सोमवार, 19 नवंबर 2007

सुन्दर होने का हक़

सुन्दर होने के हक़ पर विभेद नहीं है बहस इस पर है कि स्त्री-सौन्दर्य के दर्शन का अधिकार सभी को होना चाहिये या नहीं। एक पक्ष का प्रबल आग्रह है कि स्त्री सौन्दर्य का प्रदर्शन पुरुष आक्रमण को निमंत्रण है। और इसीलिए सौन्दर्य को ढका-छुपा कर रखना चाहिये। इस विचार में यह चिंतन आवृत्त है कि पुरुष अपनी पशु वृत्तियों का दास है और वह इतना सभ्य कभी भी न हो सकेगा कि स्त्री की इच्छा का सम्मान कर सके! इसलिए सभ्यता का रास्ता यह है कि पशु वृत्ति को उकसाने वाले विषयों को सामने से हटा दिया जाय और सिर्फ़ एक सुरक्षित वातावरण में ही खोला जाय!

दूसरा पक्ष यह कहता है कि स्त्री सौन्दर्य को दमित कर के हम किसी सभ्य राह पर आगे बढ़ सकेंगे इस में शंका है। सभ्यता की राह मुक्ति के आकाश के नीचे से जाएगी। किसी परदे भरी सुरंगो से नहीं। स्त्री और पुरुष को अपनी प्राकृतिक वृत्तियों को अभिव्यक्त करने का पूरा अधिकार दे कर ही हम और अधिक सभ्य और स्वस्थ बन सकेंगे। और सुन्दर होना तथा सौन्दर्य की प्रशंसा करना हमारी सहज वृत्ति है।

मगर उनका क्या जिन्हे युद्ध की कुरुपता ने विकल कर दिया..
तेईस साल के युद्ध के दौरान हज़ारो लैंडमाइन्स के जाल में फँसे अंगोला में ८०,००० लोग अपने एक भोले कदम की वज़ह से अपनी शारीरिक सम्पूर्णता से वंचित हो चुके हैं। इस समस्या पर ध्यानाकर्षण के लिए एक नॉर्वेजियन कलाकार ने एक सौन्दर्य प्रतियोगिता आयोजित की.. मिस लैंडमाइन.. ज़रूर देखिये यह लिंक।

7 टिप्‍पणियां:

Pratyaksha ने कहा…

हर कोई सुंदर दिखना चाहता है , चाहे जो भी सुंदरता का परसेप्शन हो । लेकिन यहाँ जो डाईकॉटमी मुझे दिख रही है .... मिस लैंडमाईन ? मिस्टर लैंडमाईन किधर हैं ?
या फिर लैंड माईंस भी जेंडर डिसक्रिमिनेटरी हैं ?

Mired Mirage ने कहा…

जहाँ खाने को अन्न नहीं है वहाँ ये बारूदी सुरंगे लगाने को पैसा कहाँ से आ जाता है ? यह सब देखने के बाद भी जब हम किसी बुरे व्यक्ति को पाशविक प्रवृत्ति का कहते हैं तो मुझे बहुत विचित्र लगता है । पशु ऐसा दुष्ट काम कभी नहीं करते ।
घुघूती बासूती

अभय तिवारी ने कहा…

प्रत्यक्षा जी आप की बात वाजिब है.. मगर मेरा ख्याल है कि इस आयोजन का उद्देश्य स्त्री-पुरुष विभेद से अधिक युद्ध की कुरुपता बनाम सौन्दर्य की सहज चाह के अन्तरविरोध पर ध्यानाकर्षण करना रहा होगा।
और यह बात भी गौर करने योग्य है कि जो लोग स्त्री सौन्दर्य को ढक कर रखने के हिमायती हैं वे युद्ध की कुरुपता से अधिक पीड़ित नहीं होते!

Saurabh ने कहा…

अभय जी नमस्कार,
देखिये मेरा मानना तो यह है कि वो सुन्दरता ही क्या जिसके कोई दर्शन न कर सके ? उत्तराखंड की फूलों की घाटी सदियों से वहाँ थीं मगर जब तक एक जिज्ञासु ने उसकी खोज न की तब तक दुनिया को उसका पता न चल पाया !इसलिए कहते हैं "Beauty lies in the eyes of the beholder"

Pratyaksha जी,
यहाँ बात स्त्री सौंदर्य की हो रही है तो मि. लैंड माइन क्या करेंगे? लिंग समानता की बात का मैं हामी हूँ मगर ये तो पुरुषों के साथ ज्यादती है! ;-)

अफ़लातून ने कहा…

छिन्दापानी गाँव इटारसी से २०-२२ किलोमीटेर दूर है । इटारसी में बम-गोले बनाने का कारखाना है। इस कारखाने में बने बम-गोले छिन्दापानी के निकट के प्रूफ़-रेन्ज में जाँचे जाते हैं। कई आदिवासी परिवारों को विस्थापित कर यह प्रूफ रेन्ज बना था। अब आदिवासी इन बम गोलों(वहाँ इन्हें गोला गट्टू कहा जाता है) से छिटके धातु के टुकड़े बिनते हैं और बेचते हैं।जो बम -गोले बिना फूटे रह जाते हैं उनके फूटने से छिन्दापानी गाँव के आधे पुरुषों के कोई अंग विच्छिन्न हुए हैं । सुन्दर सभी हैं,प्रतियोगिता की आवश्यकता क्यों आ पड़ी।असुन्दर है युद्ध और बम-गोले।

मनीषा पांडेय ने कहा…

बहुत स्‍वाभाविक है, सुंदर होने दिखने की चाह, खुद हो सुंदर-आकर्षक बनाने के प्रयास। हर कोई खूबसूरत दिखना चाहता था। लेकिन इस बेहद स्‍वाभाविक मानवीय वृत्ति में ये प्रतियोगिता कहां से आ गई, मिस लैंडमाइन, मिस अंगोला, मिस युगांडा, मिस अमरीका, मिस फिरोजाबाद, मिस बेगूसराय।
कौन हैं जो सौंदर्य के ये मिस फलाना-मिस ढेकाना वाले पैरामीटर तय कर रहे हैं। कौन हैं, इन युद्धों के कारक, जिन्‍होंने लाखों के मन-देह सबकुछ को कुरूप किया है। सुंदर देह और मन के मनुष्‍य के बुनियादी अधिकारों पर कब्‍जा किया है। मैंने उड़ती-उड़ती सी अपनी बात कही है। लेकिन शायद यथार्थ इतना एकरेखीय, एककोणीय नहीं है।

मीनाक्षी ने कहा…

अजीब विडम्बना है कि पहले तो पश्चिमी देश लैंडमाइंस अफ्रीका भेजते हैं फिर विक्टिम्स को एग्जिबिट्स की तरह इम्पोर्ट करके उनका प्रदर्शन किया जाता है...
देखने लायक यह है कि अंग-भंग होने पर भी डिगनिटी और पराइड के साथ तस्वीर में मुस्काती दिखाई दे रही नारी शक्ति और सहनशीलता की मिसाल बन गई. धन्यवाद अभय जी , एक बार फिर आपने नारी को श्रेष्ठ माना.

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