निदो की मौत के पहले का घटना क्रम जो इस रपट से बनता है उस पर ज़रा गौर किया जाय:
१॰ निदो दुकान पर जाकर पता पूछता है, वो उस पर कुछ कमेंट करते हैं
२॰ निदो दुकान में इतनी तोड़फोड़ करता है कि पुलिस की मध्यस्थता के बाद वो ७७००₹ देने को राज़ी हो जाता है। (ज़ाहिरन हत्या के मुलज़िमों ने पुलिस को बुलाया)
३॰ निदो अपने कुछ और दोस्तों के साथ वापस घटना स्थल पर आता है। निदो के हत्या के मुलज़िम पुलिस को फोन करते हैं (दुबारा)। पुलिस वाले आकर फिर बीच बचाव करते हैं। निदो की माँ को फोन करते हैं। माँ कहती हैं कि निदो को उसके लोक गारजियन के पास छोड़ा जाय।
४॰ निदो थाने जाकर अपने एक दोस्त को ही लोकल गारजियन बताकर वहाँ से चला जाता है।
५॰ अगले दिन निदो की मौत हो जाती है।
६॰ शव परीक्षा के बाद किसी बाहरी चोट से मौत मुमकिन नहीं लगती। सब मामूली चोटे हैं।
ये आज की ख़बर है। पर निदो की मौत के पहले दिन से ही फेसबुक के सजग प्रहरियों ने इस पूरे मामले को रेसिज़्म से प्रेरित बताया और मीडिया ने भी। माफ़ करें साहब मुझे तो इसमें रेसिज़्म नहीं समझ आता। झगड़े, मारपीट, हत्याएं देश भर में होती हैं। विभिन्नताओं का देश है। ये कैसे मुमकिन है कि हिन्दू हिन्दू से लड़े, जैन जैन से, और मणिपुरी मणिपुरी से? सब को एक दूसरे से लड़ने का ईश्वरीय हक़ मिला हुआ है। निदो १९ साल का जवान ख़ून, जोश से इतना उबल रहा था कि न उसे किसी की सम्पत्ति की परवाह थी और न पुलिस-क़ानून की। ये भी ध्यान रखना चाहिये कि वो एक एम एल ए का बेटा था, हमारे देश मेँ इनकी एल अलग क़ौम बन चुकी है। हो सकता है हत्या के मुलज़िमों ने कोई ऐसी बात कही हो जो रेसिज़्म से प्रेरित हो, मगर क्या इस तरह की हिंसा से रेसिज़्म का हल किया जाएगा, जिसका परिचय निदो ने दिया?
मेरी समझ में तो ये एक ऐसी मानसिकता का मामला है जिसमें आप हर बात का जवाब हिंसा से देना चाहते हैं। और ऐसी मानसिकता हर समाज में आपराधिक कहलाती है, चाहे वो अरुणाचल के एम एल ए का बेटा करे या लाजपत नगर का एक पनीर वाला।
लेकिन मेरे तमाम दोस्तों और मीडिया ने इस मामले का ऐसा रंग बदला कि हमेशा चुप रहने वाले प्रधानमंत्री तक को बोलना पड़ा। वे इसे अपनी सफलता मान सकते हैं। पर मेरी समझ से ये दुखद है। मेरे दोस्त पहले भी इस तरह की ग़लतियां करते रहे हैं। ख़ुर्शीद अनवर के मामले में भी मित्रों ने बिना सोचे समझे उनके विरुद्ध कैम्पेन शुरु कर दिया। क्यों? स्त्री के साथ खड़े होना प्रगतिशीलता है, इसलिए वो आँखमूंदकर फ़ैसले कर रहे हैं। खिड़की मामले में भी यही हुआ। वहाँ तो उन्होने एक मंत्री ही नहीं पूरे मोहल्ले को रेसिस्ट क़रार दे दिया। और अब ये निदो का केस!
क्या मिला उन्हे? उनके इस अभियान से क्या लोगों के भीतर से नस्लवाद की भावना चली जाएगी? उलटे और पनपेगी। क्योंकि आप लोगों की आँखों में उंगली डालकर उन्हे पूर्वोत्तर के लोगों को अलग चिह्नित करवा रहे हैं। और पूर्वोतर के लोगों के मन में भी जबरन एक असंतोष की भावना को बल दे रहे हैं? क्यों? अगर ये राजनीति है तो ठीक है, अच्छी नीति है। क्योंकि राजनीति लोगों को बांटकर ही होती है।
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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014
शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
बदलाव का संकट
दिल्ली में वैकल्पिक व्यवस्था चाहने वाले एक दल के नेता और कार्यकर्ता विकल्प की लड़ाई से बहककर नस्लविरोधी और स्त्रीविरोधी व्यवहार में पतित हो जाते हैं। बीरभूम में एक पंचायत बारह लोगों को एक स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार का आदेश देती है।
क्या कारण है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दल अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति कोई आस्था न पैदा कर सके? शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे राष्ट्रपति के अपने ज़िले में ऐसी जघन्यता पलती रही?
क्या इसका कारण यह है कि हमारे लोग संविधान का सम्मान तो करते हैं पर इसमें निहित मूल्य और आदर्श, उनके अपने मूल्य और आदर्श नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि बहुसंख्यक समाज आज भी स्त्री को हीन समझता है? क्या न्याय और दण्ड की जैसी व्यवस्था हमारे संविधान ने की है, सामाजिक कल्पना में भी वैसी ही न्याय और दण्ड की व्यवस्था है?
मेरा विचार है कि हमारा संविधान तो एकता, समानता और न्याय के प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है जबकि भारतीय समाज में कई स्तरों पर पिछड़ापन और पतनशीलता नज़र आती है।
मगर ये हुआ कैसे? यदि हमारा संविधान हमारे ही समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो किस समाज का करता है? तो क्या सच ये है कि हमारा समाज उन प्रगतिशील मूल्यों को ढो रहा है जिन पर दिल से उसकी आस्था नहीं है?
अगर सचमुच ऐसा है तो ये एक बड़े संकट की और इशारा है- जिसमें संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून बनाकर बदलाव तो कर दिए गए मगर सामाजिक बदलाव का पक्ष पूरी तरह उपेक्षित रहा!
तब फिर क़ानून बनाकर, लोगों को अपराधी घोषित करके, उन्हे दण्डित करके क्या हासिल होगा? आधा देश स्त्रीविरोधी, जातिवादी, साम्प्रदायिक, और न जाने किस-किस अपराध का भागीदार हो सकता है।
क्या दण्ड का डर ही बदलाव की बुनियादी शर्त है? असली बदलाव कैसे होता है? भीतर से या बाहर से? मेरी समझ में बाहर से केवल हिंसा हो सकती है, विकासमान परिवर्तन केवल भीतर से ही मुमकिन है।
***
क्या कारण है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दल अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति कोई आस्था न पैदा कर सके? शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे राष्ट्रपति के अपने ज़िले में ऐसी जघन्यता पलती रही?
क्या इसका कारण यह है कि हमारे लोग संविधान का सम्मान तो करते हैं पर इसमें निहित मूल्य और आदर्श, उनके अपने मूल्य और आदर्श नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि बहुसंख्यक समाज आज भी स्त्री को हीन समझता है? क्या न्याय और दण्ड की जैसी व्यवस्था हमारे संविधान ने की है, सामाजिक कल्पना में भी वैसी ही न्याय और दण्ड की व्यवस्था है?
मेरा विचार है कि हमारा संविधान तो एकता, समानता और न्याय के प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है जबकि भारतीय समाज में कई स्तरों पर पिछड़ापन और पतनशीलता नज़र आती है।
मगर ये हुआ कैसे? यदि हमारा संविधान हमारे ही समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो किस समाज का करता है? तो क्या सच ये है कि हमारा समाज उन प्रगतिशील मूल्यों को ढो रहा है जिन पर दिल से उसकी आस्था नहीं है?
अगर सचमुच ऐसा है तो ये एक बड़े संकट की और इशारा है- जिसमें संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून बनाकर बदलाव तो कर दिए गए मगर सामाजिक बदलाव का पक्ष पूरी तरह उपेक्षित रहा!
तब फिर क़ानून बनाकर, लोगों को अपराधी घोषित करके, उन्हे दण्डित करके क्या हासिल होगा? आधा देश स्त्रीविरोधी, जातिवादी, साम्प्रदायिक, और न जाने किस-किस अपराध का भागीदार हो सकता है।
क्या दण्ड का डर ही बदलाव की बुनियादी शर्त है? असली बदलाव कैसे होता है? भीतर से या बाहर से? मेरी समझ में बाहर से केवल हिंसा हो सकती है, विकासमान परिवर्तन केवल भीतर से ही मुमकिन है।
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सोमवार, 20 जनवरी 2014
आआपा का समर्थन
मैं आने वाले चुनावों में आआपा का समर्थन करने का इरादा रखता हूँ!
कारण:
१। अरविन्द केजरीवाल और योगेन्द्र यादव मेरे भीतर, किसी भी अन्य राजनेता से अधिक भरोसा जगाते हैं। मुझे वे किसी भी दल के अन्य नेताओं से अधिक ईमानदार, सत्यनिष्ठ, और अपने ध्येय के प्रति समर्पित समझ आते हैं।
२। वे साम्प्रदायिक नहीं हैं। आरक्षण को लेकर उनके बारे में कुछ संशय है। मगर मैं नहीं समझता कि वो आरक्षण के ख़िलाफ़ जाने की भूल करेंगे।
३। उनकी आर्थिक नीतियां स्पष्ट नहीं हैं। मगर इन हालात में जबकि भाजपा और कांग्रेस एक ही आर्थिक नीति की हिमायती है, आआपा कम से कम अन्य बिन्दुओं के आधार पर उनसे बेहतर विकल्प लगती है। और शायद वो ऐसी आर्थिक नीति लेकर आ सके जो समाज के समान विकास करने में मददगार सिद्ध हो, ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है!
४। वे स्वराज की बात कर रहे हैं, शासन तंत्र की निर्देश श्रंखला को ऊपर से नीचे के बदले, नीचे से ऊपर कर देने की बात कर रहे हैं- ये बड़ा मुद्दा है। अगर वो ये न भी कर सकें तो भी इस मुद्दे को फोकस में लाने के लिए ही उन्हे वोट दिया जाना चाहिये ताकि आगे लड़ाई का मुद्दा ये रहे!
५। इस समय देश में उनके पक्ष में माहौल बना हुआ है। लोग एक विकल्प खोज रहे हैं। ख़ासकर कांग्रेस का विकल्प! आआपा में कांग्रेस का असली विकल्प बनने की सारी सम्भावना मौजूद है। ये कोई क्रांतिकारी विकल्प नहीं है। आआपा सारी समस्याएं सुलझा दे- ऐसी उम्मीद करना भी व्यर्थ है- पर उसे एक अवसर दिया जाना चाहिये! देखें, वे क्या कर सकते हैं!
६। ये ठीक है कि ऐसा विकल्प बनाना आसान नहीं। दो लोगों के भरोसे विकल्प नहीं बनता। देश भर में तमाम अवसरवादी तत्व आआपा ज्वाइन कर रहे हैं। वो अपनी पुरानी संस्कृति इधर भी ले आएंगे। पर क्या कर सकते हैं? हमारे लोग जैसे हैं वैसे हैं। अगर हमारे देश के बहुत सारे लोग भ्रष्ट, अवसरवादी, और गहराई में जातिवादी और साम्प्रदायिक भी हैं- तो हैं। शुरू यहीं से करना होगा! कोई जादू की छड़ी नहीं है। या तो फिर उम्मीद छोड़ कर आदमी बस गरियाता रहे- सब साले चोर है! इस मुल्क का कुछ नहीं हो सकता!
७। हो सकता है तमाम ऐसे मामले हों जिस पर आप आआपा से सहमत न हों, मैं भी नहीं हूँ। पर ये समय असहमत होकर नए विकल्प से बनने के पहले ही टूट कर अलग हो जाने का नहीं, बन रहे विकल्प को बल प्रदान करने का है! नहीं तो जान लीजिए अगर आआपा आने वाले चुनावों में एक महत्वपूर्ण संख्या में सीटें नहीं जीत सकी तो सरकार या तो कांग्रेस की बनेगी या फिर भाजपा की!
८। चूंकि मैं कांग्रेस के शासन से तंग आ चुका हूँ और मोदी को भी इस देश के सर्वोच्च पद पर नहीं देखना चाहता, इसलिए मैं आने वाले चुनावों में आआपा को वोट देने का इरादा रखता हूँ।
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कारण:
१। अरविन्द केजरीवाल और योगेन्द्र यादव मेरे भीतर, किसी भी अन्य राजनेता से अधिक भरोसा जगाते हैं। मुझे वे किसी भी दल के अन्य नेताओं से अधिक ईमानदार, सत्यनिष्ठ, और अपने ध्येय के प्रति समर्पित समझ आते हैं।
२। वे साम्प्रदायिक नहीं हैं। आरक्षण को लेकर उनके बारे में कुछ संशय है। मगर मैं नहीं समझता कि वो आरक्षण के ख़िलाफ़ जाने की भूल करेंगे।
३। उनकी आर्थिक नीतियां स्पष्ट नहीं हैं। मगर इन हालात में जबकि भाजपा और कांग्रेस एक ही आर्थिक नीति की हिमायती है, आआपा कम से कम अन्य बिन्दुओं के आधार पर उनसे बेहतर विकल्प लगती है। और शायद वो ऐसी आर्थिक नीति लेकर आ सके जो समाज के समान विकास करने में मददगार सिद्ध हो, ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है!
४। वे स्वराज की बात कर रहे हैं, शासन तंत्र की निर्देश श्रंखला को ऊपर से नीचे के बदले, नीचे से ऊपर कर देने की बात कर रहे हैं- ये बड़ा मुद्दा है। अगर वो ये न भी कर सकें तो भी इस मुद्दे को फोकस में लाने के लिए ही उन्हे वोट दिया जाना चाहिये ताकि आगे लड़ाई का मुद्दा ये रहे!
५। इस समय देश में उनके पक्ष में माहौल बना हुआ है। लोग एक विकल्प खोज रहे हैं। ख़ासकर कांग्रेस का विकल्प! आआपा में कांग्रेस का असली विकल्प बनने की सारी सम्भावना मौजूद है। ये कोई क्रांतिकारी विकल्प नहीं है। आआपा सारी समस्याएं सुलझा दे- ऐसी उम्मीद करना भी व्यर्थ है- पर उसे एक अवसर दिया जाना चाहिये! देखें, वे क्या कर सकते हैं!
६। ये ठीक है कि ऐसा विकल्प बनाना आसान नहीं। दो लोगों के भरोसे विकल्प नहीं बनता। देश भर में तमाम अवसरवादी तत्व आआपा ज्वाइन कर रहे हैं। वो अपनी पुरानी संस्कृति इधर भी ले आएंगे। पर क्या कर सकते हैं? हमारे लोग जैसे हैं वैसे हैं। अगर हमारे देश के बहुत सारे लोग भ्रष्ट, अवसरवादी, और गहराई में जातिवादी और साम्प्रदायिक भी हैं- तो हैं। शुरू यहीं से करना होगा! कोई जादू की छड़ी नहीं है। या तो फिर उम्मीद छोड़ कर आदमी बस गरियाता रहे- सब साले चोर है! इस मुल्क का कुछ नहीं हो सकता!
७। हो सकता है तमाम ऐसे मामले हों जिस पर आप आआपा से सहमत न हों, मैं भी नहीं हूँ। पर ये समय असहमत होकर नए विकल्प से बनने के पहले ही टूट कर अलग हो जाने का नहीं, बन रहे विकल्प को बल प्रदान करने का है! नहीं तो जान लीजिए अगर आआपा आने वाले चुनावों में एक महत्वपूर्ण संख्या में सीटें नहीं जीत सकी तो सरकार या तो कांग्रेस की बनेगी या फिर भाजपा की!
८। चूंकि मैं कांग्रेस के शासन से तंग आ चुका हूँ और मोदी को भी इस देश के सर्वोच्च पद पर नहीं देखना चाहता, इसलिए मैं आने वाले चुनावों में आआपा को वोट देने का इरादा रखता हूँ।
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मंगलवार, 7 जून 2011
यू पी की लड़ाई में बाबा चँप गए
दिल्ली के रामलीला मैदान में जो हुआ वह कोई रणनैतिक भूल नहीं थी जैसे कि अभी कांग्रेस पार्टी, पूरी तरह बचाव की मुद्रा में आ जाने पर, बता रही है। असल में यह एक लाइन से पलटी मार कर दूसरी लाइन पकड़ लेने का झटका था। कांग्रेस में पिछले कुछ समय से दो लाइनें आपस में टकराती रही हैं। एक लाइन तो साफ़ तौर पर सत्ता पर क़ाबिज़ है और जिसका मक़सद है देश में भूमण्डलीय प्रतिमानों पर पूँजीवाद का विकास करना। मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी और चिदम्बरम इस लाइन के प्रवक्ता हैं। दूसरी लाइन का मक़सद है कांग्रेस के पुराने क़िले उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करना। सन १९८९ के बाद से कांग्रेस का यूपी से जो सफ़ाया हुआ है तो दुबारा वहाँ सत्ता की उसकी फ़सल बटाई पर भी काटने लायक़ भी नहीं हो सकी है।
राहुल बाबा का जादू भी निहायत बेअसर रहा है। चालीस का हो जाने के बाद भी उनके अन्दर किसी भी तरह की राजनैतिक बुद्धि पनपती नहीं दिख रही है। और कांग्रेसजन इस बात पर एकमत हैं कि सत्ता हासिल करने के लिए गांधी परिवार की किसी सदस्य का सदर की कुर्सी पर बैठना उनके लिए भाग्यशाली रहता आया है। चाहते तो वो असल में ये हैं कि राहुल के बदले प्रियंका जी टोपी पहन लें मगर सोनिया ज़िद करके बैठी हैं कि प्रधानमंत्री बनेगा तो मेरा बेटा ही। और बेटाजी भी पापाजी के नक़्शेक़दम पर चलने को बेताब हैं। लिहाज़ा दिग्विजय सिंह की घाघ बुद्धि को उनकी सेवा में लगा दिया गया है। तभी से दिग्विजय सिंह कांग्रेस की दूसरी लाइन के प्रवक्ता के रूप में उभरे हैं जिसका म़कसद, जैसा कि पहले कहा, यूपी में सत्ता हासिल करके केन्द्र में पूर्णबहुमत की सरकार में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है।
इन्दिरा गांधी के समय तक कांग्रेस का वोट तीन तरफ़ से आता था- ब्राह्मण, दलित और मुसलमान। राजीवगांधी ने १९८९ के चुनाव के बाद इन तीनों पर से अपने इज़ारेदारी गँवा दी। १९८७ के भागलपुर के दंगे और हाशिमपुराकाण्ड के बाद से मुसलमान का कांग्रेस से पूर्ण मोहभंग हो गया और उन्होने दूसरा रास्ता देखा। और १९८४ के बाद से निरन्तर एक शक्ति के रूप में बढ़ती बीएसपी के कांशीराम ने दलित को जगाकर बता दिया कि कांग्रेस उनके वोटों की हक़दार क्यों नहीं है। धीरे-धीरे दलित वोटबैंक भी कांग्रेस के हाथ से रेत की तरह खिसक गया। और इन दोनों के जाने के बाद ब्राह्मण जाति के वोट कांग्रेस को मिलते तो रहे मगर किसी बैंक की तरह नहीं। और पिछले चुनाव में तो मायावती ने वो भी छीन लिए।
दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी को समझा लिया है कि यूपी में वापसी इन जातियों का वोट मिले बिना मुमकिन नहीं है। लिहाज़ा राहुल, राजकुमार के मोहक चेहरे से बहक सकने वाले दलितो को कनविन्स करने में लगे हैं कि वो उनके कितने हितचिंतक हैं। दूसरी तरफ़ अधिक कठिन मुसलमानों को बरग़लाने का काम दिग्विजय ने अपने हाथ में लिया है। ब्राह्मणों की चिंता वो अभी नहीं कर रहे हैं क्योंकि जब सत्ता मिलती दिखाई देगी तो परम्परा से हमेशा से सत्ता के क़रीब रहने वाली ब्राह्मण जाति आसानी से वापस लौटा ली जाएगी।
इसीलिए जब से उन्हे यूपी का प्रभार मिला है मुसलमानों के भीतर मौजूद अल्पसंख्यक भय को भाने वाली बातों को कहने का वो कोई मौक़ा नहीं छोड़ते। ये बहुत ही अफ़सोस की बात है कि इस देश की राजनीति की धुरी बड़े तौर पर भय से प्रचालित होती है। इस धुरी का एक पहलू है जिसमें मुसलमानों को हिन्दू कट्टरता का भय दिखाकर वोट लपेटे जाते हैं और उसी धुरी का दूसरा पहलू वो है जिसमें हिन्दुओं को मुसलमान कट्टरता का भय दिखाकर वोट लपेटे जाते हैं। वामपंथ को इनमें से खुरचन भी नहीं मिलती लेकिन वो ख़ुद अपने हाथों से इस धूल को अपनी और अपने समर्थकों की आँखों में झोंकता रहता है।
जब बाबा रामदेव को एअरपोर्ट लेने चार मंत्री पहुँचे तो उसके पीछे मनमोहन की समझौतापरस्त लाइन काम कर रही थी जो पूँजीवादी विकास के लिए शांति का माहौल चाहती है और व्यवस्था में थोड़े-मोड़े सुधार करने की भी पक्षधर है। लेकिन जब आधी रात को सोते हुए लोगों पर पुलिस को छोड़ दिया गया तो वो दिग्विजय की लाइन थी जो साफ़ तौर पर हिन्दू दिखने वाले और हिन्दू प्रतीकों का इस्तेमाल करने वाले बाबा को ठग बताकर मुसलमान को उनके हितचिन्तक होने का विश्वास दिलाना चाहते हैं। जब वे ओसामा ‘जी’ के दफ़न-कफ़न के प्रति चिन्तित होते हैं तो उसके पीछे भी ही यही मंशा काम कर रही होती है।
और बाबा को आर एस एस का मुखौटा बताने के पीछे भी यही सोच है कि मुसलमानों को डराया जाय और ये बताया जाय कि कैसे वो आर एस एस के ख़िलाफ़ हैं और इसलिए उनके पक्ष में हैं। जबकि बाबा रामदेव का आर एस एस से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं। जो मुद्दे आर एस एस उठाता रहा है वो बाबा भी उठा रहा है और आर एस एस उनका समर्थन भी कर रहा है। इसी आधार पर उन्हे आर एस एस का कीच मलकर मलिन किया जा रहा है। ये दिलचस्प है कि कैसे कोई मुद्दा किसी संगठन को मलिन करता है और फिर संगठन ही दूसरे मुद्दों को छू देने भर से मैला कर देता है। अब भ्रष्टाचार आर एस एस के छू देने से मैला हो चुका है। और रही बात रामदेव की तो वो ज़ाहिरी तौर पर आर्यसमाजी परम्परा में है। आर्यसमाज भी एक समय में मुसलमानों के साथ संघर्ष की भूमिका में रहा है मगर आम मुसलमान को वो सूक्ष्म अंतर कौन समझाए। और अब आर एस एस का खौफ़ फ़ैशन में भी है तो इसीलिए दिग्विजय हर बात घुमा-फिरा कर आर एस एस की ओर मोड़ देते हैं।
बाबा का तम्बू उखाड़कर कांग्रेस ने २०१२ के यूपी के चुनावों में मुसलमानों के वोट पर अपनी दावेदारी पेश की है और मायावती को सीधी चुनौती दी है। क्योंकि असल में मायावती ही कांग्रेस की विरासत पर कुण्डली मारकर बैठ गई हैं। दलित, मुसलमान और ब्राह्मण का समीकरण अब उनके पास है। कांग्रेस की इस चाल को मायावती भी अच्छी तरह समझती हैं इसीलिए जब बाबा को दिल्ली से हकाला गया तो मायावती ने उनको भाव देना तो दूर यूपी की सीमा में वापस घुसने भी नहीं दिया। वो नहीं चाहतीं कि मुसलमान के बीच यह इम्प्रेशन जाय कि वो बाबा को बढ़ावा दे रही हैं। अपने व्यवहार में मायावती ने कहीं अधिक राजनैतिक परिपक्वता का मुज़ाहिरा किया है।
कुछ भटके हुए लोग भले यह समझते रहें कि भ्रष्टाचार १९९१ के आर्थिक नीतियों का परिणाम हैं मगर घुटे हुए समझदार लोग जानते हैं कि भ्रष्टाचार युगों पुराना रोग है। प्राचीन काल में था और मुग़ल काल में भी। कम्पनी के गोरे भी इस रोग से ग्रस्त थे और आज़ादी के तथाकथित मतवाले भी। बीच-बीच में जनता आजिज़ आकर हल्ला मचाती है मगर वापस ढर्रे पर लौट जाती है क्योंकि हर आदमी जो दूसरे के भ्रष्टाचार से दुखी है अपने भ्रष्ट आचरण के साथ सुखी है। बाबा रामदेव ने भी भ्रष्टाचार का झण्डा अपनी सस्ती लोकप्रियता को और भड़काने के लिए उठाया है। बाल-दाढ़ी बढ़ाकर शादी न करने से आदमी वास्तविक ब्रह्मचारी नहीं हो जाता। ब्रह्म के अलावा भी बहुत कुछ में विचरण करने वाले बाबा ने ब्लेड और शादी से सन्यास भले लिया हो सांसारिकता से सन्यास नहीं लिया है।
बाबा कितने आत्मकेन्दित और महत्वाकांक्षी हैं, ये कोई भी देख सकता है। अगर उन्हे वास्तव में भारत और भारतीय मानस में व्याप्त भ्रष्टाचार की चिंता तो है तो भ्रष्टाचार की जड़ पर वार क्यों नहीं करते? आचार पर? धर्म तो समाज की इकाई व्यक्ति को मानता है। समाज परिवर्तन की धुरी वो व्यक्ति को मानता है। इसीलिए साधु समाज को नहीं बदलता, स्वयं को बदलता है। बाबा कहाँ अनशन में जुट गए?
अनशन बापू का हथियार था और याद रहे बापू साधु नहीं, राजनीतिज्ञ थे। उनका अनशन अपने भीतर की वृत्तियों पर क़ाबू पाने के लिए नहीं था जैसा कि हर सच्चा धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति करता है, उनका अनशन राजनैतिक लक्ष्य के लिए होता था। इसलिए कोई अगर ये कहे कि बाबा तो राजनीति नहीं कर रहे थे, तो वो नासमझ हैं। सिर्फ़ चुनाव लड़ना ही राजनीति नहीं होती। राज्य की नीति परिवर्तन के लिए जो कुछ भी किया जाय वो सब राजनीति है।
मगर बाबा कच्चा है। वो दिग्विजय सिंह जैसा घाघ नहीं है। राजनीति उसके बस की नहीं। अच्छी राजनीति करने के लिए सिर्फ़ अच्छा आदमी होना ज़रूरी नहीं, कुटिलता ज़रूरी है। और बाबा के तो अच्छे होने पर भी सन्देह है। बाबा का असली योगदान तो यह हो सकता था कि वो व्यक्तियों के भीतर भ्रष्टाचार के अनैतिक बीज के विरुद्ध आध्यात्मिक जंग का ऐलान करे। मगर वो यह कर सकें ये बूता उनमें नहीं है। जिस व्यक्ति ने योग को महज़ शरीर को एक स्वस्थ रखने की पद्धति बना दिया उससे आप किसी आध्यात्मिक समझ की क्या उम्मीद कर सकते हैं? जिस पतंजलि के नाम पर उन्होने अपना विद्यापीठ बनाया है उनकी दो हज़ार से भी पुरानी किताब योगसूत्र में किसी आसन का कोई ज़िक़्र नहीं है, वो सिर्फ़ एक दार्शनिक-आध्यात्मिक सिद्धान्त है। आसन-बन्ध-मुद्रा वाला ये संस्करण तो गोरख और मछन्दर के बाद नौवीं-दसवीं सदी से आया है। और उसका भी ध्येय शरीर में रमना नहीं, स्थूल शरीर के पार जाना ही है। पर वो सब किसे याद है?
दिल्ली से निकाले जाने के बाद बाबा ने जिस तरह की अनावश्यक दारुणता का मुहावरा चुना है उससे कुछ लोग भले ही धोखा खा जायें पर अधिकतर लोग उनकी नौटंकी के आर-पार देख सकेंगे।
बुधवार, 10 नवंबर 2010
गांधीदर्शन
मैं उपरोक्त बातों को हलवा समझ कर हज़म नहीं कर पाता। गांधीजी असफल रहे- इस बात को स्वीकार करने में किसी को क्या परेशानी हो सकती है? आज़ादी मिलते ही उनके पट्टशिष्य़ नेहरू जी तक ने उनके बताये रास्ते ग्रामस्वराज का रास्ता छोड़कर अपने 'सपनों के भारत' को लागू करना शुरु कर दिया। चंद मुट्ठी भर आदर्शवादियों के अलावा लगभग सभी ने सत्य, अहिंसा और खादी का आश्रय छोड़कर भ्रष्ट भौतिक जीवन के पीछे भागना शुरु कर दिया। क्या इस से पता नहीं चलता है कि गांधीजी की वास्तविक अपील कितनी सीमित थी।
गांधीजी सत्यवादी और अहिंसक थे लेकिन उदार नहीं थे। हठी थे। अपनी बात मनवाने और के लिए किसी भी हद तक जाते थे। सुभाषचन्द्र बोस वाला प्रकरण सभी को मालूम ही है जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष की तरह उनके कार्यकाल को गांधीजी ने इतना मुश्किल बना दिया कि सुभाषचन्द्र बोस को इस्तीफ़ा देना पड़ा। और उनका आमरण अनशन भी एक तरह का हठ तो है ही साथ ही एक नज़रिये से हिंसा भी है। हिंसक आदमी अपनी बात मनवाने के लिए दूसरे के गले पे चाकू रखता है- मेरी बात मानो वरना मार दूँगा। गांधीजी पलटकर चाकू अपने गले पर रख लेते थे- मेरी बात मानो वरना मर जाऊँगा; बेचारे भले लोग हारकर मान जाते थे।
उनके आन्दोलन में अहिंसा के महत्व को मैं नकार नहीं रहा हूँ। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के अनशन करके नैतिक दबाव बनाने वाले वो कोई अकेले ऐतिहासिक व्यक्ति थे। इतिहास पढ़ने वाले जानते हैं कि मुग़ल शासन के अवनति के वर्षों में जब उनके पास सिपाहियों को उनका वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो ऐसे एक मौक़े पर मुग़ल बादशाह आलमगीर दोयम ने भी भूख हड़ताल की थी ताकि इमादुलमुल्क द्वारा जनता पर लगाये गए मनमाने कर को वापस लिया जाय। मेरा गांधीजी के अहिंसक हठ से कोई ऐतराज़ न होता अगर वे इसके ज़रिये कोई वास्तविक सामाजिक बदलाव ले आते- लेकिन क्या वे कुछ भी बदल सके लोगों में?
उनके त्यागपूर्ण जीवन की हमारे आज के जीवन में कितनी उपयोगिता है? जबकि अब गांधीदर्शन का मतलब करेन्सी नोटों पर छपे उनके हँसते हुए मुखड़े का दर्शन ही बनता है? हमारा राष्ट्रीय ध्वज भी, जिसे पहले खादी का ही होने की बात थी, खादी का छोड़ अन्य सभी तरह के कपड़ों का होता है?
गांधीजी का ग्रामस्वराज क्या अम्बेडकर को स्वीकार था या आज के दलितों को स्वीकार होगा जिसमें जातीय रिश्तों में बदलाव के लिए कोई जगह नहीं बनती है?
क्या आज़ादी वास्तव में गांधीजी के नेतृत्व का परिणाम थी? या विश्वयुद्ध से पस्त हो चुके साम्राज्यवादियों के द्वारा हड़बड़ी में सौंपी गई ज़िम्मेदारी?
गांधीजी एक प्रेरक पुरुष थे, महात्मा थे- इस से कोई इन्कार नहीं कर सकता। ओबामा और उनसे पहले मार्टिनलूथर किंग भी उनसे प्रेरणा लेते रहे हैं। लेकिन अफ़्रीकी-अमरीकी नागरिकों की आज़ादी में उनकी इससे अधिक कोई भूमिका नहीं देखी जा सकती। उसके केन्द्र में ऐतिहासिक कारण थे।
राजनीति में नैतिकता की एक जगह होनी चाहिये, लेकिन वो भी 'चाहिये' के दायरे में ही है। रियलपौलिटिक में चीज़े नैतिकता से तय नहीं होती। नैतिक दबाव हो या न हो, चीज़ों को बदलने वाली शक्तियाँ उन्हे एक निश्चित दिशा में लेके जाती हैं।
गांधीजी गाली के योग्य क़तई नहीं है लेकिन उन्हे भगवान भी न बनाया जाय!
(फ़ेसबुक पर एक बहस के दौरान उपजे विचार)
शुक्रवार, 25 जून 2010
राजनीति: एक बिकाऊ माल
राजनीति नाम से यह आभास होता है कि फ़िल्म भारत की समकालीन राजनीतिक सच्चाईयों पर आधारित कोई फ़िल्म है। और बहुत से लोग इस धोखे का शिकार हो भी गए हैं जिसमें प्रखर राजनैतिक टिप्पणीकार पुण्य प्रसून बाजपेयी भी शामिल हैं।
फ़िल्म के कथ्य पर वापस लौटते हुए यही कहूँगा कि यह फ़िल्म वास्तविकता का एक अच्छा भ्रम पैदा करती है लेकिन है वह भ्रम ही, वास्तविकता नहीं है। प्रकाश झा ने महाभारत और गौडफ़ादर की कहानी का इस्तेमाल किया है एक सफल फ़िल्म बनाने के लिए और सफल हुए हैं। कर्ण को दलित बना कर दलित राजनीति का कोई नया पहलू उजागर नहीं हुआ, कर्ण तो पहले भी सूतपुत्र ही था। बी एस पी जैसी परिघटना को तो अपनी पटकथा में क्यों नहीं सजा पाए झा जी? क्योंकि उनका ज़ोर समकालीन भारतीय सच्चाई को दिखाना नहीं, समकालीन भारतीय सच्चाईयों का इस्तेमाल कर के एक कामयाब यानी बिकाऊ माल बनाने पर है।
इसलिए 'राजनीति' को बिलकुल भी उस नए सिनेमा की श्रेणी में रखने की ग़लती मत करें जिसकी पताका दिबाकर बैनरजी और अनुराग कश्यप लहरा रहे हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ी पूंजी का दखल, मूल मुद्दे, नक़्ली भावनात्मक मुद्दे, जनता की विविध आकांक्षाएं, सड़क, पानी और बिजली के साथ जंगल, ज़मीन और पर्यावरण के सवालों को घेरे में लिए बिना कोई कैसे भारत की राजनीति की सच्ची तस्वीर बना सकता है?
प्रकाश झा की 'राजनीति' सिर्फ़ सामंती आपराधिक राजनीति की एक अतिरंजित तस्वीर बन गई है जो एक बीती हुई दुनिया का अवाञ्छित अवशेष है। आज की असली राजनीति में अपराध, शुद्ध सामन्ती सत्ता के लिए नहीं आर्थिक सत्ता के लिए होते हैं। सत्ता की राजनीति, अपनी अहम-तुष्टि के लिए गद्दी हासिल करने की राजनीति नहीं है। गद्दी हासिल कर के अर्थव्यवस्था को अपने अनुकूल करने की राजनीति है जिसकी एक भोथरी झलक कर्णाटक के रेड्डी बन्धुओं में और उसका महीन वितान अम्बानियों में मिलता है।
गुरुवार, 3 जून 2010
राष्ट्र क्या है?
रणनीतिक लिहाज़ से साझी सरहदों और चौकियों की तुलना में अतीत में साझी गौरवशाली धरोहर और हसरतें, और भविष्य में लागू करने के लिए (साझी) योजनाएं या साथ झेली हुई तक़लीफ़ें, साथ लिए हुए मज़े और साझी उम्मीदें कहीं अधिक मूल्यवान होती हैं। यही वो चीज़ें है जो प्रजाति और भाषा के फ़र्क़ों के बावजूद समझी जा सकती हैं। मैं ने अभी कहा 'साथ झेली हुई तक़लीफ़ें' और सच में पीड़ा, आनन्द से अधिक एका पैदा करती हैं। जहाँ तक राष्ट्रीय स्मृतियों का सवाल है, तक़लीफ़ें, विजयोल्लास से अधिक मूल्यवान होती हैं, क्योंकि वे कर्तव्य आरोपित करती हैं और एक साझी कोशिश की तलबगार होती हैं।
तो इसलिए अतीत में किए गए और भविष्य में किए जाने वाले उन बलिदानों- जिन्हे करने के लिए लोग तैयार हैं- की भावनाओं से संघटित, राष्ट्र एक व्यापक भाईचारा है। इसमें अतीत की कल्पना पहले से मौजूद है,जबकि ये वर्तमान में एक ठोस तथ्य से परिभाषित होता है, जो है सहमति- एक साझा जीवन बनाए रखने की स्पष्ट अभिव्यक्ति। जैसे एक व्यक्ति का अस्तित्व, जीवन के प्रति उसकी निरन्तर स्वीकृति है उसी तरह, यदि आप मेरे रूपक को क्षमा करें, एक राष्ट्र का अस्तित्व दैनिक जनमत-संग्रह है। और मैं जानता हूँ कि यह दैवीय अधिकार से कम आध्यात्मिक और ऐतिहासिक अधिकार से कम क्रूर है। मैं जो आप के सामने रख रहा हूँ उस विचार के अनुसार एक राष्ट्र के पास किसी राजा से अधिक अधिकार नहीं है कि वो किसी प्रदेश से कह सके, 'तुम मेरे हो, मैं तुम को हस्तगत कर रहा हूँ'। कोई भी प्रदेश, मेरे हिसाब से, उसके लोग हैं; अगर ऐसे मामलों में किसी की रायशुमारी होनी चाहिये तो वे वहाँ के लोग हैं। किसी राष्ट्र का किसी अन्य देश पर, उसकी ख़ाहिशों के ख़िलाफ़ क़ब्ज़ें में उसका अपना कोई सच्चा हित नहीं है। राष्ट्र की इच्छा ही एकमात्र वैधानिक आधार है, और वही हमेशा होना भी चाहिये।
हमने राजनीति में से आध्यात्मिक और धार्मिक अमूर्तन को निकाल फेंका है। तो बचता क्या है? आदमी; अपनी कामनाओं और ज़रूरतों के साथ। आप कहते हैं, कि लम्बी अवधि में अलगाव, राष्ट्रों का बिखराव एक ऐसे विधान का नतीजा होगा जो इन पुरानी संरचनाओं को उन इच्छाओं के रहमो करम पर छोड़ देता है जिन तक ज्ञान का उजाला नहीं पहुँचा है। ज़ाहिर है कि इन मामलों में किसी भी सिद्धान्त पर बहुत बल नहीं देना चाहिये। इस श्रेणी के सत्य एक बहुत ही आम ढंग से ही लागू करने योग्य हैं। मनुष्य के संकल्प बदलते हैं, और यहाँ भी ऐसा क्या है जो नहीं बदलता? राष्ट्र कोई शाश्वत चीज़ नहीं हैं। उनका एक आदि था और एक अन्त भी होना है। एक योरोपियन यूनियन सम्भवतः उनकी जगह ले लेगी। लेकिन जिस सदी में हम रहे हैं उसका ऐसा क़ानून नहीं है। इस दौर में, राष्ट्रों का अस्तित्व एक हितकारी चीज़ है, बल्कि एक ज़रूरत। उनका अस्तित्व आज़ादी की पूर्व-शर्त है, जो दुनिया में एक क़ानून और एक शासक होने से खो जाएगी।
अपनी विविध और अक्सर विरोधी शक्तियों के ज़रिये राष्ट्र, सभ्यता के साझे कार्य में हिस्सा लेते हैं; मानवता के महायज्ञ में अपनी आहुति देते हैं, जो (मानवता) आख़िरकार, वो उच्चतम आदर्श है जिसे हम हासिल कर सकते हैं। अकेले में, सबकी अपनी कमज़ोरियाँ हैं। अपने झूठे गौरव में फूलते रहना, हद दरज़े तक ईर्ष्यालु होना, अंहकारी और झगड़ालू होना, हर छोटे-बड़े बहाने पर अपनी तलवारें खींच लेना- ये सब गुण जो कि एक राष्ट्र के लिए बड़े सद्गुण समझे जाते हैं अगर किसी व्यक्ति में ऐसी ख़ामियाँ होती तो वो आदमी सबसे असहिष्णु माना जाता। मगर फिर भी ये विसंगतियाँ बड़े परिदृश्य में विलीन हो जाती हैं। बेचारी मानवता, तुम तुमने कितना कष्ट सहा है। और न जाने कितने इम्तहान तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। कामना करता हूँ कि विवेक तुम्हारे साथ रहे और तुम्हारे रास्ते में बिछे अनगिनत ख़तरों से तुम्हारी रक्षा करे!
सार ये है सज्जनों, कि आदमी न तो अपनी भाषा का दास है न प्रजाति का, न अपने धर्म का, न नदियों के मार्ग का, और न पर्वतमालाओं की दिशा का। सर से सतर्क और दिल से जोशीले मनुष्यों का एक बड़ा समूह उस प्रकार की नैतिक चेतना की रचना करता है जिसे हम राष्ट्र कहते हैं। जब तक यह नैतिक चेतना अपने उन बलिदानों के ज़रिये, जो समुदाय के हित में व्यक्ति के आत्म-त्याग की माँग करते हैं, अपनी शक्ति का सबूत देती है,वो वैध है और उस अस्तित्व में बने रहने का अधिकार है। अगर सरहदों के बारे में दुविधा पैदा होती है तो विवादित क्षेत्र की जनता से मशविरा करें। बेशक़, इस मामले में उन्हें अहम राय देन का हक़ है। यह सिफ़ारिश राजनीति के मुस्काने पर मजबूर कर देगी उन कुलीनों को, उन अमोघ हस्तियों को जो जीवन भर ख़ुद को धोखा देते हैं और फिर अपने उत्कृष्ट सिद्धान्तों की ऊँचाई से हमारी नश्वर चिंताओ पर रहम खाते हैं। "जनता से मशविरा, हे भगवान! क्या मूर्खता है।" मगर ज़रा इन्तज़ार कीजिय़े, सज्जनों; कुलीनों का दौर गुज़र जाने दीजिये; बलशालियों की नफ़रत को धीरज से सह जाइय़े। हो सकता है, कई असफल गठजोड़ों के बाद, लोग हमारे मामूली मगर व्यावहारिक हल की ओर लौट आयें। भविष्य में सही होने का सबसे सही तरीक़ा है, कुछ दौरों में, कि आप अपने आप को फ़ैशन से बाहर होना स्वीकार कर लें।
: अर्न्स्ट रेनान
: अर्न्स्ट रेनान
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अर्न्स्ट रेनान (१८३२-९२) एक अहम फ़्रेंच विचारक थे जिन्होने मुख़्तलिफ़ मसलों पर लिखा। उनका ये प्रसिद्ध लेख "राष्ट्र क्या है?" पहली बार १८८२ में सोबन्न में पढ़ा गया था। विद्वानों के बीच आज भी इसकी एक ख़ास जगह बनी हुई है।
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इस लेख का विशेष सन्दर्भ योरोप ही है और उनकी भविष्यवाणी कितनी सही साबित हुई, आज योरोप के सभी राष्ट्र एक यूनियन में आबद्ध हो चुके हैं। इस लेख के नज़रिये से देखें तो, एक स्तर पर, भारत एक राष्ट्र और कई राष्ट्रों के यूनियन के बीच में कहीं हैं; और दूसरे स्तर पर हम कश्मीर, नागालैण्ड और दूसरे अलगाववादी वृत्तियों का दमन ऐतिहासिक अधिकार से करते हैं।
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-५
माओवादियों के पक्ष की एक बात यह है कि जिनकी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिनके हितों की रक्षा की बात करते हैं उस जनता के साथ बिलकुल घुले-मिले हुए हैं। जनता और उनके प्रतिनिधियों में कोई बाधा नहीं है। दूसरी तरफ़ पूँजीवाद तंत्र के राज्य और जनता के बीच इतने-इतने संस्थान और उनकी जटिलताओं की इतनी दूरी है कि माओवादी व्यवस्था बड़ी सरल और सुलभ और जनतांत्रिक मालूम देती है। आदेश देने वालों लोगों और पालन करने वालों लोगों के बीच एक सीधा संवाद है, ऐसा आभास होता है। उनका यह गुण वरेण्य लगता है।
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एक तरफ़ माओवादी हैं जिनके केन्द्रीय नेतृत्व की तलाश पुलिस दिन-रात करती है, और जब वे अपना महाधिवेशन करते हैं जिसमें उनके सारे छोटे-बड़े नेता एक जगह इकट्ठा होते हैं तो किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होती। पूरा पुलिस और गुप्तचर तंत्र बेकार है क्योंकि वे एक ऐसा आदमी भी नहीं खोज पाते जो माओवादियों की इस अधिवेशन का पता-ठिकाना उन तक पहुँचा दे। दूसरी तरफ़ हमारे संसदीय लोकतंत्र के राजनेता हैं जो निर्वाचित होने के पहले और बाद में भी जनता से दस हाथ की दूरी पर रहते हैं। एक्स, वाई, ज़ेड सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ इनकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता है।
एक तरफ़ नेता और जनता में ज़मीनी, ठोस, गहरा रिश्ता है। दूसरी तरफ़ अब हालात ये पहुँच गए हैं कि संसदीय लोकतंत्र के नेता और जनता सिर्फ़ आभासी तल पर रूबरू हो सकते हैं। क्या पहला सम्बन्ध एक ऐसे गुज़रे ज़माने का अवशेष है जो सिर्फ़ आदिवासी इलाक़ो में ही सम्भव है जहाँ मानवीय प्रगति के चिह्न नहीं पहुँचे हैं? और दूसरा उस नए जीवन की पदचाप, जिस में वास्तविक से अधिक आभासी महत्वपूर्ण हो जाएगा?
ये कुछ माँ और बच्चे के सम्बन्ध जैसा है जिसमें माँ से बच्चा उत्तरोत्तर दूर ही होता जाता है; ये ब्रह्माण्ड की उस अवधारणा जैसा है जिस में सब पहले एक सिंगुलैरिटी में सिमटा हुआ था लेकिन अब सब कुछ, एक-दूसरे से दूर भाग रहा है; ये ईश्वर की उन कल्पनाओं जैसा है जिसमें पहले सब कुछ एक ही तत्व में सयुंक्त रहता है और फिर माया उसे जटिल, और जटिलतर बनाती जाती है।
बावजूद इन आकर्षक उपमाओं के, हमारी गहरी से गहरी कामनाओं की प्रेरणा इसी संयुक्त भाव की सरलता, इसी एकत्व, इसी तौहीद, इसी ज़मीनी, और ठोस रिश्ते की ओर होती है। मगर अजीब बात ये है कि इन आन्तरिक प्रेरणाओं और हमारे संघर्ष के बावजूद, ज़माना है कि विविधता और जटिलता और विलगाव की दिशा में भागा चला जा रहा है।
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यह पूछने पर कि क्या वे अपना आन्दोलन अहिंसा के साथ नहीं चला सकते, कौमरेड गणपति पलट कर पूछते हैं कि ये आप को राज्य से पूछना चाहिये कि वो प्रतिरोध के शांतिपूर्ण तरीक़ो का हिंसक दमन क्यों करते हैं? शांतिपूर्ण जुलूसों पर लाठीचार्ज और फ़ायरिंग क्यों करते हैं? हड़ताल करने वालों को जेलों में ठूंस कर यंत्रणा क्यों देते हैं? वे पूछते हैं कि वे क्यों पुलिस वालों को क्यों अनुमति देते हैं कि वे औरतों से बलात्कार करें? सही सवाल हैं!
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मगर दूसरी जगह गणपति साफ़ कहते हैं कि वे एक बड़े भूखण्ड को युद्ध क्षेत्र में तब्दील करना चाहते हैं- "The general direction of the Congress is to intensify the people’s war and to take the war to all fronts. Concretely it decided to take the guerrilla war to a higher level of mobile war in the areas where guerrilla war is in an advanced stage and to expand the areas of armed struggle to as many states as possible. The destruction of the enemy forces has come into the immediate agenda in these areas without which it is very difficult to consolidate our gains or to advance further. Likewise, there is an immediate need to transform a vast area into the war zone so that there is enough room for manoeuvrability for our guerrilla forces."
हालांकि इस युद्धघोष का आधार यही समझ है कि बिना लड़े अन्याय से मुक्ति नहीं है। ये एक केन्द्रीय सवाल है जो आम मध्यवर्ग को व्यथित करता है, कि क्या अन्याय से मुक्ति बिना युद्ध के सम्भव नहीं? मार्क्सवादी मानते हैं कि नहीं। मेरे ख़्याल से गाँधी के बाद से इस समझ में विश्वस्तर पर अन्तर आया ज़रूर है। लेकिन यहाँ पर यह भी याद रखना चाहिये कि हिंसा प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य के भी स्वभाव का एक अविभाज्य हिस्सा है। पर मुश्किल तब होती है जब माओवादी राज्य की आलोचना का मुख्य आधार हिंसा को ही बनाते हैं, और उसे ही ख़त्म करने के लिए युद्ध छेड़े हुए हैं। मैं यहाँ जा कर उलझता हूँ कि अगर माओवादी सफल हो भी गए तो क्या नए समाज में हिंसा का कोई स्थान न होगा? हिंसा अपने आप में कोई चीज़ तो नहीं है ना.. वो तो अन्याय करने का एक हथियार है... और अगर माओवादी समेत, कृष्ण व मोहम्मद आदि महापुरुषों को स्मरण किया जाय तो न्याय करने का भी।
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इन सारे महापुरुषों को नमन है लेकिन ये सच है कि आग से आग को नहीं बुझाया जा सकता। इस मामले में बुद्ध, ईसा, और गाँधी का मुरीद हूँ; हिंसा से हिंसा का शमन नहीं होता। न तो राज्य हिंसा से माओवाद का नाश कर सकता है और न ही माओवाद हिंसा से अन्याय का अंत कर के न्याय के युग का सूत्रपात कर सकते हैं। हिंसा से बस अल्पकालीन सत्ता का परिवर्तन मुमकिन है, जो हमने होते हुए देखा भी है। अहिंसा वाली डगर लम्बी है लेकिन उम्मीद की जाय कि पक्की है।
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कौमरेड गणपति अपने देश को साम्राज्यवाद के चंगुल से छुड़ाने के लिए सत्ता को हासिल करने के हिंसक रास्तों की वक़ालत करते हैं। हिंसक रास्तों की बात तो हम जानते हैं लेकिन जब वे देश कहते हैं तो साफ़ नहीं होता कि उनका अर्थ क्या है। क्योंकि वे राष्ट्रीयता के नाम पर चल रहे लगभग हर अलगाववादी आन्दोलन का समर्थन करते हैं। कश्मीरी राष्ट्रीयता के नाम पर कश्मीर में जो चीज़े होती रही हैं लगभग उसी स्वभाव की चीज़ें या उनकी अनुगूंज, शिवसेना और मनसे की नीतियों में देखी जा सकती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि मनसे पर कौमरेड के क्या विचार होंगे?
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अर्ध-सामन्ती परिभाषा के चलते माओवादी सिर्फ़ उन्ही इलाक़ो में सक्रिय हो पाते हैं जहाँ अभी भी सामन्ती तत्व बचे हैं। नहीं तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े इलाक़ो से भी बड़े पैमाने पर शहरों में विस्थापन हो रहा है। बीवियों और पूर्वजों के ज़रिये ही बस गाँवों से रिश्ता बच पा रहा है। लेकिन माओवादी गाँव और आदिवासी क्षेत्रों को ही क्रांति का केन्द्र मान रहे हैं। बहुत मुमकिन है वे कुछ इलाक़े आज़ाद करा भी ले जायं मगर उसके बाद क्या? क्या वे आदिवासी या कृषि समाज में ही एक उत्तम न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने लगेंगे? या पूँजी का विकास करेंगे? कैसे करेंगे अनैतिक पूँजी के बरक्स एक नैतिक पूँजी का विकास? इस पर उनके पास कोई सफ़ाई नहीं है।
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एक बात और समझने की है। सम्पन्नता बैठे-ठाले किसी समाज में नहीं आती और न किसी दूसरे के आसरे से आती है। उस समाज के लोगों को ही उद्यम करना होता है। हर समय दूसरों पर उंगुली उठा कर इल्ज़ाम लगाना काफ़ी नहीं होता कि तुम ने मेरे विकास के लिए कुछ नहीं किया। बंजर भूमि से आने वाले मारवाड़ी ज़बरदस्त उद्यमशील होते हैं जबकि मुट्ठी भर दाने फेंक कर खाने-पीने के प्रति निश्चिन्त हो जाने वाले गंगा प्रदेश के लोग शायद सबसे क़ाहिल। अगर गंगा प्रदेश में विकास नहीं हुआ है तो इसके लिए सामाजिक बेड़ियों के अलावा इस बात की भी भूमिका है। और इसके लिए उन्हे मारवाड़ियों, गुजरातियों यहाँ तक के तक़्सीम के बाद शरणार्थियों के रूप में आए और अब बेहद सम्पन्न पंजाबियों को दोषी नहीं ठहराना चाहिये; कि वे हमारा शोषण करते हैं। मुश्किल असल में ये है कि गंगा प्रदेश के लोग, या कोई और दूसरे लोग जो इस बीमारी का शिकार हैं, स्वयं अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं का ठीक से शोषण नहीं करते। यहाँ शोषण का प्रयोग भूल से नहीं जानबूझ कर किया गया है; उसके सकारात्मक अर्थ में।
भौतिक उन्नति और सांसारिक सम्पदा की आकांक्षाओ की पूर्ति, करुणा व त्याग जैसे आध्यात्मिक मूल्यों के रास्ते न होगी, स्वार्थ सिद्धि से ही होगी। सन्तोष का धन चाहिये, तो मार्क्स का नहीं गाँधी के ग्राम स्वराज का रास्ता देखिये। मगर उसके अलग हाहाकार हैं। बुद्ध की तरह मध्यमार्ग दिखाने वाला कौन है?
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क्रांतिकारियों की कार्यपद्धति में दो दौर देखने में आते हैं। एक जब कि वे स्थापित सत्ता का विरोध कर रहे होते हैं तो वे धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल से लेकर हिंसक कार्रवाइयों तक में संलग्न होते हैं और समाज में असंतोष को बढ़ावा देते हुए गृह-युद्ध की स्थिति की ओर खींचते जाते हैं। दूसरा दौर तब आता है जब वे, जिन भी कारणों के चलते, सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हैं। इस दौर में वे ये मानकर चलते हैं कि वे और सिर्फ़ वे ही, जनता और उसकी आंकाक्षाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं। इसलिए ऐसी किसी भी आवाज़ का वो दमन करने लगते हैं जो उनकी समझ के ख़िलाफ़ हो। धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल जैसी शांतिपूर्ण तरीक़ों का भी हिंसक दमन किया जाता है। इस के अनगितन उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद हैं। इन दोनों दौरों में एक चीज़ अलबत्ता ज़रूर समान रहती है, वो है उनके सही होने, और सब कुछ जानने का एहसास।
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म़ज़े की बात ये है कि अरुंधति स्वयं इस आशंका के प्रति सजग हैं कि जो पार्टी आज जनता के हितों की पैरोकार बनी हुई है, वही पार्टी सत्ता में आते ही अपना चरित्र बदल देगी। लेकिन वे इस भविष्य के डर को दरकिनार कर आज की लड़ाई लड़ना चाहती है। मुझे फिर लगता है कि यह समस्यामूलक है। ये अनुभव से न सीखने जैसा है। और वो भी तब जबकि माओवादी घोषित रूप से अपना उद्देश्य आदिवासी जीवन और जंगल को अक्ष्क्षुण रखना नहीं बल्कि इस देश में नवजनवादी क्रांति करना बताते हैं।
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कैसे आएगी ये नवजनवादी क्रांति? मनुष्य के इतिहास का सबसे उन्नत, सबसे न्यायपूर्ण, सबसे सभ्य समाज बनाने के लिए माओवादी किन शक्तियों को गोलबन्द कर रहे हैं? क्या वो शक्तियां आज के समाज के सबसे उन्नत उत्पादन सम्बन्धों से उपजी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं! वे तो आज की तारीख़ में जो सबसे पिछड़े, सबसे पुरातन उत्पादन सम्बन्धों वाले समाज से आने वाले आदिवासी लोग हैं, छोटे या भूमिहीन किसान हैं। तो फिर जब उन्हे इस पुरातन अवस्था से सामाजिक परिवर्तन की सबसे आगे की पाँत में ले जा कर खड़ा कर दिया जाएगा तो वो कैसे नेतृत्व करेंगे? क्योंकि आज तो आप उन्हे परिवर्तन के पक्ष में नहीं बल्कि परिवर्तन के विरुद्ध गोलबन्द कर रहे हैं?
इसके बरख़िलाफ़ शहरों में, एक नया सर्वहारा पैदा हो रहा है, जो मज़दूर की किसी भी पहचानी हुई परिभाषा में फ़िट नहीं होता। वो जींस और बेसबौल कैप पहनता है, अंगेज़ी बोलता है। वो धर्म, जाति और देश के बन्धनों से लगभग टूट चुका है। वो बीपीओज़ और मौल्स में काम करता है। अख़्बारों और मीडिया में काम करता है। उसके न तो काम के कोई नियत घण्टे हैं और न ही श्रमिक क़ानून के कोई लाभ उसे मिलते हैं। वो व़कील है, डौक्टर है, अध्यापक है, पत्रकार है, गायक है, चित्रकार है, अभिनेता है, लेखक है। अपने उत्पादन के साधनों पर उसका कोई अधिकार नहीं है, और अपने उत्पाद से वो विलगित है। उसके पास खोने के लिए वो सारी चीज़े हैं जो उस ने कर्ज़ लेकर ख़रीदी हैं। शायद उसी के लिए मियां ग़ालिब ने लिखा था:
कर्ज़ की पीते थे मय और समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन।
वो नया मज़दूर है, वो नया सर्वहारा है। लेकिन न वो ये बात जानता है और न ही देश की कोई कम्यूनिस्ट पार्टी, माओवादी तो बिलकुल नहीं।
*इस लेख में अरुंधति के हवाले आउटलुक में छपे उनके हालिया लेख 'वाकिंग विद कौमरेड्स' से हैं।
*कौमरेड गणपति के हवाले २००७ के उनके एक लम्बे साक्षात्कार से हैं।
(समाप्त)
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४
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एक तरफ़ माओवादी हैं जिनके केन्द्रीय नेतृत्व की तलाश पुलिस दिन-रात करती है, और जब वे अपना महाधिवेशन करते हैं जिसमें उनके सारे छोटे-बड़े नेता एक जगह इकट्ठा होते हैं तो किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होती। पूरा पुलिस और गुप्तचर तंत्र बेकार है क्योंकि वे एक ऐसा आदमी भी नहीं खोज पाते जो माओवादियों की इस अधिवेशन का पता-ठिकाना उन तक पहुँचा दे। दूसरी तरफ़ हमारे संसदीय लोकतंत्र के राजनेता हैं जो निर्वाचित होने के पहले और बाद में भी जनता से दस हाथ की दूरी पर रहते हैं। एक्स, वाई, ज़ेड सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ इनकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता है।
एक तरफ़ नेता और जनता में ज़मीनी, ठोस, गहरा रिश्ता है। दूसरी तरफ़ अब हालात ये पहुँच गए हैं कि संसदीय लोकतंत्र के नेता और जनता सिर्फ़ आभासी तल पर रूबरू हो सकते हैं। क्या पहला सम्बन्ध एक ऐसे गुज़रे ज़माने का अवशेष है जो सिर्फ़ आदिवासी इलाक़ो में ही सम्भव है जहाँ मानवीय प्रगति के चिह्न नहीं पहुँचे हैं? और दूसरा उस नए जीवन की पदचाप, जिस में वास्तविक से अधिक आभासी महत्वपूर्ण हो जाएगा?
ये कुछ माँ और बच्चे के सम्बन्ध जैसा है जिसमें माँ से बच्चा उत्तरोत्तर दूर ही होता जाता है; ये ब्रह्माण्ड की उस अवधारणा जैसा है जिस में सब पहले एक सिंगुलैरिटी में सिमटा हुआ था लेकिन अब सब कुछ, एक-दूसरे से दूर भाग रहा है; ये ईश्वर की उन कल्पनाओं जैसा है जिसमें पहले सब कुछ एक ही तत्व में सयुंक्त रहता है और फिर माया उसे जटिल, और जटिलतर बनाती जाती है।
बावजूद इन आकर्षक उपमाओं के, हमारी गहरी से गहरी कामनाओं की प्रेरणा इसी संयुक्त भाव की सरलता, इसी एकत्व, इसी तौहीद, इसी ज़मीनी, और ठोस रिश्ते की ओर होती है। मगर अजीब बात ये है कि इन आन्तरिक प्रेरणाओं और हमारे संघर्ष के बावजूद, ज़माना है कि विविधता और जटिलता और विलगाव की दिशा में भागा चला जा रहा है।
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यह पूछने पर कि क्या वे अपना आन्दोलन अहिंसा के साथ नहीं चला सकते, कौमरेड गणपति पलट कर पूछते हैं कि ये आप को राज्य से पूछना चाहिये कि वो प्रतिरोध के शांतिपूर्ण तरीक़ो का हिंसक दमन क्यों करते हैं? शांतिपूर्ण जुलूसों पर लाठीचार्ज और फ़ायरिंग क्यों करते हैं? हड़ताल करने वालों को जेलों में ठूंस कर यंत्रणा क्यों देते हैं? वे पूछते हैं कि वे क्यों पुलिस वालों को क्यों अनुमति देते हैं कि वे औरतों से बलात्कार करें? सही सवाल हैं!
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मगर दूसरी जगह गणपति साफ़ कहते हैं कि वे एक बड़े भूखण्ड को युद्ध क्षेत्र में तब्दील करना चाहते हैं- "The general direction of the Congress is to intensify the people’s war and to take the war to all fronts. Concretely it decided to take the guerrilla war to a higher level of mobile war in the areas where guerrilla war is in an advanced stage and to expand the areas of armed struggle to as many states as possible. The destruction of the enemy forces has come into the immediate agenda in these areas without which it is very difficult to consolidate our gains or to advance further. Likewise, there is an immediate need to transform a vast area into the war zone so that there is enough room for manoeuvrability for our guerrilla forces."
हालांकि इस युद्धघोष का आधार यही समझ है कि बिना लड़े अन्याय से मुक्ति नहीं है। ये एक केन्द्रीय सवाल है जो आम मध्यवर्ग को व्यथित करता है, कि क्या अन्याय से मुक्ति बिना युद्ध के सम्भव नहीं? मार्क्सवादी मानते हैं कि नहीं। मेरे ख़्याल से गाँधी के बाद से इस समझ में विश्वस्तर पर अन्तर आया ज़रूर है। लेकिन यहाँ पर यह भी याद रखना चाहिये कि हिंसा प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य के भी स्वभाव का एक अविभाज्य हिस्सा है। पर मुश्किल तब होती है जब माओवादी राज्य की आलोचना का मुख्य आधार हिंसा को ही बनाते हैं, और उसे ही ख़त्म करने के लिए युद्ध छेड़े हुए हैं। मैं यहाँ जा कर उलझता हूँ कि अगर माओवादी सफल हो भी गए तो क्या नए समाज में हिंसा का कोई स्थान न होगा? हिंसा अपने आप में कोई चीज़ तो नहीं है ना.. वो तो अन्याय करने का एक हथियार है... और अगर माओवादी समेत, कृष्ण व मोहम्मद आदि महापुरुषों को स्मरण किया जाय तो न्याय करने का भी।
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इन सारे महापुरुषों को नमन है लेकिन ये सच है कि आग से आग को नहीं बुझाया जा सकता। इस मामले में बुद्ध, ईसा, और गाँधी का मुरीद हूँ; हिंसा से हिंसा का शमन नहीं होता। न तो राज्य हिंसा से माओवाद का नाश कर सकता है और न ही माओवाद हिंसा से अन्याय का अंत कर के न्याय के युग का सूत्रपात कर सकते हैं। हिंसा से बस अल्पकालीन सत्ता का परिवर्तन मुमकिन है, जो हमने होते हुए देखा भी है। अहिंसा वाली डगर लम्बी है लेकिन उम्मीद की जाय कि पक्की है।
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कौमरेड गणपति अपने देश को साम्राज्यवाद के चंगुल से छुड़ाने के लिए सत्ता को हासिल करने के हिंसक रास्तों की वक़ालत करते हैं। हिंसक रास्तों की बात तो हम जानते हैं लेकिन जब वे देश कहते हैं तो साफ़ नहीं होता कि उनका अर्थ क्या है। क्योंकि वे राष्ट्रीयता के नाम पर चल रहे लगभग हर अलगाववादी आन्दोलन का समर्थन करते हैं। कश्मीरी राष्ट्रीयता के नाम पर कश्मीर में जो चीज़े होती रही हैं लगभग उसी स्वभाव की चीज़ें या उनकी अनुगूंज, शिवसेना और मनसे की नीतियों में देखी जा सकती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि मनसे पर कौमरेड के क्या विचार होंगे?
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अर्ध-सामन्ती परिभाषा के चलते माओवादी सिर्फ़ उन्ही इलाक़ो में सक्रिय हो पाते हैं जहाँ अभी भी सामन्ती तत्व बचे हैं। नहीं तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े इलाक़ो से भी बड़े पैमाने पर शहरों में विस्थापन हो रहा है। बीवियों और पूर्वजों के ज़रिये ही बस गाँवों से रिश्ता बच पा रहा है। लेकिन माओवादी गाँव और आदिवासी क्षेत्रों को ही क्रांति का केन्द्र मान रहे हैं। बहुत मुमकिन है वे कुछ इलाक़े आज़ाद करा भी ले जायं मगर उसके बाद क्या? क्या वे आदिवासी या कृषि समाज में ही एक उत्तम न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने लगेंगे? या पूँजी का विकास करेंगे? कैसे करेंगे अनैतिक पूँजी के बरक्स एक नैतिक पूँजी का विकास? इस पर उनके पास कोई सफ़ाई नहीं है।
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एक बात और समझने की है। सम्पन्नता बैठे-ठाले किसी समाज में नहीं आती और न किसी दूसरे के आसरे से आती है। उस समाज के लोगों को ही उद्यम करना होता है। हर समय दूसरों पर उंगुली उठा कर इल्ज़ाम लगाना काफ़ी नहीं होता कि तुम ने मेरे विकास के लिए कुछ नहीं किया। बंजर भूमि से आने वाले मारवाड़ी ज़बरदस्त उद्यमशील होते हैं जबकि मुट्ठी भर दाने फेंक कर खाने-पीने के प्रति निश्चिन्त हो जाने वाले गंगा प्रदेश के लोग शायद सबसे क़ाहिल। अगर गंगा प्रदेश में विकास नहीं हुआ है तो इसके लिए सामाजिक बेड़ियों के अलावा इस बात की भी भूमिका है। और इसके लिए उन्हे मारवाड़ियों, गुजरातियों यहाँ तक के तक़्सीम के बाद शरणार्थियों के रूप में आए और अब बेहद सम्पन्न पंजाबियों को दोषी नहीं ठहराना चाहिये; कि वे हमारा शोषण करते हैं। मुश्किल असल में ये है कि गंगा प्रदेश के लोग, या कोई और दूसरे लोग जो इस बीमारी का शिकार हैं, स्वयं अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं का ठीक से शोषण नहीं करते। यहाँ शोषण का प्रयोग भूल से नहीं जानबूझ कर किया गया है; उसके सकारात्मक अर्थ में।
भौतिक उन्नति और सांसारिक सम्पदा की आकांक्षाओ की पूर्ति, करुणा व त्याग जैसे आध्यात्मिक मूल्यों के रास्ते न होगी, स्वार्थ सिद्धि से ही होगी। सन्तोष का धन चाहिये, तो मार्क्स का नहीं गाँधी के ग्राम स्वराज का रास्ता देखिये। मगर उसके अलग हाहाकार हैं। बुद्ध की तरह मध्यमार्ग दिखाने वाला कौन है?
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क्रांतिकारियों की कार्यपद्धति में दो दौर देखने में आते हैं। एक जब कि वे स्थापित सत्ता का विरोध कर रहे होते हैं तो वे धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल से लेकर हिंसक कार्रवाइयों तक में संलग्न होते हैं और समाज में असंतोष को बढ़ावा देते हुए गृह-युद्ध की स्थिति की ओर खींचते जाते हैं। दूसरा दौर तब आता है जब वे, जिन भी कारणों के चलते, सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हैं। इस दौर में वे ये मानकर चलते हैं कि वे और सिर्फ़ वे ही, जनता और उसकी आंकाक्षाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं। इसलिए ऐसी किसी भी आवाज़ का वो दमन करने लगते हैं जो उनकी समझ के ख़िलाफ़ हो। धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल जैसी शांतिपूर्ण तरीक़ों का भी हिंसक दमन किया जाता है। इस के अनगितन उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद हैं। इन दोनों दौरों में एक चीज़ अलबत्ता ज़रूर समान रहती है, वो है उनके सही होने, और सब कुछ जानने का एहसास।
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म़ज़े की बात ये है कि अरुंधति स्वयं इस आशंका के प्रति सजग हैं कि जो पार्टी आज जनता के हितों की पैरोकार बनी हुई है, वही पार्टी सत्ता में आते ही अपना चरित्र बदल देगी। लेकिन वे इस भविष्य के डर को दरकिनार कर आज की लड़ाई लड़ना चाहती है। मुझे फिर लगता है कि यह समस्यामूलक है। ये अनुभव से न सीखने जैसा है। और वो भी तब जबकि माओवादी घोषित रूप से अपना उद्देश्य आदिवासी जीवन और जंगल को अक्ष्क्षुण रखना नहीं बल्कि इस देश में नवजनवादी क्रांति करना बताते हैं।
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कैसे आएगी ये नवजनवादी क्रांति? मनुष्य के इतिहास का सबसे उन्नत, सबसे न्यायपूर्ण, सबसे सभ्य समाज बनाने के लिए माओवादी किन शक्तियों को गोलबन्द कर रहे हैं? क्या वो शक्तियां आज के समाज के सबसे उन्नत उत्पादन सम्बन्धों से उपजी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं! वे तो आज की तारीख़ में जो सबसे पिछड़े, सबसे पुरातन उत्पादन सम्बन्धों वाले समाज से आने वाले आदिवासी लोग हैं, छोटे या भूमिहीन किसान हैं। तो फिर जब उन्हे इस पुरातन अवस्था से सामाजिक परिवर्तन की सबसे आगे की पाँत में ले जा कर खड़ा कर दिया जाएगा तो वो कैसे नेतृत्व करेंगे? क्योंकि आज तो आप उन्हे परिवर्तन के पक्ष में नहीं बल्कि परिवर्तन के विरुद्ध गोलबन्द कर रहे हैं?
इसके बरख़िलाफ़ शहरों में, एक नया सर्वहारा पैदा हो रहा है, जो मज़दूर की किसी भी पहचानी हुई परिभाषा में फ़िट नहीं होता। वो जींस और बेसबौल कैप पहनता है, अंगेज़ी बोलता है। वो धर्म, जाति और देश के बन्धनों से लगभग टूट चुका है। वो बीपीओज़ और मौल्स में काम करता है। अख़्बारों और मीडिया में काम करता है। उसके न तो काम के कोई नियत घण्टे हैं और न ही श्रमिक क़ानून के कोई लाभ उसे मिलते हैं। वो व़कील है, डौक्टर है, अध्यापक है, पत्रकार है, गायक है, चित्रकार है, अभिनेता है, लेखक है। अपने उत्पादन के साधनों पर उसका कोई अधिकार नहीं है, और अपने उत्पाद से वो विलगित है। उसके पास खोने के लिए वो सारी चीज़े हैं जो उस ने कर्ज़ लेकर ख़रीदी हैं। शायद उसी के लिए मियां ग़ालिब ने लिखा था:
कर्ज़ की पीते थे मय और समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन।
वो नया मज़दूर है, वो नया सर्वहारा है। लेकिन न वो ये बात जानता है और न ही देश की कोई कम्यूनिस्ट पार्टी, माओवादी तो बिलकुल नहीं।
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*इस लेख में अरुंधति के हवाले आउटलुक में छपे उनके हालिया लेख 'वाकिंग विद कौमरेड्स' से हैं।
*कौमरेड गणपति के हवाले २००७ के उनके एक लम्बे साक्षात्कार से हैं।
(समाप्त)
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४
अरुंधति मानती हैं कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है। ठीक है। लेकिन ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है, जिसमें सवर्णों की सत्ता की रक्षा के लिए नहीं दलितों और पिछड़ों को सत्ता में शामिल करने के लिए क़ानून बनते हैं? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक सत्ता पर दलित राजनीति का वर्चस्व है और 'सवर्ण हिन्दू राज्य' ब्राह्मणों को दलितों की जीहुज़ुरी और चरणवन्दना तक लगा देखते हुए भी निरपेक्ष बना रहता है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य जिसमें देश की अनेक समस्याओं के लिए ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों को निरन्तर न सिर्फ़ दोषी ठहराया जाता है बल्कि गरियाया भी जाता है, और हर समझदार ब्राह्मण अपनी परम्परा और जाति के प्रति अपराधबोध से ग्रस्त रहता है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र के वो विशेष अधिकारों के विपरीत, ब्राह्मण की अवमानना पर कोई विशेष अपराध नहीं बनता जबकि दलित के सम्मान की रक्षा के लिए हर सम्भव जगह बनाई जा रही है? अरुंधति जैसी विद्वान और सचेत महिला भी इस अन्तर को देख पाने और चिह्नित करने में क्यों चूक जाती हैं कि इस राज्य में अब अगर कोई बायस है तो अब दलितों और पिछड़ों के पक्ष में।
इस 'सवर्ण हिन्दू राज्य' पर अरुंधति समेत सभी माओवादी एक दूसरे आकलन से आरोप है कि इस देश को साम्राज्यवादी शक्तियां यानी अमरीका आदि और उनके दलाल यानी सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, अज़ीम प्रेम जी, अम्बानी बंधु, टाटा आदि चला रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो क्या वे मानते हैं कि इस सवर्ण हिन्दू आग्रह की जड़ अमरीका तक जाती है? और क्या अरुंधति ये मानती हैं कि टाटा, सोनिया और मनमोहन हो सकते हैं पारसी, ईसाई और सिख मगर चिंता सवर्ण हिन्दू हितों की करते हैं? और अगर अरुंधति ये मानती हैं कि अम्बानी अपनी नीतियां तय करते वक़्त हिन्दू हित की चिंता करते हैं तो मैं उन पर सिर्फ़ हँस सकता हूँ, और कुछ नहीं।
असल में ये उनकी समझ का दोष है जो राज्य के चरित्र और समाज के चरित्र में भेद नहीं कर पा रहीं। न तो यहाँ की पूँजी का कोई सवर्ण और हिन्दू चरित्र है और न ही राज्य का। लेकिन राज्य और पूँजी जिस समाज में व्यवहार कर रहे हैं वो एक लम्बे समय तक सवर्णों के प्रभुत्व में रहा है। लेकिन इस अवधि में भी मुस्लिम शासन का वह छै सौ साल का और दो सौ साल का वह काल है जब कि अंग्रेज़ प्रबल रहे। फिर भी यह सच है कि आज भारतीय समाज की मुख्यधारा में एक सवर्ण हिन्दू तबक़े की प्रबल उपस्थिति है। और अगर समाज में सवर्ण हिन्दू प्रबल हैं भी तो उसको लेकर इतना विचलित होने की क्या ज़रूरत है? सवर्ण हिन्दू भी इसी समाज का अंग हैं और उनको भी फलने-फूलने का पूरा हक़ है। हज़ारों सालों से उन्होने अपने प्रभुत्व का जो लाभ लिया उस की ख़ानापूरी एक सकारात्मक भेदभाव (आरक्षण) के ज़रिये की जा रही है जिससे एक दूसरी सूरत पैदा हो रही है। उत्तर प्रदेश के लाखों ब्राह्मण परिवार ऐसे हैं जिनमें जवान बेटी-बेटों के पास न नौकरी है न धंधा। वे अरुंधति के इस आरोप पर मुहँ बा देंगे। उनके अनुसार अगर उनको अनुसूचित जाति या जनजाति का प्रमाणपत्र मिल जाता तो उनकी समस्या हल हो जाती।
अरुंधति के आरोप का जवाब एक जवाबी आरोप हो सकता है। हो क्या सकता है, है। वो ये कि इस देश को साम्राज्यवादी देशों में बैठी चर्च और चर्च की संस्थाएं, इस देश में उनके दलालों के ज़रिये चला रही हैं। कांग्रेस और बड़े मीडिया घरानो से लेकर बड़े पूँजीपतियों में उनकी पैठ है। सोनिया गाँधी उसकी मुख्य एजेंट हैं, जिन्होने कांग्रेस पार्टी की सभी मुख्य ज़िम्मेदारियां ईसाईयों को सौंप रखी हैं। प्रणय राय और सुज़ाना अरुंधति राय उनके सेनापति हैं जो अपनी रिश्तेदारी ज़ाहिर होने देते हैं न उनकी ईसाईयत कि कहीं उनकी साज़िश खुल न जाय? मार्क्सवादी और ख़ासकर माओवादी भी इस साज़िश में शामिल हैं। ये जहाँ सक्रिय होते हैं, धर्म परिवर्तन होने लगते हैं। चर्च की एक शाखा है जो खुले तौर पर इस तरह के माओवादी आन्दोलनों की वक़ालत करती रही है। अधिकतर माओवादी नेता ईसाई हैं। इन सब तथ्यों की रौशनी में ये सिद्ध होता है कि भारतीय राज्य (और पूँजी भी, उसे भी लपेटने में क्या जाता है) एक कट्टरवादी ईसाई संस्था है। इस का क्या जवाब है? यहाँ आप चाहें तो हँस सकते हैं।
मुसलमानों पर अत्याचार की भी हर दम दुहाई देने वालों को ये समझना चाहिये इस देश के विभाजन के वक़्त मुसलमानों का अभिजात वर्ग, जो ईरान, तूरान आदि से आया था और जिसने इस देश में छै सौ सालों तक शासन किया था। अंग्रेज़ों के जाने के बाद की एक जनतांत्रिक व्यवस्था में एक अल्पसंख्यक की कम महत्व की भूमिका में धकेल दिए जाने को तैयार नहीं था। और इसीलिए उसने अपने लिए एक नए, ख़ास मुसलमानों का राष्ट्र बनाने का रास्ता चुन लिया और पूरे देश से निकल-निकल कर वहाँ चला गया। बच कौन रहा? बचे वे रहे जो किसी बाहरी देश से नहीं आए थे। इसी देश में हज़ारों सालों से रह रहे थे, शायद शूद्र या दलित रूप मे और फिर बौद्धों के रूप में। वे तब भी पिछड़े हुए थे और आज भी पिछड़े हुए हैं। वे राज्य या समाज की किसी साज़िश की तहत पिछाड़े नहीं गए हैं। मुसलमानों के अभिजात वर्ग के जिस हिस्से ने इसी देश में रहने का चुनाव किया, उसके प्रति न तो राज्य कोई भेदभाव करता है और न ही समाज। और वे किस लिहाज़ से किसी से पीछे हैं? क्या एक गहरे तौर पर सवर्ण, हिन्दू, साम्प्रदायिक समाज फ़िल्मों में ख़ानों और क्रिकेट में पठानों को लेकर इतना लड़िया सकता है?
हिन्दू-मुस्लिम तनाव की राजनीति की असफलता ही इसका सबसे बड़ा सबूत है कि तथाकथित हिन्दुत्व न तो बहुसंख्यक लोगों के मानस में है और न राज्य के चरित्र में। अगर ऐसा होता तो मस्जिद तोड़ने के लिए न इतना आन्दोलन करना पड़ता और न एक मन्दिर बनाने के लिए इतना इंतज़ार। उल्लेखनीय है कि तुर्की में पुराने गिरजाघरों को मस्जिदों में बदलने में न कोई आन्दोलन चलाना पड़ा था और न कोई देर लगी थी। यहाँ आन्दोलन करना पड़ा क्योंकि लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, उन्हे उत्तेजक भाषणों से भड़काना पड़ा। और उतने सब के बावजूद भाजपा कभी बहुमत न पा सकी और अब वापस मध्यमार्ग तलाश रही है। दंगो के हालात और परिणाम के आधार पर चरित्र आकलन करना भूल है- दंगे अस्थायी पागलपन होते हैं -टेम्परेरी मैडनेस। अपराधियों को उचित दण्ड मिलने में देर, किसी राज्य के चरित्र का द्योतक नहीं बल्कि तात्कालिक निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचार के लक्षण हैं।
समस्याए है; कमज़ोरों, अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय होता रहा है, मगर कोई भी परिवर्तन रातों-रात नहीं होता। बीमार को चंगा करने के लिए बिजली के झटके नहीं, औषधि चाहिये होती है। और पिछड़ापन सिर्फ़ शूद्रों, दलितों की सोच में ही नहीं, सवर्णों की सोच में भी है। समाज में उसकी उपस्थिति और आम जीवन में उसके व्यवहार को राज्य के चरित्र की तरह चिह्नित कर देना, मुझे तो बचकाना चिंतन लगता है। और उस पिछड़ेपन को बदलने की ताक़त किसी क्रांतिकारी पार्टी में नहीं, बल्कि सिर्फ़ पूँजीवाद में है। क्रांतिकारी दलों का हिंसक हस्तक्षेप जातीय नरसंहारों को जन्म देता है। जबकि बिना किसी बहस, किसी जनजागरण अभियान, बिना किसी धरना, जुलूस, प्रदर्शन और बिना किसी नरसंहार के शहर में विस्थापित हो कर दलित ठेकेदारी कर रहे हैं और तमाम सवर्ण उनके नीचे मज़दूरी कर रहे हैं। माओवादियों का बदलाव का रास्ता ज़बरदस्ती का रास्ता है, जबकि पूँजीवाद (भले ही दलाल) सहज रास्ता है।
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एक समय में मेरा भी ये विचार बना था कि आतंकवादी इस भ्रष्ट संसार में अकेले ऐसे लोग बचे हैं जो ईमा्न और सच्चरित्रता से अपने जीवन को निर्देशित कर रहे हैं, जबकि पूँजी उन सारे तत्वों को पोषित कर रही है जिन्हे इब्राहिमी परम्परा में सेवेन डेडली सिन्स के बतौर पहचाना गया है। हालांकि अब मेरा मानना है कि वे सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रतिगामी शक्तियां है जो ख़ून-ख़राबे के सिवा कुछ नहीं लायेंगी और न ही वे किसी और चीज़ के क़ाबिल हैं क्योंकि सिर्फ़ अपने को ही सही समझने का बोध उनके अन्दर इतना तगड़ा जमा हुआ है कि वे सारे उन लोगों को जो उनके रास्ते पर नहीं चल रहे पथभ्रष्ट और इसीलिए मारे जाने योग्य घोषित कर देते हैं। पाकिस्तान में आजकल जो मुसलमान ही मुसलमानों की हत्या कर रहे हैं, वह इसी चिन्तन का परिणाम है।
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सी पी आई, माओइस्ट के महासचिव कौमरेड गणपति भारत के शासक वर्ग को प्रतिक्रियावादी कहते हैं जो प्रगतिशील का विलोम है और जिसका अर्थ होता है आगे बढ़ने के बजाय पीछे की अवस्था में लौटने वाला। मैं समझ नहीं पाता कि किस परिभाषा से माओवादी अपने आप को प्रगतिशील और राज्य को प्रतिक्रियावादी मानते हैं। यहाँ तक कि गुजरात में मुस्लिमों के नरसंहार के आरोपी मोदी भी अपनी आर्थिक नीतियों में प्रतिक्रियावादी नहीं कहे जा सकते क्योंकि वो उस पूँजीवाद को बढ़ावा दे रही हैं जो जाति, धर्म और राष्ट्रीयता जैसे बनावटी विभाजकों को गला देता है। जबकि इस्लामी आतंकवादी जो शरिया को दुबारा लागू करने के लिए हर जगह संघर्ष कर रहे हैं, उन्हे कौमरेड प्रगतिशील शक्ति मानते हैं?
कौमरेड गणपति आतंकवादियों की पक्षधरता एक अलग नज़रिये से करते हैं.. कौमरेड मानते हैं कि तालिबान, अल क़ाएदा आदि प्रगतिशील शक्तियां हैं क्योंकि वे अमरीकी साम्राज्यवाद से संघर्ष कर रहे हैं और उसके नाश में क्रांतिकारी शक्तियों का सहयोग कर रहे हैं। भूमण्डलीय साम्राज्यवाद के विनाश से इस्लामी जनता अपनी दकियानूसी विचारधारा से जाग उठेगी और वर्गहीन समाज बनाने की ओर बढ़ चलेगी। पता नहीं कौमरेड ये क्यों भूल जाते हैं कि इस्लाम ख़ुद एक वक़्त में साम्राज्यवादी विचारधारा था और तब इस आर्थिक साम्राज्यवाद का नामोनिशां भी नहीं था। ये भूमण्डलीय साम्राज्यवाद, पुराने स्वरूप को नष्ट कर रहा है तो कौमरेड को लग रहा है कि पुराना प्रगतिशील है, क्रांतिकारी है और नया प्रतिक्रियावादी। कैसे सर के बल खड़े हैं कौमरेड?
(जारी)
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३
सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार भारत में आज जो चार प्रकार के जन पाए जाते हैं – निषाद (औस्ट्रिक; कोल, भील, शबर), किरात (मंगोलोइड, पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले चीनी तिब्बती भाषा मूल के), द्रविड़ (दास, द्रविड़, नाग) और आर्य (भारोपीय)- उन में आदिवासी निषाद सब से पुराने हैं। किरात, द्रविड़ और आर्य जनों में लम्बे समय तक हुई वर्ण संकरता के चलते ये तीनों संस्कृतियां और जन आपस में घुल मिल गए हैं। लेकिन निषाद संस्कृति ने जंगल के जीवन में ख़ुद को सीमित कर के अपने आदिम स्वरूप को अब तक बनाए रखा है। मुख्यधारा ने उनके साथ अन्याय और अनदेखा किया है। लेकिन आज के पहले कभी ऐसा मौक़ा नहीं आया कि आदिवासी जीवन, और मुख्यधारा का समाज ‘इतना’ आमने-सामने आ गया हो। ये पूँजीवाद की विराटता के चलते हो रहा है। इतना तो तय है कि वो कटे हुए नहीं रह सकते। बाहर के समाज ने उन्हे बुरी तरह से न सिर्फ़ घेर लिया है बल्कि अपनी लड़ाई में फंसा भी लिया है। इस लड़ाई में पूँजीवाद जीते या माओवादी, आदिवासी जीवन अब पहले वाली स्थिति में बना नहीं रह सकता। वो बदल चुका है। सवाल ये है कि वो अपने पर्यावरण को कितना बचाए रख पाते हैं जिसके साथ वो एकता महसूस करते हैं?
माओवादियों के लिए आदिवासियों को उनका पर्यावरण, उनका जंगल, उनकी ज़मीन दिला देना उनका लक्ष्य नहीं है। वे इस देश में न्यू डेमोक्रेसी क़ायम करना चाहते हैं, क्योंकि यह देश अभी भी अर्ध-सामंती, अर्ध औपनिवेशिक अवस्था में फंसा हुआ है। न्यू डेमोक्रेसी के बाद वो पूँजी का विकास करके समाजवाद के रास्ते पर बढ़ चलेंगे और मार्क्स और माओ के सपने का समाज बनाएंगे। न तो उनके पास न्यू डेमोक्रेसी की बहुत कोई व्यावहारिक धारणा है और न ही पूँजी के विकास को लेकर भी कोई ठोस योजना। न जाने क्यों वे ये भी नही देख पाते कि राज्य के द्वारा पूँजी के विकास का मॉडल बुरी तरह नाकाम हो चुका है और चीन तक ने बिना लोकतंत्र लाए पूँजी के लिए खुला बाज़ार खोल दिया है। मज़े की बात ये सोचने की है अगर माओवादी चीन में होते तो क्या करते? क्योंकि वहाँ तो भारत के पासंग बराबर भी लोकतंत्र नहीं है और पूँजी के विकास के लिए जनता की यथास्थिति का दमन वहाँ जिस तरह होता है उसे जान कर सिंगूर के किसान बुद्धदेब बाबू के प्रति अपने प्रतिरोध को लेकर कुछ अपराधबोध पाल सकते हैं।
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सर्वहारा वर्ग के पक्ष से विकास करने वाली व्यवस्थाओं का रेकार्ड बहुत रक्तरंजित रहा है। और मज़े की बात ये है कि सत्तर साल तक सोवियत संघ में समाजवाद रहने के बाद जब वहां लोकतंत्र आया तो ऐसा नहीं था कि वहाँ वर्ग विभेद बिला चुके थे? वे समाज में मौजूद बने रहे, भले ही सुप्तावस्था में? ये विचित्र बात कैसे सम्भव हुई? इसका क्या अर्थ है? तो इतना सब प्रपंच किसलिए, जब मनुष्य के मिज़ाज में जब कोई परिवर्तन आना ही नहीं है?
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सलवा जुडुम को सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की एक रपट के आधार पर बन्द करने का आदेश दे दिया जिसमें उसके ऊपर व्यापक स्तर पर मानवाधिकार हनन का आरोप था। लेकिन क्या माओवादी मानवाधिकार हनन के आरोप से मुक्त हो सकते हैं? क्या वे मानवाधिकार में विश्वास करते हैं? क्या है क्या मानवाधिकार? दोषी को सज़ा देने के प्रावधान हर व्यवस्था में है। आरोपी के दोष साबित होने के पहले तक दोषी के अधिकार के इर्द-गिर्द ही मानवाधिकारों का ताना-बाना है। मगर माओवादी तो इसी बात को दोष मानते हैं कि अगर कोई उनको लेवी देने से इन्कार करे या उनकी लड़ाई में उनका साथ न दे।
मज़े की बात ये भी है कि जो लोग देश में लोकतंत्र न होने की दुहाई देते नहीं थकते वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुडुम पर बंदिश के आदेश को, राज्य और व्यवस्था के चरित्र का आकलन करते वक़्त उसे शामिल करना बिलकुल गोल कर जाते हैं। वो ये भी नहीं देखते कि माओवादियों से कैसे निबटा जाए इस बात पर भी सरकार एकमत नहीं है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, अलग-अलग मंत्री, यहाँ तक कि सेना प्रमुख भी अलग राय रखते हैं और उसे खुले मंच से बोलते हैं। ये स्वप्नदर्शियों के स्वप्नों का जनतंत्र भले न हो पर ये जनतंत्र के लक्षण नहीं है तो और किसके है?
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लेकिन शायद जब वे कहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र नहीं आया तो वे जहाँ हैं, उसको केंद्र में रखकर बोलते हैं और जब हम उसे सुनते हैं तो हम जहाँ है, उस में रहकर सुनते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। शहरों में अपेक्षाकृत लोकतंत्र काफ़ी मज़बूत है और गाँव में लोकतंत्र अभी दूर के ढोल हैं, और सुहाने वाली बात तो दीगर ही है।
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लेकिन हर समाज में हर काल में ऐसे लोग होते हैं जो हर बात का नकारात्मक पहलू ही देखते हैं, उन्हे हमेशा लगता है कि दुनिया से बद से बदतर होती जा रही है। वे बार-बार ये कहते हैं, 'सब कुछ सड़ रहा है, खोखला हो रहा है, मर रहा है'। वो कहते हैं, 'पहले का आम बड़ा मीठा होता था, अब तो आम खाने लायक नहीं रहा, आम में स्वाद ख़त्म हो रहा है'। बिना इस बात को ख़्याल में लाए कि इस देश में जनतंत्र था कब? जो सड़ कर, खोखला हो गया? अगर आदिवासियों के बीच में मैलन्यूट्रीशन है, एबजेक्ट पावर्टी है तो वो क्या अभी दस-बीस साल का परिणाम है? वो तो हज़ारों सालों से है। और इसलिए है कि वहाँ पूँजीवाद कह लीजिये, विकास कह लीजिये, जो नाम भी है उस कल्याणकारी प्रभाव का, वो नहीं पहुँचा है।
लेकिन अगर सरकार रोड बनाने जाये, मिसाल के लिए, और बिना किसानों को उचित प्रतिदान दिए कुछ खेतो को अधिग्रहीत कर ले तो वे इस का प्रतिरोध करते हुए कुछ ऐसा सुर ले लेते हैं कि जिसमें उचित प्रतिदान का आन्दोलन, रोड की मुख़ालफ़त का आन्दोलन बन जाता है। पूँजीवादी प्रगति के तमाम प्रतीक चिह्न क्रिकेट स्टेडियम, शौपिंग मौल्स, एअरपोर्ट, सब के विरुद्ध किसानी जीवन के चिह्नों को, जन संस्कृति के रूप में भिड़ा दिया जाता है। उचित मुआवज़े का आन्दोलन, पूँजीवादी विकास के विरोध का आन्दोलन बन जाता है। फिर शिकायत ये लगातार बनी रहती है कि देखिये कितना पिछड़ापन, कितनी ग़रीबी है, कितना कुपोषण है। चालीस बरस तक तो समाजवादी राह पर चलकर कहीं नहीं पहुँचने के बाद अभी कुछ विकास होना शुरु हुआ है। सब कुछ पलक झपकते सम्भव नहीं क्योंकि ये पूरा विकास ट्रिकल डाउन सिद्धान्त पर धरा हुआ है। विकास की दूसरी अवधारणा, मैं भी चाहता हूँ कि हो, कोई तो विकल्प हो जिसमें कम से कम तक्लीफ़ से अधिक से अधिक लोगों को समृद्ध किया जा सके। ऐसा कोई विकल्प बनना ज़रूर चाहिये लेकिन वो सिर्फ़ विरोध और प्रतिरोध से नहीं बनेगा, हिंसा से तो बिलकुल नहीं।
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अमरीका और योरोप में पूँजीवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध एक उन्नत स्तर का है। वहाँ पूँजी का विकास हो चुका है। वहाँ का समाज को अगले स्तर में जाने के लिए बेचैन है। लेकिन भारत जैसे देश में पूँजी का विरोध का अर्थ है विकास का विरोध, प्रगति का विरोध। इस प्रस्थापना में एक आधारभूत अड़चन है: पर्यावरण। उसका क्या हल है, मैं नहीं जानता। लेकिन जो इस बात को मुझसे बेहतर समझते हैं या समझने का दावा करते हैं, वो माओवाद के पाले में कैसे जा कर खड़े हो सकते हैं जबकि माओवाद की पर्यावरण के प्रति कोई घोषित नीति नहीं है?
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माइन का विरोध करने वालों ने पूरे जंगल को लैंडमाइनो से भर दिया है। ये जंगल की, पर्यावरण की रक्षा हो रही है या उसे युद्ध के उन्माद में एक दूसरे अफ़्ग़ानिस्तान में बदला जा रहा है? इस पर मीर तक़ी मीर का एक शेर याद आता है:
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माइन का विरोध करने वालों ने पूरे जंगल को लैंडमाइनो से भर दिया है। ये जंगल की, पर्यावरण की रक्षा हो रही है या उसे युद्ध के उन्माद में एक दूसरे अफ़्ग़ानिस्तान में बदला जा रहा है? इस पर मीर तक़ी मीर का एक शेर याद आता है:
अब की जुनूँ में, फ़ासला शायद न कुछ रहे,
दामन के चाक का और गरीबाँ के चाक का।
(दामन का अर्थ कमरे के नीचे पहनने का वस्त्र होता है, आँचल नहीं जैसा कि आम समझ है, और गरीबाँ तो आप जानते ही हैं)
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अरुंधति की रपट से पता चलता है कि जब आदिवासी गाँव में लोग रेडियो पर सुनते हैं कि नितीश और गुरुजी 'नक्सल तो हमारे भटके हुए बच्चे हैं' जैसी बात कर रहे हैं तो वे हँस पड़ते हैं क्योंकि ‘वे जानते हैं कि उनके नाख़ून और दाँत निकालने के कार्यक्रम से आप घड़ियां मिला सकते हैं’। ये हैरानी की बात नहीं है कि आदिवासी ऐसे किसी नेता पर यक़ीन नहीं करते जो उनके प्रति मुलायमियत बरत रहा हो। मगर ऐसा क्यों है? क्या वे अपने अनुभव से ऐसा जानते हैं जैसे हम गहरे तौर पर जानते हैं कि सारे नेता चोर और हरामी होते हैं, या ये माओवादी की शिक्षा का अंग है जिसमें किसी भी नरमी को छिपी हुई तेज़ी का संकेत समझो ताकि लड़ने का तेवर कभी मद्धम न पड़ने पाए? अगर ऐसा है तो यह दुनिया को सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पूर्वाग्रह से ही देखने की ज़िद है, कि हम ने तो तय कर लिया है कि मुख्यधारा हमारे ख़िलाफ़ है और हमें उनसे आर-पार का युद्ध करना है। अगर आप फ़ौज भेजते हैं तो हमारी बात की पुष्टि होती है, और अगर आप फ़ौज न भेजकर अमन की बातें करते हों तो हम जानते हैं कि ये ढकोसला है और हम आप की बात पर हँसते हुए फ़ौज के आने की तैयारी करते जाते हैं।
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बहुत सारे अन्याय जो मुख्यधारा के समाज में होते रहे हैं, होते हैं, वो आदिवासी समाज में भी पाए जाते हैं- जैसे स्त्रियों के प्रति भेदभाव या मुखिया द्वारा बाक़ी लोगों के साथ अन्याय। माओवादी इन पुरातन मान्यताओं और रिवाज़ों के खि़लाफ़ भी लड़ते हैं। मज़े की बात ये है कि पूँजीवाद भी उनके ख़िलाफ़ लड़ रहा है, उसके ऊपरी संदेश पर मत जाइये, वो जो जीवन बना रहे है उसे देखिये। वो पुरानी हर चीज़ को कचरे में डाल रहा है। नए मूल्य गढ़ रहा है। पुराने को नष्ट करने के पाप के लिए माओवादी तब उसकी निन्दा करते हैं और अपने स्तर पर वही काम करते हैं। ये बड़ी अजब बात है कि माओवादी, ऐतिहासिक भौतिकवाद में विश्वास रखने के बावजूद आदिवासी-खेतिहर समाज में नए मूल्य के बीज डाल रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि बिना स्थितियां बदले ही मूल्य पक्के पेड़ बन जाएंगे और आगे तक फल देते रहेंगे। जब उत्पादन के मोड में फ़र्क़ नहीं आया है तो इस बात की क्या गारण्टी है कि माओवादी सरबराहों के हटते ही पुराने मूल्य वापस न लौट आयेंगे? सलवा जुडुम वाले माओवादियों का विरोध करते हुए उन पुरानी मान्यताओं की पुनर्स्थापना का भी नारा लगाते हैं जिन्हे माओवादियों ने रोका है, जैसे औरतों को बीज न बोने देना, उन्हे पेड़ पर न चढ़ने देना, और एक से अधिक शादी की आज़ादी लेना। वैसे ही जैसे भाजपा एक उग्र हिन्दुत्व का रूप धर कर आती है।
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पुलिस वालों द्वारा की जा रही मुठभेड़ों में किए गए फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और माओवादियों द्वारा जनअदालत के तुरत-फ़ुरत न्याय में फ़र्क ये है कि जहाँ पुलिसवालों के एन्काउन्टर को क़ानून की मान्यता नहीं मिली हुई है। और राज्य उस नृशंसता की भर्त्सना करता है और उस के लिए मौक़ा पड़ने पर अपराधी पुलिस वालों को दण्डित भी करता है। लेकिन जनता की सामूहिक शिरकत वाली जनअदालतों का न्याय उस नृशंसता को संस्थाबद्ध न्याय को चोला पहना देता है। जिसे अरुंधति इसलिए भारतीय अदालत के न्याय से ऊपर इसलिए मानती हैं क्योंकि उसमें जनता साक्षात उपस्थित है और फ़ैसले की भागीदार है। दूसरी तरफ़ उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, जनसमूह और उसकी आकांक्षाओं से बहुत पहले कट चुके हैं। इस राज्य की घिसटती हुई न्याय व्यवस्था के बारे में तो हम बहुत सुन चुके हैं लेकिन जन अदालतों पर अरुंधति की बात के सन्दर्भ में नीत्शे का एक वचन याद करने योग्य है, 'व्यक्तियों में पागलपन और वहशत एक अपवाद है लेकिन समूह में हमेशा एक नियम'। अकेला आदमी दंगा नहीं करता, दंगा एक सामूहिक व्यवहार है। इस तर्क को खींच कर यहां तक ले जाया सकता है कि सामूहिकता एक पाशविक वृत्ति है और निजता एक मानवीय गुण। यह बात पूरी तरह से भले ठीक न भी हो पर इसमें सच्चाई के अंश ज़रूर हैं।
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अरुंधति दंतेवाड़ा में माओवादियों द्वारा की गई ७६ सुरक्षाकर्मियों की हत्या की भर्त्सना करने से इंकार करती हैं। उनका तर्क है कि वे सताए हुए लोग हैं और उनके द्वारा बचाव में की गई प्रतिहिंसा की तुलना राज्य की संरचनात्मक हिंसा से नहीं की जा सकती। ये सिर्फ़ एक चतुर तर्क लगता है ताकि इस तुलना को अनैतिक बता कर इस का सामना करने से बचा जा सके क्योंकि अरुंधति के डिसकोर्स का पूरा संसार, हिंसा और अन्याय की अनैतिकता के आधार पर खड़ा किया गया है।
७६ सुरक्षाकर्मियों की ये हत्या आदिवासियों ने नहीं की, माओवादियों ने की। एक सोची-समझी नीति के तहत की। क्या है वह नीति? वो नीति है दुश्मन को एक कठोर सबक सिखाने की नीति, अपने इरादों की अटलता का सीधा संदेश देने की नीति। माओवादी दण्डकारण्य में एक पार्टी की तरह नहीं, एक समान्तर राज्य की तरह काम कर रहे हैं, जैसा कि अरुंधति ने स्वयं अपनी रपट में लिखा है। उनकी जनताना सरकारें सेना, अर्थ्व्यवस्था, कृषि, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सबसे महत्वपूर्ण न्याय, सभी मूलभूत अंगो का संचालन कर रही हैं।
ये कोई बेचारगी की, हताशा की आत्मघाती हिंसा नहीं है जैसे कि फ़िलीस्तीनी ख़ुद्कुश बम करते थे, और कुछ अभी भी करते हैं। ये सजग, सचेत, बचाव की नहीं और अपनी पहलकदमी वाली हमले के चरित्र की हिंसा है। अगर माओवादी चाहते तो उनमें से कुछ को जीवित भी छोड़ देते, गिरफ़्तार करते, मुक़द्दमा चलाते। उस न्याय का परिचय देते जिस की अपेक्षा वो भारत सरकार से करते हैं। लेकिन उन्होने ऐसा कुछ नहीं किया, उन्होने सब की हत्या की। जो बच गए वो ग़फ़लत में बच गए। क्या ये अजीब नहीं है कि अरुंधति के दो मापदण्ड हैं, एक माओवादियों के लिए और दूसरा राज्य के लिए?
(जारी)
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२
(जारी)
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स - २
हमारे समाज में पूँजीवाद के सकारात्मक पहलू की समझ ग़ैर-मौजूद है। हम हमेशा पूँजीवाद को पिछले समाज के या वर्तमान समाज के नज़रिये से देखते हैं और हो रही उथल-पुथल के लिए उसे ज़िम्मेदार मानते हैं, और गरियाते हैं। जैसे हम हमेशा ये दुहाई देते हैं कि पूँजीवाद यहाँ पर सामन्ती तत्वों से समझौता कर रहा है, उस से लड़ नहीं रहा। पूँजीवाद किसी से लड़ना नहीं चाहता। वो बाज़ार को, वस्तुओं को, सुविधाओं को दूर-दूर तक फैलाना चाहता है। और इस के लिए वह सबसे सरल रास्ता पकड़ता है। भ्रष्टाचार आसान राह है, ईमानदारी बड़ी कठिन है। ईमानदारी अड़ियल है, बेलोच है, भ्रष्टाचार बड़ा लचीला है। ईमानदार आदमी सिर्फ़ अपने आदर्शों की सोचता है, भ्रष्ट आदमी समझौते का, बीच का रास्ता तलाशता है। पूँजीवाद भ्रष्ट है क्योंकि पूँजीवाद अपनी प्रकृति में ही समझौतापरस्त है।
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पूँजी क्या है? मार्क्स के ही शब्दों में, पूँजी सरप्लस लेबर है। यानी मज़दूर की उचित मज़दूरी का ना दिया गया हिस्सा, जो पूँजीपति मज़दूर को न देकर अपने पास रख लेता है, वही पूँजी है। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि पूँजीपति पूँजी को अपने पलंग के नीचे ज़मीन में गाड़ कर नहीं रखता, जैसे कि मध्ययुग में सभी लोग रखते थे। वह पूँजी को समाज में वापस निवेश कर देता है। इस निवेश के ज़रिये समाज में नई सम्पदा और नई नौकरियों की सृष्टि होती है। यह सम्पदा कही जाती है कि किसी अम्बानी या टाटा की सम्पत्ति है मगर असल में वो एक पब्लिक प्रापर्टी परोक्ष रूप से बन चुकी है। क्योंकि उसका मालिकाना आज की तारीख़ में प्राइवेट लिमिटेड नहीं बल्कि पब्लिक लिमिटेड है। ये सही है कि उस संस्थान से होने वाले मुनाफ़े का सबसे बड़ा हिस्सा उस अम्बानी की जेब में जा रहा है लेकिन वह अहम नहीं है। अहम है क्रिएशन ऑफ़ वेल्थ। तर्क यह दिया जाता है कि पूँजीवाद, जो प्राकृतिक सम्पदा पहले से मौजूद है उस का कमोडिफ़िकेशन करता है। ठीक है, पानी और ज़मीन जैसी चीज़ों के साथ यही हो रहा है। लेकिन बिजली, सड़क और टेलेकाम, इन्टरनेट जैसी सुविधाओं के बारे में क्या कहा जाएगा? ये सचमुच क्रिएशन ऑफ़ वेल्थ है।
इस पर सवाल यह आता है कि अगर यह है भी तो क्या ऐसा सम्भव नहीं हो सकता कि इस सम्पदा की रचना के काम को सरकार अपने हाथ में ले ले और उसे इस तरह से अंजाम दे जिसमें आदमी का शोषण कम से कम हो। मेरा मानना है कि ये नहीं हो सकता। इसके प्रयोग किए गए और असफल हो गए। इसलिए असफल हो गए क्योंकि सरकार द्वारा उसे अंजाम देने के लिए उसके लिए एक नीति होनी पड़ेगी और एक योजना होनी पड़ेगी और उसका कार्यान्वन होना पड़ेगा। ये सब तभी हो सकता है कि जब आप ठीक-ठीक जानते हो कि पहुँचना कहाँ है? पूँजीवादी व्यवस्था एक विकसित होती हुई हस्ती है। उसके विकास का पूर्वानुमान किया जा सकता है लेकिन उसमें ग़लतियां होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाएगी। किसी पेड़ के विकास का पथ हम जानते हैं लेकिन अगर हम उसके विकास को नियोजित करने लगें तो हमें बजाय उसे मदद करने के उसमें बाधा बन जायेंगे। लेकिन पेड़ सिर्फ़ उपमा है और पूँजीवाद अपनी गति में बहुत तोड़-फोड़ करता है, इसलिए अलग-अलग मौक़ो पर कभी ढीली, कभी कठोर नीति की ज़रूरत होती है।
यहाँ पर यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि पूँजीवाद कोई आसमान से लाई गई और दुनिया पर थोपी गई व्यवस्था नहीं है। वो मनुष्य के हज़ारों साल के स्वाभाविक विकास की एक मंज़िल है। मनुष्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। किसी एक आदमी और किसी एक समाज और किसी एक देश की नहीं, पूरी मनुष्यता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति। पूँजीवाद कैसे विकसित होगा इसका निर्धारण करने और उसकी पूर्वयोजना करने की कोशिश सोशलिस्ट सरकारें ही नहीं, दुनिया का हर कारपोरेशन करता है, हर निवेशक करता है। वो अपने निजी मुनाफ़े के लिए शोषण की किसी भी हद तक जाता है, और भ्रष्टाचार के मार्फ़त लोकतांत्रिक सरकारों में बैठे अपने पिट्ठुओं से दमनकारी नीतियां और क़ानून बनवाता है।
लेकिन इन निजी मुनाफ़ों के पार पूँजीवाद की वृहत्तर गति को भी देखना चाहिये। वो कर क्या कर रहा है? वो अधिक से अधिक लोगों तक अधिक से अधिक सुविधाएं और उत्पाद पहुँचाने की तरफ़ उन्मुख है। और ये एक ऐसी शै है जो हर कारपोरेट, हर निवेशक और हर सरकार की खींचतान की हर सम्भव कोशिश के बावजूद, स्वतंत्र है। इसका एक अपनी चाल है, एक अपनी गति है, एक अपना चरित्र है। क्योंकि करोड़ों-करोड़ो लोग जो इस तंत्र का हिस्सा है, इसे प्रभावित कर रहे हैं। जो लोग माल बना रहे हैं, जो ढो रहे हैं, जो प्रचार कर रहे हैं, जो बेच रहे हैं, जो ख़रीद रहे हैं, सब। सब की मिली जुली अभिव्यक्ति है यह पूँजीवाद। उनके रंग-ढंग, पसन्द-नापसन्द, चाहतों और आंकाक्षाओं से बनता है उसका चरित्र, और तय होती है उसकी गति। एक सरकार उसे तय नहीं कर सकती, करेगी तो ग़लती कर बैठेगी, जैसी करती रहीं है। इसी अर्थ में पूँजीवाद लोकतंत्र का जुड़वां भाई है। इस बात को एक उदाहरण से समझें- फ़्रांस में सरकोज़ी ने बुर्क़े पर बैन लगाया लेकिन वहाँ के स्टोर्स डिज़ाइनर बुर्क़ा बना और बेच रहे हैं। आम चुनावों में मुसलमानों की नापसन्दगी का यह मुद्दा एक प्रेशर ग्रुप की तरह पार्टियों के बीच महत्वपूर्ण हो जाएगा और बड़े दलों की हार-जीत में निर्णायक भी हो जाएगा, सम्भवतः।
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ये समझने की ज़रूरत है कि आदिवासी इलाक़े जो पृथ्वी पर जीवन के तैयार हो रहे उस नए कलेवर की हद के बाहर रह गए सुदूरतम इलाक़े बने हुए थे जिसे पूँजीवाद या औद्योगीकरण कहा जाता है। उन इलाक़ो में इस तरह का संघर्ष उभरना दो तरह के संकेत देता है: एक तो यह कि यह कि विश्वस्तरीय बदलाव हर कोने अंतरे में घुसे कर उसे प्रभावित किए बिना नहीं रहने वाला, दूसरे यह कि मानवाधिकार और पर्यावरण के सवालों से रगड़कर पूँजीवाद का दमनकारी चरित्र सुधर सकता है। पूरी तरह न भी सही तो आम जन के बीच में ये सवाल एक जनमत रचेंगे और फिर उसके प्रत्युत्तर में पूँजीवाद को अपनी नीतियां बदलनी ही पड़ेंगी, क्योंकि जनमत ही पूँजीवाद की वो ईंट है जिस के सहारे से वो अपना पेट भरता है। और ठीक इसी वजह से वह लगातार उसे निंयत्रण करने की कोशिशें करता है। किसी सामन्त या बादशाह को कभी ये परवाह नहीं करनी पड़ी कि लोग क्या सोचते हैं। सच तो ये है कि आज तक अल्पमत ही बहुमत पर राज करता आया है, ये पहली बार है कि बहुमत अल्पमत पर हावी हो रहा है। वो अलग मसला है कि अल्पकालिक मुनाफ़े के लिए पूँजीवाद अल्पमत को भी तोड़-मरोड़ कर बहुमत के चोले में बेचने की तरक़ीबें करता रहता है।
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राज्य के ख़िलाफ़ मोटे तौर पर एक शिकायत तो ये है कि वो जंगल और ज़मीन को पूँजीवादियों के हवाले कर देना चाहती है जो आदिवासियों को बेदख़ल कर के जंगल को उजाड़ देंगे और पहले से ख़तरे में पड़े पर्यावरण का संकट और गहरायेंगे। इस का एक अलग जवाब बनता है, जो नीतिगत है। लेकिन इसके अलावा जितनी भी शिकायतें हैं वो किसी आदिवासी समाज के विरुद्ध किसी विशेष पूर्वाग्रह से नहीं उपजती हैं, जैसा कि दिखाने की कोशिश की जाती हैं। अत्याचारो की अनदेखी, दमन, बलात्कार और भ्रष्टाचार जैसी घटनाएं सिर्फ़ इसलिए होती हैं क्योंकि उन इलाक़ों में न सिर्फ़ आर्थिक पिछड़ापन है बल्कि सामाजिक पिछड़ापन भी है। लोकतांत्रिक और मानवधिकार की चेतना इस देश में जनमी हुई नहीं है। योरोप जिस नवजागरण की सन्तान है, जिसने मानवाधिकार आदि की चेतना को जन्म दिया, नवजागरणहीन समाज, बुढ़ाए हुए बीमार समाज से उस चेतना की उम्मीद करना कुछ ज़्यादती है। मुझे लगता है हमारी सरकार को थोड़ी कड़ाई और मुस्तैदी और मध्यवर्ग के सचेत तबक़े को थोड़ा धीरज अपनाने की ज़रूरत है।
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माओवादी आन्दोलन के साथ समस्या ये नहीं है कि वे आदिवासियों के मुद्दे उठा रहे हैं, और पूँजीवाद की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। सरकार को सबसे अख़रने वाली बात ये है कि वे राज्य को चुनौती दे रहे हैं। वे एक समान्तर सत्ता बन कर उभर रहे हैं। वे न सिर्फ़ आदिवासियों के राजनीतिक, और सामाजिक जीवन के सभी पहलू सम्हाल रहे हैं बल्कि लोकतांत्रिक/पूँजीवादी राज्य की ही तरह अपने अस्तित्व की राह में आने वाले किसी भी रोड़े को हटाने में उसी क्रूरता का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके लिए परम्परागत राज्य जाना जाता है। चूंकि दोनों एक ही जैसे हैं, एक ही चरित्र के हैं, और एक दूसरे की प्रतिबिम्ब हैं, इसीलिए दोनों एक दूसरे को मिटा देने के लिए इस तरह आमादा हैं। एक जंगल में एक ही सी प्रबल हिंसा वाले दो शेर नहीं रह सकते। एक को दूसरे को मारना होगा या अपने इलाक़े से बाहर करना होगा। इस लिहाज़ से दोनों ही प्रकृति के पुराने क़ानून का पालन कर रहे हैं।
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सुना गया है कि माओवादी आदिवासी गाँवों में बड़ा अच्छा प्रशासन चला रहे हैं। मगर जो उन की बात न माने उसे गोली मार देते हैं। इस दुनिया का जितना नुक़्सान सच्चे और आदर्शवादी लोगों ने किया है उतना किसी ने नहीं किया। सच्चाई, आदर्श इन सब में एक तरह की शुद्धता है। हिटलर भी एक शुद्धतावादी था वह एक शुद्ध आर्य प्रजाति तैयार करना चाहता था। वह मानता था कि चूंकि वह शुद्ध व सही है इसलिए ग़लत और अशुद्ध लोगों को गोली मार देने का उसे हक़ है। माओवादी कोई काम करने से पहले बहुमत की राय थोड़ी पूछते हैं, जिस को सही-सही ग़लत समझते हैं गोली मार देते हैं।
कुछ लोग, जिनमे सुदर्शिनी और सुतर्किणी अरुंधति भी हैं, वो बार-बार इन्ही लोगों के हवाले से पूछते हैं कि क्या यही मासूम आन्तरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं? जब अरुंधति कंधे पर बंदूक लटकाये मासूमों को देखती हैं तो उनका मोहित हो जाना स्वाभाविक है। उनकी जगह मैं होता तो मैं भी मोहित हो गया होता। हिंसा में एक शुद्धता है, एक सरलता है जो शहर के लोगों की भ्रष्ट समझौते की ज़िन्दगी जीने से विरूप हो गए उनके चरित्र और चेहरे में नहीं मिलती। ऐसी सुन्दरता आप को बाघ में भी देख सकते हैं। बाघ जब हिंसा करता है तो अपनी ज़रूरत, अपने अस्तित्व के लिए करता है। जिस का उसे कोई पाप नहीं लगता, बाघ का चेहरा निर्दोष बना रहता है और सम्भवतः आत्मा भी निर्मल बनी रहती होगी। इसी तर्क से अपने अस्तित्व की रक्षा कर रहे आदिवासियों को भी पाप न लगना चाहिये। और इसी वजह से उनके चेहरे और आत्मा में कोई मैल न पा कर अरुंधति सम्मोहित हो चली होंगी।
इस देश में एक बड़ा आन्दोलन 'सेव टाइगर' का भी चल रहा है। अक्सर कुछ लोग अरुंधति पर यह आरोप भी लगाते हैं कि वो टाइगर की ही तरह आदिवासियों को भी, संकट ग्रस्त प्रजाति की तरह, उनके जंगलो में संरक्षित देखना चाहती हैं। मैं उन से सहमत नहीं हूँ, बावजूद उन दोनों – टाइगर और आदिवासी- के बीच आदिम सौन्दर्य की एकरूपता के। मेरे अनुसार अरुंधति आदमी और जानवर में अन्तर करना जानती हैं।
मुश्किल सिर्फ़ इतनी है कि जब आदिवासी सी आर पी एफ़ के ७५ नौजवानों की हत्या करते है, जिन्होने अभी तक उनके गाँवों को नहीं जलाया था और उनकी औरतों का बलात्कार नहीं किया था, और जो बन्दूक लेकर आदिवासियों से लड़ने का काम सिर्फ़ इसलिए कर रहे थे कि उनका अपना अस्तित्व संकट में था और पुलिस की नौकरी उसकी रक्षार्थ ही थी, तो क्या तब चित्रगुप्त के लिए इन हत्याओं को पाप के खाते से दूर रखने में दुविधा का सामना न करना होता होगा?
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आज कल टीवी पर नक्सली बहसों की अगुवाई करते हुए अर्णब गोस्वामी दलील देते हैं कि उन हमदर्दों को भी ग्रीनहण्ट के दायरे में लाना चाहिये जो इन माओवादियों से मिलते-जुलते और उन के बारे में लेखादि लिखते हैं। निश्चित ही उनका इशारा अरुंधति राय की ओर होता है। मध्यवर्ग में माओवादियों के विरोधियों का एक बड़ा तबक़ा उन से लगभग नफ़रत करने लगा है और शायद इसीलिए कैपीटलिस्ट मीडिया ने अरुंधति का लगभग बॉयकाट कर रखा है। अर्णव गोस्वामी जैसे लोगों में यह नफ़रत सबसे घिनौने तरीक़े से बाहर आती है जो लगभग फ़ासिस्टी सीमा पर है। मैं अरुंधति से सहमत नहीं हूँ लेकिन मैं अरुंधति के बोलने से सहमत हूँ। उन्हे बोलना चाहिये और पूरे ज़ोर से बोलना चाहिये, और हम सब को चाहिये कि उनको सुनें। भले न सहमत हों। हमारा लोकतंत्र उनकी नकार की आवाज़ से मज़बूत होता है। और जो वो बोलती हैं वो एक कड़वी सच्चाई है। आदिवासी इस देश और समाज के मुख्यधारा से बाहर हाशिये पर पड़े लोग हैं जिनकी आवाज़ को मुख्यधारा में जगह नहीं है; अरुंधति उनकी आवाज़ हैं।
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अरुंधति कितनी सुन्दर है और कितना अच्छा बोलती हैं! भाषा और भावों पर उनका कैसा एकाधिकार है! उनके चेहरे पर उच्च नैतिक बोध की एक आध्यात्मिक चमक है। अपने मधुर स्वर में वे जो बोलती हैं, लगता है कोई देवी बोल रही है। उन के जैसी कोई दूसरी स्त्री सामाजिक जीवन में नहीं है। मैं लगभग उनसे प्रेम करता हूँ और उनकी हर बात से सहमत होना चाहता हूँ। लेकिन मेरे भीतर प्रेम की, रूमान की नदी सूख चुकी है। काश मैं उन पर आँख मूँद कर भरोसा कर सकता; मेरा शुष्क विवेक, मेरे रुक्ष तर्क मुझे उस देवी से उलझा रहे हैं, मेरा ईश्वर मुझे क्षमा करे!
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१
आज कल मेरे दोस्तों को मुझ पर शर्म आने लगी है। मेरी राजनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पूछा जा रहा है: तुम्हारी पौलिटिक्स क्या है पार्टनर। मैं उनकी शर्म का समाधान नहीं कर सकता। मैं यह ब्लौग इसलिए नहीं लिखता कि मेरे दोस्तों को मुझ पर शर्म न आए। इसलिए भी नहीं लिखता कि कोई मुझे साम्प्रदायिक, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी आदि न समझ ले। मैं यह ब्लौग इसलिए लिखता हूँ कि मैं इस लिखाई के ज़रिये अपने बारे में, लोगों और दुनिया के बारे में अपनी समझ को साफ़ कर सकूँ। किन्ही बनी-बनाई समझदारियों और सूत्रों का समर्थन और मंज़ूरी देने के लिए नहीं लिखता।
मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि मेरा ये संवाद मेरे प्रगतिशील मित्रों से है, या यूँ समझिये कि मैं अपने आप से ही एक संवाद कर के अपने ही भीतर की पुरानी मान्यताओं का संस्कार, परिष्कार और सुधार कर रहा हूँ। इच्छुक लोग आगे पढ़ें अन्यथा यहीं से विदा हो सकते हैं। क्योंकि ये एक तरह की पोलेमिक है, या कहें कि अपने आप से एक लम्बी बातचीत।
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अन्तराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा उत्पादन के लिए तेल पर निर्भरता और उसका विश्व अर्थव्यवस्था का केन्द्रीय धुरी बने होना चिंता का विषय इसलिए है कि तेल एक सीमित संसाधन है। आने वाले समय में उसके कारण पूँजीवाद में बड़े संकट उठ खड़े होने वाले हैं। उसके विकल्प के तौर पर बायोफ़्यूल की जो बात की जा रही है, वह खाद्यान्न की क़ीमतों और सुलभता की समस्या को सुलझाने के बजाय और उलझा देगा। मगर फिर भी इस मामले में उम्मीद है कि मानव अन्वेषणशीलता संकट आने तक कोई न कोई हल पा ही लेगी। दूसरी समस्या अधिक गहरी और भयंकर है।
योरोप और अमरीका में पूँजीवाद के विकास में जिस तरह से पृथ्वी के संसाधनो का दोहन हुआ है अगर उसी दर से संसाधनो का दोहन भारत और चीन और उसके बाद अफ़्रीका के देशों के भी विकास के लिए हो तो पृथ्वी की वर्तमान सूरत को बचाए रख पाना लगभग असम्भव माना जा रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों देशों को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए एक-एक स्वतंत्र पृथ्वी चाहिये होगी। मिसाल के लिए अमरीका और योरोप में आदमियों और कारों का जो अनुपात है अगर चीन और भारत में वही सूरत बन जाय तो होने वाले प्रदूषण की कल्पना ही विकट है। अगर इस जहान में विष्णु जैसा कोई ईश्वर है तो ज़रूर ही उनके दरबार में पृथ्वी रूपी गाय अपने अति दोहन और अति शोषण की शिकायत करती, और पूँजीवाद और भूमण्डलीकरण नाम के दो दैत्यों से अपनी रक्षा के लिए प्रभु के आगे गुहार करती होगी।
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सवाल ये है कि क्या मैं पूँजीवाद के पक्ष में हूँ? क्या मैं उसे एक आदर्श मानवीय व्यवस्था मानता हूँ? इसको ऐसे समझें कि मैं पूँजीवाद के समर्थन में नारे नहीं लगाता लेकिन मैं पूँजीवाद का विरोध करने के लिए सामन्ती, अर्ध-सामन्ती सम्बन्धों और व्यवस्थाओं के पक्ष में भी नहीं खड़ा हो जाता। पूँजीवाद इतिहास की कोई पहली व्यवस्था नहीं जो शोषण पर आधारित है। दास-प्रथा और सामंतवादी कृषि व्यवस्थाओं में कहीं अधिक शोषण था, हालांकि उनमें कुछ ऐसे मानवीय तत्व थे जो पूँजीवाद में एकदम बिला गए हैं, जैसे: प्रकृति के साथ तादाम्य और मनुष्य की अपनी अनुभूतियों के संसार में गहरी पैठ। लेकिन उन तत्वों के प्रति चाह रखने के बावजूद हमारे लिए उन व्यवस्थाओं में वापस जाना ना सम्भव है और ना वांछित।
आदिवासियों का मामला थोड़ा जटिल है। माना जा सकता है कि उनका जीवन और उनका सामाजिक तंत्र दोनों क़िस्म के शोषण से रहित है। न तो वे एक-दूसरे का शोषण करते हैं और न ही प्रकृति का। (हालांकि करते ज़रूर हैं मगर अपेक्षाकृत रूप से कम, अरुंधति की रिपोर्ट के ही अनुसार पहले आदिवासी मुखिया बाक़ी गाँव वालों का शोषण करते थे- सबसे ज़्यादा ज़मीन हड़पना, अपने खेत में काम करवाना, फ़सल में हिस्सा लेना आदि। बताइये ये शोषण आदमी का कितना गहरा स्वभाव है? आदमी क्या मैंने देखा है कि कुतिया का एक पिल्ला दूसरे को धकेल कर उसके हिस्से का भी दूध पी जाता है। बड़ा पेड़ छोटे पेड़ का पानी पी जाता है, धूप छीन जाता है। कहाँ तक घुसा है यह शोषण?) दास-प्रथा, सामंतवाद, और पूँजीवाद में, ये दोनों तरह के शोषण उत्तरोत्तर प्रबल होते जाते हैं।
पूँजीवाद, प्रकृति का इस बुरी तरह से शोषण कर रहा है कि पूरी मनुष्य़ जाति का अस्तित्व संकट में आ गया है। और आदमी और आदमी के बीच की खाई इतनी चौड़ी और गहरी पहले कभी न थी, जितनी अब है। पूँजीवाद का प्रभाव इतना व्यापक है कि कोई भी व्यक्ति इस व्यवस्था के बाहर रह कर अपनी बसर नहीं कर सकता। कोई सोचे कि मैं नकारता हूँ इस व्यवस्था को और चाहे कि मैं समाज से दूर चला जाऊँ, तो वो मुमकिन नहीं। पानी समेत प्रकृति के सारे तत्वों का कमोडीफ़िकेशन हो चुका है। एक हवा बची है, लेकिन शहरों में अब औक्सीज़न बार भी बन रहे हैं जहाँ जा कर आप कुछ मिनट तक शुद्ध हवा के मास्क पहन कर तरो-ताज़ा हो सकते हैं। सारे जंगल, सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े गिने और पहचाने जा चुके हैं। पहले वे सर्कस के दल में आप तक आते थे और अब आप नेशनल पार्क्स में जाकर उनका ‘बेहतर उपभोग’ कर सकते हैं।
यह बाज़ार सर्वव्यापी है। आदिवासी इलाक़ो को भी ये अपने घेरे में लेकर उनकी सम्पदा को रिसोर्स और उन आदिवासियों को उपभोक्ता बना देना चाहता है। यह एक दोहरे शोषण की नीति है। और आदिवासी अपने आदिकालिक जीवन की रक्षा करने के लिए पूरे जी-जान से लड़ रहे हैं। मुझे उनके साथ सहानुभूति है। उन्हे अपनी आदिम जीवन की रक्षा करने का पूरा हक़ है लेकिन वो उनकी लड़ाई है, मेरी नहीं। मैं यह नहीं समझता कि उनकी लड़ाई में मेरी मुक्ति के बीज भी छिपे हैं। माओवादी समझते हैं और उनके साथ, उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं, इस विश्वास से कि यह लड़ाई पूँजीवाद को परास्त करने की लड़ाई है। उनकी इस समझ पर मेरे और बहुत से दूसरे लोगों के बहुत सारे सवाल हैं।
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पूँजीवाद ने क्या आदमी के जीवन में कुछ सार्थक बदलाव भी किया है? मनुष्यता के विकास में क्या उसका कोई योगदान है? क्या वो मनुष्यता का ही एक एक्सप्रेशन है, या आदमी के भीतर बैठे किसी शैतान का? जीवन को और समाज को इतना संगठित करने और इतना केन्द्रीकृत करने के पीछे पूँजीवाद की क्या प्रेरणा है?
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केन्द्रीकरण अकेले पूँजीवाद का ही लक्षण नहीं है। सत्ता और सम्पदा के कुछ व्यक्तियों और घरानों और कारपोरेशन्स में केन्दित हो जाने की बार-बार दुहाई दी जाती है। ये समझना चाहिये कि ये वो ज़माना नहीं है कि धन को धनवान धरती के भीतर गाड़ कर रखता है। पूँजी वैसा धन नहीं है, उसे समाज में वापस निवेश करने से ही वह पूँजी बनी रहती है। सम्पदा सार्वजनिक है किसी की निजी सम्पत्ति नहीं। लेकिन यह जो केन्द्रीकरण दिखाई दे रहा वही एक स्थिति के बाद विकेन्द्रीकरण भी बन जाएगा, ऐसा मैं सोचता हूँ।
आदमी का शरीर भी एक केन्द्रीकृत संरचना है। और मानव समाज की संरचना आदमी की अभिव्यक्ति है। अलग-अलग समयों पर अलग-अलग व्यक्तियों और समूहों के छोटे-बड़े योगदानों से विभिन्न गतियों में विकसित होती हुई यह संरचना अभी भी आदमी के स्वभाव की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है। ऐसा नहीं है कि सामाजिक संरचना में कुछ ऐसे तत्व हैं जो मनुष्य के स्वभाव से बाहर के हैं। लालच और शोषण अगर सामाजिक संरचना में बुना हुआ है तो वो आदमी के स्वभाव से ही निकला है। यहाँ यह सवाल मौज़ूं बनता है कि अगर हिंसा, लालच और शोषण आदमी के स्वभाव की अविभाज्य गुण हैं तो क्या एक ऐसा समाज बनना सम्भव है जिसमें ये बातें अनुपस्थित हों? और अगर है भी तो क्या वो समाज आदमी के स्वभाव की सच्ची अभिव्यक्ति होगा? इस सवाल का एकमात्र तार्किक जवाब मुझे यही लगता है कि – हिंसा, लालच और शोषण मनुष्य का सच्चा स्वभाव नहीं है। और अगर ऐसा है तो इन वृत्तियों से हीन उस सच्चे स्वभाव को पाए बिना, ऐसा सच्चा समाज बनाना कैसे मुमकिन है? कुछ लोग यह भी तर्क कर सकते हैं कि असल में मनुष्य का स्वभाव ‘कुछ नहीं’ है, वह जो है वह अपने समाज की निर्मिति है। क्या वाक़ई? क्या सामाजिक व्यवस्था अचानक एक दिन आसमान से उतर आई, किसी मनुष्य (या मनुष्यों) ने नहीं बनाई?
अलग-अलग समाज, सभी समाज आदमी के स्वभाव की अपूर्ण अभिव्यक्तियां हैं। क्योंकि, एक तो, मनुष्य का स्वभाव कोई एक स्थिर और निश्चित प्रत्यय है भी नहीं; और दूसरे आदमी की सामाजिक संरचना अभी भी विकसित हो रही है। मनुष्य प्रकृति की सबसे जटिल संरचना है और मनुष्य का समाज जटिल से जटिलतर की ओर बढ़ रहा है। आदिम आदिवासी समाज, सरलतम और आज का पूँजीवादी समाज जटिलतर संरचना है। यहाँ दूसरा मौज़ूं सवाल ये है कि कम अपूर्ण अभिव्यक्ति के बनिस्बत अधिक अपूर्ण अभिव्यक्ति को तरजीह देना क्या उचित है? जहाँ तक मैं समझता हूँ कोई भी आदिवासी समाज में लौट चलने की वक़ालत नहीं कर रहा मगर मौके पर इस बिन्दु पर सफ़ाई बना लेना मुझे उचित लगा।
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अब यह पूछा जाना चाहिये कि माओवादी कौन है? आज की तारीख़ में दो तरह के माओवादी हैं: एक तो आदिवासी लड़ाके जो बन्दूक ले कर सुरक्षा बलों से लड़ रहे हैं और दूसरे वे माओवादी जिन्होने उन आदिवासियों के हाथ में बन्दूक दी है। यहाँ पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि आदिवासी एक लम्बी लड़ाई लड़ रहे हैं, पहले तीर-कमान से लड़ते थे, अब बन्दूक से लड़ रहे हैं; सम्भव है, ठीक है। लेकिन यह भी मानना होगा कि वो बन्दूक उन्होने अपने जंगल में नहीं उगाई। किसी ने बाहर से ला कर उनके हाथ में दी है। मैं उन लोगों की बात करना चाहता हूँ। ये कौन लोग है? ये मार्क्सवादी है, लेनिनवादी हैं, माओवादी हैं, नक्सलवादी हैं।
ये सुशिक्षित मध्यमवर्गीय या पेटी बुर्ज़ुआ हैं जो युवाओं की सहज स्वप्नवृत्ति के प्रभाव में, समाज परिवर्तन की अवधारणाओं से लैस, क्रांति की राह पर निकल पड़ते हैं। क्रांति एक ज़बरदस्त एडवेंचर हैं, जोखि़म है, रोमांच है, रोमांस है। हर युवा इन सब के प्रति सहज ही आकर्षित होता है। और उस सामाजिक क्रांति को सम्भव करने के लिए जनता के बीच जाना होता है और ऐसी जनता के बीच जिसका शोषण हो रहा हो। लेकिन माओवादियों को ऐसी जनता शहर में नहीं मिलती, उसके लिए वे ऐसे गाँवों में जाते हैं जहाँ सामन्ती सम्बन्ध अभी भी प्रबल हैं या ऐसे जंगल में जहाँ ‘सभ्यता’ के चरण न गए हों। और उस जनता को क्रांति के लिए तैयार करते हैं।
वो ख़ुद अपने को जनता के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं और जनता न होने की शर्म में हमेशा अपनी वर्ग चेतना से लड़ते रहते हैं। भले ही उनके वर्ग की माली हालत पश्चिमी देशों के सर्वहारा से बदतर हो, फिर भी वे अपने को जनता नहीं मान पाते और जनता की तलाश में अपने आप से दूर, बड़ी दूर चले जाते हैं। इस जनता के उद्धार के लिए ये अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। और उनके पेटी बुर्ज़ुआ वर्ग के दूसरे सदस्य जो ऐसा नहीं कर पाते, वे उन्हे घृणा की नज़र से देखते हैं। वे पेटी बुर्ज़ुआ से आत्म-त्याग की उम्मीद रखते हैं और अपनी तथाकथित जनता से अपने स्वार्थ के लिए बन्दूक उठा लेने की न सिर्फ़ उम्मीद करते हैं बल्कि उसे लगातार प्रेरित करते हैं। जब ये जनता के पास आते हैं तो ये पहले से ही तय कर चुके होते हैं कि समाज क्या है, जनता क्या है, क्रांति क्या है, क्रांति का रास्ता क्या है। वह सिर्फ़ जनता को उस तरफ़ हाँकते हैं। जनता ‘उनके उस सपने’ का निमित्त है, जो जनता के हित के लिए उन्होने देखा है। वे जनता से बेहतर जनता का हित जानते हैं और उसके लिए जनता को, उनके न्यायोचित असंतोष को, एक युद्ध में बदल देना वो उचित समझते हैं।
ये लोग उग्र हैं क्योंकि इनका विश्वास समझौते में नहीं, संघर्ष में है। इसी बात को खींचकर ये भी कहा जा सकता है कि ये लोग रोमांच की तलाश में वो नौजवान हैं जो अपनी लड़ाई नहीं खोज सके, इसलिए दूसरों की लड़ाई में भाग लेने आ गए। ऐसा नहीं है कि इनके अपने जीवन में सब कुछ कुशल मंगल है और वहाँ लड़ाई की कोई सम्भावना नहीं। उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के जीवन में भी, उनके निजी जीवन में तमाम मुद्दे हैं जहाँ वे संघर्ष कर सकते हैं, लेकिन नहीं करते। क्योंकि अपने स्वयं के जीवन संघर्ष को पहचानने की क्षमता से हीन हैं और अगर पहचानते भी हैं तो उसे किस शिल्प में अभिव्यक्त करें ये नहीं समझ पाते, और शिल्प भी जानते हैं तो उसे क्रांति की राह के लायक़ न मानकर ख़ारिज कर देते हैं। क्योंकि उस के लिए लड़ना, चिंतित होना, परेशान होना उनकी लिए एक शर्म का विषय है, जिसे वे पेटी बुर्ज़ुआ चिन्तन मानते हैं।
आज देश में इतना बड़ा सर्वहारा वर्ग पैदा हो चुका है, लेकिन उनको कोई ख़बर नहीं। डॉक्टर, पत्रकार, लेखक, अभिनेता, और गीतकार, संगीतकार, गायक सभी वेज लेबर में तब्दील हो चुके हैं। न तो उनके पास उत्पादन के औज़ार है और न ही उत्पाद के साथ कोई रिश्ता। वे वास्तविक और सच्चे तौर पर अपनी रचना और उत्पाद से विलगित हैं। लेकिन माओवादी ही नहीं, भारत की कोई कम्यूनिस्ट पार्टी उन्हे सर्वहारा नहीं मानती। वे बुद्धिजीवी हैं कलाकार, पेटी बुर्ज़ुआ हैं जिनका काम जनता के साथ सहानुभूति करना और जनता के आन्दोलन में अपनी शिरकत करना है। न तो वे जनता की परिभाषा में आते है, न उनकी संस्कृति, जन संस्कृति है और न ही उन का अपना कोई आन्दोलन हो सकता है। क्योंकि वे खाए-पिए, अघाए हुए लोग हैं।
सच बात तो ये है कि ये दूसरे तरह के माओवादी, जिनकी बात मैं कर रहा हूँ, ये वही भगवा पहन कर युद्ध करने वाले क्रांतिकारी हैं जिनको आप बंकिम के आनन्दमठ में देखते हैं। ये भौतिकवादी नहीं, ये आदर्शवादी हैं। ये त्याग करने, अपने जीवन का बलिदान करने निकले हैं।
लेकिन यहाँ पर ये याद रहे कि ये लोग हमारे समाज के सबसे नेक, सबसे ईमानदार और संवेदनशील लोग हैं। पर क्या नेक, ईमानदार और संवेदनशील होना ही काफ़ी है? क्या अच्छी नीयत और अच्छे अंजाम में सीधा-सीधा रिश्ता होता है? अब जैसे संवेदनशील तो और भी मिल जाएंगे, जीवन के तमाम हलक़ो में लेकिन इनके जैसे ईमानदार सिर्फ़ एक और संगठन में मिलते हैं, वो है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। आर एस एस के लोगों से मुझे और तमाम दूसरे लोगों को शिकायत है लेकिन उनकी ईमानदारी से कोई इंकार नहीं कर सकता। एक और ईमानदार और निष्ठावान और अपने ध्येय के लिए समर्पित लोग हैं जो अपने विश्वास के लिए जी जान लड़ा देते हैं। वो है आतंकवादी, आत्मघाती आतंकवादी। इस दलील के आधार पर मुझे लगने लगा है कि ईमानदारी, निष्ठा, समर्पण, संवेदनशीलता, और आदर्शवादिता वो लक्षण नहीं है जो समाज में अमन और समृद्धि के कारक होते हैं।
(जारी )
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