनी चिंताओ में लौट गई। शांति को एक पल का अवकाश मिला और उसे अपना सरदर्द याद आया। वो वहीं था, कहीं नहीं गया था। उस सर दर्द की उपस्थिति में ही शांति ने पाया कि शांति का आरती को दिलासे के लिए गले लगाना एक औपचारिकता था- उसने पहले से सोचा हुआ था कि वो क्या करेगी। आंटी की मृत्यु दुख का मौका था मगर तक़ल्लुफ़ का भी मौक़ा था। शांति को दुख है पर इतना भी नहीं कि उसे रोना आ जाय। और आरती के दुख में शरीक़ होना बिना रोए कैसे मुमकिन है.. शायद सिर्फ़ उसे गले लगाकर और पीठ थपथपाने की दिलासा देकर। लेकिन अपनी औपचारिकता के अलावा उस गले लगने में शांति को आरती की भी औपचारिकता का एहसास हुआ। जैसे पहले से तय था कि वो गले मिलेंगे और कुछ पल एक-दूसरे की पीठ सहलाकर अलग हो जाएंगे। आरती पहले से तैयार थी। शांति ने आरती के चेहरे को देखा- आरती उदास थी पर रो नहीं रही थी। उसके हावभाव से लग रहा था कि ज़िम्मेदारी निभा रही थी। मृत्यु एक निजी अवसर है, मरने वाले के लिए और उसके क़रीबी लोगों के लिए। मगर मृत्यु एक सामाजिक अवसर भी है, जहाँ दोस्त, पड़ोसी और दूर के सम्बन्धी उस सत्य के साक्षी होते हैं। उस वक़्त आरती को देखते हुए बिलकुल नहीं लगा कि उसके लिए आंटी की मृत्यु  कोई निजी अवसर थी। वो पूरी तरह उसके सामाजिक आयाम में बनी हुई थी। तो फिर आंटी की मृत्यु का आरती पर निजी तौर पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था? ऐसा कैसे सम्भव था! 
रसोई में भीड़ बढ़ने लगी थी। शांति पीछे हट आई। अचानक उसकी नज़र दूसरे कमरे में बिस्तर पर बैठे अंकल पर पड़ी। अंकल कमरे में एकदम अकेले थे और वो उसी ओर देख रहे थे। शांति को एकाएक समझ नहीं आया कि वो क्या करे? नमस्ते करे या कुछ और? शांति ने अपने आप को आरती का सामना करने के लिए तो तैयार किया था, पर अंकल की बात वो भूल ही गई थी। और इसीलिए उनसे कैसे मिले में कुछ भी सूझ न पाने की स्थिति में शांति दरवाज़े के सामने से हट गई। 

अंकल अकेले क्यों थे? उनकी पत्नी की मृत्यु हुई थी.. कोई उनको दिलासा क्यों नहीं दे रहा? फिर शांति ने ग़ौर से देखा पूरे घर में आरती और पंकज के दोस्त और पड़ोसी ही थे। अंकल का एक भी दोस्त वहाँ नहीं था? शांति को लगा कि उसे अंकल के पास बैठना चाहिये। वो दरवाज़े पर लौट गई। अंकल ने वापस उस की ओर देखा। इस बार शांति तैयार थी- उसने नमस्ते कर ली.. और उनके पास ही बैठ गई। पर उसके पास कहने को कुछ नहीं था। अंकल की तरफ़ सीधे देखना भी आसान नहीं था। वो इधर-उधर देखती रही। बीच-बीच में एक नज़र अंकल को भी देख लेती। अंकल भी रो नहीं रहे थे। उदास थे और चुप थे। जिस बिस्तर पर वो बैठे थे उस पर अस्पताल जाने से पहले आंटी भी सोया करती होंगी। कितनी रातों दोनों ने जीवन और मृत्यु की बाते की होंगी। अचानक शांति को एहसास हुआ कि क्यों नहीं रो रहे थे अंकल और आरती। आंटी की मृत्यु के पहले ही उनकी बीमारी के दौरान उन्होने आंटी की मृत्यु की कल्पना करना शुरु कर दिया होगा.. और शायद उसका इंतज़ार भी। 
कुछ वक़्त बीत गया। कमरे में शांति और अंकल ही बने रहे। अंकल का कोई दोस्त तब भी नहीं आया था। शायद उनका कोई दोस्त था ही नहीं। आंटी ही उनकी एकमात्र दोस्त थीं। अंकल और दुनिया का जो भी सम्बन्ध था, आंटी के ज़रिये था। बिना आंटी के अंकल शायद अब चलते समय किसी से मिलने के लिए कहीं नहीं रुकेंगे। किसी का इंतज़ार नहीं करेंगे.. सीधे अपनी मंज़िल पर पहुँच जायेंगे। 

*** 

पिछले इतवार को दैनिक भास्कर में छपी

गुरुवार, 10 मई 2012

समय की नदी




 जब शांति छोटी थी तो तो उसके पास बहुत खिलौने नहीं थे। बच्चों के खेलने के लिए उन दिनों लट्टू, फिरकी, झुनझुना, गुब्बारे आदि होते थे। लड़के गिल्ली-डंडा और कंचे खेलते, पतंग उड़ाते, और बेकार हो गए साइकिल के टायर को किसी लोहे की तीली से घुमाते। और लड़कियां गुड्डे- गुड़ियों  से घर-घर खेलती। लोगों की आमदनी कम थी और इसलिए माना जाता था कि बच्चों के मन बहलाने के लिए टूटी-फूटी बेकार हो गई चीज़ें काफ़ी है। और होता भी यही था। कांच की टूटी हुई चूड़ियां, शीशे के टुकड़े, कोई गुलाबी रिबन, कोई चमकीली पन्नी या गोटा और ऐसी हुई कुछ बटोरी हुई चीज़ें शांति का ख़ज़ाना हुआ करती थीं। बची-खुची चिंदियों और फटी हुई साड़ियों से शांति की माँ ने उसके लिए गुड़िया बनाई थी। जब तक उसका बचपन रहा शांति उस गुड़िया से खेलती रही। स्कूल जाने, घर में माँ का हाथ बँटाने, और इन सब से खेलने के बाद भी बहुत सारा वक़्त था जो बचा रह जाता था। उस वक़्त में शांति और उसकी उमर के दूसरे बच्चे बिलकुल खाली रहते। कुछ भी न करते। अगर घर के अन्दर होते तो खिड़की पर बैठकर बाहर ताका करते। और अगर बाहर होते तो पेड़, मिट्टी और घास के उस अबूझ संसार में फैले अनगिन रहस्यों पर अचरज किया करते। कभी बाग में टपाटप गिरते महुओं की कालीन पर से महुए बीन कर खाते। कभी पहली बरसात के बाद ज़मीन की दरारों से निकलती बीर-बहूटी की फ़ौजों के कुछ सिपाहियों को माचिस की खाली डिब्बियों में क़ैद करते। तो कभी निपट दुपहरी में तपती छत पर पानी की बूंद टपका कर उसका हवा होना देखते। 

अब ज़माना बदल गया है। अब अचरज के पास असली खिलौने हैं। क्योंकि शांति और अजय के पास दाल-रोटी, कपड़े-लत्ते आदि जुटाने के बाद भी इतना पैसा बचा रहता है कि वो अपने बच्चों की ज़िद को पूरा कर सकें। असल में सच तो ये है कि पहले की तरह बच्चों को अब पैर पटक कर ज़िद करने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती। माँ-बाप उनके मुँह खोलने से पहले ही उनकी पसन्द के खिलौने हाथों में उठाए चले आते हैं। और इस हद तक खिलौने खरीदते हैं कि कमरे में उनको रखने की जगह कम पड़ने लगती है। ज़्यादातर बच्चे असत्ती होते हैं, जुनूनी होते हैं। एक कहानी पसन्द आ गई तो बीस बार उसी कहानी को सुनाने की ज़िद करेंगे। कोई चीज़ पसन्द आयी तो हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाते हैं। बार-बार उसी को दोहराते जाते हैं। एक बार जो मज़ा मिला उसी को निरन्तर तलाशते जाते हैं। न जाने ये अकेले बच्चों का स्वभाव है या मनुष्य मात्र का! जो भी हो ये तर्कातीत भाव बच्चों में विशेष रूप से में झलकता है। शायद इसी नादानी को बचपना और इस तर्कातीत स्वभाव से ऊपर उठ जाने को परिपक्वता कहा जाता है। कोई मोकेपॉन और कोई टेनबेन बच्चों की इस वृत्ति को जमकर निचोड़ते हैं। और नतीजे में बच्चों की अलमारियों टेन्बेन की घड़ी, टेन्बेन के बैग, और न जाने क्या-क्या से उबलने लगती हैं। बहुत एहतियात बरतने पर भी शांति अचरज को इस जमाख़ोरी से अलग नहीं रख पाई। और फिर धीरे-धीरे शांति को एहसास हुआ था कि बच्चे सिर्फ़ अपने माँ-बाप और परिवार से नहीं, पूरे समाज से संस्कार ग्रहण करते हैं।  

जिस समाज में शांति बड़ी हुई थी, अब वो समाज नहीं रहा। इस समाज का रहन-सहन अलग है, मूल्य अलग, गति अलग है। बड़ों के पास तो समय नहीं ही है, बच्चों के पास भी समय नहीं है। अचरज के पास समय की मात्रा उतनी ही है जितनी शांति के पास होती थी। वही चौबीस घंटे। पर सुबह उठने से लेकर रात सोने तक अचरज शांति से कहीं ज़्यादा चीज़ें कर रहा होता है और कहीं अधिक सूचनाएं बटोर रहा होता है। शांति कभी-कभी अचरज और पाखी की किताबें और पाठ्यक्रम देखकर चकरा जाती है। इतनी कम उमर में क्या-क्या पढ़ना पड़ रहा है उसके बच्चों को। उनकी उमर शांति को देश-दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जबकि पाखी और अचरज स्कूल में जो सीखते हैं वो तो सीखते ही हैं उसके अलावा इन्टरनेट, और टीवी से भी लगातार सूचनाओं का संग्रह और विश्लेषण करते रहते हैं। घर से बाहर निकलते हैं तो भी हर ओर से उन पर साइनबोर्ड, पोस्टर और बिलबोर्ड की शकल में सूचनाओं और संदेशों की बारिश हो रही होती है। वे लगातार सीख रहे होते हैं और समझ रहे होते हैं। और ऐसा नहीं होता कि वे इस से ऊब जाते हैं। वे खुशहाल है, प्रसन्न है, जीवन की ऊर्जा और उत्तेजना से भरे हुए हैं। उनका मानस लगातार सक्रिय है। आँख बंद करने पर भी कानों में हेडफ़ोन लगाकर वे गीत-संगीत की शकल में जीवन की कैसे-कैसे सच्चाईयां समझते रहते हैं। हर वक़्त उनका चेतन और अवचेतन व्यस्त है। उनकी ये व्यस्तता शांति को बेचैन करती है। समय उनके लिए अबाध निरन्तर बहती नदी नहीं है। शांति के लिए भी नहीं थी। पर शांति के समय की नदी पर दो-चार ढीले-ढाले बाँध होते थे- स्कूल जाने से पहले की सुबह, स्कूल में बिताई दोपहर और घर लौटकर शाम तक का एक लम्बा वक़्फ़ा जिसमें करने को कुछ भी ठोस नहीं होता था, और अंत में शाम से लेकर सो जाने तक की रात। पर आजकल समय इतनी सुगठित और संगठित हो चुका है कि उस की निरन्तरता लगातार बाधित होती चलती है। जैसे किसी एक नदी के स्वाभाविक प्राकृतिक प्रवाह पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बहुत सारे बाँध बने हों। हर किताबी विषय को पढ़ने के लिए स्कूल में अलग घंटा तो होता ही है, उसके अलावा खेलने का अलग घंटा है, पिकनिक जाने का अलग घंटा है, और जब घंटे कम पड़ते हैं तो होमवर्क है।

शांति ने अपने जीवन में शायद ही कभी होमवर्क किया था। और जो किया था वो भी बेहद मामूली। स्कूल के संगठित समय की नकेल से बच्चे निकल भी नहीं पाते कि वो नकेल उनका पीछा करते हुए उनके घर में उनके कमरों में पहुँचकर उनका इंतज़ार करने लगती है। कंधो पर स्कूलबैग का बोझ और सर पर होमवर्क का बोझ लेकर बच्चे घर आते हैं और एक सांस लेकर होमवर्क में लग जाते हैं। और होमवर्क से जो समय असंगठित बच जाय उसके लिए एसाइनमेंट हैं। किसी विज्ञान या सामाजिक विज्ञान के विषय पर शोध करने के लिए एसाइनमेंट है। प्रकृति के सरंक्षण की जागरूकता बढ़ाने के लिए भी एसाइनमेंट हैं। जो भी चीज़ बच्चे के ज़ेहन में असर करने का ताब रखती हो, उसके लिए स्कूलवालों के पास एक एसाइनमेंट है- फ़िल्मों और खेलों के लिए भी!  हर चीज़, हर शै एक प्रोजेक्ट, एक एसाइनमेंट बन चुकी है। बच्चे की स्वतंत्र, स्वाभाविक प्रतिभा को सरल विकास के लिए कोई जगह नहीं है। हर बच्चा एक अलग फूल होता है। और ज़रा सोचिये कि   अगर हर फूल को गोभी के फूल में बदलने की कोशिश की जाने लगे तो क्या होगा? 

आज अचरज और पाखी के पास खाली समय नहीं है, छुट्टियों में भी नहीं। छुट्टियों में भी उनके पास होमवर्क है, एसाइनमेंट हैं, और प्रोजेक्ट्स हैं, और यदि उन से समय बचे तो इन्टरनेट और टीवी और प्लेस्टेशन पर समय को तोड़ने की अनेक विधाएं हैं। ऐसा कोई खाली समय नहीं जिसमें बैठकर वो प्रकृति को चुपचाप निहार सके, उसके और अपने सम्बन्ध की गहराई को समझ सके। और ये लगातार की व्यस्तता उसे किसी ऐसे पल का विलास नहीं देती जिसमें वो अपने भीतर बैठे सत्य से सामना कर सके। वो जो देखता है, सुनता है, गुनता है वो सब बाहर से आ रहा है। उसमें उसका अपना क्या है? और जो उसका अपना है, उस अन्दर की आवाज़ या उस मौन को सुनने का वक़्त कहाँ है उसके पास?  

*** 

२९ अप्रैल को दैनिक भास्कर में छपी

मंगलवार, 8 मई 2012

बाबा


एक दिन अचानक पहली मंज़िल वाली निर्मला आई। खुशी चेहरे से टपकी पड़ रही थी। सुबह-सुबह किसी चमकते हुए फूल की तरह की कोई सूरत देखने को मिल जाए तो बात ही क्या! शांति को लगा कि ज़रूर इसकी लॉटरी लग गई होगी। पर उसने बताया कि बाबा ने याद किया है.. वो जा रही है। इतना कहकर निर्मला ने एक चाभी उसके हाथों में सरका दी। और कहा कि पांच दिन में लौट आएगी.. पौधों को पानी देती रहना। अच्छे पड़ोसी एक-दूसरे के काम आते हैं। शांति अच्छी पड़ोसन थी। हँसते हुए ज़िम्मेदारी ले ली। पांच दिन बिला नागा पानी देती रही। पांचो दिन की सुबह जब वो पानी देने के लिए निर्मला के घर में प्रवेश करती तो घुसते ही उसकी नज़र सिंहासन पर बैठे, गेरुआ पहने बाबा की करुणामय मूर्ति पर पड़ती। यही वो बाबा थे जिन्होने अपने दरबार में     हाज़िरी देने के लिए निर्मला को सपरिवार बुलाया था।

शांति ने उनकी तस्वीरें पहले भी देख रखी थीं। आजकल उनके भक्तों की गिनती बढ़ती ही जा रही है। उनके नाम के नए-नए मन्दिर बन रहे हैं। प्राचीन मन्दिरों में उनकी नई मूर्ति की प्राण- प्रतिष्ठा हो रही है। बसों पर, कारों पर, टैक्सी और ऑटो रिक्शा के पीछे उनका नाम और संदेश पढ़ा जा सकता है। कभी भी, कहीं भी, अनायास। कहीं उनके हाथ में ओम लिखा हुआ है। कहीं माथे पर बिंदी है, कहीं तिलक और कहीं तो उनके माथे पर शैव त्रिपुण्ड रचा हुआ है। कहीं उनकी हाथों से ज्योति पुंज फूटा पड़ रहा है। कहीं बाबा के सर के पीछे एक रौशनी का चक्र है। कहीं वो रेशमी वस्त्र धारण किए डमरू बजाते नाच रहे हैं। कहीं सोने के मुकुट सर पर सजाए हैं तो कहीं सिंहासन पर विराजे हैं। आसमानी, गुलाबी, बैंगनी, पीले, भगवा, हर रंग में, हर चोले में दिखाई पड़ते हैं बाबा।

छठे रोज़ जब निर्मला लौटी तो चाभी लेने के पहले उसने शांति के हाथ में एक प्लास्टिक की थैली थमा दी- बाबा का प्रसाद है! उस प्रसाद में थोड़ी लैया, थोड़ा रामदाना, कुछ सूखे हुए फूल और बाबा की एक रंगीन तस्वीर थी। गेरुआ वस्त्र पहने बाबा अपनी पहचानी मुद्रा में पैर पर पैर रखे बैठे थे। हर दो तीन महीनें में शांति को बाबा की ऐसी तस्वीर का प्रसाद मिलता रहता है। सालों पहले जब पहली बार उसे ऐसी तस्वीर मिली थी तो उसने बाबा की तस्वीर को सर झुका कर, पैर छू कर, अपने घर के मन्दिर वाले कोने में दूसरी मूर्तियों और तस्वीरों के साथ ही सजा दिया था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, और श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई, शांति के घर में इतनी तस्वीरें जमा हो गईं कि उन्हे सम्हाल पाना शांति के लिए मुश्किल होने लगा। जब घर के मन्दिर वाले कोने में  में कोई कोना खाली नहीं बचा। तो बाबा घर के दूसरे कोनों में प्रगट होने लगे। कभी रसोई की कपबोर्ड के कांच पर, कभी ड्राइंग रूम के शोकेस में, कभी उसकी बेडसाइड टेबल पर,  कभी आईने पर, तो कभी बच्चों के पढ़ने की मेज़ पर। बाबा की व्यापकता इतनी बढ़ी कि एक रोज़ बाबा की तस्वीर पैर के नीचे आते-आते बची। उस दिन शांति ने सारी तस्वीरें इकट्ठा की और एक बंडल बना के मन्दिर वाले कोने में बनी दराज़ के अन्दर अटा दीं। श्रद्धा के लिए एक तस्वीर ही काफ़ी थी। तो जब निर्मला के प्रसाद में एक बार फिर बाबा प्रगट हुए तो शांति ने तस्वीर को खेद सहित लौटाना चाहा। तो निर्मला ने उसका हाथ लगभग धकेलते हुए उसे समझाया- प्रसाद है, लौटाया नहीं जाता। शांति से कैसे बताती कि मन्दिर वाली दराज़ प्रसाद से गले-गले तक भर चुकी है, उसमें और जगह नहीं है। लिहाज़ा बाबा की एक और तस्वीर उनकी तस्वीरों की गड्डी में बंध गई।

शांति ने बाबा को पहली बार बड़े परदे पर देखा था। फ़िल्मों का एक बड़ा हसीन हीरो हुआ करता था जिसके इश्क़ में कई पीढ़ियों की लड़कियां आँसू बहाती रही थी। वो हीरो किसी वीराने में एक दरगाहनुमा मन्दिर में बाबा के बुत के आगे झूम-झूम कर क़व्वाली गा रहा था। उसके इस भक्ति का  बाबा पर इस क़दर असर हुआ कि बाबा की आँखों से एक ज्योति निकली और उसकी बिछड़ी हुई अंधी माँ की नैनों की रौशनी बन गई।  न जाने हीरो का प्रताप था या बाबा का- फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई। और बाबा का नाम सब तरफ़ गूँजने लगा। ये वही दौर था जब जय सन्तोषी माँ फ़िल्म ने मुनाफ़े के सारे रेकार्ड तोड़ डाले थे। शांति को अपने बचपन में कुँवारी कन्या की हैसियत से हर शुक्रवार किसी ने किसी आंटी के घर से न्योता मिलता रहता। शानदार दावत होती, मान-सम्मान के साथ पैर छुए जाते, और गुड़-चने के प्रसाद के साथ कुछ रुपये भी मिलते। न जाने क्या हुआ- सन्तोषी माता की भक्ति का बाज़ार ही गिर गया। शायद अर्थवयवस्था के विकास और उपभोक्तावाद की आंधी में लोगों के जीवन से सन्तोष भाव ही बिला गया। जब भी शांति अपने कुँआरी कन्या वाले एडवेंचर पाखी को सुनाती, पाखी ईर्ष्या से जलभुन जाती-  किसी उद्यापन के लिए उसे कभी कोई बुलावा नहीं आया। किसी ने उसके पैर नहीं छुए। शांति कभी-कभी हैरान भी होती है कि सन्तोषी माता तो बिसरा दी गईं मगर बाबा की भक्ति का जादू सर चढ़ कर बोल रहा है।

ऐसे ही एक रोज़ इन्टरनेट पर शांति का सामना बाबा की एक वास्तविक तस्वीर से हो गया, जिसे उनके जीवित रहते ही किसी ने कैमरे में क़ैद कर लिया था। बाबा की बाक़ी तस्वीरों से एकदम अलग तस्वीर। नगे पैर खड़े बाबा ने बेरंग सा ढीला-ढाला कुर्ता पहना हुआ है। कुर्ते के नीचे न तो पाजामा है और न धोती। सर और कंधो पर एक लम्बी सी चादर पड़ी हुई है। एक कंधे पर एक झोला जैसा कुछ है, जिसे दूसरे हाथ से बाबा सम्हाल रहे हैं। झोले वाले ही हाथ में एक छोटा सा डब्बा है। न जाने क्यों शांति को लगा कि बाबा का डब्बा खाली है। जिस हलके अन्दाज़ में बाबा अपनी दो उंगलियों से डब्बे को साधे हुए दिख रहे हैं- मुश्किल है कि उसमें कुछ भी रहा होगा। नज़र झोले पर गई तो लगा कि झोला भी खाली है। भरे हुए झोले की लटकन अलग होती है। ये खाली झोला ही होता है जो बार-बार कंधे से उतर जाता है। सुना भी है कि बाबा भीख माँगकर खाते थे और मस्जिद में सोते थे। ऐसे निस्पृह बाबा लगभग चकित और जिज्ञासु भाव के कैमरे की ओर, और एक तरह से हर देखने वाले की ओर ताक रहे हैं- जैसे उसकी मंशा समझने की कोशिश कर रहे हों।

इन्टरनेट की इस तस्वीर में न रंगीन चोले थे, न मुकुट था, और न ही सिंहासन। तो फिर मन्दिर वाली दराज़ में गट्ठर में बंधी उन ढेर सारी तस्वीरों में क्यों है? शांति सोच में पड़ गई-  हाथ में खाली डब्बा लेकर नंगे पैर खड़े होने वाले आदमी को धकेलकर सोने के सिहांसन पर बिठा, उसके सर पर सोने का ताज रखने में क्या राज हो सकता है?  बाबा की दो शब्दों की शिक्षा तो बड़ी प्रसिद्ध है- श्रद्धा और सबुरी। कहीं ऐसा तो नहीं कि भक्त बाबा के रंग में रंगने के बदले, बाबा ही भक्तों के रंग में रंगे गए?

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22 अप्रैल को दैनिक भास्कर में छपी

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

छलांग


जब से शादी हुई है, शांति छै अलग-अलग मकानों में रह चुकी है। किराएदार कहीं मकान पर क़ब्ज़ा न कर ले- इस डर से कोई मकानमालिक दो-तीन बरस से अधिक रहने ही नहीं देता। हर मकान के खिड़की, दरवाज़ों और दीवारों का अपना एक अलग चरित्र होता है जिसके साथ तालमेल बैठने में कुछ समय लगता है। और जब तक इन्सान उस चरित्र के साथ रहनेवाले आराम का कोई समीकरण बना पाए, तब तक किराएदारों के मकान से बाहर होने की बारी आ जाती है। 

शांति को इस मकान में आए लगभग डेढ़ साल होने को आया। यह मकान शांति के रहे हुए पहले के सभी मकानों से अपेक्षाकृत बड़ा और हवादार है। तीन दिशाओं में खुलने वाली बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ और एक कुशादा बालकनी भी है। मगर सभी खिड़कियों पर लोहे की जाली जड़ी हुई हैं यहाँ तक कि बालकनी के आगे भी लोहे का एक भारी जंगला लगा के उसे बंद कर दिया है। तो बालकनी और खिड़कियों से हवा और धूप तो आ सकती थी मगर किसी जानवर या आदमी का आ पाना नामुमकिन है। कबूतर- चूहे और गिलहरी जैसे छोटे जानवरों के लिए अलबत्ता कोई रुकावट नहीं है।  यह जंगले और जालियां सुरक्षा के नज़रिये से परे शांति के लिए बड़ी परेशानी का सबब रहीं। पहले के मकानों की खिड़कियों में भी जंगले थे मगर इस मकान के जंगले कुछ ज़्यादा ही सघन हैं। ऐसी कि खिड़की से बाहर झांकते हुए नज़र बाहर पसरने के बजाए जंगले से ही उलझ कर वहीं दम तोड़ देती। घर के काम-काज के बीच कुछ पल के अवकाश के कुछ पल चुराने के लिए घर के किसी भी कोने से बाहर के संसार पर नज़र फ़ेरते हुए कभी जो सुस्ताती तो एक मुक्ति के भाव को प्राप्त होने के बजाय और बन्धन में बँधा हुआ महसूस करती। कभी तो उसे ख़ुद के घर के भीतर क़ैद होने का एहसास होता तो कभी उसे आकाश समेत शेष संसार के जंगले के बाहर बंद होने जैसी भाव ग्रस लेता।  

दूसरे का मकान है, कितने दिन रहना है, किसी तरह दिन काट लो आदि भावों से ग्रस्त होकर शांति अपनी परेशानी को ज़ब्त करती रही। मगर तीन महीने पहले जब मकानमालिक से सामना हुआ तो शांति के मन की बात बाहर आ ही गई। 
'आप के मकान में सब अच्छा है.. बस ये जंगले निकलवा दीजिये! '
'क्यों? '
'बहुत घुटन होती है.. लगता है जेल में बंद हैं.. '
'क्या बात कर रही हैं आप.. इस से तो बड़ी हिफ़ाज़त रहती है.. '
'हिफ़ाज़त तो जेल में भी बड़ी रहती है.. '
मकानमालिक लाजवाब होकर भी हुज्जत करते ही रहे। लेकिन शांति के बार-बार आग्रह करने पर मकानमालिक ने अगले महीने निकाल देने की बात पर विदा ली। पर शांति को दिख रहा था कि वो वाएदा कम और टालना ज़्यादा था। इस बात को लगभग तीन हफ़्ते गु़ज़र गए थे जब कॉलोनी में एक हादसा हो गया। 

शांति इमारतों के जिस संकुल में रहती है उसी के नज़दीक में एक नई बीस मंज़िला इमारत रॉक्सी हाईट्स खड़ी हो गई थी। पिछले चार-पाँच महीनों से उसकी कुछ खिड़कियों में बत्तियां भी जगमगाने लगी थीं। पिछले हफ़्ते जब वो दफ़्तर से आ रही थी तो उसने देखा कि रॉक्सी हाईट्स के आगे कुछ लोगों की भीड़ जमा है जिसके चलते ट्रैफ़िक चींटी की चाल पर उतर आया है। उसके स्कूटर के पास रुके मोटरसाइकिल वालों की गुफ़्तगू पर कान देने से उसे पता चला कि किसी नौजवान से इमारत की बारहवीं मज़िल से क़ूद कर जान दे दी। इस हौलनाक ख़बर के साथ ही ट्रैफ़िक में थोड़ी हलचल हुई और शांति को अपने उमड़ रहे जज़्बात को किनारे कर के घर की दिशा में स्कूटर आगे बढ़ाना पड़ा। 

लौटकर आई तो सारे कॉलोनी में इसी हादसे की चर्चा हो रही थी। पार्किंग में स्कूटर खड़ा करके घर के अन्दर दाखि़ल होने तक शांति को मरने वाले की कहानी के कई संस्करण सुनने को मिले। और अगली सुबह अख़बार में उसी हादसे की सुर्ख़ी थी और तफ़्सील भी। ख़ुदकुशी करने वाले नौजवान की उमर कुल बत्तीस साल थी, एक बड़े बैंक का मैनेजर था, लाख रुपये के ऊपर तनख़्वाह थी, मगर प्रेमविवाह करने के बाद तलाक़ हो गया था। उसके बाद बैंक की ही किसी जूनियर अधिकारी से प्रेम करने लगा था मगर वो विवाहित थी और अपने पति को छोड़ने को तैयार न थी। जिस दिन यह हादसा हुआ वो महिला भी उसके साथ फ़्लैट में मौजूद थी। नौजवान दिन से लगातार शराब पी रहा था तो न जाने किस भावुक मौक़े की उत्तेजना में उसने बालकनी से नीचे छलांग मार दी।  

उस दिन दफ़्तर में इस मामले की तार्किक, नैतिक और भावुक चीरफाड़ हुई। किसी ने नए क़िस्म के शहरी जीवन और पश्चिमी मूल्यों को दोष दिया, किसी ने शराब को तो किसी ने नौजवानी को। एक साहब ने तो हद ही कर दी- उन्होने बिना जंगले की बालकनी को दोष दे डाला। उनके मुताबिक़ इन्सान के भीतर गाहे-बगाहे ऐसी भावना उमड़ती ही रहती है- ऊँची इमारतों में खुली बालकनी रखना तो मरने वालों को दावत देना है। और आगे उन्होने दिल्ली की क़ुतुब मीनार की मिसाल भी दे डाली जिसकी ऊपरी मंज़िलों में आज भी जाने की मनाही है क्योंकि जब रोक नहीं थी तब आए दिन कोई न कोई वहाँ से छलांग मार देता। बात यहीं ख़तम हो जाती तो कुछ न था। इस के अगले ही रोज़ जिस महिला के तथाकथित प्रेम में नौजवान ने अपनी जान दी थी, उस महिला ने भी अपनी चार मंज़िला इमारत की बालकनी से छ्लांग मार दी। 

इस मामले की मार्मिकता से अलग शांति के मन में एक अलग ही आशंका पलने लगी। अपने मकान की बालकनी के ख़िलाफ़ जो अभियान उसने मकानमालिक से साथ छेड़ा था, उस अभियान की सफलता पर काले बादल मंडलाते हुए उसे नज़र आने लगे। और हुआ भी वही जिसका उसे डर था। अगली दफ़े जब मकानमालिक साहब आए तो वो बालकनी के जंगले निकालने के अपने आधे वाएदे से सरासर मुकर गए। कहने लगे कि वो अपने किराएदारों के साथ किसी भी हादसे होने की सूरत पैदा करना नहीं चाहते थे। 

शांति की नज़र और ख़याल के विस्तार के अरमान तो धरे के धरे रह गए। उलटे उसने देखा कि वो मकान जिनकी खिड़कियों-बालकनी में पहले कोई जाली-जंगले नहीं थे, उनमें से तमाम पर चमचमाते काले नए लोहे जड़े दिखाई देने लगे। तय था कि लोग डरे हुए थे। उन सब के भीतर कोई था जो छलांग मारना चाहता था या उन्हे लगता था कि उनके परिवार के भीतर कोई है जो मार सकता है कभी भी छलांग।  

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२२ जनवरी को दैनिक भास्कर में छपी.


गुरुवार, 29 मार्च 2012

प्रतिशोध




सुबह जब शांति पौधों को पानी देने के लिए बालकनी पर गई तो सूरज उग रहा था। पानी देते हुए उसने सूरज की तरफ़ एक अनुरागी दृष्टि डाली। सूरज सफ़ेद हो रहा था। ये नज़्ज़ारा शांति को बड़ा अजीब मालूम दिया। सूरज सफ़ेद ही होता है.. पर उगते हुए और डूबते हुए सूरज में लाली देखने की आदत पड़ी हुई है हमको। वैज्ञानिक बताते हैं यह एक दृष्टि भ्रम है जो प्रकाश के परावर्तन के चलते होता है। शांति ने सर उठा कर शेष आकाश की ओर देखा। पूरा आसमान एक अजब सलेटी रंग में पुता पड़ा था। आस-पास के पेड़ उगते सूरज की रौशनी में अच्छे चटख रंगो में खिले होने के बजाय एक धूसर उदासी से लिपटे खड़े थे। धूसर रंग उस धूल में था जो पेड़ और शांति की आँख के बीच ही नहीं, सारे आलम में तैर रही थी। अभी वसन्त में ही आए नए पत्तों और ताज़े खिले फूल के चटख रंगों के खुल कर पसरने की राह उसी धूल ने अवरुद्ध की हुई थी। वही धूल उगते सूरज की लाली को भी लील गई थी,  ऐसे कि सूरज नारंगी-लाल न होकर किसी अख़बारी काग़ज़ की तरफ़ निस्तेज और सफ़ेद नज़र आ रहा था। कभी-कभी ऐसा भी होता है, यह सोचकर शांति अपने में वापस लौट गई। बाहर धूल मचलती रही। 

तक़रीबन ढाई घंटे बाद जब शांति तैयार होकर दफ़्तर जाने के लिए निकली तो सूरज सर पर चढ़ आया था मगर धूप बहुत ही ख़स्ताहाल थी। धरती पर शांति की बौनी छाया थी ज़रूर पर बेहद क्षीण और महत्वहीन। शांति ने सर उठाकर ऊपर देखा। आकाश में कोई बादल न था पर सब तरफ़ बदली छाई हुई थी। जहाँ तक नज़र जाती थी धूल के नन्हे-नन्हे कण हवा में अठखेलियां करते नज़र आ रहे थे। पहले कभी नहीं देखी इस तरह की धूल? पहले जब कच्ची सड़कें होती थीं तो  गर्मी के प्रचण्ड प्रहार से धरती चटकने लगती थी और उसकी सतह के छोटे-छोटे टुकड़े हवा के साथ  पूरे वातावरण में उड़ने लगते थे। पर उस धूल की अपनी कोई गति नहीं थी वो हवा के कंधों पर सवार होकर यहाँ-वहाँ भटकती फिरती थी। पर उस दिन न तो प्रचण्ड गर्मी थी तो न ही हवा हुंकारे भर रही थी। ये वो धूल नहीं थी.. तो फिर ये कौन सी धूल थी? कहाँ से आई थी यह धूल?  शहर में न तो कच्ची सड़कें थीं, न नंगी पड़ी हुई ऊसर ज़मीन और न ही घास या बेघास के चटियल मैदान.. जिनसे छूटकर धूल इधर-उधर आवारा फिरती। 

शहर में भी धूल होती है। पर वो बिलकुल अलग क़िस्म की धूल है.. लम्बी-ऊंची इमारतों की तामीर में लगने वाली सीमेंट-मौरम के ज़र्रों की धूल। पर वो इस क़दर सरकश और आवारा नहीं होती। वो तो बहुत ही चुपचाप और रहस्यमय तरीक़े से रोज़ बरोज़ आसपास के घरों में जा टिकती है और हर सुबह घरों से बाहर बुहार फेंकी जाती है। जो कचरे के डब्बों से होते हुए शहर के बाहर बने कूड़े के टीलों में अपना अन्तिम स्थान पाती है। जहाँ उसके साथी होते हैं प्लास्टिक की थैलियां,  पन्नियां, कपड़ों के टैग, कच्ची-पक्की और सड़ी-गली सब्ज़ियां, टूटे हुए कांच के टुकड़े,  ठुकराए हुए खिलौने,  चिंदी करके फेंके हुए काग़ज़, कीलें, पतरे, लोहा-लंगड़ और कई तरह की धातुओं के टुकड़े। उसके ये सारे साथी उस धूल को इस क़दर जकड़ कर रखते हैं कि धूल वहाँ से कहीं जाने नहीं पाती। वहाँ से अगर कुछ उठता है तो उन सब की समवेत गंध, जिसका सामना करने की ताब किसी सामान्य मनुष्य में नहीं होती। फिर भी कुछ दिलेर नाक पर पट्टी बांधे, और कुछ तो बिना किसी पट्टी के भी उन ठुकराई हुई बेकार चीज़ों के ढेरों में अपने काम की चीज़ें खोजा करते हैं। 

फिर कौन सी धूल थी ये? इसी सोच को लिए-लिए शांति दफ़्तर पहुँची। जब उसने हेलमेट उतार कर हाथ में लिया तो देखा कि उस पर धूल की पतली सी परत आरामफ़र्मा है। शांति ने हौले से अपनी उंगली को हेलमेट पर फिराया तो उसकी इस हरकत के निशान को अंकित होते हुए देखा और फिर हेलमेट को स्कूटर पर ही टांगकर दफ़्तर में दाख़िल हो गई। दफ़्तर में एसी चल रहा था और सामान्य सरगर्मी थी। लोग दुनिया जहान की जो बातें कर रहे थे उनमें धूल भी एक चर्चा का मुद्दा थी। लेकिन जब दफ़्तर बंद हुआ तो हालात संगीन हो चले थे।  

शाम होते-होते तक धूल ने आदमी की बनाई दुनिया की ऊँचाई से दूर ऊपर कहीं तैरना छोड़कर वापस धरती की ओर धावा बोल दिया। हवाएं उसका साथ दे रही थीं। एक-दूसरे से सटकर चलने  वाली मछलियों और पंछियों के समूह की तरह धूल बड़े वेग से दिशाओं को झकझोरने लगीं। चलना तो दूर उस आँधी में खड़े रहना भी मुश्किल था, आँखें बंद हुई जाती थीं। सवारियों के लिए सड़कों पर चलना असम्भव हो गया। पहले रेंगने की गति पर आया ट्रैफ़िक एक पल में आकर एकदम ठप पड़ गया। पूरे शहर में समय जैसे ठहर गया। पर हवाओं पर सवार धूल अंधड़ बनकर चलती रही। 

एक बहुत लम्बे अंतराल के बाद शांति घर पहुँची। जैसे-जैसे शांति घर के भीतर क़दम रखती गई फ़र्श पर जमी धूल की परत पर अपने जूतों के निशान छोड़ती गई। सारा घर धूल से अटा पड़ा था। अजय, पाखी, अचरज डाइनिंग टेबल पर सन्न से बैठे थे। फोन सेवाएं ठप पड़ चुकी थी और पिछले कई घंटो से उनका शांति से सम्पर्क टूटा हुआ था। सासू माँ भी वहीं बैठी थीं- केबल भी बंद था। उस समय सफ़ाई करने का माद्दा नहीं था शांति में। वो सिर्फ़ नहाना चाहती थी। पर न जाने क्यों पानी नहीं आ रहा था। धूल से काली हो गई शांति का बदन एक उतनी ही किरकिरी चिड़चिड़ाहट से दरकने लगा। किसी तरह उसने अपने पर क़ाबू पाया और रखे हुए आधी बाल्टी पानी से अपने हाथ-पैर धो लिए। भूख मर चुकी थी पर पाखी और अजय के कहने पर उसने थोड़ा सा खाना अपनी प्लेट पर डाल लिया। निवाला मुँह में डालते ही उसे खाने का नहीं धूल का स्वाद आया। शांति ने वैसे ही प्लेट रख दी। और नहीं खाया फिर भी ज़बान पर धूल का स्वाद बैठा ही रहा। 

बाहर अंधड़ जारी था। घर में धूल बढ़ती ही जा रही थी। मेज़, कुर्सी, परदे, सब कुछ धूल से सन चुका था। शांति इतना थक चुकी थी कि बस बिस्तर पर गिर कर सो जाना चाहती थी पर बिस्तर, धूल के बिस्तर में बदल गया था। उस पर सोना नामुमकिन था। शांति ने चादर बदलने के लिए अलमारी खोली। तभी लाइट चली गई। अलमारी के भीतर शांति का हाथ जहाँ भी पड़ा वहाँ धूल मौजूद थी। किसी तरह शांति ने एक चादर बिस्तर पर डाल दी। और दूसरी दरवाज़े की झिरी पर तोप दी। उसके बाद भी धूल अदेखे-अनजाने छेदों से निकल-निकल कर शांति पर और कमरे की हर  चीज़ पर बैठती ही रही। जैसे धूल को कोई ईश्वरीय वरदान था और वो उसी वरदान का दीर्घप्रतीक्षित प्रतिशोध ले रही थी। 

*** 

शनिवार, 24 मार्च 2012

नौनिहाल


सवा पाँच बज रहे थे। दफ़्तर लगभग ख़ाली हो चुका था। परम्परा के मुताबिक लोग अपना आज का काल कल पर टालकर जा चुके थे। आज का काम आज ही ख़तम कर डालने की ज़िद करने वाली शांति अपना काम समेट रही थी जब हवाओं पर चढ़कर रह-रहकर एक धमक सी आने लगी।  शांति तो अपने काम में व्यस्त थी। सबसे पहले उनकी पहचान दफ़्तर की पुरानी खिड़कियों में जड़े शीशों ने की। हर धमक के साथ उनका पूरा अस्तित्व कम्पन करने लगा। और सारे शीशों के समवेत कम्पन से पूरे दफ़्तर में एक अजब माहौल तारी हो गया। तब शांति ने भी उस धमक की लहरों को अपने शरीर से टकराते हुए महसूस किया जिससे उसके मन में एक विचित्र आकुलता का संचार होने लगा। उसने लैपटॉप बन्द कर दिया। उस आकुलता में काम करना मुमकिन नहीं था। और बाहर की ओर चल पड़ी। जैसे-जैसे वो बाहर की ओर चलती गई, हवाओं में धमक बढ़ती चली गई। और जब वो लिफ़्ट से बाहर आई तो एक कान चीर देने की नीयत रखने वाले संगीत से उसका सामना हुआ। वो धमक इसी संगीत की निचली तरंगे थी।

शांति स्कूटर पार्किंग से निकालकर सड़क पर आ गई। ये सड़क जिस पर शांति का दफ़्तर था, बहुत संकरी तो न थी। लेकिन कुछ हिस्से पर दुकान अपनी हदों से बाहर निकलकर पसर गई थीं और कुछ पर ठेलेवाले अपनी रोज़ी बिछाए हुए थे। शहर का प्रशासन  एक सहिष्णु आचार का परिचय देते हुए इस अतिक्रमण के प्रति पूरी तरह उदासीन बना हुआ था। और आम नागरिक की हालत किसी कोलस्ट्राल से भरी रकतवाहिनी में बहते पोषक तत्वों सी हो चली थी। लेकिन उस समय सड़क का आवागमन रुका हुआ था। क्योंकि शांति से लगभग पचास मीटर आगे एक ट्रक था जिस पर पांच छै भीमकाय स्पीकर रखे थे। ट्रक के ऊपर, आगे-पीछे और अगल-बगल नौजवान लड़कों की एक उछलती-कूदती टोली थी। साठ-सत्तर की संख्या वाले उस दल में शायद ही एक-दो ऐसे थे जिन्होने कमर के ऊपर कोई कपड़ा पहन रखा हो। जो शोर ट्रक के स्पीकरों से उपज रहा था न तो उसे संगीत कहा जा सकता था और न ही उनकी फूहड़ उछल-कूद को नृत्य। वे अपने भीतर की ही किसी विकृति से विवश होकर हवा में हाथ-पैर फेंकते दिख रहे थे। वे पास ही स्थित विश्वविद्यालय के छात्रावासों में रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर छात्र थे।

किसी लगातार हो रहे विस्फोट की तरह उस शोर की उत्तेजना शांति को परेशान करने लगी। वो शोर एक ऐसा आक्रमण था जिसका उसके पास कोई बचाव नहीं था। उसके आगे वाहनों की लम्बी क़तारें थी और वैसी ही धीरे-धीरे पीछे भी बनती जा रही थीं। न वो आगे निकल सकती थी और न लौट सकती थी। उस शोर की धमक में उसके ज़ेहन में उठने वाली हर सोच उठते ही दम तोड़ दे रही थी। जबकि उसकी देह के किसी निचले तल से उठता एक आदिम आवेग उस पर छाता जा रहा थी।  उसका मन कर रहा था कि सबको कुचलकर आगे बढ़ जाय। अगर वो कोई सिद्ध योगिनी होती तो अपने स्कूटर को टैंक में बदल डालती उसी पल। अचानक उसे लगा कि कोई कुछ कह रहा है उस से। उसने मुड़कर देखा- उसके बाज़ू में रुकी हुई कार से एक औरत उस से कुछ पूछ रही थी।  उसके मुँह से निकल ज़रूर होंगे कुछ शब्द मगर वो कहीं पहुँचने पहले से दबा कर मार डाले गए। उस आततायी शोर में किसी स्त्री के कोमल शब्द के लिए कोई जगह नहीं बची थी। शांति को कुछ समझ नहीं आया। ड्राइवर की सीट पर बैठा उस औरत का पति उसके कंधों को हिलाकर कुछ बोल रहा था। लेकिन वो अपने पति को अनदेखा कर के शांति से बार-बार कुछ पूछती ही रही। उसके लगातार हिलते हुए होंठ, सवालिया निगाहें और शांति तक पहुँचता सिर्फ़ शोर शांति से बरदाशत नहीं हो रहा था। उस पर से अपनी ध्यान हटाने के लिए शांति ने पिछली सीट पर देखा। पिछली सीट पर दो बच्चे आपस में लड़ रहे थे। एक छै-सात बरस का लड़का एक तीन-चार बरस की लड़की, जो शायद उसकी बहन थी, बुरी तरह पीट रहा था। बच्ची का मुँह खुला था, गले की नसें तनी हुई थीं, और आँखों से आँसू बह रहे थे। निश्चित ही वो गला फाड़ कर रो रही थी पर रोने की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। अगली सीट पर बैठे उनके माँ-बाप को पता भी नहीं था कि पिछली सीट पर क्या चल रहा है।

होली के चार-पाँच रो़ज़ पहले ही होली मिलन का उत्सव मना रहे छात्रों का जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। और एक ख़ास घर के आगे जाकर रुक गया। शांति ने देखा उस घर पर दीपा गर्ल्स हॉस्टल की तख्ती लगी हुई थी। शायद वो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए कोई निजी छात्रावास था। उस हॉस्टल में कोई चौकीदार नहीं था। और अगर था भी तो लड़कों के हिंसक नाच से भयभीत होकर कहीं अन्तर्धान हो गया था। अगल-बगल फलों और जूस के ठेले थे। मगर वो घबराकर अपने सामान को ढककर किनारे होने में लगे थे। उन्हे डर था कि अगर लड़कों की नज़र तिरछी हुई तो उनका माल लुटते देर नहीं लगेगी। ये उनका सौभाग्य था कि लड़कों की दिलचस्पी किसी और 'माल' में थी। जिस के चलते वो गर्ल्स हॉस्टल के बाहर खड़े होकर भीमकाय स्पीकरों से निकल रहे उन्मादक शोर पर देर तक अश्लील ढंग से उछलते-कूदते रहे। और गंदे इशारे करते रहे। जिस पर भी जब किसी भी लड़की ने उनको दर्शन की तवज्जो नहीं दी तो एक लड़के ने जूस के ठेले के साथ रखे टोकरी में से संतरे और मौसम्बी  छिलके और गाजर-चुकन्दर के सिरों को उठा-उठाकर हॉस्टल की बंद खिड़कियों पर फेंकना शुरु कर दिया। बाक़ी लड़कों ने अनुसरण किया और हॉस्टल पर अपने हथियारों की वर्षा कर दी। वो पल तमाम तरह की ख़तरनाक सम्भावनाओं से थरथराने लगे। इस दृश्य को देखते-देखते कुछ पल पहले क्रोध में उबल रही शांति, बिलकुल उलट भय की गर्त में गिर पड़ी।

घर पहुँचने के बहुत देर बाद तक भी शांति भीतर कहीं काँपती रही। क्योंकि वो एक स्त्री है, और किसी तल पर बेहद असुरक्षित है। और उसके भीतर इस आदिम असुरक्षा की भावना पैदा करने वाले कोई अनपढ़, जंगली और गँवार नहीं थे। विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा लेकर, आने वाले दिनों में आईएएस, पीसीएस आदि बनने वाले छात्र थे, नौनिहाल थे, देश का भविष्य थे। उच्च शिक्षा हासिल करके वे किस प्रकार के बेहतर मनुष्य और किस तरह के बेहतर समाज की रचना करेंगे ये कल्पना करना शांति को बहुत कठिन और कष्टकर मालूम दिया।

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(10 मार्च को दैनिक भास्कर में छपी) 


शुक्रवार, 23 मार्च 2012

ग़रीब की गरिमा



जब वे प्लैटफ़ार्म पर दाख़िल हुए गाड़ी छूटने में तब भी चालीस मिनट थे।। उनके हलके-फुलके सामान के लिए कुली लेने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी। दो दिन का कार्यक्रम था- शादी में शामिल होके बस अगले दिन वापसी। ए-वन डब्बा सबसे आख़िर में था। जीवन में पहली बार वे पहले दर्ज़े में सफ़र करने का आनन्द लेने जा रहे थे। अजय अपना वर्ग और अपनी औक़ात जानता है। पर कुछ सौ रुपये के फ़र्क़ से अगर आपका वर्ग बदल सकता है तो अजय एक बारगी यह क़ीमत देने को तैयार हो गया। और वर्गों के पार यह छलांग मार दी। अजय और शांति आराम से अपनी ट्रालियां खींचते हुए गाड़ी के अन्त की ओर चल पड़े। दूर से उन्हे गाड़ी के आख़िर में एक लम्बी मानव श्रंखला दिखाई दी। एक-दूसरे की देह में चपक जाने तक की निकटता वाली श्रंखला, सबसे निचले दर्ज़े में बैठने की जगह पा जाने के लिए लगाई गई लाइन थी। हाथ में और कंधे पर कई आकार और प्रकार के बैग थामे और लटकाए अलग-अलग उम्र के मर्द, बच्चे और औरतें थे। बैठने की जगह या सिर्फ़ खड़े हो जाने की जगह पा जाने के संघर्ष से जिनके चेहरे तनाव से आड़े-तिरछे खिंचे हुए थे। आर पी एफ़ के कुछ सिपाही उनके उस संघर्ष के उग्र और हिंसक होड़ में बदल जाने से रोकने के लिए रह-रह कर अपने डंडे को और गले के सुर को उठा रहे थे। ऐसा नहीं था कि शांति ने पहले ऐसी क़तारें नहीं देखीं थीं। पर पहला दर्ज़ा और जनरल डब्बा इस तरह एक दूसरे से सटा होता है यह देखकर उसे एक अजब से हैरत हुई जिसमें कहीं कोई अपराध भावना भी छिपी हुई थी। कोई पहले दर्ज़े का यात्री सबसे निचले दर्ज़े की ठसाठस तक़लीफ़ों को नज़रअंदाज़ कर सकता था। और जनरल डब्बे में कशमकश करने वाला सवार भावनाओं की किन तंग गलियों से गुज़रता होगा- यह शांति सोचती ही रही। 

पहले दर्ज़े के कम्पार्टमेन्ट में साइड की बर्थ नहीं होतीं। उनकी जगह खिड़कियों से लगा हुआ एक गलियारा होता है और शेष जगह में चार-चार बर्थ के कूपे। कूपे के भीतर बैठने-लेटने के लिए जो बर्थ थीं वो थी टियर और टू टियर से कहीं ज़्यादा चौड़ी थीं। उनके ऊपर बढ़िया गहरे लाल रंग की टेपेस्ट्री लगी थी। बर्थ के तरफ़ तो खिड़की थी और दूसरी तरफ़ छोटा-मोटा सामान रखा जा सकने लायक़ एक फ़ुट चौड़ी साइडटेबल थी। इतना ही नहीं उन के ऊपर सूट टांगने के लिए एक आलमारी भी थी। शांति को उसे देखकर बार-बार किसी लाल मुँह वाले अंग्रेज़ की याद आती रही जिसका सूट टाँगने के लिए उस आलमारी का विधान बनाया गया होगा। कुल मिलाकर चार लोगों के रईस परिवार के सफ़र को सुकूनसाज़ बनाने का पूरा इंतज़ाम था। यहाँ तक कि कोच परिचालक को फ़ौरन तलब करने के लिए हर बर्थ के पास घंटी भी लगी हुई थी। हालांकि कुछ समय मे ही शांति ने समझ लिया कि वो भी अंग्रेज़ो के ज़माने का अवशेष है। तब गोरे साहब के लिए हिन्दुस्तानी अटेंडेंट दौड़ा चला आता होगा- अब वो नहीं आता। या शायद किसी एमपी-एमएलए या किसी बड़े अफ़सर के कोच में उपस्थित होने पर अब भी आता हो। वैसे भी पहले दर्ज़े की रेलयात्रा जिस तरह शांति और अजय के लिए अपवाद थी शायद वे भी पहले दर्ज़े के उस कोच के लिए अपवाद थे। 

रात भर का सफ़र था। अटेंडेंट कम्बल-चादर आके दे गया। बाहर हलकी ठण्ड थी। मगर डब्बे के भीतर उससे भी ज़्यादा ठण्ड थी। इसके बावजूद शांति के सहयात्री बार-बार शिकायत करते रहे- "ठण्डा नहीं हो रहा.. पसीना आ रहा है.. और बढ़ाओ.. !" शांति हैरत से उन्हे देखती ही रह गई। क्या रहस्य था उनकी गर्मी का? बुरी तरह कुड़कुड़ाए बिना क्या उनका पैसा वसूल नहीं होने वाला था? वो कुछ कहना चाहती थी पर अजय ने उसका हाथ दबा दिया। 

रात को शांति की जब नींद खुली तो गाड़ी खड़ी हुई थी। कोई स्टेशन आया था। पांच बज रहे थे। शांति चाय की तलाश में उठकर बाहर तक गई। दरवाज़ा खोलते-खोलते ही चायवालों की आवाज़ आनी शुरु हो गई। बाहर झांक कर देखा तो उसके डब्बे के सामने कोई नहीं था। सारे चायवाले जनरल डब्बे की खिड़कियों के आगे मंडला रहे थे। मगर वे सारे जनरल डब्बे के दरवाज़े पर लगी भीड़ से बुरी तरह आच्छादित थे। चढ़ने वालों के बीच गज़ब की जद्दोजहद चल रही थी। वहाँ कोई पुलिस वाला भी नहीं था। डब्बे में दाख़िल होने के लिए धक्कामुक्की ही एकमात्र योग्यता साबित हो रही थी। और अपनी योग्यता का परिचय देने में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता था। गाड़ी धीरे-धीरे सरकने लगी। शांति को उस प्रभात वेला में चाय मिलने की उम्मीद ख़तम होती नज़र आनी चाहिये थी। पर उसे उस भीड़ में अधिकतर की अपने गंतव्य में पहुँच पाने की उम्मीद डूबती नज़र आई। भीड़ के एकदम अंत के एक अधेड़ दम्पति ऊहापोह में पहले दर्ज़े के दरवाज़े की ओर चले आए। मगर कोच के ज़ीने पर पैर रखने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। न जाने किस ख़्याल में शांति दरवाज़े से पीछे हट गई। शांति के इस मुद्रा को उन्होने एक इशारा समझा और चढ़ गए। और डब्बे  के एक कोने में अनाधिकार भाव से खड़े हो गए और किसी अनजान शिकायतकर्ता से बुदबुदाकर कहने लगे- आगे उतर जाएंगे। शांति वहाँ खड़े होने भर में असहज अनुभव करने लगी। वो अपनी बर्थ पर लौट गई और लेट गई। उसे नींद नहीं आई। थोड़ी देर में कुछ आवाज़े आईं। उठकर बाहर गई तो पता चला कि उस दमपति को अटेंडेंट ने लगभग धकेल कर गाड़ी के भीतर चलता कर दिया। किसी और कोच की तरफ़। 

 क़ानूनन ग़लती उस दम्पति की थी। वे पहले दर्ज़े में चढ़ने के अधिकारी नहीं थे। पर क्या इस ग़लती में सरकार की कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं थी? आम आदमी न तो ऊँचे दर्ज़े का किराया वहन कर सकता है और न ही अपनी यात्राओं को पहले से योजनाबद्ध कर सकने का नियंत्रण अपने जीवन पर रखता है- तो क्या सरकार उसे जनरल दर्ज़े में मुर्ग़ियों की तरह भरने के लिए अभिशप्त बनाए रखेगी। अभी तो उनजानवरों के 'एनीमल राइट्स' की बातें उठने लगीं हैं। जनरल डब्बे में सफ़र करने वाले आदमी के 'ह्यूमन राइट्स' का कोई मसला बनता है क्या? या उसे अपनी गरिमा के साथ सफ़र करने का कोई हक़ नहीं? या तो वो एक लम्बी लड़ाई के बाद आलू-प्याज़ की तरह जनरल डब्बे की बोरी में बंद हो जाए- जहाँ पेशाब करने के बाथरूम तक सफ़र भी एक बड़ा संघर्ष है- और या फिर किसी ऊँचे दर्ज़े के अटेंडेंट के हाथों अपने सम्मान का सौदा करे। और न जाने क्यों शांति को यक़ीन है कि ये सिर्फ़ सरकार के पास पैसों की तंगी और रेलवे के ठसाठस भरे टाइमटेबल का मसला नहीं है। इस हालात के पीछे काली खाल में गोरी आत्मा वाले शासक वर्ग की आम आदमी के प्रति एक गहरी उदासीनता और उपेक्षा की भावना है।  

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(20 फ़रवरी को दैनिक भास्कर में छपी) 

सोमवार, 19 मार्च 2012

भूतपूर्व विद्रोही



बहुत सारे आंकड़ों के बीच सर खपाते हुए शांति ने बजते हुए फ़ोन को देखा। उस पर दस नम्बर का एक आंकड़ा था। एक अनजान आंकड़ा। उसे तवज्जो दे- न दे की दुविधा के बीच शांति ने फ़ोन ले ही लिया।  
हलो?
हलो शांति.. मैं रणवीर बोल रहा हूँ.. 
येस? 
अरे भई.. मैं रणवीर सिंह बोल रहा हूँ..
रणवीर सिंह? शांति के ज़ेहन में ये नाम कुलबुलाने लगा। वो तो रणवीर सिंह नाम के एक ही शख़्स को जानती थी। भारतीय क्रांतिकारी दल के नेता रणवीर सिंह! कॉलेज के ज़माने में जो चंद लोग उसके लिए आदर्श हुआ करते थे.. रणवीर भाई का स्थान उनमें कहीं शिखर के नज़दीक़ था। 
रणवीर भाई?! 
..हाँ.. कैसी हो! 
अच्छी हूँ.. आप कैसे हैं रणवीर भाई? 
ठीक हूँ.. तुम्हारे शहर में आया था.. सोचा मुलाक़ात करता चलूँ.. 
रणवीर भाई को उसी शाम लौट जाना था इसलिए शांति ने उन्हे दफ़्तर में ही बुला लिया। उनके आने तक शांति उन्ही के बारे में सोचती रही। उस दौर में समाज में बड़ी उथल-पुथल हो रही थी। रणवीर भाई का दल समाज के आमूल-चूल बदलाव चाहता था और इसके लिए समाज के हाशिए पर पड़े हुए वर्गों की गोलबंदी में यक़ीन रखता था। शहर के मध्यवर्ग में तो उनकी मौजूदगी नाममात्र की थी पर शहर के सारे कॉलेजों के विद्यार्थियों के बीच उनके दल की ज़बरदस्त लोकप्रियता थी। अधिकत कॉलेजों के चुनाव में भारतीय क्रांतिकारी दल के ही प्रत्याशी जीतते थे। और उसका प्रमुख कारण रणवीर भाई थे। उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि जो भी एक बार उनसे मिल लेता, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। लम्बा क़द, साँवला रंग, तेजस्वी मुखमुद्रा और अंगारे की तरह चमकती हुई आँखें। उनसे नज़रें मिलाना सूरज से आँखे चार करने से कम नहीं था। और उनसे बात करना जैसे किसी लाइब्रेरी में दाख़िल होना था। सभी क़ायल थे उनकी मेधा के। उनके बारे में मशहूर था कि वे जब चाहें आई ए एस हो जाएं। पर उनकी नैतिक नज़र में उनका निजी हित विराट मानवता के हित के आगे कुछ भी नहीं था। शांति भी उनकी आदर्शवादी राजनीति और सम्मोहक शख़्सियत से बहुत मुतास्सिर रही। उनके दल की सदस्य कभी नहीं बनी पर एक सक्रिय हमदर्द के रूप में जब मौक़ा मिले उनकी गतिविधियों में शामिल होती रही। 

रणवीर भाई ने तीन बजे आने को कहा था। शांति कुछ काम पहले निबटाकर और कुछ काम उनसे मुलाक़ात के बाद के लिए छोड़कर तीन बजे से ही उनका इंतज़ार करने लगी। रणवीर भाई वक़्त के बेहद पाबन्द थे। पर जब चार बजे गए तो शांति को लगा कि शायद वे नहीं आएंगे। और शांति अपने आँकड़ों की दुनिया में लौट गई। 
हलो शांति! 
शांति ने सर उठाकर देखा। पहचान तो लिया कि रणवीर भाई ही थे.. पर काफ़ी बदले हुए से। पहले सी छरहरी काया नहीं थी, पेट निकल आया था। 
रणवीर भाई ..मुझे तो लगा आप अब नहीं आयेंगे.. 
माफ़ करना.. देर हो गई.. 
आइये! बैठिए!! 
गर्मी होने लगी.. थोड़ा पानी पिऊंगा.. 
जी.. ज़रूर!! 
रणवीर भाई की बाल-दाढ़ी भी काफ़ी पक गई थे। दाढ़ी उस दौर में भी होती थी पर कपड़ों की उन्होने कभी परवाह नहीं की। वे अक्सर एक ही जोड़ी पैंट-कमीज़ हफ़्तों डाँटे रहते- वैसी ही गुंजली और मैली। पर उससे उनकी कशिश पर कुछ फ़र्क़ न पड़ता। एक चमक थी तब जो हर देखने वाली को चौंधियाए रहती। शांति ने देखा कि उनके कपड़े धुले और इस्त्री किए हुए थे पर चेहरे की चमक लापता थी। शांति ने डरते-डरते उनकी आँखों की सिम्त नज़र फेरी - वहाँ एक अजब सी धुंधली हताशा और उदासी डेरा डाले थी। ये क्या हो गया रणवीर भाई को? वो आदमी कहाँ है जिसकी आँखों मे देखने से लोग झुलस जाते थे? शांति उनसे पूछना तो बहुत कुछ चाहती थी- आदर्श, व्यवस्था और विप्लव की बाबत -पर न जाने क्यों साहस न कर सकी। जैसे किसी के घाव की ओर देखने से झिझकते हैं लोग..  
कितने सालों बाद देख रही हूँ आप को.. 
एक ज़माना बीत गया.. 
आपने शादी नहीं की.. ?
की तो.. आठ साल हो गए..
अच्छा? किससे? मै जानती हूँ उन्हे?
नहीं आप नहीं जानती.. उनका नाम शैला है..
 क्या करती हैं शैला जी?
आजकल बहुत बीमार रहती हैं.. 
क्या हुआ उन्हे.. 
एक नहीं तमाम बीमारियां है.. पिछले आठ साल में कम से कम तीन साल तो उन्होने अस्पताल के बिस्तर पर बिताए हैं.. 
अरे!!  
.. क्या करें..!?  
तो कैसे मैनेज करते हैं आप.. 
आसान नहीं है.. कुछ दोस्त हैं जो मदद करते हैं.. आप तो जानती हैं बाज़ारीकरण के इस दौर में स्वास्थ्य में कमोडिटी बन चुका है.. और मुफ़लिस को सेहत भी नसीब नहीं..  
ये कहते हुए रणवीर भाई की आँखें और मुरझा गईं। उन्हे इस हालत में देखकर शांति के भीतर कुछ बिलखने सा लगा। देर तक मद्धम सुरों में बात करने और दफ़्तर बंद होने के बाद ही शांति और रणवीर भाई वहाँ से निकले। शांति उन्हे स्टेशन तक छोड़ने गई। और जाने से पहले उनके हाथ में एक चेक थमा दिया- शैला जी के इलाज के लिए। रणवीर भाई ने चेक पर एक निगाह डाली और एक खिसयायी मुस्कराहट के साथ उसे जेब में सरका लिया। लौटते हुए शांति ने सोचा कि जिस आसानी से उसने शैला जी के इलाज के लिए इम्दाद दे दी.. क्या उसी आसानी से रणवीर भाई का भी इलाज मुमकिन है? जिस रोग ने उनकी आँखों की चमक और चेहरे का तेज हर लिया, उसका क्या?  एक क्रांतिकारी का सबसे आकर्षक पहलू होता है जीवन के प्रति उसका सघन और उदात्त नज़रिया। उसके ढह जाने के बाद रणवीर भाई निहायत खोखले नज़र आए थे शांति को। 

घर लौटने के बाद भी रणवीर भाई उसके साथ ही बने रहे..  ढेरों तकलीफ़ देने वाल सवाल छटपटाते रहे उसके भीतर.. रणवीर भाई ऐसे क्यों हो गए? ये उनकी राजनीति का दोष था या उनकी कोई व्यक्तिगत कमज़ोरी थी? या हर आदर्शवादी विद्रोही की यही नियति होती है? क्यों हमारे समाज में आदर्शों पर चलने वाली डगर इतनी कांटो भरी और कठोर होती है..? क्या आम आदमी का जीवन जीते हुए गहरा सामाजिक बदलाव करना मुमकिन है ही नहीं?  क्यों यौवन के कुछ वर्षों के बाद  आदर्शों की डगर चलना नामुमकिन हो जाता है.. या फिर आदर्श सिर्फ़ यौवन का ही शग़ल है? 

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(इस  इतवार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

स्मृति




पहचाना? शांति ने पूछा।
शांति साफ़ देख पा रही थी कि शब्बो देर तक उस मुस्कराते चेहरे से मिलती-जुलती कोई शकल अपनी स्मृतियों की गठरी में टटोलती रही। कुछ बहुत भारी पल गुज़रे। शब्बो के लिए समय जैसे लिथड़ने लगा। वो चेहरा किसी ख़ुशनुमा जवाब के इन्तज़ार में मुसकराता ही रहा। हर एक गुज़रते पल के साथ शब्बो के चेहरे पर एक अपराधबोध सा उभरता आ रहा था। न पहचानना सरासर बदतमीज़ी और बेअदबी है। अपनी शर्म में शब्बो ने चेहरे पर एक झूठी मुस्कराहट ओढ़ ली.. और तुक्के फेंकने लगी..
स्कूल में थे न..?
'थे तो.. पर नाम याद नहीं आ रहा न? 
'त्च्च..!! ..सचमुच याद नहीं आ रहा..!'  
'मैं जानती थी.. तू भूल जाएगी मुझे..!' अनजान चेहरे पर थोड़ी उदासी फैल गई। 
इसके पहले कि उदासी और पैर फैलाये शांति ने मामले को अपनी गिरफ़्त में ले लिया।  
'सुमन है रे शब्बो!' शांति ने शब्बो को याद दिलाने की कोशिश की..'याद नहीं है टेन्थ सी..हम तीनों साथ थे..मेरे बगल के घर में रहती थी.. कितनी बार साथ चाट खाई है हमने.. कितनी एम्बीज़ बॉरो की थी उससे.. सब भूल गई?'
'और दीदी की शादी में जीजा जी के जूते छिपाने की लीडरशिप भी तूने ही की थी..' सुमन ने याद दिलाया। 
'और फिर 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां' पर नाचकर सबके होश भी उड़ा दिए थे', शांति ने जोड़ा। 
इतना बताने के बाद भी शब्बो के ज़ेहन में कोई कुलबुलाहट नहीं हुई। उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी और के बारे में चर्चा हो रही हो या फिर उसके किसी ऐसे पूर्वजन्म की बातें जिनकी उसे कोई याद नहीं है। मगर ये सारे भाव दबा देने की पूरी कोशिश की झलक भी उसके चेहरे से हल्की-हल्की ज़ाहिर हो ही जा रही थी। 
'अब आया याद?, शांति ने उसका हाथ पकड़ कर झकझोरा। 
'ह..हाँ..' शब्बो अपने झूठ पर जारी रही, 'याद है.. याद है.. पर आजकल न जाने मेरी याददाश्त को क्या हो गया है.. आजकल तो कुछ भी भूल जाती हूँ.. दूधवाले और वाचमैन का नाम तो सभी भूलते होंगे पर मैं तो हीरो-हीरोइन का नाम भी भूलने लगी हूँ.. मरियम नकल करती है मेरी- अरे वो कौन सी फ़िल्म थी.. जिसमें वो गाना था.. अरे वो जो हसीन सा हीरो है उस की तो फ़िल्म थी.. अरे वही जो अपनी ज़ुल्फ़ें अदा से झटकता रहता है..' 
'अच्छा.. ये हाल हो गया तुम्हारा!?' सुमन ने हमदर्दी से पूछा? 

शांति जानती थी कि शब्बो अपनी झेंप मिटाने के लिए बहुत कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बता रही थी। पर शब्बो झूठ भी नहीं बोल रही थी। शांति और शब्बो बचपन की दोस्त हैं। स्कूल से एक दूसरे के साथ हैं। स्कूल- कालेज की तमाम बातें और क़िस्से जो शांति को चमकीले उजाले की स्पष्टता के साथ याद हैं, शब्बो के ज़ेहन से परमानेंटली डिलीट हो चुके हैं। बेचारी शब्बो! ऐसी स्मृति है उसकी कि बार-बार दोस्तों के बीच शर्मिन्दा होना पड़ता है उसे। सुमन के सामने वाली यह हालत पहली बार नहीं हुई है। जब भी कभी पुराने दोस्त मिलते हैं तो ऐसी ही हालत बार-बार पैदा होती है। जो असहजता सुमन को भूल जाने से शब्बो में जनमी थी - शब्बो को उसे भी भूलते देर नहीं लगी। दो-चार बातों के बाद शब्बो अपने रंग में वापस लौट आई। शांति को शब्बो के इस गुण पर बड़ी हैरानी होती और कभी-कभी रश्क भी होता! शांति कभी कुछ नहीं भूलती। उसे सब कुछ सब समय याद रहता है। 

सुमन चली गई, शब्बो भी। खाना-पीना करके, सबकुछ समेट कर शांति सो गई। देर रात अचानक उसकी नींद खुल गई। अजीब एहसास था एक तरफ़ गला कुछ सा सूख रहा था और वहीं पैर गल से रहे थे। गला तर करने के लिए रजाई से निकलने का यकायक मन नहीं किया शांति का। चुपचाप वहीं पड़ी रही। पूरे आलम में सन्नाटा था। बस बग़ल में अजय की सांस की आवाज़ और एक कुत्ता कहीं दूर भौंक रहा था लगातार। और कहीं कोई और आवाज़ नहीं थी। बस एक नियमित अन्तराल के बाद उस कुत्ते की भौंकने की आवाज़ आती जा रही थी-  भौं-भौं.. भौं-भौं.. भौं-भौं। 

शांति ने चाहा फिर सो जाए पर एक बात जो वो कभी भूली नहीं, उसके ज़ेहन में घूमती जा रही थी- गर्मी थी.. छुट्टियां थीं.. दोपहर थी.. माँ को हलका सा बुख़ार था। चिपचिपाते लम्बे उबाऊ दिनों के बहुत इन्तज़ार के बाद बादल घुमड़े और फिर गड़गड़ाकर मेह बरसने लगा। नन्ही शांति उत्साह से झूम उठी और चीख़ी- माँ देखो बारिश हो रही है! माँ ने कराह कर उसे बरज दिया- अच्छा है पर तू बाहर मत जाना! शांति के सारे उत्साह पर पानी फिर गया- क्यों माँ? माँ को बोलने में कष्ट हो रहा था। वो कहना चाहती थी कि पहली बारिश में भीगने से त्वचा के रोग हो सकते हैं, पर नहीं कहा। बस डाँटकर चुप करा दिया। शांति चुप तो हो गई पर मानी नहीं। हौले से दरवाज़ा खोलकर बारिश में देर तक नहाती रही। और जब बदन में शिअरन होने लगी तो उसी तरह हौले घर में दाखिल हुई। देखा माँ कहाँ है- माँ वहीं अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। नन्ही शांति बाथरूम में जाकर कपड़े बदलने लगी। दो मिनट बाद किसी के रपटकर गिरने का शब्द हुआ। जब शांति बाहर आई तो देखा कि माँ अपने कमरे के बाहर फ़र्श पर गिरी पड़ी है। जहाँ शांति ने रुककर माँ को चुपके से देखा था, वहीं पर शांति के बदन से गिरकर जमा हुए पानी पर माँ फ़िसल गई थी। और तब से अक्सर शांति की स्मृति में रात-बिरात फ़िसलती रहती है।   

ऐसी ही कितनी दुख, क्षोभ, पश्चाताप और अपमान की बातें हैं जो उसे रातों में सोने नहीं देतीं। ऐसे ही देर रात में कूदकर उसकी नींद की राह अवरुद्ध कर देती हैं। शांति ने बहुत चाहा कि फिर सो जाए पर माँ के चेहरे का वो कष्ट और अवसाद उसकी आत्मा में और बिछौने में काँटे की तरह गड़ता रहा। कुत्ता अभी भी भौंक रहा था, उसी नियमितता से- भौं-भौं.. भौं-भौं.. भौं-भौं। न जाने वो कोई बात भूल गया था या उसे कोई बात याद आ रही थी। 

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(१५ जनवरी को दैनिक भास्कर में छपी) 

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

साथ



सतीश के घर से लौटने के अगले तीन दिन तक अजय और शांति में अबोला बना रहा। झगड़ा ऐसी बात को लेकर हुआ था जिसका उनके निजी जीवन से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। सतीश की बिटिय़ा के जन्मदिन के बहाने बड़े दिनों बाद ऐसा मौक़ा आया था कि तीन लंगोटिया यार अजय, मुकुल और सतीश एक साथ जुट पाए थे। अंशुला के नाम का केक कटने, हैपीबर्थडे गा लेने और बच्चों की फ़रमाईश पर गुब्बारे फोड़-फाड़ चुकने के बाद यारों की असली महफ़िल की शुरुआत हुई। बच्चों से छिपकर जाम बनाए गए और बीवियों से छिपके चुस्कियाँ ली गईं। पहले चुटकुले सुनाए गए, फिर पुरानी गुदगुदी यादों से दिल को बहलाया गया। पर क्रिकेट में हार और बेईमानी की मार पर बातचीत का तबादला होते देर नहीं लगी। उसके पहले तक सतीश का घर तीन भागों में बँटा हुआ था- पहला तो वही जिस बैठक में यारों की तिकड़ी जमा थी, दूसरे बच्चों की रेलमपेल वाला कमरा और इन दोनों सीमाप्रदेशों के बीच तीसरा था रसोई और डाइनिंग टेबल का सम्मिलित प्रभाग, जिसकी और जिसमें शांति, सीमा और प्रभा की आवाजाही हो रही थी। जब बहस शुरु हुई तो दलील की लहरों के साथ एक-एक करके तीनों महिलाएं बैठक के तट पर आ लगीं।

'ये सब सोची-समझी नौटंकी थी', सतीश ने हिकारत से कहा, 'उनको बिल पास करना ही नहीं था..'
सतीश की बात सुनते ही मुकुल अपनी जगह बैठे-बैठे ही सर हिलाने लगा, 'नहीं-नहीं! ये तू ग़लत बोल रहा है.. आधी-आधी रात तक लगे पड़े रहे लोग और तू कह रहा है कि बिल पास नहीं करना था.. '
'बिल्कुल नाटक था.. जनता को मूर्ख बनाने के लिए..', सतीश तरंग में आ चुका था और मुकुल के सामने खड़े होकर नेताओं की नक़ल उतारते हुए हाथ लहरा-लहरा कर कहने लगा, 'देखो भैय्या हम तो बड़े भोले हैं.. हम तो रोकना चाहते हैं भ्रष्टाचार, लाना चाहते हैं लोकपाल, पर विपक्ष हमें लाने ही नहीं दे रहा..अब बताओ हम क्या करें?'
सतीश की भड़ैती से मुकुल भी भड़क गया, 'तो इसमें क्या गलत है.. यही तो हो रहा है..विपक्ष ने पहले कहा कि हम साथ देंगे और ऐन मौक़े पर गच्चा दे दिया.. जनता के साथ असली गद्दारी तो आपके विपक्ष ने की है.. वो हमेशा के गद्दार हैं..'
'अच्छा और तू जिनका साथ दे रहा है वो दूध के धुले हैं.. साठ साल से वही तो लूट रहे हैं.. ' सतीश और तैश में आ गया।
'माना.. लूट रहे हैं.. पर लूट बंद करने का क़ानून भी तो वही ला रहे हैं.. जिसे लाने नहीं दिया गया..'
'किसने मना किया लाने को.. लाओ.. बिलकुल लाओ.. किसने रोका है.. ' इतना कहकर सतीश ने अपने हाथ के गिलास को होठों से लगाके मुँह में उल्टा लिया पर गिलास ख़ाली था।
'एक मिनट रुक.. पेट्रोल ख़तम हो गया.. रुक.. मैं रिफ़िल लेके आता हूँ', सतीश कोने में जाके अपना इन्तज़ाम करने लगा।
अब अभी तक मौन अजय की बारी थी, 'वैसे वो नहीं ला रहे थे क़ानून.. उन्हे मजबूर किया गया ये क़ानून लाने के लिए.. "
अच्छा!? तुम्हे लगता है सरकार को कोई मजबूर कर सकता है?', मुकुल ने तंज़ किया।
'किया न.. '
जो सरकार बम-गोले लेके युद्ध करने वालों के हाथों मजबूर नहीं होती वो अनशन करने से मजबूर हो जाएगी..? क्या बकवास कर रहा है यार..'
बकवास नाम सुनते ही अजय को भी आग लग गई, 'मेरी बात तुझे बकवास लग रही है..? लंगोटी वाले फ़कीर ने लाल वर्दी वाले साम्राज्य को हिला के रख दिया था.. और किसी बमगोले से नहीं.. उपवास और अहिंसा की शक्ति से..'
'और बकवास किए जा रहा है तू.. अंग्रेज़ क्या गाँधी जी की वजह से देश छोड़कर गए.. दूसरे विश्वयुद्ध में उनकी बैण्ड बज गई थी.. इसलिए गए..'

इसके बाद बहुत देर तक बहस गांधी, उपवास, सदाचार और भ्रष्टाचार के मुद्दे के गिर्द उमड़-घुमड़ करती रही। शांति समेत दूसरी महिलाओं ने अपनी राय को सदन के पटल पर रखना चाहा पर उनकी बात सदन के हंगामें में हवा हो गई। बच्चे अपने खेल-वेल छोड़कर पापाओं के पौरुष को देखने के लिए इकट्ठा हो गए। अजय नेता विपक्ष की भूमिका में था और सतीश उसके मुखर समर्थक के किरदार में लगातार आवाज़ बुलन्द कर रहा था। मुकुल सत्तापक्ष में अकेले पड़ गया था और सत्ता उससे सम्हल नहीं रही थी। तो मुकुल ने अपने पक्ष में मज़बूती लाने के इरादे से महिलाओं पर नज़र डाली और सबसे पहले शांति पर निशाना साधा-
'अच्छा शांति भाभी आप बताइये.. आप क्या कहती हैं.. क्या उन्हे अनशन करना चाहिये था?'
बहस कई मंज़िलों-मक़ामों से गुज़रकर अनशन पर आ ठहरी थी।
शांति की राय स्पष्ट थी पर वो स्थिर नहीं थी, '..मेरी समझ में उन्हे इस बार अनशन नहीं करना चाहिये था..'   
'क्या बात कही भाभी.. यही तो मैं भी इतनी देर से इस गधे को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ पर इसके भेजे में जा ही नहीं रहा.. अबे घोंचू! तुझसे समझदार तो तेरी बीवी है...'
मुकुल के ये शब्द अजय के दिल में तीर की तरह चुभ गए। पर अजय ने उस से कोई ज़्यादा अहमियत नहीं दी। वो शांति की ओर सन्न होके देखता रहता जैसे शांति ने उसका कोई बड़ा गहरा अपराध कर डाला हो क्योंकि उसको उम्मीद थी कि शांति उसी का पक्ष लेगी..
'क्यों.. क्यों नहीं करना चाहिये था अनशन?', अजय ने दागा।
'इसलिए कि जो मूल माँगे थी वो तो मान ही ली गई थीं.. और आप संसद पर कुछ थोप थोड़ी सकते हैं.. वहाँ क़ानून बनने की एक... ' शांति कहती गई पर अजय के ज़ेहन में कुछ भी दर्ज़ होना बंद हो चुका था। और भी बहुत कुछ कहा-सुना गया पर अजय के दिल में शांति के उसके विरोध पक्ष में जाने की बात धंस कर रह गई। सबके सामने कुछ बोला नहीं और अपनी भावना को ज़ब्त किए रहा लेकिन कार के चलते ही वो शांति पर बरस पड़ा।
'ऐसे बड़ा आन्दोलन-आन्दोलन करती हो पर जब मौक़ा आया तो धोखा दे दिया..?'
अरे..?! मुझे जो ठीक लगा मैंने कहा.. और मुझे अपनी राय बदलने का हक़ है..' पहले चौंकने के बाद शांति ने अपनी सफ़ाई देनी चाही।
अच्छा.. तो क्या पति बदलने का भी हक़ है.. मेरी बीवी होके तुम मुकुल का साथ दे रही थीं?'
इस तरह की बेतुकी बात सुनते ही शांति एक पल के लिए हकबका गई। और उसके बाद अजय घर लौटने तक लगातार जो बकता रहा वो सब सुनना शांति के लिए लगभग असहनीय था। वो इस बात पर हैरान थी कि अजय जैसा पति उससे भी उससे सिर्फ़ एक समर्थक भर होने की उम्मीद करता है- जैसे शांति का कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व, कोई स्वतंत्र सोच हो ही ना!? वो नशा था, क्रोध था या अस्थायी पागलपन था- जो भी था शांति को बिलकुल नापसन्द था और पूरी तरह अस्वीकार्य था।

इसीलिए जब अगली सुबह नशा उतरा और अजय ने अपनी तरफ़ से बोलचाल में कोई दिलचस्पी न दिखाई तो शांति ने भी एक उदासीनता का चोला पहन लिया और तब तक पहनी रही जब तक अजय, तीन दिन गुज़र जाने के बाद, सामान्य बरताव पर कुछ इस तरह लौट आया जैसे कुछ हुआ ही न हो। शांति ने भी बीती बात को कुरेदना ठीक नहीं समझा, ये जानकर भी कि वो बात किसी दबी हुई चिंगारी की तरह उनके सम्बन्ध में सुलगती रहेगी।

***

(८ जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 


गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

दाता

इतवार का दिन था। कई दिनों के कोहरे के बाद कुनमुनी धूप निकल कर आई थी। साढ़े-दस ग्यारह बजे की मुतमईन घड़ियों में बच्चे और नौजवान जहाँ जगह मिले खेल रहे थे। प्रौढ़ और वृद्ध घरों के बाहर कुर्सियां डाल के पड़े हुए थे या बेवजह ही छायाओं की अवहेलना करते हुए धूप के आगे   चहलकदमी कर रहे थे। मगर शांति धूप की अवहेलना करते हुए एक बंद कमरे की घुटी हुई हवा में पुराने सामान को उलट-पुलट रही थी। एक तरफ़ बड़ी सी अलमारी की छोटी-छोटी दराज़ों में पुराने फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी रेकार्डस और ऑडियो कैसेट्स थे। दूसरी दीवार के सहारे लगी रैक्स में रीडर्स डाइजेस्ट, सारिका और माधुरी जैसी पुरानी पत्रिकाओं के अंको के ढेर लगे हुए थे। तीसरी और चौथी दीवार के सहारे अलग-अलग चट्टों में इब्ने सफ़ी, ओमप्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत के उपन्यास बेतरतीब अन्दाज़ में उपेक्षित से पड़े हुए थे। हालांकि जिस मोटाई की धूल हर साज़ों- सामान पर पसरी हुई थी, वो किसी को भी उपेक्षित का दर्ज़ा दिलाने के लिए पर्याप्त थी।

'कैसा लग रहा है आप को?' शांति से यह सवाल पूछा आत्माराम जी ने। शांति ने दराज़ में क़ैद कैसेट्स में फंसी अपनी नज़र निकालकर आत्माराम जी को देखा। वो अपनी लहराती सफ़ेद दाढ़ी और मुस्कराती आँखों के वेश में किसी प्राचीन ऋषि जैसे लग रहे थे। उस कमरे और उसमें मौजूद हर असबाब के स्वामी आत्माराम जी ही थे। जिन्होने अपरिग्रह या वैराग्य जैसी किसी भावना से  प्रेरित होकर अपने उस प्रिय और प्राचीन संग्रह को दान करने का इरादा कर डाला था। और उस  इरादे को एक रंगीन कागज़ की शकल में सोसायटी की हर इमारत की नोटिस बोर्ड में चिपका दिया था। शांति आत्माराम जी को पहले से नहीं जानती थी- वही नोटिस पढ़कर आई थी। और अब उस से आत्माराम जी ने पूछा था कि कैसा लग रहा है उसे। 'उनके संग्रह को देखकर' का वाक्यांश उन्होने कहा नहीं था पर वो सवाल में अन्तर्निहित था।
'अच्छा लग रहा है..' शांति ने कहा। पर वो और कह भी क्या सकती थी।
'पर आप ये सब दे क्यों रहे हैं..?' शांति ने पूछा।
'अब क्या होगा इस सब कबाड़ का.. पड़ा-पड़ा धूल खाता रहता है बस', आत्माराम जी को पत्नी सुमित्रा देवी कमरे में चली आईं थीं। और उनके हाथों में एक ट्रे ही जिसमें ग़ज़क, चिक्की और तिल के लड्डू थे।
'लो खाओ!', उन्होने ट्रे शांति के आगे कर दी।
'नहीं-नहीं.. मैंने अभी नाश्ता किया है।'
'तो क्या हुआ.. ये तो नाश्ते के बाद खाने की चीज़ है..लो खाओ!', सुमित्रा देवी के स्नेहिल आग्रह के आगे शांति को झुकना ही पड़ा।
'मुझे जो पढ़ना था, पढ़ चुका.. सुनना था, सुन चुका.. अब दूसरे लोग इसका सुख लें.. इसी कारण मैंने  इन्हे दान करने का फ़ैसला किया..'
दान करने का भी सुख होता है.. आप को कैसा लग रहा है' शांति ने पूछा।
'अच्छा लग रहा है..', आत्माराम जी अपने सुख की गहराई से मुसकराए।

जब तक यह बात हो रही थी, सुमित्रादेवी ने गुड़ की ग़ज़क की पूरी पट्टी अचरज के मुँह में ठूँस दी। अचरज भी आया था शांति के साथ। आया क्या था, घसीटकर लाया गया था, वो तो धूप में अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता था पर शांति ही उसे किताबों और संगीत की दुनिया से एक क़रीबी रिश्ता बनाने की नीयत से खींच लाई। आया गया था तो वो भी कुछ अलट-पटल कर देख रहा था, हालांकि उसके मतलब की चीज़ें थी नहीं वहाँ पर। शांति को भी अपने मतलब की चीज़ें कम ही दिखीं। रेकार्डप्लेयर न होने के कारण रेकार्डस तो किसी काम के थे नहीं और कैसेट्स भी अधिकतर उसकी पसन्द के नहीं थे। पर फिर भी बचपन में सुने गानों को फिर से सुनने के चाव से उसने कुछ कैसेट्स अलग कर लिए।

'एक व्यक्ति के लिए पाँच आईटम से ज़्यादा नहीं..' आत्माराम जी ने स्थिर स्वर में कहा।
'जी?!', शांति थोड़ा हड़क गई।
'मैं चाहता हूँ कि मेरा संग्रह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे..'
'अच्छा ख़याल है.. पर मुझे बस यही दो चाहिये..'
कैसेट्स के कवर पर पंकज मलिक और सी एच आत्मा को देखकर आत्माराम जी के चेहरे की लकीरों में विछोह के दर्द की तस्वीर बन गई।
'तो ये दोनों जायेंगे..! ?'
उनकी आवाज़ को सुनकर शांति को लगा कि शायद वो उन्हे देना नहीं चाहते..
'अगर आप इन्हे रखना चाहें तो..'
'नहीं-नहीं.. आप लेके जाइये.. बस इस रजिस्टर में अपना नाम-पता लिख दीजिये..'
'जी?' शांति को समझ नहीं आया..
'अगर कभी मुझे इन्हे सुनने का मन किया तो मुझे पता रहेगा कि ये कहाँ हैं..'
'..ओके..' शांति अटपटा के बोली।

शांति जब अपना नाम दर्ज़ कर रही थी, आत्माराम जी ने कैसेट्स के भीतर एक मोहर मार दी- जिस में उनके नाम व नम्बर के अलावा सप्रेम भेंट भी छपा हुआ था। शांति को लगा कि वो किसी लेण्डिंग लाइब्रेरी में चली आई है।
'मैं यह ले लूँ अंकल?' अचरज एक पुराना ध्वस्त सा एलबम हाथ में लेके खड़ा था।
'अरे ये.. ये तो मेरा स्टैम्प कलेक्शन है..' आत्माराम जी ने विकलता से कहा।
'ले लो बेटा ले लो.. इनके किसी काम का नहीं.. ले जाओ!', सुमित्रा जी ने साधिकार कहा तो अचरज की बाँछे खिल गई। लगभग अनमने से आत्माराम जी ने अपने रजिस्टर में उस एलबम के आगे अचरज का नाम दर्ज़ कर लिया। उनके घर से निकल कर अचरज काफ़ी प्रसन्न था। वो एलबम लेके सीधे घर जाने के बजाय घास में खेल रहे अपने दोस्तों के बीच दौड़ गया और उत्साह से उन्हे अपनी नई निधि दिखाने लगा।
**
तीन दिन बाद। शाम को जब शांति घर से लौटकर साँस ले रही थी तो अचानक आत्माराम जी चले आए.. कहने लगे- 'पंकज मलिक सुनने का मन कर रहा था..'
शांति और कर ही क्या सकती थी.. उनका कैसेट था.. उन्होने दिया था.. वही माँग रहे हैं.. कोई कैसे ना कर सकता है.. देना ही पड़ेगा। शांति ने चुपचाप ला के दोनों कैसेट उन्हे थमा दिए। शांति को उम्मीद थी कि वे सी एच आत्मा के कैसेट को लौटा देंगे.. पर वे कुछ नहीं बोले। हाथ में दोनों कैसेट थामे-थामे उन्होने पूछा- 'अचरज नहीं दिख रहा.. ?'
'वो अपने एक दोस्त को आपका एलबम दिखाने गया..',  शांति की उम्मीद फिर ग़लत साबित हुई- उसने सोचा था कि वे ख़ुश होंगे पर वे तो विकल हो गए।
'दोस्तों को.. ? वो स्टैम्प्स बाँट तो नहीं रहा न.. '
'पता नहीं.. मैंने पूछा नहीं.. '
'नहीं.. उसमें कुछ स्टैम्प्स हैं जो मैं अपने पोते को देना चाहता हूँ.. बहुत दुर्लभ स्टैम्प्स हैं.. '
उनके बेचैनी देखकर शांति को कहना ही पड़ा कि अचरज के आते ही वो उसे एलबम के साथ उनके घर भेज देगी। इस आश्वासन के बाद आत्माराम जी अपनी बूढ़ी काया को लिए-लिए सीढ़ियाँ उतर गए।

लौटकर आने पर अचरज ने बहुत हाथ-पैर फेंके कि एक बार दे दिए जाने के बाद वो एलबम उसका हो चुका है पर शांति ने उसे डाँटकर चुप करा दिया। अगले दिन अचरज को भारी मन से उस सप्रेम भेंट को भी उनके घर पहुँचाना पड़ा। उसके नन्हे हाथों के मुक़ाबले एलबम पर आत्माराम जी की पकड़ अधिक बलवती थी।

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(इस इतवार को दैनिक भास्कर में शाया हुई) 


गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

यमदूत



गाँधी जी ख़ुद एक वकील थे पर वो वकालत के पेशे को बड़ा बुरा समझते थे। उनका मानना था कि वकील झगड़ा निबटाने के बदले झगड़ा बढ़ाने का काम करते हैं, लोगों को चाहिये कि अदालत न जायें और अपना झगड़ा आपस में ही निबटा लें। शांति ने उनकी किताब हिन्द स्वराज पढ़ रखी थी। शांति को ठीक-ठीक याद नहीं पर मोटे तौर पर उसमें गाँधी जी वकीलों से भी ज़्यादा बुरा पेशा डॉक्टरी का लिखते हैं और अस्पतालों में पाप की जड़ होने की बात करते हैं। उन दिनों शांति नौजवान थी और दुनिया के हर पहलू को आदर्श नज़रों से देखने की कोशिश करती थी। बचपन में एक दौर ऐसा भी था जबकि वह ख़ुद भी डॉक्टर बनकर बीमार-बेचारों की सेवा करना चाहती थी। इसीलिए गाँधी जी की ऐसी बातों को उसने, गाँधी जी के प्रति तमाम आदर व सम्मान के बावजूद, एक अतार्किक अनर्गल प्रलाप ही माना। बहुत समय बीत गया। धीरे-धीरे कई कड़वे-कसैले अनुभवों के संशोधनों का शिकार होके के शांति की आदर्शवादी दृष्टि आदर्शों के डेरे से बेघरबार होके दुनियादार हो गई। जीवन के बहुत से पहलुओं के प्रति उसका नज़रिया बदला। वो डॉक्टरों और हस्पतालों के बारे में अब क्या सोचती है वो बाद में बतायेंगे पर पहले वो घटना जिस से गाँधी जी दुबारा प्रंसग में आ गए।

इरफ़ान का छोटा भाई फ़रहान कई दिनों से हस्पताल मे भर्ती था। शांति मिलने गई। शबनम हस्पताल के बाहर ही मिल गई। शांति को देखकर शबनम मुसकराई ज़रूर पर आँखें उदास ही बनी रहीं। आँखों के नीचे झाईंयां पड़ी हुई थीं, शायद थकान और नींद न पूरी होने के चलते। शांति ने फ़रहान का हाल पूछा तो पता चला कि उसके पैंन्क्रियस में कुछ भयंकर संक्रमण हो गया है। एक के बाद एक कई ऑपरेशन हो रहे हैं पर डॉक्टर कुछ भी साफ़-साफ़ कहते नहीं। घरवाले उनकी इस चुप्पी से अपनी उम्मीद की डोर जोड़े हुए हैं।

शबनम ने हौले से उसे बताया कि उसके अपने अनुमान से बचने की उम्मीद बहुत कम है पर अगर वो कुछ बोलती है तो बुरी बनती है.. इसलिए चुपचाप जो हो रहा है होने दे रही है। बीस दिन से आईसीयू में पड़ा हुआ है। ऑक्सीजन की मशीन से लेके न जाने कितने तरह की मशीन के तार और ड्रिप जिस्म से जोड़ रखे हैं। सुबह-शाम टैस्ट हो रहे हैं। हर तीसरे-चौथे रोज़ कोई नई जटिलता पैदा हो जा रही है और नतीजे में एक और ऑपरेशन। ऐसे करते-करते चार ऑपरेशन हो चुके हैं। शबनम ने धीरे से बताया कि डॉक्टर्स ने फ़रहान के पेट को काटकर खुला छोड़ रखा है.. बार-बार चीरने और फिर सीने से बचने के लिए।

ग़लती से एक रोज़ फ़रहान के जिसम को उसी हाल में उसकी माँ ने देख लिया- पछाड़ खा के गिर पड़ीं। रो तो वो पहले भी रही थीं मगर तब से उनकी आँखों की गंगा-जमना बरसाती मिज़ाज की हो गई है। उनको हस्पताल लाने की मनाही कर दी गई है फिर भी वो ज़िद करके चली आती हैं और उन्हे सम्हालना एक अलग काम बना रहता है। और इरफ़ान के अब्बू तो एकदम ही चुप हो गए हैं- न तो कुछ बोलते हैं और न ही हस्पताल आते हैं बस घर पर बैठकर दीवारों को ताका करते हैं। अपने जवान बेटे की इस बीमारी ने उनके चेहरे पर कई सिकुड़नें बढ़ा दी हैं।

पूरा परिवार ग़मज़दा है और फ़रहान की जान के लिए पैसे की कुछ परवाह नहीं कर रहा। वैसे भी हस्पतालों में कोई मोल-भाव नहीं होता। जो रेट बोला जाय, भरना पड़ता है। आदमी अपने दिल के हाथों मजबूर होता है। कितने ही परिवार जो सालों तक पैसा काट-काट कर बचत करते हैं- इसी हस्पताल के चक्कर में सब कुछ न्योछावर करके नंगे हो जाते हैं। और जो बचत नहीं करते वो तरह-तरह के कर्ज़ों के जाल में पड़ जाते हैं। हस्पताल में किसी को रियायत नहीं मिलती। इरफ़ान और उसके परिवार वाले भी फ़रहान की जान के मोह में रोज़ाना पंद्रह से बीस हज़ार स्वाहा कर रहे थे।

शबनम ने कहा नहीं पर एक सच्ची सहेली होने के नाते शांति ने समझ लिया कि शबनम अपने देवर की बीमारी का सोग तो मना ही रही है पर उसके अलावा लगातार की भाग-दौड़ से बेहद थकी और परेशान भी हो चुकी है। परिवार वाले लगभग तीन हफ़्ते से अलग-अलग शहरों से आकर वहीं डेरा डाले पड़े हैं। दिन-रात घर और हस्पताल के बीच चक्कर मार रहे हैं। कुछ लोग तो हस्पताल के आस-पास ही कुछ भी खा-पी के काम चला रहे थे, फिर भी दस-बारह जनों के लिए शबनम सुबह-शाम खाना बना रही है। और उनके कपड़े भी धो रही है। क्योंकि इतने सारे अतिरिक्त काम को करने से शबनम की बाई ने करने से इंकार कर दिया। काम का बोझ उतना भारी नहीं था मगर पूरे परिवार में छायी मुर्दनगी का बोझ उठाना कहीं दुश्वार था।

और हुआ वही जिसे न तो डॉक्टर बता रहे थे और न घरवाले तस्लीम करने को राज़ी थे। तेईस दिन के हस्पताल वास के बाद हस्पताल वालों ने उनका बिल तैयार कर दिया। फ़रहान का लाइफ़सपोर्ट हटा लिया गया। संयोग से शांति उस वक़्त उनके साथ ही मौजूद थी जब मनहूस ख़बर आई और घरवालों में रोना-पीटना मच गया। शांति ने सबसे संयत होने के नाते काग़ज़-पत्तर का काम सम्हाल लिया। हस्पताल के काग़ज़ात पर फ़रहान की रूह ठीक उसी पल इस आलम से आज़ाद हुई थी। लेकिन अगर लाइफ़सपोर्ट को हटाते के बाद फ़रहान के फेफड़ों ने एक भी साँस नहीं भरी तो साफ़ है कि फ़रहान नहीं उसके बेजान जिस्म में ऑक्सीज़न फूँककर दिन-रात काटे जा रहे थे। ये कसरत घरवालों की 'हर कोशिश कर लिए जाने की तसल्ली' के लिए की गई थी या शुद्ध रूप से हस्पताल का मीटर चलाते रखने के लिए- उस ग़मगीन मौक़े पर यह सवाल पूछने का मन किसी घरवाले का नहीं था। शांति का मन ज़रूर था पर वो भी मौक़े की नज़ाकत को देखकर चुप रह गई। और सोचती रही कि उसी नज़ाकत का नाजायज़ फ़ायदा उठाते रहे हैं हस्पताल वाले।

शांति ने देखा कि फ़रहान का जिस्म आईसीयू से निकलने के साथ ही एक दूसरा बेहोश जिस्म उस कमरे में दाख़िल कर दिया गया। शांति को लगा जैसे कि फ़रहान की मौत का ऐलान करने के लिए वो उस कमरे के अगले किराएदार का इंतज़ार भर कर रहे थे। फ़रहान तो बहुत पहले ही मर चुका था। शांति को अचानक लगा कि वो हस्पताल, बीमारों के चंगा करके दुनिया में वापस भेजने से ज़्यादा उन्हे यमराज के पास भेजने का टोलनाका है। और डॉक्टर्स एक तरह के यमदूत हैं जो इन्सान को इस पार से उस पार भेजने का शुल्क वसूल करने का व्यापार करते हैं।

ये वो पल था जब शांति को बरसों पहले पढ़ी हिंद स्वराज की याद हो आई। और नौजवानी में जिस बात पर वो गाँधी जी से सहमत नहीं हो पाई थी, उस पल में उसे एक बार फिर गाँधी बाबा पर श्रद्धा हो आई कि उन्होने सौ बरस पहले ही इन यमदूतों के असली किरदार को पहचान लिया था।


***

(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी) 


सोमवार, 12 दिसंबर 2011

जय भीम !


सरला के आने का समय सवा आठ का तय था। लेट होती तो आठ पचीस नहीं तो आठ तीस तक ज़रूर सरला की चाभी दरवाज़े के लैच में घूमने की आवाज़ आ जाती। सरला कभी घंटी बजाकर घर में नहीं आती थी। उसे पता था कि सुबह के वक़्त सब लोग समय के विरुद्ध एक विषम संघर्ष कर रहे होते हैं। और घर के सभी लोगों के घर में रहते हुए भी शांति द्वारा दी हुई चाभी का इस्तेमाल असल में घरवालों के उस हड़बड़ाए हुए संघर्ष के प्रति सरला की हमदर्दी और रहमदिली है। सवा आठ के बाद, आठ पचीस. आठ तीस बज गए - दरवाज़े के लैच में सरला की चाभी घूमने की सुकूनसाज़ आवाज़ नहीं आई। समय की अबाध चाल में पौने नौ, नौ, साढ़े नौ सभी बजते रहे पर सरला नहीं आई। एक फ़ोन भी लिया था सरला ने पर वो बिल समय पर न जमा न करने के कारण उन दिनों पूरी तरह स्थगित था।

शांति ने सरला को हिदायत दे रखी थी कि नागा करना तो हफ़्ते के किसी भी दिन कर ले पर छुट्टी वाले दिन मत कर। हफ़्ते भर दफ़्तर में घिसने के बाद छुट्टी के दिन घर में घिसना मंज़ूर नहीं था शांति को। उस दिन वो पूरा आराम चाहती थी। उस दिन मंगल था पर वो छुट्टी का ही दिन था। बच्चों के स्कूल की तो छुट्टी थी ही, अजय और शांति का दफ़्तर भी बंद था। लेकिन सरला के नागा कर जाने से शांति की छुट्टी बेकार हो गई।

सरला की अनुपस्थिति से घर पूरी तरह श्रीहीन सा हो गया था। शांति ने कोशिश की। घर ठीक किया, बरतन मांजे, नाश्ता बनाया, पर सरला वाली बात नहीं बनी। नाश्ता करते ही पाखी इमारत के दूसरे बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने नीचे भाग गई और अचरज सामने वाले घर में अपनी हमउम्र सहेली टिप्पा के घर चला गया। अजय अपना लैपटॉप गोद में रखकर घर में ही दफ़्तर खोलकर बैठ गया। और चैन की दो साँस लेने के लिए बैठी शांति को एकेक करके घर के वो सारे छूटे हुए काम याद आने लगे जो हफ़्तों से वो टालती रही थी। परदे पुराने हो गए थे-वो नए खरीदने थे; अजय ने अपनी चाभी खो दी थी तो उसके लिए एक डुप्लीकेट बनवानी थी;  फ़िल्टर कॉफ़ी का पाउडर ख़रीदना था जो पूरे शहर में सिर्फ़ हबीबगंज नगर की एकमात्र दुकान पर मिलता था; और अपने लिए एक आरामदायक सैण्डल ख़रीदना था- छुपकर। क्योंकि अजय को हमेशा लगता है कि वो कुछ ज़्यादा ही सैण्डल खरीदती है।

निकलते-निकलते ढाई बज गया। दोपहर की वो दुर्लभ मीठी नींद छोड़कर निकलना आसान नहीं था पर निकली। उसकी सूची में जो-जो काम दर्ज़ थे उन्हे निबटाने के लिए उसे शहा के तीन छोरों पर जाने की ज़रूरत थी। शहर के उत्तरी छोर पर स्थित दुकान से उसे पर्दे खरीदने थे- उस राह पर चलते हुए उसे इमाम हुसैन की शहादत की याद में इमामबाड़े की ओर जाता हुआ ताजियों का समूह और साथ चलते मातमियों का जुलूस मिला। शांति ने मन ही मन करबला की करुण कहानी को याद किया और इमाम को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर के आगे बढ़ी। फ़िल्टर कॉफ़ी खरीदने के लिए शहर पश्चिमी जाते हुए जब वो हबीबगंज से गुज़र रही थी तो रास्ते में उसे एक अलग दल झण्डे-बैनरों के साथ मार्च करता हुआ मिला। और तब शांति को याद आया कि मंगल को पड़ने वाली उस मुहर्रम की तारीख़ ६ दिसम्बर थी। वो काला दिन जिसके बाद से शहर के दो समुदायों के बीच तनाव की दीवार कई फ़ुट और ऊँची हो गई थी। ज़ेहन में उन दिनों की वीभत्स यादें आते ही शांति सिहर गई। और तेज़ी से स्कूटर चलाकर उन यादों से दूर भाग चली।

सैण्डल ख़रीदने के लिए उसका स्कूटर शहर पूर्वी की तरफ़ मुड़ गया। शोरूम पहुँचने के पहले ही  रास्ते में कुछ जाम मिला। शांति ने देखा कि चौराहे पर आकर मिलने वाली आड़ी सड़क से एक और जुलूस गु़ज़र रहा था। इस जुलूस में न तो ताजिए थे और न ही काला दिवस मनाने वाले काले झण्डे। जुलूस का मुँह शांति से आड़ा होने के कारण शांति बैनरों पर लिखी इबारत ठीक से पढ़ नहीं पा रही थी। सिर्फ़ एक बैनर पर उसे जय भीम लिखा हुआ दिखाई दिया। शांति घबरा गई.. क्योंकि भीम नाम से वो एक ही महाभारत वाले महाबली भीम को जानती थी। उसे अंदेशा हुआ कि वो जुलूस काला दिवस मनाने वाले जुलूस के विरोधियों का जुलूस तो नहीं। पर जुलूस में शामिल लोगों के हाव-भाव में भीम वाली कोई आक्रामकता नहीं थी। बल्कि वे बड़े विनीत भाव से धीरे-धीरे नारा लगाते हुए चले जा रहे थे। नारे में भी भीम का ही नाम ले रहे थे- जय भीम बोलो! आगे बढ़ो! जुलूस निकल गया और शांति भीम वाली बात को भूल गई।

अगली सुबह ठीक सवा आठ बजे दरवाज़े के लैच में चाभी घूमने की आवाज़ आई। शांति शिकायती मुद्रा धारण करके रसोई तक पहुँची पर मुसकराती हुई सरला ने पहल की- दीदी कल मैंने आपको देखा था।
'मुझे? कहाँ?'
'आर्यनगर चौराहे पर.. '
'हाँ मैं कल गई थी उधर .. पर तू आर्य नगर चौराहे पर क्या कर रही थी.. ?'
'मैं तो जुलूस में थी!'
जुलूस में?
शांति की आँखों के आगे जय भीम वाला विनीत जुलूस घूम गया।
'वो भीम वाला जुलूस..?
'..हाँ-हाँ दीदी.. वो ही!'
कल के नागे की बात किनारे हो गई.. शांति के कौतूहल ने बाग़ हाथ में ली।
'ये भीम कौन है.. ?'
'भीम.. ? बाबा साहेब!और कौन?!'
बाबा साहेब?'
'हाँ उनका पूरा नाम बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर है ना..! कल परिनिर्वाण दिवस था न उनका!'
शांति एकदम सिटपिटा गई और उसकी हालत किसी स्कूली लड़की की तरह हो गई जिसका सही समझे जाना वाला सवाल ग़लत साबित हो गया हो। वो जानती थी डा० अम्बेडकर का काम और पूरा नाम भी जानती थी पर न जाने क्यों वो समझ ही नहीं सकी कि जय भीम में किसकी जय की बात हो रही है।

 सरला ने आगे बताया कि किस तरह बाबा साहेब उसके लिए भगवान से भी बढ़कर हैं। क्योंकि कितने अवतार हुए पर एक ने भी दलितों के उद्धार के लिए कुछ भी नहीं किया। सरला ने ये भी बताया कि उसके घर में भगवान की कोई तस्वीर, कोई मूर्ति नहीं। भगवान के कोने में उसने बाबासाहेब की ही फ़ोटो लगा रखी है।  

शांति को शर्म सी आने लगी अपने आप पर कि वो अपने आपको बड़ा सजग और सचेत समझती है पर उस भीम के बारे में वो न सजग निकली न सचेत, जिसे समाज का सताया हुआ तबक़ा भगवान के समकक्ष या उससे भी आगे रखता है!? और यह सोचकर वह और भी शर्मसार होती रही कि सरला जो उसके घर की दूसरी घरैतिन है उसी के मन में बैठी श्रद्धा का पता भी न पा सकी!? शायद उनके दिलों के बीच कुछ हज़ारों बरस की दूरी है जिसे पाटने में बड़ी मेहनत और कसरत करनी होगी।  

***

(इस इतवार दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 

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