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मंगलवार, 13 नवंबर 2007

बेदखल की डायरी

पिछले दिनों आप ने वेब दुनिया में हुई मेरी चर्चा के बारे में देखा होगा। मुझसे पहले भी जिन चिट्ठाकारों की चर्चा की गई आज मुझे उनके लिंक प्राप्त हो गए मनीषा के माध्यम से। ये चर्चाएं मनीषा ने ही कलमबद्ध की हैं। आज इन कड़ियों को उपलब्ध कराने के अलावा मेरा मक़सद आप को मनीषा के ब्लॉग से रूबरू करवाना भी है।

मनीषा पाण्डेय स्वतंत्र मानस की एक मेधावी लड़की हैं। वैसे तो वे इलाहाबाद से तअल्लुक रखती हैं पर मेरा उनसे परिचय मुम्बई का है, जब वे यहाँ पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही थीं। उस दौरान ही उन्होने तमाम किताबों के अनुवाद को अंजाम दे डाला। फ़िलहाल वे इन्दौर में रहते हुए वेबदुनिया से सम्बद्ध हैं।

उनकी दिलचस्प डायरी पहले मोहल्ला पर शाया होती रही है.. अब से यह उन के खुद के ब्लॉग पर नियमित देखी जा सकेगी.. बेदखल की डायरी के नाम से.. जो इस धरती से बेदखल आधी आबादी के लिए लिखी जा रही है.. पर उसे पढ़ने का हक़ पूरी आबादी को प्राप्त है.. जिसमें आप भी शामिल हैं.. ज़रूर पढ़े मनीषा को और उनका उत्साह वर्धन भी करें.. उनके लेखन से मेरी बड़ी उम्मीदें हैं..

वेबदुनिया में ब्लॉग चर्चाओं के पुराने लिंक..
(इसमें से शुरुआती तीन, यूनुस खान, रवि रतलामी और पंकज पराशर वाले मनीषा की बीमारी के दौरान किसी और ने लिखे हैं। बाकी के उन्होने ही लिखे हैं)

यूनुस खान

रवि रतलामी

पंकज पराशर

उदय प्रकाश

प्रत्‍यक्षा

रवीश कुमार

ज्ञानदत्‍त पांडेय

अनिल रघुराज

अभय तिवारी


अगली चर्चा फ़ुरसतिया पर है.. ऐसी सूचना मिली है..

शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

मेरी माँ का अपना ब्लॉग


मेरी माँ की पारम्परिक शिक्षा सुव्यवस्थित तरह से नहीं हुई.. जो भी पढ़ा-जाना..स्वयं-शिक्षा से सम्भव हुआ.. एक पुरुषवादी समाज में एक स्त्री को जो हमेशा दोयम दरज़े पर धकेला जाता रहा है.. इस प्रवृत्ति के प्रति वे हमेशा सचेत रही हैं.. कहने का अर्थ यह नहीं कि मेरे पिता कोई राक्षस थे.. बस एक पुरुषवादी समाज में एक पुरुष थे.. और क्रांतिकारी नहीं थे.. फिर भी उन्होने अपने स्तर पर मेरी माँ की प्रतिभा को एक सामाजिक मंच देने की कोशिशें की.. पर वह उनके जीवन का उद्देश्य नहीं था.. मम्मी की प्रतिभा को दुनिया के सामने प्रकाशित कर देना मेरा भी जीवन उद्देश्य नहीं.. बस अपने स्तर पर जो कर सकता हूँ कर रहा हूँ..


काफ़ी दिनों से मम्मी की कविताओं का ब्लॉग खोलना चाह रहा था.. मगर मैं मुम्बई से निकल नहीं पा रहा था.. फोन पर मम्मी से कविताओं को लेना सम्भव नहीं था.. अब वे उमर के उस मकाम पर पहुँच गई हैं जहाँ आप को दूसरों की आवाज़े स्पष्ट नहीं सुनाई देतीं.. तो इस दफ़े कानपुर जा कर उनकी कविताओं को सहेज लाया हूँ और धीरे धीरे उनके अपने ब्लॉग पर चढ़ाता रहूँगा.. उम्मीद है आप लोग मेरी माँ के भीतर के कवि का उत्साह-वर्धन करेंगे.. अपने ब्लॉग का नाम उन्होने स्वयं चुना है.. जीवन जैसा मैंने देखा.. आप देखें और टिप्पणी अवश्य करें..

शनिवार, 1 सितंबर 2007

कुछ छुट्टे शेर

ब्लॉग की दुनिया में हम लिखने वाले ही एक दूसरे के पाठक भी हैं.. जो हाल कमोबेश हिन्दी साहित्य का भी है.. भाई बोधिसत्व हिन्दी के प्रतिष्टित कवि हैं.. मेरा उनको पढ़ना स्वाभाविक है.. पर वो मेरे एक नियमित पाठक हैं..और वो ही नहीं उनकी पत्नी आभा भी मेरी नियमित पाठक हैं.. वे खुद एक ब्लॉग खोल कर अपने लेखन को पुनर्जीवित करना चाहती हैं.. मैं और बोधि उनका उत्साहवर्धन करते ही रहते हैं.. मित्रों से निवेदन है कि आप भी देखें उनके ब्लॉग अपना घर को और उनके हौसले को बढा़एं..

कल आभा ने मेरे काव्य-लेखन के बारे में जिज्ञासा ज़ाहिर की.. यूँ तो मैंने इस ब्लॉग का बिस्मिल्लाह एक कविता से ही किया था.. पर काव्य मैं वैसे ही लिखता बहुत कम हूँ.. आजकल तो बिलकुल ही नहीं.. और जो पहले का लिखा है उसे लेकर हमेशा बहुत शर्मसार रहा हूँ.. मुझे वह बहुत ही दो कौड़ी का लगता रहा है.. मगर आज 'क्या लिखूँ' की दुविधा से बचने के लिए, और आभा के आग्रह का मान रखते हुए.. ये छाप रहा हूँ.. आप की गालियों का स्वागत है..

न मतला है.. न मक़ता है.. न रदीफ़, न क़ाफ़िया.. मीटर भी नहीं.. बस कुछ छुट्टे शेर समझें..

खुद को बेचकर मैंने भी क्या-क्या खरीदा है।
मुझ से अब मक़सद मेरा, इस बाज़ार में पोशीदा है॥(छिपा हुआ)

सबके लिए रात का, शहर में अलग एक वक्त है।
नींद कम है और चैन आता नहीं, कमबख्त है॥

शराब-शबाब सब है और नंगे खड़े हैं हम्माम में।
नश्शा नदारद मगर, और ईमान सर उठाता है॥

खूबसूरत कपड़े उतारने को, तैयार है सब लड़कियाँ।
मगर दिल अपना देखो कहाँ उलझा जाता है॥

साँस अटकती है, टूटती है फिर भी नहीं छूटती है।
आदमी मरता बाद में है, बहुत पहले मारा जाता है॥

छुटपन से जवानी तक, जिन्हे पोसा-पाला था।
आँसू नहीं ये सपने हैं, जलने का धुँआ आता है॥

रात है बस शहर में, सूरज उगता है न डूबता है।
और चाँद भी गोवा- गंगटोक में नज़र आता है॥




चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: चिठेरी, कविता, परिचय,

रविवार, 12 अगस्त 2007

विनीता की एक नई छलाँग

कल एक खास दिन था.. कल एक बहुत पुरानी और मेहरबान मित्र विनीता कोयल्हो की ज़िन्दगी का एक अहम दिन था.. उस अहम दिन के बारे में बताने से पहले मैं आप को विनीता के बारे में बताता हूँ.. विनीता भी टी वी की दुनिया से रोज़गार करने वाली एक शख्स हैं.. पर वो मेरी तरह 'बाज़ार से गुज़रा हूँ मगर खरीदार नहीं हूँ' के फ़लसफ़े में यक़ीन नहीं रखती.. वो जो करती हैं पूरी शिद्दत और जोश से करती हैं.. सच तो यह है कि मैंने पिछले कुछ सालों में जो गिने चुने काम किए हैं उनमें से काफ़ी कुछ विनीता की छत्रछाया में सम्पन्न हुए हैं.. विनीता कई बड़ी-बड़ी टीवी कम्पनी की क्रिएटिव पोज़ीशन्स पर शोभायमान रही हैं.. वे सोनी एन्टरटेनमेन्ट चैनेल यानी सोनी टी वी की वाइस प्रेसीडेन्ट भी रह चुकी हैं.. और आजकल इंटरनेशनल टी वी जायन्ट एण्डेमॉल की क्रिएटिव कन्सल्टेन्ट हैं..

वे मुम्बई में काम करती हैं.. मगर अपनी प्यारी माँ मैरी कोयल्हो और चार कुत्तो और तीन बिल्लियों की गुदगुदी सुरक्षा का आनन्द लेने हर सप्ताहांत अपने गोवा के घर में लौट जाती हैं.. वो नग़मे भी बड़ी सुरीली आवाज़ में गुनगुनाती हैं.. और खाली वक़्त में कैनवास फैला कर पेंटिग करने बैठ जाती हैं.. इस दुनिया की मेरी चन्द पसंदीदा औरतों में विनीता का भी नाम है.. क्योंकि एक सक्षम प्रशासक होने के बावजूद उनके भीतर का कलाकार हमेशा जागा रहता है.. और टीवी की बेदिल संगीन दुनिया में उनकी लेखकों के प्रति ये नर्मदिली मुम्बई में मेरा सहारा है.. सच्चाई ये है कि मेरी जेब की तंगी का राज़ सिर्फ़ मजबूरी की आसन्न बेरोज़गारी नहीं.. चुनी हुई बेरोज़गारी है.. मुझे काम के लिए फोन आते ही रहते हैं..काम हमेशा उपलब्ध रहता है.. लेकिन मैं कतराता रहता हूँ क्योंकि स्वस्थ मानवीय माहौल और मानवीय सम्बन्ध बनाने सकने वाले विनीता जैसे लोग कम ही मिलते हैं.. मेरे जीवन में उनके न होने पर मेरी हालत और शोचनीय हो जाती..

कल विनीता की लिखी हुई पहली किताब का बुक लांच था.. किताब का नाम है डन्जन टेल्स.. जो मूलतः बच्चों के लाभार्थ लिखी गई है.. प्रकाशक हैं स्कॉलस्टिक.. और मूल्य है मात्र २५० रुपये.. मुम्बई की इनफ़िनिटी मॉल स्थित लैण्डमार्क बुक स्टोर्स में यह आयोजन रखा गया.. ज़ाहिर है विनीता ने मुझे इस अवसर पर मौजूद रहने के लिए बुला भेजा था.. मैं नियत समय से पहुँच भी गया.. किताबों की रैक्स को सरका कर बच्चों और बड़ों के बैठने के लिए जगह बनाई गई थी.. किताब का लोकार्पण करने के लिए मशहूर अभिनेता राहुल खन्ना आए थे.. उन्होने विनीता को गोवा की जेके राउलिंग बन जाने की शुभकामना दी.. जो मुझे कुछ जँची नहीं.. असली शुभकामना तो जेके राउलिंग को अपदस्थ करने की होगी.. जो मैं विनीता को देना चाहता हूँ.. दे रहा हूँ..

लोकार्पण के बाद विनीता ने अपनी किताब के बारे में बताना शुरु किया.. डन्जन टेल्स कहानी है एक बदमाश बादशाह की जो अपने एक शाप से बचने के लिए अपने कै़दखाने को हमेशा ठसाठस रखता है.. और कैदखाने में बंद कै़दी एक दूसरे को बताते हैं अपने क़ैद हो जाने की कहानियाँ.. जादुई फ़ंतासी से भरी रूमानी दुनिया की रोमांचकारी कहानियाँ.. ऐसी दुनिया जो बच्चों को विस्मय और अद्भुत की यात्रा पर भेज देती है..

विनीता अपनी बात कर ही रही थीं कि इसी बीच अचानक सबको चौंकाते हुए बदमाश बादशाह सचमुच लैंडमार्क में हो रहे इस समारोह में आ धमका और उसकी ज़िद और धमकी पर विनीता को एक डन्जन टेल पढ़कर सबको सुनानी पड़ी.. एक ऐसे कै़दी की कहानी जिसने अपना नाम खो दिया था.. सोचिये ऐसा खोया उसका नाम कि उसकी माँ तक को याद नहीं रहा..

फिर क्या क्या कैसे कैसे हुआ जानने के लिए पढ़िये डन्जन टेल्स.. अपने लिए न तो अपने बच्चों के लिए ज़रूर खरीदिये यह किताब.. और हिन्दी अंग्रेज़ी के टंटे में मत पड़िये.. हिन्दी में अभी मौलिक लेखन का बाज़ार विकसित नहीं हुआ है.. लिखने वाले आप को मिल भी जायं तो खरीदने वाले नहीं मिलेंगे.. मैंने भी अभी किताब पूरी नहीं पढ़ी है.. पर मुझे विनीता की रचनात्मकता पर इतना भरोसा है कि वह मुझे निराश नहीं करेगी और न ही आप को..

लिखने वाले जानते हैं.. ब्लॉग लिखने की बात तो कर ही नहीं रहा.. टी वी के लिए लिखना, फ़िल्म के लिए लिखना, अखबार और पत्रिका के लिए लिखना भी अपनी जगह.. असली लिखना तो किताब लिखना ही है.. जैसे कि आप तब तक फ़िल्म मेकर नहीं कहे जा सकते जब तक आप ने फ़ीचर फ़िल्म न बनाई हो.. आप तब तक असली लेखक नहीं कहे जा सकते जब तक आप की कोई किताब प्रकाशित ना हुई हो.. तो विनीता के जीवन में कल ११ अगस्त को वह बड़ा दिन आ पहुँचा.. लेखक तो विनीता बहुत पहले से ही थीं.. मगर अब वह गर्व से कह सकेगी कि वह एक लेखक है.. राइटर है.. या ज़्यादा स्टाइल मारना हो तो कहेगी कि वह ऑथर है.. मेरी उसे ढेरों शुभकामनाएं..

सोमवार, 9 जुलाई 2007

पाया ब्लॉग जगत ने एक नया नगीना

इस नगीने का नाम है अजित वडनेरकर.. और इनके ब्लॉग का नाम है शब्दों का सफ़र.. यूं तो भोपाल में एक पत्रकार की हैसियत से अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं अजित जी.. मगर मेरी दृष्टि में उस से भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण.. वे हिन्दी भाषा के संसार में एक मौलिक काम कर रहे हैं.. शब्दों को उनके मूल में जाकर जाँच परख रहे हैं.. देश काल और विभिन्न समाजों में उनकी यात्रा को खोल रहे हैं.. हमारे हितार्थ.. हिन्दी में इस प्रकार के काम विरल हैं..

रामचरितमानस छाप कर हिन्दी की सेवा पर सीना ठोंकने वाले आप को बहुत मिलेंगे मगर ऐसे नगीने दुर्लभ हैं.. पतनशील प्रकाशकों और साहित्यिक मठाधीशों के हिन्दी के भ्रष्ट भाषा संसार में ऐसी प्रतिभाएं गुमनामी की धुंध से बाहर नहीं आ पाती कभी.. इन्टरनेट की नई तकनीकों ने हमें वो आज़ादी दी है कि आज वैयक्तिक अभिव्यक्ति के लिए किसी की खुशामद की सीढ़ियों पर सर तोड़ने की ज़रूरत नहीं.. मगर अठन्नी के संतरे में बहकने वालो की ज़मीन से उगे लोग जिनकी पुरानी पीढ़ियां चपरासी के पद मद में चूर होती रहीं.. यहाँ भी सत्तामद में रो गा रहे हैं.. उन्हे अपने रुदन में लोटने दीजिये.. आइये आनन्द लीजिये अजित जी के शब्दों के स्वाद का..

संस्कृत में एक क्रिया है सृ जिसका मतलब होता है जाना, तेज-तेज चलना, धकेलना , सीधा वगैरह। इन तमाम अर्थों में गति संबंधी भाव ही प्रमुख है। सृ से ही बना है सर शब्द जिसका मतलब न सिर्फ जाना है बल्कि गतिवाले भाव को प्रदर्शित करता हुआ एक अन्य अर्थ जलप्रपात भी है। यही नहीं सर का मतलब झील भी है। इसी से सरोवर भी बना है । अमृतसर , मुक्तसर , घड़सीसर जैसे अनेक नामों में भी यही सर समाया है..
(सड़क-सरल-सरस्वती )

भारत में आमतौर पर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान ढोने वाले के लिए कुली शब्द का प्रयोग किया जाता है। किसी जमाने में ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति का सबसे घिनौना पहलू इसी शब्द के जरिये उजागर हुआ था । सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के मूल निवासियों के लिए अंग्रेज कुली शब्द इस्तेमाल करने लगे थे। अंग्रेजी, पुर्तगाली के अलावा यह शब्द तुर्की,चीनी, विएतनामी बर्मी, आदि भाषाओं में भी बोला जाता है। हिन्दी को कुली शब्द पुर्तगालियों की देन है पर यह भारतीय मूल का ही शब्द है। हालांकि आर्य भाषा परिवार का न होकर इसका रिश्ता द्रविड़ भाषा परिवार से जुड़ता है।हिन्दी का कुली दरअसल तमिल मूल का शब्द है और कन्नड़ में भी बोला जाता है। इन दोनों भाषाओं में इसका उच्चारण कूलि के रूप में होता है जिसका मतलब हुआ मजदूर अर्थात ऐसा दास जो मेहनत के बदले में पैसा पाए..(कुली के कुल की पहचान )

महाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन और दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना में भला क्या संबंध हो सकता है ? कहां अर्जुन पांच हजार साल पहले के द्वापर युग का महान योद्धा और कहां अर्जेंटीना जिसकी खोज सिर्फ पांच सौ वर्ष पहले कोलंबस ने की। दोनो में कोई रिश्ता या समानता नजर नहीं आती। पर ऐसा नहीं है। दोनों में बड़ा गहरा रिश्ता है जिसमें रजत यानी चांदी की चमक नजर आती है। भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार का रजत शब्द से गहरा नाता है। इस परिवार की सबसे महत्वपूर्ण भाषा संस्कृत में चांदी के लिए रजत शब्द है। प्राचीन ईरानी यानी अवेस्ता में इसे अर्जत कहा गया है.. (अर्जुन, अर्जेंटीना और जरीना)

भ‌ाष‌ा क‌ा शुद्धत‌म रस निचोड़ रहे हैं अजीत जी..और शुद्ध आन‌न्द की स‌रित‌ा ब‌ह‌ा रहे हैं.. (ध्य‌ान दें.. स‌रित‌ा में भी स‌र है..).. आन‌न्दम‌.. आन‌न्द‌म‌..

अब के पहले मैंने जिन भी लोगों का परिचय अपने ब्लॉग के माध्यम से कराया वे मेरे मित्र थे.. उनसे मेरी एक लम्बी पहचान रही थी.. मगर अजित वडनेरकर साहब से मेरा परिचय सिर्फ़ हफ़्ता भर पुराना है और चिट्ठाजगत के माध्यम से हुआ है.. वे लगभग रोज़ लिख रहे हैं..

अजित जी जैसे नए नगीनों को देखने के लिए और उन्हे लगातार पढ़ने के लिए या तो उन्हे किसी रीडर से सब्सक्राइब कर लें या देखते रहें चिट्ठाजगत.. या ब्लॉगवाणी..

रविवार, 20 मई 2007

फ़रीद खान की कविता



फ़रीद पटना के रहने वाले हैं.. उर्दू में एम ए और लखनऊ से भारतेन्दु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में डिप्लोमा करने के बाद पिछले पाँच साल से मुम्बई में हैं.. मेरी ही तरह टेलेवीज़न के लिए लिख कर अपनी रोज़ी कमाते हैं.. कविताएं लिखते रहे हैं.. पर कभी छ्पाई नहीं.. पानी जैसे मूलभूत तत्व के प्रति श्रद्धांजलि के तौर पर फ़रीद खान की क़लम से एक कविता फूटी है.. आप सब की नज़र है..


पानी

खबर आई है कि कुएँ बंद किए जा रहे हैं,
जहाँ से गुज़रने वाला कोई भी राहगीर,
किसी से भी पानी माँग लिया करता था।

वैज्ञानिकों के दल ने बताया है,
कि इसमें आयरन की कमी है,
मिनिरलस का अभाव है,
बुखार होने का खतरा है।

अब इस कुएँ के पानी से,
सूर्य को अर्घ्य नहीं दिया जा सकेगा,
उठा देनी पड़ेगी रस्म गुड़ और पानी की।

सील कर दिये कुएँ,
रोक दी गई सिचाई।

सूखी धरती पर,
चिलचिलाती धूप में बैठी,
आँखें मिचमिचाते हुए अम्मा ने बताया,
चेहरे से उतर गया पानी,
नालियों में बह गया पानी,
आँखों का सूख गया पानी,
प्लास्टिक में बिक गया पानी।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2007

एक और प्रतिभाशाली कवि.. एक और चिट्ठा..

अभी कल ही आपका परिचय कराया मित्र बोधिसत्व से और आज मिलाना चाहता हूँ अपने एक वरिष्ठ और पुराने साथी से.. जो एक बेहद प्रतिभाशाली कवि हैं.. नाम है चन्द्रभूषण .. और इनके चिट्ठे का नाम है पहलू..

मैं चन्दू भाई को १९८६ से जानता हूँ.. वो मुझसे पहले से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे.. पर मैंने उन्हे जाना प्रगतिशील छात्र संगठन (पी एस ओ) के माध्यम से.. संगठन का कर्यालय था १७१ कर्नलगंज, इलाहाबाद.. कार्यालय के सामने है प्रसिद्ध जवाहर बाल भवन और आनन्द भवन.. और पीछे है सी आइ डी का कार्यालय.. पीएसओ के कार्यालय में कुछ साथी ऐसे भी थे जो ना सिर्फ़ वहाँ दिन रात काम करते थे बल्कि वहाँ रहते भी थे.. उन साथियों मे एक चन्दू भाई भी थे.. चन्दू भाई ग़रीब ब्राह्मण परिवार से आये थे.. और विश्वविद्यालय में गणित पढ़ रहे थे.. पर अक्सर दिमाग़ में गणित से ज़्यादा रहने खाने के सवाल जगह घेरते.. ऐसे बुरे दिनो के बीच चन्दू भाई अपने दुःख और अपने स्वार्थ की ही चिन्ता नहीं करते रहते.. उनके मानसिक पटल पर वृहत्तर सामजिक सरोकारों की दावेदारी थी.. वहाँ छुद्र स्वार्थों को अपने पैर फैलाने की जगह नहीं मिली.. आरक्षण के सवाल पर उनकी पारिवारिक विपन्नता स्वाभाविक रूप से उन्हे आर्थिक आधार पर आरक्षण वाले तर्क के साथ गोलबन्द कर सकती थी.. पर उन्होने स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पास भी नहीं फटकने दिया.. और सामाजिक न्याय का पक्ष चुना..

अपनी पढ़ाई बीच में ही अधूरी छोड़ के चन्दू भाई १९८८ में सी पी आई एम एल से वैचारिक साम्य रखने वाले समकालीन जनमत में पूर्णकालिक रूप से सहयोग करने के लिये इलाहाबाद से पटना चले गये.. और उस दौरान राजनीति संस्कृति विज्ञान दर्शन से लेकर साहित्य तक अपनी लेखनी चलाते रहे.. उसके बाद भी मिलता तो मैं उनसे रहा हूँ पर मेरी स्मृति में चन्दू भाई की वही छवि अंकित है जो जनमत जाने के पहले उनके व्यक्तित्व की थी.. बाद में १९९६ में जनमत के बंद होने के साथ वो दिल्ली चले आये और तब से अखबारी दुनिया के बीच अपने भीतर के बेहतर इंसान को बचाने की प्रक्रिया में संघर्षरत हैं.. हिन्दी की कई प्रमुख पत्रिकाओं में चन्दू भाई के लेख कविताएं समीक्षाएं और तीन चार कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं.. बारह से अधिक किताबों का अनुवाद सम्पादित कर चुके हैं.. मगर बेहद कोमल संवेदनाओं के स्वामी चन्दू भाई भीतर से कवि हैं.. उनकी एक पंक्ति मुझे नहीं भूलती (जो अब तक शायद किसी कविता का अंग बन गई हो) .. मैं, मेरे एक और मित्र राजेश अभय और चन्दू भाई साथ में थे.. हम कुछ नशे में थे.. कुछ दुख में थे और कुछ गुस्से में.. और चन्दू भाई ने आसमान में घूरते हुये कहा.. साथी आज की रात.. आओ मारें चाँद को एक लात..

परिचय को और लम्बा नहीं करूंगा.. चन्दू भाई का इतनी रात गये नाम से एक कविता संग्रह २००१ में संवाद प्रकाशन से निकल चुका है.. जिन्होने इसे पढ़ा है उनका मानना है कि हमारे समय के सबसे सच्चे और ईमानदार प्रतिबिम्ब आपको यहाँ देखने को मिलेंगे... आप इस संग्रह को निम्न पते से मंगा सकते हैं..
ए-४, ईडेन रोज़, वृंदावन,
एवरशाइन सिटी, वसई रोड,
ठाणे पूर्व, महाराष्ट्र -४०१२०८

'इतनी रात गये' से मेरी पसंद की एक कविता..

दुविधा


सब कुछ खुला खुला सा है
पहरा मगर सख्त है
न दिन है न रात है
अजीब सा कोई वक़्त है

सुन्न शरीरों पर रस की फुहार
अपनी अपनी नींदो में खोये
सभी नाच रहे हैं
बहुत बुरा है यहाँ खुली आँख रखना
देखना सब कुछ चुपचाप सहना
उससे बुरा यह
कि थिरक रहे हैं अपने भी पाँव
न रोक पाता हूँ इन्हे
न शामिल हो पाता हूँ
चहार सू व्यापी इस एकरस लय में

ज़िन्दगी के सफ़र का
ये कौन सा मुकाम, उफ़
कि क्षितिज पर अटका है
आत्मा का सूरज
न उगता है, ना डूबता है

गुरुवार, 26 अप्रैल 2007

कवि बोधिसत्व भी बने चिट्ठाकार

हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषाई समाज का तअल्लुक काफ़ी विछिन्न हो चला है । कारण जो भी हो, लोग पढ़ते नहीं है । इसलिये नहीं कि कवि और लेखक इस स्तर के नहीं कि उन्हे पढ़ा न जाय बल्कि इसलिये कि हिन्दी भाषा अपनी राजनैतिक व व्यावसायिक उपयोगिता खो चुकी है । किताब ही खरीदनी होगी तो लोग अंग्रेज़ी की खरीदेंगे । पर हिन्दी ब्लॉग की दुनिया बात अलग है.. यहाँ पर वही प्राणी विचरते हैं जिनका हिन्दी से अटूट प्रेम है । और इन हिन्दी प्रेमियों के बीच कविता प्रेमियों की संख्या खूब प्रबल है । आज मैं आप सब प्रेमी जनों के बीच हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कवि को परिचित करने का आनन्द लेना चाहता हूँ । कवि हैं अखिलेश मिश्र बोधिसत्व और इनके ब्लॉग का नाम है विनय-पत्रिका । ये हमारे समुदाय का हिस्सा तो फ़रवरी में ही बन गये थे पर कुछ निजी कारणों के चलते सक्रिय न हो पाये और नारद में पंजीकरण भी नहीं कर पाये । पंजीकरण अभी भी होना है .. सोमवार का इंतज़ार कर रहे हैं (अब से नये चिट्ठों का पंजी करण सिर्फ़ सोमवार को ही होगा), पर सक्रिय हो गये हैं ।

बोधि और मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सहपाठी रहे हैं । इनकी प्रतिभा के पाँव उसी पालने में पहचाने गये थे । तब से अब तक बड़े मुकाम तय किये हैं बोधि ने । तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं -सिर्फ़ कवि नहीं (१९९२), हम जो नदियों का संगम हैं (२०००), और दुःख-तंत्र (२००४) और चार सम्मान प्राप्त कर चुके हैं । कई विश्वविद्यालयों और माध्यमिक पाठ्यक्रमों में इनकी कविता पढ़ी जाती है । फ़िलहाल मुम्बई में रिहाइश है और स्टार न्यूज़ में सलाहकार हैं । निजी तौर पर मुम्बई जैसे साहित्य विरोधी शहर में मेरे कुछ सहारों में बोधि भी हैं । बोधि की कविता के बारे में, मैं क्या कहूँ.. देश के सभी साहित्यिक हस्तियां इन्हे अपनी पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में मानती हैं । मैं एक इतर बात कहना चाहता हूँ जो वो हस्तियां नहीं जानती और नहीं कहती कि बोधिसत्व एक अद्भुत स्मृति के स्वामी हैं । जिस तरह से वो लगातार उद्धरण छोड़ते चलते हैं वो मेरे जैसे स्मृति शून्य व्यक्ति के लिये बेहद आतंकित करने वाला होता है । पर मैं अपने आपको इसी आश्वासन से बचाये रखता हूँ कि वे मेरे मित्र हैं नहीं तो कब का शर्म से गल कर बह गया होता । रामचरित मानस कुछ इस तरह से उन्हे ज़बानी याद है कि वो मुझे वेदपाठी ब्राह्मणों की परम्परा के लगने लगते हैं बावजूद इसके कि अभी अभी ही वे कुछ आरोपों और हमलों का भी शिकार हुये मोहल्ले में छपी उनकी कविता शांता को लेकर । मेरी इच्छा है कि वो अपनी कवितायें तो लिखते ही रहें साथ साथ अपनी इस प्रतिभा का उपयोग कुछ गद्य लेखन में भी करें ।

आप बोधि की एक कविता पढिये जो मेरी पसंद की इसलिये भी है कि वह हमारे शहर इलाहाबाद के बारे में है..

एक एक करके गिरते जाते हैं तरु,
होता जाता है सूना
वन का आँगन, उड़ते जाते हैं पत्ते
दुःख होता जाता है दूना।


घटती जाती है छाँह, मन होता
जाता है ऊना, हाल पूछना,
राह भूल कर आना जाना, बन्द हुआ
चूमना छूना ।


एक एक कर होते हैं उऋण, सोचते हैं
वहाँ उमड़ा आता है अब पावस,
होता है शुरु पत्तों की आँखों से
जल चूना ।

शनिवार, 10 मार्च 2007

घुघूती जी और मेरी माँ

घुघूती जी मुझे हमेशा अपनी माँ की याद दिलाती हैं.. मेरी माँ जीवित हैं और ७० की उमर की हैं.. मैं नहीं जानता कि घुघूती जी की क्या वय है.. निश्चित ही वे मेरी माँ की उमर के आस पास भी न होंगी लेकिन संवेदनात्मक स्तर पर उनमें काफ़ी समानता है..वो भी कविता करती हैं.. लेकिन भारतीय स्त्री संसार की सीमाओं के चलते उन्हे व्यापक मंच ना मिल सका..अगर ब्लॉगिंग के ये वातायन दसेक बरस पहले खुल गये होते.. तो शायद वो भी अपना ब्लॉग चला रही होतीं.. सीखने के लिये वो हमेशा तैयार रहती हैं..पर अब उन्हे कम्प्यूटर देख के घबराहट होती है.. कभी संभव हुआ तो मैं उनकी कविताओं का एक अलग ब्लॉग खोलूँगा.. फ़िलहाल उनकी एक कविता..



जब मै चाहूँ पंख पसारूं
मुझको तुम उड़ने देना
वापस लौट सकूँ जब चाहूँ
द्वार खुला रहने देना

कैनवस खुला हो मन का
मुझे तूलिका तुम देना
कैसे रंग भरूँ उत्सव का
मुझे बताते तुम रहना

छू लेते हो छप जाती हूँ
क्या कहते हो सुन लेती हूँ


विमला तिवारी "विभोर", 9 अक्तूबर 2001



पिछ्ले दिनों घुघूती जी की एक टिप्पणी पर तमाम तरह की प्रतिकियाएं आई, कुछ इतनी तीखी कि घुघूती जी को अपने को ग़लत कहना पड़ा.. ग्लानि जैसे शब्दों के साथ.. मुझे इस बात का बड़ा दुख है.. जिस तरह का पारिवारिक माहौल नारद में है..उस में एक वरिष्ठ महिला को ऎसे भावों से गुज़रना पड़े..ये खेद का विषय है।
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