गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014
रेसिज़्म का हल्ला
१॰ निदो दुकान पर जाकर पता पूछता है, वो उस पर कुछ कमेंट करते हैं
२॰ निदो दुकान में इतनी तोड़फोड़ करता है कि पुलिस की मध्यस्थता के बाद वो ७७००₹ देने को राज़ी हो जाता है। (ज़ाहिरन हत्या के मुलज़िमों ने पुलिस को बुलाया)
३॰ निदो अपने कुछ और दोस्तों के साथ वापस घटना स्थल पर आता है। निदो के हत्या के मुलज़िम पुलिस को फोन करते हैं (दुबारा)। पुलिस वाले आकर फिर बीच बचाव करते हैं। निदो की माँ को फोन करते हैं। माँ कहती हैं कि निदो को उसके लोक गारजियन के पास छोड़ा जाय।
४॰ निदो थाने जाकर अपने एक दोस्त को ही लोकल गारजियन बताकर वहाँ से चला जाता है।
५॰ अगले दिन निदो की मौत हो जाती है।
६॰ शव परीक्षा के बाद किसी बाहरी चोट से मौत मुमकिन नहीं लगती। सब मामूली चोटे हैं।
ये आज की ख़बर है। पर निदो की मौत के पहले दिन से ही फेसबुक के सजग प्रहरियों ने इस पूरे मामले को रेसिज़्म से प्रेरित बताया और मीडिया ने भी। माफ़ करें साहब मुझे तो इसमें रेसिज़्म नहीं समझ आता। झगड़े, मारपीट, हत्याएं देश भर में होती हैं। विभिन्नताओं का देश है। ये कैसे मुमकिन है कि हिन्दू हिन्दू से लड़े, जैन जैन से, और मणिपुरी मणिपुरी से? सब को एक दूसरे से लड़ने का ईश्वरीय हक़ मिला हुआ है। निदो १९ साल का जवान ख़ून, जोश से इतना उबल रहा था कि न उसे किसी की सम्पत्ति की परवाह थी और न पुलिस-क़ानून की। ये भी ध्यान रखना चाहिये कि वो एक एम एल ए का बेटा था, हमारे देश मेँ इनकी एल अलग क़ौम बन चुकी है। हो सकता है हत्या के मुलज़िमों ने कोई ऐसी बात कही हो जो रेसिज़्म से प्रेरित हो, मगर क्या इस तरह की हिंसा से रेसिज़्म का हल किया जाएगा, जिसका परिचय निदो ने दिया?
मेरी समझ में तो ये एक ऐसी मानसिकता का मामला है जिसमें आप हर बात का जवाब हिंसा से देना चाहते हैं। और ऐसी मानसिकता हर समाज में आपराधिक कहलाती है, चाहे वो अरुणाचल के एम एल ए का बेटा करे या लाजपत नगर का एक पनीर वाला।
लेकिन मेरे तमाम दोस्तों और मीडिया ने इस मामले का ऐसा रंग बदला कि हमेशा चुप रहने वाले प्रधानमंत्री तक को बोलना पड़ा। वे इसे अपनी सफलता मान सकते हैं। पर मेरी समझ से ये दुखद है। मेरे दोस्त पहले भी इस तरह की ग़लतियां करते रहे हैं। ख़ुर्शीद अनवर के मामले में भी मित्रों ने बिना सोचे समझे उनके विरुद्ध कैम्पेन शुरु कर दिया। क्यों? स्त्री के साथ खड़े होना प्रगतिशीलता है, इसलिए वो आँखमूंदकर फ़ैसले कर रहे हैं। खिड़की मामले में भी यही हुआ। वहाँ तो उन्होने एक मंत्री ही नहीं पूरे मोहल्ले को रेसिस्ट क़रार दे दिया। और अब ये निदो का केस!
क्या मिला उन्हे? उनके इस अभियान से क्या लोगों के भीतर से नस्लवाद की भावना चली जाएगी? उलटे और पनपेगी। क्योंकि आप लोगों की आँखों में उंगली डालकर उन्हे पूर्वोत्तर के लोगों को अलग चिह्नित करवा रहे हैं। और पूर्वोतर के लोगों के मन में भी जबरन एक असंतोष की भावना को बल दे रहे हैं? क्यों? अगर ये राजनीति है तो ठीक है, अच्छी नीति है। क्योंकि राजनीति लोगों को बांटकर ही होती है।
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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
बदलाव का संकट
क्या कारण है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दल अपने दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं में संवैधानिक मूल्यों के प्रति कोई आस्था न पैदा कर सके? शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे राष्ट्रपति के अपने ज़िले में ऐसी जघन्यता पलती रही?
क्या इसका कारण यह है कि हमारे लोग संविधान का सम्मान तो करते हैं पर इसमें निहित मूल्य और आदर्श, उनके अपने मूल्य और आदर्श नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि बहुसंख्यक समाज आज भी स्त्री को हीन समझता है? क्या न्याय और दण्ड की जैसी व्यवस्था हमारे संविधान ने की है, सामाजिक कल्पना में भी वैसी ही न्याय और दण्ड की व्यवस्था है?
मेरा विचार है कि हमारा संविधान तो एकता, समानता और न्याय के प्रगतिशील मूल्यों पर आधारित है जबकि भारतीय समाज में कई स्तरों पर पिछड़ापन और पतनशीलता नज़र आती है।
मगर ये हुआ कैसे? यदि हमारा संविधान हमारे ही समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो किस समाज का करता है? तो क्या सच ये है कि हमारा समाज उन प्रगतिशील मूल्यों को ढो रहा है जिन पर दिल से उसकी आस्था नहीं है?
अगर सचमुच ऐसा है तो ये एक बड़े संकट की और इशारा है- जिसमें संवैधानिक व्यवस्था में क़ानून बनाकर बदलाव तो कर दिए गए मगर सामाजिक बदलाव का पक्ष पूरी तरह उपेक्षित रहा!
तब फिर क़ानून बनाकर, लोगों को अपराधी घोषित करके, उन्हे दण्डित करके क्या हासिल होगा? आधा देश स्त्रीविरोधी, जातिवादी, साम्प्रदायिक, और न जाने किस-किस अपराध का भागीदार हो सकता है।
क्या दण्ड का डर ही बदलाव की बुनियादी शर्त है? असली बदलाव कैसे होता है? भीतर से या बाहर से? मेरी समझ में बाहर से केवल हिंसा हो सकती है, विकासमान परिवर्तन केवल भीतर से ही मुमकिन है।
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010
खिचड़ी पोस्ट
* सण्डे के टाइम्स (३१ जनवरी) में स्वप्न दास गुप्ता ने भाषा पर बात की है, लिखते हैं- “हिन्दी अपने आत्मसम्मान की कमी से उबर नहीं सकी है; हिन्दी एक ज़माने से उर्दू के सामने एक हीन भावना से पीड़ित है और एक विकसित भाषा के रूप में विकसित न हो पाने की ज़िल्लत से भी ग्रस्त है।”
वो आगे कहते हैं, “भारत में अंग्रेज़ी विचार, अमूर्त चिन्तन और व्यापार की भाषा है जबकि लोक व्यवहार की। और ये फ़ारसी-हिन्दुस्तानी के पुराने समीकरण का दोहराव है, और इसीलिए नेहरू जी को जब राष्ट्र को सम्बोधित करना था (ट्रिस्ट विद डेस्टिनी...) तो अंग्रेज़ी में बात की और जब वोट माँगने की बारी आई तो हिन्दी अपना ली।”
बात निराधार नहीं और विचारणीय है।
* उसी अख़बार में पाकिस्तान से नदीम पराचा लिखते हैं कि अविभाजित हिन्दुस्तान में मुसलमानों को तब अचानक अस्तित्व का संकट लगने लगा जब अंग्रेज़ों के साथ लोकतंत्र की व्यवस्था लागू करने की बात होने लगी, उन्हे लगा कि वे अल्पमत में हो जाएंगे। और कभी ख़लीफ़ा को कुछ न समझने वाले भारतीय मुसलमानों का एक हिस्सा अपनी पहचान को, हिन्दुओं से तोड़कर अरब और तुर्की से जोड़कर देखने लगा। और ये बात इस हद तक गई कि वे लड़ाके जिनका हिन्दुस्तान से कोई लेना-देना भी न था, वे मुसलमानों के हीरो बन गए, जैसे गोरी और गज़नी (पाकिस्तान की मिसाइलों के नाम इसी नाम पर हैं)। हिन्दुओं का एक अतिवादी हिस्सा ऐसे नए नायक गढ़ने लगा। और इस विचार को वैचारिक दाना-पानी इक़बाल से मिला जिनकी नज़र में संयुक्त हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष व्यापक मुस्लिम एकता के ख़िलाफ़ था। हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता के कारण नदीम अचानक उपजे हिन्दू फ़ासिज़्म और मुसलमानों के बीच अल्पसंख्यक होने की मानसिकता के एक हवाई बौद्धिकीकरण में देखते हैं। नदीम पाकिस्तानी समाज की तकलीफ़ों की जड़ भी यहीं देखते हैं कि लोग एक तरफ़ तो फ़िलीस्तीन, इराक़, अफ़्ग़ानिस्तान और कश्मीर के मुसलमानों के दुख पर आँसू बहाते हैं और दूसरी ओर देश के भीतर मुसलमानों पर आए अज़ाब पर से नज़र फेर लेते हैं। जबकि पूरा देश मुसलमानों का है फिर भी एक तरह की अल्पसंख्यक मानसिकता बनी हुई है।
नदीम की बात में दम है। मैं ख़ुद पिछले दिनों इक़बाल के शिकवा और जवाबे शिकवा पर नज़र डाल कर सोचता रहा हूँ कि किसे तरह की मानसिकता है ये, क्या रोना रोया जा रहा है अल्लाह से कि मुसलमानों के साथ नाइंसाफ़ी हुई जब कि उन्होने तुम्हारे लिए जेहाद किया था? अगर ब्राह्मण ऐसा रोना रोयें तो, क्षत्रिय रोयें तो? इक़बाल में एक सूफ़ी तत्व ज़रूर है लेकिन वे बड़े तौर पर प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी चिंतक और शाएर हैं।
*१२ जनवरी को एक्सप्रेस में खबर थी कि तिरुअनन्तपुरम में मलयालम लेखक पॉल ज़कारिया पर सी पी एम के कार्यकर्ताओं ने हमला किया। ज़कारिया ने पार्टी के भीतर औरत-मर्द के रिश्तों को लेकर मौजूद पिछड़े चिंतन की आलोचना की थी। हुआ ये था कि एक कांग्रेस नेता के किसी स्त्री से ‘अनैतिक सम्बन्ध’ का पर्दाफ़ाशा करने के लिए उन्होने उस नेता को रंगे हाथ पकड़ने के लिए एक मकान का घेरा डाला और पुलिस के हवाले कर दिया। ज़कारिया का मानना था कि सी पी एम चर्च की तरह सेक्स के प्रति संकीर्ण नज़रिये को बढ़ावा दे रही है, जबकि पिछली पीढ़ी के पार्टी के भूमिगत नेताओं का सेक्स के लेकर काफ़ी उदार नज़रिया था। उन्होने कहा कि हालत ये आ गई है अपनी पत्नी के साथ घूमना भी ख़तरनाक होता जा रहा है। लेकिन वापस सी पी एम ने ज़कारिया की मज़म्मत की।
पॉल ज़कारिया एक अनोखे और अद्भुत कथाकार हैं, जो चर्च से लोहा लेते रहे हैं। लेकिन अब सी पी एम भी उन्हे विचार की आज़ादी नहीं दे रही। पूछा जाना चाहिये कि सी पी एम शिव सेना और बजरंग दल से कैसे अलग है? लोगों को बेडरूम में तो आज़ादी दो! लेकिन यहाँ झण्डे के रंग से नैतिकता पर फ़र्क नहीं पड़ता। हर पार्टी का अगर बस चले तो तस्लीमा नसरीन को जूते से मारे, नहीं मारते क्योंकि उसे मारने के लिए हैदराबाद के मुसलमान हैं ना।
देखिये लोगों ने नारायण दत्त तिवारी के बिस्तर के पाये काट डाले। अस्सी के पार का एक जवान अब कुछ भी दम-ख़म रखता है इस पर ख़ुश होने और उस से प्रेरणा लेने के बजाय लोग गरियाने लगे? दो लोगों के बीच आपसी सहमति से जो कुछ होता है वह आप के लिए नैतिक भले न हो, पर उन्हे उस अनैतिकता की आज़ादी होनी चाहिये। नारायण दत्त से इस्तीफ़ा लेने के बजाय उन पर संगठित वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने का मुक़द्दमा चलता तो बात जाएज़ लगती क्योंकि वेश्यावृत्ति अपराध नहीं है, वेश्यावृत्ति करवाना अपराध है।
*इश्कि़या देख ली। मनोरंजक है। छोटे शहरों की दुनिया में धँसती नहीं उनकी नुकीली, पथरीली सच्चाई का अच्छा इस्तेमाल कर लेती है कुछ मस्ती रचने में। ऐसा लगता है कि पूरी फ़िल्म यह सोचकर लिखी गई है कि ताली पिटवानी है और पिटवा लेती है। अगर यह दबाव न लेती तो इश्किया और बेहतर फ़िल्म हो सकती थी। हॉलीवुडी की वेस्टन फ़िल्मों की संरचना पर आधारित है और अपने को किसी भी राजनैतिक झुकाव से मुक्त रखती है। ये बात फ़िल्म को भारी नहीं होने देती और शायद मेरी उस से यही शिकायत भी है। संवाद चुटीले हैं लेकिन भाषा, उर्दू, हिन्दी, भोपाली और न जाने क्या-क्या होती रहती है। अरशद लुभाते हैं लेकिन नसीर को देखकर लगता है कि कुछ नया देखने का अब बचा नहीं।
रविवार, 3 जनवरी 2010
चेतन भगत शुड बी थैंकफ़ुल
आज ख़बर है कि 'थ्री ईडियट्स' के निर्माता विनोद चोपड़ा ने एक पत्रकार को चिल्ला कर और आँखें तरेर कर कहा कि 'शट अप!' वे पूरी फ़िल्म की कास्ट और क्रू के साथ एक पत्रकार सम्मेलन में थे। लोग उनसे 'फ़ाइव प्वायंट समवन' उपन्यास के लेखक चेतन भगत के आरोपों का जवाब चाह रहे थे, जिन्होने कहा है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। उनका नाम आया ज़रूर है मगर फ़िल्म के अन्त में रोलिंग क्रेडिट्स में। जबकि फ़िल्म की शुरुआत में कहानी लेखक के रूप में अभिजात जोशी और राजकुमार हीरानी का नाम आया है। उन्हे इस पर ऐतराज़ है, मुझे भी है थोड़ा-थोड़ा। उनका मानना है कि मूल कहानी उनकी है और शेष उसका रूपान्तरण है।
एच टी में वीर संघवी लिखते हैं कि इट्स ऑल एबाउट ग्रेस; 'स्लमडॉग मिलयनेर' भी विकास स्वरूप के नॉवेल 'क्यू एन्ड ए'से काफ़ी जुदा थी, मगर उनके भीतर इतनी गरिमा थी कि उनका नाम फ़िल्म क्रेडिट्स में निर्देशक के नाम के ठीक बाद आता है, और निर्देशक डैनी बॉयल उन्हे अपनी सफलता में शामिल करने के लिए आस्कर लेते वक़्त उनको मंच तक साथ ले जाते हैं।
फ़िल्मी दुनिया में लेखक सबसे निरीह जानवर रहा है। सबसे पहले डाका उसके पैसों और नाम पर ही पड़ता है। यहाँ हर निर्देशक को अपने नाम के पहले 'रिटेन एन्ड डाइरेक्टेड बाइ' देखने का शौक़ है। इस दुनिया ने तो बड़े-बड़े फ़िल्मों, बड़ी-बड़ी किताबों पर डाके डाले और किसी को कोई आभार तक नहीं दिया, छोटे-मोटे लेखक तो रोज़ ही मारे जाते हैं। चोपड़ा जी ने कम से कम किताब के अधिकार खरीदे, पैसे भी दिये, और भले आख़िर में, पर नाम दे तो दिया। चेतन भगत को उन के पैर छू कर धन्यवाद देना चाहिये, उन्होने धन्यवाद नहीं दिया इसीलिए चोपड़ा जी को क्रोध आ गया, नहीं तो वो देवता आदमी हैं।
मंगलवार, 3 नवंबर 2009
राज्य की नैतिकता और तमाम उलझे सवाल
यह राज्य और लोकतंत्र दोनों ही विभिन्न प्रकार रोगों, दोषों से आक्रान्त है लेकिन मैं शरीर में बुखार या दूसरा कोई रोग हो जाने पर हाथ-पैर फेंक कर उससे लड़ने या हताश हो कर ये सोचने कि ‘अब तो मर ही जायेंगे’ की जगह रोग को समझ लेने और उपलब्ध ज्ञान और पिछले अनुभवों के आधार पर उपचार में क्या-क्या कष्ट आने वाला है, उसे जान लेना अधिक बेहतर समझता हूँ। मुझे लगता है कि इस मामले में बहुत सारे लोग राज्य और सरकार के खिलाफ़ एक प्रकार के हताश आक्रोश से भरकर विरोध कर रहे हैं। जैसे कि देखा कि मित्र आनन्द प्रधान ने चिंता व्यक्त की है कि देश में अघोषित आपातकाल लगने वाला है। अरुंधति मानती हैं कि इस देश में लोकतंत्र ही नहीं है एक ढकोसला है। और भी बहुत सारे बुद्धिजीवी चिंतक ऐसी ही चिंताए व्यक्त कर रहे हैं।
लोकतंत्र क्या है? रूसो, वालतेयर के नवजागरण के विचारों और फ़्रांसीसी क्रांति के गर्भ से जन्मा यह शासनतंत्र बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों पर आधारित हुआ। लेकिन जन्म लेते ही खुद फ़्रांस में इसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहा और एक समय चक्र के बाद ही इसकी पुनर्स्थापना हो सकी। ब्रिटेन, अमरीका और अन्य योरोपीय देशों में यह फिर भी एक कुदरती चाल से क़ाबिज़ हुआ, भारत में लोकतंत्र लगभग ऊपर से आरूढ़ हुआ। जनता लोकतंत्र के लिए नहीं अंग्रेज़ो को बाहर करने के लिए आन्दोलन कर रही थी। अंग्रेज़ बाहर गए उनका बनाया तंत्र रह गया।
इस तंत्र की ज़रूरत, पहुँच और क्षमता कहाँ तक थी और कितनी थी, यह सब कहना मुश्किल है। माओवादी तो मानते हैं कि हम अभी भी अर्धसामन्ती समाज में हैं (फिर भी लड़ाई पूँजीवाद और साम्राज्यवाद से?)। लेकिन हमारे लगभग सभी बुद्धिजीवी संवाद के समय एक ऐसी जगह से अपनी बात शुरु करते हैं जहाँ पर लोकतंत्र एक ऐसा खूबसूरत और कल्याणकारी लिबास है जो सरकार ठीक से पहन नहीं पा रही और जगह-जगह से उघड़ जा रही है। गोरख पाण्डेय के गीत की एक पंक्ति है : समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई। गीत व्यंग्य में है पर मैं मानता हूँ कि क्रांतिकारी समाजवाद की गति हम देख चुके हैं, जल्दी में बहुत नुक़्सान भी हुए। और अभी तो ये लगता है कि लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे आई।
राज्य का स्वरूप आज जैसा है, हमेशा वैसा नहीं था। मेरे मित्र आशुतोष आज के इस राज्य को अन्याय की मशीनरी मानते हैं, है, पर मेरा आग्रह है कि वर्तमान की आलोचना करते हुए आदर्शों और सुनहरे सपनों को तो नज़र में ज़रूर रखें पर उसका इतिहास भी मत भूल जाइये। ऐतिहासिक रूप से हम जिसे भारत का स्वर्ण काल समझते हैं –मुग़ल काल – उस दौर में व्यक्ति को सम्पत्ति का अधिकार नहीं होता था, सबै भूमि गोपाल की नहीं, बादशाह की होती थी। जब जिस को चाहे दी जब चाही वापस ले ली। आज रहीम खानखाना बड़े अच्छे हैं कल मन उखड़ गया सब कुछ छीन-छान कर भिखारी बना दिया। कल तक जो दसहज़ारी सरदार था, जंग में काम आ गया या बादशाह रूठ गए, दी हुई जागीर वापस ले ली, यहाँ तक कि मकान और सौगातें भीं। दसहज़ारी सरदार का सारा खानदान दाने-दाने को मोहताज़ हो गया। यह हाल मनसबदारों का हो सकता था तो आम जन के क्या हुक़ुक़ थे, पूछे जाने की ज़रूरत है क्या?
अंग्रेज़ो के सत्ता में आने के पहले आलम ये था कि पूरा ‘देश’ (उस वक़्त देश क्या था, ठीक-ठीक कहना मुश्किल था, लोग दूसरे गाँव जाकर भी परदेसी हो जाते थे) घोड़ों की टापों के नीचे लगातार रौंदा जा रहा था। बरसात के चार महीने जब नदियां उफ़न कर सेनाओं की आवाजाही पर रोक लगा देतीं, साल भर मराठे, ईरानी, तूरानी, अफ़्गान, जाट, रोहिल्ले, और सिक्ख आपस में तलवार भांजते रहते। इसी सब के बीच पिंडारी भी थे जो राजस्थान में टौंक से निकलते और कर्णाटक के दक्षिणी इलाक़ो तक गाँव-गाँव को लूटते और आग लगाते जाते। कई बार ऐसा होता कि एक गाँव साल में तीन-चार बार अग्नि को समर्पित हो जाता। ऐसी हालत से बचने के लिए कुछ गाँवो ने शहरपनाह की तर्ज पर गाँवपनाह की चहारदीवारियां बना रखी थीं ताकि लुटेरों और चौथ लेने आने वाली फ़ौजों से कुछ सुरक्षा मिले। पर चौथ के भूखे लड़ाके गाँव वासियों के खिलाफ़ तोप का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।
आज हमारी ज़बान अंग्रेज़ो को गाली देती नहीं थकती लेकिन सच तो यह है कि उनहोने इस भूमिखण्ड को एक भयंकर अराजकता से मुक्ति दिलाई। अराजकता का आतंक कैसा होता था इसे बनारसी दास ने अपनी किताब अर्धकथानक में लिखा है कि जब उनके गाँव में पता चला कि अकबर की मौत हो गई तो लोग-बाग़ के दिल संदेह और भय से दहल उठे। लोगों ने अपने कीमती वस्त्र और गहने ज़मीन में गाड़ दिये। और बहुत से लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति को लेके इधर-उधर भागने लगे। हर आदमी घर की रक्षा के लिए हथियार एकत्र करने लगा। ऐसी अराजकता का आलम अकबर महान के मरने पर था। अठारहवीं सदी का जो हाल जो हुआ वो हमारे लिए अकल्पनीय है।
शाह आलम की सत्ता दिल्ली से पालम तक सिमट कर रह गई थी। मगर उसके बहुत पहले यानी १७०७ में औरंगज़ेब की मौत के ठीक बाद से ही अस्थिरता घर कर गई थी और पूरी सदी पूरे देश का नक़्शा और मिल्कियत लगातार बदलता रहा। रात को सोते समय कौन राजा था और सुबह जागते समय कौन- कोई ठीक-ठीक नहीं कह सकता था। कितने मुग़ल सलातीन अंधे किए गए, उनकी औरतों को लज्जित किया गया, गिनती मुश्किल है। खुद शाह आलम उनके एक पुराने वफ़ादार के हाथों अंधे हुए। ऐसी हालत में आम जन किस असुरक्षा की मानसिकता में जीते होंगे, ये जानने के लिए कभी मौक़ा लगे तो ‘मीर की आप बीती’ पढ़ लीजियेगा, सूरते हाल साफ़ हो जाएगा।
जिन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ हमने १७५७ से लड़ना शुरु किया, १८५७ में महासंग्राम किया, और १९४७ तक लड़ते रहे, वो अंग्रेज़ वास्तव में इतिहास की एक प्रगतिशील शक्ति थे, ये बात हम आज समझ सकते हैं। उस व़क्त वो विदेशी हमारे दुश्मन थे जो हमारे देश को बुरी तरह से अपनी छवि में ढाल रहे थे, हमारी मर्ज़ी, परम्परा और संस्कारों के विरुद्ध। आज हम जो भी लोकतंत्र, जनतंत्र, मानव अधिकार के नाम पर जिन भी चीज़ों का जाप करते हैं, वो हमारी अपनी सोच नहीं है, अंग्रेज़ो के साथ यूरोप से आयातित चिंतन है।
हम आज अमरीका द्वारा इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान में की जा रही सैनिक कार्रवाई के खिलाफ़ बोलते नहीं थकते। हम ऐसे किसी देश का दूसरे देश पर हमला कर देना ग़लत मानते हैं। ग़लत है.. पर किस नैतिकता के आधार पर? हमारी भारतीय परम्परा में इस तरह के आपसी युद्ध को लेकर 'मानवीय' नैतिकता का कोई आग्रह नहीं रहा। (बुद्ध और महावीर की अहिंसक परम्परा को छोड़ दें तो) उलटे लड़ना और रणभूमि में शहीद होना एक योद्धा के लिए उच्च नैतिक मूल्य है। कहा ही गया है कि वीर भोग्या वसुंधरा। और इस भोग की शुरुआत युद्ध जीतते ही लूट-पाट से आरम्भ हो जाती, जिसे विजेता का अधिकार माना जाता। सबसे बड़ा लुटेरा राजा कहलाने का अधिकारी होता था। (आज वीर भोग्या वसुंधरा मानने वालों को हम अपराधी कहते हैं)
इस्लामिक नैतिकता का युद्ध के बारे में क्या नज़रिया है? अब जब मुहम्मद साहब और खुल्फ़ा उल रशीदुन ही खुद युद्ध का परचम उठा कर चले हो और पराजित जातियों के मर्दोज़न को गु़लाम बनाने की रवायत बरक़रार रखी हो तो इस्लामिक नैतिकता में कोई शुबहे की गुंज़ाइश नहीं है। मुहम्मद साहब ने ७०० यहूदियों के गले इसलिए कटवा दिए थे क्योंकि उन्हे शक़ था कि वो उनके साथ ग़द्दारी करने वाले थे।
विष्णु भट्ट गोडशे की एक किताब है- माझा प्रवास। इस किताब में १८५७ की गदर का आँखो देखा वर्णन है। झांसी में अंग्रेज़ो की लूट के समय लेखक वहीं थे; लिखते हैं कि लूट सात दिन चली। पहले दिन अंग्रेज़ सिपाहियों ने लूटा। उनको देख कर भूसे के ढेर में छिप गए लोगों को आग लगा कर जला देते। कुँए में कूदते तो बन्दूक लेकर जगत पर जम जाते-लोग डूबकर मरते या गोली खाकर। खोज-खोज कर लोगों को मार गया- आम जनों को। इस लूट को विजन कहा गया – जनविहीन कर देने की प्रक्रिया। तीन दिन गोरों ने सोना, चांदी, रूपया-पैसा, ज़ेवर आदि लूटा। चौथे दिन काले मन्दराजी लोगों ने बर्तन भांड़े लूटे। अगले दिन हैदराबाद वालों के नाम; उन्होने कपड़े लूटे। उसके बाद रियासती पलटनें आईं, उन्होने अनाज लूटा।
बाबर ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उसे लोगों को मारकर उनके कटी हुई खोपड़ियों का पहाड़ बनाने का शौक़ था। हर लड़ाई के बाद ऐसा ज़रूर किया जाता; शायद अपने प्रतिद्वन्दियों के दिल में खौफ़ पैदा करने के लिए। अहमद शाह अब्दाली ने भी इस पुरानी परम्परा को अपने भारत अभियान में जारी रखा। हलाकू ने बग़दाद शहर को क़त्लेआम के बाद जला कर राख कर दिया था। दिल्ली कितनी बार उजड़ी है, कोई हिसाब नहीं है।
और हर छोटी-बड़ी लड़ाई के बाद औरतों का क्या हाल होता था, इसके लिए किसी कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं कि आज दुनिया में चंगेज़ खान के सबसे अधिक वंशज है; कैसे, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इस पृष्ठभूमि में अगर आप इराक़ और अफ़्ग़ानिस्तान का युद्ध देंखे तो आप को मानवीय लग सकता है। अबू ग़रीब की यातना जैसी घटना को छोड़ दें तो अमरीकी फ़ौजों ने न तो लूट-पाट की और न ही बेवजह हत्या-बलात्कार। (भाई मेरे, कृपया इसे अमरीकी नीति का अनुमोदन समझ कर चढ़े मत आईयेगा, ज़रा ठण्ड रखकर पढ़िये, बात-बात पर तलवार मत निकालिए हे मानवतावादी!)
मसला यह है कि आम जीवन में ‘मानवीय’ मूल्य और युद्ध में भी मानवता बरतने की जो नीति विकसित हुई है यह शुद्ध योरोपीय चिन्तन है और आधुनिक काल में पैदा हुआ है। कुछ लोग इस कारुणिक विचार की उत्पत्ति इमैन्वल कान्ट के दर्शन से देखते हैं। जो भी हो, जिस नैतिकता के दम पर हम अमरीका को गाली देते हैं, उस का ठीक-ठीक आगा-पीछा भी हमें नहीं मालूम। वो कैसे, किस रस्ते से हम तक पहुँची, और कैसे वह हमारी और हम उसके मालिक बन बैठे, हम नहीं जानते। हम उदार जन जिन मानवीय मूल्यों की बात-बात पर दुहाई देते हैं वो आम जन (राज्य के कर्मचारी, अधिकारी, सिपाही, सैनिक आदि भी) के भीतर कितने आत्मसात हैं, हमें नहीं मालूम।
हम जिस जीवन को जी रहे हैं, जिन सुविधाओं को भोग रहे हैं, क्या उस के लिए ‘हम’ ने संघर्ष किया है? क्या वो ‘हमारी’ आंकाक्षाओं और प्रयत्नों का परिणाम है? भारत में स्त्रियों को मताधिकार मिला, दलितों को आरक्षण मिला है, इसके लिए भारतीय स्त्रियों और दलितों ने कितना संघर्ष किया? क्या क़ुर्बानियां दी? तो फिर बिना संघर्ष, बिना बलिदान के कैसे मिल गयी उनको यह वरीयता? औरतों को मताधिकार योरोप के देशों में लम्बे संघर्ष के बाद मिला (और वो भी मिला क्योंकि स्त्री स्वातंत्र्य पूँजीवाद की ज़रूरत है, उसे सस्ता मज़दूर चाहिये) भारत में यूँ ही मिल गया? कैसे? बिना लड़े ये लड़ाईयां कैसे जीती जा रही हैं? वो कौन सी शक्ति है जो इस बदलाव के पीछे है?
शायद हमें यह मानने की ज़रूरत है कि कुछ अधिकार माँगने से, लड़ने से मिलते हैं, और कुछ बहुत लड़ने पर भी नहीं मिलते क्योंकि उनके लिए ऐतिहासिक परिस्थिति परिपक्व नहीं थी, और कुछ बैठे-बिठाए मिल जाते हैं क्योंकि वो इतिहास की ज़रूरत हैं। सोचिये इन में से कुछ अधिकार हमें अंग्रेज़ो के समय में ही हासिल हो गए थे?
आखिर क्या दबाव थे जिसके तहत अंग्रेज़ो ने मताधिकार और प्रतिनिधित्व जैसे ये अधिकार हमारी तरफ़ बढ़ा दिए थे? लोकप्रिय शासक अकबर के समय ऐसा क्यों नहीं हो सका? योद्धाओं की सन्तान उस अकबर ने तो ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार की श्रेणियों में ही सत्ता का वितरण करके मान लिया कि जनता का प्रतिनिधित्व सम्पन्न हो गया, चुनाव और मताधिकार जैसी बात उसके ख्याल में भी नहीं आई, बावजूद उसकी सारी भलमनसाहत के। लेकिन ‘सौदागर’ अंग्रेज़ ने सत्ता के बाज़ार को जन-जन तक फैला दिया और आमजन को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया। इस अधिकार को हमें मिले लगभग अस्सी बरस से भी ऊपर हो गया लेकिन कितनी अजीब बात है कि हम आज भी अपने लिए ज़मीनदार, मनसबदार, जागीरदार और सूबेदार ही चुनते हैं, अपने प्रतिनिधि नहीं। ये दोष राज्य का है कि जनता का?
ये ठीक बात है कि राज्य हमारे जीवन की अधिकतर बातों का नियन्ता है और उसने ही हमें शिकायत करने का भी हक़ हमें नियत कर दिया है। पर हमारी भी आदत हो चुकी है सारी समस्याओं को किसी एक संस्था के मत्थे मढ़ कर छुट्टी पाने की। ये प्रवृत्ति हमारी अपने जीवन की स्वयं ज़िम्मेदारी न लेने और हर बात के लिए ईश्वर पर निर्भर होने की आदत का अवशेष है। ईश्वर से हमारी शिकायतों का सिलसिला थमता नहीं दिखता। हम बजाय पुरुषार्थ पर विश्वास करने के हर चीज़ के लिए ईश्वर के आगे झोली फैलाये खड़े रहते हैं।
(वैसे कुछ चीज़ों का ठीकरा हम अंग्रेज़ों के सर भी फोड़ते हैं जैसे कि साम्प्रदायिकता; अच्छे-खासे प्रगतिशील लोग इस बात पर विश्वास करना पसन्द करते हैं कि अंग्रेज़ो के पहले भारत में साम्प्रदायिक मन-मुटाव नाम की चीज़ थी ही नहीं। एक मिसाल के तौर पर अशफ़ाक़ुल्ला खाँ के बारे में खुद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ आने से सिद्ध हो गया कि मुसलमान ग़द्दार नहीं होते- क्या ऐसी बातें सौ-पचास बरस के अंग्रेज़ों के षडयन्त्र से किसी के मन में बैठ सकती हैं या उसके लिए आपसी नफ़रत का एक लम्बी विरासत होनी चाहिये?)
इस प्रवृत्ति की सबसे अच्छा उदाहरण शिरडी के साईं बाबा के भक्त हैं: साईं बाबा का दो शब्दों का संदेश है- श्रद्धा और सबुरी; उनके भक्तों में न तो श्रद्धा है और न सबुरी, शिरडी जा के माँग-माँग कर उन्हे मरने के बाद भी हकालते रहते हैं। ऐसे अनास्था वाले लोग – हम सभी, भले ही हम साईं बाबा के भक्त हो या न हों, इस दोष के रोगी हैं – राज्य के प्रति भी ऐसी ही अनास्था से पेश आते हैं। ये नहीं है, वो नहीं है, ये नहीं दिया, वो नहीं दिया। कोई विपदा आती है तो टीवी का कैमरा आते ही लोग शुरु हो जाते हैं, हमें तो कोई पूछने नहीं आया, किसी ने हमारी खबर नहीं ली? सवाल यह भी पूछना चाहिये लोगों ने एक-दूसरे की कितनी मदद की?
वेलफ़ेयर स्टेट (पहले थे, अब पता नहीं हैं कि नहीं) का तो काम है लोगों की मदद करना लेकिन इस स्थिति को अठाहरवीं सदी से तुलना कर लें और समझें। सरकार/राज्य किसी ईश्वर का स्थानापन्न है – ईश्वर के प्रति तो हम उच्छवास भरते हुए कहते हैं कि हे ईश्वर कहाँ हो तुम - लेकिन सरकार को सीधे गरियाते हैं। क्योंकि वो हमारी प्रतिनिधि है, उसे हमारे हित में काम करना चाहिये, लेकिन वो करती नहीं, क्योंकि हमारे प्रतिनिधि हमारे नहीं किसी पूँजीपति के प्रतिनिधि हैं। एक बार फिर से- क्या इस का दोष राज्य का है कि जनता का?
अपनी इस अनास्था के चलते हमारे भीतर की उद्यमता पर भी असर पड़ा है, वो भी गहरे तौर पर भ्रष्ट हो चली है। किसी भी काम को हम पूरी शिद्द्त और मनोयोग से कर ही नहीं पाते। थोड़ी सी सुख-सुविधा और ऐशो आराम हमारी नैतिकता और आदर्श को ढहा देने के लिए काफ़ी साबित होते हैं। मुस्लिम हितों की बात करने वाले क्रांतिकारी अपने राजनैतिक करियर के लिए उन्ही के शक़-शुबहों के सहारे उनका शोषण करने लगते हैं। मज़दूरों के महान नेता, कोकाकोला को देशनिकाला देने वाले जार्ज साहब किस गली में जा कर फ़ंसते हैं। अपने भीतर की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने निकले कविवर पुरुस्कारों की जुगाड़ू राजनीति में दण्ड पेलने लगते हैं। बाक़ी छोड़िये देखिये उदाहरण शिबू सोरेन और मधु कोडा का, आदिवासियों के बीच से निकले उनकी आकांक्षाओं को स्वर देने के लिए लेकिन कहाँ जा गिरे? क्या इन के पतन पीछे सरकार और राज्य का चरित्र ही उत्तरदायी है?
राज्य से पहले हम एक समाज हैं और समाज से पहले हम एक व्यक्ति। व्यक्ति के रूप में हम कितने नैतिक हैं? ये कौन सी बात है कि गूँहू रोटी को गाली दे कि वो बेस्वाद है? ये बात ठीक है कि राज्य का जो स्वरूप हमें मिला है उसे वैसा बनाने में हमने कोई भूमिका नहीं निभाई है, मगर सरकार तो हमारी ही अभिव्यक्ति है न? और अगर हम राज्य के इस स्वरूप से असंतुष्ट हैं तो हमारे पास कोई विकल्प तो होना चाहिये?
माओवादियों के विकल्प की चर्चा मैं पिछले लेख में कर चुका हूँ, वो मेरी समझ से वरेण्य नहीं है। अरुंधति से जब पूछा गया तो उन्होने कहा कि उनके पास कोई मैनिफ़ेस्टो नहीं है। यही हाल देश के सभी (ग़ैर-मार्क्सवादी) असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का है: उनके पास शिकायतें तो हैं, सवाल तो हैं पर विकल्प नहीं है। अरुंधति का जो लम्बा लेख आउटलुक में छ्पा है उसकी मुख्य बातें निम्न हैं :
१) आदिवासी जंगल- पहाड़-नदी के साथ एकाकार हैं (जैसे आदिकाल में सभी मनुष्य थे)
२) बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासियों की इस सम्पदा पर नज़र गड़ा के बैठी हैं और उसे हथियाने के लिए कार्यरत हैं।
३) यह सम्पदा एक अनुमान के अनुसार चार ट्रिलियन (१२ शून्य) डालर्स की है, भारत के जीडीपी से कई गुना अधिक।
४) देश की सरकार ने ऐसी बहुराष्टीय कम्पनियों के साथ समझ के समझौते कर रखे हैं जिसके तहत ७-८% के हिस्सेदारी पर भारत सरकार यह सम्पदा उनके हवाले कर देगी।
५) इस मुनाफ़े में आदिवासियों को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, जो उसके असली मालिक हैं।
६) उलटे उन्हे अपने घर, गाँव, और वातावरण –जिसके साथ वो एकीकृत हैं –से बेदखल कर दिया जाएगा।
७) माओवादियों ने आदिवासियों के असंतोष को स्वर दिया है, पर वो बरगलाए हुए नहीं है, उनकी अपनी एक लड़ाकू परम्परा है।
८) माओवादियों के साथ उनकी इस हथियारबन्दी से बहुराष्ट्रीय कम्पनियां खनन का अपना काम नहीं कर पा रहीं।
९) सरकार पर इन समझौतों को निभाने के लिए दबाव बढ़ रहा है औरे जिसके कारण वो इस समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही है।
१०) वही सरकार जो विकास के नाम पर विस्थापित पाँच करोड़ लोगों का पुनर्वास नहीं कर सकी, उसे ३०० सेज़ बनाने के लिए १,४०००० हेक्टेयर ज़मीन मिल जाती है।
११) सरकार के साथ-साथ (चिदम्बरम वेदान्ता के लिए वक़ील और डाइरेक्टर के पद भी सम्हाल चुके हैं) अदालतें भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक चुकी हैं।
१२) और जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए माओवादियों के दम-खम और आतंक का हौवा बना रही है ताकि उनके बहाने आदिवासियों को रौंदा जा सके और साथ ही दूसरी लोकतांत्रिक आवाज़ों को भी।
१३) सरकार उनसे बात तक करने को तैयार नहीं वह युद्ध चाहती है बस।
१४) पूँजी के हाथ की कठपुतली मीडिया सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है, और कोई स्वतंत्र रपट करने के बजाय सरकार की भाषा बोल रहा है।
मोटे तौर पर इनमें से शायद ही कोई ऐसी बात हो कि जिसका कोई संवेदनशील व्यक्ति विरोध करेगा। बंधुता, समानता और स्वतंत्रता के मूल्य हम सभी ने भीतर तक स्वीकार कर लिए हैं (ये सवाल भी उठता है कैसे अपना लिए हैं, बिना उन पर विचार किए, क्योंकि वो खुद व्यवस्था द्वारा प्रचारित हैं; और सच में कितने अपनाए हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यापक जन भीतर अभी भी किसी अन्य नैतिक मापदण्ड के सहारे हैं) और ये जो हो रहा है इन आदर्शों से मेल नहीं खाता। ज़ाहिर तौर पर अत्याचार हो रहा है। मैं इस अत्याचार का विरोध करता हूँ और चाहता हूँ कि पर्यावरण की हानि न हो, जंगल-पहाड़-नदी की पवित्रता बनी रही, पर मेरे चाहने और विरोध करने भर से क्या होता है। इतिहास बड़ा क्रूर है उसकी विशाल नदी के बीच मेरी नन्ही वैचारिक (और तमाम दूसरों की ठोस आन्दोलित) चेष्टाएं क्या बिसात रखती हैं।
इस नदी की धारा को पलटने के लिए जिस प्रकार की हिंसा और नरबलि लगेगी उस के प्रति हम अहिंसक उदारजनों का क्या नज़रिया होगा, यह भी सोचना चाहिये। माओवादी तथा दूसरे पके हुए राजनीतिकर्मियों को कोई शुबहा नहीं होता, वो अपनी तरह की व्यवस्था लाने के लिए हर क़ुरबानी देने के लिए तैयार रहते हैं।
स्वयं अरुंधति भी जानती हैं कि माओवादी, आदिवासियों की बलि देकर आम जनता के आगे नरसंहार का एक विहंगम दृश्य खड़ा कर के अपने आंदोलन को आगे बढ़ाने की नीति खेल सकते हैं। लेकिन फिर भी वो उनके समर्थन में इसलिए जाती हैं क्योंकि उन्हे इस कॉरपोरेट पूँजीवाद के अधिक समाजवादी तंत्र पर भरोसा है (फिर भी ये सवाल रह जाता है कि उसमें पर्यावरण के मसलों की जगह कहाँ रहेगी?), इसीलिए अरुंधति जिस मुखर स्वर से राज्य की हिंसा की आलोचना करती हैं माओवादी हिंसा की नहीं करतीं। यानी विरोध हिंसा का नहीं, हिंसा के चरित्र का है।
आप तय कीजिये कि आप किस हिंसा के हिमायती हैं। हिंसा से छुटकारा नहीं है। बुद्ध की शिक्षाएं पा कर भी जापानी हिंसा के पुजारी बनी रहे। गाँधी बाबा अहिंसा-अहिंसा करते रहे, देश उन्हे बापू, महात्मा कहता रहा और जब देश आज़ादी की बारी आई तो लाखों लोग अल्लाहोअकबर और हरहरमहादेव कह कर लड़ मरे। हिंसा की ऐसी सर्वव्यापकता के बावजूद हम हिंसा को अनैतिक मान कर अपना पक्ष चुनते हैं, मैं भी – ऐसा है अपने युग की नैतिकता का दबाव।
मेरी इच्छा है कि सरकार और माओवादी के नेतृत्व में आदिवासी जन बातचीत करें और सरकार उनकी ज़मीन का उन्हे उचित मुआवज़ा दे, और साथ ही यह भे सुनिश्चित करे कि पर्यावरण की हानि न हो या कम से कम हो। ऐसा चाहने वाले किसी भी नागरिक आन्दोलन का मैं समर्थन करता हूँ। साफ़ तौर पर मैं नहीं चाहता कि मार-काट हो, मैं नहीं चाहता कि माओवादी प्रबल होकर इस राज्यतंत्र को कमज़ोर करें और १८ वीं सदी वाली अराजकता का परिदृश्य दोहराया जाय। पर ये सब सदिच्छाएं हैं, देखें ऐसा सम्भव हो पाता है कि नहीं।
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
अ सिविलाइज़्ड एण्ड डीसेन्ट सोसायटी
विडम्बना यह है कि यह बयान उस दिन आया है जब प्रोफ़ेसर सबरवाल की हत्या के सभी आरोपियों को सबूत के अभाव में अदालत द्वारा बाइज़्ज़त रिहा कर दिया गया। मुक्त हुए मुल्ज़िमों ने मालाएं पहनी, मिठाई चाभी और मुस्कुराहटें बिखेरीं।
क्या आप ने प्रोफ़ेसर सबरवाल की मौत से पहले उनकी पिटाई का वीडियो देखा था। मैंने देखा था.. मज़े की बात है अदालत के पास एक भी गवाह नहीं कोई सबूत नहीं।
अजीब बात है लाहौर हाई कोर्ट में भी यही दलील देकर हाफ़िज़ सईद को आज़ाद छोड़ दिया गया।
सोमवार, 6 जुलाई 2009
एक छिलके में दो गिरियां
मुझे याद हैं वो दिन जब मैं और मेरा दोस्त बादाम के एक छिलके में दो गिरियों जैसे बने रहते। फिर अचानक हम बिछड़ गए। कुछ वक़्त बाद मेरा दोस्त लौटा और मुझ पर इल्ज़ाम धरने लगा कि मैंने उस दौरान कोई क़ासिद भी क्यों न भेजा। मैंने कहा कि जिस हुस्न से मैं महरूम हूँ उस पर किसी क़ासिद की नज़र क्यों पड़े?
न दे मुझे सलाहे ज़ुबानी कह दो मेरे यार से।
क्यूंकि तोबा करूँ ये होगा नहीं ज़ोरे तलवार से॥
देख नहीं सकता कि हो तू ग़ैर से रज़ामन्द।
मैं फिर कहता हूँ कि हो सबका मज़ा बन्द॥
तेरहवीं सदी के शाएर शेख सादी की यह लघुकथा समलैंगिक प्रेम पर आधारित है। गुलिस्तान में संकलित इस लघुकथा के आधार पर भले ये सिद्ध न हो कि शेख सादी लौंडेबाज़ थे मगर ये तो ज़रूर पता चलता है कि उनके काल में भी यह तथाकथित बीमारी मौजूद थी। वेश्यावृत्ति की तरह इसका भी इतिहास बड़ा पुराना है। बाईबिल के पुराने विधान में भी इसका ज़िक्र मिलता है। सोडोम नाम का एक शहर था (इसी के नाम से समलैंगिकता सोडोमी कहलाई), जिसके निवासी सलोनी लड़कियों के बजाय खूबसूरत लड़कों के लिए मचलते थे। बाईबिल घोषणा करती है कि ईश्वर ने उनके शहर पर बिजली गिरा कर उन्हे उनके अपराध की सजा दी।
बावजूद इस के तीनों अब्राहमपंथी धर्मावलम्बियों की परम्पराओं में इस बीमारी की उपस्थिति बनी रही। यहूदियों, योरोपीय ईसाईयों और अरब मुस्लिम और ग़ैर अरब मुस्लिम समाजों में समलैंगिकता अबाध रूप से चलती रही। इस रुझान के लोगों की सूची में तमाम बड़े-बड़े नाम हैं जिसमें लियोनार्दो दा विंची जैसे कलाकार और बाबर जैसे सेनानायक शामिल हैं। मैंने इस ब्लॉग पर पहले भी मीर के शौक़ के बारे में लिखा है-
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं।
ऐसी लौंडेबाज़ी को धर्म और नैतिकता तब भी नहीं स्वीकारती थी। मगर नसीब वाले थे मीर कि उनके समय इस तरह के रुझान अपराध नहीं थे। अंग्रेज़ो के आने के बाद लॉर्ड मैकाले ने क़ानून बना के इसे अपराध घोषित कर दिया। आज हमारे देश में अदालत के आदेश से यह सम्बन्ध अपराध नहीं रहा। इस कारण से बड़ा हो-हल्ला है। लोग नाराज़ हैं। संस्कृति और परम्परा, धर्म और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि ये रुझान अप्राकृतिक है इसलिए निन्दनीय है। और समाज के लिए घातक है और इसीलिए आपराधिक है।
एक तर्क यह भी सुनने को मिलता है कि पशु ऐसा नहीं करते! वैसे यह पूरी तरह सच नहीं है कुछ पशु समलैंगिक व्यवहार प्रदर्शित करते पाए गए हैं। एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि ये लोग जो समलैंगिक सेक्स की आज़ादी चाहते हैं कल को पशुओं से सेक्स करने की भी इजाज़त माँगेंगे? मैं ऐसे लोगों के तर्कों के आगे ध्वस्त हो जाता हूँ। क्या कोई सचमुच इजाज़त माँग कर यह काम करता है। क्या कल तक इजाज़त न होने पर लोग समलैंगिक सेक्स नहीं कर रहे थे और आज आज़ादी मिल जाने पर मुफ़्तिया माल की तरह टूट पडेंगे?
क्या इन का सोचना यह है कि हर व्यक्ति के भीतर समलैंगिक सेक्स की ऐसी भयानक चाह है कि अपराध का डर हटते ही समाज में प्रेम का स्वरूप धराशायी हो जाएगा? बाबा रामदेव कहते हैं कि आदमी आदमी पर चढ़ने लगेगा तो बच्चे कैसे पैदा होंगे? यएनी बाबा मानते हैं कि लोग डण्डे के डर से मन मार के बैठे हैं? हास्यास्पद है ये सोच!
क्या आप ने ऐसे व्यक्ति नहीं देखे जो नर के शरीर में क़ैद नारी हैं और ऐसे भी जो नारी के शरीर में क़ैद नर हैं? ज़रूर देखें होंगे। पर मैं इस से अलग जा के एक और बात कहना चाहता हूँ- नर और नारी के चरित्र की यह श्रेणियां ही ग़लत हैं। यह वास्तविक नहीं कल्पित हैं। मानवीय गुण-दोषों की ये शुद्ध परिभाषाएं है। मगर वास्तविकता में कोई तत्व शुद्ध नहीं मिलता। शुद्ध तत्व प्रयोगशालाओं में अशुद्ध तत्वों से अलग कर के पाए जाते हैं। मेरी नज़र में तो ग़लत ये है कि नर-नारी के एक कल्पना की गई छवि के आधार पर लोगों के बारे में कोई फ़ैसला करे। फ़ैसला करे तो करे ये तो हद ही है कि फिर उन्हे आपराधिक घोषित करे? अब आप बताइये कौन प्राकृतिक है?
यह ठीक है कि मनुष्य के शरीर में यौन अंग प्रजनन के उद्देश्य से उपजे हैं। और यह बात भी तार्किक लगती है कि जो चीज़ जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई हो वो उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग की जाय। मगर प्रकृति ऐसा नहीं करती। प्रजनन के लिए एक शुक्राणु ही चाहिये होता है मगर प्रकृति उन्हे करोड़ो के संख्या में पैदा करती है। बबून के समूह में एक बंदर ही प्रजनन करता है मगर प्रकृति प्रजननांग सभी नर बंदरो को प्रदान करती है। पूछा जाना चाहिये कि प्रकृति हर चीज़ नाप-तौल के क्यों नहीं करती? और उद्देश्य के तर्क से घायल ये सारे लोग क्या अपना सारा यौनाचार प्रजनन के उद्देश्य से ही करते हैं?
समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध है। चलिए माना। पर मनुष्य के जीवन में क्या और कुछ भी नहीं जो प्रकृति के विरुद्ध है? पका हुआ भोजन भी प्रकृति के विरुद्ध है। समलैंगिकता का विरोध करने वाले क्या मिर्च-मसाले छोड़ कर कच्चा भोजन खाना शुरु कर सकेंगे? ईंट-गारे की इमारतें, मोटरकार, और पैसा-रुपया भी तो प्रकृति के विरुद्ध है। और तो और कपड़े भी प्रकृति के विरुद्ध है। पश्चिम में एक ऐसा आन्दोलन है जो प्राकृतिक होने की ज़िद में ऐसे समुदाय बना के रहते हैं जिसमें कपड़ों का कोई इस्तेमाल नहीं। क्या समलैंगिकता के विरोधी कपड़े उतार के नंगे रहना पसन्द करेंगे क्योंकि ईश्वर ने हमें कपड़े पहना के नहीं भेजा?
और सबसे बड़ा प्रकृति का विरोधी तो धर्म है। प्रकृति तो किसी धर्म को नहीं मानती। वो न तो गाय खाने से मना करती है न सूअर खाने से। प्राणी जगत में तो हर जन्तु स्वतंत्र है उस पर कोई बन्दिश नहीं। और इस तर्क से तो मनुष्य पर इस तरह की बन्दिशें लगाने वाला धर्म आप ही अप्राकृतिक है। और समलैंगिको का अपने स्वभावाविक आकर्षण के प्रति जवाबदारी बरतना प्राकृतिक।
मैं मानता हूँ कि नैतिकता समाज को स्वस्थ रखने का एक बेहतर आचरण है। पर नैतिकता स्थिर तो नहीं रहती। देश-काल-परिस्थिति के सापेक्ष है। निरन्तर बदलती है।और धार्मिक दृष्टि से तो समलैंगिकता अभी भी अनैतिक है न! उसे अवैध बनाकर समलैंगिकों को निशाना क्यों बनाना चाहता है धार्मिक नेतृत्व? कहीं ये चोर की दाढ़ी में तिनके वाली बात तो नहीं?
प्रकृति का नियम है जहाँ पानी रोका जाय वहाँ दबाव सबसे तेज़ होता है। साथ ही मैंने अक्सर महसूस किया है कि धर्म और यौनाचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तंत्र कहता है कि दोनों एक ही ऊर्जा का उपयोग करते हैं। शायद इसीलिए दोनों में ऐसा ज़बरदस्त विरोध है। पर वो दूसरी बहस है।
अंत में इतना ही कहूँगा कि मनुष्य का स्वभाव, सामाजिक और धार्मिक नैतिकता से कहीं जटिल है और प्रकृति के अनन्त भाव मनुष्य के सामाजिक परिपाटियों से कहीं विराट है।
क्या आप जानते हैं कि किशोर डॉल्फ़िन्स वयस्कता पाने के पहले अन्य प्रजातियों के जन्तुओं के साथ यौनाचार के प्रयोग करते हैं?
सोमवार, 4 मई 2009
उनके जीवन का सब से दुखद दिन
इस बयान से मुझे बरबस लाल कृष्ण अडवाणी के उस बयान की याद आ गई जिसमें वे फ़रमाते हैं कि ६ दिसम्बर १९९२ उनके जीवन का सब से दुखद दिन है। अडवाणी जी की फ़ित्रत के अनुसार तो यह बयान भी उतना धूर्ततापूर्ण है जितना के उनके पूर्व चेले कल्याण सिंह का। पर मुझे लगता है कि अडवाणी साहब झूठ नहीं बोल रहे हैं। वाक़ई वो दिन उनके जीवन का सब से दुखद दिन हो सकता है जिस दिन उनकी सोने की मुर्ग़ी हलाल कर दी गई हो।
ये उसी दुखद दिन का नतीजा है कि आज लगभग बीस साल बाद जबकि वे क़ब्र में पैर लटका कर बैठे हैं और प्रधानमंत्री की गद्दी उनके पहुँच से दूर और दूर होती जा रही है। जनता को बहकाने के लिए उनके पास एक मुद्दा भी नहीं; और राम मन्दिर तो इतना फीका हो चुका है कि मोदी भी उसका ज़िक्र करने से क़तरा रहे हैं।
अगर बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती तो आज भी वो विवादित स्थल पर वहीं शोभायमान होती जहाँ आजकल रामलला विराजमान हैं। और बार-बार मुस्लिम आक्रमणकारियों के मूर्तिभंजक इतिहास की दुहाई दे-दे कर हिन्दुओं के खून को खौलाया जा रहा होता। हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य को रोज़ भड़काया जा रहा होता। आज वो कुछ सम्भव नहीं क्योंकि बाबरी मस्जिद के गिर जाने से हिन्दुओं की प्रतिशोध की भूख पूरी हो गई.. मगर मुसलमानों के भीतर जाग गई। जिसका प्रमाण हमें मुम्बई सीरियल बम विस्फोट जैसी घटनाओं में मिला।
यहाँ एक बात साफ़ कर देना और ज़रूरी है। मेरे जैसे आस्तिक मगर ग़ैर-कर्मकाण्डी हिन्दू के लिए न तो किसी मन्दिर का कोई अर्थ है और न किसी मस्जिद में कोई श्रद्धा। मुझे बाबरी मस्जिद के वहाँ खड़े रहने से न तो कोई सुकून मिलता था और न ही उसके गिरने से मेरे मानसिक संसार में कोई अभाव आ गया है।
इस देश के बहुत सारे सेकुलरपंथी इस बात से भाजपा और विहिप से खौरियाये नज़र आते हैं कि उन्होने एक ऐतिहासिक महत्व की इमारत को गिरा दिया! इस देश में हज़ारों ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जहाँ जा कर मूतने में सेकुलरपंथियों को कोई गुरेज़ नहीं होगा। आम जनता वक़्त पड़ने पर उसकी ईंट उखाड़ कर क्रिकेट का विकेट बनाने में इस्तेमाल करती रही हैं। मुझे उनकी इस पुरातत्व-प्रियता में राजनीति की बू आती है।
मुझे इस तरह के शुद्ध, रुक्ष पुरातत्वी इतिहास में कोई आस्था नहीं; मेरे लिए वो ऐतिहासिक स्मृतियाँ अधिक मह्त्व की हैं जो मनुष्य के मानस में क़ैद रहती हैं। वही स्मृतियों जिनके नासूर में उंगलियाँ घुसा कर लाल कृष्ण अडवाणी ने इस देश में नफ़रत की राजनीतिक फ़सल काटी है।
एक और दूसरी बात साफ़ करने की ज़रूरत है कि यह सच नहीं है कि इस देश में हिन्दू और मुसलमान हमेशा शान्तिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। सेकुलर इतिहासकार सिर्फ़ एक साझी संस्कृति की छवि को ही उभारते आये हैं ऐसे तमाम तथ्यों पर परदा डालकर जो उनकी इस निष्पत्ति के विरोध में हों। साझी संस्कृति की बात पूरी तरह ग़लत नहीं है मगर वो अधूरा सच है। उसका पूरक सच - एक आपसी संघर्ष का सच और समय-समय पर हिन्दुओं के दमन का सच है।
बाबरी मस्जिद राम मन्दिर को तोड़कर बनी थी या नहीं इस बात का प्रमाण माँग कर हम अडवाणी जैसे मक़्कार राजनीतिज्ञों के क़दम कुछ देर के लिए तो रोक सकते हैं मगर हिन्दू मानस में दबी, मन्दिरों के तोड़े जाने की उस जातीय स्मृति को मेट नहीं सकते जो निराधार नहीं है। खुद मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐसे अभियानो का विस्तार से वर्णन किया है।
हमारे सामने दो तरह के झूठे इतिहास रखे जाते हैं। एक इतिहास समाज में भाई़चारा बना रहे इसलिए झूठ बोलता है तो दूसरा अपने पराजय बोध को घटाने के लिए और समाज में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए झूठ बोलता है। कोई सत्य की शक्ति में यक़ीन नहीं करना चाहता और न ही समय के स्वाभाविक प्रवाह से जातीय स्मृतियों के सुलझ जाने में विश्वास रखना चाहता है। एक उन्हे नकारता है तो दूसरा आग से आग बुझाना चाहता है।
एक स्वस्थ समाज के लिए उसके व्यक्ति को पराजयबोध से मुक्त होना चाहिये। तो क्या हर हिन्दू को विदेशी आक्रमणकारियों के साथ संघर्ष में अपने पूर्वजों की हार का बदला अपने निर्दोष पड़ोसियों से लेना चाहिये? ऐसी सोच और कृत्य को बढ़ावा देना नीचता, कायरता और अपराध है। हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करने वाले दल यही करते रहे हैं।
रथ-यात्रा निकाल कर इस देश के गाँव-गाँव में लालकृष्ण आडवाणी ने जो दंगे का माहौल तैयार किया था, उसमें हज़ारों हिन्दू-मुसलमानों की जाने गईं। मैं उसके लिए व्यक्तिगत तौर पर लाल कृष्ण अडवाणी को ज़िम्मेदार मानता हूँ। मेरा सवाल है कि उन्हे बाबरी मस्जिद से सम्बन्धित हर दंगे में होनी वाली मौत के लिए अपराधी क्यों नहीं माना जाय?
कैसे एक लिबेरहान इन्क्वायरी कमीशन महज़ उनके एक अकेले बयान पर बरी कर देता है कि वो मेरे जीवन का सब से दुखद दिन था? क्या उन्हे दिखता नहीं कि वो शख्स गाँव-गाँव नगर-नगर आग लगाता आ रहा था? और जब मस्जिद गिर गई तो रोने लगा कि हमें क्या पता कि कैसे गिर गई? मेरी समझ में तो वही केन्द्रीय रूप से अपराधी हैं।
मैंने पहले भी कहा कि मुझे मस्जिद गिरने से कोई फ़रक नहीं पड़ा। और जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहाँ राम मन्दिर बनने में भी मेरी कोई रुचि है। बावजूद इसके कि मैं मानता हूँ कि राम ने उसी अयोध्या में जन्म लिया था जो देश में समुदायों के बीच का क्लेश का कारण बनी हुई है। मुझे राम में श्रद्धा है मगर मेरे राम अपने भक्तों के हदय में रहते हैं किसी हाईली सेक्योर्ड टेंट में नहीं।
फिर भी अगर कभी वहाँ मन्दिर बन गया तो मुझे तकलीफ़ भी न होगी। लेकिन उस के बनने से अगर मेरे मुसलमान दोस्तों के मन में कोई पराजय-भाव घर करता है, कोई चोट लगती है तो ऐसा मन्दिर मुझे सात जन्मों तक भी स्वीकार्य न होगा। मन्दिर ईश्वर से आदमी का योग कराने के अभिप्राय से बनता है, आदमी का आदमी से जो वैर कराए वो मन्दिर आदमी को ईश्वर से मिला देगा इस धोखे में जो रहना चाहता है तो रहे, मैं इतना अबोध नहीं।
और जो लोग इस धोखे में हैं कि भाजपा या अडवाणी कभी कोई मन्दिर बनवा देंगे तो जाग जायें, राम का नाम लेकर राजनीतिक लाभ उठाने वाले अडवाणी और कल्याण सिंह जैसे लोग मन्दिर बनाने में नहीं मस्जिद गिराने में यक़ीन रखते हैं। और फिर मस्जिद गिरा कर एक अपने को दुखी बताने लगते हैं और दूसरे कहते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। हैरत है कि देश के हिन्दू लोग इन पर भरोसा करते हैं और मुसलमान मुलायम जैसे ढोंगियों पर जो एक तरफ़ तो इन राक्षसों से उन्हे बचाने का वादा करते हैं और फिर वोट के लालच में उन के पैर छू कर धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र भी पकड़ा आते हैं।
ये नेता तो धन्य हैं ही, हमारे देश की जनता भी धन्य है।
मंगलवार, 28 अप्रैल 2009
इस्लाम पर खरी-खरी
मगर आजकल चलन कुछ ऐसा हुआ है कि अगर खुदा को परदे में रखने की बात है तो पैग़म्बर की भी तस्वीर नहीं बन सकती। कुछ दानिशमंद तो इस हद तक जाते हैं कि खुद भी तस्वीर नहीं खिंचवाते और कैमरों को तोड़ फेंकने की तबियत भी रखते हैं। उनका भला कौन करेगा मैं नहीं जानता।
मैं पाता हूँ कि मेरे बचपन से अलग आजकल काफ़ी लोग टखने से ऊँचे पैजामे और शरई दाढ़ी के साथ टहलते पाए जाने लगे हैं। मेरी समझ ये है कि अगर कोई इस तरह की पहचान के दायरों में सुरक्षा तलाशने लगे तो निश्चय ही उस व्यक्ति/समुदाय में कमज़ोरी का भाव गहरे घर कर चुका है। वह अपने समय के साथ कदम मिलाकर चलने के बजाय अतीत का पल्लू पकड़ कर घिसटने में अपनी सार्थकता पा रहा है। यह दुःखद है।
इस्लाम की आलोचना आसान नहीं। आतंकवाद और इस्लाम में कट्टरता का विरोध करने वाले भी क़ुरान की किसी आयत के सहारे या मुहम्मद साहब की किसी हदीस की ही आड़ से ऐसा कर पाते हैं। हिन्दू धर्म की पुंगी बजाने वाले और ईसाईयत को लम्पून करने वाले आप को थोक के भाव उपलब्ध होंगे मगर इस्लाम और मुहम्मद का मखौल उड़ाना तो दूर तर्क के नाम से ही लोग थर-थर काँपने लगते हैं।
ब्लॉग की दुनिया में एक भाई मोमिन ने इस्लाम पर विवेकपूर्ण खरी-खरी कहने का बीड़ा उठाया है। उन की बातें बड़ी सटीक हैं। कितनी ग्राह्य और सुपाच्य होती हैं ये तो वक़्त ही बताएगा। ब्लॉग पर उनका परिचय नहीं मिलता मगर इतना तय है कि वे जो भी हैं, धन्य हैं। मैं उनका स्वागत करता हूँ और उन को इस बीहड़ काम को करने के लिए बधाई और शुभकामनाएं दोनों देता हूँ।
बुधवार, 29 अक्टूबर 2008
पुलिस किस की रक्षा के लिए है?
हम्मूराबी के आँख के बदले आँख की न्याय व्यवस्था में यक़ीन रखने वाले पाटिल साब का न्याय बोध तब कहाँ नदारद हो जाता है जब एक निर्दोष 'भैय्ये' को पीट-पीट कर ट्रेन में मार डाला जाता है। लालू जी की रेल में बिना किसी राजनीतिक दल का नाम लिये यह कारनामा अंजाम दिया जाना एक सोची समझी रणनीति की ओर इशारा करता है। मगर उस मामले में मंत्री जी का कहना है कि यह हेट-क्राइम नहीं है।
आज पूरे दिन सहारा समय पर मृतक धर्म देव के साथ पिटने वाले 'भैय्ये' बताते रहे कि मारने वालों की मार खाने वालों से मुख्य शिकायत उनका उत्तर-भारतीय होना ही थी; वो भैय्यों को सबक सिखा रहे थे। लेकिन मंत्री जी उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते.. सम्भवतः वे उत्तर-भारतीयों के बयान को उतना वज़नी नहीं मानते। और उप मुख्य मंत्री जी ने जाँच होने के पहले ही फ़ैसला सुना दिया है कि यह हेट-क्राइम नहीं है।
समझ में नहीं आता कि क्या करूँ.. क्या उनका एहसान मानूँ कि कम से कम वे इसे क्राइम मान रहे हैं?
मैं जिस गहरे क्षोभ को महसूस कर रहा हूँ उसका अनुभव मेरे साथ-साथ उत्तर भारत का बहुसंख्यक हिस्सा भी कर रहा है। दुविधा अब यह है कि मैं मनसे, शिव सेना, कांग्रेस और शरद पवार जी की राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच चल रही इस घिनौनी राजनीति का जवाब किस के नेतृत्व में गोलबंद हो कर दूँ? लालू जी के या मुलायम जी के? राजनीति के अपराधीकरण में इन लोगों की भूमिका कम उल्लेखनीय नहीं है.. ये वही लालू जी हैं जो कामरेड चन्द्रशेखर के हत्या के आरोपी, सिवान के सांसद शहाबुद्दीन के गले में हाथ डालकर संसद में घूमते थे जबकि पुलिस उसके नाम का वारंट लेके देश भर में भटक रही होती थी। मुलायम जी के राज में उत्तर प्रदेश में अपराधी सीन फुला के लाल बत्ती की गाड़ियों में घूमते रहे हैं.. आज भी घूम रहे हैं।
कौन दूध का धुला है? क्या भाजपा और क्या कांग्रेस.. सभी इस हमाम में नंगे हैं। सब ने अपने छुद्र चुनावी स्वार्थों के लिए क़ानून तोड़ने वालों को क़ानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था में घुसा कर उसे प्रदूषित करने का काम किया है। सब से बड़ी अपराधी तो जनता है जो इन हत्यारों को अपना नेता स्वीकार करती है.. इन अपराधियों की सफलता के पीछे सिर्फ़ बूथ-कैपचरिंग का मामला नहीं है। हमारा समाज गहरे तौर पर बीमार समाज है। हमारे समाज के सबसे बड़े नायक कौन हैं? सचिन तेंदुलकर और शाहरुख खान? समाज में इनका क्या रचनात्मक योगदान है?
आज अगर तथाकथित ‘मराठी मानूस’ राज ठाकरे को अपना नेता मान रहा है; उसकी गिरफ़्तारी पर सड़क पर आके दंगा करने और पुलिस के हाथों पिटने में अपना हित देखता है, तो दोष सिर्फ़ राज ठाकरे को ही क्यों दिया जाय? वे सभी लोग जो इस तरह की लुम्पेन राजनीति के पीछे चलने में अपनी मनुष्यता की सार्थकता समझते हैं.. वे या तो स्वयं असफल अपराधी हैं या नैतिक रूप से बीमार।
मैं ये सोच कर खीझ उठता हूँ कि मासूम विद्यार्थियों को सामूहिक रूप से पीटे जाने को अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बनाने वाले राजनीतिज्ञ की सुरक्षा में बाइस पुलिस वाले तैनात रहते हैं क्योंकि उसे डर है कि पीटे जाने वालों में से कोई या उनका सगा-सम्बन्धी उस पर क़ातिलाना हमला कर सकता है। और जब उन सम्भावित हमलावरों की जमात वालों में से किसी को जब सामूहिक रूप से पीट-पीट कर मार डाला जाता है तो राज्य व्यवस्था उस वक़्त राज ठाकरे की सुरक्षा में सजगता बरत रही होती है।
मन भीतर से बहुत क्षुब्ध है.. आप सब भी क्षुब्ध है मैं जानता हूँ.. पार आप में से तमाम मित्र ऐसे भी हैं जो कश्मीर में भीड़ पर गोली चलाने वाली पुलिस का समर्थन करते हैं, बाटला हाउस जैसे एनकाउन्टर को जाइज़ ठहराते हैं, निरीह किसानों के हित के लिए लड़ रहे नक्सलियों के क्रूर दमन की पैरवी करते हैं।
आप को लगता होगा कि यह मामला नितान्त स्वतंत्र मामला है.. पर ऐसा है नहीं दोस्तों.. ये राज्य सत्ता अपने को बरक़रार रखने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है.. उस के लिए लोग महत्वपूर्ण नहीं है.. सत्ता महत्वपूर्ण है.. जिसे पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखने के लिए वो देश, राष्ट्र, समाज, धर्म सब कुछ तोड़ सकती है.. दो चार सौ लोगों की जान को तो वो कीड़ों-मकोड़ों जैसी अहमियत भी नहीं देती।
हम सहज विश्वासी लोग.. सुन्दर चेहरों औए मीठी बातों से बरग़लाये जाते हैं और बार-बार वही ग़लतियाँ दोहराए जाते हैं। ये सिर्फ़ महाराष्ट्र और उत्तर-भारतीयों की समस्या तक सीमित मामला नहीं है। ये क्रूर खेल अलग-अलग रूप में हर जगह देखा जा सकता है।
अभी कल की ही बात है मेरी मित्र विनीता कोयल्हो जो गोवा में अन्धाधुन्ध माइनीकरण और एसईज़ेडीकरण के खिलाफ़ गोवा बचाओ अभियान के तहत संघर्ष करती रही हैं, उन्हे एक अखबार में अपनी स्वतंत्र राय रखने के विरोध में भरी ग्राम सभा में गुंडो ने अपमानित किया, धमकाया, और दबाने का हर सम्भव प्रयास किया।
जिसके जवाब में पुलिस ने क्या किया.. उलटा उन्हे गिरफ़्तार करके थाने ले गए.. ग़नीमत यह रही कि कोई केस नहीं लगाया और तीन घन्टे बाद छोड़ दिया.. मगर सोचिये.. अब भी.. कि ये राज्य किसका है? सरकार किस की है..? और पुलिस किस की रक्षा के लिए है?
आखिर में एक सवाल अपने प्रगतिशील मित्रों से जो एक साध्वी की गिरफ़्तारी को अपनी उन आशंकाओ की पुष्टि मान रहे हैं जिसके अनुसार देश में एक हिन्दू आतंकवाद काफ़ी पहले से पनप रहा है। मैं उस आशंका और सम्भावना से इन्कार नहीं करता.. मगर इल्ज़ाम और जुर्म, मुल्ज़म और मुज्रिम का फ़र्क बनाए रखा जाय। जिस पुलिस की मुस्लिम युवकों की गिरफ़्तारियों पर हम सभी लगातार प्रश्नचिह्न खड़ा करते रहे हैं, उसी पुलिस की हिन्दू साध्वी की गिरफ़्तारी को इस नज़रिये से देखा जाना कहाँ तक उचित है जैसे कि जुर्म सिद्ध ही हो गया हो?
राज्य सत्ता अपनी सहूलियत बनाए रखने के लिए जैसे पहले मुसलमानों की गिरफ़तारियाँ करती थी.. वैसे ही (चुनावी)समय की नज़ाकत को देखते हुए ये हिन्दू साध्वी की गिरफ़्तारी का खेल भी खेला जा रहा है। भाजपा, सबको पता है, नागनाथ है मगर कांग्रेस छिपा हुआ साँपनाथ है.. पर ज़हरीला कौन अधिक है.. कहना मुश्किल है।
हमारे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला मंच अभी नहीं है.. जो हैं वो या तो भ्रूणावस्था में हैं या समाज की उन्ही बीमारियों से ग्रस्त हैं जिन से हम मुक्ति पाना चाहते हैं। जब तक हमें अपना मंच नहीं मिलता.. जागते रहिये.. सवाल करते रहिये.. और जवाब खोजते रहिये।
गुरुवार, 19 जून 2008
कुलीनता का भौकाल
नादिर शाह खानदाने तैमूरी के इतने भौकाल में था कि दिल्ली में क़त्ले आम करने के बावजूद उसे मुहम्मद शाह जैसे अय्याश को हाथ लगाने की हिम्मत तक नहीं हुई। नादिर ने कोहिनूर लिया.. तख्ते ताऊस लिया.. दिल्ली के अमीरो-उमरा की खूबसरत लड़कियाँ लीं.. दिल्ली के शहरियों के तन से कपड़े तक उतार लिए .. पर मुहम्मद शाह को गद्दी को हाथ तक नहीं लगाया.. उलटे उस के साथ पगड़ी बदल कर उसे अपनी बराबरी का दरजा दिया।
अहमद शाह अब्दाली ने भी आलमगीर द्वितीय के साथ ऐसा ही व्यवहार किया.. जबकि मुल्क के अमीरों ने आलमगीर द्वितीय के लाल क़िले में रहते-रहते अब्दाली के नाम खुत्बा पढ़वा दिया था.. और मुल्लाओं तक ने चूँ नहीं की.. फिर भी उदार-हृदय अब्दाली ने आलमगीर को उनका मुल्क वापस कर दिया.. आखिर वे अकबर और औरंगज़ेब के फ़रज़ंद थे। दो महीने तक दिल्ली से मथुरा तक सरकटी लाशें सड़कों पर सड़ती रहीं.. आबरुएं लुटती रहीं.. पर खानदाने मुग़लिया की शान में गुस्ताखी की एक आँख तक नहीं उठी।
ईरानी और अफ़्गानी तो छोड़िये अपने रैशनल अंग्रेज़ भी इस राजसी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं थे। बक्सर की लड़ाई के बाद और उसके पहले भी जब शाह आलम शिकस्तज़दा हो गए तो उनके सरदारों का तो वही हाल हुआ जो पराजितों का होता आया है मगर ज़िलावतन बादशाह को पूरी इज़्ज़त और बादशाही शान-बान से ले जाके इलाहाबाद में स्थापित किया गया।
यहाँ तक मराठे भी बादशाह को बराबर इज़्ज़त बख्शते आए। १७६० में दिल्ली जब भाऊ के क़ब्ज़े में थी और भाऊ की जेब बिलकुल खाली। उन्होने लुटी-पिटी दिल्ली को बहुत निचोड़ा और फिर भी जब कुछ हाथ नहीं आया तो भी उन्होने दबी हुई दौलत की तलाश में लाल क़िले के ज़नानखाने की तरह एक क़दम तक नहीं रखा.. हाँ दीवानेखास की छत से चाँदी ज़रूर उतार ली। बाद में जब ग़ुलाम क़ादिर खान ने शाह आलम को अंधा कर दिया तो इस अक्षम्य अपराध का बदला भी मराठों ने ही लिया।
इन सब मामलों में सियासत का भी एक पहलू है मगर इस सोच की जड़े सियासत के अलावा कहीं और भी हैं। खानदान के ऊँचे गुणों की ‘खून’ के ज़रिये निरन्तरता या आनुवंशिकी पर एक अंधविश्वास इस पूर्वाग्रह की ज़मीन है। इसी सोच से सवर्ण और सय्यद पूज्य हो जाते हैं और राजे-महाराजे ईश्वर का अवतार।
कृष्ण क्या ऐसे ही विष्णु के अवतार बने और पाँच पाण्डव देवपुत्र? शम्बूक इसीलिए तो मारा गया क्यों कि उसका पिता शूद्र था और उसका खून तपस्या के योग्य नहीं था। इस देश में गाँधी-परिवार में श्रद्धा क्या उसी पूर्वाग्रह का परिणाम नहीं है जो एक को पूज्य और दूसरे को दलित बनाता है।
सारे कांग्रेसी चरम अवसरवादिता में आम जनों की इस सोच का ही चुनावी लाभ उठाना चाहते हैं और साथ में मुलम्मा दलित-उत्थान का पहनाना चाहते हैं। अंग्रेज़ी में इस ऑक्सीमोरॉन कहते हैं। इसीलिए हम एक तरफ़ तो सोनिया जी के चरणों में बिछे रहते हैं और दूसरी तरफ़ एक काले झण्डे वाले को भी टीप मार-मार कर मिटा देना चाहते हैं- जैसे कभी चार्वाक को ब्राह्मणों ने अपनी हुंकार से दमित कर दिया था।
मंगलवार, 3 जून 2008
सीधी हो रही हैं सेज़ की सलवटें!
यह क़ानून १८९४ के भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन कर के बनाया जाएगा। फ़िलहाल ये बिल की अवस्था में है पर इतना तय है कि जब इसे संसद में सर्वसम्मति से पारित किया जाएगा तो किसी को इसकी हवा भी नहीं लगेगी। मीडिया वही ग्लमैर और सनसनी परोस रहा होगा, ब्लौग पर बन्धुगण खास ब्लौगीय क़िस्म की सरगर्मियों में तप रहे होंगे और संसद में..? वहाँ कोई नारेबाज़ी नहीं होगी, कोई वौक आउट नहीं होगा.. एक क़लम भी अध्यक्ष या किसी दूसरे सांसद की तरफ़ नहीं फेंकी जाएगी। क्यों? इस से किस पार्टी का क्या बिगड़ता है..? कांग्रेस और भाजपा से लेकर माकपा तक सेज़ के समर्थन में हैं और ये बिल तो सिर्फ़ सेज़ की सलवटों को निकालने के लिए भर है। (तृणमूल कांग्रेस ज़रूर अपनी फ़ौरी ज़रूरतों के लिहाज़ से कुछ विरोध का ड्रामा कर सकती है)
बिल के विवरण में जाने से पहले ज़रा इस पर ग़ौर कीजिये कि १८९४ का क़ानून २००८ में बदला जा रहा है.. वो भी तब जबकि देश के धनिक वर्ग को तक़लीफ़ आन पड़ी है.. जब तक आदिवासी और अन्य ग्रामीण जन बार-बार इधर से उधर धकेले जा रहे थे तब तक किसी को क़ानून बदलने की याद नहीं आई? आज़ादी के रणबांकुरों ने देश की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद अंग्रेज़ों के दमनकारी क़ानूनों को जस का तस क्यों छोड़ दिया? किसी क़ानून में बदलाव लाना तो दूर उन्होने तो क़ानून के सिपाहियों को उनके हास्यास्पद काले कोट और सफ़ेद टाई से मुक्ति दिलाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई? क्यों? क्या इस से हमारे शासकों के चरित्र पर क्या कोई रौशनी पड़ती है?
इस बिल का मसविदा तैयार करने के पहले सेज़ के लिए बनाई स्टैंडिंग कमेटी ने कुछ सिफ़ारिशें की थीं.. उन सिफ़ारिशों के रू-ब-रू देखने पर ही इस बिल की क़लई खुल जाती है कि किस तरह से सारे पहलू अमीर आदमी को सहूलियत और फ़ायदा पहुँचाने के लिए हैं और एकाध नियम अगर ऐसा लगे कि जो ग़रीब आदमी की सहूलियत के लिए है वो व्यावहारिक स्तर पर जा कर ऐसी शक़ल अख्तियार कर लेगा कि अन्ततः उसे कोई लाभ नहीं पहुँच सकेगा।
सिफ़ारिश थी कि राज्य सरकार और ग्राम पंचायत मिल कर फ़ैसला करें कि कौन सी ज़मीन इस योग्य है और फिर एक जन विज्ञप्ति जारी करें ताकि ज़मीन के रिकॉर्ड्स में किसी भी तरह के कपट से बचा जा सके.. मगर बिल में इसके विपरीत ज़मीन के रिकॉर्ड्स को दुरुस्त करने, ज़मीन सम्बन्धी सभी निर्णय लेने के लिए सारे अधिकार कलेक्टर साहब के सुपुर्द कर दिए गए हैं।
ज़मीन की क़िस्म
कमेटी की सिफ़ारिश थी कि केवल बंजर और बेकार ज़मीन का ही उपयोग सेज़ के लिए किया जाय और बिलकुल ही अनिवार्य होने पर वर्षा पर आश्रित एक फ़सल वाली ज़मीन और कई फ़सल वाली सिंचित ज़मीन के अधिग्रहण पर पाबन्दी लगाई जाय .. मगर बिल इस मामले में चुप्पी साधे है।
ज़मीन खरीदने की सीमा
सिफ़ारिश थी कि हर तरह के सेज़ के लिए ज़रूरत से ज़्यादा ज़मीन खरीदने पर रोक लगाई जाय, अधिकतम सीमा निर्धारित की जाय और अधिग्रहीत ज़मीन का कम से कम ५०% हिस्सा प्रोसेसिंग एरिया की तरह इस्तेमाल किया जाय। मगर बिल कोई सीमा नहीं बताता।
ज़मीन के मालिकों की अनुमति
सिफ़ारिश थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले को छोड़कर ज़मीन के मूल स्वामियों/निवासियों की अनुमति आवश्यक हो.. मगर बिल कहता है कि प्रभावित लोग अधिसूचना के तीस दिन के भीतर अपनी आपत्ति कलेक्टर के पास दायर कर सकते हैं। सम्बन्धित सरकार इन आपत्तियों पर विचार करेगी और पुनर्वास का मामला ग्रामसभा में विचारा जाएगा।
प्रभावित लोगों को सूचना
सिफ़ारिश की गई थी कि प्रभावित लोगों को ज़मीन के अधिग्रहण के उद्देश्य, असर और पुनर्वास सम्बन्धी व्यवस्था के बारे में सूचित किया जाय। मगर बिल कहता है कि ये सारी सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएंगी और पुनर्वास की योजना उन लोगों से मशविरा कर के सार्वजनिक कर दी जाएगी।
ज़रा सोचिये! कल को आप के घर पर क़ब्ज़े का नोटिस कलेक्टर के दफ़तर के बाहर चिपका हो या अखबार के एक कोने में भी छ्पा हो और आप शेन वार्न, शाहरुख खान और तुलसी विरानी के बीच झूलते हुए उसे पढ़ने से चूक गए तो आप सर पटक के मार जाइये आप का वैधानिक अधिकार आप के हाथ से निकल गया।
ज़मीन अगर इस्तेमाल नहीं हुई
सिफ़ारिश थी कि ज़मीन खरीदने के बजाय लीज़ पर लेने का प्रावधान रखा जाय जिसमें ज़मीन के मालिक को एकमुश्त रक़म के अलावा लगातार किराया भी मिले और यदि सेज़ न चले या खत्म हो जाय तो ज़मीन को उसके मूल मालिक के पास वापस लौटा दिया जाय। मगर बिल एक बार फिर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं करता और पांच साल तक इस्तेमाल न होने की सूरत में ज़मीन को उलटे सरकार के क़ब्ज़े में जाने की बात करता है।
मुआवज़े का गणित
सिफ़ारिश थी कि मुआवज़ा उस समय के बाज़ार भाव के अनुसार दिया जाय मगर बिल इसकी भी ऐसी खिचड़ी बनाता है कि अमीर आदमी को और फ़ायदा पहुँचे.. कहता है कि मुआवज़े का आकलन बाज़ार भाव, ज़मीन का क्या इस्तेमाल होना है, ज़मीन पर खड़ी फ़सल, अन्य अधिग्रहीत ज़मीनों के ऊपरी ५०% भावों का ‘औसत’ के आधार पर किया जाय।
ज़मीन का मालिकाना
सिफ़ारिश थी कि भले ही सरकार खुद भी अधिग्रहण कर रही हो तो भी ज़मीन खरीदने के बजाय लीज़ पर ली जाय मगर बिल इस को तो अनदेखा करता ही है साथ एक और अनोखी बात करता है कि अगर अधिग्रहण की जा रही ज़मीन का ७०% हथियाया जा चुका है तो फिर कम्पनी को शेष ज़मीन को ‘पब्लिक परपज़’ के आधार पर लेने का अधिकार स्वतः मिल जाता है।
बहुत सोचने पर भी मुझे सिफ़ारिशों के उलट जा कर बिल का ऐसा स्वरूप तैयार करने के पीछे मुझे कोई और मक़्सद समझ नहीं आया सिवाय इसके कि ये राज्यसत्ता, सरकार और इसके चुने हुए प्रतिनिधि विकास के नाम पर, लुटे-पिटे ग़रीब आदमी को जितना हक़ बनता है उसे उतना भी नहीं देना चाहते। और वित्त मंत्री महाशय जो विकास के इस मॉडल के ज़रिये ही सबसे बड़े प्रदूषक- ग़रीबी को दूर करने की बात करते हैं.. क्या इतने भोले हैं कि इन बदलावों का अर्थ नहीं समझते और इसी नासमझी के चलते वे इस बिल की सहमति में हाथ खड़ा कर देंगे?
मुझे इस बिल की जानकारी इंडिया टुगेदर नाम की सचेत साइट पर प्रिया पारकर और सरिता वनका के लेख न्यू रूल्स फ़ॉर सीज़िंग लैण्ड से से हासिल हुई।
शनिवार, 31 मई 2008
मंत्री जी का सपना
तो उनका कहना था कि “हमें भी विकसित देशों की तरह तरक्की करने का अधिकार है. कभी उनका मौका था. अब हमारा है…” यानी पर्यावरण को लगातार नुक़सान पहुँचा रहे औद्यौगिक इकाईयों के प्रति वे ‘त्वरित विकास’ के नाम पर आँख फेर लेना चाहते हैं। विकसित देशों ने जब ग़लतियाँ की तब पर्यावरण के खतरे इतने आसन्न न थे मगर हम सब कुछ जान-बूझ कर उस रस्ते क्यों जाना चाहते हैं जिस पर नाग बैठा हो?
माननीय मंत्री जी की ये बात सही है कि औद्यौगिकीकरण को अब वापस उलटाया नहीं जा सकता मगर उसे पर्यावरण के अनुकूल और अधिक मानवीय तो बनाया जा सकता है? कैनाडा और उत्तरी योरोप के कई देशों में औद्यौगिक समाज होने के बावजूद एक अन्तर्निहित मानवता भी है और ये संयोग नहीं है कि इन्ही देशों में पर्यावरण को लेकर संचेतना विकसित हुई है। अफ़सोस सिर्फ़ इस बात का है हमारा ग्राम्य समाज जो पहले से ही एक संतुलित पर्यावरण के आदर्श मॉडल पर खड़ा हुआ था.. उसके प्रति माननीय मंत्री जी के विचार बेहद अफ़सोसनाक है।
“गरीबी प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक है. गरीब सबसे गंदी दुनिया में रहते हैं. उनकी दुनिया में सफाई, पेयजल, आवास, हवा...जैसी चीजें नारकीय अवस्था में होती हैं. हर चीज प्रदूषणयुक्त होती है. इसलिए मैंने कहा कि सबसे ज्यादा प्रदूषण गरीबी फैलाती है. ये हमारा अधिकार और कर्तव्य है कि पहले गरीबी को हटाया जाए.”
मंत्री जी ने यहाँ पर जिन ग़रीबों की बात की है वो साफ़ नहीं है कि किसे ग़रीब कह रहे हैं क्या ग़रीब से उनका अर्थ शहर की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले वो लोग जो गाँव से भाग कर आए हैं? पर ये अर्थ होता तो ऐसा क्यों कहते कि “गरीबी मुक्त भारत को लेकर मेरा जो सपना है उसमें एक बड़ी आबादी, तकरीबन 85 फीसद लोग शहरों में रहेंगे..” ज़ाहिर है के खातमा चाहने वाले मंत्री जी के विचार से शहर में रहने से ग़रीबी दूर होती है। तो फिर उनका अर्थ गाँव में रहने वाले करोड़ों-करोड़ ग़रीबों से होगा?
पर मंत्री जी जिन नारकीय तत्वों की बात कर रहे हैं क्या वे गाँव से ज़्यादा शहर की पहचान नहीं हैं? क्या औद्योगिकीकरण के पहले की दुनिया में इन तत्वों का प्रदूषण था? पेयजल की समस्या अगर रेगिस्तानी इलाक़ों को छोड़ दिया जाय तो कहीं नहीं थी.. ज़मीन में तीर मारने से पानी निकलता था, कुँए थे, बावड़ियाँ थी, तालाब थे, नदियाँ थी। आवास के लिए मीलों तक फैली ज़मीन थी। गन्दगी के नाम जैविक कचरा था जो सड़कर उत्पादक खाद में बदल जाता था। स्वच्छ हवा के लिए घने जंगल थे, उनकी समृद्ध जैविक विभिन्नता थी।
पर आज के शहरों में क्या हाल है? ऐसा कचरा है जो सदियों तक नष्ट नहीं होगा.. ज़हरीली गैसे हैं.. बांद्रा जैसे इलाक़ों में भी नलके से आने वाला काला पानी है..१० बाई १० के खोलियों में क़ैद दरज़नों लोग हैं..! और नारकीय अवस्था कहाँ हैं ये मंत्री जी के कुशाग्र मस्तिष्क के लिए अग्राह्य है या वे देश की आँखों में शुद्ध धूल झोंक रहे हैं..? सम्पन्नता के लिए मंत्री जी के एकमात्र उपाय औद्यौगिकीकरण ने ही तो वे सारे रोग पैदा किए हैं जिनको हल करने के लिए वे औद्यगिकीकरण का हक़ीम लाने की पैरवी कर रहे हैं। ये कैसा विरोधाभास है?
“गरीबी मुक्त भारत को लेकर मेरा जो सपना है उसमें एक बड़ी आबादी, तकरीबन 85 फीसद लोग शहरों में रहेंगे. महानगरों में नहीं बल्कि शहरों में. किसी शहरी वातावरण में जल आपूर्ति, बिजली, शिक्षा, सड़क, मनोरंजन और सुरक्षा को प्रभावी तरीके से मुहैया करवाना 6 लाख गांवों के मुकाबले ज्यादा आसान है.”
तो क्या उनका विश्वास है कि जैसे धारावी में दसियों लाख लोग एक सम्पन्न जीवन गुज़ार रहे हैं जहाँ उनको शिक्षा, पानी, और चिकित्सा आसानी से उपलब्ध कराई जा रही है? उनका मानना है कि गाँव-गाँव में ये सुविधाएं पहुँचाना बहुत टेढ़ी खीर है.. मगर शहर में आसान है?
मेरी समझ में ऐसे गाँव भी होंगे जहाँ प्राथमिक पाठशाला और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र न हो.. पर जहाँ हैं वहाँ उनको ठीक से चलाने की इच्छा-शक्ति सरकार की क्यों नहीं है। बहुधा गाँवों में समस्या ये नहीं है कि गाँव में बिजली के तार नहीं है.. समस्या ये है कि उन तारों में बिजली की आपूर्ति नहीं है? और गाँव की बात छोड़ दीजिये आप दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों के अलावा अन्य शहरों में इन सुविधाओं की क्या स्थिति है? मुम्बई में भी कई धारावी हैं और देश के तमाम छोटे-छोटे शहरों में भी तमाम छोटे—छोटे धारावी! वहाँ पर कितना पानी और कितनी बिजली मुहैय्या करा रहे हैं आप?
मंत्री जी कहते हैं कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता आदि मदों पर अब तक की सबसे बड़ी धनराशि खर्च कर रहे हैं मगर पहले के मुक़ाबले उस राशि का वास्तविक मूल्य और बजट का प्रतिशत गोल कर जाते हैं।
यहाँ पर ये बताना भी उल्लेखनीय होगा कि शिक्षा के बजट के नाम पर जो पैसा खर्च किया जाता है उसका एक बड़ा हिस्सा आई.आई.एम जैसे संस्थानों को ग्रांट के तौर पर दान दिया जाता है जो अपने विद्यार्थियों से मोटी फ़ीस लेते हैं। क्या मंत्री जी कभी सोचते हैं कि मुनाफ़े की व्यवस्था के मूल्यों की शिक्षा देने वाले ये संस्थान राज्य की कल्याणकारी अवधारणा की छाँव में खड़े होकर अपना व्यापार क्यों करते हैं? मैं फिर पूछता हूँ ये कैसा विरोधाभास है?
मंत्री जी कहते हैं कि "ये एक साजिश है कि गरीब लोग गरीब ही रहें. हम जीवन की किस गुणवत्ता की बात कर रहे हैं? उनके पास खाना नहीं है, नौकरियां नहीं हैं, शिक्षा नहीं है, पेयजल नहीं है.." ..मैं पूछना चाहता हूँ मंत्री जी से जो देश की ८५ प्रतिशत जनता को शहर में धकेल देने के स्वप्नदर्शी हैं कि इन बहुसंख्यक लोगों को शहरों में बसाने के लिए उनके पास क्या ब्लूप्रिंट है.. और फिर अगर सचमुच उनकी चिंता ग़रीब लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास है तो इन बुनियादी ज़रूरतों को बाज़ार की मुनाफ़ाखोरी के हवाले क्यों कर दिया गया है? जबकि इंगलैंड जैसे अनेक योरोपीय देशों में प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत ज़रूरतों की ज़िम्मेदारी राज्य वहन करता है। जबकि हमारे यहाँ उसे नोट काटने का धंधा बना दिया गया है।
मैं मंत्री जी के भोले भाले चेहरे पर उनकी मुस्कान पर विश्वास करना चाहता हूँ मगर फिर जब सोचता हूँ कि पाँच हज़ार बरस से ग़रीबी में रह रहे लोगों के लिए धड़कने वाले दिल के मालिक मंत्री जी सरकार में रहते हैं तो एनरॉन और वेदान्ता जैसे कम्पनियों के लिए मुनाफ़ा कमाने के लिए नीतियाँ मुकर्रर करते हैं और जब सत्ता से बाहर होते हैं तो उनकी लिए वक़ालत करते हैं तो मेरा दिल टूट जाता है। इतने भोले चेहरे का व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है?
पर सच यही है कि आदिवासियों की ज़मीन हड़पने, पर्यावरण का बलात्कार करने, नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वाली माइनिंग कम्पनी वेदान्ता जो विश्व भर में बदनाम और निन्दित है उसके टैक्स मामलों की पैरवी पी चिदमबरम साहब करते हैं और उनके बोर्ड के डाइरेक्टर का पद भी सम्हालते हैं और सत्ता में आने पर इस सर्वनिन्दित कम्पनी को अयोग्य घोषित करने के बजाय उसे धंधा करने की खुली छूट देते हैं और उस पर सवाल करने पर भड़क जाते हैं-
“उसका इससे क्या सबंध है? क्या आप अप्रत्यक्ष रूप से ये कह रही हैं कि मैं उनसे मिला हुआ हूं? अगर कोई वकील हत्या के मामले के किसी आरोपी की तरफ से जिरह कर रहा है तो क्या इसका ये मतलब है कि उसकी भी हत्या में मिलीभगत है?”
मिलीभगत का आरोप कौन लगा सकता है मंत्री जी पर ये सवाल तो बनता है कि आप ग़रीबों के खैरख्वाह हो कर उन लोगों की किसी भी मामले की पैरवी करते ही क्यों हैं जिन पर ग़रीबों की हत्या का आरोप हो?
मैं फिर भी नहीं कहता कि लोगों को गाँवों में ही बंद कर के रखा जाय.. अगर बहुमत शहरी सभ्यता को ही स्वीकार करना चाहता है और यही इतिहास की गति है तो मैं कौन होता हूँ किसी को रोकने वाला? मगर उन्हे भिखारी बना कर गाँव से शहर की ओर खदेड़ना में क्या जनहित हैं मेरी समझ में नहीं आता?
अपने सपने में एक और उल्लेखनीय बात मंत्री जी जोड़ते है “मैं ये भी मानता हूं कि एक बड़ी आबादी गांवों में रहना और खेती करना चाहेगी. इसका स्वागत होना चाहिए..” निश्चित ही ज़हर खा कर मरने की मानसिकता वाला किसान तो किसी तरह से खेती-बाड़ी से निकलने की मानसिकता रखता है तो फिर उनका इशारा ये किस आबादी की तरफ़ हो सकता है इसका फ़ैसला आप खुद करें!
अगर किसी दिन आप को अखबार के किसी कोने में छोटी इबारत में यह पढ़ने को मिल जाय कि देश की संसद ने सर्वसम्मति से क़ानून पारित कर दिया है कि अब देश का कोई भी नागरिक कहीं भी कितनी भी ज़मीन खरीद कर खेती कर सकता है तो आप को हैरान नहीं होना चाहिये।
गुरुवार, 29 मई 2008
क्या फूटने वाला है बुलबुला?
पहले तो पूरे संसार में खाद्यान्न का संकट जिसका ठीकरा बुद्धिशाली बुश ने भारत के बढ़ते मध्यवर्ग पर फोड़ दिया.. और फिर अब ये तेल का संकट.. जिसके लिए कौन ज़िम्मेवार है बुश साहब भी नहीं बता रहे!
पिछले दस सालों में तेल की क़ीमत दस डॉलर प्रति बैरल से एक सौ तीस डॉलर प्रति बैरल जा पहुँची है। जो चार महीने पहले कुल सौ डॉलर थी और साल के अंत में दौ सौ तक भी पहुँच जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिये। चुनावी वर्ष में महँगाई को दबा कर रखने के लिए सरकार तेल कम्पनियों को दीवालिया होने की कगार तक धकेले जा रही है।
अगर केरोसिन, डीज़ल और कुकिंग गैस ड्योढ़े दामों पर बिकने लगे तो महँगाई का क्या हाल होगा? और ये दाम क्या वहीं रुकने वाले हैं..? वो तो दुगने तिगुने और चौगुने भी होते जाएंगे जैसे कि ओपेक की दशा और दिशा है। उस का प्रभाव पूरे अर्थतंत्र पर क्या होगा ये बताने की ईमानदारी किसी अर्थशास्त्री में नहीं दिखती.. सारे के सारे अर्थवेत्ता, सरकार और मीडिया जनता को विकास दर और सेंसेक्स की उछाल और पछाड़ में ही उलझाए रखते हैं।
हर आदमी जानता है कि अभी की महँगाई की वजह खाद्यान्न की कमी और उनकी बढ़ी हुई क़ीमतें हैं। ग़ौरतलब बात ये है कि ये क़ीमतें मूल उत्पादक यानी किसान के सिरे पर जस की तस हैं.. वो अभी भी अपना उत्पाद उन्ही माटी के मोल पे बेच रहा है जो उसे अस्तित्वविहीनता के मुहाने पर बनाए रखता है। मगर फिर भी दाम आसमान छुए जाते हैं.. कारण क्या है?
बाबा धूमिल ने कहा है कि लोहे का स्वाद लुहार से नहीं घोड़े से पूछा जाय.. । तो खेती-बाड़ी करने वाले अशोक जी बता रहे हैं कि गणित में सौ में सौ पाने वाले देश के महान अर्थशास्त्री जन अनाज के दामों की ज़रा सी जुम्बिश तक पकड़ लेते हैं मगर लोहे का मूस मुटा के हाथी हो जाय तो भी वो उन्हे नज़र नहीं आता?
पिछले छै महीनों में लोहे की क़ीमतें दुगनी हो चली हैं.. और दूसरी तरफ़ .. "आलू जैसी कुछ सब्जियां तो इतनी सस्ती है की किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही है। हमारे यहाँ आज की तारीख में किसानों से ढाई रूपए किलो की दर से आलू खरीदने को भी कोई व्यापारी तैयार नहीं।"
अशोक भाई आगे कहते हैं कि ".. अनाज की कीमतें अधिक हैं, तो सरकार ने किसानों को भी उन अधिक कीमतों का लाभ क्यों नहीं दिया? केन्द्र सरकार इस साल भी किसानों से गेहूँ की खरीद पिछले साल के समर्थन मूल्य 1000 रूपए प्रति क्विंटल की दर से ही कर रही है।सच तो यह है की महंगाई की सबसे अधिक मार किसानों पर ही पड़ी है। उनके जीवन-यापन का व्यय बढ़ गया, कृषि लागत बढ़ गयी, लेकिन अनाज का समर्थन मूल्य पिछले साल वाला ही रहा। ... धन्य हैं भारत भाग्य विधाता। समर्थन मूल्य पाई भर भी नहीं बढाया, फिर भी कह रहे हैं कि अनाज मंहगे हैं। लोहे की कीमत डबल हो गई, फिर भी फरमाते हैं कि कीमतें कम हो रही है।"
मुझे अर्थशास्त्र की पेचीदा गलियाँ किसी भूलभुलैया से कभी कम नहीं लगी। लेकिन रोटी एक हो और खाने वाले चार तो ये गणित समझने के लिए आप को किसी अर्थशास्त्री की ज़रूरत नहीं। कुछ लोग का मुग़ालता हो सकता है कि साधन असीमित है.. पर ज़ाहिर बात है.. चाहे लोहा हो या तेल.. सीमित मात्रा में है। और जिस तरह से विकास का कार्यक्रम चल रहा है उसमें विकास से ज़्यादा विकास-दर का महत्व समझ आता है.. जैसे विकास भी कोई असीमित परिघटना हो!
बढ़ना अच्छी बात है.. पर शरीर के कुछ हिस्से बढ़ें और कुछ नहीं तो उस शरीर को स्वस्थ कोई कैसे कह सकता है? .. उसे कैंसर-ग्रस्त ही कहा जाएगा। क्या इसे विड्म्बना कहा जाय या तर्क-गति कि समाज और उसके लोग एक ही बीमारी से ग्रस्त होते हैं। ज़मीन हो, पानी हो या हवा.. सब सीमित मात्रा में हैं। मगर सभ्यता के जिस संस्करण में हम रहे हैं वो (प्रकृति और मनुष्य दोनों के ही) शोषण की व्यवस्था को ही सभ्य मानता है उसकी दृष्टि से भारत की ग्राम्य व्यवस्था एक अविकसित, पिछड़े समाज की अभिव्यक्ति थी।
उस 'असभ्य' व्यवस्था में आप जिन से कुछ लेते थे- पेड़,नदी, पहाड़, हवा, गाय,धरती- सबकी पूजा करते थे.. रोज़-रोज़ धन्यवाद करते थे। इतनी संवेदना रखते थे कि जो आप के लिए जल कर रौशनी करते हैं उनको जल चढ़ाते थे। उस संवेदना के अभाव और शुद्ध लालच से प्रेरित इस व्यवस्था में अब जबकि प्राकृतिक संसाधन अपनी सीमा तक पहुँच रहे हैं.. ये सवाल मौज़ूँ हो जाता है कि क्या बुलबुला फूटने वाला है?
सोमवार, 28 जनवरी 2008
मंगलेश जी की पार्टीलाइन
लेकिन ब्लॉग की अवधारणा और उसके उद्देश्यों के समर्थक इन पंक्तियों के लेखक का एक दुख यह है कि उसे 6 दिसंबर 2007 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के पंद्रहवें वर्ष पर ब्लॉगों के हलचल-भरे संसार में सिर्फ 'कबाड़खाना' नामक एक ब्लॉग पर कैफी आजमी की कविता 'दूसरा वनवास' के अलावा कुछ नहीं मिला।
क्या ब्लॉग के बारे में राय बनाने का यह सही पैमाना है। मुझे कल यदि मंगलेश जी की कविता के ऊपर एक लेख लिखना हो तो क्या मैं फटाफट उनकी कविता संग्रह में भोपाल त्रासदी पर लिखी किसी कविता की तलाश करूँ और न मिलने पर घोषित कर दूँ कि कवि में सामाजिक चेतना का अभाव है।
मैं पूछना चाहता हूँ कि ये ६ दिसम्बर का संदर्भ दिया क्यों जा रहा है? जो भी ब्लॉग की दुनिया से परिचित है वह जानता है कि साम्प्रदायिकता को लेकर यहाँ कितनी आग उगली गई है.. हिन्दी ब्लॉगिंग के तथाकथित 'मोहल्ला युग' में तो काफ़ी सारे ब्लॉगर्स ने और उसके पहले भी भाई प्रियंकर और अफ़लातून ने भी साम्प्रदायिक सोच के खिलाफ़ मोर्चा खोला है। मगर इसकी मंगलेश जी को कोई हवा नहीं इसीलिए मेरा शक़ है कि मंगलेश जी को हिन्दी ब्लॉग की दुनिया की उतनी ही जानकारी है जितनी हाथी की पूँछ पकड़ कर उसका आकार रज्जुवत बताने वाले पण्डित की होती है।
वे यहीं नहीं रुकते और दुःख प्रगट करते हैं कि किसी एक अमेरिकी इंडियन मूल के कवि एमानुएल ओर्तीज की एक अद्भुत कविता जिसका हिंदी अनुवाद कवि असद जैदी ने किया था उन्हे ब्लॉग पर नहीं मिली.. हद है.. उम्मीद पालने की.. बच्चा जुम्मा- जुम्मा आठ दिन का हुआ और आप उस से कह रहे हैं कि हाइज़ेनबर्ग का अनसर्टेनिटी प्रिन्सिपल बताओ.. जिसमे आधुनिक विज्ञान को मूलभूत रूप से बदल दिया.. बहुत महत्वपूर्ण है पर कितने लोगों को पता है क्या होता है अनसर्टेनिटी प्रिन्सिपल..?
मुझे भी दो दुःख हैं एक तो यह कि मैं एक बड़े कवि से इस सुर में बात कर रहा हूँ और दूसरे यह कि मेरी भाषा का बड़ा कवि उलटे-सीधे निष्कर्ष निकाल रहा है। उन्होने हिन्दी ब्लॉग की दुनिया विकसित होने से पहले ही उसके उद्देश्य और मंज़िलें तय कर दी है-
लगता है कि बाजारवादी और वर्चस्ववादी मुख्य धारा के मीडिया के बरक्स यह वैकल्पिक माध्यम आने वाले वर्षों में हाशियों की अस्मिता का एक प्रभावशाली औजार बनेगा.. वे आगे कहते हैं कि क्या ब्लॉगों से गंभीर, वैचारिक, बौद्घिक होने की मांग करना अनुचित होगा, क्या यह कहना गलत होगा कि उन्हें उर्दू के सतही शायर चिरकीं की मलमूत्रवादी गजलों, लेखकों की निजी कुंठाओं और पारिवारिक तस्वीरों की बजाय एमानुएल ओर्तीज की कविताएं, एजाज अहमद की तकरीरें और तहलका द्वारा ली गई गुजरात के कातिलों की तस्वीरें जारी करनी चाहिए?
अगर आप सचमुच सवाल कर रहे हैं तो मेरा जवाब है कि हाँ अनुचित होगा। पहली बात तो ये कि आप जिस बौद्धिकता, वैचारिकता की अनुपस्थिति की बात कर रहे हैं वो ही ग़लत है। दूसरे ये कि आप सवाल नहीं कर रहे माँग कर रहे हैं.. और मैं तो कहता हूँ कि आप माँग भी नहीं कर रहे.. आप सवाल की शक्ल में व्हिप जारी कर रहे हैं। जैसे साहित्य की दुनिया में राजनीतिक पार्टी और आलोचक लेखक का मार्गदर्शन करते हैं कि किन विषयों पर लिखो.. क्या विमर्श करो? जैसे कुछ साल पहले स्त्री विमर्श और दलित विमर्श का दौर था अभी भी शायद वही चल रहा है। जो साहित्य पार्टीलाइन सोच कर लिखा जाता है.. मैं उसे अभिव्यक्ति नहीं नारेबाज़ी कहता हूँ।
ब्लॉग के ज़रिये आम आदमी को एक आज़ादी मिली है। आप उस में पार्टी लाइन चलाना चाहते हैं? भड़ास वाले अपने ब्लॉग पर विचार वमन करें या साधुवादी लोग जन्मदिन मना कर एक दूसरे को बधाई दें..वो उनकी अभिव्यक्ति है। वे भी आप की ही तरह सम्पूर्ण मनुष्य हैं और वे वही अभिव्यक्त करेंगे जो करना चाहते हैं और उन्हे इसका हक़ है। अगर आप को लगता है कि आप लोगों को यह बताकर कि उन्हे क्या करना चाहिये किसी बौद्धिकता का परिचय दे रहे हैं तो मुझे फिर दुःख है। वे क्या बो्लें या न बोलें और कब बोलें.. आप ज़रा सोचें.. आप उन्हे बताएंगे?
सदिच्छाएं तो मेरी भी बहुत हैं पर वास्तविक समाज से अलग कोई ब्लॉग का समाज बन जाएगा.. ऐसी कोई ग़लतफ़हमी हम और आप कैसे पाल सकते हैं? हमें तो मार्गदर्शन की ज़रूरत है पर आप तो समझदार आदमी हैं। गुजरात में मोदी जीतता रहे और गुजराती ब्लॉगियों से आप उम्मीद करें कि वे गुजरात के क़ातिलों के तस्वीर जारी करें। क्या उनको आप आकाश से आया हुआ मान रहे हैं? जितने प्रतिशत लोग आप की कविताएं पढ़कर आह्लादित होते हैं उस से अधिक लोग यहाँ एमानुएल ओर्तीज की कविताओं पर भावुक हो रहे होंगे ऐसी कल्पना ही बचकानी है। रही बात उन बहुसंख्यक लोगों की जो न आप की कविता पढ़ते हैं और न गुजरात पर धरना-प्रदर्शन.. उनसे ऐसी उम्मीद, साफ़ शब्दों में, मूर्खतापूर्ण है।
रविवार, 27 जनवरी 2008
ज्ञान जी भी बदल जाएंगे
१) ज्ञान जी का सुर खिलंदड़ा था और उन्हे एहसास नहीं था कि उनका मज़ाक किसी को इतना बुरा लगेगा। मेरे प्रतिक्रिया करने के पहले कई लोगों ने ज्ञान जी के मज़ाक में छिपी हुई स्त्री-विरोधी विचार को चिह्नित कर दिया था.. अगर वे ज़रा भी समझदार हैं तो समझ चुके होंगे कि उनसे क्या गलती हो गई और समझदार नहीं है तो मेरे भी उसी बात को दोहराने से कोई लाभ नहीं होने वाला था.. बल्कि असर उलटा होता। मेरे उनके बीच स्नेह का जो सम्बन्ध है वो टूट जाता। मेरा मानना है कि ज्ञान जी समझदार व्यक्ति हैं और वो पहली प्रतिक्रिया के बाद ही समझ गए थे कि उनसे कुछ ग़लती हो गई। और उन्होने फ़ौरन माफ़ी भी माँग ली थी।
२) मेरा मानना है कि भीतर बैठे हुए संस्कार सिर्फ़ समझदारी से नहीं बदलते.. एक भौतिक प्रक्रिया में बदलते हैं। मैंने अपने निजी अनुभव में पाया है कि एक व्यक्ति जो अपनी बहनों के सर से दुपट्टा थोड़ा सरकते ही उनके माथे पर दुपट्टे को कील से ठोंकने की बात करता था.. अपने बहुओं को जीन्स पहनकर स्कूटर चलाता हुआ देखकर प्रसन्न होता है और उसकी बहनें इस दुभाति व्यवहार के लिए कुढ़ती हैं। एक दूसरा आदमी जिसने कभी अपने हाथ से एक गिलास पानी लेकर नहीं पिया, अपने खाने-पीने को लेकर इतना अड़ियल रहा कि उसकी पत्नी को जीवन भर दो तरह ही की रसोई बनानी पड़ी (एक बाकी सब के लिए और एक उसके लिए)। वही आदमी अपनी बेटी के जल्दी दफ़्तर जाने पर अपनी नातिन के लिए कभी-कभी लंचबॉक्स भी बनाता है। ईवोल्यूशन का सिद्धान्त बताता है कि वातावरण के अनुकूल वांछित परिवर्तन पीढ़ियों के ज़रिये विकसित होते हैं।
३) मेरे पास इतनी ऊर्जा नहीं है कि हर प्रतिक्रियावादी विचार के साथ मैं एक बहस में उतरूँ। ज्ञान जी के अगर किसी विचार से मुझे तक्लीफ़ है मगर उसका सीधा प्रभाव मुझ पर तो पड़ नहीं रहा तो सही है मैं क्यों खर्चा होऊँ? ज्ञान जी झेंलेंगे उनका परिवार झेलेगा। मेरे-आपके बहस करने से थोड़ी बदलती है दुनिया। दुनिया के बदलने की अपनी चाल है।
अगर कोई समझता है कि सभी मनुष्यों को बराबरी का हक किसी वॉल्तेयर साहिब के सिद्धान्त और कुछ फ़्रांसीसी क्रांतिकारियों के बलिदान के चलते मिला है या भारत से जातिवाद किसी गाँधी बाबा या बाबा साहेब के बदौलत खत्म हो रहा है या स्त्रियों के अधिकार किसी रोज़ा लक्ज़्मबर्ग या मैडम क्यूरी की देन है तो ये उनकी ग़लतफ़हमी है। इन महान लोगों का योगदान को कम नहीं कर रहा बस उन्हे उनके समय में स्थापित कर रहा हूँ। ये सारे परिवर्तन इसलिए हुए और हो रहे हैं और होंगे क्योंकि वे एक ऐतिहासिक प्रगति का हिस्सा हैं। पूँजीवाद ने दुनिया में ऐसे भौतिक परिवर्तन कर दिए हैं कि कोई चाह कर भी आदमी के सांस्कृतिक जगत के इन बदलावों को नहीं रोक नहीं सकता।
गाँव में सबको सबकी जाति मालूम होती है। मगर एक बार जब ट्रेन आ गई, और आप को गाँव छोड़कर धंधे की तलाश में शहर जाना पड़ा तो आप नहीं जान सकते कि ट्रेन में आप के बगल में सटकर बैठने वाले अनजान आदमी की जाति क्या है? जाति की जड़ तो कट गई.. कुछ दिनों में पेड़ भी गिर जाएगा। ऐसे ही स्त्रियों के प्रति व्यवहार है जो वैचारिक बहस से नहीं, ठोस व्यवहार में बदलेगा।
४) ब्लॉग की दुनिया बड़ी हो रही है पर इसमें अभी भी एक पारिवारिक भावना बनी हुई है। वो पूरी तरह कब खत्म हो जाएगी या खत्म हो ही जाएगी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। पहले-पहले जब हम एक-दूसरे को नहीं जानते थे तो हमारी उनकी बड़ी रार हुई थी, जो उनकी और मेरी पुरानों पोस्टों में देखी जा सकती है। पर अब ज्ञान जी से एक बड़े भाई जैसा सम्बन्ध बन गया है। और अगर बड़ा भाई कुछ ग़लत बात कर भी रहा हो तो उसको जवाब देने का सब का अलग तरीक़ा होता है- मेरा यह तरीक़ा है।
आखिर ‘क़यामत से क़यामत तक’ के सामंतवादी समाज से ‘दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे’ के पूँजीवादी समाज में कुछ तो अंतर है। आप को उम्मीद है कि पिछली पीढ़ी बदल जाएगी।
५) यह सिर्फ़ मेरी अपनी प्रतिक्रिया का मेरे मित्रों के लिए स्पष्टीकरण हैं मेरे उन मित्रों का विरोध नहीं जिन्होने इस मसले पर कड़ा रुख अपनाया है। बड़े भाई ज्ञान जी अगर ऐसी पोस्ट लिखेंगे तो उन्हे लोगों ऐसे कड़े रुख के लिए तैयार भी रहना चाहिये और छोटे भाई शिव कुमार मिश्र को भी।
शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007
दहशतगर्दी के खिलाफ़ देवबंद का फ़तवा
शीर्षक है - 'दहशतगर्दी के खिलाफ़ देवबंद का फ़तवा'.. तस्वीर के बगल के बॉक्स में ये मुख्य बिन्दु छापे हैं-
-एशिया में इस्लामी तालीम के सबसे बड़े मरकज़ ने दहशतगर्दी का मुआज़ना (तुलना) जेहाद से करने से मना कर दिया और कहा: जेहाद का मक़्सद बुराई के खिलाफ़ जंग है जबकि दहशतगर्दी का मक़्सद बेगुनाहों को निशाना बनाना.
-दहशतगर्दी को इन्सानियत के खिलाफ़ ‘क़ाबिले नफ़रत जुर्म’ क़रार दिया और कहा कि इस्लाम तवाज़माना (इंसाफ़ की) जंग में भी बेगुनाहों, इबादतगाहों और तालीमी मरकज़ को निशाना बनाने से मना करता है.
-फ़तवे के मुताबिक़ चन्द शिद्द्त-पसन्द (अत्याचारी) मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं.
यह फ़तवा मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के एक सवाल के जवाब में जारी किया गया. जावेद साहब ने पूछा था कि जेहाद और दहशतगर्दी में क्या फ़र्क़ है?
१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अस्तित्व मे आए दारुल उलूम देवबंद की भूमिका देश की आज़ादी में भी उल्लेखनीय रही है. और आज भी इस स्कूल के छात्रों की संख्या हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और कुछ हद तक अफ़्गानिस्तान तक फैली हुई है. इसलिए इस फ़तवे का महत्व दूरगामी और ऐतिहासिक है. अफ़सोस कि देश के हिन्दी और अंग्रेज़ी मीडिया ने इस ज़िक्र के लायक नहीं समझा.
शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007
मुझे दंगाईयों से परेशानी है
शाम को मैं और प्रमोद भाई यूँ ही टहलते हुए आरे में छोटा कश्मीर नामक एक पिकनिक स्थल पर निकल गए तो वहाँ भी हम ने कई परिवारों को छुट्टी मनाते पाया. उनमें से कुछ ने सफ़ेद परिधान धारण किए थे. देश के एक बहुसंख्यक समुदाय के लिए छै दिसम्बर के जो मायने हैं हम (सवर्ण जन) उस से अपरिचित हैं. दिलीप मण्डल आज कल इन्ही मुद्दो पर एक ज़बरदस्त बहस छेड़े हुए हैं.
ये आज की स्थिति है.. मुझे याद है १९९२ के साल के उन अन्तिम दिनों में मैं दिल्ली में था. पूरा देश अडवाणी जी की रथयात्रा के चलते एक अनोखे बुखार में तप रहा था. इस बुखार में लोग अपने आम व्यवहार को भूल कर कुछ का कुछ हो जा रहे थे. हमारी मित्र मण्डली में हिन्दू-मुस्लिम सभी तरह के लड़के-लड़कियाँ थे. और हमें इस बात का एहसास भी न था कि कौन हिन्दू और कौन मुस्लिम है. मगर अन्दर-अन्दर भावनाएं और विचार एक भयावह शकल में गड्ड-मड्ड हो चुके थे. एक मौका ऐसा भी आया कि एक सामान्य बातचीत एक ऐसी गन्दी बहस में तब्दील हो गई जिसके अन्त में मेरी एक मुस्लिम सहेली आहत हो कर रोते हुए वहाँ से चली गई. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.
कुछ रोज़ बाद बाबरी मस्जिद गिर गई. दोस्तों से साथ धीरे-धीरे छूट गया. मैं काम की तलाश में मुम्बई आ गया. जब मैं आया तो मुम्बई में पहले दौर के दंगे हो चुके थे और दूसरे दौर के दंगे मेरे आने के बाद हुए. शहर में ज़बरदस्त तनाव रहता. दिन में ये तनाव दोपहर की नमाज़ के वक़्त अपने चरम पर पहुँचता. जब बड़ी संख्या में नमाज़ियों के मस्जिद के आगे जुट जाने से रास्ता जाम हो जाता. शिवसेना ने इसके जवाब में महाआरती का अभियान चलाया हुआ था. दिन का ये तनाव कम होता भी न था कि शाम ढलते ही लोग घर लौटने के लिए हड़बड़ाने लगते. सब तरफ़ शिवसेना के लोग गश्त लगाते रहते.
हम मुम्बई में नए-नए आए थे.. सुनते थे कि मुम्बई में नाइटलाइफ़ होती है. हमारा वह डॉक्टर दोस्त भी उन दिनों मुम्बई में मौजूद था. एक दिन ऐसे ही किसी दोस्ताना जश्न का हिस्सा होने के बाद लौटते हुए हमें शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने रोक लिया. डॉक्टर साब ने थोड़ी पी रखी थी और हिन्दू होने के नाते वे शिवसेना के समर्थक भी थे इसलिए निर्भीकता से रिक्शे से उतरे मगर शिवसेना वाले मेरे मित्र के समर्थक नहीं निकले.
ये समझते ही कि डॉक्टर साब उत्तर भारतीय हैं उनके गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया गया. एक ही झटके में हम सब का नशा हिरन हो गया. हमें छोड़ तो दिया गया मगर उस रोज़ के बाद से मेरे अन्दर हमेशा एक डर सा बना रहता.. अपनी दाढ़ी के चलते मुसलमान समझ लिए जाने का डर. वो दाढ़ी मैंने सिर्फ़ इसी डर के चलते निकाल दी. लेकिन वह डर मुझे हमेशा याद दिलाता रहा कि उन दिनों मुम्बई में सचमुच एक मुसलमान होने का मतलब मन में कैसा भाव पैदा करता होगा..
वैसे तो मुस्लिम समुदाय नरसिंहराव को अपना बड़ा दुश्मन मानते हैं मगर मुझे कभी-कभी लगने लगता है कि वह आदमी मुस्लिम समुदाय और इस देश का हितचिंतक था. क्योंकि अगर वह बाबरी मस्जिद को बचा लेता.. तो आज भी देश को बार-बार उसी मस्जिद का वास्ता देकर भावनाओं के ज्वार में झोंका जाता और जिस मरगिल्ली हालत में आज भाजपा पहुँच रही है वह नहीं होने पाता. सच तो ये है नरसिंहराव ने भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता गिरवा लिया. जिसकी वजह से आज उनकी हालत ये है कि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है.
कुछ लोग मानते हैं कि मस्जिद गिर जाने से पुरातत्व और विज्ञान के बड़ी हानि हुई. मैं ऐसा नहीं सोचता. मैं भाजपा का विरोधी हूँ इसलिए नहीं कि उन्होने बाबरी मस्जिद गिराई. मस्जिद गिरे और मन्दिर बने, मन्दिर गिरे और मस्जिद बने.. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरी आस्था पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरे भगवान पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. ईंट-पत्थर गारा है.. और क्या है.
पर भाजपा ने अडवाणी के नेतृत्व में इस देश में जो हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ़ खड़ा किया मुझे उस से परेशानी है. जिस नफ़रत, गुस्से और डर का संचार किया गया मुझे उस से तक़्लीफ़ है. इस बेबात के मुद्दे को लेकर आपसी हिंसा में जो सैकड़ो निर्दोष लोगों का खून बहाया गया मुझे उस से दर्द होता है.
और दर्द इस बात से होता है कि बहुत सारे मित्र धोखे में हैं कि ये मामला राम मन्दिर बनाने का है.. अगर उन्हे मन्दिर बनाना होता तो वो बातचीत के रास्ते से कब का बन गया होता.. पर वे मन्दिर नहीं चाहते, धर्म नहीं चाहते, शांति नहीं चाहते.. वे बातचीत नहीं चाहते.. वे लड़ाई चाहते हैं.. दंगा चाहते हैं.. और मुझे दंगाईयों से परेशानी है..
गुरुवार, 6 दिसंबर 2007
सैन्ड्रा फ़्राम बैन्ड्रा
पुराने सामंती मूल्यों पर आधारित हमारे ग्राम्य समाज का ढाँचा चरमरा कर टूट रहा था पर धराशायी हुआ नहीं था। और अंग्रेज़ो द्वारा लादी गई पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अभी आधी-अधूरी अवस्था में थी और कोई शक्ल अख्तियार नहीं कर सकी थी। ऐसे में गाँधी जी जैसे विचारकों का मत था कि हम अंग्रेज़ी मूल्यों को पूरी तरह नकार कर अपने पुराने ढाँचे को पुनः खड़ा करें। पर सत्ता पर का़बिज़ नेहरू को पुराने समय में लौटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.. उनका विचार था कि नया हिन्दुस्तान नए मूल्यों पर ही आधारित होगा। ये नए मूल्य क्या थे और कहाँ से आने वाले थे? आज़ादी के साठ साल बाद हम कितना पुराने मूल्यों से दूर आए हैं और कितना उन नए मूल्यों का विकास कर सके हैं जिनकी चिंता एक समय पर नेहरू और उनके समकालीनों को रही होगी, यह एक अलग चिंता का विषय है।
व्यक्तिगत स्तर पर, निजी स्तर पर पुराने मूल्यों के बरक्स नए मूल्यों का मॉडल कहीं-कहीं भारत के ईसाई समुदाय को भी अनजाने में माना गया। एक स्तर पर तो उन्हे पतित और दुष्चरित्र समझा गया तथा दूसरे स्तर पर उन्हे, अपने घुटन पैदा करने वाले सामाजिक मूल्यों से आज़ादी का पर्याय भी समझा गया। मुम्बई की हिन्दी फ़िल्मों में यह भूमिका क्रिश्चियन सेक्रेटरी के रूप में प्रतिबिम्बित होती है, जो मर्दों की दुनिया में अकेली लड़कियों के बतौर प्रवेश करने का साहस रखती है, स्कर्ट पहनती है, गिटपिट इंगलिश बोलती है, गिटार पर गाने गाती है, डान्स करती है और प्रेम सम्बन्धों में ‘उदार’ रवैया रखती है। उसका नाम होता है बॉबी जूली रोज़ी या मेरी.. एंड शी इज़ अ गुडटाइम गर्ल.. या चालू भाषा में चालू गर्ल। तब के बॉम्बे में इसी लड़की को लोकप्रिय रूप से ‘सैन्ड्रा फ़्रॉम बैन्ड्रा’ का नाम और पहचान दी गई।फ़िल्ममेकर पारोमिता वोहरा की नई डॉक्यूमेन्टरी ‘व्हेयर इज़ सैन्ड्रा’ पड़ताल करती है इसी मिथक का.. आखिर कौन है यह सैन्ड्रा और क्या है उसकी असलियत। पारो का अपनी इस फ़िल्म के बारे में बयान है..
I searched for a way to explore the stereotype of Christians more gently - through the aspects of fantasy that exist in the idea of the sexy, supposedly available but actually unattainable Christian woman. I've tried to stay away from dismantling stereotypes in the film, tending instead to create my own notion of this figure by taking my own and others' ideas of Sandra, and weaving in Bollywood imagery and interviews with women actually named Sandra living in Bandra.पारो इस पूरे बदलाव की ऐतिहासिकता में नहीं घुसती, वे अपने आप को सिर्फ़ इस मिथक की परख तक ही सीमित रखती हैं, जिसके बहाने हम बैन्ड्रा के क्रिश्चियन समुदाय के रहन-सहन की एक रूपरेखा देख पाते हैं। ये सीमाएं शायद उनकी फ़ंडिंग एजेन्सीज़ के चरित्र और फ़िल्म की छोटी अवधि के कारण उत्पन्न हुईं होंगी। पर वे ये भी कहती हैं कि.. In a time of so many stereotypes about feminism, more mischievous stories are needed and are being told with greater ease. And the way in which this story is told is an exercise of that sort.
मेरा अपना मानना है कि भले ही पारो को ये मायावी सैन्ड्रा भले ही बैन्ड्रा में कहीं न मिली हो पर आज बदलते हुए हिन्दुस्तान की हर शहरी लड़की के भीतर (मौजूद दूसरे प्रतिमानों के साथ-साथ) एक सैन्ड्रा भी मौजूद है.. अ गर्ल हू जस्ट वान्ट्स टु हैव फ़न!
पारो मेरी पुरानी मित्र हैं और उनकी मेधा से मैं हमेशा प्रभावित रहा हूँ.. यह फ़िल्म अच्छी है पर मेरा मानना है कि पारो इस से कहीं बेहतर करने की सामर्थ्य रखती हैं।
इस फ़िल्म को ऑनलाइन देखने के लिए बाएँ दिख रहे फ़िल्म के पोस्टर पर क्लिक करें.. फ़िल्म की अवधि है अठारह मिनट।