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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

दबे पाँव



शेरजंग की शानदार किताब 'मैं घुमक्कड़ वनों का' पढ़ने के बाद उनकी दूसरी किताबों को पढ़ने की भूख लिए-लिए जब मैं मित्र बोधि के घर पहुँचा तो मेरी नज़र उनके ख़ज़ाने के एक कोने में दबी और दूसरी किताबों के बोझ से कराह रही 'दबे पाँव' पर पड़ी। ये ऐतिहासिक लेखक वृन्दावनलाल वर्मा के शिकार संस्मरणों को मुअज्जमा है। बोधि ने उदारता से किताब कवर चढ़ाकर मेरे हवाले कर दी और मैंने तो किताब पाई गाँठ गठियाई। 

किताब में वर्मा जी ने बुन्देलखण्ड के झांसी, ग्वालियर, ओर्छा आदि इलाक़ों के जंगलों में उनके शिकार के शग़ल की टीपें लिखी हैं। इन टीपों में स्यार, खरहे-खरगोश, मोर, नीलकंठ, तीतर, भटतीतर, वनमुर्गी, हरियल, चण्डूल, लालमुनियाँ, सारस, पनडुब्बियाँ, पतोखियां, टिटहरी, मगर, और जलकुत्ता जैसे जीवों के बारे में तो बात होती ही चलती है। लेकिन मुख्य तौर पर इस किताब में जंगल के बड़े जानवर चिंकारा, हिरन, चीतल, तेंदुआ, काला तेंदुआ, चीता, लकड़भग्गा, खीसदार सुअर, रीछ, साँभर, नीलगाय, नाहर या बाघ या शेर, सिंह, जंगली कुत्ते(सुना कुत्ते) और भेड़िये के व्यक्तित्व, आपसी अन्तर और व्यवहार की तमाम अनमोल जानकारियां हैं- जैसे भालू निरा बहरा होता है और नज़र का कमज़ोर होता है उसका एकमात्र सहारा उसकी नाक होती है। जब कभी किसी आदमी रूपी ख़तरे को अचानक वो अपने पास पा जाता है तो घबराकर उस पर हमला कर बैठता है। स्वभाव से वो बन्दरों की ही तरह मूलतः शाकाहारी है। या फिर लकड़भग्गा मौक़ा मिलने पर अपने ही भाई-बन्धुओं का भक्षण कर डालते हैं। हिंस्र पशुओं में तेंदुआ सबसे अधिक ढीठ होता है जबकि संसार का सबसे रफ़्तार वाला प्राणी चीता, बिल्ली की तरह पालतू बनाया जा सकता है। हालांकि चीता अब हमारे देश से लुप्त हो चुका है। इस तरह की जानकारियों के अलावा किताब में वर्मा जी के शिकार के दिलचस्प अनुभव हैं।

इस किताब को पढ़ने से जो तस्वीर ज़ेहन में खिंचती है उससे समझ आता है कि आज की तारीख़ में वन्यजीवन की हानि की इस भायनक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार दो बाते हैं

) मनुष्य की बढ़ती आबादी के कारण कृषि भूमि का होने वाला लगातार विस्तार। जिसके चलते जंगल के जानवर और मनुष्य सीधे संघर्ष में फंस गए। किताब में बार-बार यह बात आती है कि चीतल, चिंकारा, सुअर, हिरन जैसे जानवर किसानों खेत में घुसकर फ़सल का सम्पूर्ण विनाश कर देते हैं। जिसके चलते किसान या तो स्वयं मौक़ा मिलने पर इन जीवों की लाठी-डण्डों से पीट-पीटकर हत्या कर डालते हैं या फिर किसी बन्दूकधारी शिकारी के शिकार यज्ञ में भरपूर सहायता करके इन जानवरों के समूल नाश में अपनी योगदान करते हैं। और दूसरी वजह है.. 

) बन्दूक के रूप में एक ऐसा भयानक आविष्कार जिसने आदमी और शेष प्राणियों के बीच के समीकरण को पूरी तरह से एकतरफ़ा बना दिया है। तीर की मार और गति से जानवर फिर भी मुक़ाबला कर सकता था पर गोली की मार और गति के आगे जंगल का हर पशु निरीह और बेबस है। परिणाम आप देख ही रहे हैं- नंगे व सपाट मैदान जिसमें आदमी के सिवा दूसरा जानवर खोजना मुश्किल।

किताब का एक और दिलचस्प पहलू है: क्योंकि किताब ६४ साल पहले १९५७ में छपी और उसके भी काफ़ी पहले टुकड़ों-टुकड़ों में लिखी हुई है, इसलिए उसकी भाषा थोड़ी अलग है और उसमें कुछ ऐसे शब्द और प्रयोग मिलते हैं जो आजकल पूरी तरह से चलन से बाहर हो गए हैं। मसलन-
कलोल (किलोल)
परहा (पगहा?)
लगान (लगाम?)
टेहुनी (केहुनी)
परमा (प्रथमा तिथि)
ठिया
खीस (दांत)
ढी (ढीह)
/आगोट (आगे की ओट)
भरका (गड्ढा)
डाँग (पहाड़ का किनारा)
झोर( झौंर, झाड़ी)
बगर (पशु समूह)
ढुंकाई / ढूँका (छिपकर घात लगाना)
ठपदार (ठप की आवाज़ करने वाला)
मुरकना (लचक कर मुड़ जाना)
ढबुआ (खेतों के ऊपर मचान का छप्पर)
दह( नदी का सबसे गहरा बिन्दु)
टौरिया (छोटा टीला)
फुरेरू (शरीर को थरथराना, कंपकंपी लेना)

और कई शब्द ऐसे भी मिलते हैं जो शब्दकोषों में भी नहीं मिलते- इनके एक सूची मैं यहाँ दे रहा हूँ-:

तिफंसा/तिफंसी (घड़ा रखने की तिपाई)
झिद्दे (झटके, धक्के)
खुरखुन्द
छरेरी
गायरा (शेर आदि का किसी जानवर को मारकर बाद में खाने के लिए छोड़ कर चले जाना)
टोहटाप
छौंह (खरी छौहों वाला शेर)
रांझ (एक नाले में राँझ के नीचे)
झांस (झांस के नीचे छोटे नाले में)
टकारे (एड़ी से घुटने तक पहनने का जूता)
चुल (वहाँ तेंदुए की चुल थी)
बिरोरी (शिकार का एक प्रकार, जब बेर फलते हों)


***

[किताब में एक और बड़ा दिलचस्प वाक़्या है जब वर्मा जी अपने साथियों के साथ जंगल में दाल-चावल की खिचड़ी बनाते हैं और जला बैठते हैं। जो आदिवासी इन शहरी शिकारियों की सहायता के लिए उनके साथ मौजूद था वो अपनी खिचड़ी अलग बना कर मजे से खाता है क्योंकि वो आदिवासियों में पुरोहित (बेगा कहलाने वाला) का काम करने वाला है और किसी का छुआ नहीं खाता। :) ]


* एक तीसरी किताब 'नेगल' भी पढ़ रहा हूँ। बाबा आम्टे के पुत्र प्रकाश आम्टे द्वारा अनाथ हो गए जंगली जानवरों के पालने के अनुभव पर आधारित ये भी बड़ी प्यारी और न्यारी किताब है। उनके सहयोगी विलास मनोहर ने लिखी है और नेशनल बुक ट्रस्ट ने छापी है। 

बुधवार, 25 अगस्त 2010

क्रौञ्च की खरौंच


'शब्द चर्चा' पर आए दिन ज़बरदस्त शब्द संधान और शब्द विवेचना होती रहती है। कई दफ़े तो सन्देशों की संख्या पचास के भी पार चली जाती है। पिछले दिनों योगेन्द्र सिंह शेखावत ने क्रौञ्च पक्षी के बारे में शंका ज़ाहिर की। इस क्रौञ्च पक्षी की प्रसिद्धि यह है कि वाल्मीकि के कवि बनने और उसके बाद कवियों के बोझ से इस पवित्र भूमि के भारी हो जाने के पीछे यही क्रौञ्च पक्षी ज़िम्मेदार था। वह करुणगान, काव्य इतिहास का वह तथाकथित पहला श्लोक जो इस क्रौञ्च के निमित्त जन्मा वह वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के द्वितीय सर्ग में मिलता है-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीं समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

photo by Fraser Simpson
तमसा तट पर अपने प्राण का बलिदान दे कर जिस क्रौञ्च पक्षी ने कविता जैसी आतंकित कर देने वाली विधा को जन्म दिया है उसके प्रति पीडि़तजनों की जिज्ञासा स्वाभाविक है। आम तौर पर लोगों का विश्वास है कि यह सारस नाम को वह पक्षी है जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अपना राजकीय पक्षी घोषित कर रखा है। उस बेचारे सारस को यह बात मालूम नहीं है और वह निष्ठावान निरीह पक्षी ग़रीब किसानों के पानी भरे खेतों में छोटे-मोटे कीड़ों से ही अपनी क्षुधातृप्ति करता है। अगर उसे पता चलता तो वो लाल बत्ती लेकर शहरों के बजबजाते ट्रैफ़िक को चीरता हुआ किसी भी रेस्तरां में जा कर अपनी पसन्द के कीटों का महाभोज पा सकता था। लेकिन उसके जीवन की कहानी शुरु से अभी तक करुणा से ही भरी हुई है। और करुण बात ये है कि रामायण में वर्णित और उसमें सहज प्राप्य, अपने साथी के प्रति जीवन भर की निष्ठा के बावजूद कुछ लोग उस के क्रौञ्च होने पर ही प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। आयें समझें कि मामला क्या है?

सारस के बारे में मुख्य आपत्ति यह है कि वह नदी किनारे नहीं बल्कि मुख्य रूप पानी भरे खेतों में पाया जाता है, यानी दलदली भूमि में पैदा होने वाले कीट उसका मुख्य आहार हैं। अब यह प्रश्न उठ ही सकता है, और जिसे चर्चा में मेरे मित्र आशुतोष ने उठाया भी कि भई क्या तमसा नदी के किनारे हरे-भरे पानी से भरे खेत नहीं हो सकते? हो सकते हैं.. कभी-कभी नदी के ठीक किनारे पर खेत मिलते हैं। मगर यहाँ वाल्मीकि के श्लोक स्वयं आड़े आ जाते हैं।
उसी प्रकरण यानी बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग के चौथे श्लोक में वे कहते हैं-
स तु तीरं समासाद्य तमसाया महामुनिः।
शिष्यमाह स्थितं पार्श्वे दृष्ट्वा तीर्थमकर्दमम॥

यह जो श्लोक के अंत में तीर्थमकर्दमम्‌ आया है इसका सन्धि विच्छेद होगा तीर्थं अकर्दमं यानी बिना दलदल का किनारा। ये हुआ एविडेन्स नम्बर वन माई लौर्ड। और ये देखिये एविडेन्स नम्बर टू, उसे सर्ग के आठवें श्लोक में-
स शिष्यहस्तादादाय वल्कलं नियतेन्द्रियः।
विचचार ह पश्यंस्तत्सर्वतो विपुलं वनम्॥

पश्यं तत्‌ सर्वतो विपुल वनं यानी वहाँ खड़े विस्तृत जंगल को देखते हुए। मतलब किनारे पर जंगल है और दलदली पानी नहीं है। ऐसी जगह सारस के लिए ज़रा भी अनुकूल नहीं है।

सारस के विरुद्ध संस्कृत के महाविद्वान वामनराव शिवराव आप्टे भी सारस की कोई सहायता न करते हुए उसकी पहले से ही करुण परिस्थिति को और भी करुण बना देते हैं। उनके संस्कृत-हिन्दी कोष में क्रौञ्च का अर्थ क्रौंच का अर्थ जलकुक्कुटी, कुररी और बगला दिया हुआ है। एक सारस का नाम दे देते तो उनका क्या घटता था क्योंकि जो नाम उन्होने दिये वे भी क्रौञ्च पर सही नहीं बैठते। जलकुक्कुटी (water hen) तो स्वयं संस्कृत नाम है और उसकी पहचान एकदम अलग पक्षी के रूप में आज तक बनी हुई है। कुक्कुट वो शब्द है जिससे भरतीय भाषाओं में मुर्गी के लिए तमाम शब्द कुकड़ी,कुकड़ा, कुकड़ो आदि बने हैं। (कुक्कुट पर भी 'शब्द चर्चा' में चर्चा हो चुकी है) बगला होना मुश्किल है क्योंकि स्वतंत्र रूप से 'बक' की अन्यत्र काफ़ी महिमा है; क्रौञ्च के साथ उसका भ्रम नहीं हो सकता।

रह गई कुररी.. कुररी के बारे में पता चलता है कि इसे sea osprey/ sea hawk/ समुदी उक़ाब कहते हैं। स्वयं आप्टे के कोष में कुररः के मायने क्रौंच और समुदी उक़ाब दोनों दिया है। अब उकाब ज़मीन पर चलते-फिरते तो नहीं दिखते, बहुत ऊपर आसमान से अपना शिकार तड़ते हैं। तो कुररी भी नहीं हो सकता। (इस परचे पर टिप्पणी करते हुए अरविन्द मिश्रा जी ने बताया है कि कुररी नाम की एक और चिड़िया होती है, जिसे अंग्रेज़ी में टर्न कहते हैं, देखें नीचे सदुपदेशों में) और सबसे प्रमुख बात यह कि इन तीनों में साथी के प्रति उस तरह की निष्ठा नहीं मिलती जिसे क्रौञ्च का विशिष्ट गुण बताया गया है। उसकी यह निष्ठा एक नहीं दो जगह बताई गई है.. उसी प्रकरण में नवां श्लोक है..
तस्याभ्याशे तु मिथुनं चरन्तमनपायिनम्।
ददर्श भगवांस्तत्र क्रौञ्चयोश्चारुनिःस्वनम॥

चरन्तम्‌ नपायिनम्‌ यानी कि चलते हुए वे कभी एक दूजे से अलग नहीं होते थे। दूसरे प्रमाण के रूप में आगे बारहवां श्लोक है-
वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा।
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्त्रिणा सहितेन वै॥
पतिना सहचारिता यानी सदैव पति के साथ फिरती थी।

अब सारस की समस्या को और जटिल बनाते हुए किन्ही महाशय ने इन्टनेट के एक पन्ने पर क्रौञ्च की पहचान यूरेशियन कर्ल्यू के रूप में कर दी है। रहता भी ये कर्ल्यू नदी, जलाशयों के पास ही है। इस चिड़िया के पक्ष में और महत्वपूर्ण बात ये है कि इसका एक हिन्दी नाम गौंच है। वाल्मीकि के काल से (बीस हज़ार साल से दो हज़ार के बीच कोई भी समय, पाठक अपनी श्रद्धा के अनुसार काल का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं) अब तक तमसा में इतना पानी तो बह ही गया है कि क्रौञ्च जैसे कठोर आर्य शब्द को लोगों ने घिस-घिस कर नदी के पत्थर की तरह चिक्कन और कोमल गौंच बना लिया हो। (लोग आहत न हों कठोर का विशेषण आर्य संस्कृति पर किसी तरह का आक्षेप नहीं बल्कि क और ग ध्वनि का अन्तर है; क, च, ट, त, प, ध्वनियां कठोर गिनी जातीं हैं और ग, ज, ड, द, ब, ध्वनियां मृदु)

लेकिन गौंच महाशय बारहों महीने तमसा तट क्या किसी भी भारतीय तट पर नहीं टिकते। गर्मियों में उत्तरी योरोप और साइबेरिया में रहते हैं, सर्दियों में दक्षिणी योरोप, अफ़्रीका और भारत चले आते है। इस से भी क्या फ़र्क़ पड़ना था और क्रौञ्च का फ़ैसला हो ही जाता मगर सबसे दुख की बात ये पता चली कि वे यहाँ घोंसला नहीं बनाते। और चूंकि मनुष्येतर अधिकतर प्राणी सिर्फ़ प्रजनन के लिए ही मैथुन करते हैं इसलिए कामचेष्टा में लिप्त उस पक्षी युगल के यूरेशियन कर्ल्यू होने की सम्भावना कमज़ोर हो जाती है।

लेकिन दोस्तों, कहानी पिक्चर तो अभी बाक़ी है! यानी एक और सबूत, इस बार सारस के पक्ष में.. इसी प्रकरण के (ऊपर दिए गए) बारहवें श्लोक में ताम्रशीर्षेण का पद उसकी रंगत का एक राज़ खोलता है। ताम्रशीर्षेण यानी तांबे के रंग के सर वाला। अब देखिये सारस और साइबेरियन क्रेन दोनों के सर पर लाल निशान होता है। सारस में सर पर तो नहीं मगर गरदन क एक लम्बा हिस्सा लाल होता है और साइबेरियन क्रेन में ज़रा सा मगर ठीक चोंच के ऊपर।

लेकिन एक कौमन क्रेन भी है, जिसके लिए हिन्दी में नाम है- कुरुन्च, कुर्च, सिन्धी में केअन्ज, और तेलुगु में कुलंग। और मी लौर्ड, इस कुरुंच यानी कौमन क्रेन के सर पर भी लाल निशान मिलता है- ठीक सर पर! अगर भौगोलिक विवरण को अनदेखा कर दें तो इस नई जानकारी के आधार पर लगता है कि अगर कोई क्रौंच हो सकता है तो ये ही। लेकिन नहीं..

निष्कर्ष पर पहुँच जाने की ख़ुशी मैं बाधा डालने के लिए क्षमा चाहता हूँ, मगर ये कुरुंच महाराज, इनका दूसरा नाम यूरेशियन क्रेन है, भी जाड़े भर के मेहमान होते हैं और प्रजनन वहीं साइबेरिया में निपटा कर आते हैं।

हद है बताइये, नाम से लगता है कि ये कुरंच ही है..
साथी के प्रति निष्ठा के चरित्र, और अपने पूर्णकालिक भारतनिवास से लगता है कि सारस है..
और भौगोलिक विवरण से लगता है कि कर्ल्यू है..
सोचिये ज़रा, एक प्रसंग में एक पक्षी की पहचान में इतनी उलझने हैं और जबमामला अयोध्या और लंका जैसे शहरों का हो तो सर फुटव्वल कैसे न हो..

ऐसा लगता है कि वाल्मीकि ने अपने कवि होने के उस अधिकार का कुछ अधिक ही इस्तेमाल कर लिया है जिसे अब पोएटिक लिबर्टी कहा जाता है। लेकिन ये बात नहीं हो सकती क्योंकि इस प्रकरण में वाल्मीकि स्वयं एक चरित्र के रूप में दर्शाये गए हैं, यानी लिखने वाला कोई और है। और इस प्रसंग को बाद में रामायण में जोड़ दिया गया है। और जोड़ने वाले हमारे पूर्वज जो भी थे, या तो वे एक से अधिक थे जो क्रौञ्च को अपने-अपने प्रिय पक्षी के रूप में बताना चाहते थे, और उनकी खींचतान में ऐसी घालमेल हुई है कि क्रौञ्च सिर्फ़ कवि की कल्पना में पाये जाने वाला एक पक्षी बन गया है।

और अगर कोई एक ही महापुरुष थे तो खेद के साथ लिखना पड़ता है कि वे पक्षियों के बारे में अधिक नहीं जानते थे। एक अन्तिम सम्भावना और भी है- जिसे मेरे बहुत सारे मित्र जो किसी भी पुरातनता पर प्रश्नचिह्न उठाने के प्रश्न से ही ठिठर उठते हैं, लोक लेना चाहेंगे- कि ये क्रौञ्च एक ऐसा पक्षी था जो वाल्मीकि के समय में तो मिलता था मगर कलियुग में गंगा और दूसरी नदियों के पापसिक्त विषाक्त जल के कीट खा कर, पूरी प्रजाति समेत परमधाम को प्राप्त हो गया।

***
(शब्द चर्चा में हुई इस क्रौञ्च चर्चा में घुघूती बासूती, आशुतोष कुमार, नारायण प्रसाद, योगेन्द्र शेखावत, अरविन्द मिश्रा और अजित वडनेरकर ने भी भाग लिया। परचे के शीर्षक के लिए राजेन्द्र स्वर्णकार का आभारी हूँ, यह पद 'शब्द चर्चा' में वे ही लाए थे।)

गुरुवार, 10 जून 2010

शब्द चर्चा समूह



हिन्दी शब्दों के समान्तर अर्थ;
हिन्दी से उर्दू व उर्दू से हिन्दी में अर्थ;
अंग्रेज़ी से हिन्दी व हिन्दी से अंग्रेज़ी में अर्थ;
हिन्दी से अन्य भारतीय भाषाओं व अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अर्थ;
हिन्दी से अरबी-फ़ारसी व अरबी-फ़ारसी से हिन्दी में अर्थ
पर चर्चा का एक मंच।




मित्रो,
लिखते हुए,
अक्सर किसी भाव या विचार को चुभलाते हुए,
उसके स्वाद लायक़ उपयुक्त शब्द की कमी हम सब ने महसूस की है,
और ऐसा भी हुआ है कि शब्दकोश के पन्नो पर फ़िसलती उंगलियाँ
हमें सही अभिव्यक्ति तक ले जाने में असमर्थ हुई हैं।
आभासी जगत की इन नज़दीकियों ने जो हमें मौक़ा दिया है
उसके ज़रिये हम एक-दूसरे को
उसकी सही अभिव्यक्ति तक पहुँचा सकते हैं।
ये समूह बस इसीलिए!

समूह का पता यह रहा: http://groups.google.com/group/shabdcharcha?hl=en

चर्चा देखने के लिए कोई बन्दिश नहीं
मगर चर्चा में भाग लेने के आप समूह की सदस्यता हासिल कर सकते हैं।
आप सबका इस समूह में स्वागत है!

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

शब्दों के शत्रु

अभिनेता इरफ़ान की नई फ़िल्म 'बिल्लू बारबर' का नाम बदल कर कुछ और किया जा रहा है। बारबर एसोसिएशन को 'बारबर' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति है। खबर है कि फ़िल्म में जहाँ-जहाँ बारबर शब्द का इस्तेमाल आया है, उड़ाया जा रहा है। मैं भी बारबर एसोसिएशन से यहाँ पर बारबर शब्द के प्रयोग के लिए क्षमा चाहता हूँ। पूछना बस इतना चाहता हूँ कि वे किस दैवीय अधिकार से इस शब्द का उपयोग अपनी एसोसिएशन के नाम के लिए कर रहे हैं?

एक और खबर है- देवबन्द के उलेमा ने उन मुसलमान नेताओं के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है जो मुलायम सिंह के अवसरवादी कल्याण-प्रेम से खौरिया कर बहन जी की शरण में चले गए हैं। फ़तवा दिया गया है कि वे जय भीम नहीं कह सकते। जय भीम कहना ग़ैर-इस्लामी है। खुदा के अलावा किसी की बन्दगी ग़ैर इस्लामी है.. माफ़ करें खुदा नहीं अल्लाह। खुदा तो ईरानी भगवान है.. उस की बन्दगी करना भी ग़ैर इस्लामी है।

दाद देनी चाहिए देवबन्द के उलेमा की, जो जय भीम बोले बिना ही, जय भीम बोलने पर पाबन्दी लगा गए। शायद उन्होने ये फ़तवा लिख कर जारी किया होगा? तो क्या मुसलमान बहन जी के सामने जय भीम लिख कर काम चला सकेंगे..? ये पता कर लेना चाहिये। वैसे भीम ज़िन्दाबाद के बारे में क्या ख्याल है? वो इस्लामी है कि ग़ैर इस्लामी? उसमें किसी की परस्ती की बू आती है कि नहीं? भीम छोड़िये किसी की भी ज़िन्दाबाद?.. ज़िन्दा होना इस्लामी है कि ग़ैर इस्लामी?

मैं जानता था कि जय शब्द के भीतर मूल अर्थ 'विपक्षी के पराभव' का है और प्रचलित अर्थ अभिवादन और प्रणाम का है। मगर जय शब्द में छिपे वन्दना के अर्थ को पहचानने के लिए भाई अजित वडनेरकर को, सभी नए-पुराने शब्दों के व्याख्या के लिए देवबन्द के उलेमा के साथ एक इन्टेन्सिव ट्रेनिंग करनी चाहिये!

वैसे 'जय माया' के बारे में भी देवबन्द के उलेमाओं को अपनी राय ज़रूर देनी चाहिये!

सब से रोचक बात मुझे ये लगती है कि बार-बार “ला इलाहा इल अल्लाह” (अल्लाह के सिवा और कोई ईश्वर नहीं.. माफ़ करें.. अल्लाह के अलावा कोई अल्लाह नहीं) बोलने के बावजूद इन उलेमा के लिए ईरानी खुदाओं की, और दलित देवताओं की उपस्थिति बनी रहती है। अल्लाह के हज़ार नामों में खुदा का शब्द इसलिए शामिल नहीं हो सकता क्योंकि वो अरबी मूल का नहीं है? या उस से खुद और खुदा के समीपत्व का बोध होता है? ये उलेमा ये भी भूल जाते हैं कि उन्ही की इस्लामी परम्परा में स्वयं अल्ला मियाँ फ़रिश्ते से ज़्यादा आदमी को अपने क़रीब पाते हैं?

शब्दों के प्रति बढ़ते इस कट्टरपन से मुझे जार्ज ऑरवेल का उपन्यास १९८४ याद आ जाता है जिस का सर्वसत्तावादी तानाशाह हर रोज़ शब्दकोश में से कुछ 'आपत्तिजनक' शब्द मिटाता जाता है।

रविवार, 16 सितंबर 2007

मारेसि मोहिं कुठाँउ -२

(पिछली कड़ी से जारी)

बौद्ध हमारे यहीं से निकले थे। उस समय के वे आर्यसमाजी ही थे। उन्होने भी हमारे भंडार को भरा। हम तो 'देवानां प्रिय' मूर्ख को कहा करते थे। उन्होने पुण्यश्लोक धर्माशोक के साथ यह उपाधि लगाकर इसे पवित्र कर दिया। हम निर्वाण के माने दिये को बिना हवा के बुझना ही जानते थे, उन्होने मोक्ष का अर्थ कर दिया। अवदान का अर्थ परम सात्त्विक दान भी उन्होने किया।

बकौल शेक्सपीयर के जो मेरा धन छीनता है, वह कूड़ा चुराता है, पर जो मेरा नाम चुराता है वह सितम ढाता है, आर्यसमाज ने मर्मस्थल पर वह मार की है कि कुछ कहा नहीं जाता, हमारी ऐसी चोटी पकड़ी है कि सिर नीचा कर दिया। औरों ने तो गाँव को कुछ न दिया, उन्होने अच्छे-अच्छे शब्द छीन लिए।इसी से कहते हैं कि 'मारेसि मोहिं कुठाँउ'। अच्छे-अच्छे पद तो यूँ सफ़ाई से ले लिए हैं कि इस पुरानी दुकानों का दिवाला निकल गया। लेने के देने पड़ गए।

हम अपने आपको 'आर्य' नहीं कहते, 'हिंदू' कहते हैं। जैसे परशुराम के भय से क्षत्रियकुमार माता के लहँगों में छिपाए जाते थे वैसे ही विदेशी शब्द हिन्दू की शरण लेनी पड़ती है और आर्यसमाज पुकार-पुकार कर जले पर नमक छिड़कता है कि हैं क्या करते हो? हिन्दू माने काला चोर काफ़िर। अरे भाई कहीं बसने भी दोगे? हमारी मंडलियाँ भले 'सभा' कहलावें 'समाज' नहीं कहला सकतीं। न आर्य रहे और न समाज रहा तो क्या अनार्य कहे और समाज कहें(समाज पशुओं का टोला होता है)? हमारी सभाओं के पति या उपपति(गुस्ताखी माफ़, उपसभापति से मुराद है) हो जावें किन्तु प्रधान या उपप्रधान नहीं कहा सकते। हमारा धर्म वैदिक धर्म नहीं कहलावेगा, उसका नाम रह गया है- सनातन धर्म। हम हवन नहीं कर सकते, होम करते हैं। हमारे संस्कारों की विधि- संस्कार विधि नहीं रही, वह पद्धति (पैर पीटना) रह गई। उनके समाज-मन्दिर होते हैं हमारे सभा-भवन होते हैं।

और तो क्या 'नमस्ते' का वैदिक फ़िक़रा हाथ से गया, चाहे जयरामजी कह लो चाहे जयश्रीकृष्ण, नमस्ते मत कहना। ओंकार बड़ा मांगलिक शब्द है। कहते हैं कि यह पहले-पहल ब्रह्मा का कंठ फाड़ कर निकला था। प्रत्येक मंगल कार्य के आरंभ में हिन्दू श्री गणेशाय नमः कहते हैं। अभी इस बात का श्रीगणेश हुआ है- इस मुहावरे का अर्थ है कि अभी आरंभ हुआ है। एक वैश्य यजमान के यहाँ मृत्यु हो जाने पर पंडित जी गरुड़पुराण की कथा कहने गए। आरम्भ किया श्री गणेशाय नमः। सेठ जी चिल्ला उठे- 'वाह महाराज! हमारे यहाँ तो यह बीत रहा है। और आप कहते हैं कि श्री गणेशाय नमः। माफ़ करो।' तब से चाल चल गई है कि गरुड़पुराण की कथा में श्री गणेशाय नमः नहीं कहते हैं श्री कृष्णाय नमः कहते हैं। उसी तरह सनातनी हिन्दू अब ना बोल सकते हैं ना लिख सकते हैं, संध्या या यज्ञ करने पर ज़ोर नहीं देते। श्रीमद्भागवत की कथा या ब्राह्मण-भोजन पर संतोष करते हैं।

और तो और, आर्यसमाज ने हमें झूठ बोलने पर लाचार किया। यों हम लिल्लाही झूठ न बोलते, पर क्या करें। इश्क़बाज़ी और लड़ाई में सब कुछ ज़ायज़ है। हिरण्यगर्भ के माने सोने की कौंधनी पहने हुए कृष्णचन्द्र करना पड़ता है, 'चत्वारि श्रृंगा' वाले मंत्र का अर्थ मुरली करना पड़ता है, 'अष्टवर्षो‍ऽष्टवर्षो वा' में अष्ट च अष्ट च एकशेष करना पड़ता है। शतपथ ब्राह्मण नामक कपालों की मूर्तियाँ बनाना पड़ता है। नाम तो रह गया हिन्दू। तुम चिढ़ाते हो कि इसके माने होता है काला चोर या काफ़िर।

अब क्या करें? कभी तो इसकी व्युत्पत्ति करते हैं कि हि+इंदु। कभी मेरुतंत्र का सहारा लेते हैं कि ' हीनं च दूषयत्येव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये' यह उमा-महेश्वर संवाद है, कभी सुभाषित के श्लोक 'हिंदवो विंध्यमाविशन' को पुराना कहते हैं और यह उड़ा जाते हैं कि उसी के पहले यवनैरवनिः क्रांता' भी कहा है, कभी महाराज कश्मीर के पुस्तकालय में कालिदास रचित विक्रम महाकाव्य में 'हिन्दूपतिः पाल्यताम' पद प्रथम श्लोक में मानना पड़ता है। इसके लिए महाराज कश्मीर के पुस्तकालय की कल्पना की, जिसका सूचीपत्र डॉक्टर स्टाइन ने बनाया हो, वहाँ पर कालिदास के कल्पित काव्य की कल्पना, कालिदास के विक्रम संवत चलाने वाले विक्रम के यहाँ होने की कल्पना, तथा यवनों के अस्पृष्ट (यवन माने मुसलमान! भला यूनानी नहीं) समय में हिन्दूपद के प्रयोग की कल्पना; कितना दुःख तुम्हारे कारण उठाना पड़ता है।

बाबा दयानन्द ने चरक के एक प्रसिद्ध श्लोक का हवाला दिया कि सोलह वर्ष से कम अवस्था की स्त्री में पच्चीस वर्ष से कम पुरुष का गर्भ रहे तो या तो वह गर्भ में ही मर जाय, या चिरंजीवी न हो या दुर्बलेन्द्रिय जीवे। हम समझ गए कि यह हमारे बालिका विवाह की जड़ कटी नहीं, बालिकारभस पर कुठार चला। अब क्या करें? चरक कोई धर्मग्रंथ तो है नहीं कि जोड़ की दूसरी स्मृति में से दूसरा वाक्य तुर्की-बतुर्की में दे दिया जाय। धर्मग्रंथ नहीं है आयुर्वेद का ग्रंथ हैइसलिए उसके चिरकाल न जीने या दुर्बलेन्द्रिय हो कर जीने की बात का मान भी कुछ अधिक हुआ। यों चाहे मान भी लेते और व्यवहार में मानते ही हैं- पर बाबा दयानन्द ने कहा तो उसकी तरदीद होनी चाहिए। एक मुरादाबादी पंडितजी लिखते हैं कि हमारे परदादा के पुस्तकालय में जो चरक की पोथी है, उसमें पाठ है--
ऊनद्वादशवर्षायामप्राप्तः पंचविशतिम।
लीजिए चरक तो बारह वर्ष पर ही 'एज ऑफ़ कंसेट विल' देता है, बाबा जी क्यों सोलह कहते हैं? चरक की छपी पोथियों में कहीं यह पाठ न मूल में है न पाठान्तरों में। न हुआ करे-- हमारे परदादा की पोथी में तो है।

इसीलिए आर्यसमाज से कहते हैं कि 'मारेसि मोहि कुठाँउ'।


-चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'

साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित और विद्यानिवास मिश्र द्वारा संपादित ग्रंथ 'स्तबक' में संकलित


शनिवार, 15 सितंबर 2007

मारेसि मोहिं कुठाँउ: गुलेरी जी का एक लेख

तीन कहानियाँ लिख कर अमर हो चुके गुलेरी जी निबन्ध लेखन में भी एक बेजोड़ अंदाज़ रखते थे, ये बात कम लोग जानते हैं। इस निबन्ध को पढ़ने के पहले मैं भी नहीं जानता था। आर्य समाज के बहाने भाषा, धर्म, इतिहास सभी पर एक टिप्पणी है यह लेख।

गुलेरी जी का जन्म १८८३ में कांगड़ा में हुआ और ३९ वर्ष की उम्र में ही काशी में वे चल बसे। इस गणित से इस लेख का रचनाकाल बीसवीं सदी के पहले या दूसरे दशक में कभी का होना चाहिये; यानी आज से तकरीबन १०० बरस पहले।


मारेसि मोहिं कुठाँउ: चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'

जब कैकेयी ने दशरथ से यह वर माँगा कि राम को बनवास दे दो तब दशरथ तिलमिला उठे, कहने लगे कि चाहे मेरा सिर माँग ले अभी दे दूँगा, किन्तु मुझे राम के विरह से मत मार। गोसाई तुलसीदासजी की भाव भरे शब्दों में राजा ने सिर धुनकर लम्बी साँस भर कर कहा 'मारेसि मोहिं कुठाँउ- मुझे बुरी जगह पर घात किया। ठीक यही शिकायत हमारी आर्यसमाज से है। आर्यसमाज ने भी हमें कुठाँव मारा है, कुश्ती में बुरे पेच से चित पटका है।

हमारे यहाँ पूँजी शब्दों की है। जिससे हमें काम पड़ा, चाहे और बातों में हमें ठगा गया पर हमारी शब्दों की गाँठ नहीं कतरी गई। राज के और धन के गठकटे यहाँ कई आए पर शब्दों की चोरी (महाभारत के ऋषियों के कमल-नाल की ताँत की चोरी की तरह) किसी ने नहीं की। यही नहीं, जो आया उससे हमने कुछ ले लिया।

पहले हमें काम असुरों से पड़ा, असीरियावालों से। उनके यहाँ असुर शब्द बड़ी शान का था। असुर माने प्राणवाला, ज़बरदस्त। हमारे यहाँ इन्द्र को भी यही उपाधि प्राप्त हुई, पीछे चाहे शब्द का अर्थ बुरा हो गया। फिर काम पड़ा पणियों से- फ़िनीशियन व्यापारियों से। उनसे हमने पण धातु पाया, जिसका अर्थ लेन-देन करना, व्यापार करना है।एक पणि उनमें ऋषि भी हो गया, जो विश्वामित्र के दादा गाधि की कुर्सी के बराबर जा बैठा। कहते हैं कि उसी का पोता पाणिनि था, जो दुनिया को चकराने वाला सर्वाङ्ग सुन्दर व्याकरण हमारे यहाँ बना गया।

पारस के पार्श्वों या पारसियों से काम पड़ा तो वे अपने सूबेदारों की उपाधि क्षत्रप या क्षत्रपावन या महाक्षत्रप हमारे यहाँ रखे गए और गुस्तास्य, विस्तास्य के वज़न के कृश्वाश्व, श्यावश्व, बृहदश्व आदि ऋषियों और राजाओं के नाम दे गए। यूनानी यवनों से काम पड़ा तो वे यवन की स्त्री यवनी तो नहीं, पर यवन की लिपि यवनानी शब्द हमारे व्याकरण को भेंट कर गए। साथ ही बारह राशियाँ मेष, वृष, मिथुन आदि भी यहाँ पहुँचा गए। इन राशियों के ये नाम तो उनकी असली ग्रीक शकलों के नामों के संस्कृत तक में हैं, पुराने ग्रंथकार तो शुद्ध यूनानी नाम आर, तार, जितुम आदि काम में लेते थे। ज्योतिष में यवन सिद्धान्त को आदर से स्थान मिला। वराहमिहिर की पत्नी यवनी रही हो या न रही हो, उसने आदर से कहा है कि म्लेच्छ यवन भी ज्योतिःशास्त्र जानने से ऋषियों की तरह पूजे जाते हैं। अब चाहे वेल्यूयेबल सिस्टम भी वेद में निकाला जाय पर पुराने हिन्दू कृतघ्न और गुरुमार नहीं थे।

सेल्यूकस निकेटर की कन्या चन्द्रगुप्त मौर्य के ज़माने में आयी, यवन-राजदूतों ने विष्णु के मंदिरों में गरुड़ध्वज बनाए और यवन राजाओं की उपाधि सोटर त्रातर का रूप लेकर हमारे राजाओं के यहाँ आने लगी। गांधार से न केवल दुर्योधन की माँ गान्धारी आई, बालवाली भेड़ों का नाम भी आया। बल्ख से केसर और हींग का नाम बाल्हीक आया। घोड़ों के नाम पारसीक, कांबोज, वनायुज, बाल्हीक आए। शको के हमले हुए तो शाकपार्थिव वैयाकरणों के हाथ लगा और शक्संवत या शाका सर्वसाधारण के। हूण वंक्षु (oxus) नदी के किनारे पर से यहाँ चढ़ आए तो कवियों को नारंगी उपमा मिली कि ताजा मुड़े हुए हूण की ठुड्डी की सी नारंगी। कल-चुरी राजाओं को हूणों की कन्या मिली।

पंजाब में वाहीक नामक जंगली जाति आ जमी तो बेवकूफ़, बौड़म के अर्थ में (गौर्वाहीकः) मुहाविरा चल गया। हाँ, रोमवालों से कोरा व्यापार ही रहा, पर रोमक सिद्धांत ज्योतिष को के कोष में आ गया। पारसी राज्य न रहा पर सोने के सिक्के निष्क और द्रम्भ (दिरहम) और दीनार (डिनारियस) हमारे भण्डार में आ गए। अरबों ने हमारे 'हिंदसे' लिए तो ताजिक, मुजका, इत्थशाल आदि दे भी गए, कश्मीरी कवियों को प्रेम अर्थ में हेवाक दे गए। मुसलमान आए तो सुलतान का सुरत्राण, हमीर का हम्मीर, मुग़ल का मुंगल, मसजिद का मसीतिः, कई शब्द आ गए।

लोग कहते हैं कि हिन्दुस्तान अब एक हो रहा है, हम कहते हैं कि पहले एक था, अब बिखर रहा है। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा वैज्ञानिक परिभाषा का कोष बनाती है। उसी की नाक के नीचे बाबू लक्ष्मीचन्द वैज्ञानिक पुस्तकों में नयी परिभाषा काम में लाते हैं। पिछवाड़े में प्रयाग की विज्ञान परिषद और ही शब्द गढ़ती है। मुसलमान आए तो कौन सी बाबू श्यामसुन्दर की कमिटी बैठी थी कि सुलतान को सुरत्राण कहो और मुग़ल को मुंगल? तो कभी कश्मीरी कवि या गुजराती कवि या राजपूताने के पंडित सब सुरत्राण कहने लग गए। एकता तब थी कि अब?
...


(शेष लेख दूसरी कड़ी में )



साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित और विद्यानिवास मिश्र द्वारा संपादित ग्रंथ 'स्तबक' में संकलित

शुक्रवार, 27 जुलाई 2007

बड़े काम की गाली !

पिछले दिनो अपनी हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में भाषा की शालीनता और उस से जुड़े हुए सवालों पर काफ़ी चिन्ताएं की जाती रहीं.. समाज में शब्दों की उपयोगिता पर समाज के किसी वर्ग का कभी कोई वर्चस्व नहीं रहा.. कोशिशें की जाती रहीं.. आगे भी की जायेंगी.. लेकिन समाज किस शब्द को कैसे इस्तेमाल करेगा, ये तय करना किसी के लिए भी असम्भव है.. ये एक सामूहिक प्रक्रिया होती है.. जिस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं होता है.. कब हगना या झाड़ा शब्द से लिपटी गन्दगी से बचने के लिए टट्टी जैसा शब्द श्लील हो जायेगा.. और कब टट्टी अश्लील और पॉटी श्लील.. कोई नहीं कह सकता..

ऐसा ही मामला शब्दों के रचनात्मक उपयोग का है.. जननांगो से जुड़े हुए शब्दों का उपयोग क्यों इतनी उदारता से तमाम दूसरी भावनाएं व्यक्त करने में किया जाता है.. ये तो मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री ही बतायेंगे.. जो भी इसका कारण हो, सार्वभौमिक होगा.. क्योंकि लगभग सभी संस्कृतियों में ये आम चलन है..

फ़िलहाल यहाँ पर स्त्री-पुरुष समागम की क्रिया के लिए प्रयोग किए जाने वाले अश्लील अंग्रेज़ी शब्द के बारे में मुझे एक ऑडियो क्लिप प्राप्त हुई है.. जिसमें ओशो (आचार्य रजनीश) इस शब्द की विवेचना कर रहे हैं .. और उनके शिष्य आनन्द में हँस-हँस कर लोट-पोट हो रहे हैं.. आप भी सुनिये.. हो सकता है .. आप को भी आनन्द आये.. और यदि आनन्द के बजाय आप की भावनाओं को चोट पहुँचती है तो खुल कर ओशो को गलियाएं..


जिन्होने ओशो को सुना है.. वे ओशो के उच्चारण से परिचित होंगे.. नए लोग चौंके नहीं..
दूसरी बात ऑडियो क्लिप प्रवचन के बीच अचानक शुरु होती है.. उसके लिए खेद है..








शुक्रवार, 13 जुलाई 2007

बजरबट्टू यानी चश्मे बद दूर

शब्दों के सफ़र को वापस तय करने निकले अजित वडनेरकर जी रोज़ एक दो शब्दों के सफ़र की चर्चा कर रहे हैं.. आज उन्होने बेटा और बजरबट्टू की चर्चा की है.. मैं उनके काम का मुरीद हूँ लेकिन आज मैं उनसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ.. मेरा ख्याल है कि वटु से बेटा तो ठीक है.. मगर बजरबट्टू का जो उन्होने अर्थ और व्युत्पत्ति दी है वो मुझे ठीक नहीं लग रही है.. उनका कहना है कि बजरबट्टू का अर्थ मूर्ख और उसकी व्युत्पत्ति वज्र और वटुः से है..

मैंने पाया है कि बजरबट्टू शब्द का लोकप्रिय प्रयोग बुरी नज़र से बचाने वाले एक पत्थर के अर्थ के बतौर है.. रामशंकर शुक्ल 'रसाल' के भाषा शब्द कोष में भी बजरबट्टू का अर्थ है- एक पेड़ का बीज जिसे दृष्टि दोष से बचाने के लिए बच्चों को पहनाते हैं.. बजर तो साफ़ साफ़ वज्र का तद्भव है.. मगर बट्टू क्या है..? क्या वट? क्या वटन? या वटक?

मुझे तो लगता है कि यहाँ वटक ही सही है क्योंकि वटक मायने है छोटा पत्थर का ढेला..उसकी उत्पत्ति वट धातु से ही है जिसका अर्थ है.. बाँटना.. विभाजित करना.. ध्यान दीजिये.. बाँटना वट से ही आ रहा है.. तो वटक बना वो बाँट..जो चीज़ों को तौलने यानी विभाजित करने में काम आये.. जिसके लिए छोटे पत्थर के ढेलों का ही उपयोग होता रहा होगा.. और कालान्तर में हर छोटा पत्थर वटक कहलाया जाने लगा होगा.. जिसे आज हम बटा या बटिया कहते हैं.. ध्यान दें.. एक बटा दो.. और दो बटा तीन..वाला बटा भी यहीं से उपज रहा है.. तो आपका बजरबट्टू वह छोटा पत्थर है जो नज़र बचाने के काम आता है..

मगर रसाल का शब्दकोष कह रहा है कि वह एक बीज है.. अब देखिये नेट पर क्या क्या सूचना उपलब्ध है..


सूचना १) एक प्रकार के पाम या ताड़ के पेड़ का नाम भी बजर बट्टू है.. देखिये यहाँ.. जिसके पत्तो से लोग अपने झोपड़ों की छत बनाते हैं.. और पेड़ में ३० से ८० साल बाद एक ही बार हज़ारों की संख्या में फल आते हैं.. और उसके बाद पेड़ मर जाता है.. ये फल ३-४ सेंटीमीटर बड़े होते हैं और इसके अन्दर एक ही बीज होता है..

सूचना २) इस बीज का इस्तेमाल कुछ जनजातियां गले का हार बनाने में करती हैं.. देखिये यहाँ..

सूचना ३) बच्चों के गले में पहनाया जाने वाला छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण आभूषण ‘बजरबट्टू’ है.. देखिये यहाँ..

और फिर आखिर में रसाल जी के शब्दकोष का अर्थ पुनः याद किया जाय कि बजरबट्टू, बच्चों को नज़र लगने से बचाने का एक पेड़ का बीज है..

रह गई बात पत्थर और बीज की.. तो हर छोटे पत्थर को वटक या बटा कहना और हर पत्थरनुमा बीज को भी बटा कह देना शब्द की यात्रा के पड़ाव माने जा सकते हैं..

तो मित्र अजित जी.. मेरा ख्याल है कि बजरबट्टू का बट्टू.. वटुः से नहीं बल्कि वटक से आ रहा है..

सोमवार, 9 जुलाई 2007

पाया ब्लॉग जगत ने एक नया नगीना

इस नगीने का नाम है अजित वडनेरकर.. और इनके ब्लॉग का नाम है शब्दों का सफ़र.. यूं तो भोपाल में एक पत्रकार की हैसियत से अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं अजित जी.. मगर मेरी दृष्टि में उस से भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण.. वे हिन्दी भाषा के संसार में एक मौलिक काम कर रहे हैं.. शब्दों को उनके मूल में जाकर जाँच परख रहे हैं.. देश काल और विभिन्न समाजों में उनकी यात्रा को खोल रहे हैं.. हमारे हितार्थ.. हिन्दी में इस प्रकार के काम विरल हैं..

रामचरितमानस छाप कर हिन्दी की सेवा पर सीना ठोंकने वाले आप को बहुत मिलेंगे मगर ऐसे नगीने दुर्लभ हैं.. पतनशील प्रकाशकों और साहित्यिक मठाधीशों के हिन्दी के भ्रष्ट भाषा संसार में ऐसी प्रतिभाएं गुमनामी की धुंध से बाहर नहीं आ पाती कभी.. इन्टरनेट की नई तकनीकों ने हमें वो आज़ादी दी है कि आज वैयक्तिक अभिव्यक्ति के लिए किसी की खुशामद की सीढ़ियों पर सर तोड़ने की ज़रूरत नहीं.. मगर अठन्नी के संतरे में बहकने वालो की ज़मीन से उगे लोग जिनकी पुरानी पीढ़ियां चपरासी के पद मद में चूर होती रहीं.. यहाँ भी सत्तामद में रो गा रहे हैं.. उन्हे अपने रुदन में लोटने दीजिये.. आइये आनन्द लीजिये अजित जी के शब्दों के स्वाद का..

संस्कृत में एक क्रिया है सृ जिसका मतलब होता है जाना, तेज-तेज चलना, धकेलना , सीधा वगैरह। इन तमाम अर्थों में गति संबंधी भाव ही प्रमुख है। सृ से ही बना है सर शब्द जिसका मतलब न सिर्फ जाना है बल्कि गतिवाले भाव को प्रदर्शित करता हुआ एक अन्य अर्थ जलप्रपात भी है। यही नहीं सर का मतलब झील भी है। इसी से सरोवर भी बना है । अमृतसर , मुक्तसर , घड़सीसर जैसे अनेक नामों में भी यही सर समाया है..
(सड़क-सरल-सरस्वती )

भारत में आमतौर पर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का सामान ढोने वाले के लिए कुली शब्द का प्रयोग किया जाता है। किसी जमाने में ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति का सबसे घिनौना पहलू इसी शब्द के जरिये उजागर हुआ था । सभी ब्रिटिश उपनिवेशों के मूल निवासियों के लिए अंग्रेज कुली शब्द इस्तेमाल करने लगे थे। अंग्रेजी, पुर्तगाली के अलावा यह शब्द तुर्की,चीनी, विएतनामी बर्मी, आदि भाषाओं में भी बोला जाता है। हिन्दी को कुली शब्द पुर्तगालियों की देन है पर यह भारतीय मूल का ही शब्द है। हालांकि आर्य भाषा परिवार का न होकर इसका रिश्ता द्रविड़ भाषा परिवार से जुड़ता है।हिन्दी का कुली दरअसल तमिल मूल का शब्द है और कन्नड़ में भी बोला जाता है। इन दोनों भाषाओं में इसका उच्चारण कूलि के रूप में होता है जिसका मतलब हुआ मजदूर अर्थात ऐसा दास जो मेहनत के बदले में पैसा पाए..(कुली के कुल की पहचान )

महाभारत के प्रसिद्ध पात्र अर्जुन और दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना में भला क्या संबंध हो सकता है ? कहां अर्जुन पांच हजार साल पहले के द्वापर युग का महान योद्धा और कहां अर्जेंटीना जिसकी खोज सिर्फ पांच सौ वर्ष पहले कोलंबस ने की। दोनो में कोई रिश्ता या समानता नजर नहीं आती। पर ऐसा नहीं है। दोनों में बड़ा गहरा रिश्ता है जिसमें रजत यानी चांदी की चमक नजर आती है। भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार का रजत शब्द से गहरा नाता है। इस परिवार की सबसे महत्वपूर्ण भाषा संस्कृत में चांदी के लिए रजत शब्द है। प्राचीन ईरानी यानी अवेस्ता में इसे अर्जत कहा गया है.. (अर्जुन, अर्जेंटीना और जरीना)

भ‌ाष‌ा क‌ा शुद्धत‌म रस निचोड़ रहे हैं अजीत जी..और शुद्ध आन‌न्द की स‌रित‌ा ब‌ह‌ा रहे हैं.. (ध्य‌ान दें.. स‌रित‌ा में भी स‌र है..).. आन‌न्दम‌.. आन‌न्द‌म‌..

अब के पहले मैंने जिन भी लोगों का परिचय अपने ब्लॉग के माध्यम से कराया वे मेरे मित्र थे.. उनसे मेरी एक लम्बी पहचान रही थी.. मगर अजित वडनेरकर साहब से मेरा परिचय सिर्फ़ हफ़्ता भर पुराना है और चिट्ठाजगत के माध्यम से हुआ है.. वे लगभग रोज़ लिख रहे हैं..

अजित जी जैसे नए नगीनों को देखने के लिए और उन्हे लगातार पढ़ने के लिए या तो उन्हे किसी रीडर से सब्सक्राइब कर लें या देखते रहें चिट्ठाजगत.. या ब्लॉगवाणी..
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