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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

दबे पाँव



शेरजंग की शानदार किताब 'मैं घुमक्कड़ वनों का' पढ़ने के बाद उनकी दूसरी किताबों को पढ़ने की भूख लिए-लिए जब मैं मित्र बोधि के घर पहुँचा तो मेरी नज़र उनके ख़ज़ाने के एक कोने में दबी और दूसरी किताबों के बोझ से कराह रही 'दबे पाँव' पर पड़ी। ये ऐतिहासिक लेखक वृन्दावनलाल वर्मा के शिकार संस्मरणों को मुअज्जमा है। बोधि ने उदारता से किताब कवर चढ़ाकर मेरे हवाले कर दी और मैंने तो किताब पाई गाँठ गठियाई। 

किताब में वर्मा जी ने बुन्देलखण्ड के झांसी, ग्वालियर, ओर्छा आदि इलाक़ों के जंगलों में उनके शिकार के शग़ल की टीपें लिखी हैं। इन टीपों में स्यार, खरहे-खरगोश, मोर, नीलकंठ, तीतर, भटतीतर, वनमुर्गी, हरियल, चण्डूल, लालमुनियाँ, सारस, पनडुब्बियाँ, पतोखियां, टिटहरी, मगर, और जलकुत्ता जैसे जीवों के बारे में तो बात होती ही चलती है। लेकिन मुख्य तौर पर इस किताब में जंगल के बड़े जानवर चिंकारा, हिरन, चीतल, तेंदुआ, काला तेंदुआ, चीता, लकड़भग्गा, खीसदार सुअर, रीछ, साँभर, नीलगाय, नाहर या बाघ या शेर, सिंह, जंगली कुत्ते(सुना कुत्ते) और भेड़िये के व्यक्तित्व, आपसी अन्तर और व्यवहार की तमाम अनमोल जानकारियां हैं- जैसे भालू निरा बहरा होता है और नज़र का कमज़ोर होता है उसका एकमात्र सहारा उसकी नाक होती है। जब कभी किसी आदमी रूपी ख़तरे को अचानक वो अपने पास पा जाता है तो घबराकर उस पर हमला कर बैठता है। स्वभाव से वो बन्दरों की ही तरह मूलतः शाकाहारी है। या फिर लकड़भग्गा मौक़ा मिलने पर अपने ही भाई-बन्धुओं का भक्षण कर डालते हैं। हिंस्र पशुओं में तेंदुआ सबसे अधिक ढीठ होता है जबकि संसार का सबसे रफ़्तार वाला प्राणी चीता, बिल्ली की तरह पालतू बनाया जा सकता है। हालांकि चीता अब हमारे देश से लुप्त हो चुका है। इस तरह की जानकारियों के अलावा किताब में वर्मा जी के शिकार के दिलचस्प अनुभव हैं।

इस किताब को पढ़ने से जो तस्वीर ज़ेहन में खिंचती है उससे समझ आता है कि आज की तारीख़ में वन्यजीवन की हानि की इस भायनक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार दो बाते हैं- 

१) मनुष्य की बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि का होने वाला लगातार विस्तार। जिसके चलते जंगल के जानवर और मनुष्य सीधे संघर्ष में फंस गए। किताब में बार-बार यह बात आती है कि चीतल, चिंकारा, सुअर, हिरन जैसे जानवर किसानों खेत में घुसकर फ़सल का सम्पूर्ण विनाश कर देते हैं। जिसके चलते किसान या तो स्वयं मौक़ा मिलने पर इन जीवों की लाठी-डण्डों से पीट-पीटकर हत्या कर डालते हैं या फिर किसी बन्दूकधारी शिकारी के शिकार यज्ञ में भरपूर सहायता करके इन जानवरों के समूल नाश में अपनी योगदान करते हैं। और दूसरी वजह है.. 

२) बन्दूक के रूप में एक ऐसा भयानक आविष्कार जिसने आदमी और शेष प्राणियों के बीच के समीकरण को पूरी तरह से एकतरफ़ा बना दिया है। तीर की मार और गति से जानवर फिर भी मुक़ाबला कर सकता था पर गोली की मार और गति के आगे जंगल का हर पशु निरीह और बेबस है। परिणाम आप देख ही रहे हैं- नंगे व सपाट मैदान जिसमें आदमी के सिवा दूसरा जानवर खोजना मुश्किल।

किताब का एक और दिलचस्प पहलू है: क्योंकि किताब ६४ साल पहले १९५७ में छपी और उसके भी काफ़ी पहले टुकड़ों-टुकड़ों में लिखी हुई है, इसलिए उसकी भाषा थोड़ी अलग है और उसमें कुछ ऐसे शब्द और प्रयोग मिलते हैं जो आजकल पूरी तरह से चलन से बाहर हो गए हैं। मसलन-
कलोल (किलोल)
परहा (पगहा?)
लगान (लगाम?)
टेहुनी (केहुनी)
परमा (प्रथमा तिथि)
ठिया
खीस (दांत)
ढी (ढीह)
अ/आगोट (आगे की ओट)
भरका (गड्ढा)
डाँग (पहाड़ का किनारा)
झोर( झौंर, झाड़ी)
बगर (पशु समूह)
ढुंकाई / ढूँका (छिपकर घात लगाना)
ठपदार (ठप की आवाज़ करने वाला)
मुरकना (लचक कर मुड़ जाना)
ढबुआ (खेतों के ऊपर मचान का छप्पर)
दह( नदी का सबसे गहरा बिन्दु)
टौरिया (छोटा टीला)
फुरेरू (शरीर को थरथराना, कंपकंपी लेना)

और कई शब्द ऐसे भी मिलते हैं जो शब्दकोषों में भी नहीं मिलते- इनके एक सूची मैं यहाँ दे रहा हूँ-:

तिफंसा/तिफंसी (घड़ा रखने की तिपाई)
झिद्दे (झटके, धक्के)
खुरखुन्द
छरेरी
गायरा (शेर आदि का किसी जानवर को मारकर बाद में खाने के लिए छोड़ कर चले जाना)
टोहटाप
छौंह (खरी छौहों वाला शेर)
रांझ (एक नाले में राँझ के नीचे)
झांस (झांस के नीचे छोटे नाले में)
टकारे (एड़ी से घुटने तक पहनने का जूता)
चुल (वहाँ तेंदुए की चुल थी)
बिरोरी (शिकार का एक प्रकार, जब बेर फलते हों)


***

[किताब में एक और बड़ा दिलचस्प वाक़्या है जब वर्मा जी अपने साथियों के साथ जंगल में दाल-चावल की खिचड़ी बनाते हैं और जला बैठते हैं। जो आदिवासी इन शहरी शिकारियों की सहायता के लिए उनके साथ मौजूद था वो अपनी खिचड़ी अलग बना कर मजे से खाता है क्योंकि वो आदिवासियों में पुरोहित (बेगा कहलाने वाला) का काम करने वाला है और किसी का छुआ नहीं खाता। :) ]


* एक तीसरी किताब 'नेगल' भी पढ़ रहा हूँ। बाबा आम्टे के पुत्र प्रकाश आम्टे द्वारा अनाथ हो गए जंगली जानवरों के पालने के अनुभव पर आधारित ये भी बड़ी प्यारी और न्यारी किताब है। उनके सहयोगी विलास मनोहर ने लिखी है और नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापी है। 

शनिवार, 18 जून 2011

जंगले के पार

ये खिड़की जिस दिशा में खुलती है, उसी दिशा में आगे कहीं समुद्र उफनता है। उसकी कूदती-फांदती लहरों के पहले एक रेत का मैदान है। रेत पर बनाए बिलों से केकड़े बाहर आते हैं और अपनी भुजाओ को चमकाते टेढ़े-टेढ़े भागे जाते हैं। एक आदमी की आँख में दृश्य का जितना आयतन समा सकता है उतने भर में हज़ारों केकड़े या फिर लाखों । 

मैदान से पहले एक दलदल के खारे पानी में अपनी जड़ों को डुबाए पेड़ों का एक गरान है। उन पेड़ों की शाखाओं में घोसला बनाने पक्षी हज़ारों मील दूर से आते हैं।  गरान से पहले एक बस्ती है। बस्ती में सड़के हैं। मुख्य सड़क पर शोर और धुएं की एक नदी है। अधिकत लोग उससे नफ़रत करते थे पर कुछ मनचले प्यार। 

मुख्य सड़क और इस खिड़की के बीच तीन पेड़ एक कतार से लगे हैं। नागचम्पा, आम और पकुरिया। नागचम्पा की फुनगी पर हर चिड़िया हर रोज़ कुछ पल सुस्ताती है। पकुरिया के आगे नगरपालिका का लैम्पपोस्ट है। उसका बल्ब बहुत पहले फूट चुका है। 

लैम्प के अन्दर मैना ने अण्डे दिये थे। अण्डों से निकली मैना भी वहीं अण्डे देती है और तार पर बैठकर बार-बार ऊँचे शब्द से लैम्प पर अपने अधिकार की घोषणा करती है। 

मैं अक्सर सुनता हूँ, पर उसके और मेरे बीच एक जंगला है। जंगले के पार संसार, जंगले में क़ैद है। 


मंगलवार, 10 मई 2011

अरेन्ज्ड मैरिज

उसके बाप ने माँ का साथ नहीं निभाया। गाने बहुत गाए, इधर-उधर साथ उड़ते फिरे, और वादे भी बहुत किए मगर जब निभाने की बारी आई तो नदारद। बाप का साया नहीं तो कम से कम माँ की ममता तो मिल जाती। मगर कमबख़्त को वो भी न मिली। किसी दूसरे के घोंसले में रख आई अपने अण्डे को। वो पालने वाले माँ-बाप आवारा संस्कारों के न थे। बहुत सामाजिकता रही है उनमें। जो करते हैं कुल और कुटुम्ब के साथ और उसकी मर्यादाओं में करते हैं। और वो ऐसे भोले और सहज विश्वासी स्वभाव के जीव हैं कि वे जान भी ना सके कि वो जिसके मुँह में रोज़ दाना डाल रहे हैं, वो उनका अपना ख़ून नहीं किसी और का पाप है। 

जैसे-जैसे दिन बीतने लगे और पंखों का रंग और गले का सुर बदलने लगा तो खुली असलियत। और जैसे ही उन्हे समझ आया कि जिस अण्डे को उन्होने अपने पेट की गर्मी से सेया और पाल-पोस कर उड़ने लायक़ बना दिया वो तो कोई कौआ नहीं बल्कि कोयल है। बस उसी वक़्त लात मार घोंसले से गिरा दिया।

ये हादसा हर कोयल की ज़िन्दगी में होता है। किसी की ज़िन्दगी में जल्दी, किसी की ज़िन्दगी में देर से। कोई घोंसले से गिर कर भी बाद में कुहकुहाने के लिए बच जाता है किसी की जीवनरेखा ज़रा छोटी होती है। गिरने के बाद, बिना किसी माँ-बाप, भाई-बहन, और दूसरे सामाजिक सम्बन्धों के कोयल अकेले इस बेरहम दुनिया में अपना आबोदाना खोजती है। और जब जान का आसरा हो जाता है तो भीतर की कुदरत बहार आते ही जाग जाती है। और नर कोयल खोजने लगती है मादा कोयल को। हर जगह पुकारती फिरती है। और नर के इसरार का क्या करे, और कब करे, मादा कोयल तौलती है। फिर किसी मौक़े पर दिल के द्वार खोलती है। मगर एक घनचक्कर में फंसे ये पखेरू फिर उसी इतिहास को दोहराते हैं। और अपना एक घोंसला बनाने से मुकर जाते हैं। इस तरह हादसों का सिलसिला चलता रहता है।

मैं अक्सर सोचता था कि क्यों कोयल ही प्रेम के गीत गाती है। और कौवों के प्रेम की हवा किसी को नहीं मिल पाती है। शायद कह सकते हैं कि कोयल का तो शादी में यक़ीन ही नहीं और कौओं के समाज में अरेन्ज्ड मैरिज की परिपाटी है।



(यग्नेश की तस्वीर में कोयल के बच्चे को ख़ुराक़ देता कौआ)

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

सुनो

कोयल दिन भर बोलती है। दहियल सुबह दो घंटे बोलता है और फिर शाम एक घंटा बोलता है। छोटा बसन्ता कभी उत्तर पूर्व से बोलता है और कभी दक्षिण पूर्व से बोलता है। तोते बोलते नहीं चीखते हैं। दक्षिण से चीखते हुए आते हैं और उत्तर को निकल जाते हैं और कभी उलटा। गौरेया जब तुलसी के पत्ते खा रही होती है तो नहीं बोलती। उसके पहले बोलती है। फिर बाद में भी बोलती है। कबूतर कभी नहीं बोलता। बस गुर्राता है। मैना शोर मचाती है। और कौआ अप्रिय ही नहीं प्रिय भी बोलता है। एक पेड़ है जो चिड़ियों की सराय है। सारी चिड़ियों से ऊँचे सुर में उसी पेड़ पर रहने वाली गिलहरी पूँछ उठाकर न जाने क्या-क्या बोलती है। नाली के नीचे रहने वाला चूहा कभी कुछ नहीं बोलता। कुत्ते दोस्तों से बोलते हैं और दुश्मनों से। अजनबियों से वो भी कुछ नहीं बोलते। उनकी सुनते भी नहीं। 

सोमवार, 24 अगस्त 2009

कूद जाऊँ क्या?

मैं बनारस की ट्रेन बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस में सवार था। खिड़की के बगल वाली सीट थी। ट्रेन लगभग खाली थी। आराम से सामने की सीट पर पैर टिकाकर अधलेटे होने में मन अवचेतन में विचरने लगा। बाहर के खेत-मेंड़, पेड़-पंछी देखते-देखते अचानक मन में विचार आया कि चश्मा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। फिर सोचा कि बैग से कैमरा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। जेब से मोबाइल निकाल कर उसे भी खिड़की के बाहर उछाल दूँ।

ऐसे विचारों के पीछे मेरे पास कोई कारण कोई तर्क नहीं था। मैं न तो क्षुब्ध, न क्रुद्ध और न अवसादग्रस्त। न किसी से झगड़ा न कोई मेरे ऊपर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती। फिर भी मन अजीब दिशा में ठेल रहा था। मैं मनमानी करने वाला आदमी नहीं हूँ। इच्छाओं का दास तो बिलकुल नहीं। मन पर, विचारों पर तक कठोर नियंत्रण रखने वाला आदमी हूँ। मगर मन अभी स्वतन्त्र था। मेरी उस पर कोई रोक न थी। वो कह रहा था- चश्मा, मोबाइल, और कैमरा खिड़की के बाहर फेंक दूँ। न जाने क्यों?

कुछ दिन बाद बनारस में दरभंगा घाट के एक ऊँचे चबूतरे पर बैठ कर मन में आने लगा कि वहाँ से सीधे नीचे गंगा में कूद जाऊँ। बनारस आकर मैं आनन्द में हूँ। जीवन का अन्त करने का मेरा कोई विचार नहीं है। ऐसी प्रेरणा मुझे पहले भी हुई है। गंगटोक में एक बार सीधी घाटी में झाँकते एक मकान के छोर पर खड़े होकर जब मैंने अपने तलवों से लेकर घुटनों तक एक भयावह झुरझुरी और मस्तक तक दौड़ते खून को महसूस किया तो मैंने जाना कि मेरा शरीर ऊपर से नीचे तक अज्ञात में कूदने की भौतिक तैयारी कर चुका है।

इस अन्तः प्रेरणा के सम्बन्ध में मेरा एक विचार है। मेरा सोचना है कि यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हर किसी को ऊँचाई पर जाकर डर लगता है। क्योंकि हर एक के भीतर ऊँचाई पर जाकर नीचे छलांग लगाने की प्रेरणा जागती है। सिर्फ़ उसे डर नहीं लगता जो या तो छलांग लगा-लगा कर अज्ञात के डर के पार हो गया है या फिर उसे जो अपनी प्रवृत्तियों के पार हो गया है।

मल्लाहों के बच्चे इस प्रेरणा को सुनते हैं और छलांग लगा कर नदी को अपना दोस्त बना लेते हैं। हम जो छलांग नहीं लगाते, सारी उमर किनारे बैठकर इस अन्तः प्रेरणा को सुनते हैं और सुन-सुन कर डरते हैं। डर कर किनारे से थोड़ा और दूर हो जाते हैं।

अज्ञात में छलांग की प्रेरणा उठना हमारी स्वाभाविक वृत्ति है- यह सोचकर मैं घाट के चबूतरे से उठ गया। पास ही एक कुत्ता सो रहा था। मन में आया कि उसे एक लात लगाऊँ। पर मैंने अपने को रोक लिया। क्या आप जानते हैं कि मेरे भीतर कुत्तों का कितना डर है?

शनिवार, 8 अगस्त 2009

हमरे ऊ पी के बासी

कानपुर की गाड़ी में बैठते ही कानपुर का स्वाद मिल गया। दूसरे दर्जे के कूपे में चार के बजाय पाँच सहयात्री दिखाई दिये। मैं और तनु साईड की बर्थ पर थे। पाँचवे शख्स के पास आरक्षण नहीं था। वे इस विश्वास से चढ़ बैठे कि टी टी के साथ जुगाड़ बैठा लेंगे। जुगाड़ यह इस प्रदेश के मानस का बेहद प्रिय शब्द है। तमाम जुगाड़ कथाओं के बीच दल के नेता ने अपने मित्रो को यह भी एक कथा-मर्म समझाया कि सरकारी हस्पताल प्रायवेट नर्सिंग होम से कहीं अधिक बेहतर पड़ता है। जितना खर्चा प्रायवेट में करोगे उसका चार आने का भोग सिस्टर आदि को चढ़ा दो फिर देखो कैसी सेवा होती है। दिन में चार बार चादर बदलेगी, सब तरह की दवा मिल जाएगी। भोग और प्रसाद का यह चलन जुगाड़ की परिभाषा के भीतर ही समाहित है।

टी टी ने एक बार घुड़की ज़रूर दी मगर फिर चार्ज वगैरा लगा के मान गया और एक बर्थ एलॉट भी कर दी। सारे रास्ते ठेकेदारों की यह टोली अपने हमसफ़रों की अमनपसन्दगी, और सामान्य शालीनता के प्रति एक बेलौस बेपरवाही बरतते हुए मादरचो बहन्चो करते आए। ये इस प्रदेश की ही विशेषता हो ऐसा नहीं है। क्योंकि पढ़े लिखे सभ्य लोगों को को वेल एडुकेटेड सोसायटी में फ़क्देम-फ़क्यू इत्यादि का जाप करते सुना जा सकता है। इस अर्थ में हम्रे ऊपी के बासियों में एक प्रकार की सार्वभौमिकता भी है।
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कानपुर में गाड़ी चलाना एक अनुभव है। यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है कि जिसने कानपुर में गाड़ी चला ली, वो दुनिया के किसी भी इलाक़े में गाड़ी चला सकता है- लाइसेन्स हो या न हो। मेरा तजुरबा ये है कि लोग इस शहर में गाड़ी चलाते कम हैं सड़क पर मौजूद तमाम गाड़ियों के बीच खाली जगहों में अपना वाहन पेलते अधिक हैं।

लेकिन अगर आप को सचमुच कानपुर में गाड़ी चलाने का अनुभव प्राप्त करना है तो कभी सूरज ढलने के बाद चक्का घुमाइय़े। रात में कई सूरज आप को अंधा बनाने के लिए तैयार नज़र आयेंगे। या तो कानपुर में कोई नहीं जानता कि कार में हेड लाईट की एक सेटिंग का नाम लो बीम भी होता है या वो गहरे तौर पर विश्वास करते हैं कि ड्राईविंग एक युद्ध है और सड़क उनकी रणभूमि। सामने वाले को किसी तरह भी मात करना उनकी युद्ध-नीति का अंग है। जिसकी गाड़ी में जितनी तेज़ लाईट होगी वो सामने वाले को अंधा करके गाड़ी धीमी करने पर मजबूर कर सकेगा और बची हुई जगह में अपनी गाड़ी पेलने में सफल हो सकेगा।

आप सोचेंगे कि ये जुझारू चालक रात में तो हेडलाईट के हथियार से युद्ध करते हैं मगर दिन में? दिन में तो उनका यह अस्त्र बेकार सिद्ध हो जाएगा। बात माकूल है। मगर दिन में वे आँखों की जगह कानों पर हमला करते हैं। दूर से ही कानफोड़ू क़िस्म के भोंपू बजाते हुए वाहन दौड़ाते आते हैं। अपने शहर की रवायतों से अजनबी हो चुका मेरे जैसा आदमी घबरा के किनारे हो जाता है। मगर घिसा हुआ कनपुरिया अंगद की तरह डटा रहता है। इंच भर भी जगह नहीं छोड़ता। जनता का यह उदासीन व्यवहार और चिकना घड़त्व चालक को हतोत्साहित नहीं करता। वह लगा रहता है। उसे आदत पड़ चुकी है। उसे डर है कि हॉर्न न बजाने पर लोग उसे रास्ते का पत्थर मानकर सड़क के परे न धकेल दें। वो अपनी अंगुली हॉर्न से हटाता ही नहीं है।

आम नागरिक इस व्यवहार का वह इतना अभ्यस्त हो चुका है कि सुबह छै बजे चन्दशेखर आज़ाद विश्वविद्यालय में सुबह की टहल का आचमन करके स्वास्थ्य वृद्धि के उद्देश्य से आए मगर गलचौरे में व्यस्त निरीह, निरस्त्र लोगों पर भी वह इस हथियार का अबाध इस्तेमाल करने से बाज नहीं आता। और जड़ानुभूति हो चुके पक्के कानपुरिया कभी उस का कॉलर पकड़ कर सवाल करने का सोचते भी नहीं कि अबे भूतनी के! सुबह-सुबह खाली सड़्क पर काहे कान फोड़ रहा हैं.. हैं?

***

एक अन्य अनुभव में यह पाया गया कि बड़े चौराहे पर नवनिर्मित पैदल पार पथ का इस्तेमाल करने में किसी पथिक की श्रद्धा नहीं है। परेड, शिवाले और मेस्टन रोड के आने जाने वाले बड़े चौराहे के हरे लाल सिगनल और चौराहे के केन्द्र में स्थापित ट्रैफ़िक हवलदार की किसी भी चेष्टा को पूरी तरह नगण्य़ मानते हुए इधर से उधर, और उधर से इधर होते रहते हैं। अनुभूति जड़ हो चुके पक्के कानपुरिया जानते हैं कि अगर वे अपने वाहन पर आसीन नहीं होते तो वे स्वयं भी अपने इस गऊवत व्यवहार के सामने बाक़ी दुनिया को झुकाए रखते। और गऊ हमारा श्रद्धेय प्राणी है जिसे क़तई भी कोई पुरातन कालीन न समझे.. आज कल गऊ पट्टी के ह्र्दय प्रदेस ऊपी में गऊ प्लास्टिक खाती है, इस से अधिक आधुनिकता का प्रमाण आप को और क्या चाहिये?

***

यहाँ नवाबगंज में तमाम तरह के पेड़ लगे हैं नए-पुराने। बरगद, पीपल, आम, इमली, पकड़िया, और नीम जैसे सर्वव्याप्त वृक्षों के अलावा सहजन, अमलतास, गुलमोहर, गूलर, जंगलजलेबी, बालमखीरा, सुबबूल आदि भी लगे हैं। नए रोपे गए वृक्षों में कदम्ब कई जगह लगा है चूंकि वह जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। कदम्ब से पुराने वृक्षों में कसोड नाम का एक वृक्ष भी बहुतायत में लगा हुआ है। कई गलियों के तो पूरे के पूरे किनारे इसी कसोड के द्वारा आच्छादित हैं।

मुझे जिज्ञासा हुई कि कसोड नाम तो प्रदीप क्रिशन ने अपनी किताब ट्रीज़ ऑफ़ डेल्ही में दिया है। न जाने किस इलाक़े में यह नाम चलता हो। अपने कानपुर का क्या नाम है यह सोचते हुए मैं एक प्लास्टिक के पैकेट में आठ रुपये का पचास ग्राम धनिया झुलाते हुए चला जा रहा था। एक बंगले के सामने लगे कसोड के नीचे एक प्रौढ़ सज्जन एक ऐसी बेपरवाही और सहजता से पूरे चित्र में मौजूद थे जैसे कि कोई सिर्फ़ अपने घर के आगे ही हो सकता है। यह जानकर कि महाशय और इस पेड़ का साथ कई बरसों का लगता है, मैंने उन से पूछ डाला तपाक से – इस पेड़ का नाम क्या है। वो पहले तो अचकचाए फिर पेड़ की तरफ़ एक औचक दृष्टि उछाली और सर हिला दिया। इस का नाम तो नहीं मालूम। अपनी अज्ञानता में वो असहज न हो जायं मैंने कहा कि पीले फूल आते हैं न इसमें?

हाँ- पीले। बहुत पुराना पेड़ है। यहाँ जगह-जगह लगा है। तमाम लोगों ने कटवा दिया है। हमारा वैसेई बना है।

मैंने सर हिलाया कि जी यहाँ बहुत लगा है। और चलने लगा।

सड़क के पार उनके पड़ोसी बाहर खाट डाले पड़े थे। मेरे वाले महाशय ने उनसे पूछा कि नाम क्या है इस का। अधलेटे पड़ोसी ने सर प्रश्नवाचक मुद्रा में सर उचकाया।

रुकिये उनको पता है शायद।

मैं उनके पीछे-पीछे सड़क के पार गया। सवाल के जवाब में उन्होने सर नकारात्मक हिला दिया। और मेरी तरफ़ एक निगाह फेंकी जिस से मुझे समझ आया कि वो मेरे सवाल से ज़्यादा इस बात से दिलचस्पी रखते थे कि मैं कौन चीज़ हूँ जो ऐसे सड़क चलते पेड़ो का नाम-धाम पूछ रहा हूँ? इस के पहले कि वो मेरी कोई इन्क्वारी करते मैंने खिसक लेने में अपनी भलाई समझी क्योंकि उन्हे ये समझाना कि मैं इतना खलिहर हूँ कि मेरी दिलचस्पी काम धन्धे की दुनियादारी में नहीं.. बेफ़ालतू की ऐसी जानकारी इकट्ठी करने में है जो उन निम्न वर्ग के लोगों के पास ही बची है जो प्रकृति के साथ रहने के लिए अभी भी मजबूर हैं। बंगले में बन्द लोगों को अपने सामने खड़े पेड़ का नाम भी नहीं मालूम रहता और न वे मालूम करने की कोई कोशिश करते हैं। वैसे मेरे वाले महाशय ने ये ज़रूर वादा किया कि वन विभाग के लोग आते-जाते रहते हैं उन से पूछ कर वो हमें बतायेंगे। अब वो हमें कैसे बतायेंगे इस सवाल में आप अपनी मूँड़ी मत घुसाइये। हम ऊ पी के बासियों की ये एक और निर्मल निराली अदा है। कहीं तो मिलोगे कभी तो मिलोगे तो बता देंगे नाम।

आगे मेरी थेरम को इति सिद्धम करते हुए सासेज ट्री के नीचे मौसम्मी का ठेला लगाए बालक ने दूसरी ओर देखते हुए कहा- बालम खीरा। मेरा सवाल वही था कि इस पेड़ का नाम क्या है। मैं उस के ज़रिये एक पीछे की दुनिया में झांकना चाह रहा था और वो मुझ से पार एक आगे की दुनिया में कुछ तलाश रहा था।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

लैन्सियोलेट कॉडेट टॉमेन्टोज़ हरसूट

आजकल एक नई भाषा सीख रहा हूँ। पेड़ों-पौधों में जागे नए शौक के चलते उन से सम्बन्धित एक गूगल समूह की सदसयता हासिल कर ली है – indiantreepix । जब भी किसी पेड़-पौधे को पहचानने की कोशिश में मेरे पास मौजूद चारों किताबें हाथ खड़ी कर देती हैं तो इस समूह पर एक पोस्ट, मय तस्वीर चिपका देता हूँ।

और बस समूह के ८२२ सदस्यों में से वे बन्धु जो पेड़ को पहचानते हैं, पहेली सुलझा देते हैं। और एक बार पेड़ का नाम पता चल जाय, खासकर वैज्ञानिक नाम तो नेट पर तमाम ऐसे स्रोत मौजूद हैं जो पेड़/झाड़ी/लता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी मुहय्या कर देते हैं।

जो नई भाषा सीख रहा हूँ वो इसी वनस्पति शास्त्र से समबन्धित है। आप के स्वाद के लिए एक नमूना यहाँ पेश कर रहा हूँ –

Muntingia calabura (L., Muntinginaceae) : Small tree with tiered slightly drooping branches with crowded distichous simple alternate strongly asymmetrical sticky-pubescent oblong acuminate obliquely subcordate thin serrulate leaves, soon wilting, 2.5-15 cm long, 1-6.5 cm wide; stipules linear, about 5 mm long, caducous, flowers bisexual, 1 or few in axils, on pedicels about 2-3 cm long; sepals 5 (rarely 6 or 7), each about 1 cm long, lanceolate-caudate, tomentose-hirsute; petals white, [or pink], broadly spathulate-deltoid, about 12-13 mm long, rotate, stamens about 75; filaments slender, distinct, 6 mm long, white; anthers small yellow; disc annular, around the ovary; hirsute; ovary stipitate, glabrous, 5-celled; stigma capitate, 5-riged; fruit 5-celled baccate, sub-globose, light red, 1-1.5 cm wide, sweet-juicy, with many small (1/2 mm) elliptic grayish yellow seeds, stigma persistent.

ऊपर से ऐसा मालूम देता है कि यह अंग्रेज़ी भाषा है पर मैं यहाँ लिखे गए विवरण के आधे से अधिक शब्दों से परिचित नहीं हूँ। एक ग्लासरी नेट से मिली है पैंसठ पन्ने की। उसको देख कर ही थकान हो सकती है। मगर सीखने का आनन्द अक्सर बहुत थकानो से पार ले जाता है।

मैंने देखा है कि हिन्दी में इस प्रकार के समूहों का अभाव है जबकि ज़रूरत तमाम। अब जैसे शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ही एक समूह क़ायम किया जा सकता है। क्या कहते हैं अजित भाई?















तस्वीर: मन्टिन्जिया कैलाबुरा या जमैकन चेरी या मराठी में केवनी।
यह पेड़ सड़क के किनारे मिला मगर पहचान इन्डियनट्रीपिक्स के दोस्तों ने कराई।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

जो खग हौं..

मित्रो, आजकल मेरे मन-मानस पर पेड़ छाए हुए हैं। उन्हे देखना, उन्हे पहचानने के लिए किताबों में पढ़ना, अपने भाई से और नेट के नए पेड़-प्रेमी मित्रों से उनके बारे में चर्चा करना, ज़्यादा समय इसी में जाता है। इस शग़ल में दो सुख हैं – पैदल विचरने का सुख और कुछ नया जानने का सुख!

इसलिए आजकल फिर निर्मल आनन्द आ रहा है। यह कब तक चलेगा, कह नहीं सकता? शहर में पेड़ों की सीमित प्रजातियाँ हैं। एक रोज़ सारे पेड़ पहचानने जायेंगे और फिर जानने के लिए कुछ भी नया नहीं रह जायेगा, अगर मैं अपनी जिज्ञासा के दायरे में बेलों, झाड़ियों और तितलियों, कीट-पतंगो को शामिल न कर लूँ! या अपने विचरने का सीमाएं न तोड़ दूँ!


















आप के आनन्द के लिए नीचे के एक फूल की तस्वीर चिपका रहा हूँ। यह कैम नाम के पेड़ का फूल है। टेबल टेलिस के गेंद के आकार का यह फूल एक नाज़ुक खुशबू का स्वामी है। कहीं-कहीं इसे कदम्ब भी कहा जाता है।

वैसे कदम्ब नाम का एक और भी पेड़ होता है। वो कानपुर में मेरे घर की बाहर की सड़क पर क़तार से लगा हुआ है। मगर प्रदीप क्रिशन का कहना है कि भगवान श्री कृष्ण जिस कदम्ब के नीचे अपनी लीला रचते थे, वह यही कदम्ब है जिसकी तस्वीर आप देख रहे हैं।

रसखान इसी पेड़ की डार पर बसेरा करना चाहते थे..

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

ओबामा की प्रतिज्ञाएं

राष्ट्रपति ओबामा और उनकी जीत ने अमरीका और दुनिया में एक परिवर्तनकारी उत्साह पैदा किया है। मैं जल्दी किसी की छवि, छटा, और अदा के झांसे में नहीं आता.. ऐसा मुझे लगता है। मगर अमरीकी चुनावों में जीत के बाद राष्ट्रपति की गद्दी सुनिश्चित हो जाने के बाद भी ओबामा जिस तरह की क्रांतिकारी बातें कर रहे हैं, उसे सुनकर मेरी भीतर भी झुरझुरी हो रही है।

क्या ओबामा सचमुच दुनिया बदल देंगे? क्या वे सचमुच विश्व राजनीति में अमरीका की भूमिका को उलट देंगे? पर्यावरण और पूंजी के सम्बन्ध को पलट देंगे? मेरी इच्छा है कि यह सच होता हुआ देखें हम लोग.. फ़िलहाल तो देखें ओबामा की लच्छेदार वाणी में उनकी प्रतिज्ञाएं..

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

आरे पर गिद्ध-दृष्टि

मुम्बई में साँस लेने के लिए वैसे ही हवा कम पड़ती है और अब शरद पवार साहब के बयान से ऐसा मालूम देता है कि मु्म्बई के फेफड़ों में जो बची-खुची हवा है वो भी निकल जाएगी। पिछले महीने महानन्दा डेअरी के एक समारोह में बोलते हुए पवार साहब ने इशारा किया कि यदि आरे डेअरी मुनाफ़ा नहीं बना पा रही है तो क्यों न महानन्दा ही उसे सम्हाल ले।

उनके इस बयान में निहित खतरों को भाँप कर आरे मिल्क कॉलोनी में काम करने वाले और रहने वाले लोगों ने भारिप बहुजन महासंघ के अन्तर्गत २३ अक्तूबर को एक विरोध प्रदर्शन किया। इस मोर्चे का नेतृत्व डॉ आम्बेडकर के नाती आनन्दराज आम्बेडकर ने किया और आरे के प्रबन्धन को अपनी माँगो का एक ज्ञापन भी दिया। उनकी मुख्य माँग डेअरी के किसी भी प्रकार के निजीकरण पर रोक लगाना है। भारिप बहुजन महासंघ के नेताओं ने अपने-अपने भाषणों में शरद पवार पर ये आरोप लगाया कि वे डेअरी के निजीकरण की आड़ में आरे मिल्क कॉलोनी के विशाल भू-भाग को लैंड माफ़िया के हवाले कर देना चाहते हैं।

आरे मिल्क कॉलोनी के स्थापना आज़ादी के ठीक बाद १९४९ में हुई थी और आज भी इसे देश की सबसे अत्याधुनिक डेअरी में गिना जाता है। लगभग ४००० एकड़ की ज़मीन में फैली इस डेअरी के अन्दर बत्तीस तबेले हैं। डेअरी से जुड़े इन तबेलों के अलावा आरे मिल्क कॉलोनी के प्रांगण में डेअरी, एनीमल हज़बैण्डरी, पोल्ट्री और कृषि से जुड़े तमाम शोध और शिक्षण संस्थान भी मौजूद हैं। यानी ये समझा जा सकता है कि इस संस्था की स्थापना आज़ादी के समय मौजूद राष्ट्र-निर्माण के आदर्श दृष्टिकोण से की गई थी। मगर धीरे-धीरे एक अपराधिक उदासीनता, आलस्य और भ्रष्टाचार के एक दौर ने डेअरी को एक बीमारु अवस्था में धकेल दिया और अब उसे शुद्ध मुनाफ़ाखोरों के हवाले कर देने की बात की जा रही है।

आरे डेअरी को पहले सम्भवतः किसी ऐसी व्यवस्था के तहत चलाया जाता था जिसमें कॉलोनी के भीतर दुहा गया सारा दूध डेअरी को देने की बाध्यता थी। मगर बसन्तदादा पाटिल के मुख्यमंत्रित्व काल में तबेले के प्रबन्धकों को ये छूट दे दी गई कि वे अपने दूध को बाहर भी बेच सकें। जिसके कारण डेअरी घाटे के दलदल में धँसते हुए तबेलों से किराया वसूल करने वाली एक संस्था भर बन कर रह गई है। ये छूट मुक्त बाज़ार के दौर के पहले किस नैतिकता के तहत दी गई, इसके लिए बहुत सोचने की ज़रूरत नहीं है। हमारे देश में चीज़ें भ्रष्टता के जिस तरल रसायन से चलायमान होती हैं वो किसी से छिपा नहीं है।

इस देश में कम ही संस्थाएं ऐसी हैं जो अंग्रेज़ो की बनाई हुई नहीं है, आरे मिल्क कॉलोनी उन में से एक है। लेकिन शरद पवार जैसे लोग पर उसकी जड़ों में माठा डाल चुकने के बाद अब निजीकरण के नाम पर उसे उखाड़ फेंकने का काम कर रहे हैं। किस लिए? ताकि ज़मीन की खरीद-फ़रोख्त के ज़रिये कुछ नोट पैदा किए जा सकें? पर ये धन-पशु सम्पत्ति के लोभ में ऐसे अंधे हुए हैं कि सामने दिख रहे माल के ज़रा आगे गहरी खाई भी उन्हे नहीं दिखती। मीठी नदी का प्रकोप और २००५ की मुम्बई की बाढ़ के बावजूद ये लोग बिना किसी योजना के अन्धाधुन्ध निर्माण को ही विकास का पर्याय मान कर चल रहे हैं और देश को भी ऐसा ही मनवाने पर तुले हुए हैं।

समय-समय पर आरे मिल्क कॉलेनी की ज़मीन को देश के दूसरे ‘विकास-कार्यों’ के लिए दिया जाता रहा है जैसे कि कमालिस्तान फ़िल्म स्टूडियो, फ़ैन्टेसीलैण्ड एन्टरटेनमेंट पार्क, मरोल इन्डस्ट्रियल डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन (एम आई डी सी) और हाल के वर्षों में रॉयल पाल्म्स (गोल्फ़ क्लब, होटॅल और रिहाईशी बिल्डिंग्स)। रॉयल पाल्म्स के बारे में उल्लेखनीय यह है कि पहले शिव सेना ने इस का प्रचण्ड विरोध किया और फिर बाद में स्वयं बाल ठाकरे ने इस का अपने करकमलों से उदघाटन किया।

इन सब के अलावा आरे के केन्द्रीय डेअरी से सटा हुआ एक आरे गार्डेन रेस्टॉरन्ट भी इस कृपा का भागीदार हुआ है जहाँ आठ सौ ‘पार्टी-पशु’ एक साथ आनन्द ले सकते हैं। क्या ये विडम्बनापूर्ण नहीं है कि एक मिल्क डेअरी पहले तो अपने ही तबेलों को दूध बाहर बेचने की आज़ादी देकर घाटा सहन करती है और फिर घाटे को पूरा करने के लिए अपने केन्द्रीय दफ़्तर की नाक के नीचे से शराब बेचने का व्यापार शुरु कर देती है?

आरे मिल्क कॉलोनी के भीतर लगभग आठ-नौ हज़ार परिवारों की रिहाईश है। जिस में से कुछ तो प्राचीनकाल से रहने वाले आदिवासी हैं जिनका अधिकार क्षेत्र उत्तरोत्तर सिमटता ही जा रहा है। उन के अलावा आरे में काम करने वाले कर्मचारियों के परिवार तथा अन्य दूसरे लोग जो अलग-अलग समय पर झोपड़ पट्टियों में बस गए, आरे के अन्दर रहते हैं।

अब इसे चाहे हमारे देश का सह-अस्तित्व का गहरा बोध कह लीजिये या विशेष चारित्रिक भ्रष्ट उदासीनता कि जब तक पानी सर के ऊपर न हो जाय हम एडज़स्ट करते रहते हैं। इसी मानसिकता के तहत हर जगह अवैध रूप से झोपड़े बनाने वालों के प्रति एक उदासीन उपेक्षा का भाव साधा जाता है। और जब वे बरसों की मेहनत के बाद अपने घर और रोज़गार में सहूलियत की स्थिति में आने लगते हैं, उन्हे उखाड़ फेंकने के निहित स्वार्थ उठ खड़े होते हैं।

विदर्भ के हज़ारों किसानों की आत्महत्या की उपेक्षा कर के देश में आई पी एल के उत्सव में अपनी ऊर्जा देने वाले कृषि मंत्री शरद पवार का आरे सम्बन्धित बयान इसी रोशनी में देखा जाना चाहिये जिसके जवाब में भारिप बहुजन महासंघ ने विरोध प्रदर्शन करके अपने अस्तित्व के रक्षा करने की अग्रिम कार्रवाई की है।

इस देश के विकास पुरुषों की अपनी जनता के विकास की कितनी चिन्ता है वो आप इस बात से समझिये कि आरे की इन झोपड़पट्टियों में १९९३ तक पानी की व्यवस्था और १९९८ तक बिजली की व्यवस्था नहीं थी। और ये सुविधा भी तभी सम्भव हो सकी जब शहर पर बढ़ता हुआ आबादी का दबाव के चलते गोरेगाँव में अचानक त्वरित निर्माण में फलीभूत हुआ।

इसके लिए कुछ लोग बाज़ार के शुक्रगुज़ार होंगे और गलत भी नहीं होंगे मगर ऐसे लोग स्वतंत्र बाज़ार के दूसरे पक्ष पर नज़र डालना या तो भूल जाते हैं या उसे जानबूझ कर अनदेखा कर जाते हैं। गोरेगाँव के इस भयानक विकास का नतीजा ये हुआ कि १९९३ के पहले बस्ती वाले पानी की अपनी ज़रूरत के लिए जिस पहाड़ी नदी का इस्तेमाल करते थे वो आज भी गोरेगाँव और आरे के भीतर से होकर समुद्र की ओर बहती है मगर एक बेहद दुर्गन्धपूर्ण गन्दे नाले के रूप में। और मुम्बई की सबसे ऊँची ‘पहाड़ी’ नाम की पहाड़ी धीरे-धीरे काट-काट कर खतम की जा रही है।

भारिप बहुजन महासंघ की एक माँग ये भी है कि उनके पुनर्वास की किसी सूरत में उन्हे आरे के भीतर ही बसाया जाय। जो लोग पिछले पचास बरस से इस जगह के आस-पास से ही अपना रोज़गार करते हों, उनकी तरफ़ से ये माँग बहुत जायज़ है। और बहुत सम्भव है कि डेअरी का निजीकरण हो जाय और धीरे-धीरे आरे कॉलोनी की ज़मीन स्क्वायर मीटर की दर से बिकने के लिए उपलब्ध भी हो जाय। ऐसी सूरत में आरे के निवासियों को भीतर के किसी एक कोने में बसा देना घाटे का सौदा नहीं होगा।


मगर आरे सिर्फ़ एक मानवीय मामला नहीं है। एक बार अगर आप मुम्बई के नक्शे पर नज़र डालें तो आप को आरे का महत्व अपने आप समझ आ जाएगा। सजंय गाँधी नेशनल पार्क, फ़िल्म सिटी और आरे मिलकर एक ग्रीन ज़ोन का निर्माण करते हैं। वैसे ये अलग-अलग नाम भले हों पर ये उस विशाल जंगल के विभाजित क्षेत्र हैं जिसके भीतर मुम्बई को जल आपूर्ति करने वाली तीन झीलें-तुलसी,विहार और पवई- भी आती हैं। ये विभाजन आदमी ने किए हैं और इनके बीच कोई वास्तविक विभाजन नहीं है।

मनुष्य की आर्थिक गतिविधि से अलग आरे के इस विशाल कॉलोनी के प्रांगण में हज़ारों वृक्ष, बरसाती पौधे, जंगली पेड़ और लताएं भी आश्रय पाती हैं और एक ऐसे आकर्षक पर्यावरण का निर्माण करते हैं जिसमें तमाम अनोखे पंछी पूर्णकालिक या शीतकालिक निवास पाते हैं। इन पंछियों में से कुछ पीलक (गोल्डेन ओरियल) और दूधराज (एशियन पैराडाइज़ बर्ड, देखें चित्र) जैसे बेहद अद्भुत और अनूठे भी हैं। जिन्हे हाल के दिनों में अपने इतने पास पाकर चकित सा होता रहा हूँ।


मगर विकास के अंधाधुंध कंक्रीटीकरण के खतरे की ज़द में सिर्फ़ पंछी नहीं आएंगे, मानव समाज भी उसकी चपेट में आएगा। प्रकृति के नियम माफ़िया संसार से कुछ अलग नहीं होते। सत्या का एक डायलाग याद कीजिये.. एक गया तो सब जाएंगे। पर्यावरण में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है.. एक पत्थर हटायेंगे तो पूरी इमारत धराशायी हो जाएगी... हो रही है।


वैसे आरे मिल्क कॉलोनी को लेकर पिछले दिनों एक और योजना की चर्चा उठी थी- आरे के भीतर एक ज़ूलॉजिकल पार्क(ज़ू) बनाने की योजना। आरे को लैण्ड माफ़िया के हवाले करने से निश्चित ही ये एक बेहतर योजना है मगर मेरा डर है कि ये योजना सिर्फ़ पर्यावरण लॉबी का मुँह बन्द करने के लिए लटकाई जा रही है। क्योंकि इसका प्रस्तावित क्षेत्र सिर्फ़ ४०० एकड़ है.. यानी कि बाकी का ३६०० एकड़ नोचने के लिए मुक्त रहेगा। वैसे आप ही बताइये कि आप पंछियों को पिंजड़े में बन्द देखना पसन्द करते हैं या मुक्त फुदकते हुए?

मेरे लेखन में निराशा का खेदपूर्ण पुट है.. फिर भी उम्मीद करता हूँ कि आरे का भविष्य मेरे डरों से बेहतर होगा। तथास्तु!

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

नए शग़ल


एक लम्बे समय तक ब्लॉग से दूर रहने के बाद लौटना हो रहा है। मेरी पिछली पोस्ट अगस्त में लिखी गई थी। इन चालीस दिन के के दौरान मैं छुट्टी पर रहा। जो लोग मेरे जीवन को जानते हैं वे कह सकते हैं कि मैं छुट्टियों की गतिविधियों से छुट्टी पर चला गया। और उनका ये कहना ग़लत नहीं होगा।
कभी-कभी मन में एक अपराध-भावना जागती है कि जब कि शेष संसार धंधे पर लगा हुआ है, पैसे कमाने की जुगत में दिन-रात एक कर के फ़ुरसत को तरस रहा है; उस लिहाज़ से मेरा ऐसा जीवन कितना उचित और नैतिक है? मगर विवेक निर्णय देता है कि मुक्ति सबसे मूल्यवान है और छुट्टी दरअसल मुक्ति का ही लोकप्रिय रूप है। सो सब सही है.. !

तो साहब.. लगभग महीने भर के लिए मुम्बई से निकला था, साथ में कुछ काम भी था। सोचा था कि लिखना ही तो है.. लैपटॉप साथ लिए था, जैसे यहाँ तैसे शेष जहाँ। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक वाक्य तक नहीं लिखा गया। दिल्ली के मुग़लिया इमारतों का दर्शन किया गया। ल्यूटन की बनाई नई दिल्ली को आह भर-भर के फेफड़ो में भरा गया और मेरे बड़े भाई संजय तिवारी (विस्फोट ब्लॉग वाले नहीं) के ज़रिये दो नए शग़ल में शिष्यत्व लिया गया।
भाईसाहब पुराने चिड़ीनिहार (बर्ड-वाचर) हैं, और जब से उन्हे रक्तचाप की शिकायत हुई और ऐलोपैथी के दवातंत्र ने अपने शिकंजे उन पर कसने शुरु किए, उन्होने दवाओं का जुआ शरीर से उतार फेंकने के लिए टहलने का एक भयानक कार्यक्रम अपना लिया जिसमें वो रोज़ाना आठ-दस किलोमीटर टहलने लगे। दवाएं फेंक दी, रक्तचाप क़ाबू में आ गया और उन्होने अपने निहारने के शौक़ में चिड़ियों के साथ-साथ पेड़ों को भी शामिल कर लिया।
भाईसाहब के साथ रोज़ाना दिल्ली के मुख्तलिफ़ बाग़-बगीचों में टहलते हुए मुझे भी इस गतिविधि में आनन्द मिलने लगा। और दिल्ली के बाद कानपुर और इलाहाबाद के भी बगीचों और गंगा किनारों के तमाम पेड़ों और चिड़ियों को पहचानने का ये उत्साह मुम्बई भी ले कर चला आया हूँ।
मुम्बई इस मामले में थोड़ा अभागा है। यहाँ पर अंग्रेज़ों ने कोई भी कम्पनी बाग़ नहीं बनाया। जी! ये लिखते हुए मुझे दुःख हो रहा है कि आज के हिन्दोस्तान में प्रकृति के नाम पर शहरों के भीतर जो कुछ भी है वो अंग्रेज़ो की विरासत है। चाहे वो ल्यूटन की बनाई दिल्ली के बाग़-बगीचे और सड़को के किनारे लगाए गए पेड़ों की व्यवस्था हो या कानपुर और इलाहाबाद जैसे शहरों के कम्पनी बाग़- उन्ही की सोच का नतीजा हैं।
हम हिन्दुस्तानियों ने उनके जाने के साठ साल के बाद कुछ भी नहीं बनाया- शहरों में एक क़ायदे का बाग़ नहीं और जो कुदरती जंगल हैं उन्हे लगातार नष्ट करते आ रहे हैं। मुम्बई के फेफड़े कहे जाने वाले संजय गाँधी नेशनल पार्क और आरे कॉलोनी को भी चारों तरफ़ से कुतरा जा रहा है। आने वाले दिनों की स्थिति, अगर सम्हला न गई तो, भयानक होगी।
खैर! इस बीच किताबें तो खरीदता भी रहा और पढ़ता ही रहा। मगर दो किताबें जो सबसे अधिक पलटी गईं वे रहीं- डॉ सालिम अली की ‘द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स’ और प्रदीप क्रिशन की ‘ट्रीज़ ऑफ़ डेल्ही’। सालिम अली की प्रतिभा से तो सभी परिचित हैं मगर फ़िल्म डाइरेक्टर प्रदीप क्रिशन की किताब बेहद शानदार है। किताब का शीर्षक दिल्ली के पेड़ो तक अपने को सीमित करने का आभास ज़रूर देता है, मगर इसके अन्दर भारत के मुख्य पेड़ो के बारे में जानकारी बेहद क़रीने से दी गई है।
मज़े की बात यह है कि प्रदीप क्रिशन कोई वनस्पति-विज्ञान के विशेषज्ञ न थे मगर उन्होने अपने से ही अध्ययन करके स्वयं को इतना शिक्षित कर लिया कि समाज को एक कमाल की किताब का योगदान कर सके। इस प्रयास में उन्हे सात-आठ साल लगे, घूम-घूम कर के पेड़-दर्शन किए और जम कर आनन्द लिया होगा इस में मुझे कोई शक़ नहीं है। एक पेड़ को पहचानना, प्रकृति के साथ आप के एक खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत बन सकता है और गहरे निर्मल-आनन्द का स्रोत भी।

किताब में २५२ पेड़ों का विवरण दिया है मैंने अस्सी के आसपास पहचान लिए हैं, जिसे लेकर मैं खूब प्रसन्न हूँ। इस किताब को शुरु करने के पहले शायद में आठ-दस को पहचानता रहा होऊँगा। चिड़ियों को भी पहचान रहा हूँ पर उस गति से नहीं; चिड़िया पेड़ की तरह एक जगह स्थिर तो रहती नहीं ना।
कमाल की बात ये है कि उसी पुराने दृश्य में अब नई दिलचस्प चीज़ें दिखने लगी हैं।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

सेक्स और वायलेन्स

कभी सोचा आप ने क्यों इन दो शब्दों का साथ में इस्तेमाल होता है हमेशा? मनोवैज्ञानिक, फ़िल्ममेकर्स और रॉकस्टार्स हों या कोई और इन दो वृत्तियों के इर्द—गिर्द ही घूमते हैं। जहाँ सेक्स आता है वहाँ वायलेंस भी घुसा चाहता है और वायलेंस को तो सेक्स चाहिये ही। ऐसा लगता है कि ये दोनों जोड़ीदार हों जैसे। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। वायलेंस जहाँ मृत्युकामी है वहाँ सेक्स जीवनोन्मुखी है (असल में मृत्युकामी कहना विरोधाभास है.. क्योंकि काम का एक अर्थ स्वयं सेक्स है। काम का मूल अर्थ इच्छा है) तो कहना चाहिये कि वायलेंस मृत्योन्मुखी है और सेक्स जीवनोन्मुखी।

अब ये बात अलग है कि हमारे समाज में सेक्स को इतना लतिया दिया गया है कि उसके स्मरण मात्र से किसी भी नैतिक मनुष्य के मन में ग्लानिभाव पसीज जाता है। पर सेक्स या कामभाव जीवन की रचना का पूर्वगामी है। इसी बात को अलग तरह से कहें कि जीवन के प्रति मनुष्य (या फिर किसी भी जीव) की आस्था सेक्स के ज़रिये भी अभिव्यक्त होती है।

मगर फिर भी ये सेक्स वायलेंस के साथ वैसे ही जुड़े रहता है जैसे प्रकाश के साथ अँधेरा जुड़ा रहता है। मैंने अक्सर पाया है कि मृत्यु से बेहद घबराए लोग सेक्स की गोद में जा गिरते हैं। गाँधीजी ने जो अपनी आत्म कथा में लिखा है वो कोई अपवाद नहीं है – वे अपनी पिता के मृत्यु के ठीक पहले अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे। मैं नहीं जानता कि गाँधी जी ने ‘शुद्ध वासना’ में ऐसा किया या मृत्यीले अँधेरे से घबरा कर? पर मैं कई दूसरे ऐसे लोगों को जानता हूँ जिन्होने ऐसा सिर्फ़ जीवन को कस कर पकड़ने की चेष्टा में किया होगा। वैसे ‘शुद्ध वासना’ भी जीवन के प्रति एक लोभ से अधिक और क्या है?

सेक्स और वायलेंस का सबसे भयंकर रूप हमें युद्ध में सुनने को मिलता है। मनुष्य जाति का इतिहास जीतती हुई सेना के हिंसा के ताण्डव के बाद हारे हुए लोगों की स्त्रियों के साथ बलात्कार का इतिहास है। मृत्योत्सव में लिप्त सिपाही भी जीवन को पकड़े रखना चाहता है.. और अपनी इस पकड़ को वो मारे गए सिपाहियों की स्त्रियों पर आरोपित करता है। बिना यह विचारे कि वह स्त्री भी क्या जीवन की रचना में उसका सहयोग करना चाहती है या नहीं? वह सिर्फ़ पशुवृत्ति से संचालित होता है।

विडम्बना यह है कि प्रकृति भी उन स्त्रियों की असहमति की पूरी तरह से अनदेखी करती है और जीवन रचने को तैयार रहती है। क्योंकि अधिकतर स्तनपायी पशुओं में तो अक्सर इस तरह की हिंसा के बाद ही सहवास सम्भव होता है।

अगर इस दृष्टि से देखें तो हिंसा भी जीवन की कामना के सहयोगी-वृत्ति के रूप में काम कर रही है.. और महज़ प्रतिद्वन्द्वी को हटाने के लिए ही मूलरूप से अभिव्यक्त हो रही है।

तो फिर क्या हिंसा को मृत्युकामी कहना ठीक ही है?

बुधवार, 23 अप्रैल 2008

जूजू..

बचपन में आप ने भी कभी जूजू का पीछा किया होगा शायद.. जो कभी हाथ नहीं आता है। जितना आप उसके पीछे भागिए वो उतना ही फ़िसलता जाता है। लगभग असम्भव सा होता है इस जूजू को पकड़ना। क्योंकि उसे पकड़ने के लिए जैसे आप हवा को चीरते हुए अपने हाथों को आगे बढ़ाते हैं और वैसे ही हवा में पैदा हुआ यह संवेग जूजू को और आगे फेंक देता है। सच में हवा से भी हलके होते हैं ये जूजू..!

बचपन में कभी नहीं समझा कि होते क्या हैं जूजू.. ? हाँ ये पता था कि मदार/आक की झाड़ी के सुन्दर सफ़ेद फूल पककर बड़ी सी हरी गुझिया जैसे फल में बदलकर एक दिन फूट जाते हैं तो उस में से ये रूई के फाहे सब ओर उड़ने लगते हैं। तब मन को बड़ा लुभाते तो थे ये यहाँ-वहाँ उड़ते हुए जूजू मगर एक पेड़ के बतौर मदार का कोई औचित्य समझ नहीं आता था। बताइये बाकी सभी पेड़ ऐसे फल देते हैं जिनको आदमी खा-पी सकता है मगर ये कैसा फल है जिसके बारे में उलटा कहा जाता है कि ज़हरीला है.. !

पर कुछ और पढ़ने लिखने और डेविड एटनबरो की कुछ डॉक्यूमेन्टरी देखने के बाद समझ आया कि प्रकृति में मदार का भी उतना ही महत्व है जितना किसी दूसरे पेड़-पौधे का। आखिर सभी अपने बीज का प्रसार ही तो कर रहे हैं। मामला बस इतना है कि एक जगह पर जड़ जमाए बैठे खुद चलकर दूर-दूर तक अपने बीज नहीं फेंक नहीं सकते तो तरह तरह की तरक़ीबें निकालते हैं।

अपने बीज के साथे कुछ ऐसी लुभावना माल लपेट देते हैं जो जानवरों (आदमी समेत) के लिए आकर्षक हो। वे बीज को तोड़ें, आकर्षक लुभावने गूदे को खाएं, और चलते-चलते कहीं दूर निकल जाकर बची हुए बेकार चीज़ यानी बीज को यहाँ-वहाँ की ज़मीन पर फेंक दे या बीज को भी अगर खा गए तो पेट के रास्ते होते हे मल रूपी खाद समेत भूमि पर पहुँच जाए। ऐसा आम तौर पर उन बीजो के साथ होता है जो एक फल के भीतर सैकड़ों की संख्या में होते हैं। यदि एक फल में एक बीज होता है तो अक्सर वो अखाद्य होता है।

पर मदार ने यह तरक़ीब नहीं अपनाई। उसने अपने पुनुरुत्पादन के लिए/ प्रसार के लिए जानवरों का सहारा नहीं लिया। उसने अपने बीजों को पंख दे दिये। बीज बनाने की प्रक्रिया पूरी हो जाने पर फल फट जाता है सारे बीज हवा के साथ उड़ चलते हैं.. जहाँ अनुकूल वातावरण मिल जाएगा.. जड़ जमा लेगा ।
इस उड़ते हुए बीज का कितना गहरा मक़सद है.. मैं सोच कर हैरान हूँ। पर अकसर मैं एक आदमी की तरह अपने मक़सद को लेकर भी गहरी तौर पर उलझा रहता हूँ.. कि इस दुनिया में मेरा क्या मक़सद है। आप ने भी ज़रूर कभी सोचा होगा इस बारे में?


नीचे की तस्वीर में पुणे की व्यस्त सड़क के किनारे सुस्ताता मदार के बीजों का एक दल।

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

व्यसन का विरोध?

सिगरेट छोड़े हुए लगभग एक साल हुआ जा रहा है और आजकल बरसो की पुरानी सहेली की याद बहुत सता रही है। पुरानी लत है शायद अभी भी उसके अवशेष अवचेतन में कहीं दबे पड़े हैं। कितना नसेड़ी होता है आदमी क्या-क्या नशे पाले रहता है.. चाय कॉफ़ी, पान, तम्बाकू, सुपाड़ी, सिगरेट, शराब, भांग, चरस, गांजा, अफ़ीम, कोकेन। एक बार पिया इनको और गए.. शरीर फिर-फिर माँगता है इनका सेवन। सब के साथ एक ही बार में ही बेड़ी पड़ जाती हो ऐसा नहीं है- कुछ थोड़ा ज़्यादा समय लेते हैं।

होता क्या है एडिक्शन..? किसी पदार्थ के सेवन की बार-बार तलब, चाहत, हुड़क ही तो लत पड़ जाना है। एक अनुभव के अनन्त काल तक पुनरुत्पादन की इच्छा। आप को कुछ जानी-पहचानी बात नहीं लग रही ये..? जीवित जगत का हर जीव-जन्तु अपने पुनरुत्पादन के ही काम में तो निरन्तर लगा हुआ है। कुछ जड़ पदार्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर इस स्वभाव की अभिव्यक्ति करें तो यह चकित करने वाली बात ज़रूर है लेकिन प्रकृति के स्वभाव के अनुकूल ही है।

अस्तित्वात्मक दुविधा यह है कि आदमी इन पदार्थों के सेवन का प्रतिरोध कर के जीवन का समर्थन कर रहा है या प्राकृतिक स्वभाव का विरोध?

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007

बैक्टीरिया अच्छे हैं!

हार्वर्ड पत्रिका में एक दिलचस्प लेख छपा है। लिखते हैं कि बहुत पहले वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों को जीन सम्बन्ध के आधार पर एक जीवन वृक्ष के रूप में प्रदर्शित किया था जिसमें जिसका चित्र कुछ यूँ था..

मगर हाल की कुछ खोजों से पता चला है कि पुराने लोग इस पूरे जीवन को टेलेस्कोप के गलत सिरे से देख रहे थे.. सच्चाई कुछ यूँ दिखती है..

वनस्पति, जन्तु और फ़न्गी जगत इस विशाल वृक्ष के अत्यन्त मामूली अंग है..जिसके मुख्य अंग का निर्माण करते हैं:
१)बैक्टीरिया यानी एककोशीय वे सभी जीव जिनके भीतर कोई नाभिक नहीं होता।
२)आर्किया या आर्किबैक्टीरिया यानी वे जीव जो अपने सरल रूप में बैक्टीरिया जैसे ही होते हैं पर उनकी कोशीय संरचना काफ़ी अलग होती है। और
३)यूकेरया यानी शेष सभी जीव जिनके कोश में नाभिक मौजूद होता है। इस श्रेणी में पशु, पक्षी पौधे सभी आयेंगे।

पुरानी समझ के चित्र में मोनेरा के अन्तर्गत बैक्टीरिया और आर्किया को रखा गया है और प्रोटिस्टा के अन्तर्गत बची हुई सारी नाभिकीय संरचनाएं। हम अपनी पृथ्वी में किस कदर अल्पमत में हैं, इसका एहसास इस नई खोज से हो रहा है।

अगर आप के मन इन जीवों को लेकर कोई विकार हो तो दूर कर लें। आप सोचते हों कि बैक्टीरिया मतलब बीमारी। तो समझें कि हम भी इन्ही के जैसे ही एक जीव हैं बस हमारी कोशिकाओं में एक नाभिक है और हमनें पौधों और अन्य पशुओं की तरह या उनके साथ एक लम्बी विकास की प्रक्रिया में एक जटिल संगठन बना लिया है.. अपनी ही विघटित कोशिकाओं का संगठन। आज भी मनुष्य का जीवन एक कोशिका से ही शुरु होता है, जो माँ के गर्भ में विघटित हो-हो कर एक जटिल संरचना के रूप में विकसित हो जाता है जिसे हम मनुष्य मानते हैं। और इस जटिल संरचना का ब्लू प्रिंट ही हमारा डी एन ए कहलाता है। और जहाँ तक डी एन ए का प्रश्न है तो एक आलू और मनुष्य ज़्यादा करीब के रिश्तेदार हैं बजाय कि दो बैक्टीरिया के। कल्पना कीजिये इस जगत की विविधता को।

हमारा जीवन इस अदृश्य माइक्रोबायल जगत से बुरी तरह प्रभावित है। वे बादल बनाते हैं, चट्टानों को तोड़ते हैं, खनिज जमाते हैं, पौधों को खाद देते हैं, मिट्टी को तैयार करते हैं, विषैले अवशिष्ट को साफ़ करते हैं। मनुष्य के शरीर में लगभग १० ट्रिलियन कोशिकाएं हैं, मगर १०० ट्रिलियन माइक्रोब्स हैं। जो हमारे लिए खाना पचाते हैं, विटैमिन्स बनाते हैं, और हमें इन्फ़ेक्शन से बचाते हैं। हाँलाकि कुछ माइक्रोब्स हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक भी हैं। लेकिन अगर हमें इन माइक्रोब्स से वंचित कर दिया जाय तो हम बुरी तरह बीमार पड़ जायेंगे। अभी भी इनकी पूरी भूमिका को जाना जाना है।

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

मंगलवार, 28 अगस्त 2007

शरीर आराम कर रहा है..

जैनियों के यहाँ सूर्यास्त के बाद न खाने की परम्परा है। बहुत से हिन्दू साधु भी ऐसे ही नियम का पालन करते हैं। सत्यनारायण गोयनका के विपासना कोर्स में भी दिन का आखिरी खाना शाम पाँच बजे दे दिया जाता है। मुम्बई के योग संस्थान में भी शाम का खाना हल्का रखने और जल्दी से जल्दी करने की सलाह दी जाती है। ये एक परम्परागत ज्ञान है जिसे सभी पंथ/ मत के लोग अंगीकार किए हुए हैं। गाँव-देहात में भी जल्दी खा के जल्दी सोने की परिपाटी पुरातन काल से चली आ रही है। मगर शहरी जीवन ने इस मूल्य को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है।

हम शाम के वक्त समोसा, चाट, वड़ापाव, बर्गर वगैरा खाते हैं, और उसके बाद भी आखिरी खाने का अवसर बचा रहता है। जो रात को नौ, दस, ग्यारह बजे तक सम्पन्न होता है। मेरे कुछ मित्र अपना ये सुप्रतीक्षित आहार रात के एक दो बजे भी कर के तृप्त होते हैं।

वैसे आयुर्वेद के अनुसार भोजन को पचाने में सहयोगी तत्व पित्त मध्य-दिवस और मध्य-रात्रि में ही प्रबल होता है। उस दृष्टिकोण से मध्य-रात्रि भोजन करने का सबसे उचित समय ही तो हुआ। मगर उस से दूसरी जटिलताएं पैदा होती हैं।

इस तरह के खाने के तुरन्त बाद व्यक्ति क्या करेगा; सो जाएगा या दो अढ़ाई घंटे और जागता रहेगा? अगर जागता रहेगा तो खाया हुआ खाना तो पच जाएगा मगर चार बजे सोकर अगले रोज़ दस बजे के बाद ही उठेगा। तो इस तरह से दिन की शुरुआत में पित्त प्रबल होगा और वात मन्द। मल की निकासी ठीक ढँग से नहीं हो सकेगी और शरीर में विकार जन्म लेगा। और पूरे शरीर का पाचन-चक्र बिगड़ जाएगा। और लम्बे समय तक इसी तरह चलते रहने पर शरीर में गम्भीर रोग उत्पन्न हो जाएंगे।

अगर व्यक्ति उपरोक्त मध्यरात्रि के भोजन के बाद तुरंत सो जाता है तो और भी मुश्किल है। एक तो खाये हुए भोजन का पाचन सही तरह से नहीं हो सकेगा। दूसरे शरीर की अधिकतर ऊर्जा खाने के पाचन में लग जाने के कारण, नींद अच्छी नहीं आएगी। और सोकर उठने के बाद भी व्यक्ति को भारीपन लगता रहेगा।


कुछ लोग तो नींद को बेहोशी के सिवा कुछ नहीं मानते इसलिए हमेशा दारू पीकर छाई बेहोशी को ही नींद का पर्याय मानते रहे हैं। मेरा खयाल है कि ऐसे लोग बेहोशी के अँधेरे में ही नहीं, शुद्ध जहालत के अँधेरे में भी हैं। थोड़ी बुरी लगने वाली बात कह दी है, माफ़ कीजियेगा। इस अँधेरे में रहने और अपनी हानि करने का आप को पूरा हक़ है। मगर जानकर करें, अज्ञानता में क्यों?

नींद के वक्त लोग सोचते हैं कि शरीर आराम कर रहा है। क्या सचमुच? एक नज़रिया यह कहता है कि व्यक्ति आराम कर रहा है मगर शरीर काम कर रहा है। नई कोशिकाएं जन्म ले रही हैं, जो बीमार हैं, टूट-फूट गई हैं उनका इलाज हो रहा है। असल में तो जागते हुए शरीर आराम कर रहा है.. हल्की फुल्की गतिविधि कर रहा है। मगर 'सोते हुए' उसका काम इतना ज़्यादा है कि उसे दूसरे एप्लीकेशन्स शट-डाउन करने पड़ते हैं। इसीलिए बच्चा सोता है बीस-बीस घंटे। उसके पास बहुत काम है, बहुत तेज़ी से और बहुत सारा विकास करना है। जैसे-जैसे बचपन छूटता जाता है, नींद के घंटे कम होते जाते हैं। शरीर का विकास धीमा पड़ता जाता है, और एक मकाम पर आकर एकदम रुक जाता है।

मगर फिर भी नींद की ज़रूरत पड़ती रहती है। क्योंकि शरीर जीवित है और तमाम क़िस्म के बाहरी आक्रमण और भीतरी कमज़ोरियों का इलाज वह खुद करता है। ये लोगों की भ्रांति है कि दवाईयाँ कोई इलाज करती हैं। दवाईयाँ सिर्फ़ आपूर्ति करती हैं। शेष सारा काम शरीर स्वयं करता है। अतिवृद्ध हो जाने पर नींद आनी बंद हो जाती है- शरीर धीरे-धीरे जवाब दे रहा होता है; नई कोशिकाएँ बनना बंद हो जाती हैं, पुरानी की टूट-फूट की मरम्मत भी ठप पड़ जाती है।

इसलिए देर से खाकर तुरंत सोने पर नींद का बड़ा भाग और शरीर की अधिकतर ऊर्जा खाना पचाने में चली जाएगी। और जागने पर भी एक नई सुबह का एहसास नहीं होगा। क्योंकि टूट-फूट की मरम्मत का काम नहीं हो पाया। अगर ऐसी ही दिनचर्या चलती रही तो वो कब होगा? वो मुल्तवी पड़ा रहेगा। और फिर धीरे धीरे एक गम्भीर रोग के रूप में विकसित हो जाएगा।

देर से खाने और भारी खाने से कितने नुकसान हैं, देखिए.. मेरा खयाल है कि यही कुछ कारण रहे होंगे जिसकी वजह से लगभग सभी पुरातनपंथी रात के खाने को जल्दी और हल्का रखने की कोशिश करते हैं।

कभी कभी इस तरह उपदेशात्मक लिखने का अधिकार मैंने सुरक्षित रख छोड़ा है..प्लीज़ एडजस्ट!


रविवार, 26 अगस्त 2007

चीज़ों में जीवन

बिस्तर पर अधलेटा मैं अंदर के कमरे में देश की बड़ी समस्या का हल निकालने में चिंताग्रस्त था कि अचानक अअअअअअद्द करके एक आवाज़ बाहर के कमरे से आई। देश की चिंता में विघ्न? चौंक गया। दो पल के बाद समझा कि मेज़ से टिकाया गया एक बैग मुँह के बल गिर पड़ा है। उसने ये फ़ैसला अचानक किया हो ऐसा नहीं लगता। बहुत नाप-तौल कर एक लम्बी व धीमी प्रक्रिया में लागू किया गया था ये मुँह के बल गिरना। मैंने देखा है दूसरे मौकों पर भी जब चीज़ें इसी तरह आदमियों से स्वतंत्र अपनी सत्ता की घोषणा कर रही होती हैं।

पेड़ का खड़े-खड़े गिरना तो फिर भी समझ आता है; उसमें जीवन मानते हैं कुछ लोग। मगर जड़-निर्जीव चीज़ें? कभी अचानक एक स्टील की प्लेट छनछना कर किचेन में उत्पात करती है, कभी कोई परदा, पेलमेट से अपना नाता तोड़ लेता है। एक बार तो मेरी किताबों की भारी-भरकम रैक जो दीवार के साथ मजबूती से जड़ी गई थी, अचानक फ़र्श की मोहब्बत में गिर गई (जब से अंग्रेज़ इस मुल्क में आए हैं तब से लोग और चीज़ें मोहब्बत में सिर्फ़ गिरते हैं- फ़ेल इन लव, यू नो- उनके पहले उठने की भी रवायत थी)। बाद में पता चला कि दीवार और रैक के बीच अलगाव की यह आग, सीलन ने लगाई थी। बताइये, हद है! बाद में उसे खुद अपनी गलती का एहसास हुआ कि फ़र्श के साथ उसकी मोहब्बत एक छलावा थी, धोखा थी। कई दिनों तक दीवार और रैक, दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की, लेकिन एक बढ़ई ने आकर दोनों का वापस मेल-मिलाप करा दिया।

इस तरह की बात करते हुए ऐसा लगता है चीज़ों में सचमुच जीवन है। है क्या? आम तौर हम निर्जीव उन्हे मानते हैं, जो अचल हैं और बदलाव से परे हैं। पत्थर को पत्थर हम सिर्फ़ इसलिए कहते हैं कि वह सालों साल जस का तस पड़ा रहता है, बिना किसी हलचल के। मगर वही धरती के भीतर दबे पत्थर सालोसाल की एक लम्बी-धीमी प्रक्रिया में बदल के कैसे-कैसे रत्न भी तो बन जाते हैं। और लोहा भी हवा और पानी के सम्पर्क में आकर ज़ंग खाने लगता है। यूरेनियम और हीलियम के सम्पर्क से क्या होता है आप जानते ही हैं।

क्या इसे जीवन कहना उचित नहीं होगा? शायद नहीं। क्योंकि इनमें चेतना का अभाव है? या कहीं यह तो नहीं कि हमारी चेतना, उनकी चेतना को पहचानने में सक्षम नहीं? जिस पृथ्वी की मिट्टी, हवा और पानी में लगातार करोड़ों सालों से एक जीवन चल रहा है, जीवधारी जन्म-मरण की एक सतत प्रक्रिया में लगे हुए हैं, उस पृथ्वी को निर्जीव कहना कहाँ तक तर्कसंगत है? क्या पृथ्वी अपनी समष्टि में एक जीवित, सचेत संरचना नहीं हो सकती? ये सारा जीव-निर्जीव प्रपंच उसके विभिन्न अवयव ही तो हैं। आखिर हम जीवधारियों का शरीर भी तो अलग-अलग स्वतंत्र कोशिकाओं का एक समुच्चय भर ही तो है।

बुधवार, 9 मई 2007

पुरुष की इस प्रतिगामी प्रकृति का क्या करें ?

मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष पुराना है.. भारतीय वाङ्मय में इसे पुरुष और प्रकृति के द्वैत से भी जाना गया है.. या सांख्य दर्शन में (कपिल के अनीश्वीरीय दर्शन नहीं, बल्कि भागवत के श्रीकृष्णीय दर्शन में )..एक पुरुष के मुकाबले में प्रकृति और उसके सहयोगी २३ या २४ या २७ तत्व... तर्क यह है कि पुरुष या जीव माया / प्रकृति के आवरण/ जंजाल में इतना लिप्त हो जाता है कि ईश्वर तक उसकी पहुँच बन ही नहीं पाती.. तो ईश्वर से सम्पर्क बनाने का तरीका है कि माया को, प्रकृति को किनारे किया जाय.. रास्ते से हटाया जाय.. और इस भौतिक बोझ को सर से उतार फेंक इतना हलका हो जाया जाय कि ईश्वर में लीन हो जाने में..सांसारिकता से ऊपर उठ जाने में .. अनन्त के साथ एक हो जाने में कोई बाधा न रहे..

दूसरी ओर इस दर्शन की उलट खड़ी पश्चिम की भौतिकवादी सभ्यता भी कुछ इसी प्रकार का अन्तर्विरोध चिह्नित करती आई है काफ़ी पहले से.. पुराने विधान के समय से.. खुदा ने पाँच दिन तक प्रकृति को बनाया और छठे दिन पुरुष को बनाया और उसे बताया ये सब उसके लिये है.. उसके अधिकार के अन्तर्गत है.. तो मूसा आये, ईसा आये और मुहम्मद भी आये पर ये ईश्वर-प्रदत्त धरती का अधिकार नहीं बदला.. औद्योगिक समाज ने अति ही कर दी.. मनुष्य के विकास का रास्ता प्रकृति के शोषण से होकर जाता है.. इस राह पर मनुष्य का भी शोषण होता है.. उसे कम मजूरी मिलती है.. पर मिलती तो है.. प्रकृति को तो मिलता है ठेंगा.. बाबा मार्क्स ने भी कहा है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच के अन्तर्विरोध हल हो जाने के बाद मनुष्य प्रकृति के साथ पूरे ऊर्जा के साथ उलझ सकेगा..

तो क्या टंटा है ये पूर्व और पश्चिम के वैर का .. प्रतिमुख जीवन पद्धतियों का.. दो अलग दिशाओं में इंगित करती विचारधारा का.. भईया उद्देश्य तो एकै लौका रहा है.. फिर काहे के लिये बेबात में लट्ठमलट्ठा.. तो ऐसा लगता है कि अब वो दिन दूर नहीं.. जब पुरुष का प्रकृति के साथ का पुराना वैर.. ईश्वरीय और शुद्ध भौतिकवादी अनीश्वरीय .. दोनों प्रकार का.. सदा के लिये हल हो जायेगा.. कहते हैं ना भईया पूरब जाओ या पश्चिम घूम के एकै जगह आ जाओगे.. तो देखिये आ गये ना सब एक बिन्दु पर.. हो गया ना मेल.. का बोलते हैं.. ?

फ़रक बस इतना है कि अपनी भारतीय परम्परा के ज़रिये भारहीन हो कर प्राकृतिक मल से मुक्त हो जाने का स्वप्न तो नहीं पूरा हो सका.. किसी को हुआ हो हिमालय की किसी कन्दरा में तो वो हमें बताने नहीं आया.. और कबीर जैसों ने तो बताने से इंकार तक कर दिया गूँगे का फल कह कर.. मगर इस विस्फोटक पश्चिमी चिन्तन का असर तो हो गया है.. और जो अपने आस पास हम लगातार देख रहे हैं आजकल.. रोज़-ब-रोज़ हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं.. इस औद्योगिक जीवन में.. महानगरीय जीवन जीते हुये.. सुबह शाम की नित्यता से भी मुक्त हो चुके हैं हम.. सूरज को उगते डूबते देखना तो दूर की बात है.. कब रौशनी हुई और कब अँधियारे ने हमें व्याप्त लिया इसका एहसास भी नहीं होने पाता हमें.. हमारे पैर घास और मिट्टी का मृदु एहसास भी भूल चुके हैं.. गर्मी में हम ए.सी. चला लेते हैं..सर्दियों में हीटर.. ज़्यादातर जंगलों का सफ़ाया हो चुका है.. जो बचे हैं उन पेड़ों से हमारा कितना परिचय है.. विशेषज्ञों की बात मत करिये.. कितने पेड़ों का नाम जानते हैं हमारे बच्चे..?

आज सारे पृथ्वी की ज़मीन पानी हवा आकाश पर पुरुष का कब्ज़ा है.. जानवर पक्षी और कीड़ों को पृथ्वी की विरासत से बेदखल किया जा चुका है.. प्रकृति को पुरुष ने काफ़ी कुछ घुटनो तले दबोच दिया है.. और परस्पर आवलंबिता की सारी बकवास अर्थहीनता की घूरे पर आखिरी साँसे गिन रही है.. विविधिता के चितकबरेपन की गपड़चौथ अब हमें व्याकुल नहीं करेगी .. अब सब कुछ एकरंगीय बनाया जा सकेगा..

देखिये प्रकृति रिरिया रही है.. पुरुष इस प्रकृति से सदा सदा के लिये मुक्त न भी हो सके तो कम से कम उसने सम्पूर्ण प्रकृति को पूरी तरह चूस कर शेष को मलवत कर ही दिया है.. और अब पुरुष की नज़र सौर मण्डल की सीमाओ के परे जा रही है..ये ग्रह नष्ट भी हो गया तो क्या.. किसी दूसरी प्रकृति की तलाश में निकल जाने की तैयारी हो रही हैं.. पुरुष आज मंगल पर बसने की बात कर रहा है.. बस एक ही चिन्ता मुझे खाये जाती है.. कि पुरुष की भीतर की इस प्रतिगामी प्रकृति का क्या करें.. जिसके चलते पुरुष एक दिशा में अपनी सहमति से चलते चलते नये तर्क पा कर या पुराने तर्कों की नई ज़मीन पाकर, अचानक असहमत हो जाता है.. और अपनी ही बनाई व्यवस्था के भंजन के लिये उद्धत हो जाता है..
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