शनिवार, 24 नवंबर 2007

कैसी आस्था है न्याय में?

मुसलमानों से जुड़ी दो बड़ी खबर हैं- पहली कि नन्दिग्राम का झण्डा उठाए-उठाए पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने तस्लीमा नसरीन को भी खदेड़ दिया है.. और गरीब किसानों के आगे बिना झुके गोलियाँ चलाने वाली माकपा सरकार उनके आगे झुक गई है। अब आतंकवाद और कट्टरपंथ से लड़ने वाली बेघर तस्लीमा, एक अकेली औरत.. जिसका एकमात्र अपराध उसकी अभिव्यक्ति है.. एक पूरी क़ौम, एक पूरे मुल्क के लिए खतरा बन गई है..??!! और वो जहाँ जा रही है प्रशासन के हाथ पाँव फूल जा रहे हैं। मान गए भई कि व्यक्ति में कितना बल होता है.. और अभिव्यक्ति में कितना बल होता है !!

पर इसका यह अर्थ नहीं कि लखनऊ, वाराणसी और फ़ैज़ाबाद में वकीलों ने जो किया वह भी मासूम लोकतांत्रिक भावना थी..
दूसरी बड़ी खबर.. लखनऊ, वाराणसी और फ़ैज़ाबाद में सीरियल बम धमाकों में कई मरे। ववकीलों को ही निशाना बनाने के आतंकवादियों के इस इरादे के बारे में इयत्ता में सत्येन्द्र प्रताप लिखते हैं, "लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई की थी।"..उनका मानना है कि यह हमला आतंकवादियों का विरोध करने वालों पर है।

मासूम लोगों को निशाना बनाने वाली ऐसी किसी भी कायर आतंकवादी घटना की मैं घोर निंदा करता हूँ.. पर इसका यह अर्थ नहीं कि लखनऊ, वाराणसी और फ़ैज़ाबाद में वकीलों ने जो किया वह भी मासूम लोकतांत्रिक भावना थी। वो भी बेहद शर्मनाक और कायरतापूर्ण था। अन्यायी पुलिस द्वारा सिर्फ़ शक़ की बिना पर गिरफ़्तार मुस्लिम नौजवानों को अदालत के बाहर पीटना और उनका मुक़दमा लड़ने से भी इंकार कर देना कैसी आस्था है न्याय व्यवस्था में और लोकतंत्र में?!

इसके पहले कि अदालत में उनका अपराध साबित हो उन्हे पहले ही आतंकवादी स्वीकार कर लिया वकीलों ने! ऐसा कितनी बार होता है कि पुलिस जिन्हे पकड़ती है उनका अपराध से कोई लेना-देना भी नहीं होता.. वे पुलिस की चपेट में सिर्फ़ इसलिए आ जाते हैं क्योंकि पुलिसवालों को कुछ करते हुए दिखाई पड़ना है। अभी कहा जा रहा है कि हमें ज़्यादा कड़े का़नूनों की ज़रूरत है.. ताकि प्रिवेन्टिव मेज़र्स लिए जा सकें। आप समझते हैं इसका क्या मतलब है.. इसका मतलब होगा कि ऐसा क़ानून जिसके तहत पुलिस सिर्फ़ शक़ की बुनियाद पर ही किसी को भी गिरफ़्तार कर सकेगी, जेल में डाल सकेगी, गोली मार सकेगी।

मुस्लिम समुदाय बाकी देश की तरह मॉल संस्कृति में रचने-बसने के बजाय अपने धर्म में और अधिक क्यों धँसता जा रहा है?
आतंकवाद से लड़ने के लिए ये कोई नई नीति नहीं है.. अमरीका, इस्राइल और कुछ हद तक हमारे देश में भी इस नीति पर काम होता रहा है। पर नतीजे क्या है? क्या आतंकवाद घटा है.. उस पर काबू किया जा सका है? नतीजे उलटे हैं.. न सिर्फ़ मुस्लिम सम्प्रदाय में अमरीका और इस्राइल के खिलाफ़ गु़स्सा और नफ़रत बढ़ती ही जा रही है, साथ में आतंकवाद की घटनाएं भी बढ़ी हैं। क्या भारत को उसी राह पर चलने की ज़रूरत है.. क्या करेंगे हम.. अमरीका की तरह किसी भी दाढ़ी वाले को मुसलमान समझ कर डर जायेंगे और उसकी पिटाई कर देंगे? या इस्राइल की तरह मुसलमानों के इलाक़ों की घेराबंदी करके उनकी आवाजाही को चेकप्वायंट्स से नियमित करेंगे?

रुकिये.. सोचिये.. एक कायर अपराधी की सज़ा एक पूरे समुदाय को मत दीजिये! दण्ड की एक भूमिका होती है न्याय में। पर अगर वह दण्ड न्याय के बजाय अन्याय करने लगे तो अपराध कम नहीं होगा.. बढ़ेगा। ज़रूरत है न्याय की पुनर्स्थापना की।

सोचिये तो क्यों बन रहे हैं मुस्लिम नौजवान आतंकवादी..? क्या अन्याय हुआ है पिछले सालों में मुस्लिम समुदाय के साथ? क्यों मुस्लिम समुदाय बाकी देश की तरह मॉल संस्कृति में रचने-बसने के बजाय अपने धर्म में और अधिक क्यों धँसता जा रहा है?.. जवाब शायद धर्म की इस परिभाषा में है…

धार्मिक पीड़ा, वास्तविक पीड़ा की ही एक अभिव्यक्ति है.. और धर्म सताये हुये लोगों की एक कराह है.. धर्म हृदय हीन संसार का हृदय, आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा.. और अन्त में जनता की अफ़ीम है...




पढ़िये इसी विषय पर दो पुराने लेख:
चालीस कमीज़े खरीदने की बेबसी बनाम धर्म
किसे राहत दे रहा है ये न्याय

11 टिप्‍पणियां:

bhupen ने कहा…

कल जब बम धमाकों की ख़बर आई. एक टीवी पत्रकार किसी सीनियर वकील की बाइट ले रहा था. वो बार-बार वकील से कहलवाना चाह रहा था कि अब वकील धमाके के आरोपियों का केस नहीं लडेंगे. इस बात को सुनकर ही मुझे बेचैनी हो रही थी. क्यों कि मुझे आशंका है कि अब आतंकवादियों के नाम पर उनकी जगह निशाना कोई
और बनेंगे. आपने मेरी बात कह दी.

Gyandutt Pandey ने कहा…

आतंक की कायरता पर उसी स्तर की तल्खी दिखाओ, तो बात बने!
कायर अपराधी की सजा पूरे समाज को न दी जानी चाहिये। पर वह समाज उस कायर आतंकी से अपने को डिसोसियेट तो करे।
एक तुष्टीकरण सरकार कर रही है और एक आप लोग। आतंकवादी आप लोगों के ऐसे लेख पर बैंक करते होंगे!

अभय तिवारी ने कहा…

मैंने तो कहा है कि घोर निंदा करता हूँ.. पर आप को उस से संतोष नहीं! सारे लोग एक ही पक्ष को गरिया रहे हैं, मैं दूसरा पक्ष भी देख रहा हूँ तो आप को लग रहा कि मैं इकतरफ़ा बात कर रहा हूँ। आप किस स्तर की तल्खी से संतुष्ट होंगे? आप उस स्तर का लिख दीजिये और मुझ से साइन करवा लीजिये!
एक काम और कीजिये! देश में हर मुसलमान से कसम खिलवाइये कि अपने आप को आतंकवादियों से डिसोसियेट करता है!!
वो एसोसियेट करते हैं आप कैसे जानते हैं? मगर आप तो मोदी से खुल कर एसोसियेट करते हैं.. उस का क्या?

मीनाक्षी ने कहा…

हर तरफ यही माहौल !!!
डरी सहमी इंसानियत बदहवास है
गुम इंसान के भी होश हवास हैं !!

समय मिलने पर इस लिंक ज़रूर पढ़िएगा.

http://archive.gulfnews.com/articles/07/11/22/10169347.html

संजय बेंगाणी ने कहा…

भारत में कई वर्ग वास्तविक अल्पसंख्यक है. जैसे सिख, जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध. अन्याय मात्र मुसलमानो के साथ ही क्यों होता है? माना भारत में हिंसक, बर्बर हिन्दु बहुसंख्यक है मगर यहाँ तो पूरी दुनिया ही.... आखिर क्या बिगाड़ा है मासुम आतंकवादीयों ने?


जवाब मिले तो बताना, तब तक मासूमो को मनसिक खुराक पहूँचाते रहें. शुभकामनाएं. आपके पास प्रतिभा है, शब्द है, सदुपयोग होना चाहिए.

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

आतंकवादी कोई भी हो सकता है...आतंकवादियों की मदद कोई भी कर सकता है...हिंदू हो या मुसलमान...सवाल ये नहीं कि मुसलमानों से कसम खिलाना है या नहीं...इस बात की गारंटी भी नहीं कि कोई कसम खाने के बाद ऐसा काम नहीं करेगा...

सवाल केवल इतना सा है कि जिन्हें देशवासियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है, वे अपना काम कर रहे हैं या नहीं...आतंकवाद को रोकने के लिए जब कानून बनाने की बात आती है, तो ये क्यों मान लिया जाता है कि कानून मुसलमानों के ख़िलाफ़ रहेगा...या फिर ये कि देश की 'सेकुलर फैब्रिक' तार-तार हो जायेगी.

बाल किशन ने कहा…

आपका लेख बहुत ही विचारोत्तेजक है. मैं मिश्राजी की बात से सहमत हूँ.

मनीषा पांडेय ने कहा…

पश्चिम में आतंकवाद विरोध के नाम पर पूरी दुनिया के मुसलमानों के खिलाफ एक किस्‍म की साजिश भी चल रही है। जितने उत्‍साह से कूद-कूदकर अमरीका और यूरोपीय देश तसलीमा और सलमान रुश्‍दी को अपने यहां शरण देते हैं, वो सिर्फ लोकतंत्र में विश्‍वास और उसकी रक्षा की दिशा में उठाए गए कुछ जरूरी कदम भर नहीं हैं। ये सबकुछ एक सुनियोजित तंत्र के भीतर हो रहा है, जिसमें बड़े पैमाने पर ये फैलाने की कोशिश कि मुसलमान गैर-लोकतांत्रिक हैं, पिछड़े हैं, खराब हैं, आतंकवादी हैं, खेन के प्‍यासे हैं। बहुत से राजनीतिक और अर्थ से जुड़े पेंच हैं इसके भीतर, जिसे तीसरी दुनिया के देश वैसे ही देख और समझ रहे हैं, जैसाकि एक पॉपुलर पूंजीवादी मीडिया उन्‍हें दिखाता है। जैसाकि इराक युद्ध के समय हुआ था, जब टीवी के बहुत सारे चैनल सद्दाम की फांसी के बाद इराक के लोगों को खुशियां मनाते, मिठाई बांटते दिखा रहे थे। हिस्‍ट्री चैनल पर ऐसी कई टेलीफिल्‍म आईं, जो इराक में अमरीकी घुसपैठ के को न सिर्फ जस्‍टीफाई, बल्कि ग्‍लोरीफाई करती थीं।

मैं इस लेख के एक-एक शब्‍द से शतश: सहमत हूं। हम प्रिज्‍म जैसे बहुकोणीय और जटिल यथार्थ को एक सीधी पटरी जैसा समझकर उसका हल खोजना चाहते हैं। ये गलत तरीका गलत निष्‍कर्षों तक ले जाता है।

अनूप शुक्ल ने कहा…

एक कायर अपराधी की सज़ा एक पूरे समुदाय को मत दीजिये! सही है। ब्लाग और खूबसूरत लगने लगा पुलकोट लगाते ही।

संगम पांडेय ने कहा…

गाजियाबाद की सीबीआई अदालत में जब निठारी कांड के दोनों आरोपियों की पिटाई की गई थी, तब भी कानून व्यवस्था के हवाले से उस पिटाई को गलत ठहराया गया था। अब निठारी कांड पर चल रही सुनवाई की स्थिति यह है कि सबसे अहम गवाह वहां अपने बयान से मुकर चुका है, और एक दूसरा अहम गवाह संदिग्ध हालात में रेल पटरियों पर मृत पड़ा पाया गया है। इस देश में पुलिस,प्रशासन, अदालत के भ्रष्टाचार को कौन नहीं जानता। सवाल है कि ऐसे में अदालती न्याय पर ज्यादा भरोसा किया जाए, या लोगों की सहज बुद्धि पर। वैसे पिटाई मामले में न्याय व्यवस्था को जरूरी मानने वाले लोग ही शायद हैं, जिन्होंने अफजल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर उंगलियां उठाई हैं। एक बात और, आतंकवादियों की पिटाई की लखनऊ में हुई बिल्कुल ताजा घटना के बारे में यह तथ्य जानना शायद उपयोगी होगा, कि पकड़े जाने के बाद टीवी कैमरों के आगे अपनी योजना का वृत्तांत इन आतंकवादियों ने खुद कबूल किया था, जिसे सुनने के बाद अपने आसपास के हालात से दुखी किसी शख्स का गुस्सा सातवें आसमान पर जा ही सकता है। हालांकि आप जैसे लोग मान सकते हैं कि उन आतंकवादियों ने वह बयान पुलिस के दबाव में दिया होगा।

अभय तिवारी ने कहा…

संगम भाई..बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के सिर्फ़ एक बयान के आधार पर यदि ये मान भी लिया जाय कि वे सचमुच अपराधी थे..तो क्या आप इस पक्ष में हैं कि भीड़ को सजा देने का अधिकार है? भीड़ की भावनाएं आम तौर पर ८४ का दिल्ली, ९२ का मुम्बई और गोधरा-गुजरात जैसी अमानुषताओं में अभिव्यक्त होती हैं।
न्याय भावना प्रेरित नहीं हो सकता!

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