सोमवार, 30 जून 2008
अगली बार कहीं और मिला जाय!
इसी मसले पर एक अमरीकी नागरिक ने एक फ़िल्म का निर्माण किया- सुपरसाइज़ मी! यह नाम मैक्डोनाल्ड्स के सुपरसाइज़ बरगर्स से प्रेरित है जिसे पहली बार खाकर फ़िल्म के नायक और निर्माता-निर्देशक मॉर्गन स्परलॉक उलटी कर देते हैं। वो बात अलग है कि शीघ्र ही उनका शरीर इस मात्रा के लिए लचीला रुख अख्तियार कर लेता है। और फिर उन तीस दिनों में उनके शरीर की क्या दुर्दशा होती है जिस दौरान वे सिर्फ़ और सिर्फ़ मैक्डोनाल्ड्स के आउटलेट्स से मिलने वाली सामग्री से ही अपनी शरीर की खाद्य आपूर्ति कर रहे थे इसे आप फ़िल्म देखकर यहाँ से जानिये। यहाँ पर आप कई दूसरी डॉक्यूमेन्टरीज़ भी देख सकते हैं।
इस फ़िल्म की खबर मुझे भाई अफ़लातून से हुई जब वे अपनी पत्नी स्वाति जी समेत मुम्बई पधारे। वे दोनों गुजरात के एक प्राकृतिक स्पा से स्वास्थ्यलाभ कर के लौट रहे थे। आठ दिन की उस अवधि में उन दोनों का वजन साढ़े पाँच किलो कम हो गया। इसी सन्दर्भ में इस फ़िल्म का भी ज़िक्र आया। मित्रों को याद होगा कि पिछले दिनों अफ़लातून भाई की तबियत कुछ नासाज़ थी।
अफ़लातून जी के साक्षात दर्शन हम सब ने पहले दफ़े गोरेगाँव पूर्व के जावा ग्राइण्ड कैफ़े में तारीख २२ जून को किये। इस अवसर पर अनिल रघुराज, प्रमोद सिंह, विमल वर्मा, बोधिसत्व, शशि सिंह, हर्षवर्धन, और विकास मौजूद थे। और मैं तो था ही। लगभग चार घण्टे तक चली इस मुलाक़ात में तमाम आर्थिक, राजनैतिक और ब्लॉगिक मुद्दो पर खूब विचार-विमर्श हुआ। अफ़लातून भाई तो अपने फ़ितरत के अनुसार मजमा लगाने लग पड़े ही थे मगर स्वाति जी उन्हे खींच के ले गईं।
स्वाति जी जिन से हमारा अन्तजालीय परिचय भी नहीं था.. उनसे मिलना भी हमारे लिए एक ‘स्टिमुलेटिंग एक्सपीरिंयस’ रहा और वे भी हमसे मिलकर ‘बोर’ नहीं हुई जैसा कि उन्हे अन्देशा था। तस्वीरें शशि सिंह ने खींची और पी गई कॉफ़ियों का आधा बिल विकास ने भरा जिनकी जेब नई नौकरी की पगार से गर्म थी।
अफ़लातून भाई के सम्मान में हम इकट्ठा हुए और इसी बहाने हम सब की बड़े दिनों बाद एक दूसरे से भी मुलाक़ात हुई, वरना कहाँ मिलना हो पाता है। इस मुलाक़ात का ढीला पहलू सिर्फ़ मिलन-स्थल जावा ग्राइण्ड ही रहा जो अपने संगीत से हमें थकाता रहा और उसी माहौल से हमें दबाता रहा जिसकी चर्चा हम सारे समय करते रहे! तय हुआ कि अगली दफ़े कहीं और मिला जाय।
परेशानी की बात यही है कि बाज़ार ने सारी सार्वजनिक जगहों पर क़ब्ज़ा कर लिया है (यहाँ तक कि बचे-खुचे सार्वजनिक पार्कों को भी निजी हाथों में धकेला जा रहा है) और उन्हे ऐसी जगहों मे तब्दील कर दिया है जो आप के मन-मानस को सिर्फ़ एक उपभोक्ता के बौने स्वरूप में सीमित कर देते हैं।
मैक्डोनाल्ड्स की बड़ी सफ़लता के पीछे एक राज़ यह भी है बच्चों के खेलने के मैदान शहरों में से बिला गए हैं और मैक्डोनाल्ड्स के प्रांगण में फ़्री प्ले-स्टेशन्स उग आए हैं। ये हाल अमरीका का है जहाँ की आधी से ज़्यादा आबादी इन्ही प्लेस्टेशन्स की छाया में ओवरवेट या ओबीस हो चुकी है और हमारे दलाल नेता और मक्कार अफ़रशाहों की बेईमानी के चलते यही हाल हिन्दुस्तान का भी होने जा रहा है।
अच्छा नज़ारा होगा.. एक तरफ़ गाँवों में किसान अपने गले में रस्सी कस रहा होगा और शहरों का मध्यवर्ग कमर की पेटी ढीली पर ढीली कर रहा होगा!
सोमवार, 31 मार्च 2008
फ़ैमीन ऑर फ़ीस्ट
कुछ दोस्तों की चिट्ठियाँ आईं थीं.. उनका जवाब भी नहीं दे सका.. पर क्या है कि मैं एक स्टीरियोटिपिकल मेल हूँ विद वनट्रैकमाइन्ड.. सोचा कि अब जवाब लिख दूँगा कि तब.. मगर काम में मुब्तिला रहा और कई रोज़ निकल गए..इन दिनों कुछ ग़मेरोज़गार परवान चढ़ा हुआ है.. बीबी के ही भरोसे दालरोटी खाने लगूँगा तो स्टीरियोटिपिक्ल मेल की ईगो बड़ी गहरी डैन्ट हो जाएगी.. अभी भी कुछ प्रोजेक्ट्स निबटाने शेष हैं.. फिर फ़ुर्सत से लौटूँगा ब्लॉगिंग की दुनिया में..
मेरे एक लेखकीय गुरु रहे हैं मुम्बई में - सुजीत सेन.. उन्होने अर्थ और सारांश जैसी फ़िल्में लिखी थीं.. बाद में बहुत कुछ बाज़ारू भी लिखा... पर जो भी लिखा क़लम को दिल के क़रीब रखकर लिखा.. सब बनाने वाले तो महेश भट्ट नहीं होते न.. जो मर्म की बात का मर्म समझ सकें.. उनका ज़िक्र वी एस नईपाल ने भी अपनी किताब इन्डिया अ मिलियन म्यूटिनीज़ में भी एक छद्म नाम से किया है*.. सुजीत दा की एक बात हमारी फ़िल्म और टीवी इन्डस्ट्री के बारे में बड़ी सटीक थी.. वे कहते थे.. इन दिस इन्डस्ट्री.. इट्स आइदर फ़ैमीन ओर फ़ीस्ट.. नथिंग इन बिटवीन..
यही सूरतेहाल है.. बस यहाँ फ़ीस्ट और फ़ैमीन का अर्थ समय के सन्दर्भ में समझा जाय.. और फ़ीस्ट का अर्थ काम की बहुतायत निकाला जाय या रचनात्मक आराम की बहुतायत.. यह निर्णय आप खुद करें..
*ढाई बरस पहले पाँच दिल के दौरे झेलने के बाद सुजीत दा चल बसे..
शनिवार, 15 दिसंबर 2007
ब्लॉग हो ब्लॉगर मिलन न हो..
"ये निहायत लिजलिजी बात है। शहरी जीवन में अकेलेपन और अपने निरर्थक होने के एहसास को तोड़ने के दूसरे तरीके निकाले जाएं। ब्लॉग एक वर्चुअल मीडियम है। इसमें रियल के घालमेल से कैसे घपले हो रहे हैं, वो हम देख रहे हैं। समान रुचि वाले ब्लॉगर्स नेट से बाहर रियल दुनिया में एक दूसरे के संपर्क में रहें तो किसी को एतराज क्यों होना चाहिए। लेकिन ब्लॉगर्स होना अपने आप में सहमति या समानता का कोई बिंदु नहीं है।"
इसी लेख में ठीक ऊपर आप ने कहा है कि 'ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो' और फिर यह बात? बात साफ़ नहीं हो रही कि आप सहमति के पक्षधर हैं या नहीं? और ब्लॉगर होना अपने आप में एक समानता का बिंदु क्यों नहीं है..? या आप की राजनीति कहती है कि मजदूर संगठित हों, किसान संगठित हों, दलित संगठित हो पर ब्लॉगर्स न हो? और ब्लॉगर्स के संगठित होने का जो मंच बन सकता है- ब्लॉगर मिलन- वो न हो?
और क्यों यह शहरी अकेलेपन को दूर करने का छ्द्म उपाय है? अपने ख्यालों की आज़ाद अभिव्यक्ति करते इतने सारे लोग एक दूसरे से मिलें, उन प्रश्नों पर चर्चा करें जिसके बारें में वे सोच रहें हैं और एक दूसरे को साक्षात मनुष्य के रूप में जानें .. इस में क्या ग़लत है? ब्लॉग तो उस साक्षात संवाद का विकल्प है जो वास्तविक जीवन में गायब हो रहा है। इसलिए हम जिसे पढ़ रहे होते हैं उसके बारे में जानने की स्वाभाविक इच्छा उमड़ती है.. जिसकी वजह से हम लोगों का प्रोफ़ाइल देखते-पढ़ते हैं.. और जिनका पढ़ा पसन्द करते हैं उनसे मिलने के लिए उत्सुक रहते है। यह मानवीय व्यवहार है.. ऐसी भावनाओं को छाँट देंगे तो मनुष्य शुष्क वैचारिक मशीन भर रह जाएगा।
मुझे लगता है दिलीप मानवीय व्यवहार के बारे में निर्णय सुनाने में हड़बड़ी कर रहे हैं.. । मेरी समझ में तो मनुष्य सामाजिक प्राणी है जहाँ रहेगा एक समाज बना कर एक दूसरे से जुड़ेगा.. वैचारिक तौर पर भावनात्मक तौर पर। ‘ये हो और ये न हो’ जैसी घोषणाएं कर के हम सिर्फ़ मनुष्य की सम्भावनाओं को सीमित करने कोशिश करते हैं। काँट-छाँट की इसी मानसिकता से सभी दमनकारी विचारधाराएं जन्म लेती हैं!
मंगलवार, 11 दिसंबर 2007
समीर भाई को साधुवाद!
पिछले दिनों समीर भाई की उड़नतश्तरी मुम्बई में उतरी.. और समीर भाई के साधुवाद का साक्षात दर्शन और आभार प्रदर्शन करने के लिए मुम्बई के सारे ब्लॉगर उमड़ पड़े.. पहले ये आयोजन अनीता जी के घर पर होना था.. जो ठाणे की खाड़ी के उस पार है। मगर आखिरी मौके पर बोधि भाई ने इसे ठाणे की खाड़ी के इसी पार, आरे की झील पर, खींच लिया.. हम इस पर अफ़सोस करते रहे कि अनीता जी हम सब की मेहमाननवाज़ी से और हम सब उनकी मेज़बानी से वंचित हो गए पर अन्दर ही अन्दर हम इस स्थान परिवर्तन से प्रसन्न भी रहे ये जो कि सबसे पास हमारे घर से ही था।शशि जी ने समीर भाई को ले आने की ज़िम्मेदारी स्वतः उठा ली थी और बखूबी निभाई.. ये अलग बात है कि लोग बाद में देर तक इस पर हैरान होते रहे कि समीर भाई को लाने की ज़िम्मेदारी को उन्होने उठाया कैसे !
इस तरह सब की हथेलियों में गरमी आ जाने के बाद लोगों के हाथों में कुछ खुजली से होने लगी.. और सब एक दूसरे की तस्वीर खींचने में व्यस्त हो गए..
(सबसे नीचे की सामूहिक तस्वीर में बाएं से दाएं: अनीताजी, युनुस, समीर भाई, बोधिसत्व, प्रमोद भाई, विकास, अनिल भाई, शशि सिंह और विमल भाई।
उसके ठीक ऊपर की तस्वीर में कत्थई कमीज़ में हर्षवर्धन)
बुधवार, 28 नवंबर 2007
आई आई टी से निकला ब्लॉग बुद्धि
माफ़ी चाहता हूँ बात शुरु होते ही बीच में चली गई। क्रम से बताता हूँ । कल शाम यानी बुधवार २७ नवम्बर को सात बजे से आई आई टी के सुरम्य प्रांगण में एक ब्लॉगर मिलन सम्पन्न हुआ। इस में शामिल होने वाले थे मेज़बान मनीष (जो स्वयं मुम्बई के मेहमान हैं) और विकास के अलावा अनीता कुमार, अनिल रघुराज, विमल वर्मा, प्रमोद सिंह, युनुस खान और मैं।
इसी निर्मल-आनन्द के बीच अनीता जी ने विकास को प्यार से झिड़का कि कुछ काम क्यूं नहीं करता और तुरन्त आज्ञाकारी बालक की तरह विकास ने अनीता जी के लाए नाश्ते/मिठाई को हम सब के हाथ में धकेल दिया। हम उन्हे इस को धन्यवाद दे रहे थे मगर उन्होने इसे अपने महिला होने का विशेषाधिकार कह कर टाल दिया।
(जिन्हे स्माइली की कमी महसूस हो रही हो वे कल्पना से यहाँ वहाँ टाँकते हुए चलें और जो खुले और छिपे रूप से स्माइली से चिढ़ते हैं वे देख सकते हैं कि उन्हे आहत करने योग्य यहाँ कुछ भी नहीं है!)
(तस्वीर में बाएं से दाएं: मनीष, अनिल भाई, युनुस, विमल भाई, विकास, प्रमोद भाई और कुर्सी पर अनीता जी)
तरल और सरल बातें तो बहुत हुईं पर एक ठोस बात ये हुई कि सभी ने अपनी तकनीकि कठिनाईयों का रोना रोते हुए पिछली ब्लॉगर मिलन में आशीष से की हुई गुज़ारिश और फ़रमाईश को याद किया। जिस पर विकास ने तपाक से इस काम को अपने दोनों हाथों से लूट लिया और देखिये उत्साही बालक ने काम शुरु भी कर दिया.. ब्लॉग बुद्धि नाम के इस ब्लॉग पर विकास पर अपने बुद्धि से जो विषय समझ आएंगे उस पर तो लिखेंगे ही साथ ही साथ आप सब की तकनीकि समस्याओं का समाधान भी करेंगे। आप को किसी भी प्रकार की तकनीकि तक्लीफ़ हो.. आप उन्हे मेल करें। वे हल मुहय्या करने की भरपूर कोशिश करेंगे ऐसा क़ौल है उनका..।
और हाँ विकास का नाम अंग्रेज़ी में Vikash लिखा ज़रूर जाता है.. पर पुकारने का नाम विकास ही है।
ये ब्लॉगर मिलन मेरे लिए इस लिए खास यूँ भी रहा कि मनीष ने बहुत कहने के बाद जब गाना नहीं गाया तो प्रमोद जी के कहने पर विमल भाई ने हमारे छात्र जीवन का एक क्रांतिकारी गीत गाया, मैंने और अनिल भाई ने साथियों की भूमिका ली। तन मन पुरानी स्मृतियों और अनुभूतियों से सराबोर हो गया। प्रमोद भाई को गाना याद था पर वे चुप रहे। बाद में उन्होने कहा कि उन्हे गाने के अनुवाद और धुन दोनों से शिकायत रही.. हमेशा से। आज जब विमल भाई ने इसे अपने ब्लॉग पर छापा तो मैंने ग़ौर किया कि तसले को बड़ी आसानी से थाली से बदला जा सकता है.. ह्म्म.. प्रमोद भाई की सटीक नज़र..
अनीता जी को दूर जाना था, उनसे फिर मिलने का वादा कर और विदा ले कर हम ने थोड़ा सा कुछ खाया-पिया और फिर चलने के पहले पवई झील के किनारे चाँदनी रात का कुछ लुत्फ़ उठाया!
शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2007
कानपुर में खालिस की खोज
आगे का हाल तो आगे देखा-लिखा जाएगा.. मगर पहले पीछे का हाल.. बात दिल्ली छोड़ने तक पूरी हो गई थी.. अब आगे कानपुर.. मेरी जन्मस्थली.. बचपन से ले कर अब तक मैंने कुल तेरह चौदह साल इस शहर में बिताए हैं.. पापाजी के रिटायर होने पर इसी कानपुर के आज़ाद नगर में एक प्लॉट पर मकान बनवाने में उनका सहयोग करने हेतु सब काम-धाम छोड़कर छै महीने भी गुज़ारे.. पापाजी का तो देहान्त हो गया तीन बरस पहले.. अब मम्मी, बीच वाला भाई, भाभी और उनके बच्चे रहते हैं यहीं कानपुर में.. पिछले सात-आठ साल से यही नियम चला आ रहा है.. जब भी मुम्बई से निकलता हूँ तो सीधे कानपुर के लिए.. दिल्ली के रास्ते से.. बड़े भाई से मिलते हुए कानपुर.. और फिर वापस.. घुमक्कड़ी के अरमान बहुत हैं मन में पर पूरे नहीं हुए अभी.. इस बार कुछ बदलाव आने की उम्मीद ज़रूर है.. साइकिल पर भारत भ्रमण करने वाले अनूप जी के साक्षात दर्शन जो हो गए.. इस मिलन का कुछ तो असर होना चाहिये..कानपुर पहुँच कर एक दो दिन तो अपने खाने पीने का विशेष इन्तज़ाम करने में चले गए.. ये बात कम ही लोग जानते हैं कि मैं पिछले एक साल से ज्वार की रोटियाँ खा रहा हूँ..स्वास्थ्य के कारणों से.. चीनी की जगह खाँड और भैस के दूध-घी की जगह गाय का दूध-घी.. तो कानपुर में कुछ समय इन चीज़ों की तलाश में दिया गया.. परिणाम आश्चर्यजनक थे.. ज्वार सिवाय कलक्टरगंज के थोक के बाज़ार के कहीं नहीं मिला.. वहाँ भी खड़ा ज्वार ही मिला ज्वार का आटा नहीं.. देशी घी के बारे में एक स्वर से सभी डेरी वालों ने कहा.. पूरे कानपुर भर में कहीं नहीं मिलेगा..जो आप को दे दे वह झूठा.. वह धोखेबाज..
दो तीन दुधैय्यों से बात करने के बाद हम ने मान लिया कि यही सच है कि इस देश के अधिकांश भाग से गाय का असली दूध घी मिलना एक स्वप्न मात्र रह गया है.. गौ के नाम पर जान देने वाले आप को अभी भी मिल जायेंगे.. घी नहीं मिलेगा.. और उसके पॄष्ठ भाग में बिना इंजेक्शन ठोंके उसका दूध चाहने वाले.. न जी.. वे लोग भी नहीं मिलेंगे.. यहाँ यह बता देना विषयान्तर न होगा कि दूध और घी के जितने भी गुण बताये गाये गए हैं वे सभी गाय के दूध घी के हैं..रह गई खाँड.. वो हमें मिल गई देश के इलीट दुकानों पर हेल्थ कांशस जनता को बेचने के लिए बनाई गई आम चीनी से लगभग दुगुनी मँहगी ‘सुनेहरा’.. जो एक कलक्टरगंज की एक थोक की दुकान से मिली.. अभी रिटेल तक पहुँची भी नहीं थी.. तो अब पहले जैसा हाल नहीं रहा कि असली दूध घी शुद्ध माल खाने के लिए आदमी शहर छोड़कर गाँव की तरफ़ जाए.. धीरे धीरे यह मामला उलटता जा रहा है.. गाँवों और छोटे शहरों में आप को रासायनिक औद्यौगिक कचरे से भरा माल मिलेगा.. जबकि बड़े शहरों की खास-खास दुकानों पर आप प्राप्त कर सकेंगे.. ऑर्गैनिक भोज्य पदार्थ.. जैसे मैं प्राप्त करता हूँ मुम्बई में.. लेकिन फिर भी मैं ने अपने विक्रम से हासिल ही कर ली खाँड और ज्वार..गाय का घी फिर भी नहीं मिला..
अगले दिन फोन लगाया गया अनूप भाई को मुलाक़ात के लिए.. वे तो खुद ही हमें लेने आने के लिए तैयार थे मगर हमने उन्हे अपने कनपुरिया होने का आश्वासान दिलाया और खुद ही पहुँचने का वादा किया.. मगर हमारे मेहरबान साले साहब नवेन्दु भैया ने हम अनूप जी के निवास नगर आर्मापुर कॉलोनी के रास्ते की कठिन पहाड़ की ऊँचाई दिखा के विचलित कर दिया.. तो खैर उनकी कार की सुखद ठण्डक में पहुँचे हम आर्मापुर के विस्तृत वैभव में.. जो मुम्बई दिल्ली के शहराती वैभव से एक दम अलग था.. प्रकृति और सभ्यता का एक संतुलित संगम...
हमारा स्वागत किया अनूप जी के छोटे बेटे अनन्य ने.. परिचय पाते ही उसने तुरन्त हमें गुड इवनिंग ठोंक दिया.. हम और नवेन्दु भैया दोनों उसकी इस अदा से थोड़े अचकचा गए.. अन्दर जा कर हम अनूप जी और भाभी जी से मिले.. भाभी जी की बचपन की सहेली और उनके पति शुक्ल दम्पति के मेहमान-नवाज़ी का आनन्द पहले से उठा रहे थे.. हम भी बातचीत में शामिल हो गए.. बैठते ही हमारा स्वागत रसगुल्ले से किया गया.. रसगुल्ला अभी मुँह में था ही कि शुक्ल जी के बड़े सुपुत्र सौमित्र लपक कर हमारे पैर छू गए.. बताइये अब कौन भला ऐसा मीठा और सम्मान पूर्ण स्वागत पाने के बाद कुछ भी उल्टा सुल्टा लिखने की हिम्मत कर सकता है शुक्ल जी की शान में.. हमारी फ़ुरसतिया की आँखों से छलकता खून-पार्ट टू लिखने की सारी योजनाओं पर पानी फिर गया..
थोड़ी देर में भाभी जी की सहेली और और उनके पति ने विदा ली और नवेन्दु भैया भी किसी फ़र्ज की पुकार सुनने चले गए.. और राजीव टण्डन जी पधारे.. राजीव जी कम ही लिखते हैं आजकल पर जब लिखते हैं तो सब की नज़र में आ जाते हैं..लेकिन हमारी नज़र तो उस वक़्त शुक्ला जी का वैभव से चौंधियायी हुई थी.. तो निकल कर अनूप जी ने हम अच्छी तरह से अंधा कर देने के लिए अपना खेत उपवन दिखाकर उपकृत किया.. हम तो ईर्ष्यालु हुए ही.. दिल्ली में बैठे प्रमोद भाई भी एक अनजानी अग्नि में जलने लगे हैं जब से उन्हे फ़ुरसतिया के इस ऐश्वर्य का पता चला.. जीतू चौधरी की एसयूवी का उल्लेख भी आया पर उसे इस ऐश्वर्य के आगे धूरिसम माना गया.. खैर.. जैसा आप लोगों ने पढ़ा ही है कि फ़ुरसतिया हमें अपने खेत का एक बोरी धान देने वायदा कर चुके हैं.. अब कम से कम चावल तो हमें मुम्बई की इलीट ऑर्गैनिक दुकानों से तो नहीं खरीदना पड़ेगा.. ये बड़ी राहत की बात है..
आगे हम इस ऐश्वर्य में लोट लगाने के तत्पर होते उसके पहले ही हमें भाभी जी नाश्ते के लिए वापस अन्दर ले गईं..और हमारे आगे शानदार क़िस्म की पकौड़े पेश कर दिये.. हमारा सत्यवादी चरित्र पुकार–पुकार कर कहने लगा कि मना कर दे.. कह दे कि मैं ने यह सब न खाने का प्रण लिया है.. मगर हमारे अन्दर जाग रहे नए घुमक्कड़ जीव ने लचीलापन दिखाते हुए प्लेट स्वीकार कर ली और गपागप सब उदरस्थ कर लिया.. और जिस मसाले से अन्दर तक जल जाने की शिकायत मैं दिल्ली भर करता रहा.. उस मसाले की किसी तपिश का एहसास तक नहीं हुआ हमें.. शायद यह भाभी जी के पाक-कला नैपुण्य के अलावा उनके स्नेह की ठण्डक भी होगी.. निश्चित ही.. उनके स्नेह की ठण्डक का भान तो हमें बाद में भी होता रहा जब उन्होने एक ही झटके में हमारी उमर में पन्द्रह बरस घटाकर हमारी आयु में पन्द्रह बरस जोड़ दिए..
हम भाभी जी को लगातार ब्लॉग लिखने की लिए उकसाते रहे ऐसा तो अनूप जी ने बताया ही है आप को.. सच है.. और यह भी सच है कि हम उनके इस उत्तर से लाजवाब हो गए कि वह अपने सबसे बड़ी रचना प्रक्रिया -अपने बेटों के चरित्र निर्माण- से ब्लॉग लेखन के लिए समय निकालना अभी ठीक नहीं समझती.. और इस बात को मैं फिर दोहराना चाहता हूँ कि जिस खालिसपन को वस्तुओं में- ज्वार,खाँड, देशी घी आदि- कानपुर भर में तलाश कर निराश हो चला था.. वह खालिसपन भारतीय संस्कार की शक्ल में शुक्ल जी के बेटों में पाकर अन्दर तक प्रसन्न हो गया.. और उस में सुमन भाभी का ही ज़्यादा श्रेय होगा ऐसा मान लेने में मुझे नहीं लगता कि अनूप जी को भी कोई ऐतराज़ होगा..
शेष समय किस तरह क्रिकेट खेलने में, फ़ुरसतिया द्वारा कविता सुनाकर हमें पीड़ित करने की कोशिश में, और मोर देखने में बीता यह वृतांत आप अनूप जी के ब्लॉग पर पढ़ ही चुके हैं.. लौटते में अनूप जी और राजीव जी हमें छोड़ने स्वरूप नगर तक आए.. रास्ते में मोती झील की प्रसिद्ध दुकान पर चाय पान भी हुआ..दो रोज़ बाद अनूप जी और राजीव जी मेरे घर पर पधारे जिसकी रपट भी आपने देखी होगी.. उस दिन का अफ़सोस यह रह गया कि पता नहीं किस खामखयाली में उस मुलाक़ात के चित्र उतारने की बात ही मेरे दिमाग़ में नहीं आई..
फिर बड़े भाई सपरिवार दिल्ली से आ गए थे तो वे दो दिन उस पारिवारिक उल्लास में गए.. कानपुर का शेष समय मम्मी की कविताओं को पढ़ते, लैपटॉप पर छापते और मम्मी से प्रूफ़ चेक करवाते बीता.. जिस के पीछे योजना यह थी कि जिस बात का आग्रह अनूप जी सहित ब्लॉग की दुनिया के मित्र कर रहे थे, उसे पूरा कर लिया जाय.. मम्मी की कविताओं का एक अलग से ब्लॉग खोल दिया जाय.. जो शीघ्र ही होगा..
बुधवार, 26 सितंबर 2007
एक दिन दिल्ली में दोस्तों के साथ
वैसे तो हम जिस दौर में हैं जहाँ साये भी साथ छोड़ जाते हैं दोस्तों का तो कहना क्या! बावजूद उसके मुझे दोस्तों की कमी कभी खली नहीं। मेरे पुराने दोस्त मेजर संजय और प्रमोद जी से मिलने की बात थी, जगह तय हुई श्रीराम सेंटर का पुस्तक बिक्री केंद्र की, जिसे लोग दिल्ली की एकमात्र हिन्दी किताबों की दुकान मानते हैं(बाकी प्रकाशन घर हैं या वितरण के अड्डे)।
इरफ़ान मियाँ, प्रमोद भाई और अविनाश को वहाँ छोड़ अपनी नौकरी बजाने चल दिये। भूपेन अलग दिशा से आए। मैं पहुँचा। मेजर संजय चतुर्वेदी पधारे। रवीश कुमार किसी कहानी की पीछा करते हुए कुछ देर यहाँ भी उसकी बू लेते रहे।
मसिजीवी सुबह की पारी की अध्यापकी करने के बाद घर लौटने के बजाय पुरानी अड्डेबाजी का लुत्फ़ लेने यहाँ ऐसा रुके कि शाम तक रुके रहे। जब सुजाता आईं। उनके आने के पहले जमशेदपुर की रश्मि आईं, कार्टूनिस्ट पवन आए, हिन्दुस्तान के पत्रकार धर्मेन्द्र आए। और सबसे आखिर में सैय्यद मुहम्मद इरफ़ान आए। .jpg)
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कुछ दोस्तों से तो सचमुच पहली ही बार मिला। लेकिन अधिकतर से तो आभासी दुनिया का अंतरंग नाता बना ही हुआ है। लगा ही नहीं कि नए दोस्तों से मिल रहा था। बात करते रहे बैठे हुए, चलते हुए, घूमते हुए। श्रीराम सेंटर की कैंटीन में बतकही, बाहर पेड़ के नीचे चाय के अड्डे की चाय। वापस किताबों की दुकान से किताबों की खरीद और कैंटीन की कॉफ़ी। फिर बंगाली मार्केट की ओर टहलते हुए फ़्रूट मार्ट से केले और बंगाली से मिठाई और दोसा और लौटते में वापस पेड़ के नीचे बैठकी। और आखिर में साहित्य अकादमी की हरी घास पर क्षण भर से ज़्यादा।
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देश-दुनिया, टीवी-अखबार, साहित्य-समाज और एक दूसरे के निजी प्रसंगो पर बातों का सिलसिला अबाध चलता ही रहा। शाम ढल गई। अँधेरा हो गया। मेरी भाभी ने फोन पर घर लौटने की बात उठाई और मुझे अपने आजकल के अनुशासित जीवन की याद दिलाई। लोभ तो था कि रमा रहता इस दोस्ताने में देर रात तक पर दोस्ती से भरे दिल में थोड़ी जगह संतोष को भी दी। और अपने भाई के साथ लिफ़्ट ले कर वापस लौट आया।
सोमवार, 17 सितंबर 2007
फ़ुरसतिया की आँखों से छलकता खून
सबसे पहले तो ये सफ़ाई देना चाहता हूँ कि लोग आए ज़रूर थे मीट का स्वाद लेने मगर उन के साथ धोखा हुआ.. मीट के बदले केक मिला वो भी एगलेस.. फ़ुरसतिया के जन्मदिन का केक.. फ़ुरसतिया के जन्मदिन की बात बोधिसत्व ने सब को बताई और बोधि को उनकी पत्नी आभा ने घर से निकलने के बाद याद दिलाई.. (वो क्यों नहीं आई यह किसी ने नहीं पूछा).. तो उन्हे कुछ उपहार लेने का समय न मिला तो आनन-फानन नागर जी द्वारा लिखित 'मानस का हंस' की एक प्रति मेरे घर से बोधि भैया ने बरामद की और जबरिया सुकुल जी को सामूहिक तौर पर भेंट करवा दी.. मैं कहता ही रह गया कि मेरा नाम-मेरा नाम.. पर बोधि ने अपनी बलशाली काया के प्रभाव का इस्तेमाल कर के मुझे मेरे भेंट देने का यश पाने के प्राकृतिक अधिकार से वंचित कर दिया..
इस केक खाने के दौरान सबने सुकुल जी से बहुत ज़ोर देकर उनसे उनकी बुज़ुर्गी की पैमाइश जाननी चाही.. मगर फ़ुरसतिया ने बार-बार बात को दूसरी-दूसरी दिशाओं में ले जा कर पटक दिया.. हम समझ गए कि इस हठ-इंकार के पीछे अनूपजी की अपने हसीन होने में आस्था ही है.. लोगों ने इधर उधर की खूब बतकही की..और आखिरकार मेरे द्वारा धकेले जाने पर ही ब्लॉगिंग पर चर्चा करनी शुरु की.. सबसे काम की बात कम शब्दों में बोलने वालों में थे पुने से अनूप जी के साथ आए आशीष श्रीवास्तव, अजय ब्रह्मात्मज,शशि सिंह, विमल वर्मा और युनुस खान, और अनिल रघुराज ने सबसे ज़्यादा सुनकर और कम से कम बोलकर अपने बुद्धिमान होने का मुज़ाहिरा किया.. बोधिसत्व ने लोगों की इस मितभाषिता से उपजे खालीपन को महसूस नहीं होने दिया.. और वे इतना बोले कि फ़ुरसत से बोलने के लिए आए फ़ुरसतिया भी उनसे आतंकित दिखे..
(बायें से दायें: युनुस खान, अनिल रघुराज, और आशीष)बोधिसत्व ने ब्लॉग को अपनी आज़ादी का पर्याय बताया..और बहुत सारे नए लोगों तक पहुँचने का साधन..
अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि ब्लॉग उनके लिए वे सारी बातें लिखने का मंच है जिसे परम्परागत मीडिया छापना नहीं चाहता.. वे अपने ब्लॉग के ज़रिये के ऐसी नज़र विकसित करना चाहते हैं जो आमदर्शक की तरह पारदर्शी हो..
युनूस खान के लिए ब्लॉग वो जगह बनी हुई है जहाँ वे लोगों को अपने पसन्द के गाने अपनी तरह से सुना सकते हैं..
विमल जी ने कहा कि वे ब्लॉग के ज़रिये अपने भीतर एक नई लेखकीय प्रतिभा को जन्म लेते हुए देख रहे हैं.. और यह कहते ही वे ठुमकते हुए चले गए गणेश जी का आशीर्वाद लेने..
अनिल रघुराज ने कहा कि वे ब्लॉग-लेखन के सहारे अपने को खोज रहे हैं.. पागुर कर रहे हैं.. पचा रहे हैं पहले के पढ़े हु़ए को ..
(बायें से दायें: अजय ब्रह्मात्मज, युनुस खान, बोधिसत्व, अनिल रघुराज, आशीष, अनूप जी, और शशि)अनिल जी ही मेरे असली मित्र साबित हुए और मेरे रक्षार्थ घर तक आए.. फ़ुरसतिया अपने द्वारा बनाए हुए बम गोलों और तोप का भय दिखा कर अनिल जी को भी डराने की कोशिश करते रहे, मगर वे नहीं डरे.. आखिर में फ़ुरसतिया को अपने बदले की चाहत से ज़्यादा पुने में अपने बॉस की डाँट से डर लगा.. और वे जाने के लिए उठ खड़े हुए.. वे अपना इरादा न बदल दें इसलिए मैंने उन्हे स्टेशन तक भिजवा कर ही चैन की साँस ली..
(अनूप जी के उठ खड़े होने पर खाकसार के चेहरे पर आई खुशी.. आशीष और अनिल जी के चेहरे की खुशी मेरे बच जाने की हमदर्दी में है.. )*चलते चलते फ़ुरसतिया प्रमोद भाई के घर की दिशा भी पूछ रहे थे.. लगता है उनसे भी कोई पुराना हिसाब चुकाना था.. मगर प्रमोद भाई पहले ही उसे भाँप कर दिल्ली भाग खड़े हुए..
*किसने क्या कहा ..ये याद करने में मैंने बोधि की स्मृति का सहारा लिया है.. अगर कुछ ग़लती हुई तो उनको पकड़िये.. अगर सही है तो मेरी पीठ ठोंकिये..
*सभी तस्वीरें आशीष के कैमरे से

