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शनिवार, 8 अगस्त 2009

हमरे ऊ पी के बासी

कानपुर की गाड़ी में बैठते ही कानपुर का स्वाद मिल गया। दूसरे दर्जे के कूपे में चार के बजाय पाँच सहयात्री दिखाई दिये। मैं और तनु साईड की बर्थ पर थे। पाँचवे शख्स के पास आरक्षण नहीं था। वे इस विश्वास से चढ़ बैठे कि टी टी के साथ जुगाड़ बैठा लेंगे। जुगाड़ यह इस प्रदेश के मानस का बेहद प्रिय शब्द है। तमाम जुगाड़ कथाओं के बीच दल के नेता ने अपने मित्रो को यह भी एक कथा-मर्म समझाया कि सरकारी हस्पताल प्रायवेट नर्सिंग होम से कहीं अधिक बेहतर पड़ता है। जितना खर्चा प्रायवेट में करोगे उसका चार आने का भोग सिस्टर आदि को चढ़ा दो फिर देखो कैसी सेवा होती है। दिन में चार बार चादर बदलेगी, सब तरह की दवा मिल जाएगी। भोग और प्रसाद का यह चलन जुगाड़ की परिभाषा के भीतर ही समाहित है।

टी टी ने एक बार घुड़की ज़रूर दी मगर फिर चार्ज वगैरा लगा के मान गया और एक बर्थ एलॉट भी कर दी। सारे रास्ते ठेकेदारों की यह टोली अपने हमसफ़रों की अमनपसन्दगी, और सामान्य शालीनता के प्रति एक बेलौस बेपरवाही बरतते हुए मादरचो बहन्चो करते आए। ये इस प्रदेश की ही विशेषता हो ऐसा नहीं है। क्योंकि पढ़े लिखे सभ्य लोगों को को वेल एडुकेटेड सोसायटी में फ़क्देम-फ़क्यू इत्यादि का जाप करते सुना जा सकता है। इस अर्थ में हम्रे ऊपी के बासियों में एक प्रकार की सार्वभौमिकता भी है।
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कानपुर में गाड़ी चलाना एक अनुभव है। यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है कि जिसने कानपुर में गाड़ी चला ली, वो दुनिया के किसी भी इलाक़े में गाड़ी चला सकता है- लाइसेन्स हो या न हो। मेरा तजुरबा ये है कि लोग इस शहर में गाड़ी चलाते कम हैं सड़क पर मौजूद तमाम गाड़ियों के बीच खाली जगहों में अपना वाहन पेलते अधिक हैं।

लेकिन अगर आप को सचमुच कानपुर में गाड़ी चलाने का अनुभव प्राप्त करना है तो कभी सूरज ढलने के बाद चक्का घुमाइय़े। रात में कई सूरज आप को अंधा बनाने के लिए तैयार नज़र आयेंगे। या तो कानपुर में कोई नहीं जानता कि कार में हेड लाईट की एक सेटिंग का नाम लो बीम भी होता है या वो गहरे तौर पर विश्वास करते हैं कि ड्राईविंग एक युद्ध है और सड़क उनकी रणभूमि। सामने वाले को किसी तरह भी मात करना उनकी युद्ध-नीति का अंग है। जिसकी गाड़ी में जितनी तेज़ लाईट होगी वो सामने वाले को अंधा करके गाड़ी धीमी करने पर मजबूर कर सकेगा और बची हुई जगह में अपनी गाड़ी पेलने में सफल हो सकेगा।

आप सोचेंगे कि ये जुझारू चालक रात में तो हेडलाईट के हथियार से युद्ध करते हैं मगर दिन में? दिन में तो उनका यह अस्त्र बेकार सिद्ध हो जाएगा। बात माकूल है। मगर दिन में वे आँखों की जगह कानों पर हमला करते हैं। दूर से ही कानफोड़ू क़िस्म के भोंपू बजाते हुए वाहन दौड़ाते आते हैं। अपने शहर की रवायतों से अजनबी हो चुका मेरे जैसा आदमी घबरा के किनारे हो जाता है। मगर घिसा हुआ कनपुरिया अंगद की तरह डटा रहता है। इंच भर भी जगह नहीं छोड़ता। जनता का यह उदासीन व्यवहार और चिकना घड़त्व चालक को हतोत्साहित नहीं करता। वह लगा रहता है। उसे आदत पड़ चुकी है। उसे डर है कि हॉर्न न बजाने पर लोग उसे रास्ते का पत्थर मानकर सड़क के परे न धकेल दें। वो अपनी अंगुली हॉर्न से हटाता ही नहीं है।

आम नागरिक इस व्यवहार का वह इतना अभ्यस्त हो चुका है कि सुबह छै बजे चन्दशेखर आज़ाद विश्वविद्यालय में सुबह की टहल का आचमन करके स्वास्थ्य वृद्धि के उद्देश्य से आए मगर गलचौरे में व्यस्त निरीह, निरस्त्र लोगों पर भी वह इस हथियार का अबाध इस्तेमाल करने से बाज नहीं आता। और जड़ानुभूति हो चुके पक्के कानपुरिया कभी उस का कॉलर पकड़ कर सवाल करने का सोचते भी नहीं कि अबे भूतनी के! सुबह-सुबह खाली सड़्क पर काहे कान फोड़ रहा हैं.. हैं?

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एक अन्य अनुभव में यह पाया गया कि बड़े चौराहे पर नवनिर्मित पैदल पार पथ का इस्तेमाल करने में किसी पथिक की श्रद्धा नहीं है। परेड, शिवाले और मेस्टन रोड के आने जाने वाले बड़े चौराहे के हरे लाल सिगनल और चौराहे के केन्द्र में स्थापित ट्रैफ़िक हवलदार की किसी भी चेष्टा को पूरी तरह नगण्य़ मानते हुए इधर से उधर, और उधर से इधर होते रहते हैं। अनुभूति जड़ हो चुके पक्के कानपुरिया जानते हैं कि अगर वे अपने वाहन पर आसीन नहीं होते तो वे स्वयं भी अपने इस गऊवत व्यवहार के सामने बाक़ी दुनिया को झुकाए रखते। और गऊ हमारा श्रद्धेय प्राणी है जिसे क़तई भी कोई पुरातन कालीन न समझे.. आज कल गऊ पट्टी के ह्र्दय प्रदेस ऊपी में गऊ प्लास्टिक खाती है, इस से अधिक आधुनिकता का प्रमाण आप को और क्या चाहिये?

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यहाँ नवाबगंज में तमाम तरह के पेड़ लगे हैं नए-पुराने। बरगद, पीपल, आम, इमली, पकड़िया, और नीम जैसे सर्वव्याप्त वृक्षों के अलावा सहजन, अमलतास, गुलमोहर, गूलर, जंगलजलेबी, बालमखीरा, सुबबूल आदि भी लगे हैं। नए रोपे गए वृक्षों में कदम्ब कई जगह लगा है चूंकि वह जल्दी बढ़ने वाला पेड़ है। कदम्ब से पुराने वृक्षों में कसोड नाम का एक वृक्ष भी बहुतायत में लगा हुआ है। कई गलियों के तो पूरे के पूरे किनारे इसी कसोड के द्वारा आच्छादित हैं।

मुझे जिज्ञासा हुई कि कसोड नाम तो प्रदीप क्रिशन ने अपनी किताब ट्रीज़ ऑफ़ डेल्ही में दिया है। न जाने किस इलाक़े में यह नाम चलता हो। अपने कानपुर का क्या नाम है यह सोचते हुए मैं एक प्लास्टिक के पैकेट में आठ रुपये का पचास ग्राम धनिया झुलाते हुए चला जा रहा था। एक बंगले के सामने लगे कसोड के नीचे एक प्रौढ़ सज्जन एक ऐसी बेपरवाही और सहजता से पूरे चित्र में मौजूद थे जैसे कि कोई सिर्फ़ अपने घर के आगे ही हो सकता है। यह जानकर कि महाशय और इस पेड़ का साथ कई बरसों का लगता है, मैंने उन से पूछ डाला तपाक से – इस पेड़ का नाम क्या है। वो पहले तो अचकचाए फिर पेड़ की तरफ़ एक औचक दृष्टि उछाली और सर हिला दिया। इस का नाम तो नहीं मालूम। अपनी अज्ञानता में वो असहज न हो जायं मैंने कहा कि पीले फूल आते हैं न इसमें?

हाँ- पीले। बहुत पुराना पेड़ है। यहाँ जगह-जगह लगा है। तमाम लोगों ने कटवा दिया है। हमारा वैसेई बना है।

मैंने सर हिलाया कि जी यहाँ बहुत लगा है। और चलने लगा।

सड़क के पार उनके पड़ोसी बाहर खाट डाले पड़े थे। मेरे वाले महाशय ने उनसे पूछा कि नाम क्या है इस का। अधलेटे पड़ोसी ने सर प्रश्नवाचक मुद्रा में सर उचकाया।

रुकिये उनको पता है शायद।

मैं उनके पीछे-पीछे सड़क के पार गया। सवाल के जवाब में उन्होने सर नकारात्मक हिला दिया। और मेरी तरफ़ एक निगाह फेंकी जिस से मुझे समझ आया कि वो मेरे सवाल से ज़्यादा इस बात से दिलचस्पी रखते थे कि मैं कौन चीज़ हूँ जो ऐसे सड़क चलते पेड़ो का नाम-धाम पूछ रहा हूँ? इस के पहले कि वो मेरी कोई इन्क्वारी करते मैंने खिसक लेने में अपनी भलाई समझी क्योंकि उन्हे ये समझाना कि मैं इतना खलिहर हूँ कि मेरी दिलचस्पी काम धन्धे की दुनियादारी में नहीं.. बेफ़ालतू की ऐसी जानकारी इकट्ठी करने में है जो उन निम्न वर्ग के लोगों के पास ही बची है जो प्रकृति के साथ रहने के लिए अभी भी मजबूर हैं। बंगले में बन्द लोगों को अपने सामने खड़े पेड़ का नाम भी नहीं मालूम रहता और न वे मालूम करने की कोई कोशिश करते हैं। वैसे मेरे वाले महाशय ने ये ज़रूर वादा किया कि वन विभाग के लोग आते-जाते रहते हैं उन से पूछ कर वो हमें बतायेंगे। अब वो हमें कैसे बतायेंगे इस सवाल में आप अपनी मूँड़ी मत घुसाइये। हम ऊ पी के बासियों की ये एक और निर्मल निराली अदा है। कहीं तो मिलोगे कभी तो मिलोगे तो बता देंगे नाम।

आगे मेरी थेरम को इति सिद्धम करते हुए सासेज ट्री के नीचे मौसम्मी का ठेला लगाए बालक ने दूसरी ओर देखते हुए कहा- बालम खीरा। मेरा सवाल वही था कि इस पेड़ का नाम क्या है। मैं उस के ज़रिये एक पीछे की दुनिया में झांकना चाह रहा था और वो मुझ से पार एक आगे की दुनिया में कुछ तलाश रहा था।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

लैन्सियोलेट कॉडेट टॉमेन्टोज़ हरसूट

आजकल एक नई भाषा सीख रहा हूँ। पेड़ों-पौधों में जागे नए शौक के चलते उन से सम्बन्धित एक गूगल समूह की सदसयता हासिल कर ली है – indiantreepix । जब भी किसी पेड़-पौधे को पहचानने की कोशिश में मेरे पास मौजूद चारों किताबें हाथ खड़ी कर देती हैं तो इस समूह पर एक पोस्ट, मय तस्वीर चिपका देता हूँ।

और बस समूह के ८२२ सदस्यों में से वे बन्धु जो पेड़ को पहचानते हैं, पहेली सुलझा देते हैं। और एक बार पेड़ का नाम पता चल जाय, खासकर वैज्ञानिक नाम तो नेट पर तमाम ऐसे स्रोत मौजूद हैं जो पेड़/झाड़ी/लता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी मुहय्या कर देते हैं।

जो नई भाषा सीख रहा हूँ वो इसी वनस्पति शास्त्र से समबन्धित है। आप के स्वाद के लिए एक नमूना यहाँ पेश कर रहा हूँ –

Muntingia calabura (L., Muntinginaceae) : Small tree with tiered slightly drooping branches with crowded distichous simple alternate strongly asymmetrical sticky-pubescent oblong acuminate obliquely subcordate thin serrulate leaves, soon wilting, 2.5-15 cm long, 1-6.5 cm wide; stipules linear, about 5 mm long, caducous, flowers bisexual, 1 or few in axils, on pedicels about 2-3 cm long; sepals 5 (rarely 6 or 7), each about 1 cm long, lanceolate-caudate, tomentose-hirsute; petals white, [or pink], broadly spathulate-deltoid, about 12-13 mm long, rotate, stamens about 75; filaments slender, distinct, 6 mm long, white; anthers small yellow; disc annular, around the ovary; hirsute; ovary stipitate, glabrous, 5-celled; stigma capitate, 5-riged; fruit 5-celled baccate, sub-globose, light red, 1-1.5 cm wide, sweet-juicy, with many small (1/2 mm) elliptic grayish yellow seeds, stigma persistent.

ऊपर से ऐसा मालूम देता है कि यह अंग्रेज़ी भाषा है पर मैं यहाँ लिखे गए विवरण के आधे से अधिक शब्दों से परिचित नहीं हूँ। एक ग्लासरी नेट से मिली है पैंसठ पन्ने की। उसको देख कर ही थकान हो सकती है। मगर सीखने का आनन्द अक्सर बहुत थकानो से पार ले जाता है।

मैंने देखा है कि हिन्दी में इस प्रकार के समूहों का अभाव है जबकि ज़रूरत तमाम। अब जैसे शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ही एक समूह क़ायम किया जा सकता है। क्या कहते हैं अजित भाई?















तस्वीर: मन्टिन्जिया कैलाबुरा या जमैकन चेरी या मराठी में केवनी।
यह पेड़ सड़क के किनारे मिला मगर पहचान इन्डियनट्रीपिक्स के दोस्तों ने कराई।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

जो खग हौं..

मित्रो, आजकल मेरे मन-मानस पर पेड़ छाए हुए हैं। उन्हे देखना, उन्हे पहचानने के लिए किताबों में पढ़ना, अपने भाई से और नेट के नए पेड़-प्रेमी मित्रों से उनके बारे में चर्चा करना, ज़्यादा समय इसी में जाता है। इस शग़ल में दो सुख हैं – पैदल विचरने का सुख और कुछ नया जानने का सुख!

इसलिए आजकल फिर निर्मल आनन्द आ रहा है। यह कब तक चलेगा, कह नहीं सकता? शहर में पेड़ों की सीमित प्रजातियाँ हैं। एक रोज़ सारे पेड़ पहचानने जायेंगे और फिर जानने के लिए कुछ भी नया नहीं रह जायेगा, अगर मैं अपनी जिज्ञासा के दायरे में बेलों, झाड़ियों और तितलियों, कीट-पतंगो को शामिल न कर लूँ! या अपने विचरने का सीमाएं न तोड़ दूँ!


















आप के आनन्द के लिए नीचे के एक फूल की तस्वीर चिपका रहा हूँ। यह कैम नाम के पेड़ का फूल है। टेबल टेलिस के गेंद के आकार का यह फूल एक नाज़ुक खुशबू का स्वामी है। कहीं-कहीं इसे कदम्ब भी कहा जाता है।

वैसे कदम्ब नाम का एक और भी पेड़ होता है। वो कानपुर में मेरे घर की बाहर की सड़क पर क़तार से लगा हुआ है। मगर प्रदीप क्रिशन का कहना है कि भगवान श्री कृष्ण जिस कदम्ब के नीचे अपनी लीला रचते थे, वह यही कदम्ब है जिसकी तस्वीर आप देख रहे हैं।

रसखान इसी पेड़ की डार पर बसेरा करना चाहते थे..

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

नए शग़ल


एक लम्बे समय तक ब्लॉग से दूर रहने के बाद लौटना हो रहा है। मेरी पिछली पोस्ट अगस्त में लिखी गई थी। इन चालीस दिन के के दौरान मैं छुट्टी पर रहा। जो लोग मेरे जीवन को जानते हैं वे कह सकते हैं कि मैं छुट्टियों की गतिविधियों से छुट्टी पर चला गया। और उनका ये कहना ग़लत नहीं होगा।
कभी-कभी मन में एक अपराध-भावना जागती है कि जब कि शेष संसार धंधे पर लगा हुआ है, पैसे कमाने की जुगत में दिन-रात एक कर के फ़ुरसत को तरस रहा है; उस लिहाज़ से मेरा ऐसा जीवन कितना उचित और नैतिक है? मगर विवेक निर्णय देता है कि मुक्ति सबसे मूल्यवान है और छुट्टी दरअसल मुक्ति का ही लोकप्रिय रूप है। सो सब सही है.. !

तो साहब.. लगभग महीने भर के लिए मुम्बई से निकला था, साथ में कुछ काम भी था। सोचा था कि लिखना ही तो है.. लैपटॉप साथ लिए था, जैसे यहाँ तैसे शेष जहाँ। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक वाक्य तक नहीं लिखा गया। दिल्ली के मुग़लिया इमारतों का दर्शन किया गया। ल्यूटन की बनाई नई दिल्ली को आह भर-भर के फेफड़ो में भरा गया और मेरे बड़े भाई संजय तिवारी (विस्फोट ब्लॉग वाले नहीं) के ज़रिये दो नए शग़ल में शिष्यत्व लिया गया।
भाईसाहब पुराने चिड़ीनिहार (बर्ड-वाचर) हैं, और जब से उन्हे रक्तचाप की शिकायत हुई और ऐलोपैथी के दवातंत्र ने अपने शिकंजे उन पर कसने शुरु किए, उन्होने दवाओं का जुआ शरीर से उतार फेंकने के लिए टहलने का एक भयानक कार्यक्रम अपना लिया जिसमें वो रोज़ाना आठ-दस किलोमीटर टहलने लगे। दवाएं फेंक दी, रक्तचाप क़ाबू में आ गया और उन्होने अपने निहारने के शौक़ में चिड़ियों के साथ-साथ पेड़ों को भी शामिल कर लिया।
भाईसाहब के साथ रोज़ाना दिल्ली के मुख्तलिफ़ बाग़-बगीचों में टहलते हुए मुझे भी इस गतिविधि में आनन्द मिलने लगा। और दिल्ली के बाद कानपुर और इलाहाबाद के भी बगीचों और गंगा किनारों के तमाम पेड़ों और चिड़ियों को पहचानने का ये उत्साह मुम्बई भी ले कर चला आया हूँ।
मुम्बई इस मामले में थोड़ा अभागा है। यहाँ पर अंग्रेज़ों ने कोई भी कम्पनी बाग़ नहीं बनाया। जी! ये लिखते हुए मुझे दुःख हो रहा है कि आज के हिन्दोस्तान में प्रकृति के नाम पर शहरों के भीतर जो कुछ भी है वो अंग्रेज़ो की विरासत है। चाहे वो ल्यूटन की बनाई दिल्ली के बाग़-बगीचे और सड़को के किनारे लगाए गए पेड़ों की व्यवस्था हो या कानपुर और इलाहाबाद जैसे शहरों के कम्पनी बाग़- उन्ही की सोच का नतीजा हैं।
हम हिन्दुस्तानियों ने उनके जाने के साठ साल के बाद कुछ भी नहीं बनाया- शहरों में एक क़ायदे का बाग़ नहीं और जो कुदरती जंगल हैं उन्हे लगातार नष्ट करते आ रहे हैं। मुम्बई के फेफड़े कहे जाने वाले संजय गाँधी नेशनल पार्क और आरे कॉलोनी को भी चारों तरफ़ से कुतरा जा रहा है। आने वाले दिनों की स्थिति, अगर सम्हला न गई तो, भयानक होगी।
खैर! इस बीच किताबें तो खरीदता भी रहा और पढ़ता ही रहा। मगर दो किताबें जो सबसे अधिक पलटी गईं वे रहीं- डॉ सालिम अली की ‘द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स’ और प्रदीप क्रिशन की ‘ट्रीज़ ऑफ़ डेल्ही’। सालिम अली की प्रतिभा से तो सभी परिचित हैं मगर फ़िल्म डाइरेक्टर प्रदीप क्रिशन की किताब बेहद शानदार है। किताब का शीर्षक दिल्ली के पेड़ो तक अपने को सीमित करने का आभास ज़रूर देता है, मगर इसके अन्दर भारत के मुख्य पेड़ो के बारे में जानकारी बेहद क़रीने से दी गई है।
मज़े की बात यह है कि प्रदीप क्रिशन कोई वनस्पति-विज्ञान के विशेषज्ञ न थे मगर उन्होने अपने से ही अध्ययन करके स्वयं को इतना शिक्षित कर लिया कि समाज को एक कमाल की किताब का योगदान कर सके। इस प्रयास में उन्हे सात-आठ साल लगे, घूम-घूम कर के पेड़-दर्शन किए और जम कर आनन्द लिया होगा इस में मुझे कोई शक़ नहीं है। एक पेड़ को पहचानना, प्रकृति के साथ आप के एक खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत बन सकता है और गहरे निर्मल-आनन्द का स्रोत भी।

किताब में २५२ पेड़ों का विवरण दिया है मैंने अस्सी के आसपास पहचान लिए हैं, जिसे लेकर मैं खूब प्रसन्न हूँ। इस किताब को शुरु करने के पहले शायद में आठ-दस को पहचानता रहा होऊँगा। चिड़ियों को भी पहचान रहा हूँ पर उस गति से नहीं; चिड़िया पेड़ की तरह एक जगह स्थिर तो रहती नहीं ना।
कमाल की बात ये है कि उसी पुराने दृश्य में अब नई दिलचस्प चीज़ें दिखने लगी हैं।
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