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शुक्रवार, 25 मई 2012

निहितार्थ




प्रश्न: आर्य इस देश के निवासी हैं, हड़प्पा और ऋगवेद की सभ्यता में अन्तर नहीं है, एक ही सभ्यता है ऋगवेद के रूप में आर्यों की, जो हड़प्पा की नगर सभ्यता- तथाकथित नगर सभ्यता के रूप में है- ये सारी बातें संघ परिवार की संस्थाएं भी कह रही हैं (और आप भी कह रहे हैं)। मेरी पीढ़ी के लोग और नवयुवक लोग - सभी की तरफ़ से मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि आपका एजेण्डा और उन लोगों का एजेण्डा जिन्होने बाबरी मस्जिद गिरायी थी, एक ही दिखाई पड़ता है, क्यों? यह सिर्फ़ संयोग है? क्या इसमें सम्बन्ध है? 

यह सवाल नामवर सिंह ने रामविलास शर्मा से एक साक्षात्कार के दौरान किया था सन २००० में कभी, और मंगलेश डबराल ने उसे एक टेप रिकार्डर पर रिकार्ड कर  लिया था। यह साक्षात्कार तद्भव के २५वें अंक में प्रकाशित हुआ है (पहले के किसी अंक में भी छपा था, इस अंक में दुबारा छपा है)। यह बातचीत बेहद दिलचस्प इसलिए है कि इसमें से हिन्दी साहित्य की एक विशेष प्रवृत्ति का पता मिलता है। नामवर जी के सवाल और रामविलास जी के उत्तर, ऐसा लगता है कि दो अलग-अलग दुनियाओं से हैं। अब जैसे देखिये ये जो सवाल किया गया है, उसके जवाब में रामविलास जी बताते हैं कि.. 

(पूरे तर्क देखने के लिए तद्भव देखें.. मैं संक्षेप में मूल बिन्दु दे रहा हूँ)

१. भारत जैसे देश में अपनी संस्कृति और इतिहास का अध्ययन फ़ासिस्टों के हाथों में छोड़कर आर एस एस जैसी संस्थाओं से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। 
२. भारत में आर्यों की कोई अखण्ड इकाई नहीं थी, जैसा कि पूंजीवादी इतिहासकार और मार्क्सवादी इतिहासकार दोनों मानते हैं, 
३. नस्ल मे आधार पर भारत या संसार में किसी समाज का संगठन नहीं हुआ,
४. ऐतिहासिक भाषा विज्ञान, भाषाओं का अध्ययन नस्ली आधार पर करता रहा है, 
५. किसी आदि भाषा से अन्य भाषाओं का विकास नहीं हुआ है.. उसके बदले गण भाषाएं थीं।

इसके जवाब में नामवर जी विषय की इन सारी बारीक़ियों पर कोई बात नहीं करते। वे वापस अपनी मूल चिन्ता पर लौट जाते हैं,  कि आर्यों का मूल स्थान क्या था, इस प्रश्न के जवाब के राजनीतिक निहितार्थ होते हैं और रामविलास जी को उस का फ़िक्रमंद होना चाहिये और आर्यों के भारत का मूल निवासी होने से पैदा होने वाली फ़ासिस्ट राजनीति का खण्डन करना चाहिये। इस के जवाब में रामविलास जी वापस विषय की बारीक़ी में लौटते हैं- 

१. हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए वैदिक भाषा आदिभाषा है और आर्यभाषा परिवार की सारी भाषाएं वैदिक संस्कृत से निकली हैं, और ये बात पूंजीवादी भाषाविज्ञान भी मानता है। 
२. मैं गणभाषाओं की बात करता हूँ.. मराठी में तीन लिंग होते हैं, बंगला में एक भी नहीं होता- दोनों भाषाएं कैसे संस्कृत से निकल सकती हैं? गणभाषाओं का व्याकरण अलग है, शब्द भण्डार अलग है। 
३. वैदिक संस्कृति, हिन्दू संस्कृति नहीं है। (यानी हिन्दू संस्कृति में दूसरे तत्व में मिले हुए हैं) 
४. हिन्दू कट्टरपंथी और इस्लामिक कट्टरपंथी दोनों ही जातीयता का विरोध करते हैं, 
५. जबकि आर्य विभिन्न गणों में विभाजित थे, उनकी संस्कृति और भाषाओं में फ़र्क़ था, वे आपस में लड़ते थे, ऐसा कोई मार्क्सवादी इतिहासकार भी नहीं स्वीकार करता (परोक्ष रूप से वे भी जातीयता  के पहलू को अनदेखा करते हैं)  
६. आर्य भारत में रहते थे, उनके साथ द्रविड़ और मुण्डा लोग भी रहते थे, अन्य भाषाभाषी लोग भी रहते थे, हिन्दू राष्ट्रवादी उनकी बात नहीं करते, मैं करता हूँ.. मैंने उस पर किताबे लिखी हैं.. 

रामविलास जी के लम्बे जवाब के बाद नामवर जी इन मसलों पर चर्चा नहीं करते, वे वापस अपने मूल बिन्दु पर लौटते हैं- आप के ग्रंथो से जो राजनीति निकलती है उसका लाभ हिन्दू राष्ट्रवाद उठाता है। रामविलास जी कहते हैं- मैं जो लिख रहा हूँ वह हिन्दू राष्ट्रवाद का बिलकुल उलटा है, तुम न समझो तो मैं क्या करूँ। 

पूरी बातचीत में रामविलास जी विषय की बारीक़ियों की बात करते रहते हैं और नामवर जी निष्कर्षो के निहितार्थ की। और रामविलास जी कुछ बेचैन और चिड़चिड़े भी समझ में आते हैं। शायद इस वजह से कि रामविलास जी बार-बार अपने खोजे हुए सत्य पर बल दे रहे हैं और नामवर जी उसके सम्भावित उपयोग के भय की ओर उन्मुख हैं। इसको पढ़ते हुए चर्च और कोपरनिकस के अन्तरविरोध की याद हो आई, चर्च भी कोपरनिकस के आनुसंधानिक सत्य को झुठलाने पर आमादा था। हालांकि उस सत्य और इस सत्य की कोई तुलना नहीं। और मेरा आशय यह भी नहीं कि रामविलास जी की अवधारणा सत्य ही है। दिल को खटकने वाली बात इतनी सी है कि क्या इसी वजह से कोई बात न कही जाएगी कि वो पार्टीलाइन नहीं है या फिर कोई उसका ग़लत इस्तेमाल कर लेगा? 

फिर भी मेरे लिए यह संवाद पढ़ना बहुत मनोरंजक रहा। एक तो इसलिए भी कि हमारी भाषा के दो महापुरुषों का संवाद हम कमज़र्फ़ों की तरह ही उछलता-कूदता सा चलता हुआ मिला और दूसरे बड़ी वजह यह कि इसको पढ़कर दो विद्वानों के अलग-अलग मानसिक संगठन से रूबरू भी हुए। एक जो पूरी तरह अपने अनुसंधान में डूबा, राजनैतिक रूप से गहरे तौर पर प्रतिबद्ध मगर अपने निष्कर्षों को लेकर सिर्फ़ इस वजह से शर्मिन्दा नहीं कि किसी को लग सकता है कि वो फ़ासिस्ट इस्तेमाल के है; और दूसरा जो साहित्य और अनुसंधान को लगातार उनके राजनैतिक निहितार्थों से तौलता हुआ।

हिन्दी साहित्य रामविलास जी के अनुसंधान के कठोर अनुशासन, और अपने खोजे हुए सत्य के प्रति आग्रह का कितना अनुगामी हुआ है, कहना मुश्किल है। हो सकता है कुछ झक्की जीव यश और प्रसिद्धि के प्रलोभनों से दूर किसी आधुनिक मड़ई में अपनी गहरी साधना में लगे पड़े हों, और आने वाले दिनों का समाज उनके श्रम और साधना का ऋणी रहे, इस वक़्त उनके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस वक़्त हम जिनके बारे में कह सकते हैं वो हैं एक पिटे-पिटाए राजनैतिक सत्य की लीक पकड़कर चलने वाले और फ़टाफ़ट कुछ पहचान, मान, प्रकाशन, पुरस्कार, और सामाजिक प्रतिष्ठा लूट लेने के लिए आतुर शिष्यों की भीड़, जिनके लिए साहित्य सिर्फ़ एक राजनैतिक निहितार्थ है, उस से ज़्यादा कुछ नहीं। कुछ और लोग भी हैं, पर वो इस मुख्य धारा से बाहर किसी छोटी धारा में हैं, या एकदम हाशिये पर हैं। 

***  

(जहाँ कहीं भी कोष्ठक आया है, उसके भीतर मेरे शब्द हैं) 





मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

कथा अनन्ता


रावण मारा जा चुका है। युद्ध समाप्त हो चुका है। सीता ने अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता सिद्ध कर दी है। युद्ध में खेत रहे वानरों को इन्द्र ने फिर से जिला दिया है। राम अब जल्दी से अयोध्या लौट जाने के लिए उद्यत हैं। उनकी आतुरता देख विभीषण उन्हे पुष्पक विमान सौंप देते हैं। राम जी, राह में सीता जी के आग्रह पर किष्किंधानगरी से तारा आदि वानर पत्नियों को भी साथ ले लेते हैं। और सीता को उनकी यात्रा के विभिन्न पड़ावों का दर्शन कराते हुए श्रीराम भरद्वाज मुनि के आश्रम पर उनका आशीर्वाद लेने रुकते हैं और हनुमान को उनके आगमन की सूचना देने आगे भेज देते हैं। निषादराज गुह से मिलते हुए हनुमान आश्रमवासी कृशकाय भरत को राम की कुशलता का समाचार देते हैं। भरत जी हर्ष से मूर्च्छित हो जाते हैं और दो घड़ी बाद जब उन्हे होश आता है तो भाव विह्वल होकर हनुमान जी को बाहों में भरकर और आँसुओं से नहलाते हुए यह कहते हैं:
देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः
प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् || ४०||
गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं परम् |
सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्याश्च षोडश || ४१||
हेमवर्णाः सुनासोरूः शशिसौम्याननाः स्त्रियः |

सर्वाभरणसम्पन्ना सम्पन्नाः कुलजातिभिः || ४२||

ऊपर दिये गए श्लोकों का अर्थ है: "भैया, तुम कोई देवता हो या मनुष्य जो मुझ पर कृपा करके यहाँ पधारे हो। हे सौम्य, जितना प्रिय समाचार तुमने मुझे सुनाया है बदले में उतना प्रिय क्या तुम्हें दूँ? मैं तुम्हें एक लाख गायें, सौ उत्तम गाँव, और अच्छे कुण्डल पहनने वाली तथा शुभ आचार वाली सोलह कन्याएं पत्नी बनाने के लिए देता हूँ। सोने के रंग वाली, सुघड़ नाक वाली, मनोहर जंघाओं और चाँद जैसे मुखड़े वाली  उच्च कुल व जाति की वे कन्याएं सभी आभूषणों से भी सम्पन्न होंगी।"

जो लोग हनुमान के ब्रह्मचारी होने का दावा करते हैं या हनुमान के ब्रह्मचारी न होने के किसी भी उल्लेख पर भड़ककर लाल-पीले हो जाते हैं और वाल्मीकि रामायण को ही रामकथा का पहला और बीज स्रोत मानते हैं- तय बात है कि उन लोगों ने रामायण का यह अंश नहीं पढ़ा है और बिना पढ़े ही वे 'मूल' रामायण की मान्यताओं की रक्षा करने को उद्धत हो रहे हैं।

इसे पढ़ लेने के बाद भी कुछ स्वयंसिद्ध विद्वान यह कहने लगेंगे कि श्लोक में भरत के विवाह योग्य कन्याओं के देने भर का उल्लेख है पर हनुमान के स्वीकार करने की बात नहीं है!? पर उनको समझने की ज़रूरत है कि अगर स्वीकारने की बात नहीं है तो अस्वीकार करने की बात भी नहीं है। इन श्लोकों के बाद हनुमान जी प्रेम से भरत जी के साथ बैठकर राम की विजयगाथा की कथा कहने लगते हैं। अगर वे वाक़ई अविवाहित रहने वाले ब्रह्मचारी थे तो भरत भैया के आगे हाथ जोड़ लेते, पर उन्होने ऐसा कोई उपक्रम न किया। और हनुमान के ब्रह्मचर्य से वाल्मीकि जी की यही मुराद होती कि वे स्त्री तत्व से दूर रहेंगे तो वाल्मीकि महाराज भी वहीं पर सुनिश्चित कर देते कि इस मामले को लेकर कोई भ्रांति न पैदा होने पाये। 

मसला यह है कि अभी हाल में दिल्ली विवि के पाठ्यक्रम से ए के रामानुजन का लेख 'थ्री ह्ण्ड्रेड रामायनाज़ : फ़ाइव एक्ज़ाम्पल्स एण्ड थ्री थॉट्स ऑन ट्रान्सलेशन' इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि उसमें विभिन्न रामायणों की कथाओं के विविध पाठों का वर्णन हैं। और कुछ स्वघोषित संस्कृति के रक्षक (या राक्षस?) इस पर आपत्ति उठा रहे हैं। मुझे यह बात बेहद विचित्र मालूम देती है कि विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम तय करने में ऐसे अनपढ़ों की राय सुनी जा रही है जो न पढ़ते हैं और न पढ़ने देना चाहते हैं। और यह पहला मामला नहीं है जब ऐसा हुआ है इसके पहले मुम्बई विवि में भी ऐसी ही घटना हो चुकी है। आये दिन किसी किताब के किसी अंश को लेकर कोई न कोई बलवा करता रहता है। पर दिलचस्प बात यह है कि इनके बलवों का असर अक्सर उलटा होता है। भले ही मुम्बई विवि से रोहिन्टन मिस्त्री की किताब पाठ्यक्रम से हटा दी गई पर उनकी उठाई आपत्तियों से जनता में उस किताब में वापस दिलचस्पी पैदा हो गई। उसकी बिक्री में ज़बरदस्त उछाल आया। यही रामानुजन वाले मामले में भी हो रहा है। उनके लेख का अंश भले ही पाठ्यक्रम से निकाला गया हो पर इन्टरनेट पर उसे खोज निकाला गया है। और ख़ूब पढ़ा जा रहा है। इस इन्फ़र्मेशन ऎज में इस तरह की बकलोलियों का कोई अर्थ नहीं है। कुछ समय के लिए अपने पूर्वाग्रही समर्थकों के बीच सस्ती लोकप्रियता हासिल भले ही कर लें मगर किताबविरोधी और ज्ञानविरोधी इन कट्टरपंथियों का मक़सद आप विफल हो रहा है और होता रहेगा।

दुहाई रामकथा की दी जा रही है और हमारी परम्परा में रामकथा बेहद लोकप्रिय कहानी है और लगभग हर प्राचीन ग्रंथ में रामकथा का उल्लेख है। अकेले महाभारत में ही चार बार राम की कहानी सुनाई जाती है, जिनके भीतर भी छोटे-मोटे अन्तर मौजूद हैं। जब भी कोई कहानी बार-बार कही-सुनी जाएगी तो उसमें विविधिता आ जाना स्वाभाविक है। काल और देश का अन्तर जितना बढ़ता जाएगा, विविधिता की भी उसी अनुपात में बढ़ते जाने की सम्भावना बनती जाती है।

और विविधता के इसी पक्ष पर बल देता हुआ रामानुजन जी का यह तथाकथित विवादास्पद (सच तो यह है कि उनके लेख में सब कुछ तथ्य पर ही टिका हुआ है) लेख का आधार हिन्दी भाषा के विद्वान कामिल बुल्के का बहुमूल्य शोधग्रंथ 'रामकथा'ही है। रामानुजन अपने लेख की शुरुआत में उसका उल्लेख भी करते हैं। बुल्के जी अपने शोध में महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा अन्य पुराणों में वर्णित रामकथाओं के अलावा मगोलिया, तिब्बत, ख़ोतान और इण्डोनेशिया तक प्रचलित विविध रामकथाओं और उनकी विभिन्न पाठों का भी तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। मिसाल के लिए तमाम रामकथाओं में कहीं फल से, कईं फूल से, कहीं अग्नि से, कहीं भूमि से जन्म लेने वाली सीता को महाभागवतपुराण, उत्तरपुराण और काश्मीरी रामायण में रावण और मन्दोदरी की पुत्री बताया गया है, तो दशरथ जातक में दशरथ की पुत्री कहा गया है। पउमचरियं में (आम तौर पर अविवाहित समझे जाने वाले) हनुमान की एक हज़ार पत्नियों में से एक पत्नी सुग्रीव के परिवार की है और दूसरी पत्नी रावण के परिवार की। मलय द्वीप में प्रचलित 'हिकायत सेरी राम' में तो हनुमान राम और सीता के पुत्र हैं- और यही नहीं 'हिकायत सेरी राम' के प्रचलित दो पाठों में उनके इस पुत्र होने की दो अलग ही कहानियाँ है। इसी तरह के और भी विचित्र भेद पढ़ने वालों को मिल जाएंगे।

हम जिस रामायण को जानते हैं, उसकी कहानी वाल्मीकि की बनाई हुई नहीं है। उनके बहुत पहले से लोग रामकथा कहते-सुनते रहे थे। पूरी पृथ्वी पर भ्रमण करने वाले नारद ने उनको रामकथा सुनाई थी; जैसे बुद्ध ने अपने पूर्वजन्मों का वृत्तान्त कहते हुए अपने शिष्यों को रामकथा सुनाई थी जो ई०पू० तीसरी शताब्दी से दशरथ जातक में सुरक्षित मिलती है; और जैसे बहुत काल बाद तुलसीदास को उनके गुरु ने सोरोंक्षेत्र में रामकथा सुनाई थी। ध्यान देने की बात यह है कि किसी ने भी रामकथा को पढ़ा नहीं है, सुना-सुनाया है। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस का जो अन्तर है वो इसलिए भी है कि तुलसी स्पष्ट कह रहे हैं कि उनकी कथा, रामायण पर आधारित है ही नहीं- वो तो गुरुमुख से सुनी कहानी पर आधारित है। और बहुत विद्वान ऐसे है जो वाल्मीकि की रामायण को नहीं बल्कि दशरथ जातक को उस कहानी को मूल रामकथा मानते हैं जिसमें न तो रावण है और न लंका, और जिसमें सीता और राम भाई-बहन होकर भी शादी करते हैं। निश्चित तौर पर कथा का यह रूप इसके एक ऐसे प्राचीन काल के होने का संकेत देता है जब राजपरिवारों की सन्तानें रक्तशुद्धि के विचार से आपस में ही विवाह कर लेते थे- जिसका एक और उदाहरण मिस्र के फ़िरौनों में मिलता है।

पर मुद्दा यह नहीं है कि कौन सी रामायण मूल कथा है। ग़ौर करने लायक बात यह है कि रामकथा की ग्रंथ परम्परा से पहले एक जीवंत श्रुति परम्परा भी रही है- जिसे गाथा के नाम से पुराणों आदि में भी पहचाना गया है। और इस श्रुति परम्परा के चलते यदि कोई मूल कथा रही भी होगी तो उसमें देश-काल--परिस्थिति के अनुसार बदलाव होते रहे हैं। अब जैसे जैन रामायण प‌उमचरियं में रावण का वध राम करते ही नहीं, लक्ष्मण करते हैं। क्योंकि जैन धर्म में हिंसा महापाप है और जिस पाप को करने के कारण ही लक्ष्मण नरक के भागी होते हैं।

इतिहास और मिथकों की इस गति को समझने के लिए एक के रामानुजन जैसे लेखों को 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' का जाप करने वाले आस्थावान कट्टरपंथी न पढ़ना चाहें तो न पढ़ें मगर 'हरि कथा अनन्ता' का मर्म समझने की आंकाक्षा रखने वाले और सजग चेतना विकसित करने के इच्छुक छात्रों के लिए ऐसी पढ़ाई बेहद अनुकूल है।


***

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल

माओवादियों की नीति और हिंसा के खिलाफ़ लिखे मेरे पिछले लेख को कुछ पाठकों ने उसे आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ़ भी समझ लिया। और यह भी समझ लिया कि मैं राज्य की हर उलटी-सीधी हिंसा और अन्याय का समर्थक हूँ। शायद लेख के शीर्षक से ऐसा बोध हुआ है। ऐसा नहीं है, मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूँ और मैं पूरी तरह से चाहता हूँ कि आदिवासियों के साथ न्याय हो।

यह राज्य और लोकतंत्र दोनों ही विभिन्न प्रकार रोगों, दोषों से आक्रान्त है लेकिन मैं शरीर में बुखार या दूसरा कोई रोग हो जाने पर हाथ-पैर फेंक कर उससे लड़ने या हताश हो कर ये सोचने कि ‘अब तो मर ही जायेंगे’ की जगह रोग को समझ लेने और उपलब्ध ज्ञान और पिछले अनुभवों के आधार पर उपचार में क्या-क्या कष्ट आने वाला है, उसे जान लेना अधिक बेहतर समझता हूँ। मुझे लगता है कि इस मामले में बहुत सारे लोग राज्य और सरकार के खिलाफ़ एक प्रकार के हताश आक्रोश से भरकर विरोध कर रहे हैं। जैसे कि देखा कि मित्र आनन्द प्रधान ने चिंता व्यक्त की है कि देश में अघोषित आपातकाल लगने वाला है। अरुंधति मानती हैं कि इस देश में लोकतंत्र ही नहीं है एक ढकोसला है। और भी बहुत सारे बुद्धिजीवी चिंतक ऐसी ही चिंताए व्यक्त कर रहे हैं।

लोकतंत्र क्या है? रूसो, वालतेयर के नवजागरण के विचारों और फ़्रांसीसी क्रांति के गर्भ से जन्मा यह शासनतंत्र बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित हुआ। लेकिन जन्म लेते ही खुद फ़्रांस में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहा और एक समय चक्र के बाद ही इसकी पुनर्स्थापना हो सकी। ब्रिटेन, अमरीका और अन्य योरोपीय देशों में यह फिर भी एक कुदरती चाल से क़ाबिज़ हुआ, भारत में लोकतंत्र लगभग ऊपर से आरूढ़ हुआ। जनता लोकतंत्र के लिए नहीं अंग्रेज़ो को बाहर करने के लिए आन्दोलन कर रही थी। अंग्रेज़ बाहर गए उनका बनाया तंत्र रह गया।

इस तंत्र की ज़रूरत, पहुँच और क्षमता कहाँ तक थी और कितनी थी, यह सब कहना मुश्किल है। माओवादी तो मानते हैं कि हम अभी भी अर्धसामन्ती समाज में हैं (फिर भी लड़ाई पूँजीवाद और साम्राज्यवाद से?)। लेकिन हमारे लगभग सभी बुद्धिजीवी संवाद के समय एक ऐसी जगह से अपनी बात शुरु करते हैं जहाँ पर लोकतंत्र एक ऐसा खूबसूरत और कल्याणकारी लिबास है जो सरकार ठीक से पहन नहीं पा रही और जगह-जगह से उघड़ जा रही है। गोरख पाण्डेय के गीत की एक पंक्ति है : समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई। गीत व्यंग्य में है पर मैं मानता हूँ कि क्रांतिकारी समाजवाद की गति हम देख चुके हैं, जल्दी में बहुत नुक़्सान भी हुए। और अभी तो ये लगता है कि लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे आई।

राज्य का स्वरूप आज जैसा है, हमेशा वैसा नहीं था। मेरे मित्र आशुतोष आज के इस राज्य को अन्याय की मशीनरी मानते हैं, है, पर मेरा आग्रह है कि वर्तमान की आलोचना करते हुए आदर्शों और सुनहरे सपनों को तो नज़र में ज़रूर रखें पर उसका इतिहास भी मत भूल जाइये। ऐतिहासिक रूप से हम जिसे भारत का स्वर्ण काल समझते हैं –मुग़ल काल – उस दौर में व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार नहीं होता था, सबै भूमि गोपाल की नहीं, बादशाह की होती थी। जब जिस को चाहे दी जब चाही वापस ले ली। आज रहीम खानखाना बड़े अच्छे हैं कल मन उखड़ गया सब कुछ छीन-छान कर भिखारी बना दिया। कल तक जो दसहज़ारी सरदार था, जंग में काम आ गया या बादशाह रूठ गए, दी हुई जागीर वापस ले ली, यहाँ तक कि मकान और सौगातें भीं। दसहज़ारी सरदार का सारा खानदान दाने-दाने को मोहताज़ हो गया। यह हाल मनसबदारों का हो सकता था तो आम जन के क्या हुक़ुक़ थे, पूछे जाने की ज़रूरत है क्या?

अंग्रेज़ो के सत्ता में आने के पहले आलम ये था कि पूरा ‘देश’ (उस वक़्त देश क्या था, ठीक-ठीक कहना मुश्किल था, लोग दूसरे गाँव जाकर भी परदेसी हो जाते थे) घोड़ों की टापों के नीचे लगातार रौंदा जा रहा था। बरसात के चार महीने जब नदियां उफ़न कर सेनाओं की आवाजाही पर रोक लगा देतीं, साल भर मराठे, ईरानी, तूरानी, अफ़्गान, जाट, रोहिल्ले, और सिक्ख आपस में तलवार भांजते रहते। इसी सब के बीच पिंडारी भी थे जो राजस्थान में टौंक से निकलते और कर्णाटक के दक्षिणी इलाक़ो तक गाँव-गाँव को लूटते और आग लगाते जाते। कई बार ऐसा होता कि एक गाँव साल में तीन-चार बार अग्नि को समर्पित हो जाता। ऐसी हालत से बचने के लिए कुछ गाँवो ने शहरपनाह की तर्ज पर गाँवपनाह की चहारदीवारियां बना रखी थीं ताकि लुटेरों और चौथ लेने आने वाली फ़ौजों से कुछ सुरक्षा मिले। पर चौथ के भूखे लड़ाके गाँव वासियों के खिलाफ़ तोप का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।

आज हमारी ज़बान अंग्रेज़ो को गाली देती नहीं थकती लेकिन सच तो यह है कि उनहोने इस भूमिखण्ड को एक भयंकर अराजकता से मुक्ति दिलाई। अराजकता का आतंक कैसा होता था इसे बनारसी दास ने अपनी किताब अर्धकथानक में लिखा है कि जब उनके गाँव में पता चला कि अकबर की मौत हो गई तो लोग-बाग़ के दिल संदेह और भय से दहल उठे। लोगों ने अपने कीमती वस्त्र और गहने ज़मीन में गाड़ दिये। और बहुत से लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति को लेके इधर-उधर भागने लगे। हर आदमी घर की रक्षा के लिए हथियार एकत्र करने लगा। ऐसी अराजकता का आलम अकबर महान के मरने पर था। अठारहवीं सदी का जो हाल जो हुआ वो हमारे लिए अकल्पनीय है।

शाह आलम की सत्ता दिल्ली से पालम तक सिमट कर रह गई थी। मगर उसके बहुत पहले यानी १७०७ में औरंगज़ेब की मौत के ठीक बाद से ही अस्थिरता घर कर गई थी और पूरी सदी पूरे देश का नक़्शा और मिल्कियत लगातार बदलता रहा। रात को सोते समय कौन राजा था और सुबह जागते समय कौन- कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता था। कितने मुग़ल सलातीन अंधे किए गए, उनकी औरतों को लज्जित किया गया, गिनती मुश्किल है। खुद शाह आलम उनके एक पुराने वफ़ादार के हाथों अंधे हुए। ऐसी हालत में आम जन किस असुरक्षा की मानसिकता में जीते होंगे, ये जानने के लिए कभी मौक़ा लगे तो ‘मीर की आप बीती’ पढ़ लीजियेगा, सूरते हाल साफ़ हो जाएगा।

जिन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ हमने १७५७ से लड़ना शुरु किया, १८५७ में महासंग्राम किया, और १९४७ तक लड़ते रहे, वो अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उस व़क्त वो विदेशी हमारे दुश्मन थे जो हमारे देश को बुरी तरह से अपनी छवि में ढाल रहे थे, हमारी मर्ज़ी, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध। आज हम जो भी लोकतंत्र, जनतंत्र, मानव अधिकार के नाम पर जिन भी चीज़ों का जाप करते हैं, वो हमारी अपनी सोच नहीं है, अंग्रेज़ो के साथ यूरोप से आयातित चिंतन है।

हम आज अमरीका द्वारा इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान में की जा रही सैनिक कार्रवाई के खिलाफ़ बोलते नहीं थकते। हम ऐसे किसी देश का दूसरे देश पर हमला कर देना ग़लत मानते हैं। ग़लत है.. पर किस नैतिकता के आधार पर? हमारी भारतीय परम्परा में इस तरह के आपसी युद्ध को लेकर 'मानवीय' नैतिकता का कोई आग्रह नहीं रहा। (बुद्ध और महावीर की अहिंसक परम्परा को छोड़ दें तो) उलटे लड़ना और रणभूमि में शहीद होना एक योद्धा के लिए उच्च नैतिक मूल्य है। कहा ही गया है कि वीर भोग्या वसुंधरा। और इस भोग की शुरुआत युद्ध जीतते ही लूट-पाट से आरम्भ हो जाती, जिसे विजेता का अधिकार माना जाता। सबसे बड़ा लुटेरा राजा कहलाने का अधिकारी होता था। (आज वीर भोग्या वसुंधरा मानने वालों को हम अपराधी कहते हैं)

इस्लामिक नैतिकता का युद्ध के बारे में क्या नज़रिया है? अब जब मुहम्मद साहब और खुल्फ़ा उल रशीदुन ही खुद युद्ध का परचम उठा कर चले हो और पराजित जातियों के मर्दोज़न को गु़लाम बनाने की रवायत बरक़रार रखी हो तो इस्लामिक नैतिकता में कोई शुबहे की गुंज़ाइश नहीं है। मुहम्मद साहब ने ७०० यहूदियों के गले इसलिए कटवा दिए थे क्योंकि उन्हे शक़ था कि वो उनके साथ ग़द्दारी करने वाले थे।

विष्णु भट्ट गोडशे की एक किताब है- माझा प्रवास। इस किताब में १८५७ की गदर का आँखो देखा वर्णन है। झांसी में अंग्रेज़ो की लूट के समय लेखक वहीं थे; लिखते हैं कि लूट सात दिन चली। पहले दिन अंग्रेज़ सिपाहियों ने लूटा। उनको देख कर भूसे के ढेर में छिप गए लोगों को आग लगा कर जला देते। कुँए में कूदते तो बन्दूक लेकर जगत पर जम जाते-लोग डूबकर मरते या गोली खाकर। खोज-खोज कर लोगों को मार गया- आम जनों को। इस लूट को विजन कहा गया – जनविहीन कर देने की प्रक्रिया। तीन दिन गोरों ने सोना, चांदी, रूपया-पैसा, ज़ेवर आदि लूटा। चौथे दिन काले मन्दराजी लोगों ने बर्तन भांड़े लूटे। अगले दिन हैदराबाद वालों के नाम; उन्होने कपड़े लूटे। उसके बाद रियासती पलटनें आईं, उन्होने अनाज लूटा।

बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसे लोगों को मारकर उनके कटी हुई खोपड़ियों का पहाड़ बनाने का शौक़ था। हर लड़ाई के बाद ऐसा ज़रूर किया जाता; शायद अपने प्रतिद्वन्दियों के दिल में खौफ़ पैदा करने के लिए। अहमद शाह अब्दाली ने भी इस पुरानी परम्परा को अपने भारत अभियान में जारी रखा। हलाकू ने बग़दाद शहर को क़त्लेआम के बाद जला कर राख कर दिया था। दिल्ली कितनी बार उजड़ी है, कोई हिसाब नहीं है।

और हर छोटी-बड़ी लड़ाई के बाद औरतों का क्या हाल होता था, इसके लिए किसी कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं कि आज दुनिया में चंगेज़ खान के सबसे अधिक वंशज है; कैसे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अगर आप इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान का युद्ध देंखे तो आप को मानवीय लग सकता है। अबू ग़रीब की यातना जैसी घटना को छोड़ दें तो अमरीकी फ़ौजों ने न तो लूट-पाट की और न ही बेवजह हत्या-बलात्कार। (भाई मेरे, कृपया इसे अमरीकी नीति का अनुमोदन समझ कर चढ़े मत आईयेगा, ज़रा ठण्ड रखकर पढ़िये, बात-बात पर तलवार मत निकालिए हे मानवतावादी!)

मसला यह है कि आम जीवन में ‘मानवीय’ मूल्य और युद्ध में भी मानवता बरतने की जो नीति विकसित हुई है यह शुद्ध योरोपीय चिन्तन है और आधुनिक काल में पैदा हुआ है। कुछ लोग इस कारुणिक विचार की उत्पत्ति इमैन्वल कान्ट के दर्शन से देखते हैं। जो भी हो, जिस नैतिकता के दम पर हम अमरीका को गाली देते हैं, उस का ठीक-ठीक आगा-पीछा भी हमें नहीं मालूम। वो कैसे, किस रस्ते से हम तक पहुँची, और कैसे वह हमारी और हम उसके मालिक बन बैठे, हम नहीं जानते। हम उदार जन जिन मानवीय मूल्यों की बात-बात पर दुहाई देते हैं वो आम जन (राज्य के कर्मचारी, अधिकारी, सिपाही, सैनिक आदि भी) के भीतर कितने आत्मसात हैं, हमें नहीं मालूम।

हम जिस जीवन को जी रहे हैं, जिन सुविधाओं को भोग रहे हैं, क्या उस के लिए ‘हम’ ने संघर्ष किया है? क्या वो ‘हमारी’ आंकाक्षाओं और प्रयत्नों का परिणाम है? भारत में स्त्रियों को मताधिकार मिला, दलितों को आरक्षण मिला है, इसके लिए भारतीय स्त्रियों और दलितों ने कितना संघर्ष किया? क्या क़ुर्बानियां दी? तो फिर बिना संघर्ष, बिना बलिदान के कैसे मिल गयी उनको यह वरीयता? औरतों को मताधिकार योरोप के देशों में लम्बे संघर्ष के बाद मिला (और वो भी मिला क्योंकि स्त्री स्वातंत्र्य पूँजीवाद की ज़रूरत है, उसे सस्ता मज़दूर चाहिये) भारत में यूँ ही मिल गया? कैसे? बिना लड़े ये लड़ाईयां कैसे जीती जा रही हैं? वो कौन सी शक्ति है जो इस बदलाव के पीछे है?

शायद हमें यह मानने की ज़रूरत है कि कुछ अधिकार माँगने से, लड़ने से मिलते हैं, और कुछ बहुत लड़ने पर भी नहीं मिलते क्योंकि उनके लिए ऐतिहासिक परिस्थिति परिपक्व नहीं थी, और कुछ बैठे-बिठाए मिल जाते हैं क्योंकि वो इतिहास की ज़रूरत हैं। सोचिये इन में से कुछ अधिकार हमें अंग्रेज़ो के समय में ही हासिल हो गए थे?

आखिर क्या दबाव थे जिसके तहत अंग्रेज़ो ने मताधिकार और प्रतिनिधित्व जैसे ये अधिकार हमारी तरफ़ बढ़ा दिए थे? लोकप्रिय शासक अकबर के समय ऐसा क्यों नहीं हो सका? योद्धाओं की सन्तान उस अकबर ने तो ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार की श्रेणियों में ही सत्ता का वितरण करके मान लिया कि जनता का प्रतिनिधित्व सम्पन्न हो गया, चुनाव और मताधिकार जैसी बात उसके ख्याल में भी नहीं आई, बावजूद उसकी सारी भलमनसाहत के। लेकिन ‘सौदागर’ अंग्रेज़ ने सत्ता के बाज़ार को जन-जन तक फैला दिया और आमजन को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया। इस अधिकार को हमें मिले लगभग अस्सी बरस से भी ऊपर हो गया लेकिन कितनी अजीब बात है कि हम आज भी अपने लिए ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार ही चुनते हैं, अपने प्रतिनिधि नहीं। ये दोष राज्य का है कि जनता का?

ये ठीक बात है कि राज्य हमारे जीवन की अधिकतर बातों का नियन्ता है और उसने ही हमें शिकायत करने का भी हक़ हमें नियत कर दिया है। पर हमारी भी आदत हो चुकी है सारी समस्याओं को किसी एक संस्था के मत्थे मढ़ कर छुट्टी पाने की। ये प्रवृत्ति हमारी अपने जीवन की स्वयं ज़िम्मेदारी न लेने और हर बात के लिए ईश्वर पर निर्भर होने की आदत का अवशेष है। ईश्वर से हमारी शिकायतों का सिलसिला थमता नहीं दिखता। हम बजाय पुरुषार्थ पर विश्वास करने के हर चीज़ के लिए ईश्वर के आगे झोली फैलाये खड़े रहते हैं।

(वैसे कुछ चीज़ों का ठीकरा हम अंग्रेज़ों के सर भी फोड़ते हैं जैसे कि साम्प्रदायिकता; अच्छे-खासे प्रगतिशील लोग इस बात पर विश्वास करना पसन्द करते हैं कि अंग्रेज़ो के पहले भारत में साम्प्रदायिक मन-मुटाव नाम की चीज़ थी ही नहीं। एक मिसाल के तौर पर अशफ़ाक़ुल्ला खाँ के बारे में खुद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ आने से सिद्ध हो गया कि मुसलमान ग़द्दार नहीं होते- क्या ऐसी बातें सौ-पचास बरस के अंग्रेज़ों के षडयन्त्र से किसी के मन में बैठ सकती हैं या उसके लिए आपसी नफ़रत का एक लम्बी विरासत होनी चाहिये?)

इस प्रवृत्ति की सबसे अच्छा उदाहरण शिरडी के साईं बाबा के भक्त हैं: साईं बाबा का दो शब्दों का संदेश है- श्रद्धा और सबुरी; उनके भक्तों में न तो श्रद्धा है और न सबुरी, शिरडी जा के माँग-माँग कर उन्हे मरने के बाद भी हकालते रहते हैं। ऐसे अनास्था वाले लोग – हम सभी, भले ही हम साईं बाबा के भक्त हो या न हों, इस दोष के रोगी हैं – राज्य के प्रति भी ऐसी ही अनास्था से पेश आते हैं। ये नहीं है, वो नहीं है, ये नहीं दिया, वो नहीं दिया। कोई विपदा आती है तो टीवी का कैमरा आते ही लोग शुरु हो जाते हैं, हमें तो कोई पूछने नहीं आया, किसी ने हमारी खबर नहीं ली? सवाल यह भी पूछना चाहिये लोगों ने एक-दूसरे की कितनी मदद की?

वेलफ़ेयर स्टेट (पहले थे, अब पता नहीं हैं कि नहीं) का तो काम है लोगों की मदद करना लेकिन इस स्थिति को अठाहरवीं सदी से तुलना कर लें और समझें। सरकार/राज्य किसी ईश्वर का स्थानापन्न है – ईश्वर के प्रति तो हम उच्छवास भरते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर कहाँ हो तुम - लेकिन सरकार को सीधे गरियाते हैं। क्योंकि वो हमारी प्रतिनिधि है, उसे हमारे हित में काम करना चाहिये, लेकिन वो करती नहीं, क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारे नहीं किसी पूँजीपति के प्रतिनिधि हैं। एक बार फिर से- क्या इस का दोष राज्य का है कि जनता का?

अपनी इस अनास्था के चलते हमारे भीतर की उद्यमता पर भी असर पड़ा है, वो भी गहरे तौर पर भ्रष्ट हो चली है। किसी भी काम को हम पूरी शिद्द्त और मनोयोग से कर ही नहीं पाते। थोड़ी सी सुख-सुविधा और ऐशो आराम हमारी नैतिकता और आदर्श को ढहा देने के लिए काफ़ी साबित होते हैं। मुस्लिम हितों की बात करने वाले क्रांतिकारी अपने राजनैतिक करियर के लिए उन्ही के शक़-शुबहों के सहारे उनका शोषण करने लगते हैं। मज़दूरों के महान नेता, कोकाकोला को देशनिकाला देने वाले जार्ज साहब किस गली में जा कर फ़ंसते हैं। अपने भीतर की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने निकले कविवर पुरुस्कारों की जुगाड़ू राजनीति में दण्ड पेलने लगते हैं। बाक़ी छोड़िये देखिये उदाहरण शिबू सोरेन और मधु कोडा का, आदिवासियों के बीच से निकले उनकी आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए लेकिन कहाँ जा गिरे? क्या इन के पतन पीछे सरकार और राज्य का चरित्र ही उत्तरदायी है?

राज्य से पहले हम एक समाज हैं और समाज से पहले हम एक व्यक्ति। व्यक्ति के रूप में हम कितने नैतिक हैं? ये कौन सी बात है कि गूँहू रोटी को गाली दे कि वो बेस्वाद है? ये बात ठीक है कि राज्य का जो स्वरूप हमें मिला है उसे वैसा बनाने में हमने कोई भूमिका नहीं निभाई है, मगर सरकार तो हमारी ही अभिव्यक्ति है न? और अगर हम राज्य के इस स्वरूप से असंतुष्ट हैं तो हमारे पास कोई विकल्प तो होना चाहिये?

माओवादियों के विकल्प की चर्चा मैं पिछले लेख में कर चुका हूँ, वो मेरी समझ से वरेण्य नहीं है। अरुंधति से जब पूछा गया तो उन्होने कहा कि उनके पास कोई मैनिफ़ेस्टो नहीं है। यही हाल देश के सभी (ग़ैर-मार्क्सवादी) असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का है: उनके पास शिकायतें तो हैं, सवाल तो हैं पर विकल्प नहीं है। अरुंधति का जो लम्बा लेख आउटलुक में छ्पा है उसकी मुख्य बातें निम्न हैं :

१) आदिवासी जंगल- पहाड़-नदी के साथ एकाकार हैं (जैसे आदिकाल में सभी मनुष्य थे)
२) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासियों की इस सम्पदा पर नज़र गड़ा के बैठी हैं और उसे हथियाने के लिए कार्यरत हैं।
३) यह सम्पदा एक अनुमान के अनुसार चार ट्रिलियन (१२ शून्य) डालर्स की है, भारत के जीडीपी से कई गुना अधिक।
४) देश की सरकार ने ऐसी बहुराष्टीय कम्पनियों के साथ समझ के समझौते कर रखे हैं जिसके तहत ७-८% के हिस्सेदारी पर भारत सरकार यह सम्पदा उनके हवाले कर देगी।
५) इस मुनाफ़े में आदिवासियों को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जो उसके असली मालिक हैं।
६) उलटे उन्हे अपने घर, गाँव, और वातावरण –जिसके साथ वो एकीकृत हैं –से बेदखल कर दिया जाएगा।
७) माओवादियों ने आदिवासियों के असंतोष को स्वर दिया है, पर वो बरगलाए हुए नहीं है, उनकी अपनी एक लड़ाकू परम्परा है।
८) माओवादियों के साथ उनकी इस हथियारबन्दी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खनन का अपना काम नहीं कर पा रहीं।
९) सरकार पर इन समझौतों को निभाने के लिए दबाव बढ़ रहा है औरे जिसके कारण वो इस समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।
१०) वही सरकार जो विकास के नाम पर विस्थापित पाँच करोड़ लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकी, उसे ३०० सेज़ बनाने के लिए १,४०००० हेक्टेयर ज़मीन मिल जाती है।
११) सरकार के साथ-साथ (चिदम्बरम वेदान्ता के लिए वक़ील और डाइरेक्टर के पद भी सम्हाल चुके हैं) अदालतें भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक चुकी हैं।
१२) और जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए माओवादियों के दम-खम और आतंक का हौवा बना रही है ताकि उनके बहाने आदिवासियों को रौंदा जा सके और साथ ही दूसरी लोकतांत्रिक आवाज़ों को भी।
१३) सरकार उनसे बात तक करने को तैयार नहीं वह युद्ध चाहती है बस।
१४) पूँजी के हाथ की कठपुतली मीडिया सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है, और कोई स्वतंत्र रपट करने के बजाय सरकार की भाषा बोल रहा है।

मोटे तौर पर इनमें से शायद ही कोई ऐसी बात हो कि जिसका कोई संवेदनशील व्यक्ति विरोध करेगा। बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के मूल्य हम सभी ने भीतर तक स्वीकार कर लिए हैं (ये सवाल भी उठता है कैसे अपना लिए हैं, बिना उन पर विचार किए, क्योंकि वो खुद व्यवस्था द्वारा प्रचारित हैं; और सच में कितने अपनाए हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यापक जन भीतर अभी भी किसी अन्य नैतिक मापदण्ड के सहारे हैं) और ये जो हो रहा है इन आदर्शों से मेल नहीं खाता। ज़ाहिर तौर पर अत्याचार हो रहा है। मैं इस अत्याचार का विरोध करता हूँ और चाहता हूँ कि पर्यावरण की हानि न हो, जंगल-पहाड़-नदी की पवित्रता बनी रही, पर मेरे चाहने और विरोध करने भर से क्या होता है। इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं।

इस नदी की धारा को पलटने के लिए जिस प्रकार की हिंसा और नरबलि लगेगी उस के प्रति हम अहिंसक उदारजनों का क्या नज़रिया होगा, यह भी सोचना चाहिये। माओवादी तथा दूसरे पके हुए राजनीतिकर्मियों को कोई शुबहा नहीं होता, वो अपनी तरह की व्यवस्था लाने के लिए हर क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहते हैं।

स्वयं अरुंधति भी जानती हैं कि माओवादी, आदिवासियों की बलि देकर आम जनता के आगे नरसंहार का एक विहंगम दृश्य खड़ा कर के अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की नीति खेल सकते हैं। लेकिन फिर भी वो उनके समर्थन में इसलिए जाती हैं क्योंकि उन्हे इस कॉरपोरेट पूँजीवाद के अधिक समाजवादी तंत्र पर भरोसा है (फिर भी ये सवाल रह जाता है कि उसमें पर्यावरण के मसलों की जगह कहाँ रहेगी?), इसीलिए अरुंधति जिस मुखर स्वर से राज्य की हिंसा की आलोचना करती हैं माओवादी हिंसा की नहीं करतीं। यानी विरोध हिंसा का नहीं, हिंसा के चरित्र का है।

आप तय कीजिये कि आप किस हिंसा के हिमायती हैं। हिंसा से छुटकारा नहीं है। बुद्ध की शिक्षाएं पा कर भी जापानी हिंसा के पुजारी बनी रहे। गाँधी बाबा अहिंसा-अहिंसा करते रहे, देश उन्हे बापू, महात्मा कहता रहा और जब देश आज़ादी की बारी आई तो लाखों लोग अल्लाहोअकबर और हरहरमहादेव कह कर लड़ मरे। हिंसा की ऐसी सर्वव्यापकता के बावजूद हम हिंसा को अनैतिक मान कर अपना पक्ष चुनते हैं, मैं भी – ऐसा है अपने युग की नैतिकता का दबाव।

मेरी इच्छा है कि सरकार और माओवादी के नेतृत्व में आदिवासी जन बातचीत करें और सरकार उनकी ज़मीन का उन्हे उचित मुआवज़ा दे, और साथ ही यह भे सुनिश्चित करे कि पर्यावरण की हानि न हो या कम से कम हो। ऐसा चाहने वाले किसी भी नागरिक आन्दोलन का मैं समर्थन करता हूँ। साफ़ तौर पर मैं नहीं चाहता कि मार-काट हो, मैं नहीं चाहता कि माओवादी प्रबल होकर इस राज्यतंत्र को कमज़ोर करें और १८ वीं सदी वाली अराजकता का परिदृश्य दोहराया जाय। पर ये सब सदिच्छाएं हैं, देखें ऐसा सम्भव हो पाता है कि नहीं।

सोमवार, 4 मई 2009

उनके जीवन का सब से दुखद दिन

ये नेता जनता को कितना मूर्ख समझते हैं, न तो इसकी कोई हद है और न इनकी मक्कारी की कोई सीमा। भूतपूर्व रामभक्त और वर्तमान मुलायम भक्त कल्याण सिंह का कहना है कि भाजपा ने उन्हे धोखा दिया, उनकी आँखों में धूल झोंककर बाबरी मस्जिद गिरा दी। वास्तव में तो वे मुसलमानों के सच्चे मित्र हैं।

इस बयान से मुझे बरबस लाल कृष्ण अडवाणी के उस बयान की याद आ गई जिसमें वे फ़रमाते हैं कि ६ दिसम्बर १९९२ उनके जीवन का सब से दुखद दिन है। अडवाणी जी की फ़ित्रत के अनुसार तो यह बयान भी उतना धूर्ततापूर्ण है जितना के उनके पूर्व चेले कल्याण सिंह का। पर मुझे लगता है कि अडवाणी साहब झूठ नहीं बोल रहे हैं। वाक़ई वो दिन उनके जीवन का सब से दुखद दिन हो सकता है जिस दिन उनकी सोने की मुर्ग़ी हलाल कर दी गई हो।

ये उसी दुखद दिन का नतीजा है कि आज लगभग बीस साल बाद जबकि वे क़ब्र में पैर लटका कर बैठे हैं और प्रधानमंत्री की गद्दी उनके पहुँच से दूर और दूर होती जा रही है। जनता को बहकाने के लिए उनके पास एक मुद्दा भी नहीं; और राम मन्दिर तो इतना फीका हो चुका है कि मोदी भी उसका ज़िक्र करने से क़तरा रहे हैं।

अगर बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती तो आज भी वो विवादित स्थल पर वहीं शोभायमान होती जहाँ आजकल रामलला विराजमान हैं। और बार-बार मुस्लिम आक्रमणकारियों के मूर्तिभंजक इतिहास की दुहाई दे-दे कर हिन्दुओं के खून को खौलाया जा रहा होता। हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य को रोज़ भड़काया जा रहा होता। आज वो कुछ सम्भव नहीं क्योंकि बाबरी मस्जिद के गिर जाने से हिन्दुओं की प्रतिशोध की भूख पूरी हो गई.. मगर मुसलमानों के भीतर जाग गई। जिसका प्रमाण हमें मुम्बई सीरियल बम विस्फोट जैसी घटनाओं में मिला।

यहाँ एक बात साफ़ कर देना और ज़रूरी है। मेरे जैसे आस्तिक मगर ग़ैर-कर्मकाण्डी हिन्दू के लिए न तो किसी मन्दिर का कोई अर्थ है और न किसी मस्जिद में कोई श्रद्धा। मुझे बाबरी मस्जिद के वहाँ खड़े रहने से न तो कोई सुकून मिलता था और न ही उसके गिरने से मेरे मानसिक संसार में कोई अभाव आ गया है।

इस देश के बहुत सारे सेकुलरपंथी इस बात से भाजपा और विहिप से खौरियाये नज़र आते हैं कि उन्होने एक ऐतिहासिक महत्व की इमारत को गिरा दिया! इस देश में हज़ारों ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जहाँ जा कर मूतने में सेकुलरपंथियों को कोई गुरेज़ नहीं होगा। आम जनता वक़्त पड़ने पर उसकी ईंट उखाड़ कर क्रिकेट का विकेट बनाने में इस्तेमाल करती रही हैं। मुझे उनकी इस पुरातत्व-प्रियता में राजनीति की बू आती है।

मुझे इस तरह के शुद्ध, रुक्ष पुरातत्वी इतिहास में कोई आस्था नहीं; मेरे लिए वो ऐतिहासिक स्मृतियाँ अधिक मह्त्व की हैं जो मनुष्य के मानस में क़ैद रहती हैं। वही स्मृतियों जिनके नासूर में उंगलियाँ घुसा कर लाल कृष्ण अडवाणी ने इस देश में नफ़रत की राजनीतिक फ़सल काटी है।

एक और दूसरी बात साफ़ करने की ज़रूरत है कि यह सच नहीं है कि इस देश में हिन्दू और मुसलमान हमेशा शान्तिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। सेकुलर इतिहासकार सिर्फ़ एक साझी संस्कृति की छवि को ही उभारते आये हैं ऐसे तमाम तथ्यों पर परदा डालकर जो उनकी इस निष्पत्ति के विरोध में हों। साझी संस्कृति की बात पूरी तरह ग़लत नहीं है मगर वो अधूरा सच है। उसका पूरक सच - एक आपसी संघर्ष का सच और समय-समय पर हिन्दुओं के दमन का सच है।

बाबरी मस्जिद राम मन्दिर को तोड़कर बनी थी या नहीं इस बात का प्रमाण माँग कर हम अडवाणी जैसे मक़्कार राजनीतिज्ञों के क़दम कुछ देर के लिए तो रोक सकते हैं मगर हिन्दू मानस में दबी, मन्दिरों के तोड़े जाने की उस जातीय स्मृति को मेट नहीं सकते जो निराधार नहीं है। खुद मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐसे अभियानो का विस्तार से वर्णन किया है।

हमारे सामने दो तरह के झूठे इतिहास रखे जाते हैं। एक इतिहास समाज में भाई़चारा बना रहे इसलिए झूठ बोलता है तो दूसरा अपने पराजय बोध को घटाने के लिए और समाज में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए झूठ बोलता है। कोई सत्य की शक्ति में यक़ीन नहीं करना चाहता और न ही समय के स्वाभाविक प्रवाह से जातीय स्मृतियों के सुलझ जाने में विश्वास रखना चाहता है। एक उन्हे नकारता है तो दूसरा आग से आग बुझाना चाहता है।

एक स्वस्थ समाज के लिए उसके व्यक्ति को पराजयबोध से मुक्त होना चाहिये। तो क्या हर हिन्दू को विदेशी आक्रमणकारियों के साथ संघर्ष में अपने पूर्वजों की हार का बदला अपने निर्दोष पड़ोसियों से लेना चाहिये? ऐसी सोच और कृत्य को बढ़ावा देना नीचता, कायरता और अपराध है। हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करने वाले दल यही करते रहे हैं।

रथ-यात्रा निकाल कर इस देश के गाँव-गाँव में लालकृष्ण आडवाणी ने जो दंगे का माहौल तैयार किया था, उसमें हज़ारों हिन्दू-मुसलमानों की जाने गईं। मैं उसके लिए व्यक्तिगत तौर पर लाल कृष्ण अडवाणी को ज़िम्मेदार मानता हूँ। मेरा सवाल है कि उन्हे बाबरी मस्जिद से सम्बन्धित हर दंगे में होनी वाली मौत के लिए अपराधी क्यों नहीं माना जाय?

कैसे एक लिबेरहान इन्क्वायरी कमीशन महज़ उनके एक अकेले बयान पर बरी कर देता है कि वो मेरे जीवन का सब से दुखद दिन था? क्या उन्हे दिखता नहीं कि वो शख्स गाँव-गाँव नगर-नगर आग लगाता आ रहा था? और जब मस्जिद गिर गई तो रोने लगा कि हमें क्या पता कि कैसे गिर गई? मेरी समझ में तो वही केन्द्रीय रूप से अपराधी हैं।

मैंने पहले भी कहा कि मुझे मस्जिद गिरने से कोई फ़रक नहीं पड़ा। और जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहाँ राम मन्दिर बनने में भी मेरी कोई रुचि है। बावजूद इसके कि मैं मानता हूँ कि राम ने उसी अयोध्या में जन्म लिया था जो देश में समुदायों के बीच का क्लेश का कारण बनी हुई है। मुझे राम में श्रद्धा है मगर मेरे राम अपने भक्तों के हदय में रहते हैं किसी हाईली सेक्योर्ड टेंट में नहीं।

फिर भी अगर कभी वहाँ मन्दिर बन गया तो मुझे तकलीफ़ भी न होगी। लेकिन उस के बनने से अगर मेरे मुसलमान दोस्तों के मन में कोई पराजय-भाव घर करता है, कोई चोट लगती है तो ऐसा मन्दिर मुझे सात जन्मों तक भी स्वीकार्य न होगा। मन्दिर ईश्वर से आदमी का योग कराने के अभिप्राय से बनता है, आदमी का आदमी से जो वैर कराए वो मन्दिर आदमी को ईश्वर से मिला देगा इस धोखे में जो रहना चाहता है तो रहे, मैं इतना अबोध नहीं।

और जो लोग इस धोखे में हैं कि भाजपा या अडवाणी कभी कोई मन्दिर बनवा देंगे तो जाग जायें, राम का नाम लेकर राजनीतिक लाभ उठाने वाले अडवाणी और कल्याण सिंह जैसे लोग मन्दिर बनाने में नहीं मस्जिद गिराने में यक़ीन रखते हैं। और फिर मस्जिद गिरा कर एक अपने को दुखी बताने लगते हैं और दूसरे कहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हैरत है कि देश के हिन्दू लोग इन पर भरोसा करते हैं और मुसलमान मुलायम जैसे ढोंगियों पर जो एक तरफ़ तो इन राक्षसों से उन्हे बचाने का वादा करते हैं और फिर वोट के लालच में उन के पैर छू कर धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र भी पकड़ा आते हैं।

ये नेता तो धन्य हैं ही, हमारे देश की जनता भी धन्य है।

रविवार, 10 अगस्त 2008

कोई उम्मीद बर नहीं आती

फ़िलीस्तीन एक तरह से दुनिया का केंद्र है; तीन महाद्वीप की नाड़ियाँ वहाँ से गुज़रती हैं। धर्म, संस्कृति और सभ्यता के प्राचीनतम सूत्र इस जगह से जुड़े हैं और मगर आज वही स्थान विश्व के सबसे घिनौने साम्प्रदायिक संघर्ष की ज़मीन में तब्दील हो गया है।


इस में जो दो पक्ष दिखाए दे रहे हैं उनके अलावा एक तीसरा पक्ष भी है जो गंगा-यमुना के संगम में सरस्वती की तरह विलुप्त है। मेरा आशय उस योरोपीय कट्टर ईसाई मानस से है जिसकी प्रताड़ना से दग्ध हो कर यहूदी, मुसलमान अरबों के साथ आज इस संघर्ष में लथपथ हुए पड़े हैं। संगम की महिमा पापमोचन में हैं पर ये संगम पाप और प्रतिशोध का दलदल बन चुका है।


अभी तक आप ने इस श्रंखला की तीन कड़िया पढ़ी.. आज अन्तिम कड़ी..


अराफ़ात एक महानायक

1948 में इज़राईल की स्थापना के बाद बिखर आठ लाख शरणार्थियों में जो तमाम तरह की छोटी-छोटी राजनैतिक प्रतिक्रियाएं और अभिव्यक्तियाँ हुई उनमें से एक फ़तह नाम का संगठन भी था जो कुवैत में पढ़ने वाले फ़िलीस्तीनी विद्यार्थियों के बीच १९५९-६० में अस्तित्व में आया। फ़तह का उद्देश्य इज़राईल का विनाश और फ़िलीस्तीन की आज़ादी था। इसकी अगुआई कर रहे थे यासिर अराफ़त, जो वहाँ इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल कर रहे थे। अराफ़ात पहले ऐसा नेता थे जिन्होने फ़तह को अन्य फ़िलीस्तीनी गुटों/संगठनो की तरह किसी भी अरब देश का पिछलग्गू बनने से इंकार कर दिया और फ़िलीस्तीन की मुक्ति को खास फ़िलीस्तीनी संदर्भ में देखा, आम अरब संदर्भ में नहीं। उनसे ही फ़िलीस्तीनी राष्ट्रवाद की शुरुआत होती है और फ़िलीस्तीनी राष्ट्र निर्माण की भी। यहाँ तक कि आरम्भ में उन्होने इन देशों से आर्थिक सहयोग तक लेने से इंकार कर दिया ताकि उन पर किसी तरह का दबाव न रहे। कुवैत के बाद अराफ़ात ने पहले सीरिया और फिर जोर्डन को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया।


१९६४ में फ़िलीस्तीन मुक्ति संगठन (पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑरगेनाइज़ेशन) पी एल ओ की स्थापना हुई और १९६७ में इज़राईल के साथ अरब देशों की छै दिन की जंग। इस जंग के नतीज से लाखों फ़िलीस्तीनी एक बार फिर से शरणार्थी हुए और जोर्डन नदी के पश्चिमी किनारे पर इज़राईल का क़ब्ज़ा हो जाने से पूर्वी किनारे पर जोर्डन देश में बड़ी संख्या में तम्बुओ में आबाद हुए। इन्ही शरणार्थी कैम्पो में से एक करामह की लड़ाई लड़ी गई जिसने यासिर अराफ़ात को एक महानायक का दरजा दे दिया।


करामह की लड़ाई

फ़तह के लड़ाके इज़राईली सीमा पार कर के उनके ठिकानों पर हमला करने की नीति अपना कर एक छोटे स्तर का गुरिल्ला युद्ध छेड़े हुए थे, जिसमें कभी कदार एक-दो सैनिकों की क्षति हो जाती, मगर इज़राईल अपने रौद्र रूप और कठोर छवि को ज़रा भी कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहता था। १९६८ में करामह कैम्प से किए गए एक फ़िदायीन हमले के जवाब में इज़राईल की सेना पूरे दल-बल के साथ जोर्डन की सीमा में गुस आई और कैम्प पर हमला कर दिया। अराफ़ात ने एक नीति के तहत फ़िलीस्तीनियों को पीछे नहीं हटने दिया। आखिरकार मामले के बहुत अधिक विराट रूप ले लेने से डरकर इज़राईल की सेना स्वयं पीछे हट गई।


हालांकि इस लड़ाई में १५० फ़िलीस्तीनी व २५ जोर्डनी सैनिक मारे गए और दूसरी तरफ़ कुल २८ इज़राईली। मगर इज़राईल की सेना का पीछे हटना अरब जन में एक अद्भुत जीत की तरह देखा गया। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी अरब ने इज़राईल की सेना का डट कर मुक़ाबला किया था और उसे मुँहतोड़ जवाब दिया था। करामह की लड़ाई के बाद अराफ़ात का क़द अरबों के बीच बहुत ऊँचा हो गया इसी जीत के प्रभाव का नतीजा था कि अराफ़ात को पीएल का अध्यक्ष चुन लिया गया।


जोर्डन में संघर्ष

अराफ़ात की इस अप्रत्याशित लोकप्रियता से जोर्डन देश के भीतर सत्ता के दो केन्द्र हो गए। किंग हुसेन मक्का के शरीफ़, हाशमी परिवार से थे और वैधानिक रूप से देश के राजा थे मगर अरबों के बीच लोकप्रिय समर्थन अराफ़ात और पी एल के लिए बढ़ता ही जा रहा था। जैसा कि आप को मैंने पहले बताया था कि जोर्डन भी पूरी तरह से एक कृत्रिम देश जो पहले विश्व युद्ध के बाद अस्तित्व में आया क्योंकि अंग्रेज़ हाशमी परिवार की वफ़ादारी का ईनाम देना चाहते थे। वादा तो एक पूरे अरब राष्ट्र का था पर भागते भूत की लंगोटी भली जानकर, किंग हुसेन के दादा अब्दुल्ला ने वो प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था।


तो किंग हुसेन अरबों के बीच फ़िलीस्तीन को लेकर जो लोकप्रिय जज़्बात थे उनको समझते थे इसीलिए किंग हुसेन ने बहुत कोशिश की मामला सुलझ जाए; यहाँ तक कि उन्होने अराफ़ात के सामने जोर्डन के प्रधान मंत्री पद को सम्हालने का भी प्रस्ताव रखा मगर अराफ़ात फ़िलीस्तीनी मक़्सद के लिए प्रतिबद्ध थे; वे तैयार नहीं हुए।

१९७१ में आखिरकार दोनों पक्षों के बीच लड़ाई छिड़ गई। अन्य अरब देशों ने किसी तरह बीच-बचाव करके युद्ध विराम कराया गया पर तब तक ३५०० फ़िलीस्तीनी मारे जा चुके थे। फिर भी छिट-पुट घटनाएं होती रहीं। और हालात तब बिगड़ गए जब एक रोज़ अराफ़ात ने हुसेन के सत्ता पलट का इरादा कर लिया और किंग हुसेन पर हमला हो गया। अब समझौता नामुमकिन था और अराफ़ात और उनके लड़ाकों को जोर्डन छोड़ना पड़ा। पचीस साल पहले विस्थापित लोग फिर एक बार अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर लेबनान की शरण में चले गए।


लेबनान

लेबनान आकर अराफ़ात को अपने गतिविधियों के लिए वो आज़ादी मिल गई जो जोर्डन में उपलब्ध नहीं हो पा रही थी क्योंकि लेबनान की सरकार की सत्ता कमज़ोर थी और वहाँ पर पी एल एक स्वतंत्र राज्य की हैसियत से काम करने लगा। इज़राईल के भीतर और बाहर यहूदी सत्ता और यहूदी जनता पर हमले कर के उस पर दबाव बनाना उसकी नीति के अन्तर्गत था। पी एल में अराफ़त के फ़तह के अलावा भी कई दल शामिल थे। उनके नरम से लेकर चरम तक के सब रंग थे और सब पर अराफ़ात का नियंत्रण था भी नहीं।


१९७० से १९८० के बीच लेबनान को केन्द्र बनाकर पीएल के वृहद छाते के नीचे से तमाम तरह की हिंसक गतिविधियाँ की गई जैसे प्लेन हाईजैक, फ़िदायीन हमले, बंधक बनाना आदि हथगोले, फ़्रिज बम, कार बम आदि का इस्तेमाल करके इज़राईलियों के खिलाफ़ आतंकवादी घटनाएं होती रही। कुछ ऐसी भी थीं जिसमें मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया। इन सब में सब से कुख्यात और दुखद घटना रही म्यूनिक ओलम्पिक में की गई इज़राईली खिलाड़ियों की हत्या। जिसका बदला लेने के लिए इज़राईल ने भी एक ग़ैर क़ानूनी पेशेवर हत्यारे का तरीक़ा अपनाया (देखिये स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म म्यूनिक)। इज़राईली कमान्डोज़ ने म्यूनिक हत्याकाण्ड के लिए जितने भी लोग ज़िम्मेदार थे, उन सब को चुन-चुन कर मारा।


इज़राईल का जवाब

१९७८ में एक १८ बरस की फ़िलीस्तीनी लड़की के अगुआई में ११ अन्य फ़तह के सद्स्यों द्वारा अंजाम दिए गए एक कोस्टल रोड मैसेकर में ३७ इज़राइली मारे गए। इस आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए इज़राईल ने फ़िलीस्तीनी गुरिल्लो को लेबनान की अन्दर बहने वाली लिटानी नदी के उत्तर तक धकेलने के इरादे से हमला कर दिया। एक हफ़्ते तक चली इस कार्रवाई में २००० ग़ैर फ़ौजी लेबनीज़ मारे गए और २,८५,००० अपने घरों से उजड़ गए। फ़िलीस्तीनी लड़ाकों का कुछ ज़्यादा नुक़्सान नहीं हुआ।

बड़ी संख्या में फ़िलीस्तीनियों के आ जाने से लेबनान की आन्तरिक राजनीति में उथल-पुथल मच गई थी। लेबनान के ईसाई समुदाय और मुस्लिम समुदाय के बीच फ़िलीस्तीनियों को लेकर एक गहरा मतभेद घर कर गया था। जिसके चलते पी एल ओ, लेबनीज़ ईसाई संगठन और इज़राईल के बीच हिंसक झड़पे आम हो चली थीं। सीरिया का भी इस खेल में दखल बराबर बना रहा।


१९८२ में अपने एक राजदूत के हत्या के प्रयास के बदले में इज़राईल ने लेबनान पर हमला कर दिया और उसे नाम दिया ऑपरेशन पीस फ़ॉर गैलिली। लेबनान में भी तमाम समुदायों के बीच संघर्ष ने एक गृह-युद्ध का रूप ले लिया और इज़राईल ने भी मौके का फ़ायदा उठाकर हमला कर दिया। ये हमला मुख्य रूप से पी एल ओ और फ़िलीस्तीनियों को खदेड़ने के मक़सद से किया गया था जिसमें वो कामयाब भी हो गए। इस लड़ाई के अन्तिम चरण में जब फ़िलीस्तीनियों को खदेड़ दिया गया था तब इज़राईल के सरंक्षण में लेबनीज़ ईसाई संगठन फ़लन्जिस्ट ने निहत्थे फ़िलीस्तीनियों के शरणार्थी कैम्प पर एक हमला किया जिसमें मरने वालों की संख्या एक हज़ार से चार हज़ार तक अनुमानित की जाती है। इस ऑपरेशन पीस फ़ॉर गैलिली में निहत्थे फ़िलीस्तीनियों का जनसंहार प्रच्छन्न था।


फ़िलीस्तीनियों और पी एल ओ के पाँव लेबनान से भी उखड़ गए और अधिकतर फ़िलीस्तीनियों ने इस बार सीरिया में शरण ली और अराफ़ात को अपना पी एल ओ का दफ़्तर दूर ट्यूनिशाई शहर ट्यूनिस ले जाना पड़ा। अराफ़ात का फिर कभी लेबनान लौटना नहीं हुआ।


ओस्लो क़रार

फ़िलीस्तीन से इतना दूर जाकर अराफ़ात की हिम्मत जैसे टूटने लगी और जवानी के वो उत्साही दिन भी नहीं रहे। इज़राईल को नक़्शे से मिटाना हर आने वाले दिन और भी अधिक असम्भव दिखता जा रहा था। और दूसरी इज़राईल भी अपने नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी के बदले कुछ रियायत देने को तैयार होने का मन बनाने लगा था। अराफ़ात का इस नए बदलाव से कोई सम्पर्क नहीं था। उनकी अपनी हालत युधिष्ठिर जैसी होती जा रही थी जो पूरे राज्य की जगह अपने लोगों के लिए पाँच गाँवों पर भी समझौता करने को तैयार हो सकते थे। शायद ऐसी ही किसी हताशा या विकसित चिन्तन के तहत उन्होने समझौते का रास्ता अख्तियार किया।


नवम्बर १९८८ में उन्होने एक तरफ़ तो फ़िलीस्तीन राज्य की स्थापना की उद्घोषणा की और दूसरी तरफ़ अगले ही महीन संयुक्त राज्य में लगातार बढ़ते अन्तराष्ट्रीय दबाव में आकर आतंकवाद की भर्त्सना की। इस भर्त्सना के चलते दबाव अब अराफ़ात से हटकर इज़राईल पर आ गया जिसने पी एल ओ से कभी बात न करने का रुख हमेशा से ही बना कर रखा हुआ था। इसलिए एक स्थायी हल और शांति बहाल करने के लिए पी एल ओ के साथ बैक चैनल संवाद शुरु हुआ, ओस्लो में।


तीन साल तक चले इसी संवाद की बुनियाद पर १९९३ में इज़राईल और फ़िलीस्तीन के बीच ऐतिहासिक समझौता, वाशिंगटन में हो गया। फ़िलीस्तीन ने अपनी तरफ़ इज़राईल के विनाश का मक़सद अपने चार्टर से हटा दिया और उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लिया। बदले में इज़राईल गाज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक के कुछ भाग का प्रशासन व प्रबन्धन फ़िलस्तीनियों को सौंपने को तैयार हो गया। यह प्रक्रिया पाँच बरस में पूरी होनी थी लेकिन इज़राईल ने सारे अधिकारों को निर्दयता से भींचे रखा और बराबर नियंत्रण अपनी मुट्ठी में क़ैद किए रहा। १९९४ में यासिर अराफ़ात और इज़राईली प्रधान मंत्री यित्ज़ाक राबिन और विदेश मंत्री शिमोन पेरेज़ को नोबेल शांति पुरुस्कार से नवाज़ा गया पर शांति कहीं दूर-दूर तक नहीं दिख रही आज तक। और आज भी इज़राईल की दमनकारी नीति और नियंत्रण जारी है।

इस समझौते के दो बरस बाद ही यित्ज़ाक राबिन की यहूदी दक्षिणपंथियों ने हत्या कर दी। इसके पहले सुलह का रास्ता अपनाने मिस्र के राष्ट्र्पति अनवर सादात की हत्या मुस्लिम दक्षिणपंथियों द्वारा कर दी गई थी। उल्लेखनीय है कि उन्हे भी नोबेल शांति पुरुस्कार मिला था।


सेटलर्स

१९४८ के नकबे के दौरान फ़िलीस्तीनी अरबों दसे खाली कराए गए गाँवों, क़स्बों और शहरों में योरोप और दुनिया के अन्य देशों से आए यहूदियों को बसा दिया गया। इन्हे सेटलर(settler) कहा गया। १९६७ की छै दिन की जंग के बाद जब इज़राईल के के हाथ काफ़ी बड़ा भू-भाग आ गया तो उस ने गाज़ा पट्टी, वेस्ट बैंक और सिनाई क्षेत्र पर और भी सेटलर्स को बसाना शुरु कर दिया। ये सारे क्षेत्र सयुंक्त राष्ट्र के बँटवारे के मुताबिक भी उसके लिए अवैध थे, मगर उस की धृष्टता देखिये कि १९७८ में मिस्र के हुए समझौते के बाद सिनाई तो उसे लौटा दिया मगर गाज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक को इज़राईल का अभिन्न अंग घोषित कर दिया।


गाज़ा और वेस्ट बैंक में बचे रह गए फ़िलीस्तीनी अरबों का सीधा संघर्ष इन सेटलर्स के साथ होता। इज़राईल नए आए यहूदियों को अपने सीमांत पर बसा कर दो मक़सद पूरे करता रहा। एक वो नए ज़मीन पर यहूदियों को बसा कर उन्हे फ़िलीस्तीनियों को वापसी की उम्मीद और क्षीण करता है और दूसरे फ़िलीस्तीनियों को दबाने का काम इन नए आए हथियारबन्द यहूदियों को सौंप कर अपना काम आसान करता है। नए लोग फ़िलीस्तीनियों को दमन एक पाशविक वृत्ति के तहत करते हैं क्योंकि उन के अस्तित्व के लिए यही उनसे अपेक्षित होता है। उस ज़मीन पर या तो सेटलर रह सकते हैं या फ़िलीस्तीनी।


आज भी फ़िलीस्तीनियों और इज़राईलियों के बीच लड़ाई का बड़ा मसला ये सेटलर्स हैं। सेटलर्स और फ़िलीस्तीनी नागरिकों के बीच होने वाले इस संघर्ष में सेटलर्स खुद पुलिस और प्रशासन की भूमिका में रहते हैं।


फ़िलीस्तीनियों अपने रोज़गार-व्यापार के लिए भी पूरी तरह से इज़राईल पर ही निर्भर हैं। रोज़गार के अवसर कम और सीमित हैं, और व्यापार पर अनेको बन्दिशें। वास्तव में इज़राईली शासन में फ़िलीस्तीनी एक प्रकार के विशाल कारागार में ही बन्द कर के रखे गए हैं। जगह-जगह चेक पोस्ट खड़ी कर के लोगों के भीतर लगातार एक अंकुश बनाए रखना, आधी रात को घर में घुसकर तलाशी लेना, अंधाधुंध गिरफ़्तारियाँ करके बिना मुक़दमे लम्बे समय तक क़ैद में रखना, फ़र्जी एनकाउन्टर करना, छोटी सी बुनियाद पर लोगों के घरों का गिरा देना आदि इज़राईली प्रशासन का फ़िलीस्तीनियों के प्रति किया जाने वाला आम रवैया है। आज कल सेटलर्स ने फ़िलीस्तीनियों को परेशान करने की एक नई नीति निकाली है- फ़िलीस्तीनियों के घरों में बड़े-बड़े चूहो के झुण्ड छोड़ देना।


इन्तिफ़ादा

१९८८ में जब अराफ़ात आतंकवाद से तौबा करने की सोच रहे थे। उधर फ़िलीस्तीन में लम्बी निराशा और असहायता के लम्बे दौर की अभिव्यक्ति एक अजब बेचैनी में हो रही थी। नई पीढ़ी एक अजब दुस्साहस लेकर पैदा हो रही थी। गाज़ा में १९८७ में इज़राईली सेना के एक ट्रक से कुचलकर चार फ़िलीस्तीनियों की मौत हो गई। इस की प्रतिक्रिया में फ़िलीस्तीनी नौजवानों ने पत्थर हाथ में उठा लिए और उसे अपने आक्रोश का हथियार बना कर इज़राईली सेना की तरफ़ फेंकने लगे।


छोटे-छोटे बच्चे जो न गोली से डरते और न टैंक से, कुछ तो पाँच बरस की उमर के। अपमान और दमन की ज़िन्दगी की मजबूरी को परे कर लड़ कर जीने की जज़बा पैदा कर लिया उन्होने। फ़िलीस्तीनी नौजवान के प्रतिरोध को इन्तिफ़ादा के नाम से जाना गया। इन्तिफ़ादा यानी डाँवाडोल के दौरान सिर्फ़ पत्थर ही नहीं चले। फ़िलीस्तीनी लड़के खुदकुश बमबाज़ भी बने, हथियारबन्द दस्तों से कार्रवाईयाँ भी की गईं, और इज़राईली इलाक़ों की तरफ़ रॉकेट भी दाग़े गए।


ये डाँवाडोल छै साल तक चलता रहा। हमास की निन्दा तो हुई मगर उस से अधिक दुनिया भर में इज़राईल के लिए निहायत शर्म का मसला बना। पहले इन्तिफ़ादा के दौरान ४२२ इज़राईली मारे गए और ११०० फ़िलीस्तीनी इज़राईलियों के हाथों मारे गए, जिसमें १५० के लगभग की उमर १६ बरस से भी कम थी। साथ-साथ लगभग १००० फ़िलीस्तीनी अपने ही लोगों के हाथों मारे गए। इनके बारे में शक़ था कि ये गद्दार हैं और इज़रालियों ले किए जासूसी करते हैं।


२००० में वेस्ट बैंक में अल अक़्सा मस्जिद को लेकर दूसरा इन्तिफ़ादा शुरु हुआ और फिर वही हिंसा चालू हो गई।


हमास

१९८७ में इन्तिफ़ादा के साथ ही फ़िलीस्तीनियों के बीच एक नए संगठन का उदय हुआ- हमास। सत्तर के दशक के बाद से दुनिया भर में मुस्लिम कट्टरपंथी विचारों का पुनरुत्थान हुआ है। पाकिस्तान में जनरल ज़िया की सदारत में, अफ़्ग़ानिस्तान में अमेरिका के पोषण से, इरान में अयातुल्ला खोमेनी के झण्डे के तले, मिस्र में अल जवाहिरी के दल में। अराफ़ात की प्रगतिशीलता और सेक्यूलर सोच के अवसान के साथ ही फ़िलीस्तीन में भी सुन्नी कट्टरपंथी वहाबी चिंतन मजबूती पकड़ी। ये आन्दोलन न सिर्फ़ राजनैतिक है बल्कि धार्मिक भी है। इज़राईलियों से लड़ने के अलावा फ़िलीस्तीनी औरतों का हिजाब अगत व्यवस्थित न हो तो उचित सज़ा देने में भी यक़ीन रखता है।


हमास के नेता अहमद यासीन बचपन से ही एक ऐसी अस्वस्थता के शिकार थे जिसने उनके अस्तित्व को व्हीलचेयर के साथ बाँध दिया थ। पर इस शारीरिक सीमा ने उनकी मानसिक क्षमताओं को सीमित नहीं किया। उनके प्रभाव में आकर सैकड़ों फ़िलीस्तीनी नौजवानों ने अपने को खुद्कुश बम बना कर शहीद कर दिया। उनके इसे खतरनाक प्रभाव के कारण इज़राईल ने उन पर कई बार हमले किए और आखिर में एक मिसाइल हमले से उनकी हत्या कर दी। इसके पहले इज़राईल ने फ़तह के नेता और अराफ़ात के सहयोगी अबू जिहाद को भी ऐसे ही एक हमले में मार डाला था।


आज की तारीख में फ़िलीस्तीन में अराफ़ात के संगठन फ़तह से कहीं अधिक लोकप्रियता हमास की है। २००६ के चुनावों में फ़िलीस्तीनी संसद की १३२ सीटों मे जहाँ फ़तह को ४३ सीटें मिलीं वहीं हमास ने ७६ सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन आज फिर हमास को फ़िलीस्तीनियों का प्रतिनिधि मानने से इंकार किया जा रहा है, क्योंकि वे खुले तौर पर आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हैं।

फ़िलीस्तीन की आज़ादी की लड़ाई का ये रंग पहले से ज़्यादा खतरनाक है मगर क्या फ़िलीस्तीनियों के अधिकार का फ़ैसला इस आधार पर होना चाहिये कि उनका प्रतिनिधि करने वाला दल एक अतिवाद से ग्रस्त है?

हिंसा जारी है

आज भी फ़िलीस्तीन और इज़राईल के बीच आपसी नफ़रत के अलावा तमाम सारे अनसुलझे मुद्दे बने हुए हैं। उनके बीच भू-भाग का बँटवारे का सवाल वैसे ही उलझा हुआ है। इज़राईल अपना आधिकारिक मानचित्र आज भी जारी नहीं करने को तैयार है। सेटलर्स फ़िलीस्तीन के नियंत्रण में घोषित कर दिये भागों में अभी भी बने हुए हैं। इज़राईल की सेना और पुलिस आज भी फ़िलीस्तीनी क्षेत्रों में घुसकर जिसको जी चाहे गिरफ़्तार कर लेती है। और थोड़ी सी हिंसा होते ही इज़राईल फ़िलीस्तीनी इलाक़ो पर बम और मिसाइल वर्षा करने लगता है। ये मामले सुलझ सकते हैं अगर उनके बीच विश्वास का कोई पुल बने मगर जब नफ़रत और प्रतिशोध की खाईयाँ खुद चुकी हों तो कैसे कोई मामला हल हो सकता है।


लेबनान के शिया संगठन हिज़्बोल्ला के साथ भी इज़राईल का ऐसा ही उग्र सम्बन्ध क़ायम है जिसके चलते २००६ में एक महीने लम्बी खूनी लड़ाई लड़ी गई जिसमें हज़ारों जाने गईं और बेरुत जैसा खूबसूरत शहर एक बार फ़िर नष्ट हुआ।


चूँकि ये लेख उन लोगों को समर्पित रहा जो समझते हैं कि इज़राईल जैसी कठोर दमन की नीति अपनाने से आतंकवाद काबू में आ जाएगा.. (याद रखा जाय कि आतंकवादी हमारे देश में हैं फ़िलीस्तीनियों को आतंकवादी कहना उनका अपमान और उनके ज़मीन पर जबरन क़ब्ज़ा जमाए बैठे अपराधी देश इज़राईल का अनुमोदन है, हाँ हिंसावादी निश्चित हैं).. तो अपने उन बन्धुओं को लिए आखिर में एक आँकड़ा रखता चलता हूँ..


१९८७ से २००० तक के बीच चौदह साल में १८७३ फ़िलीस्तीनी और ४५९ इज़राईली मारे गए.. जबकि २००१ से २००७ के सात साल में ४२०७ फ़िलीस्तीनी और ९९१ इज़राईली अपनी जान से गए। यानी कि आधी ही अवधि में मरने वालों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई।


भविष्य के प्रति निराश हूँ

हमारे हिन्दुस्तान में हिन्दू मुस्लिम के बीच का दुराव के पीछे राजनैतिक संघर्ष, धार्मिक पूर्वाग्रह, और आपसी हिंसा के कुछ अध्याय ज़रूर हैं मगर सैकड़ों साल तक एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे को धार्मिक, सांस्कृतिक, और नैतिक स्तरों पर गहरे तौर पर प्रभावित भी किया और एक साझा जीवन जिया है।


जो लोग साझी संस्कृति की सच्चाई को नकारते हैं वे भी मानेंगे कि पिछले हज़ार सालों में भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियाँ नदी के दो पाटों की तरह अलग-अलग ज़रूर रहीं पर एक लम्बे सफ़र में कभी-पास कभी दूर रहकर भी एक दूसरे को प्रभावित करती रहीं।

अपने देश के प्रति मैं आशावान हूँ पर फ़िलीस्तीन के लिए मैं नाउम्मीद हूँ क्योंकि वहाँ ऐसे साझेपन की किसी भी सम्भावना को शुरु से ही पनपने ही नहीं दिया गया, पहले ही बँटवारा कर दिया।


१९४८ के नकबा के बाद एक दूसरे के एकदम खिलाफ़ हो गए ये दो समुदाय कभी आपस में सहज हो पाएंगे ये कहना बहुत मुश्किल है। एक फ़िलीस्तीनी, एक इज़राईली को देखकर क्या कभी भूल पाएगा कि ये उसी क़ौम की सन्तति है जिसने हम पर अनेको अत्याचार किए और हमें हमारे ही घर से बेघर कर दिया?


सम्भव है कि हिंसा का ताप मद्धिम पड़ जाय पर वो एक शोले की तरह हमेशा उन के दिलों में दब के रहेगी और कभी भी भड़कने के लिए बेक़रार बनी रहेगी। किसी बहुत बड़ी महाविपत्ति के भार के नीचे ही यह आपसी नफ़रत दफ़न होकर, उन्हे वापस जोड़ सकती है, शेष कुछ नहीं; ऐसा मुझे लगता है। भगवान करे मैं ग़लत होऊँ।




इस श्रंखला की पहले की कड़ियाँ-


जो वादा किया..

रचना एक नए देश की

एक क़ानूनी मगर नाजायज़ देश


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