शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

साथ



सतीश के घर से लौटने के अगले तीन दिन तक अजय और शांति में अबोला बना रहा। झगड़ा ऐसी बात को लेकर हुआ था जिसका उनके निजी जीवन से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था। सतीश की बिटिय़ा के जन्मदिन के बहाने बड़े दिनों बाद ऐसा मौक़ा आया था कि तीन लंगोटिया यार अजय, मुकुल और सतीश एक साथ जुट पाए थे। अंशुला के नाम का केक कटने, हैपीबर्थडे गा लेने और बच्चों की फ़रमाईश पर गुब्बारे फोड़-फाड़ चुकने के बाद यारों की असली महफ़िल की शुरुआत हुई। बच्चों से छिपकर जाम बनाए गए और बीवियों से छिपके चुस्कियाँ ली गईं। पहले चुटकुले सुनाए गए, फिर पुरानी गुदगुदी यादों से दिल को बहलाया गया। पर क्रिकेट में हार और बेईमानी की मार पर बातचीत का तबादला होते देर नहीं लगी। उसके पहले तक सतीश का घर तीन भागों में बँटा हुआ था- पहला तो वही जिस बैठक में यारों की तिकड़ी जमा थी, दूसरे बच्चों की रेलमपेल वाला कमरा और इन दोनों सीमाप्रदेशों के बीच तीसरा था रसोई और डाइनिंग टेबल का सम्मिलित प्रभाग, जिसकी और जिसमें शांति, सीमा और प्रभा की आवाजाही हो रही थी। जब बहस शुरु हुई तो दलील की लहरों के साथ एक-एक करके तीनों महिलाएं बैठक के तट पर आ लगीं।

'ये सब सोची-समझी नौटंकी थी', सतीश ने हिकारत से कहा, 'उनको बिल पास करना ही नहीं था..'
सतीश की बात सुनते ही मुकुल अपनी जगह बैठे-बैठे ही सर हिलाने लगा, 'नहीं-नहीं! ये तू ग़लत बोल रहा है.. आधी-आधी रात तक लगे पड़े रहे लोग और तू कह रहा है कि बिल पास नहीं करना था.. '
'बिल्कुल नाटक था.. जनता को मूर्ख बनाने के लिए..', सतीश तरंग में आ चुका था और मुकुल के सामने खड़े होकर नेताओं की नक़ल उतारते हुए हाथ लहरा-लहरा कर कहने लगा, 'देखो भैय्या हम तो बड़े भोले हैं.. हम तो रोकना चाहते हैं भ्रष्टाचार, लाना चाहते हैं लोकपाल, पर विपक्ष हमें लाने ही नहीं दे रहा..अब बताओ हम क्या करें?'
सतीश की भड़ैती से मुकुल भी भड़क गया, 'तो इसमें क्या गलत है.. यही तो हो रहा है..विपक्ष ने पहले कहा कि हम साथ देंगे और ऐन मौक़े पर गच्चा दे दिया.. जनता के साथ असली गद्दारी तो आपके विपक्ष ने की है.. वो हमेशा के गद्दार हैं..'
'अच्छा और तू जिनका साथ दे रहा है वो दूध के धुले हैं.. साठ साल से वही तो लूट रहे हैं.. ' सतीश और तैश में आ गया।
'माना.. लूट रहे हैं.. पर लूट बंद करने का क़ानून भी तो वही ला रहे हैं.. जिसे लाने नहीं दिया गया..'
'किसने मना किया लाने को.. लाओ.. बिलकुल लाओ.. किसने रोका है.. ' इतना कहकर सतीश ने अपने हाथ के गिलास को होठों से लगाके मुँह में उल्टा लिया पर गिलास ख़ाली था।
'एक मिनट रुक.. पेट्रोल ख़तम हो गया.. रुक.. मैं रिफ़िल लेके आता हूँ', सतीश कोने में जाके अपना इन्तज़ाम करने लगा।
अब अभी तक मौन अजय की बारी थी, 'वैसे वो नहीं ला रहे थे क़ानून.. उन्हे मजबूर किया गया ये क़ानून लाने के लिए.. "
अच्छा!? तुम्हे लगता है सरकार को कोई मजबूर कर सकता है?', मुकुल ने तंज़ किया।
'किया न.. '
जो सरकार बम-गोले लेके युद्ध करने वालों के हाथों मजबूर नहीं होती वो अनशन करने से मजबूर हो जाएगी..? क्या बकवास कर रहा है यार..'
बकवास नाम सुनते ही अजय को भी आग लग गई, 'मेरी बात तुझे बकवास लग रही है..? लंगोटी वाले फ़कीर ने लाल वर्दी वाले साम्राज्य को हिला के रख दिया था.. और किसी बमगोले से नहीं.. उपवास और अहिंसा की शक्ति से..'
'और बकवास किए जा रहा है तू.. अंग्रेज़ क्या गाँधी जी की वजह से देश छोड़कर गए.. दूसरे विश्वयुद्ध में उनकी बैण्ड बज गई थी.. इसलिए गए..'

इसके बाद बहुत देर तक बहस गांधी, उपवास, सदाचार और भ्रष्टाचार के मुद्दे के गिर्द उमड़-घुमड़ करती रही। शांति समेत दूसरी महिलाओं ने अपनी राय को सदन के पटल पर रखना चाहा पर उनकी बात सदन के हंगामें में हवा हो गई। बच्चे अपने खेल-वेल छोड़कर पापाओं के पौरुष को देखने के लिए इकट्ठा हो गए। अजय नेता विपक्ष की भूमिका में था और सतीश उसके मुखर समर्थक के किरदार में लगातार आवाज़ बुलन्द कर रहा था। मुकुल सत्तापक्ष में अकेले पड़ गया था और सत्ता उससे सम्हल नहीं रही थी। तो मुकुल ने अपने पक्ष में मज़बूती लाने के इरादे से महिलाओं पर नज़र डाली और सबसे पहले शांति पर निशाना साधा-
'अच्छा शांति भाभी आप बताइये.. आप क्या कहती हैं.. क्या उन्हे अनशन करना चाहिये था?'
बहस कई मंज़िलों-मक़ामों से गुज़रकर अनशन पर आ ठहरी थी।
शांति की राय स्पष्ट थी पर वो स्थिर नहीं थी, '..मेरी समझ में उन्हे इस बार अनशन नहीं करना चाहिये था..'   
'क्या बात कही भाभी.. यही तो मैं भी इतनी देर से इस गधे को समझाने की कोशिश कर रहा हूँ पर इसके भेजे में जा ही नहीं रहा.. अबे घोंचू! तुझसे समझदार तो तेरी बीवी है...'
मुकुल के ये शब्द अजय के दिल में तीर की तरह चुभ गए। पर अजय ने उस से कोई ज़्यादा अहमियत नहीं दी। वो शांति की ओर सन्न होके देखता रहता जैसे शांति ने उसका कोई बड़ा गहरा अपराध कर डाला हो क्योंकि उसको उम्मीद थी कि शांति उसी का पक्ष लेगी..
'क्यों.. क्यों नहीं करना चाहिये था अनशन?', अजय ने दागा।
'इसलिए कि जो मूल माँगे थी वो तो मान ही ली गई थीं.. और आप संसद पर कुछ थोप थोड़ी सकते हैं.. वहाँ क़ानून बनने की एक... ' शांति कहती गई पर अजय के ज़ेहन में कुछ भी दर्ज़ होना बंद हो चुका था। और भी बहुत कुछ कहा-सुना गया पर अजय के दिल में शांति के उसके विरोध पक्ष में जाने की बात धंस कर रह गई। सबके सामने कुछ बोला नहीं और अपनी भावना को ज़ब्त किए रहा लेकिन कार के चलते ही वो शांति पर बरस पड़ा।
'ऐसे बड़ा आन्दोलन-आन्दोलन करती हो पर जब मौक़ा आया तो धोखा दे दिया..?'
अरे..?! मुझे जो ठीक लगा मैंने कहा.. और मुझे अपनी राय बदलने का हक़ है..' पहले चौंकने के बाद शांति ने अपनी सफ़ाई देनी चाही।
अच्छा.. तो क्या पति बदलने का भी हक़ है.. मेरी बीवी होके तुम मुकुल का साथ दे रही थीं?'
इस तरह की बेतुकी बात सुनते ही शांति एक पल के लिए हकबका गई। और उसके बाद अजय घर लौटने तक लगातार जो बकता रहा वो सब सुनना शांति के लिए लगभग असहनीय था। वो इस बात पर हैरान थी कि अजय जैसा पति उससे भी उससे सिर्फ़ एक समर्थक भर होने की उम्मीद करता है- जैसे शांति का कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व, कोई स्वतंत्र सोच हो ही ना!? वो नशा था, क्रोध था या अस्थायी पागलपन था- जो भी था शांति को बिलकुल नापसन्द था और पूरी तरह अस्वीकार्य था।

इसीलिए जब अगली सुबह नशा उतरा और अजय ने अपनी तरफ़ से बोलचाल में कोई दिलचस्पी न दिखाई तो शांति ने भी एक उदासीनता का चोला पहन लिया और तब तक पहनी रही जब तक अजय, तीन दिन गुज़र जाने के बाद, सामान्य बरताव पर कुछ इस तरह लौट आया जैसे कुछ हुआ ही न हो। शांति ने भी बीती बात को कुरेदना ठीक नहीं समझा, ये जानकर भी कि वो बात किसी दबी हुई चिंगारी की तरह उनके सम्बन्ध में सुलगती रहेगी।

***

(८ जनवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई) 


बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

दाता

इतवार का दिन था। कई दिनों के कोहरे के बाद कुनमुनी धूप निकल कर आई थी। साढ़े-दस ग्यारह बजे की मुतमईन घड़ियों में बच्चे और नौजवान जहाँ जगह मिले खेल रहे थे। प्रौढ़ और वृद्ध घरों के बाहर कुर्सियां डाल के पड़े हुए थे या बेवजह ही छायाओं की अवहेलना करते हुए धूप के आगे   चहलकदमी कर रहे थे। मगर शांति धूप की अवहेलना करते हुए एक बंद कमरे की घुटी हुई हवा में पुराने सामान को उलट-पुलट रही थी। एक तरफ़ बड़ी सी अलमारी की छोटी-छोटी दराज़ों में पुराने फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी रेकार्डस और ऑडियो कैसेट्स थे। दूसरी दीवार के सहारे लगी रैक्स में रीडर्स डाइजेस्ट, सारिका और माधुरी जैसी पुरानी पत्रिकाओं के अंको के ढेर लगे हुए थे। तीसरी और चौथी दीवार के सहारे अलग-अलग चट्टों में इब्ने सफ़ी, ओमप्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत के उपन्यास बेतरतीब अन्दाज़ में उपेक्षित से पड़े हुए थे। हालांकि जिस मोटाई की धूल हर साज़ों- सामान पर पसरी हुई थी, वो किसी को भी उपेक्षित का दर्ज़ा दिलाने के लिए पर्याप्त थी।

'कैसा लग रहा है आप को?' शांति से यह सवाल पूछा आत्माराम जी ने। शांति ने दराज़ में क़ैद कैसेट्स में फंसी अपनी नज़र निकालकर आत्माराम जी को देखा। वो अपनी लहराती सफ़ेद दाढ़ी और मुस्कराती आँखों के वेश में किसी प्राचीन ऋषि जैसे लग रहे थे। उस कमरे और उसमें मौजूद हर असबाब के स्वामी आत्माराम जी ही थे। जिन्होने अपरिग्रह या वैराग्य जैसी किसी भावना से  प्रेरित होकर अपने उस प्रिय और प्राचीन संग्रह को दान करने का इरादा कर डाला था। और उस  इरादे को एक रंगीन कागज़ की शकल में सोसायटी की हर इमारत की नोटिस बोर्ड में चिपका दिया था। शांति आत्माराम जी को पहले से नहीं जानती थी- वही नोटिस पढ़कर आई थी। और अब उस से आत्माराम जी ने पूछा था कि कैसा लग रहा है उसे। 'उनके संग्रह को देखकर' का वाक्यांश उन्होने कहा नहीं था पर वो सवाल में अन्तर्निहित था।
'अच्छा लग रहा है..' शांति ने कहा। पर वो और कह भी क्या सकती थी।
'पर आप ये सब दे क्यों रहे हैं..?' शांति ने पूछा।
'अब क्या होगा इस सब कबाड़ का.. पड़ा-पड़ा धूल खाता रहता है बस', आत्माराम जी को पत्नी सुमित्रा देवी कमरे में चली आईं थीं। और उनके हाथों में एक ट्रे ही जिसमें ग़ज़क, चिक्की और तिल के लड्डू थे।
'लो खाओ!', उन्होने ट्रे शांति के आगे कर दी।
'नहीं-नहीं.. मैंने अभी नाश्ता किया है।'
'तो क्या हुआ.. ये तो नाश्ते के बाद खाने की चीज़ है..लो खाओ!', सुमित्रा देवी के स्नेहिल आग्रह के आगे शांति को झुकना ही पड़ा।
'मुझे जो पढ़ना था, पढ़ चुका.. सुनना था, सुन चुका.. अब दूसरे लोग इसका सुख लें.. इसी कारण मैंने  इन्हे दान करने का फ़ैसला किया..'
दान करने का भी सुख होता है.. आप को कैसा लग रहा है' शांति ने पूछा।
'अच्छा लग रहा है..', आत्माराम जी अपने सुख की गहराई से मुसकराए।

जब तक यह बात हो रही थी, सुमित्रादेवी ने गुड़ की ग़ज़क की पूरी पट्टी अचरज के मुँह में ठूँस दी। अचरज भी आया था शांति के साथ। आया क्या था, घसीटकर लाया गया था, वो तो धूप में अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता था पर शांति ही उसे किताबों और संगीत की दुनिया से एक क़रीबी रिश्ता बनाने की नीयत से खींच लाई। आया गया था तो वो भी कुछ अलट-पटल कर देख रहा था, हालांकि उसके मतलब की चीज़ें थी नहीं वहाँ पर। शांति को भी अपने मतलब की चीज़ें कम ही दिखीं। रेकार्डप्लेयर न होने के कारण रेकार्डस तो किसी काम के थे नहीं और कैसेट्स भी अधिकतर उसकी पसन्द के नहीं थे। पर फिर भी बचपन में सुने गानों को फिर से सुनने के चाव से उसने कुछ कैसेट्स अलग कर लिए।

'एक व्यक्ति के लिए पाँच आईटम से ज़्यादा नहीं..' आत्माराम जी ने स्थिर स्वर में कहा।
'जी?!', शांति थोड़ा हड़क गई।
'मैं चाहता हूँ कि मेरा संग्रह अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे..'
'अच्छा ख़याल है.. पर मुझे बस यही दो चाहिये..'
कैसेट्स के कवर पर पंकज मलिक और सी एच आत्मा को देखकर आत्माराम जी के चेहरे की लकीरों में विछोह के दर्द की तस्वीर बन गई।
'तो ये दोनों जायेंगे..! ?'
उनकी आवाज़ को सुनकर शांति को लगा कि शायद वो उन्हे देना नहीं चाहते..
'अगर आप इन्हे रखना चाहें तो..'
'नहीं-नहीं.. आप लेके जाइये.. बस इस रजिस्टर में अपना नाम-पता लिख दीजिये..'
'जी?' शांति को समझ नहीं आया..
'अगर कभी मुझे इन्हे सुनने का मन किया तो मुझे पता रहेगा कि ये कहाँ हैं..'
'..ओके..' शांति अटपटा के बोली।

शांति जब अपना नाम दर्ज़ कर रही थी, आत्माराम जी ने कैसेट्स के भीतर एक मोहर मार दी- जिस में उनके नाम व नम्बर के अलावा सप्रेम भेंट भी छपा हुआ था। शांति को लगा कि वो किसी लेण्डिंग लाइब्रेरी में चली आई है।
'मैं यह ले लूँ अंकल?' अचरज एक पुराना ध्वस्त सा एलबम हाथ में लेके खड़ा था।
'अरे ये.. ये तो मेरा स्टैम्प कलेक्शन है..' आत्माराम जी ने विकलता से कहा।
'ले लो बेटा ले लो.. इनके किसी काम का नहीं.. ले जाओ!', सुमित्रा जी ने साधिकार कहा तो अचरज की बाँछे खिल गई। लगभग अनमने से आत्माराम जी ने अपने रजिस्टर में उस एलबम के आगे अचरज का नाम दर्ज़ कर लिया। उनके घर से निकल कर अचरज काफ़ी प्रसन्न था। वो एलबम लेके सीधे घर जाने के बजाय घास में खेल रहे अपने दोस्तों के बीच दौड़ गया और उत्साह से उन्हे अपनी नई निधि दिखाने लगा।
**
तीन दिन बाद। शाम को जब शांति घर से लौटकर साँस ले रही थी तो अचानक आत्माराम जी चले आए.. कहने लगे- 'पंकज मलिक सुनने का मन कर रहा था..'
शांति और कर ही क्या सकती थी.. उनका कैसेट था.. उन्होने दिया था.. वही माँग रहे हैं.. कोई कैसे ना कर सकता है.. देना ही पड़ेगा। शांति ने चुपचाप ला के दोनों कैसेट उन्हे थमा दिए। शांति को उम्मीद थी कि वे सी एच आत्मा के कैसेट को लौटा देंगे.. पर वे कुछ नहीं बोले। हाथ में दोनों कैसेट थामे-थामे उन्होने पूछा- 'अचरज नहीं दिख रहा.. ?'
'वो अपने एक दोस्त को आपका एलबम दिखाने गया..',  शांति की उम्मीद फिर ग़लत साबित हुई- उसने सोचा था कि वे ख़ुश होंगे पर वे तो विकल हो गए।
'दोस्तों को.. ? वो स्टैम्प्स बाँट तो नहीं रहा न.. '
'पता नहीं.. मैंने पूछा नहीं.. '
'नहीं.. उसमें कुछ स्टैम्प्स हैं जो मैं अपने पोते को देना चाहता हूँ.. बहुत दुर्लभ स्टैम्प्स हैं.. '
उनके बेचैनी देखकर शांति को कहना ही पड़ा कि अचरज के आते ही वो उसे एलबम के साथ उनके घर भेज देगी। इस आश्वासन के बाद आत्माराम जी अपनी बूढ़ी काया को लिए-लिए सीढ़ियाँ उतर गए।

लौटकर आने पर अचरज ने बहुत हाथ-पैर फेंके कि एक बार दे दिए जाने के बाद वो एलबम उसका हो चुका है पर शांति ने उसे डाँटकर चुप करा दिया। अगले दिन अचरज को भारी मन से उस सप्रेम भेंट को भी उनके घर पहुँचाना पड़ा। उसके नन्हे हाथों के मुक़ाबले एलबम पर आत्माराम जी की पकड़ अधिक बलवती थी।

***

(इस इतवार को दैनिक भास्कर में शाया हुई) 


बृहस्पतिवार, 22 दिसम्बर 2011

यमदूत



गाँधी जी ख़ुद एक वकील थे पर वो वकालत के पेशे को बड़ा बुरा समझते थे। उनका मानना था कि वकील झगड़ा निबटाने के बदले झगड़ा बढ़ाने का काम करते हैं, लोगों को चाहिये कि अदालत न जायें और अपना झगड़ा आपस में ही निबटा लें। शांति ने उनकी किताब हिन्द स्वराज पढ़ रखी थी। शांति को ठीक-ठीक याद नहीं पर मोटे तौर पर उसमें गाँधी जी वकीलों से भी ज़्यादा बुरा पेशा डॉक्टरी का लिखते हैं और अस्पतालों में पाप की जड़ होने की बात करते हैं। उन दिनों शांति नौजवान थी और दुनिया के हर पहलू को आदर्श नज़रों से देखने की कोशिश करती थी। बचपन में एक दौर ऐसा भी था जबकि वह ख़ुद भी डॉक्टर बनकर बीमार-बेचारों की सेवा करना चाहती थी। इसीलिए गाँधी जी की ऐसी बातों को उसने, गाँधी जी के प्रति तमाम आदर व सम्मान के बावजूद, एक अतार्किक अनर्गल प्रलाप ही माना। बहुत समय बीत गया। धीरे-धीरे कई कड़वे-कसैले अनुभवों के संशोधनों का शिकार होके के शांति की आदर्शवादी दृष्टि आदर्शों के डेरे से बेघरबार होके दुनियादार हो गई। जीवन के बहुत से पहलुओं के प्रति उसका नज़रिया बदला। वो डॉक्टरों और हस्पतालों के बारे में अब क्या सोचती है वो बाद में बतायेंगे पर पहले वो घटना जिस से गाँधी जी दुबारा प्रंसग में आ गए।

इरफ़ान का छोटा भाई फ़रहान कई दिनों से हस्पताल मे भर्ती था। शांति मिलने गई। शबनम हस्पताल के बाहर ही मिल गई। शांति को देखकर शबनम मुसकराई ज़रूर पर आँखें उदास ही बनी रहीं। आँखों के नीचे झाईंयां पड़ी हुई थीं, शायद थकान और नींद न पूरी होने के चलते। शांति ने फ़रहान का हाल पूछा तो पता चला कि उसके पैंन्क्रियस में कुछ भयंकर संक्रमण हो गया है। एक के बाद एक कई ऑपरेशन हो रहे हैं पर डॉक्टर कुछ भी साफ़-साफ़ कहते नहीं। घरवाले उनकी इस चुप्पी से अपनी उम्मीद की डोर जोड़े हुए हैं।

शबनम ने हौले से उसे बताया कि उसके अपने अनुमान से बचने की उम्मीद बहुत कम है पर अगर वो कुछ बोलती है तो बुरी बनती है.. इसलिए चुपचाप जो हो रहा है होने दे रही है। बीस दिन से आईसीयू में पड़ा हुआ है। ऑक्सीजन की मशीन से लेके न जाने कितने तरह की मशीन के तार और ड्रिप जिस्म से जोड़ रखे हैं। सुबह-शाम टैस्ट हो रहे हैं। हर तीसरे-चौथे रोज़ कोई नई जटिलता पैदा हो जा रही है और नतीजे में एक और ऑपरेशन। ऐसे करते-करते चार ऑपरेशन हो चुके हैं। शबनम ने धीरे से बताया कि डॉक्टर्स ने फ़रहान के पेट को काटकर खुला छोड़ रखा है.. बार-बार चीरने और फिर सीने से बचने के लिए।

ग़लती से एक रोज़ फ़रहान के जिसम को उसी हाल में उसकी माँ ने देख लिया- पछाड़ खा के गिर पड़ीं। रो तो वो पहले भी रही थीं मगर तब से उनकी आँखों की गंगा-जमना बरसाती मिज़ाज की हो गई है। उनको हस्पताल लाने की मनाही कर दी गई है फिर भी वो ज़िद करके चली आती हैं और उन्हे सम्हालना एक अलग काम बना रहता है। और इरफ़ान के अब्बू तो एकदम ही चुप हो गए हैं- न तो कुछ बोलते हैं और न ही हस्पताल आते हैं बस घर पर बैठकर दीवारों को ताका करते हैं। अपने जवान बेटे की इस बीमारी ने उनके चेहरे पर कई सिकुड़नें बढ़ा दी हैं।

पूरा परिवार ग़मज़दा है और फ़रहान की जान के लिए पैसे की कुछ परवाह नहीं कर रहा। वैसे भी हस्पतालों में कोई मोल-भाव नहीं होता। जो रेट बोला जाय, भरना पड़ता है। आदमी अपने दिल के हाथों मजबूर होता है। कितने ही परिवार जो सालों तक पैसा काट-काट कर बचत करते हैं- इसी हस्पताल के चक्कर में सब कुछ न्योछावर करके नंगे हो जाते हैं। और जो बचत नहीं करते वो तरह-तरह के कर्ज़ों के जाल में पड़ जाते हैं। हस्पताल में किसी को रियायत नहीं मिलती। इरफ़ान और उसके परिवार वाले भी फ़रहान की जान के मोह में रोज़ाना पंद्रह से बीस हज़ार स्वाहा कर रहे थे।

शबनम ने कहा नहीं पर एक सच्ची सहेली होने के नाते शांति ने समझ लिया कि शबनम अपने देवर की बीमारी का सोग तो मना ही रही है पर उसके अलावा लगातार की भाग-दौड़ से बेहद थकी और परेशान भी हो चुकी है। परिवार वाले लगभग तीन हफ़्ते से अलग-अलग शहरों से आकर वहीं डेरा डाले पड़े हैं। दिन-रात घर और हस्पताल के बीच चक्कर मार रहे हैं। कुछ लोग तो हस्पताल के आस-पास ही कुछ भी खा-पी के काम चला रहे थे, फिर भी दस-बारह जनों के लिए शबनम सुबह-शाम खाना बना रही है। और उनके कपड़े भी धो रही है। क्योंकि इतने सारे अतिरिक्त काम को करने से शबनम की बाई ने करने से इंकार कर दिया। काम का बोझ उतना भारी नहीं था मगर पूरे परिवार में छायी मुर्दनगी का बोझ उठाना कहीं दुश्वार था।

और हुआ वही जिसे न तो डॉक्टर बता रहे थे और न घरवाले तस्लीम करने को राज़ी थे। तेईस दिन के हस्पताल वास के बाद हस्पताल वालों ने उनका बिल तैयार कर दिया। फ़रहान का लाइफ़सपोर्ट हटा लिया गया। संयोग से शांति उस वक़्त उनके साथ ही मौजूद थी जब मनहूस ख़बर आई और घरवालों में रोना-पीटना मच गया। शांति ने सबसे संयत होने के नाते काग़ज़-पत्तर का काम सम्हाल लिया। हस्पताल के काग़ज़ात पर फ़रहान की रूह ठीक उसी पल इस आलम से आज़ाद हुई थी। लेकिन अगर लाइफ़सपोर्ट को हटाते के बाद फ़रहान के फेफड़ों ने एक भी साँस नहीं भरी तो साफ़ है कि फ़रहान नहीं उसके बेजान जिस्म में ऑक्सीज़न फूँककर दिन-रात काटे जा रहे थे। ये कसरत घरवालों की 'हर कोशिश कर लिए जाने की तसल्ली' के लिए की गई थी या शुद्ध रूप से हस्पताल का मीटर चलाते रखने के लिए- उस ग़मगीन मौक़े पर यह सवाल पूछने का मन किसी घरवाले का नहीं था। शांति का मन ज़रूर था पर वो भी मौक़े की नज़ाकत को देखकर चुप रह गई। और सोचती रही कि उसी नज़ाकत का नाजायज़ फ़ायदा उठाते रहे हैं हस्पताल वाले।

शांति ने देखा कि फ़रहान का जिस्म आईसीयू से निकलने के साथ ही एक दूसरा बेहोश जिस्म उस कमरे में दाख़िल कर दिया गया। शांति को लगा जैसे कि फ़रहान की मौत का ऐलान करने के लिए वो उस कमरे के अगले किराएदार का इंतज़ार भर कर रहे थे। फ़रहान तो बहुत पहले ही मर चुका था। शांति को अचानक लगा कि वो हस्पताल, बीमारों के चंगा करके दुनिया में वापस भेजने से ज़्यादा उन्हे यमराज के पास भेजने का टोलनाका है। और डॉक्टर्स एक तरह के यमदूत हैं जो इन्सान को इस पार से उस पार भेजने का शुल्क वसूल करने का व्यापार करते हैं।

ये वो पल था जब शांति को बरसों पहले पढ़ी हिंद स्वराज की याद हो आई। और नौजवानी में जिस बात पर वो गाँधी जी से सहमत नहीं हो पाई थी, उस पल में उसे एक बार फिर गाँधी बाबा पर श्रद्धा हो आई कि उन्होने सौ बरस पहले ही इन यमदूतों के असली किरदार को पहचान लिया था।


***

(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी) 


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