बनारस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बनारस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

संस्कृति की अश्लील परम्परा उर्फ़ बहुत हुआ सम्मान

इलाहाबाद में अपने छात्र जीवन की शुरुआत के साथ ही अश्लील परम्पराओं से मेरा परिचय हो गया था। हमें हौस्टल के सीनियर्स ने फ़र्शी सलामी सिखलाई और जिस हौस्टल गीत को याद कर के उचित अवसरों पर सुनाने की हमें ताक़ीद की गई उसमें पुरुष के अंग विशेष के गुणगान किए गए थे। ऐसा बताया जाता था कि वह गौरवगीत हौस्टल के एक पूर्ववासी के पेन-प्रताप का ही परिणाम था।

हमारे रहते भी हौस्टल के एक वरिष्ठ वासी हिन्दी भाषा में अपने जौहर, साहित्य की इस अश्लील परम्परा को अर्पित करते रहे थे। उनके गीतों की लोकप्रियता का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके गायन के सभी अवसरों पर हौस्टलवासियों का आनन्द और उत्साह राष्टगीत और राष्ट्रगान को गाने के मौक़ो से कई गुणा अधिक होता, और उसका उद्गम विशुद्ध, अनहत और मणिपुर से भी गहरे सीधे मूलाधार से होता। सभी सुनने वालों के अंग-अंग से हर्ष का सागर हिलोड़ें मारने लगता।

ये नंगापन था, लेकिन कोई नंगा नहीं था। ये पाशविक वृत्ति की उपज थी, पर भाषा और गायन की मानवीय उपलब्धियों में आबद्ध था। शारीरिक उद्वेगों की ये सामाजिक अभिव्यक्ति थी। जाति और धर्म की सीमाओं को तोड़ सभी को जोड़ देने वाली यह संस्कृति थी। जन संस्कृति थी। लेकिन किसी भी सभ्य हलक़ों में इस 'जन संस्कृति' को मान्यता नहीं थी। नहीं है।

हौस्टल में ही रहते हुए मेरा परिचय बनारस की उस परिपाटी से हुआ जिसकी आवृत्ति हर बरस होली के अवसर पर होती। अस्सी पर होने वाला इस विशिष्ट सम्मेलन की ख्याति दूर-दूर तक हो चली थी, जिसमें सार्वजनिक मंच से आदमी और औरत के गुप्त प्रसंगो, और सामाजिक मसलों में उन प्रसंगो के मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल, की चर्चा सस्वर गायन के ज़रिये की जाती। इस सम्मेलन में पढ़ी गई कविताओं का एक संकलन भी निकलता जो पढ़ना तो हर कोई चाहता लेकिन घर में रखना कोई न चाहता। इस सम्मेलन में भाग लेने वाले कवि आम तौर पर हास्य कवि ही होते और कविता की मुख्य धारा से उनका कोई सीधा सम्बन्ध न होता।

बाक़ी कवियों को छोड़ दें और सिर्फ़ चकाचक बनारसी की ही बात करें। साल के ३६४ दिन चकाचक की पहचान एक हास्य कवि की ही बनी रही। ये भी पता चला है कि वे दूसरा कोई काम नहीं करते थे और कवि सम्मेलनों में हुई आमदनी के ज़रिये ही अपना खर्चा चलाते थे। लेकिन एक होली के दिन उनका रूप बदल जाता और वे सारी वर्जनाओं को छोड़ कर भाषा को खुला छोड़ देते। और फिर ऐसी कोई चीज़ निकलती जो बड़े-बड़े विद्वानों को किए जा रहे सम्मान को बहुत हुआ बताकर उनकी माता जी से सम्बन्ध स्थापित करने की घोषणा होती :

बड़े-बड़े विद्वान,
तुम्हारी...
बहुत हुआ सम्मान,
तुम्हारी...

इस विद्रोही तेवर की अनुगूँज मुझे दूर-दूर तक सुनाई दी है, सुदूर मुम्बई तक भी। भाषा की मुख्यधारा में पड़े हुए और उस से अड़े हुए दोनों तरह के लोगों के भीतर। इस तरह की ज़बरदस्त मक़बूलियत अच्छे-अच्छे साहित्यकारों की नहीं है जो साहित्य के शीर्ष पुरस्कार पाने के बाद भी जनता के प्यार और स्वीकृति से कटे होने के कारण एक प्रकार की कुण्ठा में जीते हैं। चकाचक की घोषणा शायद उन को भी सम्बोधित है कि बहुत हुआ सम्मान। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि चकाचक सभी तरह की कुण्ठा से मुक्त हो कर वैकुण्ठ हो गए होंगे। मुझे पता लगा है कि एक उनका एक संग्रह ही प्रकाशित हुआ और वो भी बहुत बाद में; सन २००४ में उनकी मृत्यु के कुछ पहले ही और उसमें भी उनकी सबसे लोकप्रिय कविताओं को जगह नहीं थी। वे सिर्फ़ लोगों के दिलों, ज़ुबानों और गुप्त खर्रों में ही बसी रहीं। ये वहीं चकाचक हैं जिनकी एक और कविता का मुखड़ा बहुत लोकप्रिय हुआ है:

हर अदमी परेसान ह
हर अदमी त्रस्त ह
मारा पटक के
जे कहे पन्द्रह अगस्त ह

***

चकाचक की इसी चमक को याद करके मैंने इस बार होली बनारस में मनाने का फ़ैसला किया। इलाहाबाद तक आया था, फिर ऐसा मौक़ा मिले न मिले। तो वापसी के कार्यक्रम को रद्द कर के मैं बस इसी कार्यक्रम में शिरक़त करने के लिए बनारस पहुँचा। बनारस आ कर भाई अफ़लातून और अपने पुराने मित्र मेजर संजय से मालूम हुआ कि न तो अब होली का ये विशिष्ट कवि सम्मेलन अस्सी पर होता है और न उसे चमकाने के लिए चकाचक जीवित हैं। सम्मेलन की जगह बदल कर मैदागिन के एक मैदान में कर दी गई है क्योंकि अस्सी में रहने वाले परिवार, सम्मेलन के तीन-चार घण्टों के दौरान तय नहीं कर पाते थे कि अपने कान बन्द करें कि अपने बच्चों के।

होली तो नहीं खेली मगर भाई अफ़लातून और स्वाति जी के शानदार आतिथ्य का लाभ उठाया और अस्सी पर पप्पू की दुकान पर होली मिलन समारोह में गुलाल से रंगा गया। बनारस के तमाम राजनीतिक और साहित्यिक विभूतियों से मिलना हुआ। और इस साहित्य की इस अश्लील परम्परा पर विचार-विमर्श भी हुआ। मैं कह रहा था कि आने वालों साल में चकाचक को वैसे ही मान्यता मिल जाएगी जैसे पश्चिमी साहित्य में दि साद को मिली, डेढ़-दो सौ साल बाद।

मैं यह भी चाह रहा था कि मेरे हाथ इस अश्लील सम्मेलन के पुराने प्रकाशन मिल जायं लेकिन वे किसी के घर पर नहीं थे, कारण स्पष्ट है। अस्सी से निकलते-निकलते मैंने उत्साहित हो कर अपनी इस राय को भी गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष रखा कि इस अश्लील साहित्य का एक ब्लौग रचा जाय और उसे जनता के लाभार्थ समर्पित कर दिया जाय। अफ़लातून भाई इस बात पर बहुत सहमत नहीं दिखे। न जाने वह कुछ देर पहले उदरस्थ किए भंग के गोले का असर था या मेरी बात का, वे सपाट नज़रों से मेरी तरफ़ देखते रहे। और मुझे अपनी राय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करते रहे। सबसे विदा लेके मैं मैदागिन को चला आया।

सम्मेलन की सभी कुर्सियाँ काशी की जनता की तशरीफ़ों से घेरी जा चुकी थी। एक शरीफ़ आदमी ने अपनी तशरीफ़ सरका के मुझे भी अपनी तशरीफ़ टिकाने का निमंत्रण दिया; मैंने स्वीकार कर लिया। मंच पर और दर्शकों में सभी धर्म और वर्ग के लोग मौजूद थे। लोग हल्ला मचा रहे थे और संचालक बद्री विशाल की बहन के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति इच्छुक और आतुर दिख रहे थे। हारकर बद्री विशाल ने सामान्य कविताओं के दौर को समाप्त करते हुए विशिष्ट सम्मेलन का आग़ाज़ किया। उसके बाद जो कुछ हुआ उस से अश्लील साहित्य के प्रति मेरा उत्साह धीरे-धीरे ठण्डा पड़ता गया।

मंच पर से जो पढ़ा जा रहा था वो अधिकतर फ़िल्मी गानों की पैरोडी या सस्ती तुकबन्दी के अलावा कुछ नहीं था। बीच में एक कवि, जिनका मैं नाम याद न रख न सका, ने ज़रूर शिल्प और कथ्य दोनों में एक स्तर दिखाया। उस एक को छोड़कर किसी भी कविता में कोई सामाजिक या राजनैतिक सच्चाई को टटोलने की कोई कोशिश नहीं दिखी। जिसका निष्कर्ष मैं यह निकालता हूँ कि कविता श्लील हो या अश्लील, वो आम तौर पर कूड़ा ही होती है। (इस पाठक चाहें तो 'बुरा न मानो होली है' की भावना से प्रेरित मान सकते हैं)।

लगभग एक घण्टे तक किसी बेहतरी की उम्मीद करने के बाद मुझे अपनी तशरीफ़ और देर वहाँ रखने में तकलीफ़ होने लगी और मैं उठ चला आया। बाद में मैंने अफ़लातून भाई से किए अपने प्रस्ताव पर पुनर्विचार करते हुए पाया कि अच्छा यही होगा कि साहित्य की अश्लील परम्परा को अपना स्थान खुद तलाशने दिया जाय। चकाचक के उत्तराधिकारियों को इन्टरनेट तक पहुँचने में मेरी सहायता की ज़रूरत होगी, यह सोचना अहमन्यता होगी। और रही बात चकाचक को उनका स्थान मिलने की तो कौन जानता है कि तमाम कहावतों का निर्माता कौन है? चुटकुले कौन बनाता है? भाषा की उस गुमनामी में हो सकता है कि चकाचक के लिए भी कोई कोना सुरक्षित हो!

***

बाद में सोचते हुए अस्सी पर रामाज्ञा शशिधर की एक बात पर विचार करते हुए मैंने पाया कि ये बात ठीक है कि यह अश्लील परम्परा सिर्फ़ पुरुषवादी सोच या पुरुषों की अभिव्यक्ति है। पूरे का पूरा महिला वर्ग इस से कटा हुआ है। इस संस्कृति पर यह आरोप भी है कि यह महिला के प्रजननांगो को अपनी विकृति का निशाना बनाती है, इसलिए हिंस्र और पतनशील है। मेरा इस से मतभेद है। पहले तो ये कि प्रजनन के प्रति आदमी और औरत का नज़रिया अलग-अलग है। एक-दूसरे के प्रति आप उनसे एक ही जैसे व्यवहार की उम्मीद अगर करते हैं तो आप की उम्मीद निराधार है। प्रजनन के प्राकृतिक ज़िम्मेदारी है और आदमी की प्रजनन में भूमिका गर्भाधान के साथ ही समाप्त हो जाती है। उसके बाद पालन-पोषण में उसकी जो भूमिका है उसे निभाने में कोई सार्वभौमिक मानक नहीं रहा है।

विवाह संस्था का इतिहास से पता चलता है कि अलग-अलग समाजों में यह भूमिका बदलती रही है। और स्त्री को जितनी अधिक आर्थिक स्वतंत्रता मिली है उसने अपने यौन व्यवहार पर से पुरुषवादी बन्धनों को उतना ही तोड़ा है। विवाह की सामंती धारणा स्त्री की यौन शुचिता को एक ऐसे मूल्य की तरह प्रस्तुत करती है जो उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। एक बार कौमार्यभंग हो जाने पर वह किसी सम्मानित पुरुष के योग्य नहीं रहती और उसके लिए आत्महत्या या किसी भयंकर अपमान और सज़ा के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

इस्लाम में ये मूल्य बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित किए गए हैं। जहाँ औरत को ग़ैर-मर्दों से बराबर पर्दे में रहने की बात है। (बहस बस इतनी है कि कितना परदा करने की बात है) और किसी भी प्रकार के व्यभिचार की कड़ी स़ज़ा है। पिछली सदी में आए हिन्दू समाज में सुधारों की चलते उन परम्पराओं से छुटकारा पा लिया जो पति की मृत्यु के बाद भी उसकी विधवा पर उसका यौन-अधिकार बनाए रखती थी। लेकिन आज के पूँजीवादी अमरीकी समाज में प्रथम सहवास के इर्द-गिर्द कोई मिथक नहीं रह गया है बल्कि तमाम अमरीकी फ़िल्मों और साहित्य के ज़रिये देखा जा सकता है कि अमरीकी नवयुवतियों के बीच ‘कौमार्यभंग न होना’ एक पिछड़ेपन की निशानी है और यौन अनुभव होना आकर्षकता की पहचान।

तो हमारे सामंती समाज में यौन-सम्बन्धों पर बन्दिशों के चलते ही इस प्रकार की विकृत अभिव्यक्ति होती है जिसे हम अश्लीलता का नाम देते हैं। अगर यौन-सम्बन्धों के लिए एक स्वस्थ माहौल हो तो इस प्रकार के विकार पैदा होने की सूरत कम हो जाएगी।

दुनिया में हर जगह पारिवारिक रिश्तों में यौन-सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध है और ये क्या सिर्फ़ संयोग है कि अधिकतर गालियां माँ और बहन को लेकर हैं? इन्ही गालियों के कारण कहा जाता है कि इन गालियों के ज़रिये पुरुष समाज स्त्री के प्रजननांगो को अपनी हिंसा का निशाना बना रहा है। ऐसा नज़र ज़रूर आता है लेकिन ये सही समझ नहीं है। ऐसा लग सकता है कि वह किसी दूसरे की माँ के साथ सम्बन्ध स्थापित करने की बात कर रहा है मगर वास्तव में वह आदमी माँ और बहन के सम्बन्धों में अपनी यौन-आंकाक्षाओं को जगह दे रहा है। जो ‘कर्मणा’ नहीं हो पा रहा उसे ‘वाचा’ कर रहा है।

संस्कृति और विकृति दोनों सामाजिक नज़रिये का फ़रक़ है। मेरा मानना यह है कि गालियाँ प्रजननांगो पर हमला नहीं बल्कि उन के प्रति सम्मोह हैं। और ये गालियां स्त्री के प्रजननांगो पर नहीं बल्कि प्रजननांगो पर हैं और गुप्तांगो पर हैं। भूला न जाय कि कितनी गालियाँ गुदा पर लक्षित है। और ये भी याद कर लिया जाय कि गालियों का एक प्रमुख हिस्सा आदमी के लिंग को बार-बार स्मरण को समर्पित है। और यह मान लेना कि यदि औरतों को मौक़ा मिला तो वे गालियाँ नहीं देंगी, भी ठीक नहीं। इस समाज में ही कितनी औरतें गाली देती हैं। वे शायद पुरुषवादी सोच के प्रभाव में देती हैं लेकिन पश्चिमी समाजों में जहाँ औरतें अपेक्षाकृत स्वतंत्र है, वहाँ औरतें गाली देती हैं और किसी पुरुषवादी सोच के तहत नहीं देतीं। औरतों द्वारा दी जाने वाली अंग्रेज़ी की प्रमुख गालियों में उल्लेखनीय हैं: अपने-आप से यौन सम्बन्ध बनाना, पुरुष के लिंग के समकक्ष होना।

***

समाज हमेशा चाहता है कि यथास्थिति को बनाए रखे। नैतिकता उस की इसी इच्छा का हथियार है। बहुत लोग जो साहित्य को समाज का दर्पण मानते हैं और दर्पण को सजने-सँवरने का साधन देखते हैं और वे जो साहित्य को आदर्शों की हदबन्दी में ही क़ैद रखना चाहते हैं, मुख्यधारा के उन खेवैयों के लिए लिए अश्लीलता हमेशा एक विकृति बनी रहेगी।

यहाँ पूछा जा सकता है कि कविता की मुख्य धारा क्या है और कौन सी है। तुलसी दास के ज़माने में कविता की मुख्यधारा काशी के सांस्कृत-पण्डितों की रही होगी लेकिन आज के ज़माने में वामपंथी विचार के साहित्यकारों की धारा ही मुख्यधारा है। शेष कवियों को अस्सी की धारा* की तरह भ्रष्ट मान लिया गया है और उनका हाल अस्सीवत ही यानी नालेनुमा हो चला है। मुख्यधारा में अपनी-अपनी नाव खे रहे ये महाभाग ऐसे किसी काव्यसाधक को मुख्यधारा में प्रवेश की अनुमति नहीं देते जो उनके वैचारिक और नैतिक मानदण्डों पर ख़रा न उतरता हो।

कुछ लोग ऐसा मान सकते हैं कि साहित्यिक सत्ता के शीर्ष पर बैठे ये लोग आज भी उसी क़िस्म का छुआछूत चला रहे हैं समाज में जिसकी ये ऊँचे गले से निन्दा करते हैं। ये तर्क किया जा सकता है कि यह बात इस आधार पर ग़लत है कि वामपंथ का सत्ता से कोई जुड़ाव नहीं रहा है। लेकिन ये बात ठीक नहीं है; साहित्य और शिक्षा के दायरों में वामपंथी विचारकों का वर्चस्व शुरु से ही बना हुआ है। और तुलसी दास के भी समय में कौन सा काशी का पण्डित मुग़ल दरबार का सीधा भागीदार था?

उच्च साहित्य की सारी वर्जनाओं और उनके द्वारा जनता की नैतिक रक्षा के बावजूद जनता की संस्कृति बेलाग रूप से चलती रहती है। और जनता उच्च साहित्य द्वारा प्रस्तावित दूसरी ‘जन-संस्कृति’ की घास को अछूता छोड़ देती है। बनारस में एक ऑटो यात्रा के दौरान कुछ भोजपुरी गीतों ने मेरे समेत दूसरे यात्रियों को तरंगित किया उनके बोल थे – ‘तनि सा जींस ढीला करा’ और ‘मीस्ड काल मारत आड़ू कीस देबू का हो, आपन मसिनिया में पीस देबू का हो’।

यह याद रखना चाहिये कि जो साहित्य न सीमाओं को तोड़ता है और न नए आसमानों की ओर पंख पसारता है वह मनुष्यता के विकास में कोई योगदान नहीं करता।



*अस्सी गंगा से ही निकली एक धारा का नाम है। वो जहाँ गंगा से वापस मिलती है उस घाट का नाम अस्सी है। इसी अस्सी और वरुणा के बीच बसे नगर को वाराणसी कहा गया। आजकल यह धारा नाला बन चुकी है।


***


(मुम्बई से दूर अपने इस उत्तरभारतीय प्रवास के दौरान गिरिजेश राव और ज्ञानभाई से भी मिलना हुआ और पाया कि ये दोनों जितने बेहतर ब्लौगर हैं उतने ही बेहतर इन्सान भी)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

ई रजा कासी हॅ - लंगोट सर्ग

वैसे तो बनारस में और भी तमाम रंग देखे, सब का ज़िक्र करना यहाँ मुमकिन नहीं लेकिन लंगोट की चर्चा के बिना यह विवरण अधूरा रह जाएगा। अपनी काशी डायरी का अंत इसी लंगोट को समर्पित करता हूँ।

जहाँ बाकी देश में खासकर बड़े शहरों में ब्रीफ़्स और अण्डरवियर्स का चलन है, बनारस में लंगोट अभी भी लोकप्रिय है, घाट पर नहाते पुरुषों में अधिकतर लोग आप को ब्राण्डेड अण्डरवीयर में ज़रूर दिखेंगे मगर एक अच्छी संख्या लंगोटधारियों की भी मिलेगी। और नगरों में लंगोट को लोगों ने पके करेले की तरह त्याग दिया है। करेला तो वो पहले भी था क्योंकि जो लोग लंगोट के योग्य अपने को नहीं पाते थे उन्होने पिछली पीढ़ी में ही पटरे वाले जांघिये का आविष्कार करवा लिया था। अब तो खैर! ये भी बात होने लगी है कि लंगोट पहनने से आदमी नपुंसक हो जाला।

आधुनिक विज्ञान के फ़ैड्स पर यक़ीन करना ख़तरे से खाली नहीं। साठ के दशक में पूरे योरोप और अमरीका के वैज्ञानिकों ने मिल्क फ़ूड कम्पनियों को यह प्रमाण पत्र दे दिया है कि माँ का दूध बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं। साठ, सत्तर और अस्सी, और नब्बे के दशक में पैदा होने वाले बच्चे डिब्बा बन्द पाउडर के दूध पर पले। आज बिना किसी माफ़ी, किसी अपराध स्वीकरोक्ति के ये फ़िर से स्थापित कर दिया गया है कि माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ है। तो आज का कॉमन सेन्स है कि लंगोट पहनने से आदमी नपूंसक हो जाता है।


अगर सचमुच ऐसा होता तो काशी में आबादी की वृद्धि दर में कमी ज़रूर नोटिस की जाती। काशी में लंगोट कितना आम है इसका अन्दाज़ा आप को कपड़ों की कुछ दुकानों के आगे फ़हराते रंगीन पताकाओं से मिलेगी। अगर आप भूल न गए हों तो आप पहचान जाएंगे कि ये झण्डा-पताका नहीं छापे वाले रंगीन लंगोट हैं।

लंगोट पहनना कोई कला नहीं है। आप को बस गाँठ मारना और हाथ घुमा के सिरा खोंसना आना चाहिये। लेकिन घाट पर लंगोट पहनना एक हुनर ज़रूर है। इस हुनर में पहले लंगोट का एक सिरा मुँह में दबा कर शेष तिकोना भाग लटका लिया जाता है। फिर पहने हुए लंगोट/अंगौछे को गिरने के लिए आज़ाद छोड़कर फ़ुर्ती से तिकोने को पृष्ठ भाग पर जमा लिया जाता है। दोनों तरफ़ ओट हो जाने के बाद फिर नाड़े को कस लिया। सारा हुनर इस फ़ुर्ती में ही है। अनाड़ी लोग चूक जाते हैं तो उनके पृष्ठ भाग आम दर्शन के लिए सर्व सुलभ हो जाता है। और हुनरमन्द हाथ की सफ़ाई से नज़रबन्दी कर देते हैं और एक पल में ही सब कुछ खुल कर वापस ओट में हो जाता है। जय लिंगोट।

मेरे हिसाब से लंगोट से बेहतर अन्डरवियर मिलना असम्भव है। एक प्रकार के मॉर्डन अण्डरवियर की टैग लाइन है कि फ़िट इतना मस्त कि नो एडजस्ट। बात मार्के की है। हर आदमी अण्डी पहन के एडजस्ट का हाजतमन्द हो जाता है। मुश्किल ये है कि सारी अण्डीज़ प्रि फ़िटेड आती है वो आप के लिए कस्टम मेड नहीं है। ९० हो सकता है आप के लिए ढीला हो, और ८५ टाइट। आप सर पटक कर मर जाइये आप के लिए कोई ८७ या ८८ साइज़ का अण्डरवियर नहीं बनाएगा। और किसी ने बना भी दिया तो आप का साइज़ सर्वदा ८७ ही रहेगा इस की क्या गारन्टी है हो सकता है सुबह ८४ हो शाम ९१ हो जाय और रात को ८१।

झख मार कर आप ८५ या ९० का साइज़ लेंगे और फिर आप कितना भी एडजस्ट करें कुछ एडजस्ट नहीं होगा। इसके विपरीत लंगोट है। इसके ठीक विपरीत लंगोट कस्टम मेड है। जितना चाहे एडजस्ट। टाइट पहनना हो सिरा खींच कर टाइट कर लीजिये। और नपुंसक हो जाने के अफ़वाह से बचाव करना हो तो ढील दे कर लंगोट का वातायन बना लीजिये।


जय बनारस! जय लंगोट!!

(बनारस यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी से)

ई रजा कासी हॅ ! - ६

किन्ही लाल साहब का मक़बरा है राजघाट के पुल के पास। आरकेयोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इन्डिया के संरक्षण में है वो खूबसूरत इमारत। हम ने चाहा कि देखें मगर पन्द्रह अगस्त के दिन छुट्टी है और उस दिन किसी को काम करने की इजाज़त नहीं है। शायद घूम-फिर कर ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को देखने की आज़ादी भी नहीं। हमें ये लाभ देने के लिए जो व्यक्ति उस के देखरेख करता होगा उसे काम करना पड़ता शायद इसीलिए वहाँ प्रवेश बन्द था मगर सुरक्षाकर्मी फिर भी नौकरी बजा रहे थे।

हम यह सोच ही रहे थे कि वहाँ मुसलमानों के एक जत्थे की आमद हुई। हमें लगा कि शायद इन लोगों से इस इमारत की तारीख़ का कुछ पता चले सो दीनी पहनाव में पैबस्त एक मोटी-ताजी शख्सियत से हम ने पूछा कि क्या वो जानते हैं कि इस ऐतिहासिक इमारत की क्या अहमियत है। पर वे शायद खुद परिचित नहीं थे और सम्भवतः बाहर से आए थे। उनके साथ एक स्थानीय से लगने वाले जनाब उस पुलिस वाले से बहस में उलझ गए कि ये लोग बाहर से आए हैं और इनका मक़बरा देखना ज़रूरी है। हम ने उनसे भी अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर की तो बासित जमाल नामधारी इन साहब ने इमारत की ऐतिहासिकता पर हमारी पुर्सिश को बुरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया और अपने दुख भरे आक्रोश को प्रगट करने लगे कि मुसलमानों की जगह और उन्हे ही नहीं घुसने दे रहे।

बाहर से आए अपने रिश्तेदारों या दोस्तों को वो हिन्दू बनारस में मुस्लिम परम्परा के नाम पर जो कुछ है उसका मुज़ाहिरा करने में अपने को बेबस पा कर वे ये भी नहीं देख पा रहे थे कि सुरक्षाकर्मी हमें भी नहीं घुसने दे रहे। फिर भी मैंने उन के दुख को समझने की कोशिश करते हुए कहा कि आज पन्द्रह अगस्त है आज आज़ादी की छुट्टी है। तो भी उनका मानना था कि उस से क्या। उन्हे तो ये आज़ादी नहीं मिली कि वे अपने बुज़ुर्ग की जगह जा कर जो करना चाहें कर सके। शायद उन्हे बाबा विश्वनाथ के श्रद्धालुओं से ईर्ष्या हो जो संडे, मंडे, बैंक हॉलीडे सभी दिन अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर सकते हैं।

बाद में जमाल साहब की शिकायत पर सोचते हुए मैंने पाया कि मजारों को तो सरकार हस्तगत नही करती, सिर्फ़ ऐतिहासिक स्थलों को। अजमेर शरीफ़, निज़ामुद्दीन औलिया की मजार आदि तो जनता के ही अधिकार में रहती हैं बावजूद इसके कि वो ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं। तो क्या जमाल साहब मुसलमानों के पुरानी हुक़ूमत के सभी स्थानों पर अधिकार न मिलने से दुखी थे। अगर ऐसा है तो ये बहुत बड़ी शिकायत है क्योंकि मुसलमानों के अधिकार में तो एक वक़्त पूरे का पूरा हिन्दुस्तान था।

जमाल बासित हमें बहुत देर तक अरझा कर नहीं रख पाए और हम आगे निकल गए। वरूणा और गंगा के संगम पर लगा वाराणसी का पहला घाट है आदि केशव घाट। गंगा के प्रवाह की दिशा से देखेंगे तो आखिरी घाट मगर न जाने क्यों इसे पहला घाट ही कहते हैं। वाराणसी में भी पहले वरुणा आती है और असी बाद में। घाट पर लिखा है काशी पहले विष्णु की नगरी है बाद में शिव की। मन्दिर जीर्ण है और प्राचीन मूर्ति के बारे में उघारे बदन, अगोंछे में अधोभाग का आच्छादन किए पुजारी जी ने बताया कि वह स्वयं विष्णु जी के द्वारा स्थापित है।

दो बकरी और एक गाय के अलावा घाट लगभग सुन्न पड़ा है। मन्दिर के चारों ओर लोगों ने अपना घर बना लिया है। आप मन्दिर में घुसते हैं तो आप को लगता है कि आप किसी के घर की सीमा का उल्लंघन कर रहे हैं। चौसट्ठी घाट पर चतुर्षष्ठेश्वर मन्दिर में भी इसी संकोच के चलते मैं बाहर ही रह गया। यह केवल आदिकेशव की नहीं सम्पूर्ण बनारस का चरित्र है यहां लोग मन्दिर में घुस कर रहते ही नहीं, वहां से दुकान धंधा भी संचलित करते हैं। विश्वनाथ गली में भी कई प्राचीन मन्दिर ऐसे हैं जो लोगों के घरों और दुकानों के बीच पिस कर महीन हो कर विलीन होते जा रहे हैं। कुछ एक ने तो मन्दिरवे में ही होटल खोल दिया है। खाओ रजा इडली डोसा!

मैंने पाया कि काशी का कुछ अलग रंग नहीं है। ऊ पी का ही रंग है जो यहाँ कुछ खिल कर निकलता है। आदमी नंगा है कुछ नहीं है उसके पास। फिर भी मस्त है। जैसे उसे दुनिया जहान से कोई मतलब ही नहीं। कहते हैं जो आनन्द यहाँ हैं कहीं नहीं। यहाँ एक अजब मिठास है। गमछा लपेटे हैं, दो रुपये की सब्जी खरीदें हैं, जेब खाली है, पर कोई परिचित दिख जाय तो आवा एक ठ पान हो जाए, चाय हो जाए। ये चरित्र पूरे प्रदेश का है- खास तौर पर आगरा से दक्षिण-पूर्व का- लेकिन काशी तो जैसे एक सुरूर में रहता है हमेशा। जैसे नशा यहाँ की भंग में नहीं गंगा के पानी में हो। जिसने डुबकी लगायी वो गया, सुरूर में। मन लागो यार फ़कीरी में। दूसरी तरफ़ कुछ लोगों का मानना है कि बनारस एक लद्धड़ शहर है जो अपनी निरुद्देश्यता को बनारसी मस्ती का नाम देकर आँखें मूंदे पड़ा है।


ऐसी ही निरुद्देश्य मस्ती में शाम को घाट पर टहलते हुए अचानक बारिश होने लगी। दौड़ कर एक चाय की दुकान पर लगे तिरपाल में घुस गए। तमाम श्रद्धालुओं के बीच गीता वचन उवाचते मिले झक्क कुर्ता पैजामा धारी सज्जन जो आपस के राग-द्वेष से चिंतित थे। कानों में पड़ा कि उनकी दृष्टि में कोई अपना-पराया नहीं, सब आत्मा है। और आत्मा आत्मा में क्या भेद। यह कहते हुए उनके मुख कमल से मदिरा की गन्ध मन्द-मन्द आ रही है। धीरे से बात खेत के पट्टो और फ़ौजदारी पर लौट गई। ये एक और विषेशता है। लम्पट सबसे बढकर साधु की भाषा बोलता है। लेकिन उसके हाव-भाव और कर्म उसका राज़ खोल देते हैं। कभी भाषा मंत्र थी। उसमें इतनी शक्ति थी कि उच्चारण मात्र ही वरदान और शाप हो जाता था। पर आज की भाषा वास्तव में धोखा है। अकेले भाषा से साधु और शैतान का भेद करना बहुत मुश्किल है। हर लंगोटधारी ब्रह्मचारी हो ये ज़रूरी नहीं।


(बनारस यात्रा की दौरान लिखी डायरी से)

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

ई रजा कासी हॅ ! - ५

ओम नमो शिवाय! ओम नमो शिवाय!! सुबह सुबह पाँच साढ़े पांच बजे होटल गैंजेस के नीचे से इस मंत्र जाप के साथ भक्तो की टोली खड़ताल खड़काते निकलती हैं। शिव मंत्र का यह सस्वर पाठ बड़ा ऊर्जावान जागृति देने वाला मालूम हुआ मुझे। होटल के छज्जे पर खड़े होकर उन्हे देखा और फटाफट नीचे उतर आया। उनके पीछे चलते हुए मुझे भी मन हुआ कि मैं भी उस टोली का हिस्सा होकर ओम नमो शिवाय का जाप करने लगूं। लेकिन अपनी स्वाभाविक झिझक और लज्जा के चलते मैं चुप ही रहा। विश्वनाथ गली के अन्दर मुड़कर वे वहीं खड़े होकर कुछ देर तक माहौल बनाते रहते। उनके इस जादू से कुत्ते भी मुग्ध हो गए। पास आकर पूँछ हिलाते शामिल हो गए। एक ने तो अपना स्वरदान भी किया; भौं-भौं, कूं-कूं नहीं, अजब आह्लाद से भरा हुआ। जैसे किसी उसमें भी किसी सुसुप्त स्मृति का जागरण हो गया हो।

शंख नाद के साथ बाबा विश्वनाथ की अर्चना समाप्त करके टोली दशाश्वमेध घाट की ओर स्नान के लिए चली गई। पाठ का स्वर बदल कर मद्धम हो गया पर जारी रहा। चाय वाले ने बताया कि यह बहुत पुराना नहीं है। पाँच साल से ही चालू हुआ है। चार टोली आती हैं। एक कबीरचौरा से, एक चेतगंज से, एक चौक से और एक अन्यत्र से। पास खड़े एक बाबा ने कामना की कि अब एक टोली सोनारपुरा से आनी चाहिये। चायवाले ने सहमति जतायी। एक सभ्रान्त पुरुष जिसके कपड़े काफ़ी मलिन हो चुके थे मुझसे आग्रह किया कि बाबू एक चाय पिलाइये। उसके आग्रह में विनय़ था, दैन्यता न थी। ऐसे आग्रह को टालना असम्भव था।

चाय वाले के हाथ में तुलसी और पुदीने के रस मिश्रित काली चाय बनाने का हुनर था, मैं उसका मुरीद हो कर सुबह तीन चार चाय पी जाता हूँ। तीन चार इसलिए भी क्योंकि बढ़ती महँगाई में दाम बढ़ाने के अलावा कुल्हड़ का आकार भी मध्यम से छोटा और छोटे से नन्हा होता जा रहा है। पर अफ़सोस यह था कि उसकी सड़क पर स्थित अस्थायी दुकान, स्थायी दुकानों के खुलते ही बन्द हो जाती है। चाय का आनन्द लेते हुए मैं ने देखा कि कि एक बड़ी गाड़ी टयोटा इनोवा आकर विश्वनाथ गली के दूसरी तरफ़ रुकी। आगे के दरवाजे से एक सुथरे स्वरूप के सिल्क के कुर्ता-धोती डांटे एक धनिक सज्जन उतरे। ड्राइवर गाड़ी रोके रहे। पीछे एक प्रौढ़ महिला थीं। वे नहीं उतरी। फिर हमने देखा कि एक मोटरसायकिल सवार पुलिस वाला ऊँचे स्वर में कुछ अपशब्द हकाल रहा था- साले एक गाड़ी से पूरा रस्तवा जाम कर दिया है.. बढ़ा भोसड़ी वाले। गाड़ी का ड्रायवर उतर कर दूसरी तरफ़ का दरवाजा खोल रहा था। गाड़ी से एक प्रौढ़ महिला का अवतरण हुआ। ड्रायवर बहुत हड़का नहीं मगर वापस आकर अपनी गद्दी सम्हाली और गाड़ी जब तक आगे नहीं बढ़ी, पुलिसवाले की प्रेरणा जारी रही।

बनारस प्रवास की शुरुआत ही यहाँ के यातायात की अराजक रोमांच से हुई थी। तभी समझ गया था कि यह सड़क पर दृश्यमान ये स्वच्छन्द गतियां बनारसी मानस का निछन्दम प्रवृत्ति का प्रतिबिम्ब हैं। कोई किसी के लिए रुकने को तैयार नहीं है। एक दूसरे को रास्ता देने की न्यूनतम विनम्रता भी नहीं है, जिसे इंगलिश ऐटीकेट या ‘पहले आप’ वाली लखनवी तहज़ीब में देखा जाता है। यहाँ तो बस उन दो प्राचीन राजाओं की अदम्य ऊर्जा है जो संकरे पुल पर आमने सामने होकर अपने रथ पीछे हटाने से इन्कार कर देते हैं। और जो अपनी सुविधा के लिए पूरे जगत की गतियों को अवरुद्ध करने में भी नहीं संकोच करते।

अचानक मुझे कल शाम की एक घटना याद हो आई। यही सड़क थी, और गाड़ी भी इनोवा ही थी। ठीक ऐसे ही चिल्ल-पों करती सड़क पर एक इनोवा रुक गई थी और उसके पीछे का सारा ट्रैफ़िक जड़वत हो गया था। अजीब दृश्य था, न तो कोई इनोवा के अगल-बगल की जगह से अपने वाहन को रगड़ते हुए निकालने की कोशिश कर रहा था और न ही पीछे खड़े वाहनसवारों में से कोई बेचैन आत्मा अपने स्वरयंत्र के ज़रिये इनोवावासियों को धकेलने जैसी प्रतिक्रिया कर रहा था। बड़े अचरज का नज़ारा था, ग़ौर से देखने पर समझ आया कि इनोवा के आगे एक पुलिस की जीप भी खड़ी है जिसके वर्दीधारी सरकारी कर्मचारी इनोवा से उतरने वाली सभ्रान्त महिलाओं के लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोलने से लेकर उन्हे दुकान के भीतर छोड़ आने तक जैसी सेवा-टहल कर की स्वयं को सार्थक सिद्ध कर रहे हैं। निश्चित ही ये महिलाएं किसी कुलीन अफ़सर के परिवार की थीं। दो-तीन मिनट तक गौदौलिया से दशाश्वमेघ जाने वाली सड़क का संसार एक सम्मोहक जड़ता में स्तम्भित रहा। और ये सब एक सरकारी अफ़सर के रौब-दाब के भौकाल में।

यह विचार ही रहा था कि देखा कि सुबह से बानारस के यातायात को सुधार देने के लिए तत्पर एक लम्बोदर पुलिसवाला अपनी टांग उठाकर रिक्शेवाले के पृष्ठभाग वो अंकन कर रहा था जिसे आम चलन में गाँड़ पर लात कहा जाता है। गाँड़ पर लात मुहावरे का प्रयोग आजकल जी पी एल के रूप में एम टी वी पर भी लोकप्रिय हो चला है लेकिन उसके सार्वजनिक प्रयोग का साक्षात दर्शन आप को काशी या काशी जैसी दिव्यनगरी में ही सम्भव है।

इस अनुभव के बाद मन पर जो बनारस की अराजकता को जो अभिराम बिम्ब बना था, ऐसे खण्डित होने लगा कि नई बनी छवि का कुछ स्पष्ट अर्थ निकालना कठिन हो गया। क्या इसका अर्थ यह था कि बनारसी अराजकता और स्वच्छन्दता तभी तक है जब तक कि राज्य का डण्डा पिछवाड़े पर अंकित होने की सम्भावना क्षितिज पर दूर हो? कुछ चाह कर भी इस मुद्रांकन से बच नहीं पाते और कुछ ऐसी सम्भावना के उपजते ही अपनी निर्दोषता का सबूत, बुत बन पेश करने लगते हैं।

बनारस का अन्तिम घाट है राजघाट। लोगों ने बताया कि वो एकदम ‘गँवार’ है। उसे देखने की इच्छा इसलिए बलवती हुई कि वो सम्भवतः बनारस का पूर्ववर्ती रूप है। पिछली सदियों का जिसे अभी देखा जा सकता है। वहाँ पहुँचे तो समझ आया कि उसे गँवार क्यों कहा गया.. घाट पर पत्थर की सीढ़िया तो हैं मगर मिट्टी का साम्राज्य कहीं अधिक है।

वहाँ पहुँचने के पहले ही दर्शन हुए भैंसासुर मन्दिर के। थोड़ा चौंका। भैंसासुर यानी महिषासुर - देवी माँ द्वारा जिसके मर्दन का उत्सव हर वर्ष हम करते ही हैं- उसका मन्दिर? आगे घाट पर देखा कि घाट का नाम भैंसासुर राज घाट लिखा है। फिर ऊपर देखा तो एक भव्य संत रविदास मन्दिर निर्माणाधीन दिखा। उसके नीचे लिखा था – संत रविदास घाट। ये थोड़ा उलझाने वाला लगा। एक घाट के तीन-तीन नाम कैसे। पूछा तो मल्लाहों ने बताया कि घाट का नाम भैंसासुर राजघाट है। संत रविदास बोलेंगे तो दूसरी छोर पर अस्सी के आगे भेज दिये जायेंगे। फिर एक स्त्री ने बताया कि इस घाट का असली नाम कुलकुल घाट है। इसकी क्या कहानी है उसने नहीं बताई बस यही कहा कि कुलकुल ही पुराना नाम है।

अपने मातृपक्ष और श्वश्रूपक्ष की पूरी कहानी बताने के बात उसने हमें दस-दस रुपये की माला बेच दी और कहा कि जाइये भैंसासुर बाबा पर चढ़ा आइये। वो जागता बाबा है। हैजा फैलता है तो हम बाबा से कहते हैं कि बाबा हैजा रोक दो तो बाबा रोक देता है। बेटी मर गई थी तो बाबा के पास जा के लिटा दिया। बोला कि बाब इसे जिला दो- बाबा ने जिला दिया। जागता बाबा है। ऐसे जागते बाबे कितने हैं देश में। शायद हजारों, शायद लाखों। मगर भैंसासुर बाबा पूरे वर्ल्ड में एक ही है। ऐसा एक अन्य भक्त ने बताया। हम अपराजित/नीलकण्ठ की माला ले के गए। बाबा का केवल धड़ था और बाबा की सहधर्मिणी सायरा माता की पूरी आकृति। और अन्दर भैंसासुर बाबा के बगल में बाबा की सवारी भैंसा या उनका कोई बन्धु ही- पता नहीं कह नहीं सकते! न विष्णु थे, न राम, न कृष्ण, न गणेश और न ही कोई अन्य देवी देवता। ये देवालय नहीं एक असुरालय था जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा के होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन बाहर शंकर जी के नन्दी थे। और मन्दिर के भीतर ही बाजू में भोले बाबा भी उपस्थित थे। इस प्राचीन गँवार घाट पर असुर संस्कृति के चिह्न आज भी जीवित हैं और उन्हे भोले बाबा का समर्थन और संरक्षण दोनों प्राप्त है।


(बनारस यात्रा के दौरान लिखी डायरी से)

सोमवार, 24 अगस्त 2009

कूद जाऊँ क्या?

मैं बनारस की ट्रेन बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस में सवार था। खिड़की के बगल वाली सीट थी। ट्रेन लगभग खाली थी। आराम से सामने की सीट पर पैर टिकाकर अधलेटे होने में मन अवचेतन में विचरने लगा। बाहर के खेत-मेंड़, पेड़-पंछी देखते-देखते अचानक मन में विचार आया कि चश्मा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। फिर सोचा कि बैग से कैमरा निकाल कर बाहर फेंक दूँ। जेब से मोबाइल निकाल कर उसे भी खिड़की के बाहर उछाल दूँ।

ऐसे विचारों के पीछे मेरे पास कोई कारण कोई तर्क नहीं था। मैं न तो क्षुब्ध, न क्रुद्ध और न अवसादग्रस्त। न किसी से झगड़ा न कोई मेरे ऊपर कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती। फिर भी मन अजीब दिशा में ठेल रहा था। मैं मनमानी करने वाला आदमी नहीं हूँ। इच्छाओं का दास तो बिलकुल नहीं। मन पर, विचारों पर तक कठोर नियंत्रण रखने वाला आदमी हूँ। मगर मन अभी स्वतन्त्र था। मेरी उस पर कोई रोक न थी। वो कह रहा था- चश्मा, मोबाइल, और कैमरा खिड़की के बाहर फेंक दूँ। न जाने क्यों?

कुछ दिन बाद बनारस में दरभंगा घाट के एक ऊँचे चबूतरे पर बैठ कर मन में आने लगा कि वहाँ से सीधे नीचे गंगा में कूद जाऊँ। बनारस आकर मैं आनन्द में हूँ। जीवन का अन्त करने का मेरा कोई विचार नहीं है। ऐसी प्रेरणा मुझे पहले भी हुई है। गंगटोक में एक बार सीधी घाटी में झाँकते एक मकान के छोर पर खड़े होकर जब मैंने अपने तलवों से लेकर घुटनों तक एक भयावह झुरझुरी और मस्तक तक दौड़ते खून को महसूस किया तो मैंने जाना कि मेरा शरीर ऊपर से नीचे तक अज्ञात में कूदने की भौतिक तैयारी कर चुका है।

इस अन्तः प्रेरणा के सम्बन्ध में मेरा एक विचार है। मेरा सोचना है कि यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हर किसी को ऊँचाई पर जाकर डर लगता है। क्योंकि हर एक के भीतर ऊँचाई पर जाकर नीचे छलांग लगाने की प्रेरणा जागती है। सिर्फ़ उसे डर नहीं लगता जो या तो छलांग लगा-लगा कर अज्ञात के डर के पार हो गया है या फिर उसे जो अपनी प्रवृत्तियों के पार हो गया है।

मल्लाहों के बच्चे इस प्रेरणा को सुनते हैं और छलांग लगा कर नदी को अपना दोस्त बना लेते हैं। हम जो छलांग नहीं लगाते, सारी उमर किनारे बैठकर इस अन्तः प्रेरणा को सुनते हैं और सुन-सुन कर डरते हैं। डर कर किनारे से थोड़ा और दूर हो जाते हैं।

अज्ञात में छलांग की प्रेरणा उठना हमारी स्वाभाविक वृत्ति है- यह सोचकर मैं घाट के चबूतरे से उठ गया। पास ही एक कुत्ता सो रहा था। मन में आया कि उसे एक लात लगाऊँ। पर मैंने अपने को रोक लिया। क्या आप जानते हैं कि मेरे भीतर कुत्तों का कितना डर है?
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...