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गुरुवार, 8 नवंबर 2007

कैसे गिरा सद्दाम

अगर आप से पूछा जाय कि पिछले इराक़ युद्ध की कौन सी छवि सबसे मज़बूती से आप के मानस में अंकित है तो आप क्या जवाब देंगे? बग़दाद के ऊपर आतिशबाजियों की तरह बरसते स्मार्ट बमों के उत्तेजक दृश्यों के अलावा मुझे जो छवि याद रह गई वह है- बग़दाद के मुख्य चौक पर लगी सद्दाम हुसेन की विशाल मूर्ति को रस्सियों से खींच कर ज़मीन में गिराती इराक़ी जनता। आप भी शायद भूले नहीं होंगे यह छवि। अगर आप ग़लती से टीवी पर देखने से चूक भी गए तो उसकी भरपाई के लिए दुनिया की लगभग हर पत्र-पत्रिका के मुखपृष्ठ पर भी सुशोभित हुई यह छवि।

एक बड़ा सीधा संदेश छुपा था इस छवि में- इराक़ के हत्यारे तानाशाह को अमरीकी सेना ने अन्ततः उखाड़ फेंका और इराक़ी जनता अपनी मुक्ति का उत्सव मना रही है। यदि मैं आप से कहूँ कि न इस सन्देश का सच से कोई लेना देना था और न इस छवि का.. तो क्या आप मेरा यक़ीन करेंगे। शायद नहीं- अपनी आँखों देखी बात को आप मेरे कहने भर से क्यों झूठ मानने लगे!

कल मैंने कन्ट्रोल रूम नाम की एक डॉक्यूमेन्टरी देखी, जो इराक़ युद्ध के दौरान मीडिया की भूमिका पर केन्द्रित है। अल-जज़ीरा नाम के चैनल को लोग भूले नहीं होंगे। युद्ध के दौरान एक ओर तो वह अमरीकी प्रशासन की आँख की किरकिरी बना हुआ था और दूसरी ओर सद्दाम प्रशासन का भी आरोप था कि अल-जज़ीरा अमरीकी कुत्ता है। फ़िल्म मुख्य रूप से इस चैनल और अमरीकी मीडिया मैनेजमेंट और इराक़ युद्ध के रिश्तों की पड़ताल करती चलती है।

अमरीकी सेना के बग़दाद अधिग्रहण के पहले आप को याद होगा कि अमरीकी सेना ने बग़दाद के भीतर एक हमले के दौरान तीन मीडिया सेन्टर को निशाना बनाया था। यह घटना हमें फ़िल्म के भीतर विस्तार से देखने को मिलती है जिसमें दोहा टीवी सहित दो अन्य मीडिया सेन्टर्स पर हमले के साथ-साथ अल-जज़ीरा के बग़दाद कार्यालय पर हमला किया गया –सीधा डाइरेक्ट रॉकेट हमला। जिसमें अल-जज़ीरा के मुख्य रिपोर्टर की मौत हो गई। इस बर्बर हमले का कारण पूछे जाने पर अमरीकी वक्तव्य था कि इन ठिकानों से उनके जहाजों के ऊपर हमले किये जा रहे थे इसलिए उन्होने सिर्फ़ जवाबी कार्रवाई की। क्या बात है जवाबी कार्रवाई की। पूरी दुनिया जानती है कि पूरे का पूरा इराक़ युद्ध एक जवाबी कार्रवाई था- अगर अमरीका ने हमला ना किया होता तो सद्दाम ने अपने वेपन्स ऑफ़ मास डिस्ट्र्कशन्स के सहारे अमरीका जनता को धुआँ कर दिया होता। खैर..

दुनिया भर के मीडिया को हिला देने वाले इस हमले का नतीजा ये हुआ कि जितने भी मीडियाकर्मी स्वतंत्र रूप से यहाँ-वहाँ टहल कर युद्ध का हाल बयान करने की कोशिश कर रहे थे, वे सब डर कर अमरीकी सेना के साथ लटक लिए.. युद्ध देखना है और दुनिया को दिखाना है तो वैसे देखो-दिखाओ जैसे हम बता रहे हैं। अल जज़ीरा ने फिर भी चाहा कि वह स्वतंत्र ही रहे पर किसी भी इराक़ी इमारत में उन्हे जगह नहीं मिली.. हर जगह लोग डरे हुए थे कि अमरीकी सेना उन्हे निशाना बना रही है.. वे जहाँ जायेंगे.. बम वहीं मारा जायेगा।

मीडिया ने थोड़ी निंदा ज़रूर की पर अमरीकी सेना ने एक बड़ी लड़ाई जीत ली थी अब वे सच को स्टेज-मैनेज कर सकते थे.. एक एक घटना को वैसे बना-बना कर पेश कर सकते थे जैसा कि वे चाहते थे.. फ़िक्शन की तरह.. पहले सीन लिखा.. एक्टर तैयार किए.. सेटिंग तैयार की.. और सबसे आखिर में कैमरामैन को बुलाकर शूटिंग कर ली.. ये जो इराक़ युद्ध का अविस्मरणीय दृश्य मेरे/ आप के मानस में अंकित है वह इसी तरह से तैयार किया गया था।

इराक़ में बम मारे जा रहे थे.. बेगुनाह आदमी, बूढ़े, बच्चे, औरतें मर रहे थे.. लोगों डर के मारे अपने घरों में बंद थे। मगर अमरीकी टैंको के आते ही ये कौन और कैसे नौजवान थे जो अचानक सड़कों पर निकल आए और बेधड़क हो कर विदेशी कैमरों के आगे उत्पात मचाने लगे.. सद्दाम को ऊँची पत्थर की मूर्ति को पूरे साजो सामान के साथ गिराने लगे.. क्या यह सब स्वतःस्फूर्त था? फ़िल्म के अन्दर एक अरब चरित्र बताता है कि वह इराक़ी है और वह पहचानता है इराक़ी लहज़े को.. उत्पात मचाने वे लोग बग़दादी तो क्या इराक़ी भी नहीं थे! इस पूरे घटना क्रम के दौरान बाकी शहर में क्या हो रहा था लोग क्या महसूस कर रहे थे.. ये बताने वाला कोई रिपोर्टर नहीं था। उन्हे बम खा कर मरना नहीं था.. वे सब अमरीकी सेना के इशारे पर आ-जा रहे थे.. वही दिखा रहे थे जो उन्हे सेना दिखा रही थी।

तो साहब वह छवि झूठी थी और दोनों ही बातें झूठी थी उस छवि के संदेश में। न तो वहाँ की जनता सद्दाम से मुक्ति पा कर कोई उत्सव मना रही थी- बल्कि अमरीकियों से मुक्ति पाने के लिए लड़ रही है आज भी - और न ही उस घटना के साथ इराक़ युद्ध समाप्त हो गया था। इराक़ में क़त्लो-ग़ारत आज भी जारी है।

चलते चलते एक बात और यदि अमरीकी प्रशासन एक छवि का निर्माण करने के लिए इतना कुछ कर सकता है तो वह ११ सितम्बर के हमले की योजना खुद बनाकर, खुद अमल में लाकर दोष ओसामा सहित मुस्लिम आतंकवादियों पर क्यों नहीं मढ़ सकता? आखिर तेल पर कब्ज़े और दुनिया पर अमरीकी आधिपत्य की इस पूरी लड़ाई के बीज तो उसी घटना में दबाए गए हैं। और यह आरोप किसी अल-जज़ीरा नाम के अरब चैनल का नहीं है.. खुद अमरीकी जनता के एक बड़े प्रबुद्ध और जागरूक हिस्से का है।

रविवार, 6 मई 2007

बाज़ार बनाता है मीडिया को: रवीश कुमार

पिछले तकरीबन एक महीने से रवीश जी यू पी के चुनाव में व्यस्त हैं.. इस बीच बेनाम ने जो उनके नाम शिकायती अंदाज़ में चिट्ठी लिखते हुये अपनी चिंतायें ज़ाहिर की थी.. आज आखिरी दौर के मतों के बैलट बॉक्स में पहूँचने के साथ ही रवीश कुमार का खत भी हमारे मेल बॉक्स में पहूच गया .. वे बेनाम के नाम अपने इस खुले जवाब में.. उन्ही चिंताओं पर अपनी बेबाक राय ज़ाहिर कर रहे हैं..



प्रिय बेनाम,

आपका लेख पढ़ा। जो चिंता आपकी है वही हमारी है। चुप रहने का सवाल नहीं है। मगर बोलने वाले का ही इम्तहान लिया जाता है। कि आपने आगरा पर बोला और बक्सर पर चुप रहे। हम कुछ लोग जो बोलते हैं क्रांतिकारी नहीं है। बल्कि मामूली या भारी नुकसान का जोखिम उठाते हुए बोल रहे हैं। हमारे बोलने का कुछ भी असर नहीं हुआ है। जैसा कि स्टार न्यूज पर हमला करने वाले धनंजय का कुछ नहीं हुआ।

अब आप यह सवाल करें कि मीडिया अपने संपादकों के खिलाफ खबर क्यों नहीं दिखाता तो चुप रहना ही पड़ेगा। क्योंकि संपादक और मीडिया कार्पोरेट की देन हैं। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। हां मीडिया से स्वतंत्रता की उम्मीद की जाती है। आप अपने मालिक या संपादक के खिलाफ ख़बर कैसे कर सकते हैं? और करेंगे तो दिखायेंगे कहां? इसके बाद भी मीडिया सापेक्षिक स्वतंत्रता की सांस लेते हुए कुछ करता रहता है। पर इस बड़े सवाल पर चुप्पी के अलावा मीडिया बोलता रहता है। अमर सिंह के खिलाफ कोई एक चैनल न बोल रहा हो तो उसी वक्त दूसरा बोल रहा होता है। ऐसा भी होता है कि सभी एक ही राग अलापने लगते हैं। ऐसा भी होता है कि विदर्भ की घटना एक चैनल पर न हो तो उसी वक्त दूसरे चैनल पर होती है। हम क्यों उम्मीद करें कि एक ही ख़बर एक ही समय में सभी चैनलों पर हो। जबकि ऐसा कई बार होता है। अमिताभ ऐश की शादी सब पर एक साथ दिखाई जा रही थी लेकिन विदर्भ के किसानों की आत्महत्या एक साथ नहीं। मीडिया को बाज़ार बनाता है। जब तक उसका अस्तित्व बाज़ार से स्वतंत्र नहीं होगा उसे उसकी शर्तों पर चलना ही होगा। अगर आप जनहित की खबरों को छाते हुए देखते हैं तो इसमें किसी ए बी सी डी ईमानदार पत्रकार के अलावा बाज़ार का भी सहयोग होता है। बाज़ार अपनी नैतिकता को बनाने के लिए कुछ ईमानदारी की खबरे दिखाता है। जिसकी बातें अविनाश अपने लेख में कर रहे हैं।

इसका अध्ययन किया जाना चाहिए कि आज़ादी की लड़ाई में जब टाटा बिड़ला सहित कई उद्योगपति गांधी जी का समर्थन कर रहे थे तो क्या उसी वक्त वो अपने काम काज में उदार थे। क्या वो सभी को काम के बराबर मेहनताना दे रहे थे? क्या वे अपने मज़दूरों का शोषण नहीं कर रहे थे? अगर ऐसा था तो उसी वक्त हमें मज़दूर आंदोलन का इतिहास देखने को क्यों मिलता है? क्यों मज़दूर मालिकों के खिलाफ लड़ रहे थे? फिर क्यों मालिक अंग्रेजों के ख़िलाफ गांधी जी का साथ दे रहे थे? मगर इसी स्पेस में बोलने की आज़ादी तो है। जिसका फायदा हम उठा रहे हैं।

नुकसान उठा कर।

मैं अपनी बात पर लौटता हूं। जिस वक्त एक चैनल शिल्पा को दिखाता है उसी वक्त कहीं न कहीं दूसरा चैनल या अखबार गरीबो की चर्चा करता है। शिखा त्रिवेदी,सुतपा देब बनारस के बुनकरों की दुर्दशा पर रोती हुई खबरें कर रही होती हैं। दफ्तर में बार बार मज़ाक उड़ाए जाने के बाद भी इनकी निष्ठा नहीं बदलती। लेकिन इनके बाद बनारस के बुनकरों का कोई हाल लेगा भी मुझे यकीन नहीं है। अनिरूद्ध बहल की चर्चा भी करनी होगी। उनके कोबरा पोस्ट ने बाबाओं की लंगोट उतार दी है। वो हर दिन बाज़ार के ही सहारे व्यवस्था से टकरा रहे हैं। बाज़ार के सहारे इसलिए क्योंकि उनकी खोजी रिपोर्ट का खरीदार बाज़ार ही है। हर चैनल खरीदना चाहता है। तो इससे एक रास्ता नज़र आता है। और इससे एक कमी भी। जब हम व्यवस्था के खिलाफ ऐसी ख़बरों की खरीद कर दिखाने का जोखिम उठा सकते हैं तो खुद क्यों नहीं करते? लगता है ईमानदारी अब आउटसोर्सिंग से हासिल की जा रही है। यह भी अच्छा है।

लेकिन बेनाम जी मैं यह नहीं मानता कि पत्रकारों का उदय किसी नेता के सहारे होता है। कुछ के साथ संयोगवश ऐसा हुआ हो मगर यह सच नहीं। बहुत से पत्रकार हैं जिनका नेताओं से कोई लेना देना नहीं और वो भी शिखर पर हैं। हम शिखर की धारणा भी बदल लें। शिखर किसी एक के खड़े होने की जगह नहीं रही। यहां पर कई लोग खड़े होते हैं। हिंदुस्तान में सिर्फ अपने अपने चैनलों और अखबारों के शिखर पर मौजूद संपादकों की संख्या हज़ारों में हो सकती है। इसलिए एक की नहीं उन हज़ारों की बात होनी चाहिए।

रही बात गिरावट की तो बोधिसत्व जी कह चुके हैं। हममें से ज़्यादातर लोग एक भ्रष्ट सामाजिक पारिवारिक और राजनीतिक माहौल से आते हैं। जिस समाज में दहेज की रकम घर के बड़ों के बीच तय की जाती है उसके दुल्हे समाज में ईमानदार हो सकते हैं। इसका यकीन आपको है तो मुझे कोई परेशानी नहीं। पर ये सवाल चैनलों और अखबारों में काम कर रहे पत्रकारों से मत पूछियेगा। और इस्तीफे की मांग तो कतई भी नहीं कीजिएगा। पता चलेगा सब चले गए और एक दो लोग बच गए।
आपका
रवीश कुमार

पूछ रहे हैं नासिर.. सब धान बाइस पसेरी ?

अपनी प्रतिक्रिया में बेनाम ने रवीश, अविनाश और बोधिसत्व का नाम लिया था.. अविनाश और बोधिसत्व ने तो अपना जवाब दे दिया और रवीश जी यू पी चुनाव के बीच से भी इस बहस में अपनी शिरकत करने के लिये समय निकाल कर जवाब लिख रहे हैं.. आज शाम तक भेजने का वादा है..
इस बीच हमारे एक नये चिट्ठाकार साथी नासिरुद्दीन ने लखनऊ से इस मसले पर अपनी राय हमारे बीच भेजी है.. नासिर प्रिंट मीडिया के पत्रकार हैं.. और हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान के लिये नौकरी बजाने के साथ भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक और धार्मिक स्थिति पर विशेष अध्ययन भी कर रहे हैं.. पिछले दिनों मोहल्ला पर उनका तथ्यपरक और संतुलित लेख भी छपा था जो मोहल्ला के विवाद के बावजूद सब के द्वारा सराहा गया.. उस के बाद अविनाश की प्रेरणा से उन्होने एक निजी ब्लॉग भी खोला है - ढाई आखर.. हालांकि भगत सिंह के ऊपर शहीद-ए-आज़म नाम से एक ब्लॉग वे और उनके साथी काफ़ी पहले से चला रहे हैं.. आइये देखते हैं.. क्या कह रहे हैं नासिर.. मीडिया और उसकी सामाजिक भूमिका के बारे में..


भय जी के निर्मल-आनन्‍द पर पहले बेनाम फिर अविनाश और बोधिसत्‍व जी की टिप्पणियां पढ़ते हुए बार-बार लग रहा था कि यह सिर्फ इन चंद लोगों की बात नहीं है। यह हमारी बात हो रही है। हम यानी खबरनवीसी से जुड़े लोग। बेनाम साहब की बात में जितना सच है, उतनी ही हकीकत बयानी बाकियों के जवाब में भी है। इसीलिए जब‍ इन दोनों का जवाब आया तो लगा कि काफी हद तक इन्‍होंने हमारी ही बात की है। हमारे दिल को हल्‍का किया है।
वैसे ये लोग भले ही कुछ कहें, लेकिन मेरी समझ से आज भी ये ख़बरों के धंधे से इसलिए जुड़े हैं कि कहीं उन्‍हें कुछ कचोटता रहता है। इस‍ीलिए अविनाश ‘मोहल्‍ला’ बना रहे हैं तो रवीश ‘कस्‍बा’ तैयार करने में जुटे हैं। अगर महज नौकरी कर रहे होते तो उनके लिए इन मोहल्‍लों-क़स्बों में भटकने, बहस करने और अपने विचार रखने की जरूरत नहीं थी। यह सब, यानी इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम के अपने माहिर साथी, जितनी तनख्‍वाह पाते हैं, वे आराम से हर शाम सुखी परिवार की तस्‍वीर बन सकते हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। इन्‍हें कुछ कचोटता है, इसलिए ये जूझते हैं। इसलिए यह महज इत्‍तेफाक नहीं है कि नौकरी के दौरान, नौकरी के साथ और नौकरी के इतर, यह लोग भीड़ से अलग दिखते हैं। यह अलग दिखना, मेरी समझ में इनकी शक्‍ल सूरत की वजह से नहीं है। तो हमें सोचना होगा कि फिर कौन सी वजह है जो हमें, ख़बरों की भीड़ में स्‍पेशल रिपोर्ट और बात पते की याद रखने पर बाध्‍य करता है। यह सिर्फ इन्‍हीं की बात नहीं है, ऐसे इस देश में कई खबरनवीस हैं। प्रिंट में भी इलेक्‍ट्रॉनिक में भी। कस्‍बों में भी और राजधानियों में भी।
इसलिए इन लोगों को भी तुरंत सुरक्षात्‍मक घेरा नहीं तैयार करना चाहिए। जो हम कर रहे हैं, वो भी बतायेंगे और जो नहीं कर पा रहे, उसकी सीमा समझने और समझाने की कोशिश करेंगे। पूरब की दो कहावत याद आर रही है- ‘सब धान बाईस पसेरी’ और सबको एक ही लग्‍घी से हॉंकना। यानी सबको एक तराजू पर तौलने की जरूरत नहीं है। फर्क करना जरूरी है।रही बात सामाजिक मुद्दों के उठाने और न उठाने की। मैं चंद घटनाएं सिर्फ याद दिलाना चाहता हूँ। गुजरात में नरसंहार के पहले दिन की बात है।
‘धर्मनिरपेक्ष दलों’ का एक दल विमान से अहमदाबाद पहुँचा लेकिन दंगे के बीच में वह शहर जाने की हिम्‍मत नहीं जुटा सका और गेस्‍ट हाउस से वापस लौट आया। ... फिर दुनिया ने गुजरात का सच कैसे जाना... दंगों के बीच पथराव और आग की लपटों से गुजरते यही खबरनवीस थे, जो जान की परवाह किये बगैर दुनिया को वह बता और दिखा रहे थे, जो इससे पहले इस देश ने देखा नहीं था। अगर वह न होते तो गर्भवती कौसर बानो के पेट फाड्कर उसके बच्‍चे को आग के हवाले किये जाने की बात हम सबको ‘कपोल कथा’ लगती।
पूरे देश में पिछले कुछ सालों में आतंकवादी होने के आरोप में कई (मुसलिम) नौजवान मुठभेड़ के नाम पर मारे डाले गये। लेकिन किसी दल या पार्टी ने कभी इन मुठभेड़ों की सच्‍चाई जानने की कोशिश नहीं की, उस पर सवाल उठाना तो दूर रहा। सोहराबुद्दीन का जो मामला अभी गर्म है, उसके पर्दाफाश का सेहरा भी इसी मीडिया के सर बँधता है।
या फिर तहलका का स्टिंग ऑपरेशन हो या आईबीएन-7 कोबरा पोस्‍ट का बाबाओं काले धन को सफेद करने का धंधा का ताजा स्टिंग ऑपरेशन। या फिर इंडियन ऑयल के अधिकारी मंजूनाथ की हत्‍या का मामला हो या फिर किसानों की आत्‍म हत्‍या का मुद्दा- इन सबके बारे में देश को किसने बताया। किसान सिर्फ महाराष्‍ट्र या आंध्र में ही नहीं बल्कि बुंदेलखंड, अवध में भी जान दे रहे हैं, यह बातें भी खबरनवीसों ने बतायी। लखनऊ में एक गरीब किशोरी के साथ चंद दबंग-पैसे वाले लडके अपहरण कर सामूहिक दुराचार करते हैं। यह लड़के राजनीतिक रूप से भी काफी शक्तिशाली हैं। दो साल हो गये हैं, इस घटना को। वो लड़की न तो प्रियदर्शनी मट्टू है और न ही जेसिका लाल लेकिन लखनऊ शहर के अख़बारों ने इस मुद्दे को आज तक दबने नहीं दिया। कहीं न कहीं कुछ तो बचा है। ... इसलिए यह कहना कि सब कुछ काला है... मुझे लगता है, ज्‍यादती होगी।
मुझे यह भी लगता है कि समाज मीडिया से बहुत ज्‍यादा उम्‍मीद करने लगा है। इसकी वजह भी है। राजनीतिक दलों या आंदोलनों को जो काम करना चाहिए, वह नहीं कर रहे। जो मुद्दे, सवाल उन्‍हें उठाने चाहिए वे नहीं उठा रहे। सामाजिक मुद्दों पर गोलबंदी का जो काम राजनीतिक पार्टियों को करना चाहिए, वे नहीं कर रहीं। आर्थिक उदारीकरण और वैश्‍वीकरण से उपजे सामाजिक सवालों से जूझने में राजनीति कहीं पीछे आँख चुराये खड़ी नजर आ रही है।
... आप अपने दिमाग पर जोर डालिये और याद कीजिये कि आखिरी बार राजनीतिक दलों ने कौन सा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा उठाया था, जिसने समाज को झकझोर दिया। ...और यह सारा काम जो वो नहीं कर पार रहे, उसे करने की अपेक्षा मीडिया से की जा रही है। वह खबर तलाश करे, सामाजिक आंदोलन करे, लोगों की गोलबंदी भी करे। भई, आम जन के साथ हम खबरनवीसों को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए, हम यह सारे काम नहीं कर सकते। हम सहयोगी की भूमिका ही अदा कर सकते हैं। हम कैटेलिस्‍ट (उत्‍प्रेरक) हो सकते हैं। बस...। इसलिए जो सवाल बेनाम ने उठाये वह सामाजिक आंदोलनों के न होने और राजनीतिक खालीपन से उपजे सवाल हैं। जब भी समाज या राजनीति के फलक पर कोई मजबूत गोलबंदी होगी या आंदोलन होगा तो बेनाम के सवालों के जवाब भी मिलेंगे... और असलियत में हमारा भी इम्‍तहान तभी होगा।

शुक्रवार, 4 मई 2007

बोधिस‌त्व क‌ा ज‌व‌ाब‌: बीस‌न ल‌प्प‌ड़ पउते ब‌ापू

बोधिस‌त्व‌ एक क‌वि के रूप में आप से तो पिछ्ले ह‌फ्ते मिल‌ ही लिये थे.. फिर बेन‌ाम के लेख ने एक प‌त्रक‌ार के रूप में उन‌की‌ स‌ाम‌ाजिक भूमिक‌ा प‌र प्रश्न चिह्न ख‌ड़‌ा ‌क‌र दिय‌ा.. तो उन‌से भी रह‌ा न ग‌य‌ा.. और अविनाश के ज‌व‌ाब के ब‌ाद व‌ह भी इस पूरे म‌ाम‌ले प‌र अप‌नी स‌म‌झ ह‌म‌ारे बीच रख रहे हैं.. एक मीडिय‌ाक‌र्मी के ब‌तौर..
भय भाई मैं चुप था,क्योंकि आपने एक दम चुप कर देनेवाला मुद्दा ही उठाया है। यहाँ जो कुछ लिख रहा हूँ आपद्-धर्म मान कर । मैं ना आप से असहमत हूँ, ना बेनाम प्रतिक्रिया देनेवाले से और ना ही अविनाश के उत्तर से । मैं उस तरह का पत्रकार नहीं हूँ । 1997 में कुछ महीने अमर उजाला के इलाहाबाद ब्यूरो में रिपोर्टर के रूप में काम करने के बाद 2006 में स्टार न्यूज से जुड़ा हूँ । यहाँ सलाहकार हूँ और चैनल में अपनी हैसियत को लेकर फिलहाल किसी तरह के मुगालते में नहीं हूँ ।

भाई मैं मानता हूँ कि आज कोई पत्रकार नहीं है बल्कि आज का पत्रकार खबर लानेवाला एजेंट है। शाम होते-होते एसाइनमेंट पर बैठा आदमी उस पत्रकार से पूछता है कल क्या खबर दे रहे हो । और पत्रकार मरते-जीते कुछ खबरनुमा बातें देने की बात कबूल कर खुश या परेशान हो उठता है। वह खबर देने को मजबूर है । कोई इन पत्रकारों या तमाम चैनलों से यह क्यों नहीं पूछता कि क्या जो वो दिखा रहे हैं वो वाकई खबर है। कुछ एक चैनलों को छोड़ दें तो महाराष्ट्र और बुंदेलखंड के किसानों की आत्महत्या की खबर कहीं भी जगह नहीं बना पाई। जबकि लालू या तमाम नाचने गाने वाले अभिनेताओं की चालीसा को कई चैनलों ने शान से चलाया। एक गड्ढे में गिरा प्रिंस देश के तमाम चैनलों पर जीवन और मौत का मंजर पेश करता रहा तो पटना का एक आशिक अध्यापक अपनी सुधड़ छात्रा के साथ अपना इश्किया आंदोलन चलाता रहा लेकिन इन दोनों खबरों या ऐसी तमाम खबरों के बीच तमाम आवाजे अनसुनी रह गईं या रह जाती हैं । मैं तमाम फालतू और रची-रचाई खबरों का क्या करूँ । क्योकि प्रिंस और प्राध्यापक की खबरों में ड्रामा था, इमोशन था, रूप-रस था या कहें कि मसाला था । इसलिए ये खबरे दनदनादन चलती रहीं । किसानों और कामगारों की नीरस खबरें कौन देखता-दिखाता है। आज अनशन और सविनय अवज्ञा आंदोलन का नहीं ड्रामा का युग है। अगर विदर्भ के खुदकुशी करने वाले वही किसान मुंबई में मंत्रालय के सामने ताम-झाम के साथ अपनी जान दें या बुंदेलखंड के किसान कसाई बन कर ददुआ बन जाएं तो तमाम चैनलों को खबर दिखेगी और सबकुछ गरमागरम रहेगा। लेकिन इसलिए सवाल यही है कि भाई खबर क्या है । और इसे तय करने का अधिकार फिलहाल चैनलों के संपादकों और कर्ता-धर्ताओं के विवेक पर है । और उनका विवेक जो कहेगा से बड़ा सवाल यह है कि उनके चैनल को धनबल देने वाले लोग कितना कुछ बिना ड्रामे का करने देते हैं ।

आप को जान कर हैरत होगी सदी के महानायक के नाम से प्रचारित अमिताभ बच्चन और लोकनायक जय प्रकाश जी का जन्म दिन एक ही तारीख यानि 11 अक्टूबर को पड़ता है। अगर 11 गलत हो तो जो भी तारीख हो एक ही है। सारे चैनलों ने अमिताभ की अखंड आरती उतारी लेकिन मैने कहीं भी लोकनायक से जुड़ी एक लाइन की खबर भी नहीं देखी । तर्क वही जेपी की खबर कौन देखता है भाई। यानि जो हिट है वो फिट है । चाहे वो राखी हो या शिल्पा ।

बेनाम ने सही ही कहा है कि पत्रकार और संपादक भी इसी भारतीय समाज की देन हैं । उनमें भी वो तमाम कमजोरियाँ हो सकती है जो आरटीओ ऑफिस के बाबुओं या पुलिस के दारोगा में होती हैं । आज मुन्नाभाई भले लगे रहें लेकिन यह बात माननी पड़ेगी कि वक्त गांधी-लेनिन नहीं गुंडों-लुच्चों का है और हम सब तमाशाई हैं । महाभारत के कुरुक्षेत्र के बाहर खड़े विदुर से अधिक हमारी कोई भूमिका फिलहाल मुझे नहीं दिखती।

चलते-चलते सुल्तान पुर के अवधी के एक कवि इंदु जी की एक कविता का अंश लिख रहा हूँ, अभी इतनी ही याद आ रही है-

एक बार जौ अउते बापू
नेक बात समझउते बापू
सत्य-अहिंसा कहतइ भर में
बीसन लप्पड़ पउते बापू।

भावार्थ यह है कि यदि बापू तुम एक बार फिर आ जाते और अपनी नेक बातें समझाते । तो सत्य-अंहिसा कहने की देर थी तुम्हे बीसियों थप्पड़ लग जाते ।भाई अगर कुछ ऊंच-नीच हो गया हो तो थप्पड़ से बचाना। मार खाने से बहुत डर लगता है । और मैं बेनाम से आग्रह करूँगा कि वो खुल कर अपनी बात कहे । नाम और पहचान क्यों छिपाते हो भाई। डरते क्यों हो, हम हैं ना ।

मीडिया की चरित्रहीनता पर अविनाश का जवाब

इस बात की तक्लीफ़ मुझे भी थी और बेनाम ने भी इसका ज़िक्र किया कि पत्रकार साथियों की प्रतिक्रिया नहीं आई.. उनकी कुछ तो मजबूरियां रही होंगी.. पर देर से ही सही .. अविनाश ने 'मीडिया चिंतन' पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है, मीडिया के चरित्र की हीनता की चर्चा की है और कुछ हद तक पेशेगत मजबूरियों पर भी रौशनी डाली है.. और इस मशवरे के साथ (विनम्र आदमी हैं अविनाश, मेरी तरह अक्खड़ नहीं ) कि उनकी इस प्रतिक्रिया को एक प्रविष्टि के बतौर छापा जाय.. इस मशवरे को क़बूल करने में हमें कोई उज्र नहीं.. (हाँ ये कई लोगों को ज़रूर लग सकता है कि निर्मल आनन्द, दूसरा मोहल्ला बनता जा रहा है..और इसके पीछे भी कोई एजेण्डा है.. पर गलतफ़हमी का इलाज तो लुक़्मान हकीम के पास भी नहीं था.. हम आप तो साधारण मनुष्य हैं..)
ज़ाहिर है, आपने जो लिखा और उस पर बेनाम की जिस तरह से सुसज्जित प्रतिक्रिया आयी, उसे आमतौर पर मीडिया चिंतन कहा जाता है। चिंतन भी एक कारोबार है। कारोबार से मेरा मतलब पैसे की आवाजाही से नहीं है, बल्कि एक पूरे काम से है। तो ऐसे काम में कई लोग लगे हैं। ये अच्‍छा काम है और सब के बस का नहीं। जैसे यह कहना कि राहुल के बयान का ताप शिल्‍पा-गेर मामले की बदली में छिप गया, यह अनायास नहीं था। काश, हिंदुस्‍तानी मीडिया चतुराई की ऐसी चादर फैलाने में कामयाब होता!
दरअसल आज जो मीडिया हमारे सामने है, उसका कोई चरित्र नहीं है। शायद कभी नहीं रहा। लोग कहते हैं, कई उदाहरण देते हैं, आजादी के दिनों की बात करते हैं- लेकिन हमेशा से मीडिया मुनाफे बटोरने का साधन रहा है। और कई बार मुझे लगता है कि इस बटोरन को नैतिकता के पेंट से रंगने के लिए ऐसे पत्रकारों की ज़रूरत होती है, जो संस्‍कार और कुछ कुछ आत्‍मबोध के कारण ईमानदार रह जाते हैं। आपको हर जगह कुछ पत्रकार मिलेंगे, जो मुद्दों की बात करते नज़र आएंगे। वरना, ज्‍यादा ऐसे होंगे, जो बाज़ार के हिसाब से ख़बरों के निर्धारण-प्रसारण-प्रकाशन में जुटे नज़र आएंगे।
बेनाम ने बिल्‍कुल सही व्‍याख्‍या की है। लेकिन इस व्‍याख्‍या में हम जैसे पत्रकारों से जिस किस्‍म का आग्रह झलकता है, उससे यही साबित होता है कि वे चाहते हैं कि मीडिया में छाये अनैतिकता के इस घटाटोप को हटाने के लिए हम आंदोलन करें। जबकि हम नौकरी कर रहे हैं। हर पत्रकार जो समाज की नज़रों में ख़बरों की आपाधापी से जुड़ा है, नौकरी कर रहा है। जैसे हिंदी के कथाकार संजीव बहुत दिनों तक एक कंपनी की नौकरी करते रहे थे। जैसे मैथिली के लेखक स्‍वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी जीवन बीमा निगम की नौकरी करते रहे थे। जैसे हिंदी के कवि लीलाधर जगूड़ी भारतीय प्रशासनिक सेवा मेंजुटे हुए हैं। इन लेखकों का उदाहरण इसलिए, क्‍योंकि ये नौकरी की नैतिकताओं का निर्वाह भी करते रहे और अपनी रचनात्‍मक बेचैनियों को कविता-कहानी के माध्‍यम से बाहर भी लाते रहे। जो पत्रकार आपको अलग से नज़र आते हैं, वो अपनी निजी बेचैनियों की वजह से। न कि ये उनकी पेशागत नैतिकता है।
पेशागत नैतिकता ये है कि अगर हम एक टीवी में काम कर रहे हैं, तो उसे नंबर वन तक पहुंचाना हमारी ज़ि‍म्‍मेदारी है। जबकि यह हकीकत है और हमारा देखा हुआ है कि उड़ीसा के किसी गरीब गांव की कहानी अगर एनडीटीवी दिखाता है, तो दशमलव कुछ कुछ में टीआरपी आती है, जबकि शिल्‍पा गेर मामले को दिखा कर दूसरे टेलीविज़न अप्रत्‍याशित टीआरपी का पुरस्‍कार पाते हैं। ऐसे में हमें क्‍या करना चाहिए? हम जैसों को क्‍या करना चाहिए? रवीश, अविनाश और बोधिसत्‍व को क्‍या करना चाहिए? खामोश ही रहना चाहिए दोस्‍त। चुपके से पतली गली पकड़ लेना चाहिए। जब दूसरा चैनल चुंबन से लहालोट हो, तो उसके तोड़ के लिए कुछ वैसा ही मसाला लाकर तत्‍काल टीवी पर चलाने से बेहतर यही रास्‍ता है।
इसका मतलब यह नहीं कि जो हो रहा है होने दें। जिसे हमारे मित्र यथास्थितिवादी होना कहते हैं। इसका मतलब यह है कि मीडिया जिस काम के लिए है और उसका जो चरित्र है, उसे ऐसा ही होना है। समाज के दुग्‍ध-धवल वर्ग का प्रचार और हित साधन। जैसा कि बेनाम महाशय ने लिखा है। तो हम सिर्फ यही कर सकते हैं कि इस अंधेरे में थोड़ी रोशनी, थोड़ा रास्‍ता बटोर लें.. अपनी बेचैनियों के लिए।

गुरुवार, 3 मई 2007

रवीश, अविनाश और बोधिसत्व की चुप्पी के जवाब में

शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर के चुम्बन-विवाद पर मीडिया की भूमिका पर मेरी प्रविष्टि पर ब्लॉग जगत के लगभग सभी पत्रकार कतरा कर निकल गये.. वो भी जिनके साथ मैं एक दल का सदस्य समझा जाता हूँ.. वह दल भी सन्नाटा साधे रहा .. खैर, आज एक बेनाम प्रतिक्रिया आई है.. जो इस लायक है कि उसे अलग से एक प्रविष्टि के तौर पर सम्मान दिया जाय और वो मैं दे रहा हूँ..



मैं कोई कुलवक्ती यानि होलटाइमर पत्रकार नहीं हूँ भाई इसीलिए आप द्वारा उठाए गए मुद्दे पर बोलने का अधिकारी मैं शायद नहीं हूँ । होना तो यह चाहिए था कि आप के मुद्दे पर रवीश, अविनाश, बोधिसत्व या खबरिया चैनलों में काम कर रहे अन्य पत्रकार मित्र करते पर लगता है कि इन लोगों ने न बोलने का मन बना लिया है इसलिए मैं अपनी जैसी भी समझ है कुछ कह रहा हूँ ।

खबरें किनके खिलाफ नहीं चलतीं

अ- वे लोग जिनकी पकड़ कॉरपोरेट वर्ल्ड पर हो अक्सर खबरिया चैनलों के मध्यवर्गीय संपादक ऐसे लोगों के खिलाफ खबरें नहीं चलाते ।अगर चलाते भी हैं तो ऐसी भाषा में जिनमें आक्रामकता का नामोनिशान भी न हो। खबर चलने के दौरान कोई ना कोई फोन उस समय के ऑउटपुट एडीटर को गालियाँ दे रहा होता हैऔर ऑउटपुट एडीटर माफी मांग रहा होता है ।और खबर थोड़ी ही देर में लुढ़क जाती है।

ब- बड़े औद्योगिक घरानों के खिलाफ कोई भी खबर कभी नहीं चलती। जो खबर चलेगी वो खुश करने के लिए । बड़े औद्योगिक घरानों के मुखिया की उड़ान और देवालयों की परिक्रमा का प्रसारण कभी भी छोड़ा नहीं जा सकता ।रतन टाटा और सिंहानिया की उड़ान और रिलायंस के अनिल भाई धीरूभाई अंबानी की तीर्थयात्रा हो या पारिवारिक तकरार दोनो खबरो में सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें की जाती हैं । तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालु भक्तों को दर्शन में हुई देरी के लिए सिर्फ अमिताभ बच्चन को ही निशाना बनाया जाता है । जबकि अनिल भाई भी उस मंदिर में दर्शन के लिए अमिताभ परिवार के साथ गए होते हैं । लेकिन किसी चैनल के संपादक के बस में नहीं कि वह अनिल भाई के खिलाफ कुछ भी बोल सके।

स-अक्सर शुरु के दिनों में हर पत्रकार किसी ना किसी नेता की लटकन हुआ करता है । आप चाहें तो पता कर सकते हैं कि किस पत्रकार को किस नेता ने प्रमोट किया है । बड़े पदों पर पहुंच जाने के बाद भी संपादक को अपने प्रमोटर नेता को याद रखना पड़ता है ।

द-जिन दलों के पास पाले हुए गुंडे कार्यकर्ता हों उनके खिलाफ कोई भी चैनल कोई भी खबर नहीं दिखाता । आप उदाहरण ले सकते हैं शिवसेना प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बाल ठाकरे का । उनके खिलाफ खबर दिखाने की हिम्मत कोई भी चैनल नहीं दिखाता । अभी तो स्टार को तोड़ कर रख देनेवाले धनन्जय देशाई पर भी कोई खबर नहीं चलनी है ।आप बताए कि धनन्जय के खिलाफ क्या किया पुलिस या खबरिया चैनलों ने ।

य- सूचना और प्रसारण मंत्री भी इसी तरह का एक डरावन शब्द और पद है खबरिया चैनलों के लिए।इस मंत्री के खिलाफ तो छोड़ दीजिए उसके आस-फास मडराने वालों के भी खिलाफ कोई खबर नहीं चल सकती भाई ।

र-कुछ चैनलों के संपादकों का मानना है कि राजनीतिक खबरों को कौन देखता है। यानि खबर बड़ी हो या छोटी उसमें मनोरंजन का पुट होना ही चाहिए । तभी तो अमर सिंह की भड़ैती और लालू की लंठई हमेशा चलनेवाली खबरें होती है।ल-एक राजनैतिक बयान पर चुम्मा-चाटी की खबर कफन बन कर छाएगी ही और राहुल बाबा को नाराज करने की ताकत किस संपादक में है...कल का प्रधान मंत्री है राहुल ।

ल-बाबाओं और संतों के खिलाफ भी चैनल अक्सर मौन रहते हैं । बोलते हैं तो पक्ष में । आप चाहें तो बाबा रामदेव और बृंदा कारात की भिड़त में चैनलों का चरित्र आंक सकते हैं । आखिर बृंदा कहां गलत थीं और बाबा रामदेव कहां सही था । तय है कि बाबा से कुछ मिल सकता था बृंदा से नहीं इस लिये लाइन तो फायदेवाली ही लेनी होगी । इसी तरह परमपूज्य आशाराम बापू के जमीन संबंधी खबर से चैनलों के भक्त पत्रकार कब उतर गए समझ नही आया। आशा राम बापू ने आश्रम की जमीन किसानों को सौपी या नहीं कौन पूछे ।


तो भाई अभय पत्रकार भी इंसान है और वह लोभी भी हो सकता है ।उसकी की भी तो त्रृष्णा होगी , सपने होंगे। आपकी प्रतिबद्धता के फेर में वो अपने भविष्य पर लात नहीं मार सकते । एक बात और पर्दे पर दिख रहे पत्रकार की कोई हैसियत नहीं होती। उनके कान में एक वायर लगा होता है जिसपर अपने कमरे में बैठा संपादक या उस समय का इंचार्ज अपने हिसाब से दिशा निर्देश देता रहता है। यह सवाल प्रश्न के परे है कि चल रही बड़ी खबरे बनावटी होती हैं, उन्हे सजा सवांर कर पेश करने के लिए कुछ सुंदर चेहरे और कुछ सुंदर शब्द होते हैं बस..

बुधवार, 2 मई 2007

समाचार कौन बनाता है.. ?

आज मेरी बात अपने एक मित्र से हो रही थी.. रिचर्ड गियर और शिल्पा शेट्टी जुड़ी उस चुम्बन के बारे में .. जिसके बाद पूरे देश में ऐसा हंगामा हो गया.. कि आज तक लोग बाग़ गिरती हुई नैतिकता के स्तर से परेशान हैं.. और इस के लिये ज़िम्मेदार शिल्पा और गियर को क़ानून की ज़द में ले लेना चाहते हैं..

एक स्त्री जिसे चूमे जाने से कोई परेशानी नहीं.. एक पुरुष जो आसानी से दुनिया की किसी भी औरत को हम बिस्तर कर सकता है..(हर औरत को नहीं, मैं सामान्यीकरण कर रहा हूँ) .. उनका चुम्बन लोगों के नैतिक विवाद का विषय है.. जो लोग अपने ही घर में माँ, बाप, दादा, दादी, बेटे, बेटियों के साथ बैठ कर टी वी पर हिन्दी फ़िल्मो गानों और न्यूज़ चैनल्स पर दिन रात सचमुच अश्लील गाने और अश्लील विज्ञापन संदेश, और कहीं ज़्यादा अश्लील समाचार देखते थकते नहीं.. जिस देश की सड़कों पर सामान्य साज सज्जा में निकलने वाली लड़्कियां भी सुरक्षित नहीं.. वो लोग शिल्पा की आबरू के बारे में चिन्तित हैं..

जो लोग अपने सामान्य बातचीत के भाव बिना गालियों के अलंकार के प्रेषित नहीं कर पाते.. जो लोग अपने ही देश को सब मिल कर नोच रहे हैं.. जहाँ से जो पा रहे हैं खसोट रहे हैं.. उन्हे ये चुम्बन तो अश्लील लगता है पर बाकी कुछ अश्लील नहीं लगता.. और लगता होगा अगर किसी को तो कम से कम इतना तो नहीं कि उस के खिलाफ़ रोये गाये..

आप खुद सोचिये क्या अश्लील था उस चुम्बन में.. आपने पहले चुम्बन नहीं देखा.. सबने देखा है.. स्त्री पुरुष का अश्लील सहवास भी चोरी छिपकर अपनी मर्जी से देखा है.. और तो और आजकल अखबारों तक में नंगी तस्वीरें छ्पना आम बात है.. कोई आवाज़ नहीं उठाता.. तो किस बात के लिये हुआ इतना सब नाटक.. इतना सब पाखण्ड..

आपको शायद याद न हो तो याद दिला दूँ.. ये घटना है १६ अप्रैल २००७ की .. और उस से एक रोज़ पहले उत्तर प्रदेश के किसी दूर दराज़ के इलाक़े में हमारे सुन्दर राजकुमार राहुल बाबा ने अपने ओजस्वी वाणी में दो चार बातें उनके परिवार और पाकिस्तान के विभाजन के सम्बंध से कहीं थी.. जिसके चलते उनकी राजनैतिक समझदारी और वाकपटुता के संदर्भ की सारी पोल पट्टियां उजागर हो गईं ..

न सिर्फ़ देश के भीतर के गैर काँग्रेसी दल बल्कि पडो़सियों को भी सरकार और काँग्रेस को गरियाने का एक अच्छा मौका मुह्य्या हो गया था.. लगा कि न सिर्फ़ यू पी बल्कि देश की सत्ता पर से काँग्रेसी दावे का शेर लड़खड़ा कर ढेर हुआ जाता है.. पर इस शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर के चुम्बन ने उसे पूरी तरह आच्छादित कर दिया..

आप को लगता है कि ये सिर्फ़ एक संयोग था.. और इसके पीछे कोई मंच संचालन नहीं था.. मेरे मित्र इसे संयोग नहीं मानते.. उनका खयाल है कि आम जनता का ध्यान मुद्दो से हटाने के लिये उन्हे जान बूझ कर गैर राजनैतिक मुद्दो में फँसाया जा रहा है.. जैसे कि सरकार का मेहनत मशक्कत कर के सुनिश्चत करना कि दूरदर्शन पर क्रिकेट का सीधा प्रसारण हो.. ये सारा कुछ एक तयशुदा नीति के तहत किया जाता है .. और ये भी एक ऐसा ही मामला है..

आप इससे सहमत हों कोई ज़रूरी नहीं मगर एक बार फिर से सोचे.. और विशेषकर वे लोग जो नारद जैसे मंच में भी एक षडयंत्र खोज लेते हैं.. आप के लिये अच्छा मसाला है..

मंगलवार, 17 अप्रैल 2007

नैतिकता का हथौड़ा

अजीब है आदमी के शरीर की बनावट..पेट में आग लगी पड़ी है.. आँते छिल चुकी है.. लेकिन ज़बान लाल मिर्चों के लिये लटपटाती है..ज़बान और पेट के बीच में कोई संवाद ही नहीं है.. ये आदमी के शरीर की रचना में एक मूलभूत दोष है.. और आदमी ने अपने भगवान को ही नहीं अपने संसार अपने समाज को भी अपनी ही शक्ल में ढाला है.. जैसे नाड़ियों और शिराओं का जाल शरीर के अन्दर फैला है वैसा ही बाहर की दुनिया में भी आदमी ने निर्मित किया है (और उसे विज्ञान की अनुपम खोजों का नाम दिया है इस तथ्य को पूरा अनदेखा करते हुए कि शरीर के अन्दर अभी भी कहीं ज़्यादा जटिल संरचनाएं मौजूद है)..और सामाजिक संरचनाओं में भी शरीर से एक साम्य है.. शरीर के विभिन्न अंगो के बीच इस संवादहीनता का मूलभूत दोष उसकी सामाजिक संरचना में भी अभिव्यक्त होता है.. विभिन्न समुदायों के बीच आपसी तालमेल तो नहीं ही है संवाद भी नहीं है.. अपने निजी हित के लिये एक सामाजिक अंग दूसरे सामाजिक अंग का इस्तेमाल करना चाहता है.. कोई नई बात नहीं सदियों से होता आया है.. और इसी विषमता के कारण जैसे शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं वैसे ही समाज को भी अपने असंतुलन का खामियाजा सामूहिक तौर पर भुगतना पड़ता है.. रोग किसी भी अंग में हो कष्ट किसी एक भाग में ही क्यों न केन्द्रित हो .. प्रभावित तो पूरा शरीर ही होता है.. और रोग बढ़ जाने पर शरीर के मृत्यु भी होती है.. समाज और सभ्यताएं भी विनष्ट होती हैं..

हमारे समाज में भी तमाम रोग लगे हुए हैं.. एक रोग का प्रगटीकरण कल देखा गया.. रिचर्ड गेयर ने शिल्पा शेट्टी को चूमा एक एड्स अभियान के प्रचार के एक हथकंडे के बतौर.. सोच ये थी कि इस घटना की वजह से इस अभियान की चर्चा होगी..और आज तक और स्टारन्यूज़ जैसे चैनेल्स ने इसे जानबूझकर गेयर के यौन अतिक्रमण की तरह पेश किया.. टी आर पी पाने के लिये पूरे मामले को और सनसनीखेज बनाया गया.. जनता के एक खास तबक़े ने इस घनघोर अनैतिकता का प्रदर्शन माना.. और इस पर अपनी भयंकर नाराज़गी ज़ाहिर की.. शिल्पा के खिलाफ़ प्रदर्शन करके.. शिल्पा अपने निजी और सामाजिक जीवन में कैसा व्यवहार करें यह वे लोग तय करना चाहते हैं.. दूसरा मामला.. एक १६ वर्षीय लड़की एक विधर्मी पुरुष के साथ भाग कर मुम्बई आती है.. स्टार न्यूज़ उन दोनों को अपने चैनल पर शरण देता है.. उन पर कार्यक्रम कर के सनसनी परोसता है अपने दर्शकों को आगे.. ये भूल कर कि ये ..एक नाबालिग़ लड़की को भगाने का आपराधिक मामला है.. चैनल एक व्यापारिक संगठन है उसे सिर्फ़ अपने मुनाफ़े से मतलब है.. और इसी लिये वो किसी भी सामाजिक ज़िम्मेदारी से बिदकता रहता है.. हाँ उसका नाटक ज़रूर करता है.. जैसे इस पूरे घटनाक्रम के बाद वो कह रहा है कि हम आपकी आवाज़ को दबने नहीं देगे.. हम आपको हमेशा रखेंगे आगे.. वगैरह वगैरह.. स्टार न्यूज़ के खिलाफ़ पोलिस केस दर्ज़ हो चुका है.. मगर एक दर्शक वर्ग को इतना बुरा लगा कि वे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिये चैनल के दफ़्तर में तोड़ फोड़ करते हैं.. उनके अनुसार उन्हे पता है कि सही रास्ता क्या है.. और स्टार न्यूज़ जो भटक कर ग़लत रास्ते पर चला गया है, उसे सही रास्ते पर वापस लाने के लिये वो हिंसा का सहारा लेते हैं..

यहाँ पर दो वर्ग हमें साफ़ साफ़ दिख रहे हैं.. एक वर्ग जो कि अपने मुनाफ़े के लिये किसी भी हद तक गिरने को तैयार है.. और वो इस मुनाफ़े को कमाने के लिये एक समाज की वकालत करता है जहाँ सम्पूर्ण आज़ादी हो कोई रोक टोक ना हो.. किसी प्रकार की नैतिक बन्दिश भी ना हो.. ये उसके हित के लिये आदर्श वातावरण होगा.. ऐसा उस वर्ग का मानना है.. और दूसरा वर्ग है जो किसी प्रकार के मुनाफ़ा कमाने के व्यवसाय में नहीं है.. जो सामाजिकता और नैतिकता का प्रहरी है.. और सामाजिक आज़ादी की उसकी अपनी एक परिभाषा है.. और अपनी परिभाषा को मनवाने के लिये वो हिंसा का रास्ता अख्तियार करने में हिचकिचाता नहीं.. ये दोनों संघर्ष कर रहे हैं.. सरकार फ़िलहाल पहले वर्ग- मुनाफ़ाखोरों के साथ है.. पर लोकतंत्र में ये तस्वीर बदल भी सकती है..

मज़े की बात ये है कि ये दोनों प्रवृत्तियां आज़ादी की लड़ाई के समय भी थी.. तब इनमें मेल था.. या यूं कहें कि एक दूसरे के अधीन थी.. मुनाफ़ाखोर तो मुनाफ़ाखोर ही थे.. पर इतने बेशरम ना थे.. नैतिकता और सामाजिकता के चोले में रहकर धंधा करते थे.. गाँधी जी को अपना नेता मानते थे.. गाँधी जी का भी उनपर खास स्नेह था.. वे जहाँतक हो सके बिड़ला के ही अतिथि होते.. और दूसरी प्रवृत्ति के प्रतिनिधि स्वयं गाँधी जी थे.. देश के हित में अपने सही फ़ैसलों को पर्याप्त सहयोग अनुमोदन आदि ना मिलने पर वो आमरण अनशन पर बैठ जाते.. अगर तुम लोगों ने मेरी बात ना मानी तो मैं जान दे दूंगा.. हिंसा ये भी है.. मारने की नहीं तो मरने की बात है.. चाकू की नोंक दूसरे की तरफ नहीं अपनी तरफ कर ली गई है.. बस इतना फ़रक है.. अम्बेदकर और सुभाष बोस भी, बापू की इस हिंसा का निशाना बने थे.. अंग्रेज़ तो बने ही बने.. उस वक्त ये तरीका बीमारी नहीं था .. जो हो रहा था देश के हित में हो रहा था.. मगर अब यही प्रवृत्ति बढ़ कर एक फ़ासीवादी रूप ले चुकी है.. और अभी भी इस के इलाज के प्रति हम ठीक से सचेत नहीं है.. सरकार तो नहीं ही है.. ऐसी असहिष्णुता कभी कभी हमें अपने ब्लॉग जगत में भी दिखती है.. क्या हम भूलते जा रहे हैं इन शब्दों का अर्थ- आज़ादी.. नैतिकता.. सहिष्णुता.. या जानते ही नहीं हैं..?
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