सोमवार, 5 नवंबर 2007

असल में क्या होती है लीला!

मेरा अपने आस-पास के जगत से कैसा रिश्ता है यह तय होता है इस बात से उस पल में अपने जगत में कितना धँसा हुआ हूँ मैं। दूर बैठकर ठोड़ी पर हाथ रखकर मनन करते रहने से पेड़, झाड़ी, गली-मकान भी दूर रहकर मनन मुद्रा बनाए रखते हैं। मगर जैसे ही विचारक को लंगड़ी मार कर खिलवाड़ के लिए उमड़ता हूँ, गली-मकान, पेड़-झाड़ी, स्कूटर-नाली का भी चरित्र बदल जाता है। क्यों, क्योंकर, किस तरह नहीं जानता पर अनुभव से जानता हूँ।

चलायमान हो जाता है सारा आस-पास, एक स्पंदन में धड़कने लगता है, जैसे जो गोशे चुपचाप अनजाने भाव में सिमटे-लिपटे पड़े थे अचानक एक परिचय की बयार में फड़कने लगे हों। खेलते हुए ये सारी भौतिक इकाईयाँ भी जैसे हमारे साथ एक खेल में शामिल हो जातीं हैं। जब इस खेल भाव से मैं उनके सम्पर्क में आता हूँ तो न तो बहुत गम्भीर होता हूँ न बहुत आह्लादित, न उनसे कुछ लेना चाह रहा होता हूँ और न कुछ देना। किसी मक़्सद किसी मंशा से उन भौतिक इकाईयों के सम्पर्क में नहीं आता; अपनी मौज में उनके क़रीब आता-जाता हूँ। जो आम तौर पर एक गेंद की शक्ल में यहाँ से वहाँ उछल-कूद कर रही होती है।

ये आम अनुभव है, सभी को होता है बचपन में और मेरे जिसे कुछ लोग जो बचपन में मनन के मारे जम के खेलने से रह गए, उन को अब भी होता है- खेलने के बचे हुए घण्टे पूरे करते हुए। इस सिलसिले के दौरान हम आस-पास के सभी पेड़, पत्थर, झाड़ी, दीवार, नाली, स्कूटर, साइकिल सभी के सम्पर्क में आते हैं।

इस अनुभव के दौरान एक और अनुषंगी अनुभव होता है। मैंने पाया है कि खेल शुरु होने के कुछ समय बाद ही ये सारी इकाईयाँ भी हमारे साथ खेल में शामिल हो जाती हैं- अपनी भौतिक सीमाओं के अन्दर रहते हुए। झाड़ी बहुत चाह कर भी अन्डर-आर्म बोलिंग नहीं कर सकती, मगर फ़ील्डिंग कर सकती है और करती है। कभी-कभी अपनी शानदार फ़ील्डिंग के मुज़ाहिरे पर दाद न मिलने या किसी दूसरी वज़ह से शैतानी भी करने लगती है। जैसे ही गेंद उसके पास आती है वह उसे लपक के अन्दर कर लेती है और वापस ही नहीं करती। अरे भाई साहब मैंने कितनी बार तो मोटरसाइकिल को गेंद को अपने पहियों के तीलियों में जकड़ के पकड़ते हुए पाया है और कितनी बार कार के अपने पेट के नीचे लुकाते हुए। नालियाँ भी कुछ कम पंगेबाज़ नहीं होती। गेंद को जैसे लील लेती हैं, फिर खोजते रहिये आप? अब ये पूरी तरह उनकी नाराज़गी के स्तर पर निर्भर होता है कि गेंद आप को वापस मिलेगी या नहीं मिलेगी।

मेरी ये बात उनको भी हवाई लग सकती है जिनके जीवन का मक़सद कुर्सी-बिस्तर और मकान-गाड़ी ही है। लेकिन जिन लोगों ने बचपन में अपनी न जाने कितनी गेंदे इस तरह से गँवाई हैं, वे मेरी बात समझेंगे। मैं तो आज तक गँवा रहा हूँ.. एक तो कल शाम को ही लील ली गई नाली द्वारा। जिस से खीज कर यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा हुई। और पोस्ट लिखते-लिखते ये समझ आई कि असल में क्या होती है लीला!

10 टिप्‍पणियां:

अनिल रघुराज ने कहा…

गेंदों से, झाडियों से...आसपास की चीजों से अंदर का रिश्ता ही बताता है कि हम कितनी भरीपूरी जिंदगी जी रहे हैं, नहीं तो सब प्राकृतिक तत्वों का खेल है जो हमें ठेले जा रहा है।

काकेश ने कहा…

पहले भी आपको जड़ में चेतन दिखे थे. आज भी.अच्छा है..कि आप खेल पा रहे हैं..आपके आसपास अभी भी झाड़ियां और नालियां हैं...!!

Pratyaksha ने कहा…

चीज़ों के गुम होने में भी एक कहानी छुपी होती है । कहीं पढ़ा था चम्मचों के गुम होने की , जैसे कि उनके गुम होने में उनका अपना कॉंशस हाथ हो । कोई चौथे डाईमेंशन में गायब हो जाने वाला गड्ढा जहाँ से गिर कर चीज़ें खो जाती हों ?

आभा ने कहा…

अक्सर गुम गेंद नालियाँ अपने दुलारों के लिए छिपा लेती हैं....
नाली ने बाल निगल लिया .....और झाड़ी ने छिपा लिया ...क्या बात है....अच्छा है...

Srijan Shilpi ने कहा…

लीला को महसूस करने का आनंद अलौकिक है। जो इसे महसूस कर पाते हैं वे धन्य हैं। उसे कहीं भी कभी भी महसूस किया जा सकता है, बशर्ते आप खुद भी उसमें खुशी-खुशी शामिल होने के लिए सहज भाव से तैयार हों।

अतुल ने कहा…

इस सिलसिले के दौरान हम आस-पास के सभी पेड़, पत्थर, झाड़ी, दीवार, नाली, स्कूटर, साइकिल सभी के सम्पर्क में आते हैं।

अतुल

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा आपने!!

गेंद को झाड़ी या नाली द्वारा लील जाना और इससे उपजी खीझ को समझ सकता हूं, क्योंकि किशोरावस्था आते तक यह अनुभव खूब मिला है!!

चंद्रभूषण ने कहा…

खेलों में हासिल किए गए अनुभव के आधार पर इस बारे में मेरी निजी धारणा यही बनी है कि प्रकृति में खोजने वाले और छिपाने वाले के बीच कोई अजीब उलझा हुआ सा रिश्ता है। पुराने खेलों गिट्टीफोर और गेनाभड़भड़ के अलावा क्रिकेट में भी ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। फेंकने या मारने में गेंद कहीं खो गई और खेलने वाले दस-बारह बच्चे एक छोटे-से तयशुदा दायरे में ही खोजते-खोजते हैरान होकर अपने-अपने घर चले गए। फिर अगले दिन या तीन-चार दिन बाद वहां टहलते हुए वही गेंद इतनी खुली जगह में इतने खुले ढंग से रखी हुई मिली कि यकीन ही नहीं हुआ। मैंने इसे इस तरह रेशनलाइज किया कि अकेला ही नहीं, सामूहिक दिमाग भी एक स्तर की खोजबीन के बाद बिल्कुल सामने पड़ी चीज को देखकर अनदेखा कर देता है। लेकिन अपने इस वितर्क से मैं संतुष्ट कभी नहीं हो पाया।...कहीं कोई है...श्शशश...

Udan Tashtari ने कहा…

बड़ा बहता और सहज लेखन है..वो नालियाँ तो याद में बसी हैं जो कितनी बॉलें खा गईं.

बोधिसत्व ने कहा…

मजा आया गुरुदेव.....मैं अक्सर मानस की गेंद खोज कर परेशान होता रहता हूँ.....

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