और फिर इस ख्याल के साथ एक गूढ़ बात में उलझ गया। पुराना मुहावरा है बूँद के सागर में मिलने का- आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को परिभाषित करता। और ख्याल आया अपनी मृत्यु और मृत्यु जनित अपने भय का.. अपने अस्तित्व के विखण्डन का। कोई अनोखा भय नहीं है मेरा। सभी डरते हैं मरने से। क्या यह जानकारी इस भय को भगाने के लिए काफ़ी नहीं कि मर कर हम बूँद के बदले सागर का अस्तित्व ग्रहण करेंगे? शायद नहीं.. या बिलकुल नहीं.. अगर काफ़ी होती तो हम डरते ही क्यों?क्या हम डरते हैं क्योंकि हम अज्ञान के अँधेरे में हैं या हम डरते हैं क्योंकि हमें पता है कि सचमुच विखण्डन हो ही जाएगा? भारतीय अध्यात्म कहता है कि हमारा डर सिर्फ़ अज्ञान से उपज रहा है और विज्ञान मानता है कि सचमुच विखण्डन होना ही नियति है।
हिन्दू लोग अपनी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार इसीलिए मृत्यु के हर अवसर पर मोह-शोक—दुःख से ग्रस्त होने पर गीता-पाठ करते हैं कि आत्मा तो अजर-अमर है कपड़े बदलती है आदि आदि। पर वही लोग जो गीता-पाठ करते-कराते हैं गरुड़ पुराण का प्रेतकल्प पढ़ने और उसके अनुष्ठानों को करने की सलाह भी देते हैं। उस प्रेतकल्प के अनुसार शरीर को जला देने के बाद जो बचता है वह आत्मा नहीं अँगूठे के आकार का प्रेत है। कहीं और पढ़ेंगे तो आप को कुछ और मान्यता मिल जाएगी।
अध्यात्म के भीतर आत्मा सम्बन्धी विचार कोई एक नहीं है कि सीधे सीधे कपड़ने बदलने जैसी बात हो। मामला ज़रा जटिल है और आप उसमें जितना बूड़ियेगा उसका रंग उज्जवल होने के बजाय श्याम की ओर गहराता जाएगा। फिर भी यह मान्यता ठोस रूप में बनी रहती है कि आप चाहे, न चाहें, मानें, न मानें, मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। शरीर से स्वतंत्र अस्तित्व!
तो फिर चेतना क्या है? विज्ञान के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है पर हाँ वह इसे भौतिक पदार्थ के जटिल सरंचना का साइड इफ़ेक्ट सा मानता है। आत्मा की अनादि अनन्त स्वभाव पर अध्यात्म का ज़ोर है और पदार्थ की अखण्डता, शाश्वतता को विज्ञान मानता है.. कहीं ये एक ही सिक्के के दो पहलू तो नहीं? पर किस तरह.. ?
अब वापस लौटते हैं मूल बूँद और सागर की बात पर.. यदि वैज्ञानिक मान्यता से इस बात को देखें तो ठीक और तार्किक मालूम होती है। सिवाय एक पहलू के कि व्यष्टि के समष्टि में विलीन होने पर चेतना के स्तर पर कुछ भी घटित नहीं होगा क्योंकि शरीर की जटिल सरंचना का विखण्डन होते ही चेतना नष्ट हो जाएगी।
यदि आध्यात्मिक मान्यता से भी चला जाय तो बूँद सागर में मिल भी गई तो भी उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है प्रेत के रूप में जो कर्म-बन्धन के चलते बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहने के लिए बाध्य है। मगर प्रेत के रूप में और बारम्बार शरीर के रूप में उसे अनन्त दुःखों का भागी-भोगी होना ही पड़ता है। इसीलिए बुद्ध ने इस दुःख से निवृत्ति का मार्ग बताया.. जो गीता के मार्ग से सैद्धान्तिक रूप से अलग नहीं है। गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो।शरीर के भीतर चेतना की यह अलख वाली बात ध्यान देने योग्य है। बुद्ध अपने साधकों को वैचारिक मारा-मारी से दूर रहकर विपश्यना करने की सलाह देते हैं। वि-पश्य-ना.. वि माने विशेष और पश्य माने देखना। विपश्यना माने शरीर को खास तरह से देखना। ऐसे कि शरीर के एक-एक अणु को आप स्वतंत्र अस्तित्व के बतौर पहचान सकें, जान सकें और देख सकें।
अगर इस आध्यात्मिक परिघटना को विज्ञान से समझने की कोशिश करें तो शायद यह कहना अनुचित न होगा कि चेतना का जो साइड इफ़ेक्ट, जो चेतन व्यवहार, पदार्थ का जो आधिभौतिक पहलू, पदार्थ की जटिल संरचना के चलते पदार्थ के भीतर फ़ौरी तौर पर पाया गया था वो साइड इफ़ेक्ट जटिलता के नष्ट होने पर भी पदार्थ के सरल स्वरूप में भी पदार्थ संचित कर ले जाता है। और एक महाचेतना का अंग बन जाता है। कैसे?
क्या माया के परदे से बाहर निकल अँधेरे को हटा कर पदार्थ सीख जाता है, जान जाता है.. क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ? या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्नत स्वभाव- चित को प्राप्त हो जाता है ? और अगर ऐसी कोई परिघटना अगर सचमुच सम्भव है तो क्या इसीलिए बड़े-बूढ़े बार-बार चेताते हैं कि मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती इसका सदुपयोग कर लो..? .. ह्म्म ! कुछ कहानी बनती है क्या?






फ़रक बस इतना है कि अपनी भारतीय परम्परा के ज़रिये भारहीन हो कर प्राकृतिक मल से मुक्त हो जाने का स्वप्न तो नहीं पूरा हो सका.. किसी को हुआ हो हिमालय की किसी कन्दरा में तो वो हमें बताने नहीं आया.. और कबीर जैसों ने तो बताने से इंकार तक कर दिया गूँगे का फल कह कर.. मगर इस विस्फोटक पश्चिमी चिन्तन का असर तो हो गया है.. और जो अपने आस पास हम लगातार देख रहे हैं आजकल.. रोज़-ब-रोज़ हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं.. इस औद्योगिक जीवन में.. महानगरीय जीवन जीते हुये.. सुबह शाम की नित्यता से भी मुक्त हो चुके हैं हम.. सूरज को उगते डूबते देखना तो दूर की बात है.. कब रौशनी हुई और कब अँधियारे ने हमें व्याप्त लिया इसका एहसास भी नहीं होने पाता हमें.. हमारे पैर घास और मिट्टी का मृदु एहसास भी भूल चुके हैं.. गर्मी में हम ए.सी. चला लेते हैं..सर्दियों में हीटर.. ज़्यादातर जंगलों का सफ़ाया हो चुका है.. जो बचे हैं उन पेड़ों से हमारा कितना परिचय है.. विशेषज्ञों की बात मत करिये.. कितने पेड़ों का नाम जानते हैं हमारे बच्चे..?









सत्ता के लिये आदमी की आक्रामकता के कारण स्त्रियों को महज़ सजावटी क्षेत्रों में हमेशा के लिये धकेला नहीं जा सकता। क्योंकि वह सभ्यता के लिये आदमी से कोई कम ज़रूरी नहीं बल्कि शायद ज़्यादा ज़रूरी है। पृथ्वी की भौमिकी इतिहास में विराट विभीषिकाओं के दौर भी गुज़रे हैं जबकि पृथ्वी ने परिपक्वता की वो नरमी हासिल नहीं की थी जो किसी भी प्रकार के हिंसक प्रदर्शन को तुच्छ समझती है। व्यापारिक स्पर्धा और सत्ता के लिये संघर्ष करने वाली सभ्यता को उस अवस्था की श्रेष्ठता के लिये भी जगह बनानी चाहिये जिसकी शक्ति, सौन्दर्य और शुभता की गहराई में छिपी होती है। इतिहास की बागडोर अभीप्सा के हाथ अब बहुत रह ली। क्योंकि व्यक्ति को अपने हर हक़ के लिये सत्ता पक्ष से बलपूर्वक छीना झपटी करनी पड़ी है और अपनी भलाई को प्राप्त करने के लिये भी बुराई की मदद लेनी पड़ी है। मगर इस तरह की व्यवस्था लम्बे समय तक नहीं चल सकती। ऐसी व्यवस्था को बार बार हिंसा क्रे बीजों का सामना करना होगा जो उसके कोनों दरारों म्रें ही पड़े रहते हैं, और सामना करना होगा अंधेरे में फैले व्यवधानों का जो इसको नेस्तनाबूद कर देंगे जबकि ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं होगी।



स्त्रियों को अपनी शक्ति का प्रयोग सतह को चीर कर चीज़ों के केंद्र में जाने के लिये करना चाहिये जहाँ कि जीवन का रहस्य में मौजूद है एक शाश्वत अभिरुचि। आदमी के पास ऐसी शक्ति नहीं है। मगर स्त्री के पास है यदि वह इसकी हत्या नहीं कर देती- और इसी लिये वह उन प्राणियों से भी प्रेम करती है जो अपने असामान्य चरित्र के कारण प्रेमयोग्य नहीं हैं। आदमी अपनी ही दुनिया में अपना फ़र्ज़ निभाता है जहाँ वह सत्ता और सम्पदा और तमाम तरह के संगठन खड़े करता रहता है। लेकिन प्रभु ने स्त्री को संसार से प्रेम करने के लिये भेजा है, एक साधारण ची़ज़ों और घटनाओं के संसार से। वह किसी परी कथा के संसार में नहीं रहती जहाँ कोई परी सदियो तक सोती रहती है जब तक कि वह जादुई छड़ी से छुई नहीं जाती। प्रभु के संसार में स्त्रियों के पास अपनी जादू की छड़ियाँ हैं जो उनके दिलों को जगाये रखती हैं और ये छड़ियां सम्पदा के सोने की नहीं है और ना ही सत्ता के लोहे की।


इतिहास के वर्तमान मकाम पर सभ्यता लगभग पूरी तरह से पौरुषीय है, एक ताक़त की सभ्यता, जिसमें स्त्रियों को एक किनारे ढकेल दिया गया है। इसलिये इस सभ्यता का सन्तुलन बिगड़ा हुआ है और ये एक युद्ध से दूसरे युद्ध में उछलते हुए सी गति कर रही है। इसकी नीयत की शक्ति विनाश की शक्ति है, और इसके अनुष्ठान मानव बलि की एक भयंकर संख्या के साथ सम्पन्न होती है। ये एकतरफ़ा सभ्यता एक ज़बरदस्त चाल से दुर्घटनाओं की एक श्रंखला से टकराती हुई चल रही है क्यों कि ये एकतरफ़ा है। और आखिरकार वो समय आ गया है जब स्त्रियों आकर इस ताक़त की इस दुस्साहसी चाल को अपने जीवन लय प्रदान करें। 
वास्तव में ये सवाल आत्मा के अस्तित्व का सवाल नहीं है.. ये चेतन तत्त्व के अस्तित्व का प्रश्न है..चेतन का अस्तित्व तो है.. तो शंका उसके अस्तित्व पर नहीं है.. जड़ के साथ प्राप्य है.. यानी भौतिक तत्व के एक जटिल संरचना में साथ आजाने पर एक चेतना निर्मित होती है.. हमारे आपके भीतर है.. सवाल उसके जड़ से स्वतंत्र अस्तित्व होने पर है.. क्या शरीर के मरने पर आत्मा भी मर जाती है.. या शरीर से इतर भी किसी चेतना का कोई अस्तित्व है..? इसी सवाल से दो तरह से सामना किया जा सकता है.. एक तो आस्था के रास्ते.. वहां तो शक़ की कोई गुंज़ाईश ही नहीं..बस मान लो.. दूसरे युक्ति बुद्धि और तर्क से.. तर्क वाला रास्ता लेते हैं.. सवाल है कि क्या आत्मा या चेतना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है.. ?