धर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 14 जून 2015

दऽऽ से




एक बार ब्रम्हा जी अकेले बैठे थे।
कमल के फूल पर नहीं थे। नाभिकमल पर भी नहीं थे। पहाड की चोटी पर थे। सर पर मुकुट भी नहीं था शायद। छाप तिलक भी बराबर नहीं था। जो जैसा था, वैसा मानकर बैठे थे। चुपचाप। अकेले। ध्यानमगन!

सृष्टि कर चुके थे। प्राकृत वैकृत सब। मानसी सृष्टि हो चुकी थी। दक्ष, नारद, सातों ऋषि, सब हो चुके थे। मानसी सृष्टि में कुछ करना पड़ना नहीं पड़ता। सोचा हो जाओ। बस काम हो जाता है। उसके बाद ब्रम्हा जी फटकर दो हो गए थे। दायां भाग नर। बायां नारी। जिन्हे मनु और शतरूपा कहा गया। उनसे ही लैंगिक सृष्टि शुरु हुई। फिर तो झड़ी लग गई। दैत्य, देव, मनुष्य, पशु-पक्षी, सब बनने लगे।

तो बहुत कुछ हो चुका था। ब्रम्हा जी शायद थोड़ा चट भी चुके थे सृष्टि से। पहले उनको अपनी सृष्टि से मोह हो गया था। उन्हे लगा था जो वो बनाएंगे। वो ईश्वर की छवि में होगा। शांत। सुन्दर। कल्याणकारी। पर ये सब कुछ हुआ नहीं। सब कुछ बिगड़ता चला गया। लड़ाई-झगड़ा। हिंसा। आपसी कलह। ये सब देखकर उन्हे अपनी ही सृष्टि से विमोह हो गया। विरक्ति। जी उचट गया। सोचने लगे कि सब मिथ्या है। एक केवल ईश्वर ही सत्य है।

तो इतना कुछ होने के बाद ब्रम्हा जी बैठे अपने मन को साध रहे थे। तभी की बात है कि दैत्य उनके पास आए। अपने राजा बलि को आगे रखकर। वही दैत्य जिनके सिर पर सींग आदि की कल्पना की गई है। अहंकार के सींग। और देवों के सर पर आलोक बताया गया है। ज्ञान का आलोक। दैत्यों के बारे में प्रसिद्ध है कि वे देवों से पहले उपजे। देवता उनके बाद हुए। छोटे होकर भी लड़-झगड़ कर उन्होने सृष्टि पर अपना अधिकार कर लिया।

ख़ैर। दैत्य आए। ब्रम्हा जी को प्रणाम किया। ब्रम्हा लगे उनके पिता के पिता के पिता के .. लम्बी चेन है। इसलिए सब बड़ा आदर करते थे। ये उस समय की बात है जब लोग बूढे लोगों का ज्ञान का भण्डार मानते थे। भले लोग सब काम उनसे पूछकर करते थे। आजकल भी भले लोग होते हैं। पर ज़रा कम।

तो प्रणाम-व्रणाम के बाद हालचाल पूछा गया। दैत्यों में जो समझदार थे, शुक्र जैसे ऋषि। वही बोले कि पितामह हमें जीवन के बारे में कुछ बताइये! कैसे समृद्धि हासिल की जाय! प्रगति कैसे की जाय! समानता का संसार कैसे लाया जाय! अधिकतम सुख कैसे प्राप्त किया जाय! आदि-आदि।

दैत्यगुरु शुक्र स्वयं बड़े ज्ञानी थे। ज्ञान का आयतन बड़ा होता है। वो छोटे में नहीं समाता। ज्ञान मिलते ही आदमी आसमान छूने लगते हैं। सब उसके आगे बौने हो जाते हैं। उसके वाक्यों में भी बड़प्पन आ जाता है। विस्तार आ जाता है। तो शुक्र ने अपनी बात के हर पहलू को समेटते हुए ब्रम्हा जी के सामने रखा। देर तक।

ब्रम्हा जी चटे हुए थे। पर उन्होने धीरज से सुना। शुक्र के पीछे जो दैत्य चुप खड़े थे। राजा बलि भी। वो सब धीरे-धीरे बेचैन होने लगे। सवाल के खतम होने की प्रतीक्षा करने लगे। उनमें शुक्र जितनी बुद्धि नहीं थी। उन्हे समझ में आना बंद हो चुका था। वे उठकर भाग जाना चाहते थे। पर शिष्टता उन्हे जकड़े रही। आखिरकार शुक्र का सवाल खतम हुआ।

शुक्र चुप हुए। दैत्यों को बड़ी राहत हुई। अब ब्रम्हा जी की बारी थी। सब ब्रम्हा जी को देखने लगे। अब ब्रम्हा जी बताएंगे। समृद्धि कैसे मिले। प्रगति कैसे हो। अधिकतम सुख कैसे मिले। इन सब सवालों का जवाब देंगे। जो बलि जैसे थोड़े बुद्धिमान थे, वो सोचने लगे कि अब ब्रम्हा जी बोलेंगे। शुक्र तो छोटे ज्ञानी हैं। उन्होने तो इतना बोला। ब्रम्हा जी तो सर्वज्ञ माने जाते हैं, वो पता नहीं कितना बोलेंगे। सब बेचैन हो उठे।

पर ब्रम्हा जी चुप थे। काफी देर तक वे चुप रहे। फिर उनके अंगो में हरकत हुई। होंठ हिले। और कहीं बहुत गहरे से एक भर्राई हुई सी आवाज़ निकली- दऽऽऽ ।

दैत्य सांस रोके खड़े थे। बहुत दिन से बोले नहीं हैं ब्रम्हा जी। गला बैठ गया है। कैसी खरखराहट के साथ दऽऽ भर बोल पाए हैं। अब गला खखारकर आगे बोलेंगे। जिनमें सेवा भावना अधिक थी-वे सोचने लगे कि शायद ब्रम्हा जी को पानी चाहिए। दौड़कर पानी ले आएं क्या! पर सोचते ही रह गए। सब पहल करने से डरते थे। कोई कहे तो हम कर लेंगे। अपने से करने लगें और लोगों ने डांट दिया तो। बलि राजा हैं। शुक्र गुरु हैं। वे समझदार हैं। वे चुप हैं। हम काहे बोलें। तो सब एक दूसरे का मुंह देखते रहे। बलि शुक्र के डर से चुप रहे। और शुक्र तो ज्ञानी थे। वे करने से पहले सोचते थे। वे भला बिना सोचे कुछ कैसे कर डालते।

ब्रम्हा जी ने आगे कुछ नहीं बोला। कुछ देर तक शुक्र को देखा। उससे कम देर बलि को। और दैत्यों के झुंड पर एक उड़ती हुई सी नज़र डाली और आंखे मूंद ली। उसके बाद सन्नाटा। पहले हलचल भीड़ में हुई। फिर राजा बलि कसमसाए। शुक्र की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगे। क्या कहा पितामह ने? क्या अर्थ है दऽऽ का?

शुक्र को पता लगा कि लोग बेचैन हो रहे हैं। पर स्वयं उन्हे कुछ समझ नहीं आया था। वे सोच रहे थे- क्या पितामह की बात पूरी हो गई थी? या वे हमसे इतना चट चुके हैं कि बात करना भी व्यर्थ समझते हैं? पितामह को बात न करनी होती तो चुप रहते, दऽऽ भी क्यों बोलते! अगर दऽऽ बोला है तो उसे पूरे वाक्य की तरह बोला है। और उसमें ही सारी बात है। पर वो बात क्या है- शुक्र नहीं समझ पा रहे थे।

प्राचीन ऋषि कठिन-कठिन विषयों को छोटे-छोटे सूत्रों में कहकर छुट्टी पा लेते थे। जिसको समझना हो समझें। न समझना हो मरें। कोई विरला ही समझता था। बहुत सारे मरते थे। लोग बहस करते। मतलब निकालते। बहुत सारे मतलब निकालते। एक ही सूत्र के कई-कई मतलब निकाले। जीवन निकल जाता। पर हाथ कुछ न आता।

तो दैत्यगुरु शुक्र ने इतना तो समझा कि दऽऽ एक सूत्र है। और इसका कुछ विशेष मतलब है। और उस पर गहरे विचार मंथन की जरूरत है। उन्होने बलि को उठने को इशारा किया। बलि उठे तो सब उठ गए। बलि चले तो सब चल पड़े। रास्ते में बलि ने चलते-चलते पूछा। कहा क्या पितामह ने, कुछ समझ नहीं आया!

शुक्र को राहत हुई। वो तो समझे नहीं और अगर बलि को समझ आ गया होता तो उनके गुरु होने पर लानत थी। शुक्र मौन साधते रहे। बलि आज्ञाकारी थे। गुरु जो बोल देते थे, करते थे। तो शुक्र ने आज्ञाकारी शिष्य को टाल दिया। शाम हो रही है, सुबह चर्चा करेंगे। ब्रम्हा जी की बात गहरी है। सुबह के शांत मानस में कहना उचित रहेगा। बलि क्या कहते। जो आज्ञा गुरुदेव- कहकर चुप हो गए।

शुक्र रात भर बिस्तर पर करवटें लेते रहे। कभी दिया तेज करते कभी मद्धम। कभी खिड़की पर जाकर चांद-तारे देखने लगते। कभी सांस साधकर अपने भीतर दऽऽ का उत्तर तलाशने लगते। पर सुबह हो गई। उत्तर न मिला। नित्य कर्म से मुक्त हुए ही थे कि बलि आ गए। कुछ मंतरी-संतरी भी थे उनके साथ।

बलि पैर छूकर खड़े हो गए। शुक्र ने आसन दिया। सब शुक्र का मुंह देखने लगे। शुक्र के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। उनके अहंकार ने बहुत कोशिश की पर शुक्र से झूठ न बोला गया। उन्होने सर झुकाकर कह दिया कि महाराज बलि- मैं पक्की तौर पर नहीं कह सकता कि पितामह ने जो दऽऽ कहा, उसका क्या अर्थ था!

बलि को ये उम्मीद नही थी। पर वो बहुत ऊंची नैतिकता के राजा थे। एक पल भी गुरु की विद्वता पर शक नहीं किया। कहा कोई बात नहीं- चलिए ब्रम्हा जी के पास एक बार फिर चलते हैं। और उन्ही से पूछते हैं कि उनका क्या मतलब था।

शुक्र को ये बात पसंद आई। वो झट तैयार हो गए। और चलते चलते बलि से बोले कि मुझे लगता है कि दऽऽ का अर्थ है-दंड। पर मैं पूरी तरह निश्चित नहीं हूं। क्योंकि इसे मैंने विचार में जाना है, समाधि में नहीं। बलि सहमत हो गए।

कहने लगे कि दऽऽ का अर्थ दंड ही होना चाहिए। दुनिया बहुत बुरी है। एक से एक हरामी लोगों का संसार है। भलाई का तो जमाना ही नहीं। दो जूते मारकर रखो तो सब सही रहते हैं। थोड़ी सी छूट दो तो सर पर चढ़ जाते हैं। सभ्य समाज अनुशासित समाज होता है। बिना दंड के अनुशासन कैसे आएगा।

यही बात करते-करते सारे पहुंचे ब्रम्हा जी के पास। ब्रम्हा जी क्या करते, उन्ही की सृष्टि थी। जिम्मेवारी उन्ही की थी। तो आंखें खोलकर शुक्र और बलि की बात सुननी पड़ी। इस बार बलि भी बोले। ब्रम्हा जी ने सब सुना। फिर चुप हो गए।

जब काफी समय बीत गया तो बलि के साथ दूसरे दैत्य अधीर होने लगे। तो बलि ने साहस करके कहा कि पितामह, हमें लगता है कि दऽऽ एक सूत्र है। जिसका अर्थ है- दंड! पर हम पूरी तरह निश्चित नहीं हैं। क्योंकि इसे हमने विचार में जाना है, समाधि में नहीं।

अचानक ब्रम्हा जी के होंठ हिले। आंखें हालांकि बंद ही रहीं। और शब्द निकला। वैसे ही घरघराया हुआ- ठीक समझा!

बस उनका इतना कहना था कि शुक्र के चेहरे पर लाली आ गई। बलि का चेहरा भी चमकने लगा। दैत्यों के भीतर भी उत्साह आ गया। वे ब्रम्हा जी की जैजैकार करने लगे।

पर ब्रम्हा जी ने न आंखें खोली और न कुछ मुंह से उचारा। आशीर्वाद तक नहीं दिया। ऐसी जैजैकार वो बहुत बार सुन चुके थे। और उसका परिणाम भी देख चुके थे। उन्हे जीत-हार, जैजैकार सब से वितृष्णा हो चुकी थी। उन्हें शांति चाहिए थे केवल।

पर दैत्य खुश थे। उन्हे उनका जीवन सूत्र मिल गया। दऽऽ से दंड! हर बात का एक कानून। और कानून तोड़ने का दंड। वे हंसी खुशी अपने राज्य लौट आए। और दंड व्यवस्था बनाकर अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

***

फिर एक बार। दैत्यों के छोटे भाई। देव। वैसे ही दल बनाकर ब्रम्हा जी के पहाड़ी शिला तक जा पहुँचे। ब्रम्हा जी देवों से उतने खफा नहीं थे। क्योंकि देव सब कुकर्म करने के बाद ब्रम्हा जी की इज्जत थोड़ी ज्यादा करते थे। ब्रम्हा जी रहते भी उन्ही के इलाके में थे। इसलिए भी ब्रम्हा जी उन्हे थोड़ा भाव देते थे।

पर सच बात ये थी कि ब्रम्हा जी को उनसे बात करना भी पसन्द नहीं था। कोई मुसीबत आई। चले आते थे। कुछ करिए। आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा। चलकर उनसे बात करवा दीजिए। उनसे मिलवा दीजिए। तंग किए रहते थे। पर क्या करते। सृष्टि उन्ही की थी। और ब्रम्हा जी ठहरे जिम्मेदार आदमी। तो करते थे।

इसके पहले कि देवगण और उनके नेता इंद्र मीठी-मीठी बातें करतें। लम्बी-चौड़ी स्तुति करते। ब्रम्हा जी ने पहले ही आंखे खोल दीं। और कुछ इस निगाह से उनकी ओर देखा- कि अब क्या! इंद्र तो गंधर्वों और अप्सराओं को तिरछी दृष्टि से स्तुति आरम्भ करने का संकेत भी दे चुके थे।

पर देवगुरु बृहस्पति पितामह का भाव ताड़ गए। और गंधर्वों को हाथ दिखाकर चुप करा दिया। और हाथ जोड़कर बोले। पितामह! हम देव बड़े व्यथित हैं। हमारे पास सब कुछ है। धन। ऐश्वर्य। विद्या। ज्ञान। साम्राज्य। पर फिर भी कुछ अधूरा-अधूरा लगता है। आखिर हमारे जीवन में क्या कमी है? हमें क्या करना चाहिए कि हमारे जीवन में पूर्णता आ जाय!

ब्रम्हा जी ने आँखें बंद कर ली। दो पल बाद खोलीं। तो ऊपर देखने लगे। मानो भगवान से शिकायत कर रहे हों। फिर बृहस्पति को देखकर मुंह खोला। और वही हुआ जो पहले हुआ था। भरभराकर बोला - दऽऽ !

देवगण भी इसके लिए तैयार नहीं थे। प्रतीक्षा करते रहे। कि कुछ और बोला जाएगा। पर कहाँ कुछ बोला जाना था। सन्नाटा रहा। देर तक। देव चूंकि दैत्यों से ज्यादा ज्ञानी थे। इसलिए बृहस्पति ने इंद्र की ओर देखा। इंद्र ने कंधे उचका दिए। दऽऽ का का मतलब गुरुजी? बृहस्पति ने संकोच नहीं किया। शर्म भी नहीं की। बिना अहंकार के इंद्र से दबी जुबान में बतियाने लगे। हमें तो कुछ समझ नहीं आया बेटा!

तो सारे देवता जुट आए। वायु, अग्नि, वरुण, पृथिवी, सरस्वती, गंगा। चंद्र, सूर्य, बुध। सब मिल विचार-विमर्श करने लगे। बीच-बीच में ब्रम्हा जी में हरकत होती। वो कसमसाते। देवों को लगता कि शायद पितामह कुछ बोल रहे हैं। वे चुप हो जाते। शायद पितामह और कुछ बोलें पर पितामह को न बोलना था।

अंत में मीटिंग समाप्त हुई। बृहस्पति ने ब्रम्हा जी की तरफ वापस देखा। अदब से हाथ बांधकर कहने लगे। हे पद्मसंभव! हमने आपके सूत्र पर बहुत सोचा। हमें यही समझ आया कि हम देव अपने ज्ञान के कारण अति विनम्र हो जाते हैं। और लोक कल्याण की भावना से सर्वसुलभ हो जाते हैं। जिसके कारण जनता हमारा अनुचित लाभ उठाती है।

सूर्य निष्काम भाव से सबके लिए प्रकाश और ऊर्जा की व्यवस्था करते हैं। पृथिवी, चंद्र, वरुण, वायु, अग्नि आदि भी बिना भेदभाव के सेवा करते हैं। किंतु हमारी प्रापर वैल्यू नहीं होती। जब हम अपने दिव्य तत्व का उचित सत्कार नहीं करते, तो कोई दूसरा क्यों करेगा।

इसलिए आपने हमें दऽऽ का सूत्र दिया है। दऽऽ यानी दर्प। अपनी उपलब्धियों को पहचानो। समाज से उसका उचित मूल्य लो! नथिंग कम् फॉर फ्री यू नो! तुम अपनी वैल्यू करोगे तो दूसरे करेंगे। इसलिए दऽऽ ! दऽऽ  यानी दर्प! अभिमान! स्वाभिमान!

इतना कहके देव चुप। ब्रम्हाजी भी चुप। जब काफी देर मौन बना रहा। और देव खलबलाने लगे तो ब्रम्हा जी को लगा कि यदि नहीं बोला तो ये जाएंगे नहीं। और चले भी गएं तो शायद फिर आ जाएंगे। अतः उन्होने होंठों को हिलाया। और पहले की तरह ही कह दिया- ठीक समझा!

बस देवों के दल में भी मंगलध्वनियां बजने लगीं। गंधर्व गाने लगे। अप्सराएं नाचने लगीं। और सब अपने-अपने लोक लौट गए।

और ब्रम्हा जी शांति की साधना में लौट गए।

***
पर ब्रम्हाजी की सृष्टि बड़ी थी। मनुष्य हो ही चुके थे। दैत्य और दानव सवाल लेकर गए। तो वो कैसे पीछे रह जाते। वे भी गए। ब्रम्हा जी को परेशान करने। ब्रम्हाजी हुए तो परेशान। पर दिखाया नहीं। मनुष्य भी नेता लेकर आए थे। पर एक नहीं अनेक नेता थे। छोटे-बड़े सब प्रकार के दल थे। झंडे, डंडे और नारे थे। धक्कामुक्की भी थी। कि कौन पहले बोलेगा। सब बोले। एक साथ बोले।

महाराज का करी। कौनो मंत्र दे द्या! कौनो सुत्र बतावा महाराज! कुल जीवन खरमंडल हुइ चुका है। जरा चैन नहीं। मेहनत बहुत करित है, फल मिलबो नाहिं करित। तबहुं दूसर मनई देख-देख जलित आहें। पैसा आवित है पर टिकित नाहिं। जरूरत हमेसा बनी रहित है। कबौं पूरा नाहिं पड़ित। कौनौ उपाइ बतावा गुरु जी।

चूंकि सब एक साथ बोल रहे थे। ब्रह्मा जी को समझ कुछ नहीं आया। बस एक शोर सा सुनाई दिया। वैसे भी वे कहाँ कुछ सुनना चाहते थे। बड़ी देर तक हल्ला-गुल्ला होता रहा। जब ब्रम्हा जी को असह हो गया। क्रोध सा आने लगा। तो वो कसमसाए। मुंह खोला। और बोला - दऽऽ !
पर इस बार किसी ने नहीं सुना। शोर वैसे ही होता रहा। तो घबड़ाकर ब्रम्हा जी ने गला खखारकर दुबारा जोर से बोला- दऽऽऽऽ !

कुछ लोगों ने सुना। पर शोर जारी रहा। जिन्होने सुना था। वो सब लोगों को चुप कराने लगे। फिर जिन्होने चुप कराने वालों को सुना, वो दूसरों को चुप कराने लगे। फिर बड़ी देर तक साइलेंस! साइलेंस! के स्वर गूंजते रहे। दो-चार घड़ी बाद फाइनली साइलेंस हुआ। पर टोटल न था। ब्रम्हा जी को आदत न थी। पर उन्होने भी मारे डर के अनटोटल साइलेंस पर समझौता कर लिया और सब को सुनाते हुए आखिरी बार बोला- दऽऽऽऽऽ !


और फिर चुप हो गए। मनुष्यों में सब ज्ञानी थे। तुरंत व्याख्याएं होने लगीं। कुछ लोगों ने तो आनन-फानन टीकाएं भी लिख डालीं। कुछ शोध प्रबंध भी तैयार हो गए। सब बोल रहे थे। अपना-अपना अर्थ बता रहे थे। दुबारा उन्हे शांत करना नामुमकिन था।

किसी ने ब्रम्हा जी से दुबारा पूछा तक नहीं कि उनके दऽऽ का सही अर्थ क्या है। क्योंकि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। मनुष्यों के पास हर चीज को तय करने का एक बढ़िया सिस्टम था- चुनाव। तो उन्होने क्विक पोल कराए। तमाम तरह के विचार थे। सब लड़े। पर तीन विचार जिनको सबसे अधिक वोट मिले- वो थे;

१) दऽऽ से दंड- इनको तीन में से सबसे कम वोट मिले।
२) दऽऽ से दर्प- ये विचार मुख्य विपक्षी दल का पद पा गया। और;
३) दऽऽ से दुह- यानी दुहना, निचोड़ना; इस विचार ने सबसे अधिक वोट पाकर सरकार बना डाली।

पर सत्ता में सबको साझेदारी मिली। और ब्रम्हा जी के आदेशानुसार मनुष्यों ने सारे साधन-संसाधनों का दोहन शुरु कर दिया।

ब्रम्हा जी बड़ी देर तक उनके जाने का इंतजार करते रहे। उन्होने सोचा था कि अपना जवाब मिल जाने पर मनुष्य वापस लौट जाएंगे। और वे शांति से अपनी साधना कर सकेंगे। पर मनुष्य नहीं टले। वे वहीं बस गए। उन्होने पर्वत काटकर नगर बना लिए। नदी नाले की शकल की हो गई। बाजार लग गया। होटल खुल गए। मनुष्य दऽऽ से दोहन करते हुए अपना जीवन बिताने लगे।

इतना कुछ होता देख ब्रम्हा जी ने कमंडल, चिमटा, और कम्बल उठाया। और चुप्पेचाप कहीं ऊपर की चोटी पर कट लिए। जहाँ कोई उनको डिस्टर्ब न कर सके।

***

ब्रम्हा जी बड़े उमरदराज हैं। कई बार सृष्टि कर चुके हैं। रोज करते हैं। जब रात हो जाती है। तो सारा संसार समेटकर जलप्रलय कर देते हैं। और सो जाते हैं। फिर अगली सुबह वापस सृष्टि करते हैं। फिर से सब कुछ बनाते हैं। और फिर से वही सब कुछ होता है, जो पहले हो चुका है। हर बार ये दैत्य, देवता और मनुष्य आकर उनसे यही सब सवाल करते हैं। हर बार ब्रम्हा जी जवाब देते हैं। पर हर बार थोड़ा बहुत अंतर हो जाता है।

जैसे इसके पहले के कल्प में जब ये तीनों प्राणी पितामह के पास आए थे। तब भी ब्रम्हा जी ने ऐसे ही दऽऽ बोला था। पर उस बार हर एक ने दऽऽ से कुछ अलग मतलब निकाला था।

दैत्य क्रूर थे। फिर भी उन्होने दऽऽ से समझा था- दया!
देव विलासी थे। फिर भी उन्होने दऽऽ से समझा था- दमन!
और मनुष्य लोभी थे। फिर भी उन्होने दऽऽ से समझा था- दान!

*****

(ऐसी एक कथा बृहदारण्यकोपनिषद में भी आती है। पर इस कथा का उससे कोई संबंध नहीं है। यह पूरी तरह मौलिक है। कहीं से कोई प्रेरणा नहीं है। यदि है भी तो, उन्होने मुझसे ली होगी प्रेरणा। लोग अक्सर भविष्य से प्रेरित होते हैं। पुराने ऋषि मुझसे प्रेरित रहे होंगे। लुब्बेलुबाब ये कि उपरोक्त कहानी मेरी है केवल मेरी। )

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

अधूरा ईश्वर..


कहते हैं कि यह संसार/कायनात/सृष्टि/ब्रह्माण्ड ईश्वर की रचना है या फिर यह सब कुछ ही ईश्वर है जिसे सूफ़ियों ने हमा ओस्त कहा है। इस बात में मुझे कुछ दुविधा लगती है।

अगर उस सर्वशक्तिमान सम्पूर्ण ईश्वर ने ये संसार बनाया है, अगर ये उस की अभिव्यक्ति है तो ये संसार भी सम्पूर्ण होना चाहिये! हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण होनी चाहिये, बिना किसी विकार, कमी या नुक्स के। वो इसलिए कि पूर्ण से तो पूर्ण ही निकलता है, सम्पूर्ण ईश्वर की अभिव्यक्ति अपूर्ण कैसे हो सकती है? मगर हम जानते हैं कि हमारा संसार सम्पूर्ण नहीं है- तमाम तरह की अपूर्णताओं का समुच्चय है ये संसार।

सम्पूर्ण का ना तो विकास हो सकता है और ना ही ह्रास। लेकिन इस संसार में तो बदलाव ही नियम है- कुछ भी स्थिर नहीं है। जन्म, विकास, क्षय और मरण इस संसार की आधारभूत विशेषता है। हर पल कुछ जन्म ले रहा है, कुछ मर रहा है, कुछ का विकास हो रहा है, और कुछ का क्षय। निश्चित ही यह संसार अपूर्ण है, अधूरा है, इसे किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं बनाया हो सकता।

और अगर, किसी न्यूनतम सम्भावना के चलते, ये अधूरा संसार सचमुच किसी ईश्वर ने बनाया भी है तो किसी सम्पूर्ण ईश्वर ने नहीं.. ये अधूरा संसार किसी अधूरे, अपूर्ण ईश्वर की ही रचना हो सकता है।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

शेल्डन पौलक का सुनहरा आम


पिछले दिनों एक प्राच्यविद, जो भारत सरकार से इसी वर्ष पद्‌मश्री भी पा चुके हैं, शेल्डेन पौलक का एक लेख पढ़ा- डीप ओरियण्टलिज़्म: नोट्स औन संस्कृत एण्ड पावर बियौण्ड राज। विषय में प्रवेश करने में काफ़ी मशक़्क़त और परिश्रम हुआ लेकिन किया गया। पौलक साहब की ज़मीन सही है कि पूर्व औपनिवेशिक भारत में एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग का शोषण चल रहा था और उस में सत्ता और वर्चस्व का पाठ भी है। पौलक साहब पहले तो सिद्ध करते हैं कि नाज़ियों के सत्ता में आने के बाद से भारतीय प्राच्यविद्या में अचानक जो तेज़ी आई उसका मक़सद आर्य संस्कृति की प्राचीन उपलब्धियों के ज़रिये यहूदियों और शामी जातियों के बनिस्बत जर्मनों की जातीय श्रेष्ठता को सिद्ध करना था। तो इस तरह से यहूदियों का दमन नाज़ियों ने आर्यश्रेष्ठता के सिद्धान्त पर किया।

यहाँ तक बात तार्किक है। फिर पौलक साहब उसे प्राचीन व मध्यकालीन भारत में ले जाते हैं जहाँ वे आर्य सत्ता में प्रजातीय तत्व की घोषणा कर के नाज़ियों और ब्राह्मणों को एक पायदान पर खड़ा कर देते हैं। यह तो हद ही हो गई। क्या ब्राह्मणों ने अछूतों के लिए कोई गैस चैम्बर्स बनाए थे? किसी जाति के प्रति पूर्वग्रह होना और उस जाति का क़त्लेआम करना दो बहुत अलग-अलग बाते हैं। यू ए ई में आज भी एक हिन्दू मज़दूर के मरने पर उसे ७००० दीनार का मुआवज़ा मिलता है, ईसाई के मरने पर पचास हज़ार और मुसलमान के मरने पर १ लाख का। यह क्या पूर्वग्रह नहीं है? अलग-अलग वर्गों के लिए हर समाज में क़ानूनो में पक्षपात होता ही आया है, कुछ में खुले तौर पर कुछ में छिपाकर। आगे पौलक साहब सती प्रथा के अनुमोदन के शास्त्रीय साक्ष्य लाकर यह सिद्ध करते हैं कि अंग्रेज़ो द्वारा भारत के औपनिवेशीकरण के पहले ही ब्राह्मणों ने अन्य जातियो का औपनिवेशीकरण किया हुआ था।

प्राचीन भारतीय समाज में ब्राह्मणों के नैतिक और बौद्धिक वर्चस्व से किसी को इंकार नहीं है मगर उसे औपनिवेशीकरण कहना यह मानना होगा कि सभी जातियां अलग-अलग प्रजाति की थीं और ब्राह्मण उन पर अपनी नैतिकता थोप रहे थे। प्रजाति वाली बात की चर्चा आगे करेंगे लेकिन नैतिकता के समबन्ध में अगर सचमुच ऐसा है तो वैदिक ब्राह्मण गणेशभक्त और देवीभक्त कैसे हो गए? किस के प्रभाव में हो गए? क्या किसी ने उनका औपनिवेशीकरण किया? सती का अनुमोदन अगर ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है तो क्या कबीर भी ब्राह्मण उपनिवेशवाद का शिकार हैं? देखिये कबीर जैसे मुहँफट और रैडिकल समाजसुधारक संत क्या कहते हैं..:

१) सती को कौन सिखावता है,
संग स्वामी के तन जारना जी।
प्रेम को कौन सिखावता है,
त्याग माँहि भोग का पावना जी॥

२) जैसे सती चढ़ि सत-ऊपर, पिया की राह मन भाई।
पावक देख डरे वह नाहीं, हाँसत बैठे सदा माई।

३)अब तो जरै-मरै बनि आवै, लीन्हे हाथ सिधौंरा।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

इब्राहिम से तीन धर्म

यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म एक ही परम्परा के धर्म हैं। प्राचीन काल में पश्चिमी एशिया में तमाम क़िस्म की प्रजातियां और उनकी सभ्यताएं पनप रही थीं। उन्ही में से एक में से निकल आए थे इब्राहिम। पहले उनका ठिकाना आज के इराक़ और तब के चाल्डिया के एक नगर में था। ईश्वर ने प्रेरणा देकर उन्हे पश्चिम में कनान यानी आज के इज़राईल/फ़िलीस्तीन की ओर भेज दिया। ये इब्राहिम ही तीनों धर्मों के मूलपुरुष हैं और इन में पूज्य हैं। इन्ही की परम्परा में आगे चल कर मूसा हुए जिन्होने दस आदेश/कमान्डमेन्ट्स पाए।

इन के बीच और दूसरे पैग़म्बर आते रहे, जिनकी इन यहूदियों ने वैसे ही स्मृति बनाए रखी जैसी कि भारतभूमि में ब्राह्मणों ने अवतारों व ऋषियों की। उनकी परम्परा में ये बातें थीं कि आगे और रसूल आएंगे जो ईश्वर का संदेस लाएंगे। उनके चिह्न व स्थितियों आदि की भी भविष्यवाणी की गई थी। ईसा भी यहूदी थे, एक दिन उन्होने घोषणा कि वे ईश्वर के पुत्र हैं और ईश्वर का राज्य बस आने ही वाला है। जिसे लोगों ने नये मसीहा का उद्घोष समझा लेकिन ज़्यादातर यहूदियों ने उन्हे अपना रसूल नहीं माना। उनके अनुयायी उन्हे यहूदियों में नहीं दूसरी प्रजातियों में मिले। हालांकि वे इब्राहिम और यहूदियों के धर्मग्रंथ को प्राचीन विधान के नाम से उतनी ही श्रद्धा देते हैं जितने कि नए विधान यानी बाईबिल को। मगर ईसा को ईश्वरपुत्र मानते हैं।

तक़रीबन छै सौ साल बाद अरब में, क़बीलाई अरबों के बीच से एक आदमी उठ खड़ा होता है जो आदम, नूह, इब्राहिम, मूसा और ईसा की परम्परा में ही अपने को अगला रसूल बताता है। वह वही सब कहानियां सुनाता है जो यहूदियों के प्राचीन विधान में दी हुई है, जिसे ईसाई भी मानते हैं। वो कहता है कि यहूदी और ईसाई दोनों इब्राहिम के असली धर्म से भटक गए हैं, उन के ज़रिये ईश्वर उन्हे सच्चे मार्ग पर लौट चलने की ताक़ीद कर रहा है। यहूदी और ईसाई उन की बात नहीं मानते। मगर इस व्यक्ति-मुहम्मद के द्वारा बताया गया 'असली प्राचीन धर्म' इस्लाम के नए नाम से विख्यात होता है और दूर-दूर तक फैल जाता है। मुहम्मद ये भी बताते हैं कि अरब जन असल में इब्राहिम की उस दासी से उत्पन्न पुत्र इश्माईल की संताने है, जिसे निर्जन रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था।

इब्राहिम के द्वारा बताई गई बहुत सारी बातें तीनों धर्म मानते हैं लेकिन यहूदी और इस्लाम धर्म में अधिक साम्य है। ईसाईयों में बहुत सारे ऐसे नए तत्व हैं जो यहूदियों में नहीं थे, और न ईसा ने उनकी चर्चा की है। जबकि इस्लाम में एकेश्वरवाद, खाने-पीने की पाबन्दी, एक आत्मश्रेष्ठता का भाव, परसेक्यूशन कौम्पलेक्स, ख़तना आदि बहुत सी चीज़े हैं जो यहूदियों सी हैं; और ये टोपी भी।



दुनिया के तीन प्रमुख धर्मों से सम्बन्धित यह पोस्ट, असल में बज़ पर मुनीश शर्मा के इसरार पर टिप्पणी के रूप में लिखी गई थी जो अब सतीश पंचम के इसरार पर यहाँ डाल दी गई है।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

इस्लाम पर खरी-खरी

तमाम पढ़े-लिखे लोगों का मानना है कि इस्लाम एक निहायत कट्टर धर्म है और उसमें सुधार की कोई गुंज़ाइश नहीं है। आज के इस्लाम की जो तालिबानी और वहाबी सूरत है उस से यह मत काफ़ी सही मालूम देता है। मगर हमेशा से ऐसा नहीं था। इस्लाम के इतिहास में पहुँचे हुए पीर कहे जाने वाले तमाम मुसलमानों ने इसे अनेक रंगो से सजाया और संवारा है।

मगर आजकल चलन कुछ ऐसा हुआ है कि अगर खुदा को परदे में रखने की बात है तो पैग़म्बर की भी तस्वीर नहीं बन सकती। कुछ दानिशमंद तो इस हद तक जाते हैं कि खुद भी तस्वीर नहीं खिंचवाते और कैमरों को तोड़ फेंकने की तबियत भी रखते हैं। उनका भला कौन करेगा मैं नहीं जानता।

मैं पाता हूँ कि मेरे बचपन से अलग आजकल काफ़ी लोग टखने से ऊँचे पैजामे और शरई दाढ़ी के साथ टहलते पाए जाने लगे हैं। मेरी समझ ये है कि अगर कोई इस तरह की पहचान के दायरों में सुरक्षा तलाशने लगे तो निश्चय ही उस व्यक्ति/समुदाय में कमज़ोरी का भाव गहरे घर कर चुका है। वह अपने समय के साथ कदम मिलाकर चलने के बजाय अतीत का पल्लू पकड़ कर घिसटने में अपनी सार्थकता पा रहा है। यह दुःखद है।

इस्लाम की आलोचना आसान नहीं। आतंकवाद और इस्लाम में कट्टरता का विरोध करने वाले भी क़ुरान की किसी आयत के सहारे या मुहम्मद साहब की किसी हदीस की ही आड़ से ऐसा कर पाते हैं। हिन्दू धर्म की पुंगी बजाने वाले और ईसाईयत को लम्पून करने वाले आप को थोक के भाव उपलब्ध होंगे मगर इस्लाम और मुहम्मद का मखौल उड़ाना तो दूर तर्क के नाम से ही लोग थर-थर काँपने लगते हैं।

ब्लॉग की दुनिया में एक भाई मोमिन ने इस्लाम पर विवेकपूर्ण खरी-खरी कहने का बीड़ा उठाया है। उन की बातें बड़ी सटीक हैं। कितनी ग्राह्य और सुपाच्य होती हैं ये तो वक़्त ही बताएगा। ब्लॉग पर उनका परिचय नहीं मिलता मगर इतना तय है कि वे जो भी हैं, धन्य हैं। मैं उनका स्वागत करता हूँ और उन को इस बीहड़ काम को करने के लिए बधाई और शुभकामनाएं दोनों देता हूँ।

शनिवार, 15 नवंबर 2008

न्याय का आतंक

पिछले दो हफ़्तो में जिस तरह से हिन्दू साधु और साध्वी आतंकवाद के सिलसिले में पकड़े गए हैं उसे लेकर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। मैं जानता हूँ कि मेरी ही तरह तमाम अन्य मित्र भी ऐसा महसूस कर रहे हैं। ये ऐसा मामला है कि बुरा लगना स्वाभाविक है.. आप की आस्थाएं जहाँ से जुड़ती हों उस इमारत के कुछ लोग यदि गम्भीर आरोपों के घेरे में आ जायं तो धक्का तो लगता है। खासकर और, जब वही आरोप हम दूसरे समुदाय के लोगों पर लगाते रहे हों।

अपने हिन्दू समुदाय के लोगों को मेरा मशवरा हैं कि वे बौखलाए नहीं, संयम से काम लें। यदि आप को लगता है कि आरोपी निर्दोष हैं, और उन्हे महज़ फँसाया जा रहा है, तो देर-सवेर सच सामने आ ही जाएगा।

लेकिन अगर आप मानते हैं कि हिन्दू धर्म को बदनाम करने की इस तथाकथित साज़िश में कांग्रेस पार्टी, केन्द्रीय सरकार, और पुलिस के साथ-साथ न्याय-प्रणाली भी शामिल है तो इस पर गु़स्सा नहीं अफ़सोस करने की ज़रूरत है कि हमारे देश के बहु-संख्यक हिन्दू जन अपने ही धर्म को बदनाम करने की इस तथाकथित साज़िश में खुशी-खुशी सहयोग कर रहे हैं? और जिस समाज के इतने सारे पहलू इस हद तक सड़-गल गए हों उसके साधु-संत और महन्त बन कर घूमने वाले लोग क्या निष्पाप होंगे?

आम तौर पर माना जाता है कि धर्म की भूमिका मनुष्य और ईश्वर के बीच एक स्वस्थ सम्बन्ध स्थापित करने की है। पर यह सच नहीं है.. असल में दुनिया के अधिकतर धर्म अपने स्वभाव में आध्यात्मिक से अधिक सामाजिक हैं। इस भूमिका के सन्दर्भ में एक छोर पर इस्लाम जैसा धर्म है जो सामाजिक जीवन के बारे में सब कुछ परिभाषित करने का प्रयास करता है तो दूसरे छोर पर बौद्धों और जैनों की श्रमण परम्परा जो समाज को त्याग देने में ही धर्म का मूल समझते थे।

इन दो छोरों के बीच हिन्दू धर्म के तमाम सम्प्रदाय जो अलग-अलग वक़्त पर अलग-अलग भूमिका निभाते रहे हैं। आप को हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने वाले साधकों की परम्परा भी मिलेगी, शुद्ध पारिवारिक जीवन जीने और तिथि-वार के अनुष्ठानों से दैनिक जीवन को अर्थवान करने वाली वैष्णव परम्परा भी है, घोर अनैतिक समझे जाने वाले वामाचारी तांत्रिक भी हैं, और अपने सम्प्रदाय के हितों के लिए हथियार ले कर युद्ध करने वाले अखाड़ों के सन्यासी भी हैं।

अपने धर्म के सामाजिक पहलू के पोषण के लिए इस्लाम में एक लम्बी परम्परा रही है जिसे लोकप्रिय रूप से जेहाद का नाम दिया जाता रहा है। ईसाईयत ने भी अपनी धर्म-स्थानों पर क़ब्ज़े के लिए चार-पाँच सौ साल तक क्रूसेड्स का सिलसिला जारी रखा। इसके अलावा ईसाईयों में पेगन्स के खिलाफ़ हिंसक गतिविधियों में भी उनके भीतर वैसा ही उत्साह जगाया जाता रहा जैसे कि इस्लाम में समय-समय पर क़ाफ़िरों के नाम पर भावनाएं भड़काने का काम होता रहा है।

सनातन धर्म भी इस तरह की सामाजिक हिंसा से अछूता नहीं रहा है। शैव-वैष्णव संघर्ष, बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष का स्वरूप भी बेहद क्रूर और हिंसक रहा है। पुष्यमित्र का अपने ही राजा बृहद्रथ की हत्या कर राज्य हथियाने के पीछे एकमात्र कारण बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष ही था। फिर गुरु नानक जैसे परम ज्ञानी की सिख परम्परा को अपना अस्तित्व बचाने के लिए सैन्य रूप लेना पड़ा (हालांकि विडम्बना ये है सैन्य रूप लेते ही नानक की परम्परा का अस्तित्व गहरे तौर पर बदल गया)।

धर्म के नाम पर होने वाली इस तरह की सारी सामाजिक हिंसा को करने वाले लोग किसी प्रकार के नैतिक दुविधा का सामना नहीं करते क्योंकि वे इस हिंसा का हेतु सीधे अपनी आस्था और नैतिकता के स्रोत अपने धर्म से ग्रहण करते हैं। वे राज्य की न्याय-व्यवस्था से इतर और उससे स्वतंत्र एक न्याय-प्रणाली में विश्वास करते हैं।

किसी ने अपराध किया या नहीं इसका फ़ैसला वो किसी नौकरीपेशा न्यायाधीश पर नहीं छोड़ते, खुद करते हैं। और उसे क्या दण्ड दिया जाना चाहिये ये भी स्वयं ही तय करते हैं और स्वयं ही निष्पन्न भी कर डालते हैं। उनकी अपनी नज़र में वे अपराधी नहीं होते बल्कि उस न्याय—व्यवस्था के रखवाले होते हैं जिस पर उनका पक्का यक़ीन है।

तमिलो के हितों की लड़ाई लड़ने वाला प्रभाकरन भी अपनी नज़र में न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। भूमिहीन किसानों के हितों के लिए हथियार बन्द संघर्ष करने वाले नक्सली भी न्याय के पक्ष में खड़े हैं। ओसामा बिन लादेन और अफ़ज़ल गुरु भी इंसाफ़ के सिपाही हैं। और साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पाण्डे पर भी यही आरोप है कि उन्होने क़ानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश की है।

राज्य का अस्तित्व तभी तक है जब तक वो अपने द्वारा परिभाषित क़ानून को लागू करा सके। इसके लिए ऐसे सभी लोग जो न्यायप्रणाली में दखल देने की कोशिश करते हैं उन्हे राज्य, अपराधी की श्रेणी में रखता है। मगर राज्य चाह कर भी अपनी न्याय की परिभाषा को हर व्यक्ति के भीतर के न्याय बोध पर लागू नहीं कर पाता।

अब जैसे साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पाण्डे के मामले में ही लोगों ने अपने-अपने न्याय-बोध से फ़ैसले कर लिए हैं। कुछ लोग तो अवधेशानन्द तक को आतंकवादी घोषित कर चुके हैं। और कुछ लोग आरोपियों के अपराधी साबित हो जाने पर भी उन्हे अपराधी नहीं स्वीकार करेंगे.. क्योंकि उनके न्यायबोध से उन्होने किसी को मार कर कोई अपराध नहीं किया। ऐसे न्याय-बोध के प्रति क्या कहा जाय?

फ़िलहाल मामला अदालत में है और अभी कुछ भी साबित नहीं हुआ है। वैसे तो आधुनिक क़ानून यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति तब तक निर्दोष है तब तक उसका जुर्म साबित नहीं हो जाता। मगर आजकल इसका उलट पाया जाता है। जैसे परसों ही मैंने कांगेस की प्रवक्ता जयंती नटराजन को टीवी पर बोलते सुना कि let them prove their innocence.. । मेरा ख्याल था कि आप अदालत में जुर्म साबित करने की कोशिश करते हैं.. मासूमियत नहीं।

मज़े की बात ये है कि उस पैनल डिसकशन में मौजूद विहिप के लोगों ने भी इस बयान पर कोई ऐतराज़ नहीं किया। क्योंकि इस बात पर तो वे खुद भी आज तक विश्वास करते आए हैं और इस समझ की पैरवी करते आए हैं। तभी तो एक बड़ा तबक़ा आतंकवाद के नाम पर पकड़े जाने वाले हर मुस्लिम युवक को अपराधी ही समझता रहा है। यहाँ तक कि कुछ शहरों का अधिवक्ता समुदाय एक स्वर से आरोपी की पैरवी तक करने से इंकार करते रहे हैं और उस मुस्लिम युवक के वक़ील बनने वाले के साथ मारपीट तक करते पाए गए हैं। ये है हमारे समाज का न्यायबोध?

आखिर में साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पाण्डे को आतंकवादी मानने वालों से मैं गुज़ारिश करूँगा कि वे याद कर लें कि आतंकवादे के मामलों में पुलिस द्वारा गिरफ़्तार मुस्लिम नौजवानों के विषय में उनकी क्या राय होती थी? जो लोग मालेगाँव जैसे मुस्लिम बहुल इलाक़ों में बम विस्फोट करना न्यायसंगत समझते हैं उनसे कोई क्या कह सकता है? मगर साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पाण्डे को निर्दोष क़रार देने वालें मत भूलें कि गाँधी जी की हत्या का षडयन्त्र करने वाले हिन्दू नौजवान अपनी एक स्वतंत्र नैतिकता और उच्च(!) न्याय-बोध से ही प्रेरित थे।

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

मैं हिन्दू क्यों नहीं: कांचा ऐलय्या

कांचा ऐलय्या की किताब 'मैं हिन्दू क्यों नहीं' का उप शीर्षक हिन्दुत्व दर्शन, संस्कृति और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक शूद्रवादी विश्लेषण ज़रूर है मगर किताब अपने विश्लेषण पक्ष में कुछ दुर्बल रह जाती है और अपनी पहले से तय की हुई प्रस्थापनाओं को सिद्ध करने की आतुरता में अधकचरे निर्णय सुनाने लगती है।

किताब के आखिरी अध्याय में ऐलय्या दलित चिंतन की परम्परा में बुद्ध, फुले और आम्बेडकर के बाद अपना ज़िक्र भी करते हैं। एक महान परम्परा में उचित स्थान पाने की उनकी ये महत्वाकांक्षा सफल हो गई होती यदि उन्होने आम्बेडकर जैसी शोध के अनुशासन, और वैश्लैषिक पद्धति पर निर्भरता दिखाई होती। अफ़सोस है कि एक लम्बे समय तक आम्बेडकर जैसे विद्वानों को अपना सही स्थान नहीं दिया गया क्योंकि वे दलित थे और फिर अफ़सोस है आज कांचा ऐलय्या जैसे विद्वानों को उनकी प्रतिभा से अधिक महत्व दिया जा रहा है क्योंकि वे दलित हैं।

ऐलय्या हिन्दू देवताओं और मिथकों का विश्लेषण करते हुए एक बेहद सहूलियतपरस्त रवैया अख्तियार करते हैं। वे जब चाहते हैं उसे इतिहास बताते हैं और जब चाहते हैं ब्राह्मणों की गढ़ी हुई कहानी क़रार दे देते हैं। रावण एक महान दलित बहुजन राजा था और उसके ब्राह्मण होने की बातें बकवास हैं- ये कहते हुए वे जानते हैं कि कि रावण का होना और उसका ब्राह्मण होना एक ही प्रकार के स्रोतों से मालूम होता है फिर भी वे हंस की भाँति अपने मनमाफ़िक मोती चुनते रहते हैं।

ऐसा नहीं है कि किताब पूरी तरह से खोखली है और उसमें कोई आकर्षक निष्कर्ष नहीं हैं। अब जैसे ऐलय्या जी बताते हैं कि विद्या की देवी सरस्वती स्त्री होते हुए भी हिन्दुत्व में स्त्रियों के विद्यार्जन पर पाबन्दियाँ बनी रहीं। और धन की देवी लक्ष्मी होने के बावजूद स्त्रियों को सम्पत्ति में हिस्से का अधिकार नहीं मिलता रहा। हिन्दू धर्म की ऐसी अन्तर्निहित विसंगतियों के विपरीत वे अपनी दलित बहुजन संस्कृति की देवियों-पोचम्मा और कैटसम्मा के गुण और उदारता का वर्णन करते हैं जो अपने भक्तों पर किसी प्रकार का दबाव नहीं करतीं।

ऐलय्या बताते हैं कि बचपन से ही सिखाई जानी वाली जातीय भेदभाव के अलावा किस तरह बचपन से ही उनका जातीय प्रशिक्षण शुरु हो जाता है जिसमें वे पेड़-पौधों और जानवरों के साथ रिश्तो के बारे में तमाम बाते सीखते हैं जबकि स्कूल में दी जाने वाली शिक्षा और भाषा उनके जीवन के परिवेष से पूरी तरह विलगित बनी रहती हैं। यहाँ तक कि उनके लिए वेद-पुराण और ओथेलो एक बराबर से अजूबे होते हैं।

वे ये भी बताते हैं कि हिन्दू मानस किस तरह से एक तरफ़ तो अनेको कामुक देवताओं और काम कला की रचना करता है और दूसरी ओर अपने समाज पर तमाम वर्जनाओं की गाँठें भी मारे रखता है जबकि इन कामुक कल्पनाओं और वर्जनाओं दोनों से मुक्त दलित बहुजन समाज में यौनिक चेतना एक स्वतः स्फूर्त ढंग से विकसित हो जाती है।

एक लम्बे समय तक भारतीय राजनीति में में दलित बहुजन की भूमिका और रामराज्य में हनुमान की भूमिका का उनका समांतर बेहद सटीक है। मगर आने वाले दिनों में जिस दलितीकरण की प्रक्रिया की बात वो कर रहे हैं वो फ़िलहाल की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में कैसे सम्भव होगा इस विस्तार में वे नहीं जाते, जबकि दलित बहुजन भी अपनी सामुदायिकता को छोड़-छाड़ निजी सम्पत्ति की होड़ में कूद पड़े हैं।

अपनी भावना और राजनीति में सही होते हुए भी मुझे लगता है कि ऐलय्या जी का विश्लेषण, ऐतिहासिक उत्पीड़न और आज भी चल रहे भेदभाव से उपजे अपने क्षोभ और आक्रोश के चलते बीच-बीच में विक्षेप का शिकार होता रहता है।

ऐलय्या किताब में जब-जब एक निजी नज़रिये से चीज़ों को विश्लेषित करते हैं तो उनकी बात तीर की तरह पैनी होती है और अचूक होती है। जैसे कि उन्हे स्कूल में कभी फुले और आम्बेडकर के बारे में नहीं पढ़ाया गया.. लेकिन ऐसी घटनाओं से वे अपने हड़बड़ाए निष्कर्ष निकालने में सरलीकरण और सामान्यीकरण के शिकार हो जाते हैं।

कांचा ऐलय्या की ये भी प्रस्थापना है कि ब्राह्मण जाति गैर उत्पादक और निष्क्रिय शक्ति है। मुझे यह एक झाड़ूमार बयान लगता है क्योंकि यदि वेद-पुराण, पठन-पाठन, अध्यात्म और दर्शन सब गैर-उत्पादक क्रियाएं हैं तो फिर वे आधुनिक विश्वविद्यालयों में कार्यरत उनके अपने जैसे प्राध्यापकों के काम और अपनी इस किताब की भी उपयोगिता को कैसे सही ठहरा पाएंगे?

वे भी तो न तो खेत में हल चला रहे हैं और न पत्थर ढो रहे हैं.. बन्द कमरे में बैठ कर अपने वर्ग/जाति के हितों के लिए तर्कों का एक तानबाना बुन रहे हैं। आम जनता द्वारा एकत्रित कर से अपना वेतन पाने वाले ऐलय्या जी ब्राह्मणों पर भी तो यही करने का तो आरोप लगा रहे हैं। मगर इस विरोधाभास को वो चिह्नित नहीं करते उलटे वे मानते हैं कि हज़ारों सालों से उत्पादन से दूर रहने के कारण ब्राह्मण-बनिया एक ठस, तर्कहीन, अविवेकी और हिंसक मानस में कै़द हो गया है।

ऐलय्या मानते हैं कि पिछड़ी जाति से आने वाले नवक्षत्रिय हाल में सत्ता में भागीदारी पा गए हैं मगर सत्ता मिलते ही वे भी ब्राह्मणवादी रंग में ढल गए हैं। दक्षिण की पिछड़ी जातियों के उभार और उत्तर में भी उसकी अनुगूँज को रेखांकित करते हुए ऐलय्या जी भूल जाते हैं कि बुद्ध कालीन नन्द वंश, मौर्य वंश, और आल्हा ऊदल जैसे अनेको मध्यकालीन योद्धा भी उच्च जातियों के न होते हुए भी सत्तावान थे और ब्राह्मण उनकी सेवा में थे।

शिवाजी के राज्याभिषेक करने से महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने इनकार ज़रूर कर दिया था मगर काशी के ब्राह्मणों ने ये सम्मान हाथ से जाने नहीं दिया। बाद के वर्षों में पेशवा के सेनापतियों में भोंसले, होलकर और शिन्दे भी उच्च जातियों से नहीं थे। एक तरफ़ वो एक ब्राह्मण पेशवा के सेवक थे और दूसरी ओर तमाम ब्राह्मण उनके आश्रित थे। इतिहास में ब्राह्मणों और पिछड़ी जातियों,शूद्रों और दलितों का सम्बन्ध इतना सरल एकांगी नहीं रहा है जितना अक्सर विद्वजन पेश करते रहे हैं।

ऐलय्या इच्छा ज़ाहिर करते हैं कि दलित बहुजन, पिछड़ी, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों का मिलाजुला मंच तैयार हो मगर किताब लिखने के दस साल भीतर ही मायावती ने उनकी इच्छाओं को नज़रअंदाज़ कर के ब्राह्मणों के साथ साझीदारी कर ली है।

एक तरफ़ तो ऐलय्या नेहरू, गाँधी आदि तथाकथित बुद्धिजीवियों को अंग्रेज़ो द्वारा ढाला गया बताते हैं दूसरी तरफ़ आम्बेडकर और फुले के उभार को स्वीकार करना अंग्रेज़ो की मजबूरी बता कर फिर एक बार सुविधाजनक तर्क इस्तेमाल करते हैं। वे मानते हैं कि उपनिवेशवाद ने भी ब्राह्मणवाद की ही मदद की.. पर ऐसा करते हुए वे आम्बेडकर को मिले ज़बरदस्त ब्रिटिश सहयोग को झुठला देते हैं।

ऐलय्या बराबर परिवर्तन में भौतिक स्थितियों की भूमिका को नकारते हुए किसी वर्ग या जाति की सनक और दुराग्रहों को ही ज़िम्मेदार ठहराते जाते हैं। ऐलय्या कहते हैं कि तीन हज़ार साल में अकेले आम्बेडकर ऐसे थे जिन्होने महार घर में जन्म लेकर दलितबहुजन चेतना को जन्म दिया। ऐसा कहते हुए वे रैदास, दादू और कबीर को भूल जाते हैं क्या उनकी आध्यात्मिक चेतना भी सिर्फ़ ब्राह्मणवादी चेतना थी या समाज भौतिक रूप से उस परिवर्तन के लिए तैयार नहीं हुआ था जो फुले और आम्बेडकर अपने समय में अंजाम दे सके?

ऐलय्या जी की शिकायत है कि भारत में ब्राह्मणों ने दलितबहुजन के प्रति एक साज़िश के तहत चुप रखकर उन्ह बहिष्कृत किया गया है जबकि योरोप में परस्पर विरोधी संस्कृतियों को भी अपने इतिहास में जगह दी गई है। एक तो वैसे ही भारतीय स्रोतों को ऐतिहासिक स्रोत नहीं गिना जाता यदि ऐलय्या जी उन्हे यह दरजा दे रहे हैं तो पूछा जा सकता है कि पौराणिक आख्यानों में असुर कौन हैं, राक्षस कौन हैं, नाग कौन हैं, दैत्य कौन हैं.. क्या वे विरोधी संस्कृतियों की उपस्थिति नहीं हैं बावजूद इसके कि इस उपस्थिति में एक संस्कृति के गुण और दूसरी के दोष बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किए गए हैं?

ऐलय्या जी अपने किताब में बार-बार बताते हैं कि हिन्दू धर्म संसार का सबसे उत्पीड़क धर्म है और इस्लाम और ईसाईयत आध्यात्मिक लोकतांत्रिक धर्म हैं। वे विभिन्न धर्मों के प्रति कैसी भी राय बनाने और रखने के लिए स्वतंत्र हैं मगर जातीय विभाजन के चारित्रिक दोष के आधार पर हिन्दू धर्म के बारे में यह निर्णय अतिरंजित है।

क्या हिन्दू धर्म इसलिए अलोकतांत्रिक है कि वे उसके भीतर रहते हुए आप किसी भी पूजा-पद्धति और आध्यात्मिक परम्परा को अपनाने और अपनी नई चलाने के लिए भी स्वतंत्र है? तथाकथित लोकतांत्रिक धर्म इस्लाम और ईसाईयत भी आप को यह विकल्प नहीं देते।

दूसरी तरफ़ हिन्दू धर्म छोड़ने पर भी गोवा में कथोलिक ब्राह्मण और मछुआरों के बीच का जातीय विभाजन कम नहीं हो जाता यहाँ तक कि उनके चर्च भी अलग-अलग होते हैं। अमरीका जैसी महान लोकतांत्रिक संस्कृति में भी काले और गोरे चर्चों का भेद आज भी बना हुआ है।

मोहम्मद साहब ने इस्लाम में सबकी बराबरी की बात ज़रूर की है मगर अरब में सिर्फ़ मुसलमान ही रहेंगे और खलीफ़ा सिर्फ़ क़ुरैश से ही होगा क्या यह आग्रह किसी जातीय र्रंगत से मुक्त है? भारत में अंसारी और सैय्यद क्या एक बराबर हैं? इस्लाम के भीतर स्थानीय संस्कृति के आयामों के लिए कितना स्थान है? क्या वो बहुत हद तक अरब संस्कृति में ही केन्दित नहीं है?

दोष-दर्शन करना हो तो इस्लाम और ईसाईयत में भी हज़ारों दोष गिनाए जा सकते हैं। ईसा की करूणा से द्रवित होने वाले यूरोपी लुटेरे लैटिन अमरीका की मूल अमेरी जनजाति का संहार पादरियों के आशीर्वाद के साथ करते थे क्योंकि उनके अनुसार जो ईसाई नहीं वे जीने योग्य नहीं थे। उत्तरी अमरीका में वहाँ आज की मूल रेड इंडियन की जनसंख्या क्या है? क्या वे सब ज़हर खा के मर गए या एक गहरी नफ़रत की नीति के तहत उनका क़त्ले आम किया गया?

ऐलय्या साहब मानते हैं (बिना किसी प्रमाण के) कि आर्य ब्राह्मण बाहर से आए और उन्होने यहाँ के मूल दलितबहुजन को अपदस्थ कर दिया। । यदि एक पल के इसी कहानी को ऐतिहासिक सच्चाई मान भी लिया जाय तो क्या वे प्राचीन आर्य ब्राह्मण आधुनिक आतताईयों से भी गए गुज़रे इसलिए हुए क्योंकि उन्होने बजाय दलित बहुजन का सफ़ाया करने के बजाय उनके साथ एक सामाजिक संयोजन बनाया और एक ही सामाजिक व्यवस्था में रहने का विधान बनाया?

कांचा ऐलय्या की यह किताब हिन्दुत्व दर्शन और संस्कृति की कोई विवेकपूर्ण जाँच नहीं करती बल्कि पूर्व नियोजित निष्कर्ष अपने पाठक पर थोपती है और बताती है कि हिन्दू धर्म का हर एक आयाम सिर्फ़ दलित बहुजन का उत्पीड़न करने के लिए ही है। बड़े दुःख की बात है कि अपनी इस अतिवादी सोच का विस्तार करते हुए वे अपनी चिन्तन शैली में उन्ही हिन्दुत्व वादियों के साथ जा कर खड़े हो जाते हैं वे जिनका इतना भीषण विरोध कर रहे हैं।

हिन्दुत्ववादी मानते हैं कि देश की हर समस्या का कारण मुसलमान और इस्लाम हैं और ऐलय्या घोषणा करते हैं कि सब मुसीबत ब्राह्मणों की खड़ी की हुई है। इस तरह के ब्लैक एंड व्हाईट नज़र से सच्चाई को पकड़ने की उम्मीद बेमानी है। और अन्ततः कांचा ऐलय्या साहब भी निराश ही करते हैं।

कांचा ऐलय्या साहब का सोचना है कि भारत में हिन्दूकरण का जवाब दलितीकरण होना होगा- मतलब ये कि हिन्दुओं को दलित संस्कृति और मूल्यों से सीखना होगा। मुझे उनके इस विचार से कोई दिक़्क़त नहीं.. मेरा स्वयं का भी मानना है कि हिन्दू (भारतीय) संस्कृति ऐसी सड़ाँध भरी अवस्था में पहुँचती जा रही है कि जिसमें उसे बहुत कुछ भूलने और बहुत कुछ फिर से सीखने की ज़रूरत है।

और अपने उन बन्धुओं से तो ज़रूर जिनके ऊपर हज़ारों साल तक उच्च जातियाँ अत्याचार करती रहीं। पर मेरा ऐतराज़ इस दलितीकरण शब्द है। ये ठीक है कि गाँधी जी के हरिजन के जवाब में तत्कालीन राजनीति के परिदृश्य में दलित शब्द उपयुक्त था जो ऐतिहासिक उत्पीड़न की स्मृति अपने कलेजे में छुपाए था। मगर आज जब समाज के दलितीकरण की बात होने लगी है तो अच्छा हो कि हम एक नया शब्द ईजाद करें जो एक सकारात्मक भाव जगाता हो।

मित्रगण मुझे माफ़ करेंगे कि मैं ऐलय्या जी की किताब के नकारात्मक पहलुओं की ही चर्चा कर रहा हूँ जबकि किताब पढ़ते हुए तमाम मौकों पर मैं अपने पुरखों पर शर्मसार भी होता रहा और अपनी संस्कृति के उन पहलुओं पर विक्षुब्ध भी होता रहा जो मनुष्य-मनुष्य में भेद करती रही। इस विषय में रुचि रखने वाले मित्रो से निवेदन है कि वे किताब हासिल कर के खुद पाठ करें.. और अपनी राय क़ायम करें। किताब कलकत्ता के साम्य प्रकाशन (१६ सदर्न एवेन्यू, कोलकाता) ने छापी है और मूल्य है मात्र १२० रुपये, हिन्दी अनुवाद किया है ओमप्रकाश वाल्मीकि ने।

गुरुवार, 24 अप्रैल 2008

ओशो इन्टरनेशनल मेडीटेशन रिसार्ट

रजनीश मुझे काफ़ी पहले से अच्छे लगते रहे हैं. उनके गुरुआई का मैं क़ायल रहा हूँ। नाक सीधे पकड़नी हो या घुमा के.. वो दोनों तरह से पकड़ने की महिमा गा कर आप को चकाचौंध कर सकने की प्रतिभा रखने वाले गुरु थे। कबीर को कबीर बन कर और नानक को नानक बनकर समझा सकने वाले गुरु रहे वो। बहुत ही पहुंचे हुए आदमी थे।

ये गोरी चमड़ी वाले लोग, जिन्होने डेढ़ सौ बरस राज किया हमारे ऊपर, को ओशो, अंग्रेज़ी के अपने निहायत देसी उच्चारण के बावजूद कुत्ता बनाकर रखते थे। इसे गाली न समझा जाय! कुत्ता जैसे स्वामी के आगे पीछे भक्ति भाव से डोलता है.. वैसे ही ये गोरे भी डोलते रहे।

अमरीका जा के भी डंका बजा आये थे.. पर जाने क्या साउंड बैरियर तोड़ दिया कि अमरीका वालो ने इनको टिकने ही नहीं दिया। कुछ लोगों का आरोप है कि वहाँ कि क्रिश्चियन लॉबी को इनका ‘नैतिक भ्रंश’ रास नहीं आया। कुछ लोगों का कहना है कि अमरीका से उनके निकाले जाने के पीछे अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और उनके पीछे पोप का दुराग्रह था। और वो सिर्फ़ अमरीका ही से नहीं निकाले गए.. पूरी दुनिया में वो जहाँ-जहाँ गए उन्हे विरोध का सामना करना पड़ा।

अमरीका से निकलने के बाद ओशो ने दुनिया की सैर करने का मन बनाया पर ग्रीस, स्वीडन, इंगलैंड, आयरलैंड, स्पेन, स्विटज़रलैंड, सेनेगल, उरुग्वे कहीं भी उन्हे जमने नहीं दिया गया। कुल मिलाकर सत्रह देशों से खदेड़े गए और कई जगह तो एयरपोर्ट से ही वापस लौटा दिया गया.. जैसे वो कोई प्लेग की बीमारी हों! ध्यान दिया जाय इन देशों में से कोई भी ‘मुस्लिम’ देश नहीं था.. लगभग सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश थे।

पहले तो ओरेगॉन की बिग मडी रान्च में बसे रजनीशपुरम को अवैध घोषित किया गया क्योंकि वहाँ धर्म को राज्य के साथ मिलाया जा रहा है.. ये वो देश कह रहा था जिसकी करेन्सी - हर डॉलर पर छपा रहता है – इन गॉड वी ट्रस्ट! हद है!

इस घटना के बाद जब ओशो की सचिव माँ आनन्द शीला के खिलाफ़ एक हत्या का मामला सामने आया तो पुलिस ने जाँच के बहाने ओशो को गिरफ़्तार करके बारह दिन तक अमरीका की छै जेलों की सैर कराई। उनके ऊपर तमाम क़ानूनों के अन्तर्गत चौंतीस केस बनाए गए.. और ये सब अवैध तरीके से। ओशो ने बिना प्रतिवाद किए अमरीका छोड़ देने का फ़ैसला किया। अमरीकी लोकतंत्र से उनकी आस्था उठ चुकी थी। उन्हे विश्वास हो चला था कि अमरीका ऐसे अपराधियों का देश है जो आज़ादी का मन्त्र का जाप करते हैं।

अमरीका जाने से पहले ओशो ने अपनी बेबाक ज़बान में भारत तथा उसकी संस्कृति को काफ़ी गरियाया था। क्योंकि पुणे में उनके आश्रम के खुले वातावरण और रजनीश के उकसाने वाले वक्तव्यों के चलते धार्मिक कट्टरपंथी उनसे खासे खफ़ा थे। पुणे में एक सभा के दौरान उन पर एक व्यक्ति ने चाकू से हमला भी किया। सरकार ने उनके आश्रम में आने वाले विदेशी भक्तों के ऊपर रोक-टोक लगाना शुरु कर दिया और आश्रम के ऊपर भी कुछ क़ानूनी दाँव-पेंच निकाले।
जिस से खफ़ा होकर ओशो ने दुनिया के ‘सबसे सुनहरे’ देश अमरीका की ओर रुख किया। पर वहाँ जो हाल हुआ उसने उनका दिल ही नहीं तोड़ दिया- बाद में उनके डॉक्टर ने भी ये भी आशंका व्यक्त की वहाँ पर दिए गए ज़हर ने ही उनकी जान ले ली। पर विडम्बना यह है कि आखिरकार ओशो को पुणे की धार्मिक संकीर्णता ने ही शरण दी। जिस को गरिया कर भागकर वो पश्चिम के खुलेपन में अपना आश्रम बनाने गए थे.. पर नहीं बना सके।

बताइये! ओशो की ही तरह हमारा पढ़ा-लिखा अंग्रेजी तबका अपने ऐसे देसी देशवासियों को दकियानूसी, पोंगापंथी और न जाने क्या-क्या बताता है.. और अमरीकी संस्कारों में नित नए रूपों में ढला जाता है। पर वो दकियानूसी-पोंगापंथी रजनीश को पचा जाता है.. पर अमरीकी लिबरलिज़्म अपने समाज की सहज नैतिकता का एक धार्मिक आवरण नहीं स्वीकार पाता। क्या पाखण्ड है भाई अमरीकी समाज का!

यहाँ यह याद दिला देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि रामकथा बखानने वाले मुरारी बापू भी ओशो का श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं और उन्हे महात्मा मानते हैं। साथ ही साथ यहाँ यह भी याद करा दूँ कि इस बात को किन्ही रामभक्तों की शुद्ध आपराधिक साम्प्रदायिकता का अनुमोदन न समझा जाय! वो हमारे समाज का एक अपना फोड़ा है।

खैर.. रजनीश उर्फ़ ओशो तो निकल लिए.. पर चेले छोड़ गए पुणे में। चेलों में काफ़ी उठापटक भी चलती रही काफ़ी बाद तक। पर यहाँ का जो आश्रम है.. वो अब आश्रम नहीं रिसार्ट है- ओशो इन्टरनेशनल मेडीटेशन रिसार्ट। पहले तो इतना नहीं खटका पर जब साइलेंट टुअर के हिस्से के बतौर हमें जो आधे घंटे की वीडियो फ़िल्म दिखाई गई, उसे देखकर हमें समझ आ गया कि जन्नत की हक़ीक़त क्या है।

यह फ़िल्म एक ऐसे दर्शक को सम्बोधित थी जो इंडिया के बारे में कुछ नहीं जानता। उसका जहाज मुम्बई पर लैंड करता है वहाँ से डेकन एक्सप्रेस पकड़कर वो लोनवला की मिस्टीरियस पहाड़ियों को देखता हुआ पूना आ जाता है, जहाँ पर ऒशो रिसार्ट है। फ़िल्म आगे बताती है इस दर्शकों को कि इस रिसार्ट में क्या क्या गतिविधियां होती हैं और कुछ ऐसे लोगों के अनुभव बाते जाते हैं जो इस सुविधा का लाभ ले चुके हैं। फ़िल्म में दिखाई देने वाले ये चार-पाँच चेहरे सभी गोरी चमड़ी वाले हैं जो दिन में तो भूरे रंग की आध्यात्मिकता के लबादे पहन कर इधर-उधर डोलते रहते हैं पर रात में शराब और शबाब की रंगीनियों में खो जाते हैं।

दिन में समाधि और रात में सम्भोग। समझ नहीं आता कि ये लोग सम्भोग से समाधि की ओर जा रहे हैं या समाधि से सम्भोग की ओर। या फिर सम्भोग और समाधि के सतत चक्र में हैं.. भैया जहाँ तक हम जानते हैं.. जब भगवान श्री रजनीश ने ‘स से स की ओ’ लिखी थी तो उनका मतलब था कि स से चल कर स तक पहुँचना है.. ये थोड़ी कहा था कि वापस स पर लौट आना है। एक ही न ऊर्जा है! उसे आप स में खर्च कर देंगे तो स के लिए क्या बचेगा? और ये बात कोई रजनीश कोई ओशो अपने मूलाधार से निकाल के थोड़ी लाए थे? पूरी भारतीय धर्म की परम्परा इसी तथ्य पर आधारित है।

खैर छोड़िये इस बात को… हमें बस ओशो रिसार्ट जा कर एक बात का एहसास हुआ कि गोरा आदमी भले ही व्यक्तिगत तौर पर काले और भूरे आदमी को अपने से हीन न समझता हो या व्यक्तिगत तौर पर ज़ाहिर न होने देता हो पर तमाम ऐसे छोटे-छोटे रूप हैं जिनसे उनका ये रंगाग्रह ज़ाहिर हो जाता है। पर वे ये नहीं समझते कि जिस छोटे से आश्रम की चहारदीवारी में बंद हो कर वे अपने को धन्य-धन्य समझ रहे हैं.. उस के बाहर तमाम ऐसे भूरी चमड़ी वाले ठलुए, थोक के भाव, घूम रहे हैं जो उन्हे अपनी जटाओं में बाँधकर सहस्रार की सैर करवा सकते हैं।

इसके अलावा मैंने ऐसे सभी आश्रमों में देखा है कि इस की दीवारों के भीतर जाने वाले लोग मुक्ति की तड़प ले के जाते हैं और आश्रम की उन दीवारों के बन्दी होकर रह जाते हैं..क्यों? मेरे मित्र कमल भाई बताते हैं कि असल में आश्रम एक तरह का कॉरपोरेशन है.. वो तो यहाँ तक कहते हैं कि कॉरपोरेशन की अवधारणा का विकास आश्रम/मठ की अवधारणा से हुआ है। तो किसी भी अन्य कॉरपोरेशन की तरह हर आश्रम शुरु तो होता है सामाजिक हित के लिए पर जल्दी ही अपने हित साधने लगता है।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...