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शनिवार, 18 जून 2011

जंगले के पार

ये खिड़की जिस दिशा में खुलती है, उसी दिशा में आगे कहीं समुद्र उफनता है। उसकी कूदती-फांदती लहरों के पहले एक रेत का मैदान है। रेत पर बनाए बिलों से केकड़े बाहर आते हैं और अपनी भुजाओ को चमकाते टेढ़े-टेढ़े भागे जाते हैं। एक आदमी की आँख में दृश्य का जितना आयतन समा सकता है उतने भर में हज़ारों केकड़े या फिर लाखों । 

मैदान से पहले एक दलदल के खारे पानी में अपनी जड़ों को डुबाए पेड़ों का एक गरान है। उन पेड़ों की शाखाओं में घोसला बनाने पक्षी हज़ारों मील दूर से आते हैं।  गरान से पहले एक बस्ती है। बस्ती में सड़के हैं। मुख्य सड़क पर शोर और धुएं की एक नदी है। अधिकत लोग उससे नफ़रत करते थे पर कुछ मनचले प्यार। 

मुख्य सड़क और इस खिड़की के बीच तीन पेड़ एक कतार से लगे हैं। नागचम्पा, आम और पकुरिया। नागचम्पा की फुनगी पर हर चिड़िया हर रोज़ कुछ पल सुस्ताती है। पकुरिया के आगे नगरपालिका का लैम्पपोस्ट है। उसका बल्ब बहुत पहले फूट चुका है। 

लैम्प के अन्दर मैना ने अण्डे दिये थे। अण्डों से निकली मैना भी वहीं अण्डे देती है और तार पर बैठकर बार-बार ऊँचे शब्द से लैम्प पर अपने अधिकार की घोषणा करती है। 

मैं अक्सर सुनता हूँ, पर उसके और मेरे बीच एक जंगला है। जंगले के पार संसार, जंगले में क़ैद है। 


सोमवार, 30 जून 2008

अगली बार कहीं और मिला जाय!

आजकल के शहरी बच्चे मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर के प्रति इस तरह समर्पित होते हैं जैसे हमारे समय के बच्चे कैथे और चूरन के प्रति लालायित रहते थे। निश्चित ही चूरन और कैथा उन बच्चो के लिए कोई बाल जीवन घुट्टी नहीं था और मैक्डोनाल्ड्स के बर्गर्स और फ़्रेन्च फ़्राईस भी आज के बच्चे के लिए वाईटेमिन्स की गोलियाँ नहीं हैं। फ़्री मार्केट की पक्षधर हमारी सरकार इस ‘स्वादिष्ट’ सत्य के प्रति आँख मूँदे पड़ी है जो हमारे लोगों के स्वास्थ्य में लगातार सेंध लगा रहा है।

इसी मसले पर एक अमरीकी नागरिक ने एक फ़िल्म का निर्माण किया- सुपरसाइज़ मी! यह नाम मैक्डोनाल्ड्स के सुपरसाइज़ बरगर्स से प्रेरित है जिसे पहली बार खाकर फ़िल्म के नायक और निर्माता-निर्देशक मॉर्गन स्परलॉक उलटी कर देते हैं। वो बात अलग है कि शीघ्र ही उनका शरीर इस मात्रा के लिए लचीला रुख अख्तियार कर लेता है। और फिर उन तीस दिनों में उनके शरीर की क्या दुर्दशा होती है जिस दौरान वे सिर्फ़ और सिर्फ़ मैक्डोनाल्ड्स के आउटलेट्स से मिलने वाली सामग्री से ही अपनी शरीर की खाद्य आपूर्ति कर रहे थे इसे आप फ़िल्म देखकर यहाँ से जानिये। यहाँ पर आप कई दूसरी डॉक्यूमेन्टरीज़ भी देख सकते हैं।

इस फ़िल्म की खबर मुझे भाई अफ़लातून से हुई जब वे अपनी पत्नी स्वाति जी समेत मुम्बई पधारे। वे दोनों गुजरात के एक प्राकृतिक स्पा से स्वास्थ्यलाभ कर के लौट रहे थे। आठ दिन की उस अवधि में उन दोनों का वजन साढ़े पाँच किलो कम हो गया। इसी सन्दर्भ में इस फ़िल्म का भी ज़िक्र आया। मित्रों को याद होगा कि पिछले दिनों अफ़लातून भाई की तबियत कुछ नासाज़ थी।

अफ़लातून जी के साक्षात दर्शन हम सब ने पहले दफ़े गोरेगाँव पूर्व के जावा ग्राइण्ड कैफ़े में तारीख २२ जून को किये। इस अवसर पर अनिल रघुराज, प्रमोद सिंह, विमल वर्मा, बोधिसत्व, शशि सिंह, हर्षवर्धन, और विकास मौजूद थे। और मैं तो था ही। लगभग चार घण्टे तक चली इस मुलाक़ात में तमाम आर्थिक, राजनैतिक और ब्लॉगिक मुद्दो पर खूब विचार-विमर्श हुआ। अफ़लातून भाई तो अपने फ़ितरत के अनुसार मजमा लगाने लग पड़े ही थे मगर स्वाति जी उन्हे खींच के ले गईं।

स्वाति जी जिन से हमारा अन्तजालीय परिचय भी नहीं था.. उनसे मिलना भी हमारे लिए एक ‘स्टिमुलेटिंग एक्सपीरिंयस’ रहा और वे भी हमसे मिलकर ‘बोर’ नहीं हुई जैसा कि उन्हे अन्देशा था। तस्वीरें शशि सिंह ने खींची और पी गई कॉफ़ियों का आधा बिल विकास ने भरा जिनकी जेब नई नौकरी की पगार से गर्म थी।




अफ़लातून भाई के सम्मान में हम इकट्ठा हुए और इसी बहाने हम सब की बड़े दिनों बाद एक दूसरे से भी मुलाक़ात हुई, वरना कहाँ मिलना हो पाता है। इस मुलाक़ात का ढीला पहलू सिर्फ़ मिलन-स्थल जावा ग्राइण्ड ही रहा जो अपने संगीत से हमें थकाता रहा और उसी माहौल से हमें दबाता रहा जिसकी चर्चा हम सारे समय करते रहे! तय हुआ कि अगली दफ़े कहीं और मिला जाय।

परेशानी की बात यही है कि बाज़ार ने सारी सार्वजनिक जगहों पर क़ब्ज़ा कर लिया है (यहाँ तक कि बचे-खुचे सार्वजनिक पार्कों को भी निजी हाथों में धकेला जा रहा है) और उन्हे ऐसी जगहों मे तब्दील कर दिया है जो आप के मन-मानस को सिर्फ़ एक उपभोक्ता के बौने स्वरूप में सीमित कर देते हैं।

मैक्डोनाल्ड्स की बड़ी सफ़लता के पीछे एक राज़ यह भी है बच्चों के खेलने के मैदान शहरों में से बिला गए हैं और मैक्डोनाल्ड्स के प्रांगण में फ़्री प्ले-स्टेशन्स उग आए हैं। ये हाल अमरीका का है जहाँ की आधी से ज़्यादा आबादी इन्ही प्लेस्टेशन्स की छाया में ओवरवेट या ओबीस हो चुकी है और हमारे दलाल नेता और मक्कार अफ़रशाहों की बेईमानी के चलते यही हाल हिन्दुस्तान का भी होने जा रहा है।

अच्छा नज़ारा होगा.. एक तरफ़ गाँवों में किसान अपने गले में रस्सी कस रहा होगा और शहरों का मध्यवर्ग कमर की पेटी ढीली पर ढीली कर रहा होगा!

मंगलवार, 22 अप्रैल 2008

बेईमान रिक्षेवाले

आज से मुम्बई में तीन दिन की ऑटो-रिक्षावालों की हड़ताल चालू हो गई है। आम लोगों को इस हड़ताल से काफ़ी तक्लीफ़ है.. हर हड़ताल में होती ही है। मामला नए इलेक्ट्रानिक मीटर लगाने का है.. सरकार उन्हे ठेल रही है पर रिक्षेवाले तैयार नहीं हैं। सीधे-सीधे कुछ हज़ार का ज़बरदस्ती का खरचा है- कोई क्यों उठाना चाहेगा- बात समझ में आती है। आप ही को अगर सरकार बोले कि सब लोग अपनी कार-मोबाइक के अच्छे-खासे टायर बदलो तो आप भी शायद हड़ताल कर बैठें।

मगर यहाँ एक दूसरी दलील भी प्रच्छन्न है- वो ये कि मेकेनिकल मीटर के साथ खेल किया जा सकता है पर इलेक्ट्रानिक मीटर के साथ नहीं। ह्म्म.. जनता इस तर्क को निगलने को तैयार है क्योंकि सब लोग जानते हैं कि ये रिक्षेवाले साले बड़े लूटते हैं।

इसमें दो बाते हैं। एक तो यह कि ये सोच लेना कि इलेक्ट्रानिक मीटर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकेगी थोड़ा बचकाना है और दूसरी यह कि इसमें सारे रिक्षेवालों को बेईमान और चोर कहा जा रहा है। आप कहेंगे कि वो तो साले हैं ही। चलिए मान लिया कि सब रिक्षे वाले बेईमान हैं। देश के बहुत सारे निम्न-मध्यम-वर्गीय लोगों की तरह उनकी भी आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया है। और आमदनी क्या.. महीने कुल मिलाकर छै-सात हजार रुपैया.. चोरी-बेईमानी करके आम आदमी को लूटने के बाद?

क्या कहना! अब इस तस्वीर के एक और पहलू पर भी विचार तो कीजिए। आप को क्या लगता है कि सरकार आम आदमी की इस रोज़-रोज़ की लूट को रोकने के लिए ये प्रगतिशील क़दम उठा रही है। क्या आप के देश की सत्ता पर आसीन लोग क्या सचमुच ऐसे नेक मक़सदों से प्रेरित होते हैं? वो किस तरह से काम करते हैं क्या आप नहीं जानते?

अच्छा आप बताइये कि ये जो इलेक्ट्रानिक मीटर लगाए जा रहे हैं वो बाज़ार में कहीं से भी तमाम मॉडलों में से चुनकर कोई भी के लगाया जा सकेगा? या कोई एक खास कम्पनी का खास मॉडल ही इस सम्मान का अधिकारी होगा? आप जानते हैं ऐसे में एक खास स्टैन्डर्ड मॉडल ही होता है। और अगर ये नया मीटर लागू हो गया तो इस खास कम्पनी की तो लॉटरी निकल आएगी.. नहीं?

और इसमें कम्पनी के मालिकों, ट्रान्सपोर्ट मंत्री, आर.टी.ओ. के अधिकारियों के बीच किसी साँठ-गाँठ होने की या कम्पनी का फ़ायदा कराने के लिए इस नीति को लागू करने के किसी षड्यंत्र होने का तो दूर-दूर तक कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि चोर और बेईमान तो सिर्फ़ रिक्षेवाले, रेलवे टी.टी. और ट्रैफ़िक हवलदार होते हैं। इसलिए इसमें फ़ायदा अगर किसी का है तो सिर्फ़ आम जनता का.. !!??

.. मैं सोचने लगता हूँ कि दिल्ली में भी तो इलेक्ट्रानिक मीटर लगाया गया पर सुनते हैं वहाँ अब रिक्षेवालों ने मीटर से जाना ही बंद कर दिया। और अगर मान लीजिये कि नए मीटर लागू हो गए और उस से रिक्षेवालों की बेईमानी के चलते तीस-चालीस प्रतिशत किराए सीधे कम हो गए.. तो क्या उसके बाद रिक्षेवाले किराए में वृद्धि के लिए हड़ताल नहीं करेंगे? या आप ये सोचते हैं कि बैठते हैं तो बैठें.. पर उनकी सुनी नहीं जानी चाहिये क्योंकि उन्होने बेईमानी की और उन्हे अपने इस पाप का फल ऐसे ही मिलना चाहिए?

क्या हमें ऐसा सोचने का हक़ है? खास तौर पर उस देश में जहाँ लोग बैठे-बैठे चार-पाँच सौ करोड़ निगल जाते हैं और न डकार लेते हैं न पादते हैं। उसी देश में जहाँ किसान दस-बीस हज़ार के कर्ज़ का बोझ सहन नहीं कर पाते और पेड़ से लटक जाते हैं।

सोमवार, 21 अप्रैल 2008

पुणे में परदा!

पुणे में लड़कियों का मैंने एक खास रवैया देखा है। वे अपने दुपट्टे को अपने सीने पर ओढ़ने के बजाय अपने चेहरे पर कुछ इस तरह से बाँध लेती हैं कि सिर्फ़ आँख ही नज़र आती है.. यानी दुनिया को देखने के लिए आँखे खुली छोड़कर सब कुछ ढक लेती हैं। अकसर ऐसा स्कूटर की सवारी करने वाली लड़कियों ऐसा करती हैं.. पर पैदल जाने वाली महिलाओं को भी मैंने इस स्वरूप में देखा है। इतना ही नहीं कुछ को तो मैंने एक कपड़े की जैकेट और दस्ताने पहने भी पाया.. भरी गर्मी में।

मुझे बताया गया कि ये लड़कियों मुस्लिम हों ऐसा नहीं है.. वे किसी भी धार्मिक आग्रह के चलते ऐसा नहीं करतीं। बस अपने चेहरे को गर्मी, धूल-धक्कड़ और प्रदूषण से बचाने के लिए ऐसा करती हैं। बात समझ आती है.. स्त्रियाँ स्वभावतः इन विषयों और अपने रूप को लेकर अधिक सचेत होती हैं.. वैसे कुछ पुरुष भी होते हैं।

अनोखी परिपाटी चल निकली है पुणे शहर में.. सोचता हूँ शायद अरब और उत्तरी अफ़्रीका के तमाम उन देशों में जहाँ हिजाब का चलन है, ऐसे ही कुछ प्राकृतिक कारण रहें होंगे जो स्त्रियों में और पुरुषों में भी परदे की परम्परा चल निकली और बाद में सामाजिक तौर पर ऐसी रूढ़ हो गई कि मर्द तो अपनी मर्जी का मालिक रहा मगर औरत की आज़ादी में बन्धन और बेड़ी हो गई।

कैसे—कैसे बदल जाती हैं चीज़ें- अच्छी बातें बुरी बातों में पतित हो जाती हैं। कुछ भी तो एक जैसा नहीं रहता कभी.. हमेशा रूप बदलता रहता है। पतंजलि के योगसूत्र में भी यही बात पढ़ी थी कभी।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

पश्चिम से उगता सूरज



मैं आज कल एक स्क्रिप्ट पर काम कर रहा हूँ उस में एक संवाद कुछ ऐसा है.. "मैं जब यहाँ आया तो सूरज उसी जगह से निकल रहा था जहाँ अभी डूब रहा है.. मैं कुछ अजीब जगह में फँस गया था…"

और अजब संयोग देखिये मेरे घर की हालत भी आजकल कुछ ऐसी ही हो गई है.. शाम को सूरज को जिस दिशा में डूबते हुए देख कर विदा किया था .. सुबह उसी दिशा से वो उगता चला आता है..

पहले ऐसा नहीं होता था.. जब से मेरे खिड़कियाँ के सामने वाली दिशा यानी पश्चिम में तीन-तीन तीस-मंज़िली ओबेरॉय टॉवर्स की तामीर अपने अंजाम तक आ पहुँची है, तभी से उनकी खिड़कियों में जड़े शीशों में उगते हुए सूरज का अक्स पलट कर मेरे कमरों को चमका जाता है..

पहले मैं इन टॉवर्स पर बड़ा तमका रहता था कि इसने मेरे हिस्से के आसमान को ढाँप लिया.. पर अब समझ नहीं आता कि इस नई परिघटना पर बिहँसू कि इसके चलते मेरा घर सुबह की रौशनी में भी जगमगाने लगा है या बौखलाऊँ कि सूरज पश्चिम से उगता नज़र आने लगा है..

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

जामा मस्जिद वहाँ क्यों है?

आप ने कभी सोचा कि जामा मस्जिद वहाँ क्यों है जहाँ कि है? वो कहीं भी हो सकती थी; जहाँ लाल क़िला है वहाँ; चाँदनी चौक के अंत में जहाँ फ़तेहपुरी मस्जिद है वहाँ; या लाल क़िले के दरयागंज की तरफ़ वाले दूसरे दरवाज़े की सीध में दिल्ली गेट की जगह पर? या लाल क़िले की ठीक सामने चाँदनी चौक के मुहाने पर? या ठीक दूसरी तरफ़ लाल क़िले और जमना के बीच? लाल क़िले के ठीक दाँये? ठीक बाँये?


मगर नहीं.. जामा मस्जिद यहाँ कहीं नहीं है। जामा मस्जिद लाल क़िले और चाँदनी चौक के बीच की सड़क से थोड़ा नीचे चलकर, थोड़ा बायीं तरफ़ स्थित है? कुछ अजीब सी जगह नहीं चुनी गई है जामा मस्जिद के लिए.. एक ऐसे शहर की योजना में जिस में सब कुछ नाप तौल कर समकोणों पर बना हो?

या कुछ भी अजीब नहीं बिलकुल सही जगह चुनी गई है जामा मस्जिद के लिए। जामा मस्जिद ठीक वहाँ स्थित है जहाँ शाहजहाँबाद नामक इस शहर का दिल होता है। और लाल क़िला वहाँ है जहाँ इस शहर का दिमाग़। चाँदनी चौक का बाज़ार इस शहर की रीढ़ और उसकी गलियाँ(जो थी और हैं) पसलियाँ हैं। और ऐसा इसलिए है कि शाहजहाँ द्वारा बनाए और बसाए इस शहर की तामीर एक मानव शरीर की तरह भी की गई है।

इस कल्पना का आधार इख्वान अल सफ़ा के रसाइल से उपज रहा है। तमाम दूसरे विषयों के अलावा ये रसाइल व्यष्टि और समष्टि, मनुष्य और ब्रह्माण्ड का तुलनात्मक अध्ययन भी हैं। मनुष्य और ब्रह्माण्ड का सम्बन्ध ही सभी परम्परागत इस्लामिक स्थापत्य का आधार है। व्यष्टि के रूप में मनुष्य समष्टि का दर्पण है (हिन्दू दर्शन में काल पुरुष भी ऐसी ही अवधारणा है)। मनुष्य ब्रह्माण्ड की सभी सम्भावनाओं को अपने भीतर समेटे है और जगत-रचना की अंतिम अवस्था होते हुए, लौकिक और अलौकिक की संधि पर वह इस जगत के केंद में है।

जब हिन्दू दर्शन की ही तरह (दस द्वारों की नगरी) इन रसाइल का मानना है कि मानव शरीर एक शहर की भाँति बनाया गया है तो शहर को बनाने में मानव शरीर की बनावट से थोड़ी मदद ले लेना, नक़ल तो नहीं कहा जा सकता? तो बादशाह का क़िला, दिमाग़ की जगह- जहाँ से वह पूरे शरीर को नियंत्रित रख सके और धर्म रूपी जामा मस्जिद दिल की जगह - जहाँ से वह आस्था और आत्म बल का स्रोत बन सके।

शायद ऐसे ही प्रभाव रहे होंगे जिनके चलते दारा शिकोह ने मज्म अल बहरैन - समुद्र संगम जैसे ग्रंथ की रचना की जिसमें इस्लामिक दर्शन और वैदिक दर्शन की समानताओं को निरूपित किया गया है। इस ग्रंथ को दारा ने फ़ारसी और संस्कृत दोनों में साथ-साथ लिखा था।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2008

मुंबई के झगड़े के पीछे क्या है?

आज के नवभारत टाइम्स में इतिहासकार अमरेश मिश्र का एक लेख आया है जिसमें मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ़ जो माहौल बनाया जा रहा है उसके पीछे की एक लम्बी राजनीति पर से पर्दा उठाया गया है.. उनकी सहमति से यह लेख यहाँ छाप रहा हूँ..

मुंबई के झगड़े के पीछे क्या है?

अमरेश मिश्र

हाल के दिनों में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने मुंबई में बसे उत्तर भारतीयों को लेकर नाराजगी दिखानी शुरू कर दी है। इस मुद्दे पर छिटपुट हमले हुए हैं और फिलहाल सियासत गर्म है। मुंबई की दो करोड़ आबादी में करीब साठ-सत्तर लाख उत्तर भारतीय हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर को अब भी अहसास नहीं कि मामला क्या है। इन घटनाओं का एक छुपा पहलू यह है कि मराठीवादी सियासत के नाम पर सवर्ण और अवर्ण यानी अगड़े और पिछड़े की राजनीति चल रही है।

शिव सेना की मराठीवादी राजनीति एक खास सवर्ण वर्ग के पूर्वाग्रहों से संचालित रही है। पिछले कुछ अरसे में मराठियों के भीतर अगड़े और पिछड़े का संघर्ष तेज हुआ है। मराठी ओबीसी सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांग रहे हैं। इसी के जवाब में, यानी पिछड़ों की दावेदारी को ध्वस्त करने के लिए इस वक्त मराठी माणूस की एकता का यह नारा लगाया गया है। उत्तर भारतीय तो इस सियासी खेल में सिर्फ एक मोहरा हैं।

लेकिन सवर्ण और अवर्ण के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तों का इतिहास आज का नहीं है। इसे देश और मुंबई के इतिहास के संदर्भ में देखना होगा, जहां समाज, सियासत और पैसे का भी रोल है। इसी में उत्तर भारतीयों और मराठियों के आपसी रिश्ते की कहानी भी मौजूद है।

इतिहास में मुंबई कोई खालिस सवर्ण शहर नहीं रहा है। मुंबई पहले बंबई था और इसे अंग्रेजों ने बनाया था, यानी इतिहास में इसकी दखल बाद में शुरू हुई। शिवाजी महाराज के जिस आंदोलन से मराठियों को पहचान और सम्मान मिले थे, उसका केन्द्र रायगढ़ था। पेशवाओं की राजधानी पुणे थी। बंबई महज कुछ टापुओं के रूप में मौजूद थी। पहले इन टापुओं पर पुर्तगालियों का कब्जा था। सत्रहवीं सदी में ये अंग्रेजों के हाथ आए। यहां जो कोली समाज बसता था, वह अवर्ण था। उसे न तब और न अब सत्ता का सुख हासिल हुआ।

औरंगजेब के समय पुर्तगालियों को बंबई से खदेड़ने की कोशिश हुई। मराठों से भी पुर्तगालियों और अंग्रेजों की जंग हुई। लेकिन पश्चिम भारत में सक्रिय भारतीय ताकतों ने बंबई को कभी अपना सियासी या व्यापारिक केन्द्र नहीं बनाया। मुगल और मराठा काल में भी गुजरात के सूरत जैसे शहरों को यह दर्जा हासिल रहा। बंबई एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र बन कर उभरा उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में। अंग्रेजों को एक नए पूंजीवादी सेंटर की तलाश थी, जिसे उन्होंने बंबई में आकार दिया। अंग्रेज उस समय भारत के उद्योगों का नाश कर रहे थे। उनकी मुख्य गतिविधि थी भारत से कच्चा माल एक्सपोर्ट करना और इंग्लैंड से तैयार माल इम्पोर्ट करना। गुजरात के पोर्ट अपनी मराठा-मुगल संस्कृति के चलते इस मकसद में पूरी तरह सहायक नहीं हो सकते थे।

मुंबई का इस्तेमाल उस अफीम व्यापार के लिए भी हो रहा था, जिसके तहत चीनियों से माल लेकर उन्हें अफीम दी जाती थी। इस व्यापार में अंग्रेजों के मददगार थे मुंबई के पारसी और दूसरे धनी लोग। मुगलकाल में पारसी पूंजीपतियों का नाम कम सुनाई पड़ता था। उस वक्त गुजराती पूंजीपति ही हावी थे। लेकिन अफीम व्यापार में पारसियों के रोल ने 1857 के आसपास उन्हें बंबई में सबसे ताकतवर बना दिया। जगन्नाथ शंकरसेठ को छोड़ कर कोई भी मराठी इन पारसियों की बराबरी नहीं कर सकता था। पारसियों के बाद गुजरातियों के पास ही दौलत थी।

मुंबई में उत्तर भारतीयों का आना 1857 के आसपास ही शुरू हुआ। सन सत्तावन की क्रांति के दौरान जहां शंकर सेठ जैसे लोगों को गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं, वहीं पारसियों को वफादारी का इनाम मिला। पूरे महाराष्ट्र में सत्तावन की जंग जोरदार तरीके से चली, लेकिन इसमें ज्यादातर हिस्सेदारी ओबीसी कोली, महार और भील समुदायों ने ही की। कुछ जगह चितपावन ब्राह्माण भी लड़े, लेकिन बाल ठाकरे जिस जाति से आते हैं, वह इस जंग से अलग ही रही। कुल मिलाकर पिछड़ी जातियों ने ही अंग्रेजों से लोहा लिया। यह बात बाबासाहेब आंबेडकर ने 21 अक्टूबर 1951 को लुधियाना में दिए गए अपने भाषण में मानी थी।

सन सत्तावन की क्रांति में बंगाल आर्मी की रीढ़ थे उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदू और मुस्लिम पूरबिए। वही कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और मणिपुर से महाराष्ट्र तक राष्ट्रीयता की भावना से लड़े। पूरे महाराष्ट्र में पिछड़ी जातियों ने उत्तर भारतीयों के साथ मिलकर मोर्चा खोला था।

जब 1857 के बाद बंबई में औद्योगीकरण की शुरुआत हुई, तो उत्तर भारतीय कामगार उसकी वर्क फोर्स का हिस्सा बन गए। लेकिन बहुमत अवर्ण मराठियों का ही रहा। इनमें से ज्यादातर मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र से आए थे। बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में जब आजादी का आंदोलन नया मोड़ ले रहा था, उसी समय से ओबीसी मराठी और उत्तर भारतीय कामगार एक साझा ताकत बनकर उभरने लगे थे। बालगंगाधर तिलक की गिरफ्तारी के बाद जब बंबई में हड़ताल हुई, तो एक नई ताकत का जन्म हुआ। इस ताकत ने आजादी की लड़ाई में कांग्रेस और कम्युनिस्टों का साथ दिया। आजादी के बाद यह कम्युनिस्टों की रीढ़ बनी रही। यही अवर्ण समुदाय था, जिसने बंबई को मुंबई बनाया। इससे भी पहले गिरगांव जैसे इलाकों में एक साझा मराठी-उत्तर भारतीय संस्कृति परवान चढ़ी।

1960 में कांग्रेस की मदद से शिवसेना का उभार होने लगा। उस वक्त कांग्रेस सवर्ण मराठी लीडरशिप के हाथों में थी। अवर्ण मराठियों को कम्युनिस्टों से अलग करने के लिए शिवसेना को आगे बढ़ाया गया। दत्ता सामंत की हड़ताल शायद अवर्ण मराठियों के लिए सबसे गौरवशाली दौर था। लेकिन इसी हड़ताल के दौरान पारसी पूंजीपतियों और सवर्ण मराठियों के बीच वह गठजोड़ उभरा, जिसने बंबई का चरित्र बदल कर रख दिया। बंबई मैन्युफैक्चरिंग के सेंटर से बदलकर फाइनैंस और जायदाद के कारोबार का सेंटर बन गई। सवर्ण मराठी सामंतशाही ने धीरे-धीरे सवर्ण मध्यवर्ग को भी खुद से अलग कर दिया।

मराठीवाद का नारा देने वाले लोग इसी सामंतशाही का हिस्सा हैं। बंबई के मुंबई बनने के बाद नब्बे के दशक में उसके चरित्र में और भी बड़े बदलाव आने लगे। अवर्ण मराठियों की ताकत टूट चुकी थी। उसी वक्त नए पेशों में (जिसे सर्विस सेक्टर कहा जा सकता है) उत्तर भारतीयों का दबदबा बढ़ने लगा। इसमें उत्तर भारत की कमजोर इकॉनमी का रोल उतना बड़ा नहीं था, जितना कि मुंबई में पैदा हो रही नई डिमांड का। सर्विस सेक्टर को ऐसे लोग चाहिए थे, जो महज कामगार न हों, थोड़ा पढ़े-लिखे भी हों।

पारसी पूंजीपतियों से मिलकर सवर्ण मराठियों ने पहले अवर्ण मराठियों की ताकत तोड़ी, फिर जब उत्तर भारतीय खुद को साबित करने लगे, तो यह नया मराठीवाद खड़ा कर दिया गया। आज के दौर में यह पिछड़ा सोच है। इस झगड़े से बहुसंख्य पिछड़े मराठियों को कोई लेना-देना भी नहीं है। इसलिए आज एक बार फिर उत्तर भारतीयों, पिछड़े मराठियों और दलितों के साझा मोर्चे की मुंबई को जरूरत है।

अमरेश मिश्र इतिहासकार हैं जो लम्बे समय तक सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं.. उनकी नई किताब War of Civilisations: India AD 1857 बाज़ार में उपलब्ध है.. जिसे रूपा एंड कम्पनी ने छापा है..

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2008

घर लौट जायँ भैये?

राज ठाकरे अपने एक बयान से राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर छा गए हैं। उनकी गिरफ़्तारी की उलटी गिनती की जा रही है। मीडिया को तो परोसने के लिए कुछ गरम मसाला चाहिये, समझ में आता है। पर राज्य सरकार की भूमिका इस में इतनी मासूम नहीं है जितनी किसी को शायद लग सकती है।

पहले ही कुछ लोग यह आशंका व्यक्त कर चुके हैं कि राज ठाकरे को भाव देने में कांग्रेस की सोची-समझी नीति है। पिछले नौ बरसों से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस और एन.सी.पी. को तिबारा बहुमत पा जाने का विश्वास नहीं है, खासकर तब जबकि प्रदेश में किसान लगातार आत्म-हत्याएं करते रहे हों और उद्धव अपने परम्परागत वोटबैंक से बढ़कर किसानों और उत्तर भारतीयों को जोड़ने के प्रयास कर रहे हों।

ऐसी आशंकाओं के बीच शिव सेना के खिलाफ़ राज ठाकरे को असली सेनापति के रूप में खड़ा कर देने में असली हित तो कांग्रेस का ही है। और राज ठाकरे की विद्रोही छवि को एक नाटकीय रूप देने में जो कुछ बन सकता है, सरकार लगातार कर रही है।

अब उन पर यह रोक लगाई गई है कि वे रैली या प्रेस कान्फ़्रेन्स न करें। नाटकीयता की माँग होगी कि उनकी गिरफ़्तारी ऐसी एक रैली/ प्रेस मीट के बीच हो जिस में राज कुछ सनसनी पूर्ण बयानबाजी कर रहे हों। मेरा डर है कि सरकार राज ठाकरे को ऐसी स्क्रिप्ट लिखने में पूरा सहयोग करेगी। देखें क्या होता है!

अपने राजनैतिक हितों को बचाये रखने के लिए ऐसे खेल राजनीति में किये जाते रहे हैं और कभी-कभी इन खेलों में हज़ारों-लाखों लोग मौत के घाट उतर जाते हैं और भिन्डरांवाले और ओसामा जैसे महापुरुषों के जन्म भी हो जाते है। इस खेल में सीधे-सादे मराठियों को निरीह भैयों से भिड़ाया जा रहा है ताकि शिवसेना-भाजपा को सत्ता में आने से रोका जा सके।

क्या करें बेचारे भैये? मुम्बई छोड़ दें? मेरे विस्फोटक मित्र संजय तिवारी का मानना है कि हाँ छोड़ दे! (कल मेरी उनसे फोन पर बात हो रही थी) .. वे मुम्बई छोड़ेंगे तो ही उत्तरांचल की मनीआर्डर अर्थव्यवस्था के स्थान पर एक असली और स्वस्थ अर्थव्यवस्था कायम होगी। क्योंकि उनका मानना है कि व्यक्ति ही पूँजी है.. वे जहाँ जमा हो जायेंगे विकास और सम्पत्ति पैदा हो जायेगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर मुम्बई की सम्पन्नता का असली रहस्य हैं। इन सस्ते मज़दूरों के बाज़ार से हट जाने से मुम्बई का सारी हेकड़ी निकल जाएगी।

मैं अर्थशास्त्र में बहुत मज़बूत नहीं हूँ.. पर संजय की बात मुझे तार्किक लगती है। मार्क्सवादी भी जानते हैं कि पूँजी के उत्पादन का श्रम से सीधा सम्बन्ध है। मज़दूर के उचित श्रम मूल्य और दिये गए श्रम मूल्य के अन्तर से ही पूँजी का निर्माण होता है। विस्थापित मज़दूर कम से कम मूल्य पर काम कर के इस अन्तर को बढ़ाकर अधिक पूँजी उत्पादित करने में सहायक होता है।

फिर भी मैं संजय की इस बात के साथ सहज नहीं हूँ कि भैये मुम्बई छोड़ दें। अभी तक का आदमी का इतिहास कई अर्थों में आदमी के विस्थापन का इतिहास भी है। विस्थापन में कई त्रासदियाँ भी होती हैं पर प्रगति के नए दरवाज़े भी बाहर जाने वालों रास्तों पर ही खुलते हैं। देखा गया है कि विस्थापित लोग ही विकास की मशाल के वाहक होते हैं। अपने जड़ों को पकड़ कर जमे लोग वहीं बने रहते हैं और नई ज़मीन खोजने वाले आगे बढ़ जाते हैं।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

पूर्वग्रह की राजनीति

मेरी माँ और दूसरे शहरों में बैठे मित्र परेशान हैं कि मुम्बई में क्या हो रहा है? पहली बात तो यह कि यह पूरा मामला जितना बड़ा है उस से कई गुना बढ़ा-चढ़ा कर इसे पेश किया जा रहा है। और इसमें मीडिया की खबरखोरी का लोभ एक बड़ा कारण है। मगर ज़्यादा दुःखद इसमें राज्य सरकार की भूमिका है.. जो अराजक तत्वों को बेक़सूर लोगों को सताने दे रही हैं?

अब वो दिन नहीं रहे जब जनता नेता के पीछे चलती थी.. अब नेता जनता के पीछे चलता है। कोई भी बात कहने से पहले वो देख लेता है कि हवा का रुख क्या है। ऐसे में राजनीति का सबसे आसान रास्ता आम जन में व्याप्त पूर्वग्रहों की गली से होकर जाता है.. क्योंकि वहाँ असंतोष भी होता है और एक बना-बनाया दुश्मन भी।

अधिकाधिक पार्टी इस क़िस्म की राजनीति कर रही हैं.. अकेले मुम्बई ही नहीं, दुनिया के हर कोने में आप को इस तरह के पूर्वग्रह मिल जाएंगे.. जर्मनी में तुर्कों के खिलाफ़, फ़्रांस में नार्थ अफ़्रीकी मुस्लिम विस्थापितों के खिलाफ़, इंगलैण्ड में इण्डियन्स और पाकीज़ के खिलाफ़ और पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया में और खासकर अमरीका में, मुसलमानों के खिलाफ़ एक बनी बनाई सोच मौजूद होती है।

आदमी को जानने के पहले ही उसकी भाषा और चेहरे-मोहरे से उसके बारे में एक राय क़ायम कर ली जाती है। आम तौर पर इन पूर्वग्रह का एक भौतिक आधार भी होता है। मुस्लिमों के बारे में पूर्वग्रह की जड़ आतंकवाद से जुड़ा हुआ है मगर अन्य मामलों में यह विस्थापित मज़दूर के कम दामों में बिकने को तैयार हो जाने की वजह से स्थानीय मजदूर में पैदा हुए क्षोभ के चलते होता है। और भूमण्डलीकरण के इस दौर में इस तरह की राजनीति का भविष्य अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य पर निर्भर करेगा काफ़ी कुछ।

मुम्बई के इस मामले में विडम्बना की बात यह है कि यहाँ पर जिन विस्थापितों के खिलाफ़ मुहिम चलाया जा रहा है वो किसी दूसरे देश में नहीं अपने ही देश में नफ़रत का निशाना बन रहे हैं। मुम्बई में एक निम्न वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय मराठी के मन में यह क्षोभ है कि यूपी बिहार के मज़दूरों के रेट गिरा कर उनके रोज़गार के अवसरों में सेंध लगाते हैं। राज ठाकरे इसी सोच का राजनैतिक फ़ायदा उठाना चाहते हैं। इस तरह की राजनीति बेहद खतरनाक है और चिंता का विषय है।

और चिंता का विषय यह भी है कि एक के बाद एक हर राज्य में यह तस्वीर उभर कर आ रही है कि क़ानून लागू किया जाएगा या नहीं इसका फ़ैसला इस बात को ध्यान में रख कर किया जा रहा है कि बहुसंख्यक राय क्या है? अगर बहुसंख्यक राह यह कि मुसलमानों को पिटना चाहिये तो हत्यारों को गिरफ़्तार करने से बचती रहेगी पुलिस। अगर सिवान की जनता भारी वोटों से शहाबुद्दीन को जिताती है तो वे बीसियों क़त्ल और कई नॉन बेलेबल वारन्ट के बावजूद पूरे भारत को अपना अभयारण्य समझ सकते हैं और केन्द्रीय मंत्रियों के गले में हाथ डाल कर संसद में घूम सकते हैं ।

अगर बहुसंख्यक राय यह है कि आधी रात को शराब पी कर होटल से बाहर निकलने वाली औरत परोक्ष रूप से बलात्कार आमंत्रित कर रही है तो उस पर हमला करने वालों को पुलिस सहानुभूति की दृष्टि से देखेगी। मेरा ख्याल है कि वही मानसिकता विलासराव देशमुख को राज ठाकरे को गिरफ़्तार करने से रोके हुए है। वे अभी तौल रहे हैं कि आम राय कितनी राज ठाकरे के साथ है?

राज ठाकरे साहब अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते शिवसेना से अलग हो गए। शिवसेना की सीमाओं को समझते हुए उन्होने एक धर्म निरपेक्ष छवि बनाने की कोशिश में अपने झण्डे में एक हरी पट्टी भी डाली पर चुनाव में उनको दो-ढाई प्रतिशत वोट भी नहीं मिला। बजाय एक लम्बी राजनैतिक पारी के लिए धीरज पैदा करने के वे हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में अपने चाचा के पुराने हथकण्डों को दोहरा रहे हैं। ये हथकण्डे उस समय थोड़े चल भी गए थे अब अपने दुहराव में चलेंगे, इसमें मुझे शक़ है।

मैं मुम्बई में पन्द्रह साल से हूँ और मैंने मराठियों को बहुत सरल, शांतिप्रिय और अपने काम से काम रखने वाले समुदाय के रूप में जाना है। आम मराठी शिवसैनिक नहीं है। शिव सेना बनने के चालीस साल के इतिहास में शिवसेना को अभी तक सिर्फ़ एक बार ही राज्य में सरकार बनाने का मौका़ मिला है- १९९२-९३ के साम्प्रदायिक दंगो के बाद वाले चुनाव में.. वो भी भाजपा के साथ गठबन्धन बना कर ही।

टीवी क्लिप्स में ठेले का सामान गिराने वाले युवकों की चेष्टा में मुझे जज़बात की गर्मी नहीं एक सोची समझी ठण्डे दिमाग की कार्रवाई दिखी। पहले से तय कर के आए थे कि दो चार टैक्सी वालों को पीटेंगे और दो चार ठेले उलटा देंगे। ज़ाहिर है कि इसमें कोई ऐसी भावना नहीं है जो जुनून बन के कोई हंगामा बरपा कर सके। मेरी समझ में यह मामला अपनी राजनैतिक ज़मीन बनाने की या शिवसेना की राजनैतिक ज़मीन हथियाने की एक ऐसी चाल है.. जिसके जाल में मीडिया तो फँस गया पर मराठी माणूस फँसेगा या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा।

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

काम चलाने की मानसिकता

छोटे शहरों में सार्वजनिक आयामों का ऐसा हाल क्यों है जैसा कि है? सड़कों की, नालियों की, खेल के मैदानों की यहाँ तक कि अपने रहने के मकानों तक की कोई चिंता नहीं करता.. सब लोग किसी तरह काम चला लेते हैं। घर के ठीक सामने नालियाँ कीच से बजबजाती रहती हैं और लोग उन्हे साफ़ करने-कराने का कोई यत्न नहीं करते! क्यों? इस काम-चलाऊ मानसिकता का कारण क्या है? क्या इसलिए कि यह किसी और का काम है? और वे किसी और के काम में दखल न देने वाली नागरिक-नैतिकता रखते हैं? क्या मुम्बई जैसे बड़े शहरों के पुराने इलाक़ों में भी यही तस्वीर है? नहीं..!

शायद आप ने पिछले दिनों पढ़ा हो कि बान्द्रा ईस्ट के एम आई जी मैदान को लेकर क्लब की अधिकारियों और नागरिकों के बीच एक झगड़ा चल रहा है.. अभी हाल यह है कि मैदान को कुछ निश्चित घंटों के लिए ही आम नागरिकों के लिए खोला जाता है। बाकी समय मैदान को रणजी ट्रॉफ़ी के मैचेस, कुछ सांस्कृतिक आयोजन वगैरह के लिए किराये पर दे दिया जाता है जो क्लब की आय का एक मात्र स्रोत है।

पर नागरिकों का मानना है कि इसके चलते इलाक़े के बच्चे अपने खेलने के मैदान से वंचित हो रहे हैं। और वे खेल के मैदान को क्लब के अधिकार से निकाल कर सार्वजनिक दायरे में लाना चाहते हैं। क्लब वाले कह रहे हैं कि उन्होने मैदान को महाडा से खरीद लिया है और नागरिक सकते में हैं कि ये कब हुआ कैसे हुआ? और उनके बीच लड़ाई जारी है!

मेरा सवाल है कि क्या ऐसी लड़ाई किसी छोटे शहर या क़स्बे में मुमकिन है? अगर नहीं तो क्यों नहीं? अभी पिछले दिनों मैं कानपुर गया हुआ था जहाँ मेरे बचपन का एक बड़ा हिस्सा गुज़रा है। बचपन में मैं साकेत नगर के जिस मकान में रहा करता था उसे फिर से देखने जा पहुँचा। उस मकान में कोई बदलाव नहीं आया यह देख कर मुझे थोड़ी हैरानी हुई मगर ज़्यादा हैरानी इस बात से हुई कि सामने की सड़क और मैदान में भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

वो आज भी वैसे ही ऊबड़-खाबड़ और उजाड़ पड़ा हुआ है झाड़ियों और पत्थरों से भरा हुआ कि जिसे देखकर आप के भीतर खेलने की कोई उमंग नहीं जागेगी। क्या यहाँ रहने वाले बच्चों को खेलने की कोई ज़रूरत नहीं? या उनके माँ-बाप इस बारे में सचेत नहीं? और अगर सचेत हैं तो कुछ करते क्यों नहीं? क्या उनके पास समय नहीं है? ऊर्जा नहीं है? क्या बात है?

मेरा अपना ख्याल यह है कि मुम्बई और कानपुर में फ़र्क गाँव से जुड़ाव का है। लोग छोटे शहरों में रहते हुए भी कभी पूरी तरह से मान नहीं पाते कि उन्हे स्थायी तौर पर यहीं रहना है। वे लगातार एक विस्थापित मानसिकता में ही बने रहते हैं। वे महज आर्थिक कारणों से गाँव छोड़कर शहर आए होते हैं और अपने शहरी-निवास को एक प्रवास मानकर बने रहते हैं एक अस्थायी मानसिकता में।

दूसरी बात जो मुझे लगती है कि चूँकि ज़्यादातर शहर मूलतः अंग्रेज़ों के द्वारा बनाए-बसाए गए हैं तो शहर में रहने वाले हिन्दुस्तानी एक पराये आयाम में परदेसी मानसिकता से रहते हैं। दूसरे की बनाई संरचना में अपने योगदान की बात, अपनी रचनात्मकता की बात वे नहीं सोचते। मुम्बई जैसे महानगर के इन इलाक़ों में लोगों के भीतर एक स्थायित्व आया है.. अब यहीं रहना है, कहीं और नहीं जाना, न आगे न पीछे। तो अपने आस-पास पर अपने अधिकार का दावा पेश करते हैं.. और अपने योगदान के प्रति सजग होते हैं।

आप का क्या खयाल है?

शनिवार, 15 दिसंबर 2007

पूँजीवाद के पार जीवन

पूँजीवाद और उपभोक्तावाद के खिलाफ़ जनता की गोलबंदियों के एक नए मंच की जानकारी हुई आज.. फ़्रीगन्स। अंग्रेज़ी दैनिक डी एन ए में इस आन्दोलन के ऊपर एक लेख छपा है। मुख्यतः अमरीका के शहरों में मौजूद इन फ़्रीगन्स का नारा है ‘पूँजीवाद के पार जीवन’

बड़े-बड़े सुपर मार्केट और मॉल्स के कचरे में से काम की चीज़े निकाल लेने में विश्वास रखते हैं ये लोग। बाहर से देखने वालों को लग सकता है कि ये लोग कचरा बीनने वाली प्रजाति के नंगे-भूखे लोग हैं पर ऐसा है नहीं.. ये पढ़े-लिखे नई सोच से लैस नए ज़माने के लोग हैं.. आने वाला मानव इन से जीवन की सीख ले कर ही आगे बढ़ेगा.. ऐसा मेरा विश्वास है।

आप इस लिंक पर देख सकते हैं एक फ़्रीगन से साक्षात्कार..

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

मुझे दंगाईयों से परेशानी है

अभी कल छै दिसम्बर था. मुझे यह तारीख दो कारणों से याद रहती है. एक तो बाबरी मस्जिद को गिराये जाने की बरसी इसी दिन पड़ती है और दूसरे यह तारीख मेरी सास की पुण्यतिथि भी होती है. लेकिन कल मेरी हाउसकीपर सीमा के बच्चे उसके घर पर ही थे, पूछने पर पता चला कि छुट्टी है. मैं सोच में पड़ गया कि कौन सी छुट्टी हो सकती है. मुझे बताया गया कि बाबा साहेब अंबेडकर की बरसी है. मुझे अपने ऊपर थोड़ी कोफ़्त हुई कि ये बात मुझे याद होती थी मगर भूल गया. बाद में जब सीमा आई तो उसने उजली सफ़ेद साड़ी पहनी हुई थी बाबा साहेब के सम्मान में.

शाम को मैं और प्रमोद भाई यूँ ही टहलते हुए आरे में छोटा कश्मीर नामक एक पिकनिक स्थल पर निकल गए तो वहाँ भी हम ने कई परिवारों को छुट्टी मनाते पाया. उनमें से कुछ ने सफ़ेद परिधान धारण किए थे. देश के एक बहुसंख्यक समुदाय के लिए छै दिसम्बर के जो मायने हैं हम (सवर्ण जन) उस से अपरिचित हैं. दिलीप मण्डल आज कल इन्ही मुद्दो पर एक ज़बरदस्त बहस छेड़े हुए हैं.

मगर शिवसेना वाले मेरे मित्र के समर्थक नहीं निकले. ये समझते ही कि डॉक्टर साब उत्तर भारतीय हैं उनके गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया गया...
पर आज देख रहा हूँ कि हमारा हिन्दी ब्लॉग संसार इतना बड़ा हो गया है कि कल हुई एक दूसरी गरमागरम बहस की हमें कुछ हवा भी नहीं हुई. मैं उस बहस का ज़िक्र कर रहा हूँ जिसके केन्द्र में अनुनाद सिंह है. वो हैरान हैं कि राही मासूम रज़ा बाबरी मस्जिद के गिराए जाने पर खुश क्यों न हुए. उधर भूमण्डलीकरण के खिलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने वाले हमारे जुझारु मित्र संजय तिवारी भी कुछ ऐसी ही भावनाओं में उतरा रहे थे. और वे अकेले नहीं हैं जो इस मन्दिर-मस्जिद विवाद के नाम से ही भावुक हो जाते हैं. सर्वप्रिय और अतिसंवेदनशील बड़े भाई ज्ञानदत्त जी भी इस विषय पर अपनी बेबाक राय रखते हैं.

ये आज की स्थिति है.. मुझे याद है १९९२ के साल के उन अन्तिम दिनों में मैं दिल्ली में था. पूरा देश अडवाणी जी की रथयात्रा के चलते एक अनोखे बुखार में तप रहा था. इस बुखार में लोग अपने आम व्यवहार को भूल कर कुछ का कुछ हो जा रहे थे. हमारी मित्र मण्डली में हिन्दू-मुस्लिम सभी तरह के लड़के-लड़कियाँ थे. और हमें इस बात का एहसास भी न था कि कौन हिन्दू और कौन मुस्लिम है. मगर अन्दर-अन्दर भावनाएं और विचार एक भयावह शकल में गड्ड-मड्ड हो चुके थे. एक मौका ऐसा भी आया कि एक सामान्य बातचीत एक ऐसी गन्दी बहस में तब्दील हो गई जिसके अन्त में मेरी एक मुस्लिम सहेली आहत हो कर रोते हुए वहाँ से चली गई. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

सच तो ये है नरसिंहराव ने भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता गिरवा लिया. जिसकी वजह से आज उनकी हालत ये है कि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है...
कड़वी बात कहने वाला मित्र कोई अनपढ़ मूर्ख नहीं ऎम्स में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा एक डॉक्टर था. उसके चले जाने के बाद बचे हुए दोस्तों में बहस में गरमी और बढ़ गई और होते-होते बात शब्दों से उतर कर हाथ-पैरों तक पहुँच गई. ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ था.

कुछ रोज़ बाद बाबरी मस्जिद गिर गई. दोस्तों से साथ धीरे-धीरे छूट गया. मैं काम की तलाश में मुम्बई आ गया. जब मैं आया तो मुम्बई में पहले दौर के दंगे हो चुके थे और दूसरे दौर के दंगे मेरे आने के बाद हुए. शहर में ज़बरदस्त तनाव रहता. दिन में ये तनाव दोपहर की नमाज़ के वक़्त अपने चरम पर पहुँचता. जब बड़ी संख्या में नमाज़ियों के मस्जिद के आगे जुट जाने से रास्ता जाम हो जाता. शिवसेना ने इसके जवाब में महाआरती का अभियान चलाया हुआ था. दिन का ये तनाव कम होता भी न था कि शाम ढलते ही लोग घर लौटने के लिए हड़बड़ाने लगते. सब तरफ़ शिवसेना के लोग गश्त लगाते रहते.

हम मुम्बई में नए-नए आए थे.. सुनते थे कि मुम्बई में नाइटलाइफ़ होती है. हमारा वह डॉक्टर दोस्त भी उन दिनों मुम्बई में मौजूद था. एक दिन ऐसे ही किसी दोस्ताना जश्न का हिस्सा होने के बाद लौटते हुए हमें शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने रोक लिया. डॉक्टर साब ने थोड़ी पी रखी थी और हिन्दू होने के नाते वे शिवसेना के समर्थक भी थे इसलिए निर्भीकता से रिक्शे से उतरे मगर शिवसेना वाले मेरे मित्र के समर्थक नहीं निकले.

ये समझते ही कि डॉक्टर साब उत्तर भारतीय हैं उनके गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया गया. एक ही झटके में हम सब का नशा हिरन हो गया. हमें छोड़ तो दिया गया मगर उस रोज़ के बाद से मेरे अन्दर हमेशा एक डर सा बना रहता.. अपनी दाढ़ी के चलते मुसलमान समझ लिए जाने का डर. वो दाढ़ी मैंने सिर्फ़ इसी डर के चलते निकाल दी. लेकिन वह डर मुझे हमेशा याद दिलाता रहा कि उन दिनों मुम्बई में सचमुच एक मुसलमान होने का मतलब मन में कैसा भाव पैदा करता होगा..

मस्जिद गिरे और मन्दिर बने, मन्दिर गिरे और मस्जिद बने.. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता..
मुम्बई में ही क्यों अडवाणी साहब ने तो पूरे देश को इस डर में डुबो देने की साज़िश की थी. सच तो ये है कि उन्हे मन्दिर बनाने और मस्जिद गिराने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हे सिर्फ़ एक जज़्बाती माहौल बनाने में रुचि थी जिसमें वह अपनी चुनावी फ़सल काट सकें.

वैसे तो मुस्लिम समुदाय नरसिंहराव को अपना बड़ा दुश्मन मानते हैं मगर मुझे कभी-कभी लगने लगता है कि वह आदमी मुस्लिम समुदाय और इस देश का हितचिंतक था. क्योंकि अगर वह बाबरी मस्जिद को बचा लेता.. तो आज भी देश को बार-बार उसी मस्जिद का वास्ता देकर भावनाओं के ज्वार में झोंका जाता और जिस मरगिल्ली हालत में आज भाजपा पहुँच रही है वह नहीं होने पाता. सच तो ये है नरसिंहराव ने भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता गिरवा लिया. जिसकी वजह से आज उनकी हालत ये है कि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है.

कुछ लोग मानते हैं कि मस्जिद गिर जाने से पुरातत्व और विज्ञान के बड़ी हानि हुई. मैं ऐसा नहीं सोचता. मैं भाजपा का विरोधी हूँ इसलिए नहीं कि उन्होने बाबरी मस्जिद गिराई. मस्जिद गिरे और मन्दिर बने, मन्दिर गिरे और मस्जिद बने.. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरी आस्था पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरे भगवान पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. ईंट-पत्थर गारा है.. और क्या है.

पर भाजपा ने अडवाणी के नेतृत्व में इस देश में जो हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ़ खड़ा किया मुझे उस से परेशानी है. जिस नफ़रत, गुस्से और डर का संचार किया गया मुझे उस से तक़्लीफ़ है. इस बेबात के मुद्दे को लेकर आपसी हिंसा में जो सैकड़ो निर्दोष लोगों का खून बहाया गया मुझे उस से दर्द होता है.

और दर्द इस बात से होता है कि बहुत सारे मित्र धोखे में हैं कि ये मामला राम मन्दिर बनाने का है.. अगर उन्हे मन्दिर बनाना होता तो वो बातचीत के रास्ते से कब का बन गया होता.. पर वे मन्दिर नहीं चाहते, धर्म नहीं चाहते, शांति नहीं चाहते.. वे बातचीत नहीं चाहते.. वे लड़ाई चाहते हैं.. दंगा चाहते हैं.. और मुझे दंगाईयों से परेशानी है..

गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

सैन्ड्रा फ़्राम बैन्ड्रा

दो सौ साल के अंग्रेज़ो के शासन के दौरान भारत के सांस्कृतिक चरित्र में कई गहरे बदलाव हुए जो आज भी जारी हैं। हम उनकी भाषा बोलते हैं, उनकी तरह कपड़े पहनते हैं, उनके खेल खेलते हैं। हमारा लोकतंत्र, हमारी न्याय व्यवस्था, नौकरशाही, शिक्षा सभी कुछ अंग्रेज़ो के मॉडल पर आधारित है। वास्तव में तो ‘मॉडल पर आधारित’ कहना भी एक रचना प्रक्रिया की भ्रांति देता है.. जबकि हुआ यह कि अंग्रेज़ो द्वारा बनाई संरचना को हम ने बिना किसी छेड़-छाड़ के जस का तस बने रहना दिया और जारी रखा। शायद इसका कारण हमारे नेताओं (राजनैतिक और सांस्कृतिक) के पास किसी वैकल्पिक व्यवस्था के मॉडल का अभाव था।

पुराने सामंती मूल्यों पर आधारित हमारे ग्राम्य समाज का ढाँचा चरमरा कर टूट रहा था पर धराशायी हुआ नहीं था। और अंग्रेज़ो द्वारा लादी गई पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अभी आधी-अधूरी अवस्था में थी और कोई शक्ल अख्तियार नहीं कर सकी थी। ऐसे में गाँधी जी जैसे विचारकों का मत था कि हम अंग्रेज़ी मूल्यों को पूरी तरह नकार कर अपने पुराने ढाँचे को पुनः खड़ा करें। पर सत्ता पर का़बिज़ नेहरू को पुराने समय में लौटने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.. उनका विचार था कि नया हिन्दुस्तान नए मूल्यों पर ही आधारित होगा। ये नए मूल्य क्या थे और कहाँ से आने वाले थे? आज़ादी के साठ साल बाद हम कितना पुराने मूल्यों से दूर आए हैं और कितना उन नए मूल्यों का विकास कर सके हैं जिनकी चिंता एक समय पर नेहरू और उनके समकालीनों को रही होगी, यह एक अलग चिंता का विषय है।

व्यक्तिगत स्तर पर, निजी स्तर पर पुराने मूल्यों के बरक्स नए मूल्यों का मॉडल कहीं-कहीं भारत के ईसाई समुदाय को भी अनजाने में माना गया। एक स्तर पर तो उन्हे पतित और दुष्चरित्र समझा गया तथा दूसरे स्तर पर उन्हे, अपने घुटन पैदा करने वाले सामाजिक मूल्यों से आज़ादी का पर्याय भी समझा गया। मुम्बई की हिन्दी फ़िल्मों में यह भूमिका क्रिश्चियन सेक्रेटरी के रूप में प्रतिबिम्बित होती है, जो मर्दों की दुनिया में अकेली लड़कियों के बतौर प्रवेश करने का साहस रखती है, स्कर्ट पहनती है, गिटपिट इंगलिश बोलती है, गिटार पर गाने गाती है, डान्स करती है और प्रेम सम्बन्धों में ‘उदार’ रवैया रखती है। उसका नाम होता है बॉबी जूली रोज़ी या मेरी.. एंड शी इज़ अ गुडटाइम गर्ल.. या चालू भाषा में चालू गर्ल। तब के बॉम्बे में इसी लड़की को लोकप्रिय रूप से ‘सैन्ड्रा फ़्रॉम बैन्ड्रा’ का नाम और पहचान दी गई।

फ़िल्ममेकर पारोमिता वोहरा की नई डॉक्यूमेन्टरी ‘व्हेयर इज़ सैन्ड्रा’ पड़ताल करती है इसी मिथक का.. आखिर कौन है यह सैन्ड्रा और क्या है उसकी असलियत। पारो का अपनी इस फ़िल्म के बारे में बयान है..

I searched for a way to explore the stereotype of Christians more gently - through the aspects of fantasy that exist in the idea of the sexy, supposedly available but actually unattainable Christian woman. I've tried to stay away from dismantling stereotypes in the film, tending instead to create my own notion of this figure by taking my own and others' ideas of Sandra, and weaving in Bollywood imagery and interviews with women actually named Sandra living in Bandra.

पारो इस पूरे बदलाव की ऐतिहासिकता में नहीं घुसती, वे अपने आप को सिर्फ़ इस मिथक की परख तक ही सीमित रखती हैं, जिसके बहाने हम बैन्ड्रा के क्रिश्चियन समुदाय के रहन-सहन की एक रूपरेखा देख पाते हैं। ये सीमाएं शायद उनकी फ़ंडिंग एजेन्सीज़ के चरित्र और फ़िल्म की छोटी अवधि के कारण उत्पन्न हुईं होंगी। पर वे ये भी कहती हैं कि.. In a time of so many stereotypes about feminism, more mischievous stories are needed and are being told with greater ease. And the way in which this story is told is an exercise of that sort.

मेरा अपना मानना है कि भले ही पारो को ये मायावी सैन्ड्रा भले ही बैन्ड्रा में कहीं न मिली हो पर आज बदलते हुए हिन्दुस्तान की हर शहरी लड़की के भीतर (मौजूद दूसरे प्रतिमानों के साथ-साथ) एक सैन्ड्रा भी मौजूद है.. अ गर्ल हू जस्ट वान्ट्स टु हैव फ़न!

पारो मेरी पुरानी मित्र हैं और उनकी मेधा से मैं हमेशा प्रभावित रहा हूँ.. यह फ़िल्म अच्छी है पर मेरा मानना है कि पारो इस से कहीं बेहतर करने की सामर्थ्य रखती हैं।

इस फ़िल्म को ऑनलाइन देखने के लिए बाएँ दिख रहे फ़िल्म के पोस्टर पर क्लिक करें.. फ़िल्म की अवधि है अठारह मिनट।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2007

मँहगा होता मुम्बई

एक सवाल इस वक्त गर्मागर्म है कि क्या कारण है कि भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के शहरों में ज़मीन/रियल स्टेट की कीमतें विकसित देशों की तुलना में भी ज़्यादा बढ़ गई हैं? (सिवाय न्यूयॉर्क जैसे एकाध शहर को छोड़कर)

यहाँ पर यह भी न भूला जाय कि अभी हाल ही में मुकेश अम्बानी बिल गेट्स जैसे दिग्गजों को पछाड़ते हुए दुनिया के नम्बर एक के रईस बन गए हैं जबकि विदर्भ और आंध्र प्रदेश के किसानों की आत्महत्या का ज़िक्र न करते हुए सिर्फ़ यह याद कर लिया जाय कि मुकेश बाबू अपने घर से कहीं भी आते-जाते मुम्बई की झुग्गी-झोपडि़यों के दर्शन की बीहड़ मार से अपने को नहीं बचा सकते!

यह सवाल फ़ाइनैन्शियल टाइम्स में लिखने वाले टिम हारफ़ॉर्ड के किसी पाठक द्वारा पूछे जाने के बाद इंडियन इकॉनॉमी ब्लॉग के नीलकान्तन के ज़रिये आप तक पहुँचा है। इन बन्धुओं के पास कोई सन्तोषप्रद जवाब नै है? आप के पास है?

सोमवार, 15 अक्टूबर 2007

घर से निकलकर..

इस बार जब लगभग दो साल के अन्तराल के बाद मुम्बई से बाहर निकला तो अपने जीवन की सीमाओं को मस्तक में भरे हुए और जड़ताओं को बैग्स में ढोते हुए निकला। ताकि जहाँ भी जाऊँ उसी मुम्बीय जीवन को वहाँ भी रच सकूँ। उसी तौलिया से मुँह पोँछने और उसी चप्पल को घसीटने के अलावा वैसा ही खा सकूँ और उसी समय पर सो सकूँ जैसे नियमों का पालन भी करता रह सकूँ, जैसा मुम्बई में करता रहा हूँ। और इसमें नियमित रूप से ब्लॉग लिखना और दूसरे मित्रों के ब्लॉग्स देखना भी शामिल रहा है, जीवन के नए विकास के रूप में। लेकिन दिल्ली और उसके बाद कानपुर पहुँचकर मैं अपने इस प्रिय शग़ल को जारी नहीं रख सका। जिसके लिए मैं सभी मित्रों से माफ़ी चाहता हूँ, खास तौर पर भाई बोधिसत्व और उनके परिवार से।

इस आई हुई रुकावट के पीछे पहले तो किसी अच्छे इन्टरनेट कनेक्शन का अभाव था और बाद में एक सचेत निर्णय भी था जो मैंने नए हालात के आगे समर्पण करते हुए किया। अगर कोशिश करता तो लड़-भिड़कर रोज़ एक पोस्ट डाल सकना ऐसा कोई कठिन पहाड़ न होता, मगर फिर घर से निकलने का मक़सद अलग खड़ा मुझ पर हँसता होता।

क्योंकि घर से निकलना अपने जमे-जमाये जीवन से निकलना होता है, उसके ठोस हो गए आकार की सीमाओं से बाहर निकलना होता है। घर से काम पर जाना, काम से निकल कर घर को आना, ज़रूरत पड़ने पर बाज़ार जाना और ज़रूरत की ही तरह मनोरंजन की दुकानों पर जाना- इन्ही जड़ताओं में फँसता जाता है रोज़मर्रा का ढर्रा। सभ्यता ने जहाँ एक तरफ़ मनुष्य के जीवन में अनन्त सम्भावनाओं के रंग भरे हैं वहीं दूसरी ओर ऐसी निहायत उबाऊ एकरसताओं का भी उत्पादन किया है, बड़े पैमाने पर। हम सब अपनी-अपनी एकरसताओं के शिकार हुए पड़े रहते हैं अपने-अपने कोटरों में - कल्पना में, किताबों में और अब के इन्टरनेटीय जीवन में एक आभासी दुनिया में एक समान्तर जीवन की रचना करते हुए।

मैंने चाहा था अपनी एक ओर ठोस हो चुकी मगर सीमित, और दूसरी ओर विस्तृत मगर वायवीय और आभासी दुनिया से निकलकर एक सच्ची, वास्तविक, तरल दुनिया में बहना। दिल्ली और कानपुर में पुराने और नए मित्रों के साथ समय गुज़ारते हुए और ढर्रे से कुछ अलग तरह समय को जीते हुए वह कुछ हद तक किया भी गया, जिसका विवरण एक अलग पोस्ट में दिया जायेगा। फ़िलहाल तो इतना ही कहना चाहता हूँ कि घुमक्कड़ी सम्भावनाओं के अनोखे द्वार खोल विविधताओं के अद्भुत दर्शन कराती है तो आदमी से एक लचीलापन भी माँगती है मगर आदमी नियम के नियंत्रण से नियति को बाँध रखने का इच्छुक रहता है।

इस खींचतान पर ग़ालिब का एक शेर याद आता है; आशिक़ी सब्रतलब और तमन्ना बेताब, दिल का क्या रंग करूँ खूने जिगर होने तक।

इसी अन्तरविरोध पर एक ज़ेन मास्टर ने अलग तरह से टिपियाया कि जब भूख लगती है खा लेता हूँ और जब नींद आती है सो जाता हूँ।

बुधवार, 26 सितंबर 2007

एक दिन दिल्ली में दोस्तों के साथ

आजकल दिल्ली में हूँ। प्रमोद भाई पहले से ही दिल्ली में हैं। दिल्ली सालों मेरा घर रहा है-१९८४ से १९९६ तक। जिस बीच मैं इलाहाबाद और मुम्बई रहते हुए भी बार-बार दिल्ली लौटता रहा। मेरे बड़े भाई का घर आज भी यहीं है। इसलिए कानपुर- जहाँ अब मेरा दूसरा भाई और माँ रहतीं हैं- जाने का रास्ता दिल्ली हो कर ही बना हुआ है। इस बार लगभग दो बरस बाद मुम्बई से निकला है। बोधि तो मुझे हमेशा ही कहते रहते हैं कि तुम तो कभी भी आश्रम बना लो क्योंकि तुम ने तो क्षेत्र-सन्यास लिया ही हुआ है। तो इस सन्यासाश्रम से घबरा कर मैं भागा हुआ हूँ। इस पलायित अवस्था में अचानक ढेर सारे दोस्तों के साथ एक पूरा दिन बिताना एक सुखद अनुभव रहा। वैसे तो हम जिस दौर में हैं जहाँ साये भी साथ छोड़ जाते हैं दोस्तों का तो कहना क्या! बावजूद उसके मुझे दोस्तों की कमी कभी खली नहीं। मेरे पुराने दोस्त मेजर संजय और प्रमोद जी से मिलने की बात थी, जगह तय हुई श्रीराम सेंटर का पुस्तक बिक्री केंद्र की, जिसे लोग दिल्ली की एकमात्र हिन्दी किताबों की दुकान मानते हैं(बाकी प्रकाशन घर हैं या वितरण के अड्डे)। इरफ़ान मियाँ, प्रमोद भाई और अविनाश को वहाँ छोड़ अपनी नौकरी बजाने चल दिये। भूपेन अलग दिशा से आए। मैं पहुँचा। मेजर संजय चतुर्वेदी पधारे। रवीश कुमार किसी कहानी की पीछा करते हुए कुछ देर यहाँ भी उसकी बू लेते रहे।


मसिजीवी सुबह की पारी की अध्यापकी करने के बाद घर लौटने के बजाय पुरानी अड्डेबाजी का लुत्फ़ लेने यहाँ ऐसा रुके कि शाम तक रुके रहे। जब सुजाता आईं। उनके आने के पहले जमशेदपुर की रश्मि आईं, कार्टूनिस्ट पवन आए, हिन्दुस्तान के पत्रकार धर्मेन्द्र आए। और सबसे आखिर में सैय्यद मुहम्मद इरफ़ान आए।
कुछ दोस्तों से तो सचमुच पहली ही बार मिला। लेकिन अधिकतर से तो आभासी दुनिया का अंतरंग नाता बना ही हुआ है। लगा ही नहीं कि नए दोस्तों से मिल रहा था। बात करते रहे बैठे हुए, चलते हुए, घूमते हुए। श्रीराम सेंटर की कैंटीन में बतकही, बाहर पेड़ के नीचे चाय के अड्डे की चाय। वापस किताबों की दुकान से किताबों की खरीद और कैंटीन की कॉफ़ी। फिर बंगाली मार्केट की ओर टहलते हुए फ़्रूट मार्ट से केले और बंगाली से मिठाई और दोसा और लौटते में वापस पेड़ के नीचे बैठकी। और आखिर में साहित्य अकादमी की हरी घास पर क्षण भर से ज़्यादा।
देश-दुनिया, टीवी-अखबार, साहित्य-समाज और एक दूसरे के निजी प्रसंगो पर बातों का सिलसिला अबाध चलता ही रहा। शाम ढल गई। अँधेरा हो गया। मेरी भाभी ने फोन पर घर लौटने की बात उठाई और मुझे अपने आजकल के अनुशासित जीवन की याद दिलाई। लोभ तो था कि रमा रहता इस दोस्ताने में देर रात तक पर दोस्ती से भरे दिल में थोड़ी जगह संतोष को भी दी। और अपने भाई के साथ लिफ़्ट ले कर वापस लौट आया।

शनिवार, 8 सितंबर 2007

आई वान्ट टु गेट सम एअर..

कल कहीं जाते हुए रास्ते में तमाम नई मॉल्स के दर्शन किए। और सोचा कि क्यों बना रहें है लोग इतनी नई-नई मॉल्स? क्या शहर चलाने वाले लोग(!) नहीं देख पाते कि बान्द्रा से लेकर बोरीवली तक एक बच्चों के खेलने का पार्क नहीं है, लाइब्रेरी नहीं है, म्यूज़ियम, ज़ू या ऐसी कोई भी सार्वजनिक जगह नहीं है, जहाँ आप अपने घर से निकल कर दो पल चैन से बैठ सकें। घर से निकलते ही सड़क है, सड़क पर गुर्राता-गरजता ट्रैफ़िक है। कारें हैं, बाइक्स हैं, बसे हैं, ट्रक हैं, ट्रेन हैं, स्टेशन्स हैं, गँजागज भरे लोग है.. पसीने, पेट्रोल और परफ़्यूम में गजबजाता मनुष्यता का समुद्र है। और बाज़ार है।

यूँ तो बाज़ार आपके बेडरूम तक बढ़ आया है। आप टीवी खोलते हैं, बाज़ार खुल जाता है। आप अखबार उठाते हैं ,बाज़ार हाथ आता है। आप खाने के लिए कुछ भी मुँह में डालते हैं, बाज़ार गले में अटक जाता है। आप अपने अस्तित्व की हदों को तोड़ कर कहीं खुले में साँस लेना चाहते हैं। मगर जगह कहाँ है? काफ़ी सारे लोग भूल भी जाते हैं ये साँस लेना, और अपने घर की बंद हवा में घुट-घुट कर मर जाते हैं।

अंग्रेज़ी फ़िल्मों में मैंने अक्सर देखा है, अचानक कोई चरित्र कहेगा कि, आई वान्ट टु गेट सम एअर!.. इतना कह कर वह बाहर किसी टेरेस या हवादार छत या खुली सड़क पर निकल कर खुले आकाश को ताकता है! दिल्ली वाले अंग्रेज़ी फ़िल्मों की इस अदा से कुछ सीख सकते हैं, मगर मैं असहाय हो जाता हूँ। दिन में कई दफ़े मैं कहना चाहता हूँ कि आई वान्ट टु गेट सम एअर.. लेकिन हवाखोरी की कोई खुली जगह इस शहर ने अपने शहरियों के लिए नहीं छोड़ी है।

कल तक जो स्थान मुम्बई के नक्शों पर दलदल(मार्श) के बतौर चिह्नित थे, आज वहाँ नए जगमगाते नगर उग आए हैं। इसे आप प्रगति नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? उन दलदलों में पल रहे पर्यावरण के लिए बेहद ज़रूरी मैन्ग्रोव नष्ट हो जाने के अलावा एक और पहलू है इस प्रगति का। दुर्भाग्य से शहर में आ चुकी और आने वाली बाढ़ में इस प्रगति की बड़ी भूमिका है।

करोडो़- करोड़ो गैलन पानी जो पहले के सालों में धरती पर गिर कर कुछ धरती के भीतर और बाकी नालियों-सड़कों आदि से होकर आस-पास के दलदल में चला जाता था। अब शहर की अधिकतर धरातल के सीमेंट से बंद हो जाने के कारण पानी के धरती के भीतर जाने का रास्ता बंद हो चुका है। दलदलों पर नए प्रगति नगर बसा दिए गए हैं। पानी के निकलने का एकमात्र रास्ता सौ-डेढ़ सौ बरस पुरानी नालियाँ हैं। जो इतना पानी वहन करने में समर्थ नहीं। आने वाले दिनों में यह हाल हर बड़े शहर का होने वाला है। पीने का पानी नहीं होगा, मगर शहरों में बाढ़ का गंदा पानी भरा करेगा हर बरसात। अगर प्रशासन ने दूरदर्शिता न दिखाई तो!

इन नए प्रगति नगरों में, पुराने मोहल्लों की संकरी गलियों में, पुरानी मिलों के नए प्राँगणो में.. हर कहीं-सब जगह मॉल्स बनते जा रहे हैं। सवाल है कि क्या ये सिर्फ़ किसी पूर्व-योजना के अभाव में हो रहा है? कुछ लोग सच में इतने भोले हो कर सोचते हैं..कि यदि प्रशासन को याद दिलाया जाय कि भई मॉल्स बहुत हो गए तो अब एक पार्क बना दो, तो प्रशासन चट से अपनी भूल स्वीकार कर लेगा। मेरा खयाल है कि ये हमारे शासक वर्ग के भीतर किसी भी तरह के सामाजिक दायित्व के अभाव में हो रहा है। और एक कुरूप लोलुपता की सर्वांगीण उपस्थिति के दानवीय दबाव में हो रहा है।

हमारा शासक वर्ग हमारी ही अभिव्यक्ति है। हम जो आम आदमी है, उसी की मुखरता दिखती है खास-खास लोगों में। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि जब शासक वर्ग को हवाखोरी करनी होती है तो वह ऑस्ट्रेलिया, आइसलैण्ड, अजरबैजान से लेकर गोवा, गंगटोक कहीं भी चला जाता है। मगर आम आदमी के पास साधन कहाँ, या तो वो प्रमोद भाई की तरह एक चीन यात्रा कर डालता है.. या फिर हार कर मॉल की दुनिया की चमक में अपनी धूसर धूमिलता को ढकने चला जाता है। और कुछ पल के लिए ही सही, अपनी टेढ़ी-मेढ़ी बेढंगी ज़िन्दगी को सार्थक समझता है, स्वयं को मॉल के उस हाहाकारी ऐश्वर्य को हिस्सा समझ कर।


चित्र:सबसे ऊपर दलदल को निगलता मुम्बई शहर, फिर न्यू यॉर्क का विस्तृत सेन्ट्रल पार्क, मुम्बई की बाढ़ और अन्त में शहरियों के जीवन को जगमगाता इन-ऑर्बिट मॉल


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