शनिवार, 28 जुलाई 2007

किसे राहत दे रहा है ये न्याय?

खुशी की बात ये है कि डॉक्टर हनीफ़ की रिहाई तय हो गई है.. पिछले एक महीने से उनके ऊपर आतंकवादियों की सहायता करने का गम्भीर आरोप था.. एक महीने तक उनका परिवार तथा पूरा भारतीय मुस्लिम समुदाय इस त्रासदी के दर्द को जीते रहे.. भारत की सरकार ने कन्सर्न ज़ाहिर किया और ऑस्ट्रेलियाई सरकार की तरफ़ से की जाने वाली कार्रवाई की निगरानी रखने लगी.. मगर इस से ज़्यादा हमारी सरकार ने कुछ नहीं किया.. शायद कहीं डर रहा हो के कहीं सचमुच आतंकवादी न हो.. ? और ज़्यादा प्रतिरोध करने के चक्कर में दुनिया में अमरीका और देश के अन्दर की हिन्दूवादी जनता अपने खिलाफ़ न हो जाय..?

आज दुनिया में मुसलमान लगातार शक की नज़रों से देखे जा रहे हैं.. और ये घटना भी इसी का एक और उदाहरण थी.. इसलिये मुझे विशेष खुशी है कि डॉक्टर हनीफ़ छोड़े जा रहे हैं.. और इस के लिए मैं ऑस्ट्रेलियाई सरकार की न्यायप्रियता की प्रंशसा करता हूँ कि भले ही उन्होने शुरु में एक निर्दोष पर शक़ किया और उसे लगभग फँसा ही दिया.. फिर भी उन्होने आखिर में न्याय किया..

अब दुख मुझे इस बात का है कि याक़ूब मेमन को फाँसी सुनाई गई है..मेरे वरिष्ठ मित्र अनिल रघुराज ने भी कल इसके बारे में लिखा.. मैं नहीं जानता कि वो दोषी है कि नहीं.. लेकिन लगता नहीं कि एक मुजरिम मरने के लिए देश वापस आ कर आत्म समर्पण करेगा.. जबकि वो टाइगर मेमन की तरह देश से बाहर बने रह सकता था.. याक़ूब के अलावा उन सब मुस्लिम नौजवानों को फाँसी की सजा सुनाई गई है जिन्होने मुम्बई सीरियल बम धमाकों में बम रखने का काम किया.. इसे राष्ट्रद्रोह माना गया.. माननीय जज महोदय ने बम धमाकों के पहले की घटनाओं को नज़रअंदाज़ करके ऐसा फ़ैसला सुनाया है.. बहुत लोग मारे गए इन धमाकों में.. ठीक बात है.. उन के प्रति न्याय ये माँग करता है कि इन्हे फाँसी दी जाय..मगर क्या ये सिर्फ़ संयोग है कि मुम्बई दंगो की जाँच के लिए बैठाये गए श्रीकृष्ण आयोग द्वारा चिह्नित दोषी पुलिस अधिकारियों की नौकरी पर भी कोई आँच तक नहीं आई है, सजा-वजा तो दूर.. दंगो में मारे गए लोग क्या न्याय के अधिकारी नहीं होते?

क्या याकू़ब और दूसरे मुजरिमों को फाँसी दे कर बम धमाकों में मारे गए लोग पुनः जीवित हो जायेंगे..? या इन मुजरिमों के भीतर का राक्षस सुधरने के पार चला गया है इसलिए सिर्फ़ मार देने योग्य हैं.. ? मुम्बई की २६ जुलाई की बाढ़ में जिन लोगों की जान गई.. उस के लिए किस पर मुकदमा चलाया गया..? क्या उस के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं.. ? आप कहेंगे ये सब अमूर्त अपराध हैं.. ठीक.. भोपाल गैस ट्रैजेडी के लिए किसी को ज़िम्मेदार माना जायेगा..? यूनियन कारबाईड के जिस अधिकारी को माना गया उसके कितना पीछे पड़ी रही हमारी सरकार..? इन्दिरा गाँधी की मृत्यु के बाद देश भर में खास कर दिल्ली में सिखों के क़त्लेआम के लिए कोई ज़िम्मेदार..? या वह सिर्फ़ एक बड़े पेड़ गिरने का दोष है..? ये किस प्रकार का न्याय है.. मैं समझ नहीं पाता..? ये न्याय किसे बचा रहा है... किसे मार रहा है.. औए किसे राहत दे रहा है.. मुझे समझ नहीं आता?

अफ़ज़ल गुरु को फाँसी की सजा दे दी गई.. पूरा देश उस आदमी को सबसे बड़ा खलनायक मान रहा है.. क्यों..? क्योंकि उसने इस देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था संसद पर हमला करने की साज़िश रची.. उसने कोई हत्या नहीं की.. सिर्फ़ साज़िश रची लोकतंत्र के खिलाफ़...किस लोकतंत्र के खिलाफ़.? उस लोकतंत्र के खिलाफ़ जो साठ साल से कश्मीर में उसके लोगों का लोकतांत्रिक हनन कर रहा है.. वैसे लोकतंत्र के प्रतीक पर हमला करने की साजिश रची.. तो..? क्या आप को इस लोकतंत्र से कोई शिकायत नहीं..? क्या अफ़ज़ल गुरु और याक़ूब मेनन का अपराध सिर्फ़ यह है कि वे इस देश काल में मुसलमान हैं.. ?

8 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

श्रीकृष्‍ण कमीशन ने बहुतों को चिन्हित करके सज़ा सुनाया. सुलेमान उस्‍मान बेकरी और हरी मस्‍ज़ि‍द पर बिना प्रोवोकेशन के फ़ायरिंग के लिए क्रमश: आरडी त्‍यागी व निखिल कापसे दोषी ठहराये गए. बाल ठाकरे, मधुकर सरपोतदार, गोपीनाथ मुंडे, राम नाईक सबको श्रीकृष्‍ण आयोग ने दंगा उकसावे का दोषी बताया था, महाराष्‍ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार के दौरान सारे दर्ज़ मामले सरकार ने हटवा लिए थे. कांग्रेस की सरकार में वापसी के बाद उनमें से कोई फ़ाईल दुबारा खोलने की ज़रूरत नहीं महसूस की गई. कोई कहता और समझता है कि मुसलमानों के साथ इस मुल्‍क में न्‍याय है तो वह पहले इस फांस को समझाये, साफ़ करे!

चंद्रभूषण ने कहा…

अल्पसंख्यकों के लिए भारत में रहना अस्सी के दशक से ही तलवार की धार पर चलने जैसा है लेकिन अब हमलावर मीडिया के जमाने में यह देश दिनोंदिन उनके लिए और भी खतरनाक होता जा रहा है। आक्रामक तेवरों वाले बदमाश लोग अभी के माहौल में यहां जो चाहें वह कर सकते हैं- और सरकार किसकी है, इससे उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। अदालत की ऊंची कुर्सियों पर बैठकर हवा के मुताबिक पीठ देने वाले मामूली लोगों की तो बात ही छोड़िए, आंदोलनों में तपकर निकले मजबूत लोगों के तर्क भी इन चीखती आवाजों के सामने भोथरे पड़ने लगते हैं। 1993 के बम विस्फोटों के वास्तविक या कथित दोषियों को सजा सुनाए जाने के समानांतर श्रीकृष्ण आयोग की रपट सार्वजनिक करने और उसमें चिह्नित किए गए दोषियों पर मुकदमा चलाने की मांग यदि पूरे देश में जोर नहीं पकड़ती तो आगे न्यायिक और दूसरे मंचों से तमाम तार्किक आवाजों के लिए स्थितियां और भी भयानक बनेंगी।

अनामदास ने कहा…

हनीफ़ का गुनाह ये था कि उन्होंने अपना सिम कार्ड किसी को दिया था. पिछले एक साल में यह गुनाह तीन बार मैं भी कर चुका हूँ, मुझे पता नहीं कि उन सिम कार्डों से कोई क्या कर रहा है.(भाई ब्रिटेन में अभी तक को नियम क़ानून नहीं है, सिम कार्ड की खुली बिक्री होती है.) दुनिया के पौने दो अरब मुसलमानों एक रंग में पोतने के ख़िलाफ़ एक ग्लोबल मुहिम चलाने की ज़रूरत है. अगर नहीं संभले तो ठीक-ठीक सोचने वाले साधारण आदमी को ये रवैया आतंकवादी बनाकर छोड़ेगी. डॉक्टर हनीफ़ की रिहाई वाक़ई ख़ुशी की बात है, मुद्दा आपने बहुत बड़ा और सेट करके छेड़ा है...लोकतंत्र, अल्पसंख्यक, सरकार, कश्मीर...सबको सही परिदृश्य में छेड़ा है. इन मुद्दों का जवाब देशभक्ति की कोरी भावुकता से नहीं बल्कि निर्मम विश्लेषण से मिलेगा. धन्यवाद

afjal husain ने कहा…

तिवारी जी
सिर्फ तिवारी होने के नाते अगर आपकी तुलना मैं अमर मणि त्रिपाठी या हरिशंकर तिवारी या किसी और ऐसे व्यक्ति से करूं तो क्या आप पसंद करेंगे? क्या सिर्फ इसलिए सारे तिवारियों के सारे जघन्य अपराध माफ़ कर दिए जाने चाहिए कि आप तिवारी हैं? नहीं न । असल में डाक्टर हनीफ़ और मेमन या या अफ्ज़ाल गुरू को एक ही पल्दे पर तुलना ऎसी ही गलती है । यह एकदम ऐसी ही गलती होगी जैसे मैं यह कहूं कि चूंकि मेरा नम अफजल है और मैं निरपराध हूँ, इसलिए अफजल नाम के सरे लोगों या मुसलमानों को बेगुनाह माना जाए और उन्हें माफ़ कर दिया जाए । कहॉ तो अफजल गुरू को फांसी न होने के लिए सर्कार की खिंचाई होनी चाहिए और कहॉ आप उल्टे उसकी तरफदारी कर रहे हैं । मैं नहीं जानता कि आप किस पार्टी के झंडाबरदार हैं, लेकिन इतना जानता हूँ कि हिंदुस्तान में मुसलामानों की जो दुर्गति है उसके बडे कारण आप जैसे धर्म निरापेक्षतावादी ही हैं । मुसलामानों पर यह झूठी हमदर्दी अगर आप न जटाएं और अफजल गुरू और मेमन जैसों को फांसी पर चढ़ने ही दें तो मुसलामानों पर आपका बड़ा करम होगा । हनीफ़ पर आयी मुसीबत कि वजह कुछ और नहीं अफजल और मेमन जैसे शैतान ही हैं । और शैतान सिर्फ शैतान होता है, उसे हिंदु या मुस्लमान के तौर पर न देखें तो बेहतर होगा ।
अफजल हुसैन

तनु तिवारी ने कहा…

मैं यहाँ की गई अफ़ज़ल खान की प्रतिक्रिया से कुछ हद तक सहमत हूँ..कि जिसने गुनाह किया उसे सजा मिलनी चाहिये बिना ये सोचे कि वह हिन्दू है या मुस्लिम.. हनीफ़ तो निर्दोष हैं इस पर कोई बात नहीं..याक़ूब मेमन और अफ़ज़ल गुरु ने जो भी गुनाह किया है वो फ़ाँसी की सजा देने योग्य है.. मैं ऐसा नहीं समझती..
दूसरी बात मुसलमानो पर लगातार जो शक किया जा रहा है उस के लिए जितनी सरकारें ज़िम्मेदार हैं उतने ही आतंकवादी ज़िम्मेदार हैं..उनके कारनामों की वजह से मासूम लोगों पर शक किया जाता है..
और आखिरी बात कि सरकार का ये जो न्याय दिखाई दे रहा है ये न्याय नहीं है.. दोगली राजनीति है..सरकार एक खास तबके को अपीज़ कर रही है.. और अपना खास एजेण्डा ले कर चल रही है.. उनका इस के पीछे का मोटिव न्याय से कहीं जुड़ा नहीं है..

अभय तिवारी ने कहा…

मियाँ अफ़ज़ल हुसेन.. मेरा इरादा कतई अफ़ज़ल गुरु या याक़ूब मेमन को बेगुनाह साबित करने का नहीं है.. हनीफ़ के साथ उन का नाम लेने के पीछे मेरा एक तर्क है.. जिसे शायद मैं ठीक से नहीं सामने ला पाया..
वो तर्क न्याय से जुड़ा तर्क है.. और न्याय करते समय जाने अनजाने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण अपनाने का है..और कुछ अपराधियों के साथ रहम दिली, उपेक्षा और कुछ मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप करके बचाव तक का हो.. और मुसलमान मुजरिमों के साथ इस तरह की सख्ती बरती जा रही हो और न्याय की कठोरता याद दिलाई जा रही हो.. तो समझदार आदमी को चाहिये कि गौर से देखे कि मामला क्या है.. ?
और आप को इतना मुक्त भी न हो जाना चाहिये कि आप गैर साम्प्रदायिक होने के नाम पर समाज में व्यवहार की जा रही सक्रिय साम्प्रदायिकता को पहचानने की नज़र भी खो बैठे..
आखिर में एक छोटी सी बात आप को बताना चाहूँगा कि अफ़ज़ल के हिज्जो में ज नहीं ज़ का का इस्तेमाल होता है.. माने आपने अपने नाम को यूँ लिखा है.. afjal.. जबकि होना चाहिये.. afzal.. आगे ख्याल रखियेगा.. कि जब मुसलमानों का नाम ओढ़ कर कोई हिन्दूवादी तर्क प्रस्तुत करना हो तो ऐसी ग़लती न हो..

सर्जक ने कहा…

अभय जी,
जिस लोकतंत्र को बचाने को हो-हल्‍ला किया जाता है वह लोकतंत्र किसका है, इसमें लोक तो कहीं नजर ही नहीं आता, नजर आता है तो केवल धन, यानि धनतंत्र। और जिन साथियों अफजल की फांसी का पक्ष लिया है वे जाएं कश्‍मीर में मुसलमानों पर हो रहे अत्‍याचार को खुद देखें वैसे इसकी खबर भी कभी-कभार मीडिया में आ ही जाती है। और आतंकवादी के खिलाफ विश्‍वव्‍यापी मुहिम चलाने वाले अमेरिका के बारे में आपका क्‍या विचार है क्‍या अमेरिकी व्‍यवस्‍था को ही कब्र में नहीं दफना दिया जाना चाहिए जिसने अपने फायदे के लिए लादने और सद्दाम को डॉलर से लेकर हथियार तक की मदद की लेकिन जब वे उसके काम के नहीं रहे तो वे आतंकवादी हो गए और क्‍या इराक - अफगानिस्‍तान पर अमेरिकी हमला जायज था क्‍या ये आतंकवाद के खिलाफ था या तेल या सामरिक फायदे के लिए। खैर, आतंकवाद वाकई में समस्‍या का हल नहीं है लेकिन हमे यह भी सोचना चाहिए कि आतंकवाद की जड़ क्‍या है। केवल याकूब मेमन और अफजल को फांसी देना समस्‍या का समाधान नहीं बल्कि असली समस्‍या से ध्‍यान हटान है। आप लोग किसी के भी विचार व्‍यक्‍त करने पर उसे किसी पार्टी या विचारधारा से जोड़ लेते है। अभय जी के बारे में भी आपको ऐसा ही कोई संदेह है, लेकिन मैं पूछता हूं आप किस पार्टी से हैं, किसी हिंदूवादी पार्टी से तो नहीं। और हां, बेहतर होता आप अभय जी के राजनीतिक जुड़ाव का सवाल उठाने के बजाय उनके विचारों की आलोचना करते। भोपाल गैस कांड जैसे कितने ही मामलों में कुछ नहीं हुआ उस पर आपको कोई दिक्‍कत नहीं है, लेकिन अफजल को फांसी देना आपको उचित लगता है।

Reyaz-ul-haque ने कहा…

शायद हां, अभय जी...

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