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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

रूमी और शम्स


शम्सुद्दीन तबरेज़ी के बारे में ठीक-ठीक जानकारी उस तरह से उपलब्ध नहीं है जैसे कि रूमी के बारे में। कुछ लोग मानते हैं कि वो किसी सिलसिले के सूफ़ी नहीं थे, बस एक इधर-उधर घूमने वाले दरवेश या क़लन्दर थे। एक अन्य स्रोत से ये भी हवाला मिलता है कि शम्स के दादा हशीशिन सम्प्रदाय (१) के नेता हसन बिन सब्बाह के नाएब थे। (२) बाद में शम्स के वालेद साहब ने सुन्नी इस्लाम ग्रहण कर लिया। लेकिन यह बात संदेहास्पद होते हुए भी दिलचस्प इस अर्थ में है कि हशीशिन, इसमायली सम्प्रदाय की एक टूटी हुई शाख़ा थे। और ये इस्मायली ही थे जिन्होने सबसे पहले क़ुरान के ज़ाहिरी अर्थ को नकार कर बातिनी (छिपे हुए) अर्थों पर ज़ोर दिया, और रूमी को ज़ाहिरी दुनिया को नकार कर रूह की अन्तरयात्रा की प्रेरणा देने वाले शम्स तबरेज़ी ही थे।

रूमी और शम्स की मुलाक़ात के बाद ही रूमी को एक असाधारण अनुभव हुआ जिसके लिए उन्होने कहा कि उनके दिमाग़ में एक खिड़की सी खुली और उसमें से धुँआ निकल कर अर्श की ओर चला गया। यह निस्सन्देह एक उच्चतम आध्यात्मिक अनुभव की ओर इशारा है, जिसे तंत्र की भाषा में कह सकते हैं कि उनकी कुण्डलिनी सीधे सहस्रार तक जा पहुँची और समाधि लग गई।

इस अनुभव के बाद शम्स ने रूमी पर कुछ पाबन्दिया लगाईं जैसे कहा कि ख़ामोश रहो, किसी से मत बोलो। और रूमी चालीस दिन (या तीन महीने) तक न किसी और से बोले, और न शम्स से जुदा हुए। दोनों एक कमरे में बन्द रहे बस। दूसरे रूमी में कुछ रासायनिक परिवर्तन ख़ुदबख़ुद आये जैसे कि उन्होने मौलवी का चोगा उतार कर फ़क़ीरों का ख़िरक़ा पहन लिया, और कालान्तर में नाचना-गाना भी शुरु कर दिया। उनके इन बदलाव का ज़िम्मेदार उनके शिष्यों ने शम्स को माना और अपने गुरु को इस तरह से भ्रष्ट करने के लिए वे शम्स से नफ़रत करने लगे। वैसे कुछ और भी स्वतंत्र कारण थे कि लोग उन्हे नापसन्द करते, जैसे कि शम्स बहुत सी ऐसी बातें बोलते थे और करते थे जो कि इस्लाम के नियमों के ज़ाहिरी अर्थ के अनुसार कुफ़्र समझी जाती। शम्स इस ग़लतफ़हमी की परवाह न करते और लोग मानते कि उन्हे इस्लाम की परवाह नहीं है। साथ ही यह भी अफ़वाह थी कि शम्स शराब पीते हैं।

किसी रोज़ कुछ ढीठ मुफ़्तियों ने रूमी से पूछा कि शराब हराम है कि हलाल? उनका मक़सद शम्स तबरेज़ी को बदनाम करना था; रूमी ने रूपक में जवाब दिया, “यह इस बात पर टिका है कि पीने वाला कौन है? नदी में एक मुश्क शराब मिलाने से न तो नदी नशीली होती है न उसका रंग मैला होता है, और पूरी तरह से वज़ू के लायक़ बना रहता है। लेकिन अगर एक तसले पानी में एक बूंद भी शराब पड़ जाय तो पानी नापाक हो जाता है। सीधी बात है कि मौलाना शम्स अगर पीते हैं तो उन के लिए जाएज़ है क्योंकि वो नदी की तरह हैं लेकिन तुम्हारे जैसे रंडी के बिरादरों के लिए शराब तो क्या जौ की रोटी भी हराम है।” (३)

जैसे कि हवाले मिलते हैं शम्स एक बहुत ही सख़्त और सम्पूर्ण समर्पण की माँग करने वाले गुरु थे, दोस्त थे, जो भी नाम उनके रिश्ते को दिया जाय। क्योंकि उनको देखकर ये तय करना मुश्किल था कि कौन किस से सीख रहा है, ऐसा कहा जाता है। लेकिन घटनाक्रम से यह निर्णय निकाला जा सकता है कि शम्स ही गुरु थे और रूमी चेले; मुर्शिद समर्पण नहीं करता, मुरीद करता है। और रूमी ने किस तरह का समर्पण किया यह अफ़्लाकी ने मुनाक़िब ए आरिफ़ीन में लिखा है। वे लिखते हैं कि कोन्या की महफ़िलों में ये बातें होने लगीं थीं कि बहाउद्दीन बल्खी का बेटा (यानी रूमी) तो शम्स का फ़रमाबरदार लौंडा बन गया है। (४)

‘मुनाक़िब ए आरिफ़ीन’ में ही दिए एक अन्य क़िस्से में सुल्तान वलेद के हवाले से बताया जाता है कि एक रोज़ शम्स ने रूमी को उकसाने और आज़माने के लिए, एक हसीन सूरत की माँग की (सूफ़ियों में एक रवायत रही है कि वे किसी एक हसीन सूरत को प्रतीक बनाकर अल्लाह से इश्क़ का रास्ता खोलते हैं, उसे वे शाहिदी कहते हैं), तो रूमी ने अपनी मरियम की तरह पाक और बेगुनाह और बेहद ख़ूबसूरत बीवी कीरा ख़ातून का हाथ पकड़ कर उनके आगे पेश कर दिया; वो थीं। शम्स ने उन्हे देखकर कहा कि ये तो मेरी रूहानी बहन है, ये नहीं चलेंगी। बल्कि मुझे तो एक नाज़ुक और ख़ूबसूरत लड़के की चाहत है जो मेरी सेवा भी करे। फ़ौरन रूमी, युसूफ़ की तरह हसीन सुल्तान वलेद को ले आए और शम्स के आगे खड़ा कर दिया, और बोले कि उम्मीद है कि ये आप की ख़िदमत के और जूते ले आने, पहनाने के लायक़ है। तो शम्स बोले कि ये तो मेरा प्यारा बच्चा है; अब बस थोड़ी शराब का भी इन्तज़ाम हो जाता किसे मैं पानी की जगह पी सकता क्योंकि मैं उसके बिना नहीं रह सकता। इसके बाद रूमी बाहर गए और पड़ोस के यहूदियों के मुहल्ले से एक घड़े में शराब भी ले आए।

इसके बाद रूमी की फ़रमाबरदारी से क़ायल हो कर अचानक शम्स ने आनन्दातिरेक में एक चीख मारी और अपने जिस्म के कपड़े फाड़ दिये और बोले कि तुम जैसा कोई नहीं। (५) वे ये सब बातें रूमी के समर्पण की आज़माईश के लिए कर रहे थे।

जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी और शम्सुद्दीन तबरेज़ी के बीच के रिश्ते के बारे तमाम तरह की अटकलें लगाईं जाती रही हैं। इस तरह के क़िस्सों और रूमी के काव्य में शम्स के प्रति जुनूनी इश्क़ और उनके सम्पूर्ण समर्पण ही वो बातें है जो उनके बीच समलैंगिक सम्बन्ध होने का शुबहा पैदा करती है। रूमी भी मानते हैं कि इश्क़ कैसा भी हो अच्छा है। क्योंकि वह वास्तव में बन्दे और अल्लाह के बीच के इश्क़ का स्थानापन्न है और अन्ततः उसी ओर प्रेरित कर ले जाएगा। फिर भी उनके बीच में शारीरिक सम्बन्ध थे या नहीं इसे सिद्ध करने का कोई तरीक़ा नहीं है। लेकिन ये तो जग ज़ाहिर है कि उनके बीच बहुत गहरे, बहुत पक्के, भावनात्मक और आध्यात्मिक रिश्ते थे। जिसे रूमी ख़ुद अपने शब्दों में इश्क़ कहते हैं।

फ़र्क़ ये ज़रूर है कि पुरुष जब स्त्री से इश्क़ करता है तो उस में एक बहुत तगड़ा लैंगिक आयाम रहता है, वासना का प्रभाव रहता है। जबकि ऐसा मानते हैं कि सूफ़ियाना इश्क़ में मामला पूरी तरह रूहानी होता है। सूफ़ी शब्दों में एक नफ़्स से संचालित है और एक रूह से। आम आदमी तो इश्क़ को नफ़्स के, लैंगिक वासनाओं के दायरे से आज़ाद कर ही नहीं पाता। जबकि इश्क़ करने वाले हर सूफ़ी साधक की कोशिश अपने नफ़्स (मूलाधार की हैवानी ऊर्जा) को दिल और दिल से ऊपर की ओर ले जाने की है, ताकि वो हैवान से उन फ़रिश्ते की ओर यात्रा की जा सके, जिनके भीतर कोई दैहिक वासना नहीं होती।

मगर दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि चूंकि दोनों तरह की ऊर्जाओं, सम्बन्धों, और उनकी अभिव्यक्तियों में इतना अधिक साम्य है एक को दूसरे में जाने या गिर जाने की बात भी मुमकिन लग सकती है। यानी इस राह के साधक भटक जाने पर वासनाओं के दलदल में जा गिरेंगे, और जा गिरते रहे हैं। और इस बात के व्यापक प्रमाण हैं कि कैसे बौद्धों और ईसाई मठो में व्यभिचार होता रहा। सूफ़ी साधकों के बीच वासना विचलना पैदा करती रही है। ख़ुद रूमी इस प्रवृत्ति के प्रति सचेत हैं कि कैसे लोगों ने सूफ़ी मार्ग को सिर्फ़ समलैंगिकता और ख़िरक़ा ही समझ लिया है। उनके क़िस्सो में और उनके जीवन के क़िस्सों में सूफ़ी समाज में इस व्यवहार के ज़िक्र आते रहे हैं। यहाँ तक कि जब मौलाना ने सुल्तान वलेद को शम्स का शागिर्द बनाया तो कहा कि मेरा बहाउद्दीन (सुल्तान वलेद का नाम, उनके दादा के नाम पर) न तो हशीश खाता है और न ही उसे समलैंगिकता की आदत है क्योंकि अल्लाह की नज़र में ये दोनों आदतें बहुत ही नापसंदगी की हैं। (६)

अंतरंगता की चाह और समर्पण की माँग दोनों तरह के इश्क़ में होती है। नफ़्स से संचालित सम्बन्धों में कभी-कदार हासिल होती है, जबकि रूह से चालित इश्क़ में उनकी प्रबल अभिव्यक्ति होती है। वो रूमी में भी है, सूर, तुलसी और मीरा में भी है। कहा जा सकता है कि भक्ति प्रेम की उच्चतम अवस्था है। लेकिन इस उच्चतम अवस्था के चिह्न देखकर निचली कामनाओं – लैंगिक सम्बन्ध- की भी मौजूदगी की कल्पना कर लेना तार्किक नहीं लगता।


सन्दर्भ:

१. उमैय्या वंश की अय्याशियों के विरोध से पैदा हुआ एक शिया सम्प्रदाय जिसने लड़ाई का एक गुरिल्ला तरीक़ा अपनाया। वे अपने उच्च पदस्थ दुश्मनों को हत्यारे भेजकर क़त्ल करवा देते थे। माना जाता था कि ये हत्यारे अफ़ीम पर पाले जाते थे, मगर यह बात संदेहास्पद है। (दि असैसिन्स; बर्नार्ड लुईस; ११) इन हशीशिन के नाम से अंग्रेज़ी का हत्यारे अर्थ का शब्द असैसिन विकसित हुआ।
२. लाइफ़ एण्ड वर्क्स ऑफ़ जलालुद्दीन रूमी; अफ़ज़ल इक़बाल; ११०
३. मुनाक़िबे आरिफ़ीन के अंग्रेज़ी अनुवाद फ़ीट्स ऑफ़ नोअर्स ऑफ़ गॉड, जॉन ओ केन, पृष्ठ ४४१
४. वही पृ. ४३६
५. वही पृ. ४२७
६. वही पृ. ४३६


(शालीनता की सीमाओं में रहने की मुराद से इस लेख को 'कलामे रूमी'  में छपने से बचा लिया गया)


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सोमवार, 6 जुलाई 2009

एक छिलके में दो गिरियां

मुझे याद हैं वो दिन जब मैं और मेरा दोस्त बादाम के एक छिलके में दो गिरियों जैसे बने रहते। फिर अचानक हम बिछड़ गए। कुछ वक़्त बाद मेरा दोस्त लौटा और मुझ पर इल्ज़ाम धरने लगा कि मैंने उस दौरान कोई क़ासिद भी क्यों न भेजा। मैंने कहा कि जिस हुस्न से मैं महरूम हूँ उस पर किसी क़ासिद की नज़र क्यों पड़े?


न दे मुझे सलाहे ज़ुबानी कह दो मेरे यार से।

क्यूंकि तोबा करूँ ये होगा नहीं ज़ोरे तलवार से॥


देख नहीं सकता कि हो तू ग़ैर से रज़ामन्द।

मैं फिर कहता हूँ कि हो सबका मज़ा बन्द॥


तेरहवीं सदी के शाएर शेख सादी की यह लघुकथा समलैंगिक प्रेम पर आधारित है। गुलिस्तान में संकलित इस लघुकथा के आधार पर भले ये सिद्ध न हो कि शेख सादी लौंडेबाज़ थे मगर ये तो ज़रूर पता चलता है कि उनके काल में भी यह तथाकथित बीमारी मौजूद थी। वेश्यावृत्ति की तरह इसका भी इतिहास बड़ा पुराना है। बाईबिल के पुराने विधान में भी इसका ज़िक्र मिलता है। सोडोम नाम का एक शहर था (इसी के नाम से समलैंगिकता सोडोमी कहलाई), जिसके निवासी सलोनी लड़कियों के बजाय खूबसूरत लड़कों के लिए मचलते थे। बाईबिल घोषणा करती है कि ईश्वर ने उनके शहर पर बिजली गिरा कर उन्हे उनके अपराध की सजा दी।


बावजूद इस के तीनों अब्राहमपंथी धर्मावलम्बियों की परम्पराओं में इस बीमारी की उपस्थिति बनी रही। यहूदियों, योरोपीय ईसाईयों और अरब मुस्लिम और ग़ैर अरब मुस्लिम समाजों में समलैंगिकता अबाध रूप से चलती रही। इस रुझान के लोगों की सूची में तमाम बड़े-बड़े नाम हैं जिसमें लियोनार्दो दा विंची जैसे कलाकार और बाबर जैसे सेनानायक शामिल हैं। मैंने इस ब्लॉग पर पहले भी मीर के शौक़ के बारे में लिखा है-


मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिसके सबब,
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं।


ऐसी लौंडेबाज़ी को धर्म और नैतिकता तब भी नहीं स्वीकारती थी। मगर नसीब वाले थे मीर कि उनके समय इस तरह के रुझान अपराध नहीं थे। अंग्रेज़ो के आने के बाद लॉर्ड मैकाले ने क़ानून बना के इसे अपराध घोषित कर दिया। आज हमारे देश में अदालत के आदेश से यह सम्बन्ध अपराध नहीं रहा। इस कारण से बड़ा हो-हल्ला है। लोग नाराज़ हैं। संस्कृति और परम्परा, धर्म और नैतिकता की दुहाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि ये रुझान अप्राकृतिक है इसलिए निन्दनीय है। और समाज के लिए घातक है और इसीलिए आपराधिक है।


एक तर्क यह भी सुनने को मिलता है कि पशु ऐसा नहीं करते! वैसे यह पूरी तरह सच नहीं है कुछ पशु समलैंगिक व्यवहार प्रदर्शित करते पाए गए हैं। एक अन्य तर्क यह भी दिया जाता है कि ये लोग जो समलैंगिक सेक्स की आज़ादी चाहते हैं कल को पशुओं से सेक्स करने की भी इजाज़त माँगेंगे? मैं ऐसे लोगों के तर्कों के आगे ध्वस्त हो जाता हूँ। क्या कोई सचमुच इजाज़त माँग कर यह काम करता है। क्या कल तक इजाज़त न होने पर लोग समलैंगिक सेक्स नहीं कर रहे थे और आज आज़ादी मिल जाने पर मुफ़्तिया माल की तरह टूट पडेंगे?


क्या इन का सोचना यह है कि हर व्यक्ति के भीतर समलैंगिक सेक्स की ऐसी भयानक चाह है कि अपराध का डर हटते ही समाज में प्रेम का स्वरूप धराशायी हो जाएगा? बाबा रामदेव कहते हैं कि आदमी आदमी पर चढ़ने लगेगा तो बच्चे कैसे पैदा होंगे? यएनी बाबा मानते हैं कि लोग डण्डे के डर से मन मार के बैठे हैं? हास्यास्पद है ये सोच!


क्या आप ने ऐसे व्यक्ति नहीं देखे जो नर के शरीर में क़ैद नारी हैं और ऐसे भी जो नारी के शरीर में क़ैद नर हैं? ज़रूर देखें होंगे। पर मैं इस से अलग जा के एक और बात कहना चाहता हूँ- नर और नारी के चरित्र की यह श्रेणियां ही ग़लत हैं। यह वास्तविक नहीं कल्पित हैं। मानवीय गुण-दोषों की ये शुद्ध परिभाषाएं है। मगर वास्तविकता में कोई तत्व शुद्ध नहीं मिलता। शुद्ध तत्व प्रयोगशालाओं में अशुद्ध तत्वों से अलग कर के पाए जाते हैं। मेरी नज़र में तो ग़लत ये है कि नर-नारी के एक कल्पना की गई छवि के आधार पर लोगों के बारे में कोई फ़ैसला करे। फ़ैसला करे तो करे ये तो हद ही है कि फिर उन्हे आपराधिक घोषित करे? अब आप बताइये कौन प्राकृतिक है?


यह ठीक है कि मनुष्य के शरीर में यौन अंग प्रजनन के उद्देश्य से उपजे हैं। और यह बात भी तार्किक लगती है कि जो चीज़ जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई हो वो उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग की जाय। मगर प्रकृति ऐसा नहीं करती। प्रजनन के लिए एक शुक्राणु ही चाहिये होता है मगर प्रकृति उन्हे करोड़ो के संख्या में पैदा करती है। बबून के समूह में एक बंदर ही प्रजनन करता है मगर प्रकृति प्रजननांग सभी नर बंदरो को प्रदान करती है। पूछा जाना चाहिये कि प्रकृति हर चीज़ नाप-तौल के क्यों नहीं करती? और उद्देश्य के तर्क से घायल ये सारे लोग क्या अपना सारा यौनाचार प्रजनन के उद्देश्य से ही करते हैं?


समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध है। चलिए माना। पर मनुष्य के जीवन में क्या और कुछ भी नहीं जो प्रकृति के विरुद्ध है? पका हुआ भोजन भी प्रकृति के विरुद्ध है। समलैंगिकता का विरोध करने वाले क्या मिर्च-मसाले छोड़ कर कच्चा भोजन खाना शुरु कर सकेंगे? ईंट-गारे की इमारतें, मोटरकार, और पैसा-रुपया भी तो प्रकृति के विरुद्ध है। और तो और कपड़े भी प्रकृति के विरुद्ध है। पश्चिम में एक ऐसा आन्दोलन है जो प्राकृतिक होने की ज़िद में ऐसे समुदाय बना के रहते हैं जिसमें कपड़ों का कोई इस्तेमाल नहीं। क्या समलैंगिकता के विरोधी कपड़े उतार के नंगे रहना पसन्द करेंगे क्योंकि ईश्वर ने हमें कपड़े पहना के नहीं भेजा?


और सबसे बड़ा प्रकृति का विरोधी तो धर्म है। प्रकृति तो किसी धर्म को नहीं मानती। वो न तो गाय खाने से मना करती है न सूअर खाने से। प्राणी जगत में तो हर जन्तु स्वतंत्र है उस पर कोई बन्दिश नहीं। और इस तर्क से तो मनुष्य पर इस तरह की बन्दिशें लगाने वाला धर्म आप ही अप्राकृतिक है। और समलैंगिको का अपने स्वभावाविक आकर्षण के प्रति जवाबदारी बरतना प्राकृतिक।


मैं मानता हूँ कि नैतिकता समाज को स्वस्थ रखने का एक बेहतर आचरण है। पर नैतिकता स्थिर तो नहीं रहती। देश-काल-परिस्थिति के सापेक्ष है। निरन्तर बदलती है।और धार्मिक दृष्टि से तो समलैंगिकता अभी भी अनैतिक है न! उसे अवैध बनाकर समलैंगिकों को निशाना क्यों बनाना चाहता है धार्मिक नेतृत्व? कहीं ये चोर की दाढ़ी में तिनके वाली बात तो नहीं?


प्रकृति का नियम है जहाँ पानी रोका जाय वहाँ दबाव सबसे तेज़ होता है। साथ ही मैंने अक्सर महसूस किया है कि धर्म और यौनाचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तंत्र कहता है कि दोनों एक ही ऊर्जा का उपयोग करते हैं। शायद इसीलिए दोनों में ऐसा ज़बरदस्त विरोध है। पर वो दूसरी बहस है।


अंत में इतना ही कहूँगा कि मनुष्य का स्वभाव, सामाजिक और धार्मिक नैतिकता से कहीं जटिल है और प्रकृति के अनन्त भाव मनुष्य के सामाजिक परिपाटियों से कहीं विराट है।


क्या आप जानते हैं कि किशोर डॉल्फ़िन्स वयस्कता पाने के पहले अन्य प्रजातियों के जन्तुओं के साथ यौनाचार के प्रयोग करते हैं?

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