गुरुवार, 15 नवंबर 2007

पद्मिनी नारी का विचार और मुश्किलें

दीपिका पादुकोने को पद्मिनी नारी की संज्ञा दिये जाने पर चन्दू भाई की टिप्पणी आई;

मर्दों-औरतों के इस सिंह-शशक और पद्मिनी-हस्तिनी वर्गीकरण ने भारतीय इतिहास में बड़े-बड़े गुल खिलाए हैं- लुक्स से लेकर एनेटॉमी तक को इनका आधार बनाया जाता था और जो भी राजा-रानी इन पर खरा नहीं उतरता था उसकी अपनी तो जिंदगी रद्द होती ही थी, अपने प्रजाजनों का भी वह जीना दूभर कर देता था। पूरब में कोणार्क मंदिर बनवाने वाले राजा नरसिंह से लेकर पश्चिम में चित्तौड़ नाश की वजह बनी रानी पद्मिनी तक इसके अनेक उदाहरण हैं। आपकी पोस्ट से प्रभावित होकर यह सिलसिला कहीं दुबारा न चल पड़े...

ऐसी किसी खतरे का परिहार करने के लिए(:)) पद्मिनी नारी पर अपना स्पष्टीकरण पहले ही दे रहा हूँ। ये वर्गीकरण आदिकाल से चला आ रहा है और आज तक जारी है.. मध्य काल में स्त्रियों के चार प्रकारों की चर्चा आम थी; हस्तिनी, शंखिनी, चित्रिणी, और पद्मिनी। मलिक मुहम्म्द जायसी ने भी पद्मावत में इसका ज़िक्र इस प्रकार किया है।

चौथी कहौं पदमिनि नारी। पदुम गंध ससि दैउ सँवारी।
पदमिनि जाति, पदुम रंग ओही।पदुम बास,मधुकर संग होही।
ना सुठि लांबी, ना सुठि छोटी। ना सुठि पातरि, ना सुठि मोटी।
सोरह करा रंग ओहि बानी। सो सुलतान! पदमिनि जानी।
दीरघ चारि, चारि लघु सोइ। सुभर चारि, चहुँ खीनी होई।
औ ससि बदन देखि सब सोहा। बाल मराल चलर गति सोहा।
खीर अहार न करि सुकुवाँरी।पान फूल के रहै अघारी।
सोरह करा संपूरन, औ सोरहौ सिंगार।
अब ओहि भाँति कहत हौ, जस बरनै संसार।

अर्थात सोलह कलाओं युक्त पद्मिनी नारी की चार कला/अंग (केश, उंगली, नेत्र, ग्रीवा) लम्बे होते हैं। चार कला/ अंग (दशन, कुच, ललाट और नाभि) छोटे होते हैं। चार कला/अंग (कपोल, नितम्ब, बाहु और जंघा) पुष्ट होते हैं। शेष चार कला/अंग (नासिका, कटि, पेट, और अधर) पतले होते हैं।

नारियों के वर्गीकरण की यह परम्परा मध्यकाल में आ कर नहीं शुरु हुई, बहुत सारी दूसरी चीज़ों की तरह इस के बीज भी पुराने हैं। महाभारत के गालव प्रकरण में आये उद्योग पर्व के ११६ वें अध्याय से ये श्लोक देखिये;

उन्नतेषून्नता षट्सु सूक्ष्मा सूक्ष्मेसु पञ्चसु।
गम्भीरा त्रिषु गम्भीरेष्वियं रक्ता च पञ्चसु।।
श्रोण्यौ ललाट मूरू च घ्राणं चेति षडुन्नतम।
सूक्ष्माण्यङ्गुलिपर्वाणि केशरोमनखत्वचः।।
स्वरः सत्वं च नाभिश्च त्रिगम्भीरे प्रचक्षते।
पाणिपादतले रक्ते नेत्रान्तौ च नखानि च॥

अर्थ: इस कन्या के जो छै अंग ऊँचे होने चाहिये, ऊँचे हैं। पांच अंग जो सूक्ष्म होने चाहिये, सूक्ष्म हैं। तीन अंग जो गम्भीर होने चाहिये, गम्भीर हैं तथा इसके पांच अंग रक्त वर्ण के हैं।

दो नितम्ब, दो जांघे, ललाट, और नासिका, ये छै अंग ऊँचे हैं। अङ्गुलियों के पर्व, केश, रोम, नख और त्वचा- ये पाँच अंग सूक्ष्म हैं। स्वर, अंतःकरण और नाभि- ये तीन गम्भीर कहे जा सकते हैं तथा हथेली, पैरों के तलवे, दक्षिण नेत्र प्रान्त, वाम नेत्र प्रान्त और नख, ये पाँच अंग रक्त वर्ण के हैं। आगे श्लोक और है;

बहुदेवासुरालोका बहुगन्धर्व दर्शना।
बहुलक्षण सम्पन्ना बहुप्रसवधारिणी।।
समर्थेयं जनयितुं चक्रवर्तिनमात्मजम।
ब्रूहि शुल्कं द्विजश्रेष्ठ समीक्ष्य विभव मम॥

अर्थ: यह बहुत से देवो-असुरों के लिए भी दर्शनीय है। इसे गन्धर्वविद्या (संगीत) का भी अच्छा ज्ञान है। यह अनेक शुभ लक्षणों द्वारा सुशोभित और अनेक संतानों का जन्म देने में समर्थ है। विप्रवर आपकी यह कन्या चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ है; अतः आप मेरे वैभव की समीक्षा करके इसका समुचित शुल्क बताएं।

तो आदिकाल और मध्यकाल से होता हुआ इस वर्गीकरण की अनुगूँज अब पश्चिम की वैज्ञानिक सभ्यता में भी सुनाई दे रही है। अभी हाल में किए गए एक शोध के अनुसार जिन स्त्रियों की कमर और कूल्हे का अनुपात ज़्यादा होता हैं वे कम अनुपात वाली स्त्रियों से अधिक बुद्धिमान होती हैं। क्योंकि कूल्हों में मौजूद वसा में ओमेगा-३ एसिड पाया जाता है जो गर्भ के दौरान शिशु के मस्तिष्क के विकास में सहायक होता है और स्त्री के अपनी मानसिक शक्ति के लिए भी और इसके विपरीत कमर में जमा होने वाला वसा –ओमेगा-६ मस्तिष्क विकास में सहायक नहीं होता।

अब इस पर दो तरह से प्रतिक्रिया हो सकती हैं;

१) ये मर्दवादी सोच कि आकर्षक स्त्रियाँ बुद्धिमान नहीं होती, ग़लत साबित हो ही गई।

२) या फिर इसके ठीक उलट कि ये शोध बकवास है क्योंकि यह सिद्ध करती है कि अनाकर्षक स्त्रियाँ बुद्धिमान भी नहीं होती।

सही-गलत से इतर एक सवाल और भी है जो मुझे हमेशा परेशान करता है.. क्या सत्य का फ़ैसला इस आधार पर होगा कि वह पोलिटिकली करेक्ट है या नहीं?

7 टिप्‍पणियां:

प्रियंकर ने कहा…

यार अभय!
गज़ब का शोध और संयोजन है . जगह हो और भर्ती चालू हो तो मुझे चेला मूंड़ लो .

तनु ने कहा…

आज के बदलते माहौल में कुछ महिलाएं होंगी जो इसको बिल्कुल सीरियसली नहीं लेंगी क्योंकि वे अपनी बॉडी और सेक्सुएलिटी के साथ कमफ़र्टेबल हैं. मगर कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो इन मापदण्डों को कुछ ज़्यादा ही सीरियसली लेती हैं. बाज़ार में स्पाज़, फ़ैट बर्निंग लोशन्स, फ़ेयरनेस क्रीम बोट्क्स इनजेंक्शन्स, सिलिकॉन इम्प्लान्ट्स, और टमीटक्स की बढ़ती हुई लोकप्रियता इस बात का सुबूत हैं.

काकेश ने कहा…

पुरुषों व नारियों का यह वर्गीकरण शायद वात्सयन के कामसूत्र में पढ़ा था. आपने अपने इस शोधमय लेख से उसे फिर से याद दिला दिया.

Sanjeet Tripathi ने कहा…

आपका शिष्यत्व ग्रहण करना है, निर्धारित योग्यताएं बतलाएं मान्यवर!!

Tarun ने कहा…

टैक्निकली इन हस्तिनी, शंखिनी, चित्रिणी, और पद्मिनी नारियों की क्या परिभाषा होती है ये तो पता नही, लेकिन एक पद्मिनी नारी आपने दिखा दी है, अब जरा हस्तिनी, शंखिनी और चित्रिणी के भी दर्शन करा दीजिये। हम भी कोशिश करते हैं इनके बीच के अंतर को समझने की।

वैसे परिभाषा तैयार रखियेगा, क्योंकि देखने से कुछ समझ नही आया तो हम इन सब की परिभाषा आप से ही पूछेंगे। अगली पोस्ट हस्तिनी, शंखिनी और चित्रिणी के फोटो की होनी चाहिये, हम भी तो देंखे ये क्या बला हैं भला।

पुनश्चः, आपकी पद्मिनी नारी की परिभाषा (फार्मूले) का दिये गये सेंपल (दीपिका) के साथ मिलान कर लिया गया है, सब कुछ अनुपात के अनुसार ही पाया गया है।

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छा शोध है...बधाई।

अभिषेक ओझा ने कहा…

आज गूगल से यहाँ पंहुचा. इस पर और पोस्ट बनती है.

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