रविवार, 20 मई 2007

फ़रीद खान की कविता



फ़रीद पटना के रहने वाले हैं.. उर्दू में एम ए और लखनऊ से भारतेन्दु नाट्य अकादमी से नाट्य कला में डिप्लोमा करने के बाद पिछले पाँच साल से मुम्बई में हैं.. मेरी ही तरह टेलेवीज़न के लिए लिख कर अपनी रोज़ी कमाते हैं.. कविताएं लिखते रहे हैं.. पर कभी छ्पाई नहीं.. पानी जैसे मूलभूत तत्व के प्रति श्रद्धांजलि के तौर पर फ़रीद खान की क़लम से एक कविता फूटी है.. आप सब की नज़र है..


पानी

खबर आई है कि कुएँ बंद किए जा रहे हैं,
जहाँ से गुज़रने वाला कोई भी राहगीर,
किसी से भी पानी माँग लिया करता था।

वैज्ञानिकों के दल ने बताया है,
कि इसमें आयरन की कमी है,
मिनिरलस का अभाव है,
बुखार होने का खतरा है।

अब इस कुएँ के पानी से,
सूर्य को अर्घ्य नहीं दिया जा सकेगा,
उठा देनी पड़ेगी रस्म गुड़ और पानी की।

सील कर दिये कुएँ,
रोक दी गई सिचाई।

सूखी धरती पर,
चिलचिलाती धूप में बैठी,
आँखें मिचमिचाते हुए अम्मा ने बताया,
चेहरे से उतर गया पानी,
नालियों में बह गया पानी,
आँखों का सूख गया पानी,
प्लास्टिक में बिक गया पानी।

33 टिप्‍पणियां:

अभय तिवारी ने कहा…

जो कुछ पुराना था, सब बेकार था, रुग्ण था.. जो कुछ नया है, प्रगतिशील है.. सब बढ़िया है, स्वस्थ है.. ऐसी मान्यता समाज में आम हो चली है.. विज्ञान को लेकर एक नये अन्धविश्वास से हम सब ग्रस्त हो चुके हैं..अब कुछ लोग ये सवाल उठाने लगे हैं.. बाज़ार विज्ञान और प्रगतिशीलता के नाम पर हमें क्या क्या बेच रहा है.. और पुरातन होने के ही अपराध से क्या क्या निधियां ध्वस्त की जा रही है..और हम इसके प्रति आँखें मूँदे हुए हैं..

परमजीत बाली ने कहा…

आज पानी की समस्या बहुत विकराल हो चुकी है। जब भारत की राजधानी दिल्ली मे साफ पानी पीने को नही मिल रहा तो बाकि जगह का क्या हाल होगा।
आँखें मिचमिचाते हुए अम्मा ने बताया,
चेहरे से उतर गया पानी,
नालियों में बह गया पानी,
आँखों का सूखा गया पानी,
प्लास्टिक में बिक गया पानी।

बेनामी ने कहा…

बहुत घिसा और कहा जा चुका मुद्दा, कहने को और भी बातें हैं भाई उन्हें कहें । अन्यथा चुप रहें।

एक और कवि ने कहा है-
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सुन
पावी गये न उबरहि मोती मानुस चून
आप की कविता में नया क्या है फरीद जी

अभय तिवारी ने कहा…

भाई बेनाम,
..आखों पर चढ़े मुद्दों के चश्मो को उतारो..जीवन के प्रकाश अन्दर जाने दो.. फिर बहुत सी दूसरी सामान्य बातें और चीज़ें भी विशेष रंग रूप लेती नज़र आयेंगी..
और इस तरह लोगों का मुँह बंद करना भले लोगों का लक्षण नहीं.. लोगों को अपनी बात कहने दो..

Pramod Singh ने कहा…

फ़रीद बाबू, प्रयास अच्‍छा है.. कविताओं की लिखाई का यह नेक़ काम आप और-और करते रहें. हमारी शुभकामनाएं..

Udan Tashtari ने कहा…

सूखी धरती पर,
चिलचिलाती धूप में बैठी,
आँखें मिचमिचाते हुए अम्मा ने बताया,
चेहरे से उतर गया पानी,
नालियों में बह गया पानी,
आँखों का सूखा गया पानी,
प्लास्टिक में बिक गया पानी।


--अच्छी रचना पेश की है, फरीद जी की. बधाई

अविनाश ने कहा…

फरीद, आपकी कविता में समाज को बाज़ार से बचाने की चिंता है. यही चिंता कविता के अर्थ को मार्मिक बना रही है. बाकी मैं अभय जी की बात से सहमत हूं.

मैथिली ने कहा…

"सूखी धरती पर,
चिलचिलाती धूप में बैठी,
आँखें मिचमिचाते हुए अम्मा ने बताया,
चेहरे से उतर गया पानी,
नालियों में बह गया पानी,
आँखों का सूखा गया पानी,
प्लास्टिक में बिक गया पानी।"
पहली बार पढ़ते पढ़ते यह कविता आंखों के आगे से गुम हो गयी. शुक्र है कि दुबारा पढ़ सका.
धन्यवाद अभय जी

आलोक पुराणिक ने कहा…

पानी पर पानीदार कविता फरीद खानजी, आपकी और रचनाओं का इंतजार रहेगा
आलोक पुराणिक

Bodhi ने कहा…

अक्सर नए कवियों को देख कर पहले से आसन मार कर बैठे कवि नाक-भौं सिकोड़ते हैं। लेकिन फरीद बाबू मैं तो खुश हूँ कि मुंबई को एक कवि और मिल गया आप की जय हो। बेनामों की छय हो। लिखते रहो और पानी पर लिकला ज्ञानेदय का विशेषांक भी एक बार देख लो। पानी भारत के लिए हमेशा महत्व का विषय रहा है। तुम्हारी कविता अच्छी है।
चलते- चलते-

प्यास और पानी की बात हो तो
बात करो दशरथ की
बात करो श्रवण कुमार की
उसके अंधे मां-बाप की
बात करो उन सब की जिनके
शब्दवेधी वाणों से
विधे हैं
लाखों प्यासे कंठ।
आज लाखों सरोवरों पर
यक्ष बैठे हैं
जो बेच रहे हैं अपने भाव पर पानी।

mona ने कहा…

tumhaari kavita man ki kisi kone ko chuute hai!! baar baar lagta hai ki is sawwal ko duhraane ki zaroorat haii!!aj hum sawaloon se bhagtee phir rahe hai zaroorat hai sawaloon ko mukhyee dhara me laane ki

अफ़लातून ने कहा…

फ़रीद की कविता में एक पानीदार समाज को टिकाने की तडप है । उन्हें साधुवाद दें ।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बढ़िया कविता, शुभकामनाएं फ़रीद जी।
शुक्रिया अभय भाई

शशि सिंह ने कहा…

तो फरीद मियां ये ज़ुर्म भी करते हो आप?... मिलो फिर बताते हैं... चार कविताएं सुनाये बगैर हिलने न दूंगा।

सुंदर कविता...

yunus ने कहा…

अच्‍छी कविता है, आनंद आया पढ़कर । मुंबई में हैं ज़रूर एक दिन मिलेंगे, बोधि जी ने सही कहा, मुंबई को एक कवि और मिल गया, बोधि जी कुछ करिए कि मुंबई के कवि केवल चिट्ठे पर ही ना मिलें, साक्षात मिलें ।

Nasiruddin ने कहा…

पब्लिक स्पेस में तुम्हारी कविता देख कर अच्छा लगा। 'निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटि छवाय'- इसलिए निंदकों की टिप्पणी से परेशान होने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपना काम करने दीजिये और आप अपना काम कीजिये। अभय जी को धन्यवाद, उन्होंने सार्व‍जनिक दायरे में अनजान एक कवि को पोस्ट करने का खतरा अपने ब्लॉग पर उठाया। रही बात पानी की, तो जो हाल है, पानी पर जितना लिखा जाये कम है। सुविधा के आदी लोग, जो सबसे ज्यादा पानी की बर्बादी करते हैं और पानी के सोते को खत्म होने के सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, उन्हें ये कैसे भायेगा। जरा सोचिये। और वे जिन्होंने न तो कुआं देखा हो, न कुएं की मिठाय महसूस की हो और न ही उसकी शीतलता को अपने अंदर उतारा हो वे क्या जानें कुआं क्या होता है।

Mired Mirage ने कहा…

इतनी अच्छी कविता हम तक लाने के लिए धन्यवाद । जल, वायु और भूमि पर जितना भी लिखा जाए कम है ।
घुघूती बासूती

irfan ने कहा…

आलोकधन्वा की पानी कविता से कुछ लाइनें भाई फरीद के लिये

Upendra Agnihotri ने कहा…

Dost mein aapka shukra guzaar hun jo aapne is or apni chinta jatayee. Samaaj ke girte mulya aur bazaarikaran ki wajah se insaan ki kho rahi insaaniyat bahut dukh hota hai.Sab kuch to bik raha hai . Yog aasan bik chuka hai, haldi patent ho gayee hai neem bhi .Kal hasne pe bhi pabandi hogi. Fresh air bhi bottle mein bikagee. Aur ak din insaaniyat dum ghot lege . Tab shyaad koi bhi insaan zinda na bache...

irfan ने कहा…

मित्रो, माफ करें.कल जब कुछ लाइनें भेजनी चाहीं तो बत्ती चली गई थी.फिर मैं कुछ फंस गया, देखिये.....
आदमी तो आदमी
मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था
कि भारत में बसना सिखाऊंगा

सोचता था
पानी होगा आसान
पूरब जैसा
मोम की रोशनी जैसा

गोधूलि में उस पार तक
मुश्किल से दिखाई देगा
और एक ऐसे देश में भटकाएगा
जिसे अभी नक्शे में आना है

ऊंचाई पर जाकर फूल रही लतर
जैसे उठती रही हवा में नामालूम गुम्बद तक
ये मिट्टी के घडे में भरा रहेगा
जब भी मुझे प्यास लगेगी

शरद में हो जायेगा और भी पतला

irfan ने कहा…

शरद में हो जायेगा और भी पतला
साफ और धीमा
किनारे पर उगे पेड की छाया में

सोचता था
यह सिर्फ शरीर के ही काम नहीं आयेगा
जो रात हमनें रोकर गुज़ारी
क्या उस रात पानी
सिर्फ शरीर तक आकर लौटता रहा?

क्या-क्या बसाया हमने
जब से लिखना शुरू किया?

उजडते हुए बार बार
उजडने के बारे में लिखते हुए
पता नहीं वाणी का
कितना नुक़सान किया

पानी सिर्फ वही नहीं करता
जैसा उससे करने के लिये कहा जाता है
महज़ एक पौधे को सीचते हुए पानी
उसकी ज़रा सी ज़मीन के भीतर भी
किस तरह जाता है

क्या स्त्रियों की आवाज़ों में बच रही हैं
पानी की आवाज़ें
और दूसरी सब आवाज़ें कैसी हैं?

दुखी और टूटे हुए ह्र्दय में
सिर्फ पानी की रात है
वहीं है आशा और वहीं है
दुनिया में फिर से लौट आने की राह.
------------------------------

तो दोस्तों इस तरह 'पानी'कविता आप तक पूरी पहुंची.

irfan ने कहा…

In addition to bodhi's प्यास और पानी की बात हो तो
बात करो दशरथ की.....Paanee piyo to yaad karo pyaas imaam husain kee.

Bodhi ने कहा…

सिर्फ इमाम हुसैन की प्यास की बात क्यों हो उनके साथ शहीद हुए बहत्ततर लोगों की प्यास पर आप क्यों नहीं बोलना कहना चाहते । अनीस साहब ने अपने मर्सिए में कर्बला के इन शहीदों की प्यास की दर्दनाक कथा या घटना का सिलसिले से वर्णन किया हैं वहाँ सभी बहत्तर लोगों के प्यास का हवाला है । इस्मत आपा का उपन्यास कतरा-ए-खून भी कर्बला के शहीदों में अकेले इमाम हुसैन के शहादत को ही महिमामंडित करके खत्म नहीं हो जाता वहाँ भी सभी शहीदों का महत्व के साथ वर्णन किया गया है । इरफान भाई इमाम साहब को कहीं बहुत या कुछ ज्यादा महत्व इस लिए तो नहीं दिया गया या दिया जा रहा कि वो पैगम्बर मोहम्मद साहब के सीधे रिश्तेदार थे उनके नवासे थे । इमाम साहब के साथ शहीद होनेवालों में बहुत सारे बच्चे और औरते थीं उन सब की प्यास कम महत्व तो नहीं रखती साथी । अनीस के मर्सिए पाठकों को रुलाते हैं उन्हे आप जरूर देखें ।
जहां तक मेरी बात है मुझे प्यास का जिक्र आते ही मेरे सामने अंधेरे जंगल में बह रही नदी में घड़ा डुबाता श्रवण कुमार और उस पर शव्द वेधी वाण साधते-चलाते दशरथ की छवि आ कर खड़ी हो जाती है। साथ ही प्यास के मारे व्याकुल श्रवण कुमार के माता-पिता का आर्तनाद सुन पड़ता है जो बिना पानी पिए ही मर गये । बचपन से किशोरावस्था तक इस प्रसंग पर न जाने कितनी बार रोया हूँ क्या करूँ अक्सर हमारी माताएं हमें श्रवण कुमार बनने का सीख दिया करती थीं ।

भाई पुराने भारतीय इतिहास में पानी को लेकर कई सारे युद्ध हुए हैं ऐसे ही एक युद्ध के कारण बुद्ध को संन्यास लेना पड़ा था। आंबेडकर की माने तो शाक्यों और कोलियों के बीच हर साल पानी के लिए भयानक खूनी संघर्ष हुआ करता था । इस विवाद का निपटारा बुद्ध भगवान बनने के बाद कर पाए।
भाई उस चकवा-चकवी के प्यास को भी याद कर सकते हैं जो एक स्वाति नक्षत्र के बूँद की आस में महीनों प्यासे रहते है। मृग मरीचिका में तो मृग पानी के भ्रम में मर ही जाता है उसे पानी नहीं मिलता । तो भाई संसार में प्यास की अनेक छवियाँ हैं सिर्फ इमाम हुसैन साहब की ही जिंदगी प्यास के खिलाफ नहीं काम आयी थी। हर समाज का एक यजीद होता है वह अयोध्या हो या कर्बला हो ।

irfan ने कहा…

बोधि भाई! बस यही मंशा थी कि आप माइथोलॉजी से सस्ते,सुन्दर और टिकाऊ उद्धरण देकर ही चलते न बनें.अब जब कि आपने प्यास की दूसरी चन्द छवियों को याद किया है,अनेक याद की मोहताज रह गयी होंगी.

अभय तिवारी ने कहा…

भई इरफ़ान, एक तो आप से अभी तक फ़रीद की हौसला अफ़्ज़ाई के लिये दो शब्द कहते नहीं बने.. उलटे इस कवि और उस कवि को आप फेंक फेंक कर मार रहे हैं.. इतने से भी संतुष्ट नहीं हुए तो एक कवि को दूसरे कवि की कविता फेंक कर मार रहे हैं.. वो जवाब दे रहा है तो आप उनके उद्धरण को सस्ता बता रहे हैं.. और छूट गई उपमाओ का हवाला दे रहे हैं.. जो छवियाँ मोहताज रह गईं उनमें से दो चार का कल्याण आप कर दीजिये.. बिना दूसरे कवियों की गिरह काटे..

irfan ने कहा…

"प्रतिक्रिया,जो लिखी न जा सकी"

भाई अभय, मुझे फरीद(शिब्बू)की कविता बहुत पसंद आई.प्रभु उनकी लेखनी को शतायु करे और मां सरस्वती का उनकी जिह्वा पर वास हो.आप लोग निर्मल आनंद पर जिन धवल भावनाओं का संचार कर रहे हैं, कामना करता हूं उससे हमारा देश एक दिन विश्व बिरादरी के सामने एक बार फिर से सोने की चिडिया कहा जायेगा.भाई बोधि ने सनातन स्म्रृतियों से जो बानगी प्रस्तुत की है उसकी तो सराहना करने के लिये मुझे शब्द ही नहीं मिल रहे हैं.शब्द तो मैं यहां भी जो छौंक रहा हूं वे गोस्वामी जी से उधार लिये हुए हैं.आपको बहुत बहुत साधुवाद.
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लीजिये मैंने आपकी इच्छा का मान रखा.बताइये इससे क्या फरीद के विकास में बाधा आई या अब उन्हें युवा कवि होने का भारत भूषण पुरस्कार मिल गया. क्या उनकी ऐसी कोइ तमन्ना भी है? मुझे जो कहना था मैं शिब्बू से कह चुका हूं और वे समझ भी चुके हैं आप क्यों उन्हे जल्दी से कवि की मान्यता दिलाने को आतुर हैं?

अभय तिवारी ने कहा…

भाई इरफ़ान आप ने तो तारीफ़ क्या की तमाचा मार दिया.. ले साले .. यहीं माँग रहा था न अब बोल.. और वो शिब्बू उसे तो मैं जानता ही हूँ.. उसकी तारीफ़ करनी होगी तो अकेले में करूँगा.. सबके सामने करूँगा तो बेकार दिमाग खराब होगा उसका.. सही है.. आप का शिब्बू है.. मैं तो फ़रीद को जानता हूँ..
दूसरी बात .. आप को बोधि की बातों को सस्ता कह कर शांति नहीं मिली.. अब आप उन्हे साम्प्रदायिक होने का आरोप लगा रहे हैं.. बस आपने ये शब्द भर ही तो नहीं इस्तेमाल किया बाकी सबतो कह ही डाला.. मुझे नहीं पता था कि आप के भीतर ऐसा परिवर्तन आ गया है कि आप को भारतीय कथाओं कहानियों मिथको का ज़िक्र भर भी साम्प्रदायिक लगने लगा है.. और इस्लाम धर्म के महत्वपूर्ण स्तम्भ की चर्चा प्रगतिशील.. मुझे तो हुसेन से कोई गुरेज़ नहीं.. उनकी प्यास दारुण है.. सुनने वाले को रुला देती है.. पर बिना उनका ज़िक्र हुए किसी और की प्यास मान्य न होने की आप की शर्त मेरे गले नहीं उतरती.. इसमें मुझे एक खास तरह की बीमार मानसिकता की छाया नज़र आती है.. आप ज़रा विचारे इस पर..

irfan ने कहा…

मित्र, आप कुछ हडबडी में नहीं हैं? उस कल्पना प्रवण वैज्ञानिक की तरह जो अपनी मनगढ्ंत व्याख्या को सही मानने के लिये इतना पूर्वाग्रही हो जाता है कि तथ्य अगर उसकी व्याख्या का खंडन भी करें तो वह उसका त्याग नहीं करता बल्कि तथ्यों को ही अपने सिद्धांत में फ़िट करने के किये तोड मरोड लेता है?
अब मेरी यह ऊपर दर्ज् बीमार मांसिकता किसकी कटी हुई गिरह से गिरी है, ये फ़ैसला आप पर छोडता हूं.
वैसे आपने "मुझे तो हुसेन से कोई गुरेज़ नहीं.. उनकी प्यास दारुण है.." कहकर प्यास के दारुण या अदारुण होने का फ़ैसला करने का अधिकार अपने ही पास रखा है, इसलिये ये तो तय है कि मैं भले बदल गया होऊं, आप वही रहे-- हडबडी से काम लूं तो कहूंगा--ब्राह्मणवादी--लेकिन सही फ़िकरा होगा-- अपनी सहजवृत्तियों से संचालित.

अभय तिवारी ने कहा…

ठीक समझा आपने.. मुझे सहजता रुचती है..

irfan ने कहा…

"मैंने कही और तूने मानी दोनों परम गयानी."

ज़ाकिर ने कहा…

आप दूसरों के बारे में भी सोचते हैं, ये देख कर अच्छा लगा। बधाई स्वीकारें।

Farid Khan ने कहा…

२० मई को प्रकाशित मेरी कविता पर जब उसी दिन १० टिप्प्णियां आ गईं तो मुझे बड़ी ख़ुशी हुई ... मेरी ज़िन्दगी का ये पहला ऐसा मौका था जब कोई रचना छपी हो और उस पर फ़ौरन ही १० लोंगो ने कुछ कहा...

फिर ये सिलसिला २३ मई तक चला... और भी खु़शी हुई.... इसमें इरफ़ान भाई काफ़ी पेश पेश रहे...इस पर मैने शुक्रिया का एक पत्र भी उन्हें प्रेषित किया....

लेकिन २४ मई आते आते उनकी टिप्पणियां व्यक्तिगत कटाक्ष का रूप धारण करती गईं...जो २५ मई तक चलती रही...

मुझे इससे व्यक्तिगत रूप से भी ठेस पहुंची है और वैचारिक स्तर पर भी...(मेरी कविता किस विषय पर है, ये भुला दिया गया)

पानी या प्यास का ज़िक्र आते ही अगर किसी को इमाम हुसैन की याद आती है तो इस पर किसे आपत्ति हो सकती है...तो फिर श्रवण कुमार पर आपत्ति का कोई कारण नहीं बनता....(इरफ़ान भाई ने आपत्ति शब्द का इस्तेमाल तो नहीं किया है लेकिन शब्द-प्रयोग से साफ़ तौर पर ऐसा ही लगता है.)

अब मेरे दिमाग़ में पानी के ज़िक्र के वक्त ना तो इमाम हुसैन आते हैं ना श्रवण कुमार....मेरे छोटे भाई के दिमाग़ में तो बिस्लरी की बोतल उभरती है...और मैं नहीं चाहता कि कोई उसे ये डिक्टेट करे कि कौन सी बात के ज़िक्र पर किस चीज़ की याद आनी चाहिए...

जहां तक मेरी बात है मैंने पानी के रूप में सिर्फ़ गंगा नदी को देखा हैं ... ना श्रवण कुमार ना इमाम हुसैन ....और गंगा में सूर्य को अर्घ्य देने को उठे हाथ देखे हैं .... जो मेरे पूरे व्यक्तित्व में परिलक्षित होता है...अगर मैंने कुछ नहीं देखा है, तो ठीक है देख लूंगा... लेकिन कोई डिक्टेट क्यों करेगा मुझे...?

हमारी परवरिश के दौरान ही हमें अपनी अभिव्यक्ति के विभिन्न टूल्स मिलते हैं जिनकी मदद से हम खु़द को अभिव्यक्त करते हैं ....अगर इरफ़ान भाई को लगता है कि इमाम हुसैन को भी याद किया जाना चहिए तो इरफ़ान भाई आप उन्हें याद करें उन कविता भी लिखें , हम उसका सम्मान करते हैं...
आप मुझे जानते है व्यक्तिगत रूप से ...इसलिए आप को ज़रूर याद होगा कि मेरे मामा परवेज़ अख्तर ने हमेशा अपनी अभिव्यक्ति के लिए महाभारत की कहानियों को ही अपना टूल बनाया है ...इसीलिए उन्होंने सत्य हरीश्चंद्र , माधवी, मुक्ती पर्व(क्रिष्ण पर),बर्बरीक उवाच जैसे नाटक किए....दूसरे मामा नें कबीर और संत कवि बसवण्णा पर नाटक किए.

उन्ही मामा ने मेरी परवरिश की है...मेरे ज़ेहन में इमाम हुसैन कैसे आएंगे....

अब आपने इतना ज़ोर दे दिया है तो मैं ज़रूर जानूंगा इमाम हुसैन के बारे में...लेकिन कविता की आलोचना साहित्यिक दाएरे में होनी चाहिए....मेरी कविता को अखाडा बना कर कुश्ती करने से प्यार नहीं बढ़ता है....

अंत में मै उन सबका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने मेरी कविता पढी़...और ये उम्मीद करता हूं कि हम लोग अपने विषय से अब नहीं भटकेंगे.

ध्न्यवाद.

अजित वडनेरकर ने कहा…

अच्छी कविता। तब नहीं पढ़ पाया था क्योंकि मैं ब्लागर नहीं हुआ था तब तक :)
फ़रीद साहब से मिल कर अच्छा लगा। उन्हें लिखते रहना चाहिए। हमारी टिप्पणी की उन्हें ख़बर कर दें ज़रूर:)

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