शुक्रवार, 2 नवंबर 2007

मँहगा होता मुम्बई

एक सवाल इस वक्त गर्मागर्म है कि क्या कारण है कि भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश के शहरों में ज़मीन/रियल स्टेट की कीमतें विकसित देशों की तुलना में भी ज़्यादा बढ़ गई हैं? (सिवाय न्यूयॉर्क जैसे एकाध शहर को छोड़कर)

यहाँ पर यह भी न भूला जाय कि अभी हाल ही में मुकेश अम्बानी बिल गेट्स जैसे दिग्गजों को पछाड़ते हुए दुनिया के नम्बर एक के रईस बन गए हैं जबकि विदर्भ और आंध्र प्रदेश के किसानों की आत्महत्या का ज़िक्र न करते हुए सिर्फ़ यह याद कर लिया जाय कि मुकेश बाबू अपने घर से कहीं भी आते-जाते मुम्बई की झुग्गी-झोपडि़यों के दर्शन की बीहड़ मार से अपने को नहीं बचा सकते!

यह सवाल फ़ाइनैन्शियल टाइम्स में लिखने वाले टिम हारफ़ॉर्ड के किसी पाठक द्वारा पूछे जाने के बाद इंडियन इकॉनॉमी ब्लॉग के नीलकान्तन के ज़रिये आप तक पहुँचा है। इन बन्धुओं के पास कोई सन्तोषप्रद जवाब नै है? आप के पास है?

6 टिप्‍पणियां:

Srijan Shilpi ने कहा…

लगभग डेढ़ साल पहले मैंने अपने इस लेख में उक्त सवाल पर विचार किया था और इस आलेख के संपादित अंश राष्ट्रीय सहारा में भी प्रकाशित हुए थे।

Debashish ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
बोधिसत्व ने कहा…

इस पर मुंबई के लेग क्यों चुप हैं.....

Debashish ने कहा…

रीयल एस्टेट की बढ़ी कीमतें कायम रहने के पीछे एक नहीं अनेक कारक हैं जिनमें भूमाफिया और बैंक जैसे अनेक लोग शामिल हैं। निरंतर पर इस लेख के प्रकाशन के एक साल बाद भी, तमाम आश्वासनों के बावजूद कीमतें नीचे नहीं आईं और बैंको ने भी नये लोन के झाँसों में ब्याज दर कम कर फिर से जाल बिछा दिये हैं। (posted again as the previous comment didn't show the link)

बेनामी ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
आशीष ने कहा…

महंगाई की मार मेरी जेब पर भी पड़ी है, घर के किराए से लेकर खाना तक महंगा हो चुका है, जब वेतन में कोई खास इजाफा नहीं

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