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शनिवार, 12 जनवरी 2008

बुड़ुम.. बुड़ुम.. बुड़ुम..

आज सुबह एक पोस्ट लिख कर वापस सोने चला गया। जब जागा तो बाहर के कमरे से कुछ आवाज़ आ रही थी। भली सी, सुखद, तसल्ली देने वाली आवाज़। एक पल के बाद याद आ गया कि यह आवाज़ एक कम्प्यूटर गेम से आ रही थी जो तनु खेल रही थी। आम तौर पर वीडियो गेम्स, कम्प्यूटर गेम्स से धाँय धूम, धाड़ भाड़, शाँय शूँ, भीं‍ऽऽऽ ईंऽऽऽऽ तरह की आवाज़े आती हैं पर इस गेम से टुड़ुम-टुड़ुम-टुड़ुम, बुड़ुम-बुड़ुम, टुपुक, छपाक जैसी आवाज़े आ रही थीं। थोड़ी देर इन्हे सुनते रहने के बाद समझ आया कि ये सारी आवाज़े बूँद के जलराशि में मिलने की आवाज़े हैं।

और फिर इस ख्याल के साथ एक गूढ़ बात में उलझ गया। पुराना मुहावरा है बूँद के सागर में मिलने का- आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को परिभाषित करता। और ख्याल आया अपनी मृत्यु और मृत्यु जनित अपने भय का.. अपने अस्तित्व के विखण्डन का। कोई अनोखा भय नहीं है मेरा। सभी डरते हैं मरने से। क्या यह जानकारी इस भय को भगाने के लिए काफ़ी नहीं कि मर कर हम बूँद के बदले सागर का अस्तित्व ग्रहण करेंगे? शायद नहीं.. या बिलकुल नहीं.. अगर काफ़ी होती तो हम डरते ही क्यों?

क्या हम डरते हैं क्योंकि हम अज्ञान के अँधेरे में हैं या हम डरते हैं क्योंकि हमें पता है कि सचमुच विखण्डन हो ही जाएगा? भारतीय अध्यात्म कहता है कि हमारा डर सिर्फ़ अज्ञान से उपज रहा है और विज्ञान मानता है कि सचमुच विखण्डन होना ही नियति है।

हिन्दू लोग अपनी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार इसीलिए मृत्यु के हर अवसर पर मोह-शोक—दुःख से ग्रस्त होने पर गीता-पाठ करते हैं कि आत्मा तो अजर-अमर है कपड़े बदलती है आदि आदि। पर वही लोग जो गीता-पाठ करते-कराते हैं गरुड़ पुराण का प्रेतकल्प पढ़ने और उसके अनुष्ठानों को करने की सलाह भी देते हैं। उस प्रेतकल्प के अनुसार शरीर को जला देने के बाद जो बचता है वह आत्मा नहीं अँगूठे के आकार का प्रेत है। कहीं और पढ़ेंगे तो आप को कुछ और मान्यता मिल जाएगी।

अध्यात्म के भीतर आत्मा सम्बन्धी विचार कोई एक नहीं है कि सीधे सीधे कपड़ने बदलने जैसी बात हो। मामला ज़रा जटिल है और आप उसमें जितना बूड़ियेगा उसका रंग उज्जवल होने के बजाय श्याम की ओर गहराता जाएगा। फिर भी यह मान्यता ठोस रूप में बनी रहती है कि आप चाहे, न चाहें, मानें, न मानें, मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। शरीर से स्वतंत्र अस्तित्व!

गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो..
विज्ञान ऐसा नहीं मानता। विज्ञान कहता है कि सबसे जटिल भौतिक संरचना और सबसे उन्नत चेतना वाला प्राणी मनुष्य है.. पर साथ ही मानता है कि शरीर के साथ ही चेतना का भी विखण्डन हो जाता है- मृत्यु के बाद चेतना (आत्मा) के स्वतंत्र अस्तित्व जैसी धारणा अतार्किक है। ग़ौरतलब है कि विज्ञान चेतना के अस्तित्व को नहीं नकारता.. सिर्फ़ उसके स्वतंत्र अस्तित्व को नकारता है।

तो फिर चेतना क्या है? विज्ञान के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है पर हाँ वह इसे भौतिक पदार्थ के जटिल सरंचना का साइड इफ़ेक्ट सा मानता है। आत्मा की अनादि अनन्त स्वभाव पर अध्यात्म का ज़ोर है और पदार्थ की अखण्डता, शाश्वतता को विज्ञान मानता है.. कहीं ये एक ही सिक्के के दो पहलू तो नहीं? पर किस तरह.. ?

अब वापस लौटते हैं मूल बूँद और सागर की बात पर.. यदि वैज्ञानिक मान्यता से इस बात को देखें तो ठीक और तार्किक मालूम होती है। सिवाय एक पहलू के कि व्यष्टि के समष्टि में विलीन होने पर चेतना के स्तर पर कुछ भी घटित नहीं होगा क्योंकि शरीर की जटिल सरंचना का विखण्डन होते ही चेतना नष्ट हो जाएगी।

यदि आध्यात्मिक मान्यता से भी चला जाय तो बूँद सागर में मिल भी गई तो भी उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है प्रेत के रूप में जो कर्म-बन्धन के चलते बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहने के लिए बाध्य है। मगर प्रेत के रूप में और बारम्बार शरीर के रूप में उसे अनन्त दुःखों का भागी-भोगी होना ही पड़ता है। इसीलिए बुद्ध ने इस दुःख से निवृत्ति का मार्ग बताया.. जो गीता के मार्ग से सैद्धान्तिक रूप से अलग नहीं है। गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो।

शरीर के भीतर चेतना की यह अलख वाली बात ध्यान देने योग्य है। बुद्ध अपने साधकों को वैचारिक मारा-मारी से दूर रहकर विपश्यना करने की सलाह देते हैं। वि-पश्य-ना.. वि माने विशेष और पश्य माने देखना। विपश्यना माने शरीर को खास तरह से देखना। ऐसे कि शरीर के एक-एक अणु को आप स्वतंत्र अस्तित्व के बतौर पहचान सकें, जान सकें और देख सकें।

क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ?या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्न्त स्वभाव चित को प्राप्त हो जाता है ..?
जब कोई ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं तो इसे बोध हो जाना कहते हैं या दूसरे शब्दों में पूरी तरह से चेतन हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त हुआ व्यक्ति फिर जन्म नहीं लेता वह महाबोधि को, कैवल्य को, मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। मतलब कि फिर बूँद का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहता। बूँद सागर में मिलने से घबराती नहीं क्योंकि कुछ खोता नहीं बहुत कुछ, सब कुछ मिल जाता है।

अगर इस आध्यात्मिक परिघटना को विज्ञान से समझने की कोशिश करें तो शायद यह कहना अनुचित न होगा कि चेतना का जो साइड इफ़ेक्ट, जो चेतन व्यवहार, पदार्थ का जो आधिभौतिक पहलू, पदार्थ की जटिल संरचना के चलते पदार्थ के भीतर फ़ौरी तौर पर पाया गया था वो साइड इफ़ेक्ट जटिलता के नष्ट होने पर भी पदार्थ के सरल स्वरूप में भी पदार्थ संचित कर ले जाता है। और एक महाचेतना का अंग बन जाता है। कैसे?

क्या माया के परदे से बाहर निकल अँधेरे को हटा कर पदार्थ सीख जाता है, जान जाता है.. क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ? या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्नत स्वभाव- चित को प्राप्त हो जाता है ? और अगर ऐसी कोई परिघटना अगर सचमुच सम्भव है तो क्या इसीलिए बड़े-बूढ़े बार-बार चेताते हैं कि मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती इसका सदुपयोग कर लो..? .. ह्म्म ! कुछ कहानी बनती है क्या?

गुरुवार, 1 नवंबर 2007

आपका अगला जन्म

कहते हैं कि इंसान सबसे अधिक प्यार अपनी औलाद को करता है। माँ के बच्चों के प्रति प्रेम/ समर्पण को कितना महिमामण्डित किया गया है। पिता के बारे में भी कहा जाता है कि वह प्रदर्शित नहीं करता मगर जो कुछ करता है औलाद के लिए ही। काफ़ी हद तक सच भी है यह बात। हम मनुष्य ही नहीं प्रकृति का एक-एक अवयव, सभी जीवित पदार्थ स्वयं का पुनरुत्पादन कर रहे हैं। बैक्टीरिया से लेकर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी अपने सीमित जीवन काल को अनन्त काल तक खींचने के लिए अपने ही जैसी संरचना को अपने भीतर से जन्म देकर अपने से स्वतंत्र कर देते हैं। और अपनी मृत्यु के बाद भी एक दूसरे स्वरूप में जीवित रहते हैं।

यदि जीवन जीना किसी भी प्राणी की सबसे बड़ी प्रवृत्ति है तो उसका पुनरुत्पादन भी उसी वृत्ति का ही एक पक्ष है। ये एक दूसरी बात है कि मनुष्य ने अपने विकास क्रम में उसी यौन-वृत्ति को अपराध भावना और ग्लानि से जोड़ दिया है जो जीवन की इस निरन्तरता का आधार है। इस अपराध-बोध में धर्म की भूमिका केन्द्रीय रही है। पर मैं यहाँ कुछ और ही बात करना चाह रहा हूँ.. कि ऊपर दिये हुए तर्क के बाद यह कहना अनुचित न होगा कि इंसान अपनी औलाद के ज़रिये अपने जीवन को जारी रखता है। दूसरे शब्दों में किसी के बच्चे ही उसका अगला जन्म हैं।

आप को मेरी बात अनोखी ज़रूर लग सकती है। मगर मैं अपनी बात के लिए शास्त्रों का भी साक्ष्य देना चाहूँगा। ज्योतिष का साक्ष्य- किसी भी व्यक्ति की कुण्डली में पाँचवा स्थान उसकी सन्तान का स्थान होता है और वही अगले जन्म का भी। नवाँ स्थान माता-पिता गुरुजनों का स्थान होता है और वही पूर्वजन्म का भी।

ठीक है चलिये ये मान लिया गया कि हम अपने औलाद के ज़रिये और और जीते ही जाते हैं। वैज्ञानिक शब्दावलि में कहें तो अपने डी एन ए कोड को सफ़र में रखते हैं, भले ही संवर्धित करते हुए। एक रिले रेस के धावक की तरह- पीछे से बेटन लेकर बस आगे तक दे देते हैं। अपने जीवन काल में हम जो जीवन के बारे में अच्छा-बुरा सीखते हैं वह उस ब्लूप्रिन्ट में कोडीफ़ाई कर देते हैं।

.. क्या सचमुच? क्योंकि अगर ऐसा होता तो माता/पिता के जीवन के सारे अनुभव/ज्ञान सब बेटे/ बेटी को स्वतः पता चल जाते। मगर ऐसा होता नहीं। तो या तो ये पूरी प्रस्थापना ही गलत है या स्मृति/ज्ञान इतना महत्वहीन कि इसे कोडीफ़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं समझता हमारा शरीर/ प्रकृति/ ईश्वर। आप का क्या ख्याल है?

गुरुवार, 27 सितंबर 2007

पराजय का मूल्य

सफल आदमी के चेहरे पर एक चमक होती है। दिल में एक गुदगुदी होती है। अपनी जीत का एहसास होता है। जब वह नज़र उठा के देखता है तो उसे हारे हुए लोगों की भीड़ दिखती है। उनके लटके हुए उदास चेहरों को देख वह थोड़ा और अकड़ जाता है। वो जो कुछ भी सोच रहा होता है उसे अपनी जीत का मूलमंत्र मानकर उस में और जकड़ जाता है। जब वह मुँह खोलता है तो अपने बारे में बोलता है। वह सामने वाले को नहीं देखता उस के सन्दर्भ में सिर्फ़ अपने को ही देखता है। वह बताता है कि उसके आस-पास दुनिया कितनी प्रतिभाहीन है। ऐसा कहकर वह जतलाता है कि सारी गुणवत्ता उसी में आसीन है।

उसकी जगह हम होते तो हम कुछ अलग बरताव करते इसमें संदेह है। माना गया है कि जीवन में सफलता बड़ा मूल्य है। मगर कई पाठ ऐसे भी हैं जो पराजय के गुणगान करते हैं। जैसे हराल्ड हेट्ज़ेल की किताब ‘बुद्धाज़ लास्ट सरमन – इन हेल’ .. देखिये उसका एक अंश:

हर सच्ची साधक एक बेलौस और बाशौक़ जंगजू है। उसे जंग से कोई खौफ़ नहीं। वह जीत की प्यास से बेचैन है और लगातार तलाशती है अपनी मुक्ति को – अपनी आखिरी शिकस्त।

इस आखिरी शिकस्त- उसकी गुरु- में ही वह शक्ति है जो इस दुनिया में सीखी हुई हुशियारी और दुनियादारी के उस बेहद मजबूती से जकड़े हुए बख्तरबंद को छिन्न-भिन्न कर सकती है, जो पहले ही पुराना हो चला है। यह आखिरी शिकस्त सब कुछ मांगती है, पूरी और समूची ताक़त, साहस, इरादा, हुशियारी, दर्द, तमन्ना, शौक़, समर्पण, इल्म और उम्मीद। इस आखिरी शिकस्त से हासिल होता है अन्तहीन शून्य- सम्पूर्ण पराजय, मगर सिर्फ़ फ़ौरी तौर पर।

इस आखिरी और समूची शिकस्त से ही सुधर कर और पूरी तरह बदल कर उपजती है सच्ची (रूमानी नहीं) साधक और जंगजू, जैसे एक नया जन्म लेकर। यह नई शख्सियत बुज़ुर्ग है, शालीन है; यह गहराई से करती है सवाल और समझती है, यह शख्सियत ज़्यादा गम्भीर है और ज़्यादा शांत है। ज़िन्दगी और लोगों से पहचान की आदत को त्याग दिया गया है या कहें कि बदल लिया गया है। और क्योंकि यह शख्सियत आनन्दरहित नहीं है- बिलकुल भी नहीं- यह एक अलग जीवन जीती है एक नई मासूमियत के साथ।

रविवार, 26 अगस्त 2007

चीज़ों में जीवन

बिस्तर पर अधलेटा मैं अंदर के कमरे में देश की बड़ी समस्या का हल निकालने में चिंताग्रस्त था कि अचानक अअअअअअद्द करके एक आवाज़ बाहर के कमरे से आई। देश की चिंता में विघ्न? चौंक गया। दो पल के बाद समझा कि मेज़ से टिकाया गया एक बैग मुँह के बल गिर पड़ा है। उसने ये फ़ैसला अचानक किया हो ऐसा नहीं लगता। बहुत नाप-तौल कर एक लम्बी व धीमी प्रक्रिया में लागू किया गया था ये मुँह के बल गिरना। मैंने देखा है दूसरे मौकों पर भी जब चीज़ें इसी तरह आदमियों से स्वतंत्र अपनी सत्ता की घोषणा कर रही होती हैं।

पेड़ का खड़े-खड़े गिरना तो फिर भी समझ आता है; उसमें जीवन मानते हैं कुछ लोग। मगर जड़-निर्जीव चीज़ें? कभी अचानक एक स्टील की प्लेट छनछना कर किचेन में उत्पात करती है, कभी कोई परदा, पेलमेट से अपना नाता तोड़ लेता है। एक बार तो मेरी किताबों की भारी-भरकम रैक जो दीवार के साथ मजबूती से जड़ी गई थी, अचानक फ़र्श की मोहब्बत में गिर गई (जब से अंग्रेज़ इस मुल्क में आए हैं तब से लोग और चीज़ें मोहब्बत में सिर्फ़ गिरते हैं- फ़ेल इन लव, यू नो- उनके पहले उठने की भी रवायत थी)। बाद में पता चला कि दीवार और रैक के बीच अलगाव की यह आग, सीलन ने लगाई थी। बताइये, हद है! बाद में उसे खुद अपनी गलती का एहसास हुआ कि फ़र्श के साथ उसकी मोहब्बत एक छलावा थी, धोखा थी। कई दिनों तक दीवार और रैक, दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की, लेकिन एक बढ़ई ने आकर दोनों का वापस मेल-मिलाप करा दिया।

इस तरह की बात करते हुए ऐसा लगता है चीज़ों में सचमुच जीवन है। है क्या? आम तौर हम निर्जीव उन्हे मानते हैं, जो अचल हैं और बदलाव से परे हैं। पत्थर को पत्थर हम सिर्फ़ इसलिए कहते हैं कि वह सालों साल जस का तस पड़ा रहता है, बिना किसी हलचल के। मगर वही धरती के भीतर दबे पत्थर सालोसाल की एक लम्बी-धीमी प्रक्रिया में बदल के कैसे-कैसे रत्न भी तो बन जाते हैं। और लोहा भी हवा और पानी के सम्पर्क में आकर ज़ंग खाने लगता है। यूरेनियम और हीलियम के सम्पर्क से क्या होता है आप जानते ही हैं।

क्या इसे जीवन कहना उचित नहीं होगा? शायद नहीं। क्योंकि इनमें चेतना का अभाव है? या कहीं यह तो नहीं कि हमारी चेतना, उनकी चेतना को पहचानने में सक्षम नहीं? जिस पृथ्वी की मिट्टी, हवा और पानी में लगातार करोड़ों सालों से एक जीवन चल रहा है, जीवधारी जन्म-मरण की एक सतत प्रक्रिया में लगे हुए हैं, उस पृथ्वी को निर्जीव कहना कहाँ तक तर्कसंगत है? क्या पृथ्वी अपनी समष्टि में एक जीवित, सचेत संरचना नहीं हो सकती? ये सारा जीव-निर्जीव प्रपंच उसके विभिन्न अवयव ही तो हैं। आखिर हम जीवधारियों का शरीर भी तो अलग-अलग स्वतंत्र कोशिकाओं का एक समुच्चय भर ही तो है।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2007

फल क्यों मीठा होता है?

कभी-कभी बैठे-बैठे अचानक अपने मनुष्य होने का एहसास खत्म हो जाता है। लगने लगता है कि मैं भी मिट्टी-पत्थर-पेड़ की तरह बस एक पदार्थ-पुंज ही तो हूँ। एक चलता-फिरता पदार्थ-पुंज.. जो अपने अस्तित्व के लिए दूसरे पदार्थों को अपने भीतर से गुजारता है, और पता नहीं क्या-क्या रासायनिक परिवर्तन सम्पन्न कर के उसे वापस अपने से बाहर फेंक देता है। और फिर नज़र आता है कि मैं कोई अनोखा पदार्थ-पुंज नहीं हूँ, गली का कुत्ता भी यही कर रहा है, नाली का तिलचट्टा भी यही कर रहा है, तो मनुष्य ऐसा क्या अनोखा कर रहा है?

हम में संवेदना है, भाषा है, चेतना है। हम कुत्ते और तिलचट्टे से श्रेष्ठ हैं। और इसलिए हर धर्म में मनुष्य सृष्टि के शीर्ष पर है। कहीं ईश्वर ने मनुष्य को अपने रूप में बनाया है कहीं वह स्वयं मनुष्य के रूप में है। फिर मुझे लगता है कि क्यों नहीं ईश्वर तितली के रूप में हो सकता है, एक राजहंस के रूप में क्यों नहीं? क्यों मनुष्य की यह महासत्ता.. जिसमें सब उसके आधीन है?

क्या सच में मनुष्य के सिवा सब कुछ जड़ है? क्या सारा चिन्तन मस्तिष्क से ही होता है? क्या श्रोत्र का सारा गुण कान में ही केन्द्रित है? क्या अकेले आँख ही देखती है? मन की इच्छा बस मन में ही होती है? तो पोर-पोर में क्या होता है?

अगर चेतना सिर्फ़ प्राणियों में है तो फल क्यों मीठा होता है? अगर पेड़ में जगत तो क्या, स्वयं का भी कोई आभास नहीं तो उसका फूल गंध क्यों फैलाता है? सूरज निकल आया है पत्ती को ये कौन समझाता है?

रविवार, 12 अगस्त 2007

जहालत के अँधेरे

आप लोगों ने आज के अखबार में देखा होगा कि हैदराबाद पुलिस ने एम आई एम के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी की अर्ज़ी पर तस्लीमा नसरीन के खिलाफ़ लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़काने का केस कर स्वीकार कर लिया है... ये केस भी शायद उसी धारा से सम्बन्धित होगा जो वडोदरा में चन्द्रशेखर पर लगाया गया था.. हद है.. जब मायावती काँग्रेस और भाजपा को नागनाथ और साँपनाथ कहती हैं तो क्या गलत कहती हैं..

अंग्रेज़ी के अखबार में खबर है कि हैदराबाद से निकलने वाले उर्दू अखबारों ने एम आई एम की खबर ली है.. खुश मत हो जाइये कि चलिए जनता ने न सही अखबारों ने तो हमलावरों को हमला करने के लिए फटकारा .. मामला उलटा है.. उन्हे फटकारा जा रहा है कि जहाँ जूते और चप्पल मारने चाहिये थे वहाँ फूल फेंक मारे गए.. ओवैसी साब सुरक्षात्मक मुद्रा में हैं.. हद है..

मुम्बई से निकलने वाले उर्दू अखबार इंकलाब में किसी आसिम जलाल ने एक लेख लिखा है.. तस्लीमा तस्लीम नहीं.. (स्वीकार नहीं).. उसमें वे कहते हैं.. चन्द सवालात ऐसे हैं जो तवज्जो तलब(ध्यान देने योग्य) हैं..

१.क्या हैदराबाद में जो कुछ हुआ उस के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हमलावर ही ज़िम्मेदार हैं.. ?
२. क्या हुकुमत और इन्तज़ामिया (व्यवस्था) पर इस की कोई जवाबदेही आयद नहीं होती?
३. क्या वह जमात (संस्था) इस के लिए ज़िम्मेदार नहीं जिसने तस्लीमा को मदऊ (आमंत्रित) किया था?
४. क्या एक मुतनाज़ा (झगड़ालू) और बदनामे ज़माना मुसन्निफ़ा (लेखिका) की हैदराबाद आमद पर सिक्योरिटी की खातिरख्वाह इन्तज़ामात नहीं किए जाने चाहिये थे?
५. क्या अगर हिन्दोस्तान ने मुसलमानों के मुतालबात(माँगों) के अल्लिरे-ग़म (बर खिलाफ़) तस्लीमा नसरीन को हिन्दोस्तान में क़याम (रहने) की इजाज़त न दी होती यह सब होता? नहीं -

इसके आगे पूरे लेख में इस बात का रोना रोया गया है कि किस तरह से पूरी दुनिया में इस्लाम के खिलाफ़ साजिश हो रही है.. और कैसे मुसलमानों की भावनाओं की अनदेखी की जा रही है.. वही पुराना राग जो कभी सिख अलापते हैं कभी हिन्दू और कभी मुसलमान..

ये जो सवाल पूछे जा रहे हैं.. एक खास मानसिकता की झाँकी देते हैं.. कि अगर हमें आप की किसी बात से तकलीफ़ हो रही है तो जनाब आप सुधर जाइये बजाय इसके कि हम अपने भीतर थोड़ी बरदाश्त पैदा करें.. ये सारे श्रद्धालु लोग इस बात से खफ़ा हैं कि तस्लीमा अच्छी मुसलमान नहीं हैं.. और इस्लाम और मुहम्मद साहिब की शान में अनाप-शनाप लिख-बक रहीं है.. और ये बड़ा कुफ़्र है साहब.. मगर इसका नतीजा क्या होगा.. दोज़ख..!! तस्लीमा के लिए.. मगर ये लोग बेचैन है कि कैसे तस्लीमा को दोज़ख मिल जाय.. वे अपने साथ साथ तस्लीमा के लिए भी जन्नत की सीट बुक करना चाहते हैं.. इसलिए इतना जोशो-खरोश.. सर क़लम कर देने की खुजली..

जहालत के अँधेरे में जीवन बसर कर रहे ये करोड़ो करोड़ो लोग अभी भी क़ुरान और इस्लामी दर्शन को ज्ञान की शुरुआत और अन्त समझते हैं.. किसी भी विषय पर अंतिम निर्णय करने के लिए हर बार मुहम्मद साहिब की नींद हराम करने पहुँच जाते हैं.. उनके दो अलग अलग मौक़ो पर कहे गए बयानों से अपने मतलब के अर्थ निकाल कर वही करते हैं जिसका वे पहले ही मन बना चुके हैं.. इसलिए हार कर उनके मज़हब के दानिशमंद लोग भी उन्हे बार बार कुरान के ही सहारे कुछ राह दिखाने की कोशिश करते हैं.. कि भाई देखो मुहम्म्द साहिब का असली अर्थ क्या था.. पर वे नहीं मानते.. उन दानिशमंदों को अपना तक नहीं मानते.. उर्दू के इन अखबारों में जावेद अख्तर और नुरुल हसन के बयानों को कोई अहमियत नहीं दी जाती.. छपते ही नहीं..

ये सोच उसी जिहादी मानसिकता का एक चपेटा है जिसे मोटे तौर पर आतंकवाद की शक्ल में देखा जाता है.. मगर ये जिहादी ज़ेहनियत वाले मर्दोज़न भूल जाते हैं कि उनके चहेते पैग़म्बर मुहम्मद साहिब ने भी ज़िहाद की दो क़िस्में बताई हैं.. जिहादे अकबर और जिहादे असग़र.. दुनिया में फैली बुराइयों और अन्याय के खिलाफ़ लड़ाई जिहादे असग़र है.. और अपने भीतर के राक्षस को मारने की लड़ाई जिहादे अकबर है.. ध्यान रहे कि असग़र मायने -बहुत छोटा और अकबर मायने-सबसे बड़ा.. मगर ये भाई लोग बड़े काम को हमेशा के लिए मुल्तवी कर के छोटी मोटी लड़ाई किया करते हैं.. और उम्मीद करते हैं कि उनका अल्लाह बड़ा प्रसन्न होगा..

आखिर कैसे बदलाव आएगा इन करोड़ो करोड़ देशवासियों में.. कभी कभी मुझे लगता है कि जिस बाज़ार से मैं इतना खफ़ा और ग़मज़दा रहता हूँ.. उस के मूल्य ही इनकी जहालत के अँधेरे में कुछ रौशनी ला सकते हैं.. भले ही वे नियॉन लाइट्स की भ्रामक रंगीनियाँ ही क्यों न हो.. और वैसे भी सामंतवाद से सीधे साम्यवाद में कूद जाने के सारे शार्टकट फ़ेल हो चुके हैं.. बाबा मार्क्स की उस बात का महत्व बार बार समझ आता है कि साम्यवाद सबसे पहले सबसे विकसित समाज में ही आएगा...

गुरुवार, 10 मई 2007

दो गज़ ज़मीन भी न मिली..

आज से १५० बरस पहले मेरठ में साम्राज्यवाद के खिलाफ़ हमारे पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा..इसके पहले मंगल पान्डे और ईश्वरी प्रसाद को फाँसी हो चुकी थी.. और एक दिन पहले ९ मई को मेरठ की तीसरी लाइट कैवलरी के ८५ सैनिकों को दस साल की कै़द सुनाई गई थी..एक खास कारतूस इस्तेमाल करने से इंकार की सजा.. एक ऐसा कारतूस जो हिन्दू और मुसलमानों दोनो को अपने साझे दुश्मन अंग्रेज़ो के खिलाफ़ एक करता था.. खैर लड़ाई हुई.. शुरुआत में लगा कि हम लड़ाई जीत जायेंगे.. मगर १८५७ के अंत से अंग्रेज़ वापस पकड़ बनाने लगे.. और जुलाई १८५८ तक वो वापस सत्ता पर काबिज़ हो गये..

और इसके साथ ही शुरु हुआ आने वाले ९० सालों का रानी का राज.. जिसमें अंग्रेज़ शासक वर्ग ने इस लड़ाई से सीखे हुए पाठ को हमारे समाज में अच्छी तरह से लागू किया.. हिन्दू और मुसलमान समाज को बहुत सचेत रूप से एक दूसरे के खिलाफ़ भड़काया गया और इस तरह पैदा हुए वैमनस्य को बढ़ावा दिया गया..जिन लोगों ने पश्चिमी एशिया का इतिहास पढ़ा है वे जानते हैं कि ऐसी ही नीतियों का थोड़ा अलग मंज़र फिलिस्तीन में जारी था.. उसे भी हमारी तरह १९४८ में विभाजित किया गया..

मैं ऐसा नहीं कहता कि उसके पहले हिदू और मुसलमान एक थाली से खाते थे.. बिलकुल नहीं.. दो अलग अलग समुदाय थे.. दो ही नहीं. और भी कई समुदाय थे.. हिन्दू समाज तो नाम ही विभिन्नताओं का है.. तो वे अलग अलग रहते अलग अलग अपने अपने कार्य व्यापार करते.. मगर बीच में इस तरह का संदेह और शक़ का घना कोहरा तो न था.. ये कोहरा जिसमें कि आज के दिन एक तबक़ा दूसरे के बारे में अनर्गल बातें और मिथ्याचार के ज़रिये बेवज़ह भावनाओं को भड़काने के पापाचार में संलग्न है.. ये अंग्रेज़ो के उस नीति की विरासत है जिसकी परिणति हमारे प्यारे हिन्दुस्तान के विभाजन में हुई..

तो वह लड़ाई तो हम हारे ही हारे.. फिर ९० साल बाद जब हमें आज़ादी मिली तो विभाजित..दो टुकड़ों में फाड़ कर मिला हमें हमारा देश.. उनकी नीति जीती हमारी एकता हारी.. और आज़ादी के ६० साल बाद भी आज हम उनकी भाषा बोल रहे हैं और उनके मूल्यों का अनुगमन कर रहे हैं.. और उनकी संस्कृति को श्रेष्ठ मान कर अपनी संस्कृति को पद-दलित कर रहे हैं..और उनके फैलाये ज़हर से भी उबर नहीं पाये हैं.. हम उनके अवैतनिक एजेण्ट बन चुके हैं..वे और उनका नया सेनापति अमरीका पूरी दुनिया में उन्ही पुरानी नीतियों को अपनी दादागिरी के बल पर लोगों के हलक़ में ठेल रहा है.. और हम वाह वाह कर रहे हैं कि भई और कस के ठेलो.. साले इसी लायक हैं.. अपने जिन भाइयों के साथ मिलकर हमे १५० साल पहले एक लड़ाई छेड़ी थी साम्राज्यवाद के खिलाफ़.. आज उस समुदाय के अपने बन्धुओं को हमने अकेला ही नहीं छोड़ दिया.. अपना दुश्मन भी समझ लिया है.. वो लड़ रहे हैं.. अपने धर्म अपनी संस्कृति को बचाने के लिये.. हम खड़े हो के तमाशा देख रहे हैं..

कल प्रमेन्द्र ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि किस तरह मंगल पान्डे के स्मृति स्मारक को माकपा ने गिरा दिया.. माकपा तो सत्ता का स्वाद चख चख कर पूरी तरह से जन विरोधी और वैचारिक रूप से खोखली हो चुकी है.. और दूसरी तरफ़ पिछले हफ़्ते कॉगेस के असली चरित्र को साफ़ करते हुए मंत्री जी अर्जुन सिंह ने बताया कि बहादुर शाह ज़फ़र की अस्थियों को भारत वापस लाने के प्रस्ताव को उन्होने नामंज़ूर कर दिया और कहा कि बर्मा के भी एक राजा के अवशेष यहाँ है.. यह है उनका अपने इतिहास और नायकों के प्रति आदर.. बहादुर शाह ज़फ़र चाहते थे कि उन्हे हिन्दुस्तान में दफ़नाया जाय.. पर ना जाने क्यों वे उम्मीद हार चुके थे..

कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

आज़ादी की लड़ाई के इस साझे प्रतीक को कम से कम अपने दिल की ज़मीन से बेदखल मत कीजिये..



हमारे एक पुराने मित्र अमरेश मिश्र इतिहासकार हैं जो कि आजकल १८५७ पर अपने २००० पृष्ठीय महाग्रंथ War of Civilisations: India, South Asia, Europe and the World 1857-1867 को अन्तिम रूप देने में तल्लीन है.. आज की जयन्ती के अवसर पर अमरेश ने आज के एशियन एज में एक लेख लिखा है इसी विषय पर.. देखें यहाँ..

बुधवार, 9 मई 2007

पुरुष की इस प्रतिगामी प्रकृति का क्या करें ?

मनुष्य और प्रकृति का संघर्ष पुराना है.. भारतीय वाङ्मय में इसे पुरुष और प्रकृति के द्वैत से भी जाना गया है.. या सांख्य दर्शन में (कपिल के अनीश्वीरीय दर्शन नहीं, बल्कि भागवत के श्रीकृष्णीय दर्शन में )..एक पुरुष के मुकाबले में प्रकृति और उसके सहयोगी २३ या २४ या २७ तत्व... तर्क यह है कि पुरुष या जीव माया / प्रकृति के आवरण/ जंजाल में इतना लिप्त हो जाता है कि ईश्वर तक उसकी पहुँच बन ही नहीं पाती.. तो ईश्वर से सम्पर्क बनाने का तरीका है कि माया को, प्रकृति को किनारे किया जाय.. रास्ते से हटाया जाय.. और इस भौतिक बोझ को सर से उतार फेंक इतना हलका हो जाया जाय कि ईश्वर में लीन हो जाने में..सांसारिकता से ऊपर उठ जाने में .. अनन्त के साथ एक हो जाने में कोई बाधा न रहे..

दूसरी ओर इस दर्शन की उलट खड़ी पश्चिम की भौतिकवादी सभ्यता भी कुछ इसी प्रकार का अन्तर्विरोध चिह्नित करती आई है काफ़ी पहले से.. पुराने विधान के समय से.. खुदा ने पाँच दिन तक प्रकृति को बनाया और छठे दिन पुरुष को बनाया और उसे बताया ये सब उसके लिये है.. उसके अधिकार के अन्तर्गत है.. तो मूसा आये, ईसा आये और मुहम्मद भी आये पर ये ईश्वर-प्रदत्त धरती का अधिकार नहीं बदला.. औद्योगिक समाज ने अति ही कर दी.. मनुष्य के विकास का रास्ता प्रकृति के शोषण से होकर जाता है.. इस राह पर मनुष्य का भी शोषण होता है.. उसे कम मजूरी मिलती है.. पर मिलती तो है.. प्रकृति को तो मिलता है ठेंगा.. बाबा मार्क्स ने भी कहा है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच के अन्तर्विरोध हल हो जाने के बाद मनुष्य प्रकृति के साथ पूरे ऊर्जा के साथ उलझ सकेगा..

तो क्या टंटा है ये पूर्व और पश्चिम के वैर का .. प्रतिमुख जीवन पद्धतियों का.. दो अलग दिशाओं में इंगित करती विचारधारा का.. भईया उद्देश्य तो एकै लौका रहा है.. फिर काहे के लिये बेबात में लट्ठमलट्ठा.. तो ऐसा लगता है कि अब वो दिन दूर नहीं.. जब पुरुष का प्रकृति के साथ का पुराना वैर.. ईश्वरीय और शुद्ध भौतिकवादी अनीश्वरीय .. दोनों प्रकार का.. सदा के लिये हल हो जायेगा.. कहते हैं ना भईया पूरब जाओ या पश्चिम घूम के एकै जगह आ जाओगे.. तो देखिये आ गये ना सब एक बिन्दु पर.. हो गया ना मेल.. का बोलते हैं.. ?

फ़रक बस इतना है कि अपनी भारतीय परम्परा के ज़रिये भारहीन हो कर प्राकृतिक मल से मुक्त हो जाने का स्वप्न तो नहीं पूरा हो सका.. किसी को हुआ हो हिमालय की किसी कन्दरा में तो वो हमें बताने नहीं आया.. और कबीर जैसों ने तो बताने से इंकार तक कर दिया गूँगे का फल कह कर.. मगर इस विस्फोटक पश्चिमी चिन्तन का असर तो हो गया है.. और जो अपने आस पास हम लगातार देख रहे हैं आजकल.. रोज़-ब-रोज़ हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं.. इस औद्योगिक जीवन में.. महानगरीय जीवन जीते हुये.. सुबह शाम की नित्यता से भी मुक्त हो चुके हैं हम.. सूरज को उगते डूबते देखना तो दूर की बात है.. कब रौशनी हुई और कब अँधियारे ने हमें व्याप्त लिया इसका एहसास भी नहीं होने पाता हमें.. हमारे पैर घास और मिट्टी का मृदु एहसास भी भूल चुके हैं.. गर्मी में हम ए.सी. चला लेते हैं..सर्दियों में हीटर.. ज़्यादातर जंगलों का सफ़ाया हो चुका है.. जो बचे हैं उन पेड़ों से हमारा कितना परिचय है.. विशेषज्ञों की बात मत करिये.. कितने पेड़ों का नाम जानते हैं हमारे बच्चे..?

आज सारे पृथ्वी की ज़मीन पानी हवा आकाश पर पुरुष का कब्ज़ा है.. जानवर पक्षी और कीड़ों को पृथ्वी की विरासत से बेदखल किया जा चुका है.. प्रकृति को पुरुष ने काफ़ी कुछ घुटनो तले दबोच दिया है.. और परस्पर आवलंबिता की सारी बकवास अर्थहीनता की घूरे पर आखिरी साँसे गिन रही है.. विविधिता के चितकबरेपन की गपड़चौथ अब हमें व्याकुल नहीं करेगी .. अब सब कुछ एकरंगीय बनाया जा सकेगा..

देखिये प्रकृति रिरिया रही है.. पुरुष इस प्रकृति से सदा सदा के लिये मुक्त न भी हो सके तो कम से कम उसने सम्पूर्ण प्रकृति को पूरी तरह चूस कर शेष को मलवत कर ही दिया है.. और अब पुरुष की नज़र सौर मण्डल की सीमाओ के परे जा रही है..ये ग्रह नष्ट भी हो गया तो क्या.. किसी दूसरी प्रकृति की तलाश में निकल जाने की तैयारी हो रही हैं.. पुरुष आज मंगल पर बसने की बात कर रहा है.. बस एक ही चिन्ता मुझे खाये जाती है.. कि पुरुष की भीतर की इस प्रतिगामी प्रकृति का क्या करें.. जिसके चलते पुरुष एक दिशा में अपनी सहमति से चलते चलते नये तर्क पा कर या पुराने तर्कों की नई ज़मीन पाकर, अचानक असहमत हो जाता है.. और अपनी ही बनाई व्यवस्था के भंजन के लिये उद्धत हो जाता है..

बुधवार, 2 मई 2007

समाचार कौन बनाता है.. ?

आज मेरी बात अपने एक मित्र से हो रही थी.. रिचर्ड गियर और शिल्पा शेट्टी जुड़ी उस चुम्बन के बारे में .. जिसके बाद पूरे देश में ऐसा हंगामा हो गया.. कि आज तक लोग बाग़ गिरती हुई नैतिकता के स्तर से परेशान हैं.. और इस के लिये ज़िम्मेदार शिल्पा और गियर को क़ानून की ज़द में ले लेना चाहते हैं..

एक स्त्री जिसे चूमे जाने से कोई परेशानी नहीं.. एक पुरुष जो आसानी से दुनिया की किसी भी औरत को हम बिस्तर कर सकता है..(हर औरत को नहीं, मैं सामान्यीकरण कर रहा हूँ) .. उनका चुम्बन लोगों के नैतिक विवाद का विषय है.. जो लोग अपने ही घर में माँ, बाप, दादा, दादी, बेटे, बेटियों के साथ बैठ कर टी वी पर हिन्दी फ़िल्मो गानों और न्यूज़ चैनल्स पर दिन रात सचमुच अश्लील गाने और अश्लील विज्ञापन संदेश, और कहीं ज़्यादा अश्लील समाचार देखते थकते नहीं.. जिस देश की सड़कों पर सामान्य साज सज्जा में निकलने वाली लड़्कियां भी सुरक्षित नहीं.. वो लोग शिल्पा की आबरू के बारे में चिन्तित हैं..

जो लोग अपने सामान्य बातचीत के भाव बिना गालियों के अलंकार के प्रेषित नहीं कर पाते.. जो लोग अपने ही देश को सब मिल कर नोच रहे हैं.. जहाँ से जो पा रहे हैं खसोट रहे हैं.. उन्हे ये चुम्बन तो अश्लील लगता है पर बाकी कुछ अश्लील नहीं लगता.. और लगता होगा अगर किसी को तो कम से कम इतना तो नहीं कि उस के खिलाफ़ रोये गाये..

आप खुद सोचिये क्या अश्लील था उस चुम्बन में.. आपने पहले चुम्बन नहीं देखा.. सबने देखा है.. स्त्री पुरुष का अश्लील सहवास भी चोरी छिपकर अपनी मर्जी से देखा है.. और तो और आजकल अखबारों तक में नंगी तस्वीरें छ्पना आम बात है.. कोई आवाज़ नहीं उठाता.. तो किस बात के लिये हुआ इतना सब नाटक.. इतना सब पाखण्ड..

आपको शायद याद न हो तो याद दिला दूँ.. ये घटना है १६ अप्रैल २००७ की .. और उस से एक रोज़ पहले उत्तर प्रदेश के किसी दूर दराज़ के इलाक़े में हमारे सुन्दर राजकुमार राहुल बाबा ने अपने ओजस्वी वाणी में दो चार बातें उनके परिवार और पाकिस्तान के विभाजन के सम्बंध से कहीं थी.. जिसके चलते उनकी राजनैतिक समझदारी और वाकपटुता के संदर्भ की सारी पोल पट्टियां उजागर हो गईं ..

न सिर्फ़ देश के भीतर के गैर काँग्रेसी दल बल्कि पडो़सियों को भी सरकार और काँग्रेस को गरियाने का एक अच्छा मौका मुह्य्या हो गया था.. लगा कि न सिर्फ़ यू पी बल्कि देश की सत्ता पर से काँग्रेसी दावे का शेर लड़खड़ा कर ढेर हुआ जाता है.. पर इस शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर के चुम्बन ने उसे पूरी तरह आच्छादित कर दिया..

आप को लगता है कि ये सिर्फ़ एक संयोग था.. और इसके पीछे कोई मंच संचालन नहीं था.. मेरे मित्र इसे संयोग नहीं मानते.. उनका खयाल है कि आम जनता का ध्यान मुद्दो से हटाने के लिये उन्हे जान बूझ कर गैर राजनैतिक मुद्दो में फँसाया जा रहा है.. जैसे कि सरकार का मेहनत मशक्कत कर के सुनिश्चत करना कि दूरदर्शन पर क्रिकेट का सीधा प्रसारण हो.. ये सारा कुछ एक तयशुदा नीति के तहत किया जाता है .. और ये भी एक ऐसा ही मामला है..

आप इससे सहमत हों कोई ज़रूरी नहीं मगर एक बार फिर से सोचे.. और विशेषकर वे लोग जो नारद जैसे मंच में भी एक षडयंत्र खोज लेते हैं.. आप के लिये अच्छा मसाला है..

मंगलवार, 1 मई 2007

मैं एक मजदूर और आप भी..

आज एक मई है दुनिया भर में आज के दिन को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं.. इस तारीख के मजदूर दिवस बन जाने के पीछे एक कहानी है.. १८५६ में ऑस्ट्रेलिया में बिल्डिंगो में काम करने वाले मजदूरों ने काम बंद कर के पार्लियामेंट का घेराव किया और आठ घंटे कार्य दिन की माँग की और सुखद रूप से इतिहास में पहली बार मजदूरों की विजय हुई.. लेकिन आठ घंटे के कार्य दिन और दूसरी जायज़ माँगों के लिये संघर्ष आज भी जारी है.. और हर जगह उन्हे इतनी आसान जीत नहीं मिली है.. प्रदर्शन हुए, रैलियां की गई.. गोलियाँ चलीं.. खून बहा.. लोग मारे गये.. मजदूर नेताओं पर मुक़दमे भी चलाए गए.. धीरे धीरे यह घटना राज्यसत्ता के खिलाफ़ मजदूर संघर्ष का एक प्रतीक बन गई और लगातार दुनिया भर में इसकी बरसी मनाई जाती रही और कई बरसियों पर भी राज्य-मजदूर संघर्ष के फलस्वरूप जानें जाती रहीं.. आज दुनिया भर में इसे मजदूर दिवस का दरजा मिल गया है..

आप सोच रहे होंगे कि मैं भी क्या मजदूरों की बात करके आप को बोर कर रहा हूँ.. आप से आप की बात करूँ.. मजदूरों की बात मजदूरों से करूँ.. माफ़ करें बन्धु.. मैं वही कर रहा हूँ.. आप में से कितने लोग हैं जो अपना धंधा करते हैं.. अपनी दुकान.. अपना व्यापार.. कमीशनखोरी वाले बन्धु लेख पढना यहीं बंद कर सकते हैं.. आप लोग अभी मजदूर नहीं बने हैं.. जिस तरह की पूँजी की इजारेदारी इस देश में और दुनिया भर में जारी है.. सभी तरह के छोटे मोटे धंधे वाले आप सब लोग मन बनायें, अपना बोरिया बिस्तर समेटने की तैयारी करें.. आप भी मजदूर बना दिये जायेंगे..

शेष लोग जो किसी कम्पनी या कॉरपोरेट के लिये काम करते हों, डॉक्टर, अध्यापक, पत्रकार, अधिकारी, एजेन्ट, बीपीओ, सेल्स, मार्केटिंग, विज्ञापन की दुनिया में काम करने वाले, एक्टर, गायक, लेखक.. आप सब मजदूर हैं.. मेरी तरह.. क्यों.. मजदूर तो वो होता है जो फ़ैक्ट्री में जा के मशीन पर काम करता है.. भाईसाहब दुनिया बदलती है.. फ़ैक्ट्री का स्वरूप बदलता है..

मिसाल के तौर पर मुम्बई में मशहूर फ़िल्मी हस्ती राम गोपाल वर्मा के दफ़्तर का नाम फ़ैक्ट्री है.. तरह तरह के कलाकार अपनी प्रतिभा लेके अपने सपने लेके मुम्बई आते हैं.. और यहाँ आकर कलाकार नहीं बनते सिर्फ़ मजदूर बन जाते हैं.. कला व्यक्ति के भीतर से निकली उसकी अनोखी अभिव्यक्ति है.. पर मुम्बई फ़िल्मों में जिसने आखिरी बार कोई अनोखी अभिव्यक्ति देखी हो.. कृपया मुझे भी बताये.. ये अनुकृति का धंधा है.. जो चल रहा है जो बिक रहा है उसकी नकल करो.. कभी कदार अपवाद स्वरूप कोई कला की अभिव्यक्ति हो जाती है.. तो फिर अंधभाव से उसकी नकल शुरु हो जाती है.. इस विषय पर बहुत लिख गया है मुझे लिखने की ज़रूरत नहीं.. लुब्बे लुबाब ये है कि कलाकार भी अब मजदूर हो चुका है.. अपने को सफ़ेद कॉलर कर्मचारी समझने की भूल भी जो बन्धु कर रहे हैं वो अपनी भूल सुधारें .. सब मजदूर हैं.. आप को लगेगा मैं कुछ सामान्यीकरण कर रहा हूँ.. एक झाडू से सब को समेट रहा हूँ..

पर बन्धु मैं यहाँ बाबा मार्क्स से आपका परिचय कराना चाहूँगा.. मार्क्स का नाम लेते ही हमारे दिमाग़ में माकपा, भाकपा, भाकपामाले, और तमाम दूसरे नक्सलवादी धड़े.. रूस, चीन की क्रांति क्यूबा, वियतनाम आदि आदि कौंध जाता है.. पर सच मानिये मार्क्स को इन से जोड़ कर देखना एक गलती है.. अलबत्ता ये मार्क्स से अपना सम्बंध ज़रूर जोड़ते है.. ये वैसे ही है जैसे कि हम बजरंग दल, शिव सेना, तोगडि़या, भाजपा, अड्वाणी और उभरते हुये दल हिन्दू राष्ट्र सेना के अपराध को राम के मत्थे मढ़ दें.. वे राम का नाम लेते हैं.. राम तो उनका नाम नहीं लेते.. जैसे ये राम के साथ अन्याय होगा.. वैसे ही मार्क्स के साथ भी अन्याय मत करें..

बाबा मार्क्स का जन्म १८१८ में जर्मनी में हुआ.. उन दिनों जर्मनी योरोपीय दर्शन का केन्द्र बना हुआ था .. मार्क्स, जो मूलतः एक दार्शनिक ही थे, उस परम्परा को शीर्ष तक ले गये.. उनके दर्शन का नाम है ऐतिहासिक भौतिकवाद.. उन्होने मजदूर की बड़ी सुन्दर परिभाषा की है..

पहले कि अपने उत्पादन के साधन (मशीन/ कम्प्यूटर/ दफ़्तर/ दुकान/ नेट्वर्क/ कैमरा; एक शब्द में औजार) जिसके हाथ में न हो.. और दूसरे कि वह अपने उत्पाद अपनी रचना से विलगित हो.. यानी कि आदमी जिस की रचना में संलग्न है.. जो काम कर रहा है उसके साथ एकत्व, अपनापन ना महसूस करे..

कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग जो अपने काम में आनन्द लेते हैं.. अपने काम के साथ एक भीतरी जुड़ाव महसूस करते हैं.. यहाँ मैं याद दिलाना चाहूँगा कि पुराने समय अक्सर कामगार लोग काम करते करते गाते थे.. निर्मल आनन्द में काम के साथ एक रूप हो जाते थे.. अब कहाँ ऐसा होता है.. काम के दौरान तो असम्भव सी बात है.. काम के बाद मजदूर डिस्को और पब और म्यूज़िक कन्सर्ट जाकर भी निर्मल आनन्द को नहीं प्राप्त कर पाता.. कुछ लोग गूगल के दफ़्तर की मिसाल देना चाहेंगे.. पर वो शायद आने वाले समय के संकेत हैं.. और इस तरह के दफ़्तर आम स्तर पर कभी नहीं लागू हो सकते अभी के पूँजीवाद में..

तो वे सारे लोग जिनके औज़ार जिनके हाथों में नहीं.. और जो अपने काम के साथ एकाकार नहीं.. और जिनके पास बेचने के लिये केवल अपना श्रम है.. शारीरिक या मानसिक.. वे सब भाई बहन मजदूर हैं.. और आज हम सब का दिन मजदूर दिवस है.. भूल जायं कि रूस में क्या हुआ.. चीन में क्या हो रहा है.. और हमारे देश में कम्यूनिस्ट पार्टियाँ क्या कर रही हैं.. उनके कुकर्मों की वज़ह से मार्क्स के नगीनों का अनादर न करें.. ध्यान दें कि आठ घंटे कार्य दिन का संघर्ष अभी भी अधूरा है.. सरकारी संस्थानों को छोड़कर बाकी जगहों पर श्रम क़ानून ताक़ पर रखे जा रहे हैं.. १२ से १६ घंटे काम करना आम बात है.. निजी क्षेत्रों में हमारे आप जैसे लोग ८ घंटे की नहीं.. २४ घंटे की नौकरी बजाते हैं.. आप से उम्मीद की जाती है कि फ़ोन और नेट के ज़रिये आप हमेशा उपलब्ध रहें.. आप कभी भी सोते से जगाये जा सकते हैं.. और ऊँचे नीचे ओहदे का भेद नहीं.. सब मजदूर हैं..

आइये इस नये एह्सास के साथ अपनापन महसूस करें मजदूर दिवस के साथ.. नहीं कर पा रहे.. ? कोई बात नहीं कोशिश कीजिये सिर्फ़ अपनापन महसूस करने की.. किसी भी चीज़ के साथ.. कोशिश कीजिये.. अगर कर सकते हैं तो आप भाग्यशाली हैं .. आप खुश रहिये.. आप की खुशी को किसी की नज़र ना लगे..

शनिवार, 7 अप्रैल 2007

जो नहीं बनना चाहतीं राखी सावंत

पिछले दिनों गुरुदेव का स्त्री पर जो लेख आप पढते रहे .. उस पर ऐसा समझा गया कि मैं अपनी बाते गुरुदेव से कहलवा रहा हूँ.. मैं ऐसा कहूँगा कि मैंने जो पहले भी कहा वो गुरुदेव के विचारों से प्रभावित हो कर कहा फिर अपनी बात ठीक ठीक न रख पाने के कारण गुरुदेव को ही आपके सामने पेश कर दिया.. गुरुदेव के पूरे लेख में दो तीन बाते मुख्य तौर पर निकल कर आईं..
१] एक तो स्त्री का स्वभाव पुरुष से अलग है.. उसका स्वभाव कोमल और उदार है.. वह ग्रहणशील है व प्रकृति की तरह समाज में उसकी भूमिका समावेशी है..
२} पुरुष वाह्य रूप से स्त्री से ज़्यादा बलवान है.. और उसने स्त्री जाति को काफ़ी समय से दबा कर रखा है और समाज को अपने गुणों के अनुकूल ढाला है.. इस तरह से पैदा हुआ समाज असंतुलित है और बार बार विनाश होता रहा है आज भी उसी मार्ग पर है..
३] एक मानवीय समाज बनाए के लिये स्त्रैण गुणों को और स्त्री को समाज की अग्रणी भूमिका में आना होगा और वह आयेगी..

नोटपैड वाली सुजाता जी ने और घुघूती बासूती जी ने स्त्री को इस तरह से डिफ़ाइन करने के प्रयास पर भी सवाल खड़ा किया है.. पर मेरा मत यह है कि यहाँ गुरुदेव की मंशा स्त्री को परिभाषित कर उसे एक खास भूमिका में क़ैद कर देने की नहीं है.. बल्कि स्त्री के स्वरूप पर बात करते हुये उन्होने सभ्यता सम्बंधी बड़े प्रश्न उठायें हैं.. स्त्री शोषण के मूल में छिपे तत्वों का अनावरण किया है.. घुघूती बासूती जी ने कहा कि उन पर बाइबिल का प्रभाव है.. आप की बात अंशतः सही है चूँकि गुरुदेव अमेरिका की बहुसंख्यक क्रिश्चियन श्रोताओं से मुखातिब हैं इसलिये उन्होने एक दो जगह बाइबिल के उद्धरण दिये हैं .. इसके अलावा उनके विचार काफ़ी मौलिक है..

सुजाता जी ने बिलकुल ठीक बताया कि अभी का समाज ऐसा है जिसमें स्त्री होना पीड़ा और शर्म का दूसरा नाम हो गया है.. उसके जननांगों का उपहास होता है.. वह बलत्कृत होती है.. गर्भ में ही मार जाती है.. और इस पर मेरा मत यह है कि परिणाम स्वरूप कुछ स्त्रियाँ अपने अन्दर के ऐसे व्यक्तित्व के विकास के प्रति ज़्यादा सचेत हो रही है जो लिंग निरपेक्ष हैं.. और अपने नैसर्गिक स्त्रैण गुणों को नकार रही है..

अन्त में बस इतना कहूँगा कि हमें नहीं चाहिये वो समाज जो एक स्त्री के अन्दर की किरन बेदी और सानिया मिर्जा और राखी सावंत को दमित करता हो.. ऐसा समाज स्त्री विरोधी और मानव विरोधी है.. साथ साथ ही हमें ऐसे समाज से भी सावधान रहना चाहिये जो सुषमा, रेखा और अतिया जैसी हज़ारों हज़ार आम स्त्रियों को अपने आप से शर्मसार करता हो क्यों कि वो नहीं बनना चाहती किरन बेदी, सानिया मिर्ज़ा और राखी सावंत .. वे किसी को अपना पति चुन कर और उसके साथ छोटे छोटे मौलिक मनुष्यों की रचना और उनके पोषण में ही खुश रहना चाहती हैं.. उन्हे रसोई में तकलीफ़ नहीं होती और वही उनकी दुनिया है.. वे दोनों ही समाज स्त्री विरोधी हैं एक वो जो उन्हे धकेल के रसोई के अन्दर बंद करता है.. और दूसरा वह जो उन्हे धकेल के रसोई से बाहर कर मैकडोनाल्ड के रास्ते पर खड़ा कर देता है.. और उन्हे बना देता है अपने विशाल बाज़ार का सिर्फ़ एक मज़दूर.. .

गुरुवार, 5 अप्रैल 2007

स्त्री टूटी नहीं है और ना तोड़ी जा सकती है..

जीवन बदल रहा है.. विशेषकर स्त्री पुरुष सम्बंधों और स्त्री की समाज में भूमिका को लेकर.. इस विषय पर तमाम तरह के विचार समाज में चल रहे हैं.. भारत के एक मूर्धन्य कवि और विचारक और आधुनिक ऋषि, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार आपके सामने ला रहा हूँ..स्त्री पर अपने ये विचार उन्होने १९१६-१७ की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक भाषण में व्यक्त किये.. कल आपने पढ़ा दूसरा टुकड़ा.. जिसमें गुरुदेव ने कहा.. मगर क्योंकि आदमी अपनी सत्ता के अभिमान में उन सारी चीज़ों का उपहास करता है जो कि जीवित हैं और उन सम्बंधो का जो कि मानवीय है, तो बहुत सारी स्त्रियाँ गला फाड़ के चीख रही हैं ये सिद्ध करने के लिये कि वे स्त्रियाँ नहीं हैं और संगठन और सत्ता में ही उनकी सच्ची अभिव्यक्ति होती है। वर्तमान काल में जब उन्हे अस्तित्व की जैविक ज़रूरत और प्रेम और सहानुभूति के गहरी आध्यात्मिक ज़रूरत की संरक्षक के बतौर सिर्फ़ माँ समझा जाय तो उन्हे लगता है कि उनके सम्मान को क्षति होती है.. आज पढ़िये तीसरा और अन्तिम टुकड़ा..


काफ़ी समय से बदलाव जारी हैं समाज की ठोस परत के नीचे जिस पर स्त्री की दुनिया की बुनियाद रखी है। हाल में, विज्ञान की मदद से, मनुष्य की सभ्यता और ज़्यादा पौरुषीय होती जा रही है। जिसके कारण व्यक्ति की पूरी वास्तविकता की उपेक्षा हो रही है। व्यक्तिगत रिश्तों के इलाक़े में संगठन अपने पैर फैला रहा है और भावनाओं का स्थान पर क़ानून। पौरुषीय आदर्शों से प्रभावित कुछ समाजो में, भ्रूण हत्या का चलन होता रहा है ताकि स्त्रियों की जनसंख्या पर क्रूरता से काबू बनाये रखा जाय। वही चीज़ एक दूसरे रूप में आधुनिक सभ्यता में भी हो रही है। सत्ता और सम्पदा के अपने सतत लोभ के चलते इस सभ्यता ने स्त्री को उसकी दुनिया के अधिकतर भाग से वंचित कर दिया है। घर रोज़-ब रोज़ दफ़्तर से और घेरा जा रहा है। स्त्रियो के लिये कुछ भी ना छोड़ कर इस ने पूरी दुनिया को निगल लिया है। ये अपकार ही नहीं अपमान भी है।

सत्ता के लिये आदमी की आक्रामकता के कारण स्त्रियों को महज़ सजावटी क्षेत्रों में हमेशा के लिये धकेला नहीं जा सकता। क्योंकि वह सभ्यता के लिये आदमी से कोई कम ज़रूरी नहीं बल्कि शायद ज़्यादा ज़रूरी है। पृथ्वी की भौमिकी इतिहास में विराट विभीषिकाओं के दौर भी गुज़रे हैं जबकि पृथ्वी ने परिपक्वता की वो नरमी हासिल नहीं की थी जो किसी भी प्रकार के हिंसक प्रदर्शन को तुच्छ समझती है। व्यापारिक स्पर्धा और सत्ता के लिये संघर्ष करने वाली सभ्यता को उस अवस्था की श्रेष्ठता के लिये भी जगह बनानी चाहिये जिसकी शक्ति, सौन्दर्य और शुभता की गहराई में छिपी होती है। इतिहास की बागडोर अभीप्सा के हाथ अब बहुत रह ली। क्योंकि व्यक्ति को अपने हर हक़ के लिये सत्ता पक्ष से बलपूर्वक छीना झपटी करनी पड़ी है और अपनी भलाई को प्राप्त करने के लिये भी बुराई की मदद लेनी पड़ी है। मगर इस तरह की व्यवस्था लम्बे समय तक नहीं चल सकती। ऐसी व्यवस्था को बार बार हिंसा क्रे बीजों का सामना करना होगा जो उसके कोनों दरारों म्रें ही पड़े रहते हैं, और सामना करना होगा अंधेरे में फैले व्यवधानों का जो इसको नेस्तनाबूद कर देंगे जबकि ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं होगी।

हालाँकि इतिहास की वर्तमान अवस्था में पुरुष अपने पौरुष का सिक्का चला रहा है और अपनी सभ्यता को शिलाखण्डों से बनाता आ रहा है, विकास के जीवन सिद्धान्त की उपेक्षा कर के। मगर वह स्त्री के स्वभाव को दबा कर मिट्टी या अपनी बिल्डिंगों का मृत सीमेन्ट रेतादि नहीं बना सकता। स्त्री के घर टूट गये हो पर स्त्री नहीं टूटी है और ना तोड़ी जा सकती है। सिर्फ़ आदमी की व्यापारिक इजारेदारी के खिलाफ़ संघर्ष करते हुये स्त्री अपने रोज़गार की आज़ादी खोज रही है, ऐसा नहीं है कि बल्कि ये संघर्ष है आदमी की सभ्यता पर इजारेदारी के खिलाफ़ जहाँ वह रोज़ उसका हृदय खण्डित कर रहा है और जीवन विध्वंस कर रहा है। उसे स्त्री का सम्पूर्ण भार मानवीय दुनिया के सृजन में लगाते हुये सामाजिक असंतुलन को फिर से संतुलन में लाना चाहिये। संगठन की पैशाचिक मोटर-कार जीवन के राजमार्ग पर चलते हुये, विपत्ति और विकृति फैलाते हुये, घरघरा किरकिरा रही है क्योंकि दुनिया में तेज़ गति ही उसकी प्रथम वरीयता है। अतः आवश्यक है कि व्यक्ति के घायल और चोटिल जगत में स्त्री का आगमन हो, और वो हर एक को अपनाये, बेकार को और तुच्छ को भी। वह भावनाओं के सुन्दर सुमनों को वैज्ञानिक प्रवीणता के झुलसा देने वाले ठहाकों से छाँव दे । लोभ के सांगठनिक साम्राज्य के द्वारा जीवन को उसकी सामान्यताओं से वंचित किये जाने पर जन्मी और बढ़ती अशुद्धताओं को बुहार कर बाहर करे । समय आ गया है कि जब उसका कार्य क्षेत्र घरेलू आयामों से कहीं बाहर तक फैल गया है और स्त्री की ज़िम्मेदारी पहले से और बढ़ गई है। दुनिया ने, अपने अपमानित व्यक्तियों के समेत, अपनी गुहार उस तक पहुँचा दी है। इन व्यक्तियों को अपनी सच्चा मूल्य फिर से पाना है, खुले आसमान में फिर से सर उठाना है, और उसके प्रेम के सहारे ईश्वर में अपनी आस्था का पुनर्जागरण करना है। आदमियों ने आज की सभ्यता की अर्थहीनता देख ली है, जो राष्ट्रवाद पर आधारित है, यानी कि आर्थिक और राजनैतिक आधारों पर, और उसके परिणाम सैन्यवाद पर। आदमी अपनी आज़ादी और मानवता खोता रहा है विशाल मशीनी संगठनों मे फ़िट होने के लिये। तो अगली सभ्यता, ऐसी आशा है !!!, सिर्फ़ आर्थिक, राजनैतिक स्पर्धा और शोषण पर नहीं और सिर्फ़ कार्यकुशलता के आर्थिक आदर्शों पर नहीं बल्कि विश्वव्यापी सामाजिक सहयोग, आदान प्रदान के आध्यात्मिक आदर्शों पर आधारित होगी। और तब स्त्रियों को अपना सच्चा स्थान मिलेगा।

क्योंकि पुरुष विशाल और पैशाचिक संगठन बानाते रहे हैं, उन्हे ये सोचने की आदत हो गई है कि सत्ता उत्पादन अपने आप में कोई स्वाभाविक आदर्श है। ये आदत उनमें बैठ गई है। और उन्हे विकास के वर्तमान आदर्शों मे सत्य की ग़ैर मौजूदगी को देखने में मुश्किल हो रही है। मगर स्त्री अपनी एक मानसिक ताज़गी ले आ सकती है इस आध्यात्मिक सभ्यता के निर्माण के इस नवीन कार्य में, यदि वह अपने उत्तरदायित्व के प्रति सचेत बनी रहे।

निश्चित ही वह चंचल हो सकती है अपने नज़रिये में संकीर्ण हो सकती है और अपने लक्ष्य से भटक भी सकती है। स्त्री अलग थलग रही है, आदमी के पीछे एक ग़ुमनामी में रही है अब तक, पर मेरा ख्याल है कि आने वाली सभ्यता में इस बात की खानापूरी हो जायेगी। और जीवन की अगली पीढ़ी में हारेंगे वे मनुष्य जो अपनी सत्ता की डींगे मारते रहे, और आक्रामक तरीक़ों से शोषण करते रहे और जिनका भरोसा उठ गया है अपने मालिक की शिक्षा के असल अर्थ से कि कमज़ोर ही पृथ्वी का उत्तराधिकारी होगा। यही बात प्राचीन दिनों में भी घटी थी, प्रागैतिहासिक काल में, डायनासोर और मैमॉथ जैसे विशाल प्राणियों के साथ। उन्होने पृथ्वी का उत्तराधिकार खो दिया है। बलशाली प्रयासों के लिये उनके पास विराट मज्जायें थी लेकिन उन्हे अपने से कहीं कमज़ोर प्राणियों से हारना पड़ा उनसे जिनकी मज्जा कम थी, आकार कम था। और भविष्य की सभ्यताओं में भी, स्त्री जो कि कमज़ोर प्राणी है, अपने बाहिरी आकार में, मज्जा में, और जो हमेशा पीछे रहीं और छोड़ दी गईं पुरुष नाम के उस विशाल प्राणी के साये में, वे अपनी जगह हासिल करेंगी और बड़े प्राणियों को रास्ता देना होगा।
समाप्त

बुधवार, 4 अप्रैल 2007

मानवीय दुनिया स्त्रियों की दुनिया है

जीवन बदल रहा है.. विशेषकर स्त्री पुरुष सम्बंधों और स्त्री की समाज में भूमिका को लेकर.. इस विषय पर तमाम तरह के विचार समाज में चल रहे हैं.. भारत के एक मूर्धन्य कवि और विचारक और आधुनिक ऋषि, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार आपके सामने ला रहा हूँ..स्त्री पर अपने ये विचार उन्होने १९१६-१७ की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक भाषण में व्यक्त किये.. कल आपने पढ़ा पहला टुकड़ा.. जिसमें गुरुदेव ने कहा.. जो स्त्रियां अपनी रुचियों को जीवंत बनाये रखने के लिये अपने माहौल में कुछ विशेष और हिंसक तलाश करती हैं केवल यही सिद्ध करती हैं कि उनका अपने सच्चे जगत से नाता टूट चुका है। देखा गया है कि पश्चिम में बहुत सारी स्त्रियां और पुरुष भी उन चीज़ों की भर्त्सना करते हैं जो आम हैं। और वे उन चीज़ों का पीछा करते हैं जो कुछ खास है, और अपनी सारी शक्तियों का ज़ोर एक ऐसी जाली मौलिकता पर देते हैं जो सिर्फ़ चकित करती है, संतुष्ट भले ना करती हो। मगर ऐसी कोशिशें जीवंतता की सही निशानियां नहीं हैं। और ये पुरुषों से ज़्यादा स्त्रियों के लिये घातक होती होंगी... आज दूसरा टुकड़ा ..

अगर, बाहरी उद्दीपन के प्रयोग से, वे एक मानसिक व्यसन पाल लें, और लगातार सनसनी के घूँट दर घूँट खुराक की लती हो जायें, तो वे अपनी प्राकृतिक संवेदनशीलता खो बैठेंगी और साथ ही अपने स्त्रीत्व की बहार भी और इसके साथ मनुष्य जाति को क़ायम रखने की वह वास्तविक शक्ति भी।

एक आदमी की अभिरुचि दूसरे मनुष्य में तब ही जागती है जबकि उसमें कोई विशेष उपयोगिता या प्रतिभा हो, लेकिन एक स्त्री दूसरे मनुष्यों मे दिलचस्पी रखती है क्योंकि वे जीवित प्राणी है, वे मनुष्य हैं, किसी विशेष प्रयोजन के खातिर नहीं, या उनकी किसी ऐसी क्षमता के कारण भी नहीं जो स्त्री को बहुत भा गई हो। चूँकि स्त्री में यह शक्ति है इसीलिये वह हमारे मानस को इतना मोहित करती है.. जीवन के प्रति उसका ये उल्लास इतना मोहक होता है कि उसकी वाणी, उसकी चाल, उसकी हँसी, सब कुछ एक गरिमा से भर जाता है। उसकी गरिमा का यह सुर हमारे वातावरण की रुचियों के इसी समन्वय में है।
सौभाग्य से हमारे रोज़मर्रा की दुनिया में साधारणता का सूक्ष्म और निराग्रही सौन्दर्य है मगर इसके अदृश्य अचंभों को समझने के लिये हमें अपने स्वयं के संवेदनशील मन पर निर्भर होना होगा क्योंकि वे आध्यात्मिक हैं। यदि हम उसके आवरण को चीर कर भीतर जा सकें, कि दुनिया अपने साधारण आयामों में एक चमत्कार है।

इस सत्य को हम अपने प्रेम की शक्ति के द्वारा अन्तर्बोध से जानते हैं, इस शक्ति के ज़रिये समझते हैं कि हमारे प्रेम और सहानुभूति के पात्र, अपने महत्वहीनता के खुरदुरे भेस के बावजूद, अनमोल हैं। जब स्त्रियाँ साधारण चीज़ों में अपनी रुचि की शक्ति को खो बैठती हैं तो फिर फ़ुर्सत अपने खालीपन से उन्हे डराती है क्योंकि उनकी अपनी कुदरती संवेदनशीलता कुंद हो चुकी है और उनके आस पास ऐसा कुछ भी नहीं जो उनके ध्यान को पकड़ सके। तो फिर वो अपने आप को बुरी तरह से व्यस्त रखती हैं समय के उपयोग में नहीं, महज़ उसको काटने में।

हमारा दैनंदिन जीवन एक बाँस की तरह है, इसका सच्चा मूल्य इसके अपने आप में नहीं मगर जिनके पास ध्यान की शक्ति और शांति है वे सुन सकते हैं वह संगीत, जो अनन्त हमारे खालीपन के ज़रिये बजाता है। लेकिन चीज़ों की क़दर उनके लिये ही करना स्त्रियों की आदत होती है तो आप उनसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे आप के मानस में तूफ़ान खड़ा कर दें, आपकी आत्मा को अनन्त से मिलन से लुभा लें और अपनी अर्थहीन ध्वनियों की अविराम गति से अनन्त की आवाज़ का गला घोंट दें।

मेरा ये तात्पर्य नहीं है कि घरेलू जीवन ही स्त्री के लिये एकमात्र जीवन है। मेरा मतलब है कि मानवीय दुनिया महज़ संगठित करने का अमूर्त प्रयास नहीं, मानवीय दुनिया स्त्रियों की दुनिया है चाहे वह घरेलू हो या मानवीय जीवन की कोई और गतिविधि।

जब भी कोई चीज़ मूर्त रूप से व्यक्तिगत और मानवीय है तो वह स्त्रैण दुनिया है। घरेलू दुनिया ही वह दुनिया है जहाँ हर व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का सच्चा मूल्य मिलता है इसलिये उसकी कीमत बाज़ारू कीमत नहीं है..बल्कि प्रेम की कीमत है; कहने का मतलब यह है कि वह मूल्य जो प्रभु ने अपनी अनन्त दया से हर प्राणी को प्रदान किया है। घरेलू दुनिया स्त्रियों को प्रभु की एक भेंट रही है। वह अपने प्रेम की आभा को सभी ओर अपनी सीमाओं के परे ले जा सकती है और छोड़ भी सकती है अपने स्त्रीत्व को सिद्ध करने के लिये समय आने पर । लेकिन ये एक सच है इसकी उपेक्षा की नहीं जा सकती कि जिस पल वह अपने माँ की गोद में जन्म लेती है वह अपनी सच्ची दुनिया, मानवीय सम्बंधों की दुनिया के केंद्र में जन्म लेती है।

स्त्रियों को अपनी शक्ति का प्रयोग सतह को चीर कर चीज़ों के केंद्र में जाने के लिये करना चाहिये जहाँ कि जीवन का रहस्य में मौजूद है एक शाश्वत अभिरुचि। आदमी के पास ऐसी शक्ति नहीं है। मगर स्त्री के पास है यदि वह इसकी हत्या नहीं कर देती- और इसी लिये वह उन प्राणियों से भी प्रेम करती है जो अपने असामान्य चरित्र के कारण प्रेमयोग्य नहीं हैं। आदमी अपनी ही दुनिया में अपना फ़र्ज़ निभाता है जहाँ वह सत्ता और सम्पदा और तमाम तरह के संगठन खड़े करता रहता है। लेकिन प्रभु ने स्त्री को संसार से प्रेम करने के लिये भेजा है, एक साधारण ची़ज़ों और घटनाओं के संसार से। वह किसी परी कथा के संसार में नहीं रहती जहाँ कोई परी सदियो तक सोती रहती है जब तक कि वह जादुई छड़ी से छुई नहीं जाती। प्रभु के संसार में स्त्रियों के पास अपनी जादू की छड़ियाँ हैं जो उनके दिलों को जगाये रखती हैं और ये छड़ियां सम्पदा के सोने की नहीं है और ना ही सत्ता के लोहे की।

हमारे सारे आध्यात्मिक गुरुओं ने व्यक्ति के अनन्त मूल्य का गुणगान किया है। ये वर्तमान काल का निरंकुश भौतिकवाद है जो संगठन के लहूलोलुप बुतों के आगे व्यक्तियों की क्रूर बलि दे रहा है। जब धर्म भौतिकवादी था, जब आदमी अपने भगवानों की अर्चना उनके रौद्ररूप से डर कर करता था या फिर सत्ता और सम्पदा के लोभ से , तब अनुष्ठान नृशंस थे और बलिदान असंख्य। परन्तु आदमी के आध्यात्मिक जीवन के विकास के साथ हमारी अर्चना प्रेम की अर्चना बन गई है।

सभ्यता की वर्तमान अवस्था में जब कि न सिर्फ़ व्यक्ति को विकृत किया जाता है बल्कि उसका महिमा मण्डन भी होता है, ऐसे में स्त्रियाँ अप्ने स्त्रीत्व से ही लज्जा महसूस करती हैं। क्योंकि प्रभु ने अपने प्रेम के संदेश के साथ उन्हे व्यक्तियों के संरक्षक के रूप में भेजा है और अपनी इस दिव्य भूमिका में उनके लिये सेना, नेवी संसद दुकानो और कारखानों से कहीं ज़्यादा व्यक्ति का मूल्य है। यहाँ वे अपने प्रभु के वास्तविक मन्दिर में सेवारत हैं जहाँ प्रेम का मूल्य सत्ता से ज़्यादा है।

मगर क्योंकि आदमी अपनी सत्ता के अभिमान में उन सारी चीज़ों का उपहास करता है जो कि जीवित हैं और उन सम्बंधो का जो कि मानवीय है, तो बहुत सारी स्त्रियाँ गला फाड़ के चीख रही हैं ये सिद्ध करने के लिये कि वे स्त्रियाँ नहीं हैं और संगठन और सत्ता में ही उनकी सच्ची अभिव्यक्ति होती है। वर्तमान काल में जब उन्हे अस्तित्व की जैविक ज़रूरत और प्रेम और सहानुभूति के गहरी आध्यात्मिक ज़रूरत की संरक्षक के बतौर सिर्फ़ माँ समझा जाय तो उन्हे लगता है कि उनके सम्मान को क्षति होती है।

क्योंकि आदमी अपनी उत्पादित अमूर्तताओं की छवियों की चिकनी चुपड़ी तारीफ़ें करता रहता है, स्त्रियाँ शर्म में अपने सच्चे प्रभु का भंजन कर रही हैं, और वो आत्म-बलिदानात्मक प्रेम द्वारा अपनी अर्चना की प्रतीक्षा कर रहा है।

जारी.. कल अन्तिम टुकड़ा..

मंगलवार, 3 अप्रैल 2007

वो मनुष्य जाति की मातायें हैं

जीवन बदल रहा है.. विशेषकर स्त्री की समाज में भूमिका को लेकर.. इस विषय पर तमाम तरह के विचार समाज में चल रहे हैं.. उन विचारों के बिल्ले भी हैं.. नारीवादी, अतिनारीवादी, प्रगतिशील, पतनशील, पुरातनपंथी, रूढ़िवादी आदि आदि.. इन विचारों में कुछ पोलिटिकली करेक्ट विचार माने जाते हैं.. और कुछ पोलिटिकली इनकरेक्ट.. मैंने भी कुछ ऐसे ही पोलिटिकली इनकरेक्ट विचार पिछले दिनों व्यक्त किये.. लोग अप्रसन्न भी हुए.. आज मैं भारत के एक मूर्धन्य कवि और विचारक और आधुनिक ऋषि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार आपके सामने ला रहा हूँ.. स्त्री पर ये विचार उन्होने १९१६-१७ की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक भाषण में व्यक्त किये.. पाठकों से थोड़े धैर्य की अपेक्षा है.. कुछ गुरुदेव की अपनी अंग्रेज़ी की सीमायें हैं और कुछ मेरे अनुवाद की.. एक साथ पूरे भाषण को देना पढने वालों के लिये भारी हो जायेगा इसलिये तीन टुकड़े कर दिये हैं.. आज पहला टुकड़ा..

स्त्री


जब नर प्राणी एक दूसरे को मारने के लिये अपनी हिंसा में लिप्त होते हैं, कुदरत इसकी अनदेखी करती है क्योंकि, तुलनात्मक रूप से, मादा उसके मक़सद में अनिवार्य हैं जबकि नर महज़ एक ज़रूरत। किफ़ायती शील की होने के कारण कुदरत उन भूखी सन्तानों को ज़्यादा तरजीह नहीं देती जो झगड़े की हद तक पेटू हैं मगर कुदरत का ऋण चुकाने के लिये योगदान बहुत ज़रा सा ही करते हैं। इसीलिये कीट जगत में हम यह संवृत्ति देखते हैं जिसमें मादायें नर जन संख्या को कम से कम रखने की ज़िम्मेदारी निभाती हैं।

प्रकृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से बहुत हद तक मुक्त हो गये, मनुष्य जगत में नर को, अपने शौक और खुराफ़ातों को पूरा करने की आज़ादी मिल गई है। आदमी को परिभाषा से औज़ार बनाने वाला प्राणी कहा जाता है। ये औज़ार बनाना कुदरत के दायरे से बाहर है।

वास्तव में हम अपनी औज़ार बनाने की ताक़त के ज़रिये ही कुदरत की अवहेलना कर सके हैं। अपनी अधिकतर ऊर्जा की मुक्ति की बदौलत ही मनुष्य ने ये क्षमता पैदा की और शक्तिशाली हो गया। और इस तरह से, बावजूद इसके कि कुदरत द्वारा प्रदत्त जैविक विभाग की गद्दी अभी भी स्त्री के ही पास है, मानसिक विभाग में पुरुष ने अपना प्रभुत्व बना और बढ़ा लिया है। इस महान कार्य के लिये दिमाग़ का अलगाव और गतिविधि की स्वतंत्रता आवश्यक थे।

आदमी ने शारीरिक और भावनात्मक बेड़ियों से अपनी तुलनात्मक आज़ादी का फ़ायदा उठाया और अपने जीवन की सीमाओं को तोड़ने की दिशा में बेरोकटोक बढ़ चला। इस यात्रा में वह क्रांति और विध्वंस के खतरनाक रास्तों से होकर गुज़रा है। समय समय पर उसके संचय समूह ढहते रहे और और तरक़्क़ी की धारा अपने स्रोत से ही अदृश्य होती रही है। लाभ अच्छे खासे हुए मगर नुकसान उससे भी ज़्यादा उठाने पड़े। खासकर कि जब हम ये सोचें कि जो सम्पदा जाती रही वो अपने साथ सारे प्रमाण भी ले गई। विनाश के इन आवृत्तियों से आदमी ने ये समझा है, हालाँकि उस सत्य का पूरा लाभ अभी भी नहीं लिया है, कि उसके सभी संरचनाओं को विनाश से बचाने के लिये एक लय बनाये रखना ज़रूरी है, कि मह्ज़ शक्ति की असीमित बढोत्तरी सच्ची तरक़्क़ी नही लाती, और सच में एक सही प्रगति के लिये एक सन्तुलन होना चाहिये, संरचना का बुनियाद के साथ एक तालमेल होना चाहिये।

स्त्री के स्वभाव में स्थायित्व के गुण के लिये बड़ा मूल्य है। अंधकार के हृदय में जिज्ञासा के चंचल तीर छोड़ते रहने का महज़ चलताऊपन उसे कभी नहीं लुभाता। उसकी सारी शक्तियाँ कुदरतन चीज़ों को एक आकार एक गोलाई देने में लगी रहती हैं क्यों कि यही जीवन का नियम है। जीवन की गति में हालाँकि कुछ भी अन्तिम नहीं मगर फिर भी हर कदम में एक पूर्णता की लय है।एक कली में भी अपने आदर्श की सम्पूर्ण गोलाई है, और फल में भी। मगर एक अधूरी इमारत में सम्पूर्णता का कोई आदर्श नहीं होता। इसलिये अगर वह अपने परिमाण में बढ़ती ही जाय तो धीरे धीरे वह अपने स्थायित्व के दायरे से बाहर चली जाती है। मानसिक सभ्यता की पौरुषीय संरचनायें बेबेल की मीनारें हैं। वे अपने बुनियाद की अवहेलना की ज़ुर्रत करती हैं और बार बार भरभराकर धसक जाती हैं। मनुष्य का इतिहास अपने विध्वसों की परतों पर ही विकसित होता रहा है। ये कोई सतत जीवन विकास नहीं रहा है। अभी चल रहा युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध) इसी की एक अभिव्यक्ति है। बुद्धि से जन्मे हुए आर्थिक और राजनैतिक संगठन जो महज़ मशीनी शक्ति के ही नुमाइन्दे हैं, जीवन के बुनियादी आयाम में अपने गुरुत्व के केन्द्रों को भूल जाने के लिये प्रवृत्त हैं। शक्ति और स्वामित्व का संचित लोभ जिसका कोई सम्पूर्णता की कोई अवस्था नहीं हो सकती, जिसका नैतिक और आध्यात्मिक पूर्णता के आदर्शों के साथ कोई तादात्म्य नहीं है, आखिरकार अपने ही उपादान के भारीपन पर एक हिंसक वार कर बैठता है ।

इतिहास के वर्तमान मकाम पर सभ्यता लगभग पूरी तरह से पौरुषीय है, एक ताक़त की सभ्यता, जिसमें स्त्रियों को एक किनारे ढकेल दिया गया है। इसलिये इस सभ्यता का सन्तुलन बिगड़ा हुआ है और ये एक युद्ध से दूसरे युद्ध में उछलते हुए सी गति कर रही है। इसकी नीयत की शक्ति विनाश की शक्ति है, और इसके अनुष्ठान मानव बलि की एक भयंकर संख्या के साथ सम्पन्न होती है। ये एकतरफ़ा सभ्यता एक ज़बरदस्त चाल से दुर्घटनाओं की एक श्रंखला से टकराती हुई चल रही है क्यों कि ये एकतरफ़ा है। और आखिरकार वो समय आ गया है जब स्त्रियों आकर इस ताक़त की इस दुस्साहसी चाल को अपने जीवन लय प्रदान करें।

क्योंकि स्त्री की भूमिका मिट्टी की ग्रहणशील, समावेशी भूमिका है जो न केवल पेड़ को बढने में मदद देती है बल्कि उसकी वृद्धि की सीमायें भी तय करती है। जीवन के जीवट के लिये पेड़ अपनी शाखाएं ऊपर की दिशा में सभी ओर फैलाता है मगर उसके सारे गहरे बन्धन ज़मीन के नीचे मिट्टी में जकड़े हुये छिपे हुए हैं और उसे जीने में सहायक होते हैं। हमारी सभ्यता के भी अपने समावेशी तत्व चौड़े, गहरे और स्थिर होने चाहिये। केवल वृद्धि नहीं, वृद्धि का एक समन्वय होना चाहिये। सिर्फ़ सुर नहीं ताल भी होना चाहिये। ताल कोई बाधा नहीं है, ये वैसे ही जैसे नदी के किनारे होते हैं, वो धारा को सततशील बनाते हैं वरना वह दलदल के अनियतता में खो जायेगी। ये लय है ताल है, जो संसार की गति को रोकती नहीं बल्कि उसे एक सत्य और सौन्दर्य प्रदान करती है।

शील, विनय, समर्पण और आत्म-बलिदान की शक्ति स्त्री को समावेशिता के ये गुण पुरुष से ज़्यादा अनुपात में मिले हैं। ये प्रकृति की समावेशिता का गुण ही है जो इस की पैशाचिक शक्ति के जंगली तत्वों को वश में करके सौम्य और कोमल बनाकर जीवन के सेवायोग्य एक सुन्दर रचना में बदल देता है। स्त्री की इसी समावेशिता की शक्ति ने उसे वह वृहद और गहरी शान्ति दी है जो स्वास्थ्य पोषण और संग्रहण के लिये अत्यावश्यक है। अगर जीवन सिर्फ़ व्यय होने का नाम होता तो वह रॉकेट की तरह एक पल ऊपर जाता और दूसरे पल राख बनकर ज़मीन पर आ गिरता। जीवन एक चिराग़ की तरह होना चाहिये जिसमें कि रौशनी की सम्भावना लपटों से कहीं ज़्यादः है। स्त्री के स्वभाव में इसी समावेशिता की गहराई में जीवन की सम्भावना संग्रहीत होती है।

मैंने पहले कहीं कहा है कि पश्चिमी दुनिया की स्त्रियों में एक खास बेचैनी देखी जाती है जो उस के स्वभाव का सामान्य पहलू नहीं हो सकता। क्योंकि जो स्त्रियां अपनी रुचियों को जीवंत बनाये रखने के लिये अपने माहौल में कुछ विशेष और हिंसक तलाश करती हैं केवल यही सिद्ध करती हैं कि उनका अपने सच्चे जगत से नाता टूट चुका है। देखा गया है कि पश्चिम में बहुत सारी स्त्रियां और पुरुष भी उन चीज़ों की भर्त्सना करते हैं जो आम हैं। और वे उन चीज़ों का पीछा करते हैं जो कुछ खास है, और अपनी सारी शक्तियों का ज़ोर एक ऐसी जाली मौलिकता पर देते हैं जो सिर्फ़ चकित करती है संतुष्ट भले ना करती हो। मगर ऐसी कोशिशें जीवंतता की सही निशानियां नहीं हैं। और ये पुरुषों से ज़्यादा स्त्रियों के लिये घातक होती होंगी क्योंकि स्त्रियों में जैविक शक्ति पुरुषों की तुलना में अधिक प्रबल होती है। वो मनुष्य जाति की मातायें हैं और अपने आस पास की दुनिया की आम चीज़ों में उनकी सच्ची अभिरुचि होती है, यदि ऐसा ना हो तो मनुष्य जाति का विनाश हो जायेगा।


जारी..

शनिवार, 17 मार्च 2007

अनामदास के डायनासोर और चेतना की स्वतंत्रता

अपने आगमन के साथ ही बहुत सारे सवाल खड़े कर देने वाले अनामदास..और मैं... लगता है हम एक ही राह के मुसाफ़िर हैं.. आपने जो बाते कहीं हैं.. वो मेरे भी दिमाग़ को चकराती रही हैं.. "लेकिन एक बात जो समझ में नहीं आई कि अगर आत्मा न पैदा होती है न मरती है तो दुनिया की आबादी कैसे बढ़ रही है? क्या भगवान के पास आत्माओं का स्टॉक है जो वह वक़्त ज़रूरत के हिसाब से रिलीज़ करता रहता है, क्या उसने तय किया है चीन और भारत के लिए सबसे अधिक आत्माएँ एलोकेट की जानी चाहिए?"

अनामदास का सवाल सोचने लायक है.. आत्मा होती है तो क्या होती है.. क्या हर शरीर की आत्मा अलग होती है.. जैसे उसके कपड़े.. एक के कपड़ों की तरह उसकी आत्मा भी दूसरा नहीं पहन सकता... या कपड़ों ही की तरह कोई भी पहन सकता है.. बस लिहाज़ में नहीं पहनता... या ये कोई स्कूलनुमा सिस्टम है जहां आप चौरासी लाख योनियों में से गुज़र कर आखिर में महाबोध हासिल करके डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजे जाते हैं.. मुझे लगता है अनामदास का सवाल इस पूरे मसले की प्रक्रिया से ज़्यादा इसके दार्शनिक मूल पर है.. कुछ विचार जो मेरे भीतर आते रहे हैं वो लिखता हूँ..
वास्तव में ये सवाल आत्मा के अस्तित्व का सवाल नहीं है.. ये चेतन तत्त्व के अस्तित्व का प्रश्न है..चेतन का अस्तित्व तो है.. तो शंका उसके अस्तित्व पर नहीं है.. जड़ के साथ प्राप्य है.. यानी भौतिक तत्व के एक जटिल संरचना में साथ आजाने पर एक चेतना निर्मित होती है.. हमारे आपके भीतर है.. सवाल उसके जड़ से स्वतंत्र अस्तित्व होने पर है.. क्या शरीर के मरने पर आत्मा भी मर जाती है.. या शरीर से इतर भी किसी चेतना का कोई अस्तित्व है..? इसी सवाल से दो तरह से सामना किया जा सकता है.. एक तो आस्था के रास्ते.. वहां तो शक़ की कोई गुंज़ाईश ही नहीं..बस मान लो.. दूसरे युक्ति बुद्धि और तर्क से.. तर्क वाला रास्ता लेते हैं.. सवाल है कि क्या आत्मा या चेतना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है.. ?

मान लेते हैं नहीं.. अब मैं पूछता हूँ.. क्या अग्नि का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है.. ? जल का?.. वायु का ? और काल का ?जल वायु पृथ्वी और आकाश से भिन्न एक अग्नि की कल्पना सम्भव है.. तो चेतना की क्यों नहीं.. ?भौतिक तत्व एक विशेष अवस्था में आग्नेय रूप धारण कर लेता है.. वही तेल ठण्डे तरल रूप में करोड़ो वर्ष पड़े रह सकता है.. और किसी एक अन्य तत्व के संयोग से उसमें एक अकल्पनीय अग्नि की सम्भावना सिद्ध हो जाती है.. अग्नि न मरती है ना जनम लेती है.. वो सदा थी सदा रहेगी.. ये सब कहा जा सकता है.. फ़र्क यहां सिर्फ़ इतना है.. हम बात अग्नि की नहीं आत्मा या चेतना की कर रहे हैं.. चेतना को हम जिस रूप में जानते हैं वो भी तो भौतिक तत्व के एक विशेष संयोग का परिणाम ही तो है.. यदि किसी एक जंगल में किसी एक काल में आग लगी थी.. तो ये कहना कि आग सिर्फ़ जंगल में ही लग सकती है.. और जंगल से स्वतंत्र आग का अस्तित्व संभव नहीं, शायद तर्क संगत नहीं होगा..

बाकी ये बात निश्चित ही सोचनीय है कि पृथ्वी का भार मोटे तौर पर तो नहीं बदलने वाला.. अगर मनुष्य ज़्यादा हैं तो जानवर पेड़ आदि शर्तिया कम हुये होंगे.. और डायनासोर की आत्मा भले ही हमारे भीतर ना हो.. उसकी चेतना ज़रूर है.. हमारे अवचेतन में उसकी स्मृति ज़रूर हैं.. क्यों.. ? .. आपने देखे हैं अपने भीतर के डायनासोर.. मैंने देखे हैं कभी कभी स्वप्नों में.. कुछ विक्षिप्त और अर्धविक्षिप्त लोग उसी में फंस जाते हैं.. वो चिन्ता की अलग राह है..
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