गुरुवार, 8 मार्च 2007

चालीस कमीज़ें खरीदने की बेबसी बनाम धर्म

आपके पास कम से कम चालीस कमीज़ें तो होंगी! अगर आप के पास नहीं हैं तो इस बाज़ारू दौर में आपको शर्मसार होना चाहिये! मेरे पास तो हैं..लेकिन मॉल में पैर धरते ही न जाने क्यों मैं स्वयं को इतना अकिंचन क्यों महसूस करने लगता हूँ कि वही सलेटी, सफ़ेद, काही और कत्थई रंगों की वैसी ही कमीज़ें देखकर उन पर पैसे फेंकने को तैयार हो जाता हूँ.. और तो और जितना वो अंग्रेज़ी मे उवाचते हैं.. उतना हम अपने क्रेडिट कार्ड से कटवा कर विजयी भाव से मॉल से घर तक का सफ़र तय करते हैं.. घर आकर सबसे पहले उसे डाँट कर आइने में अपने को निहारते हैं और तब पाते हैं कि हम कितने बड़े ...हैं। अगले दिन से हम वही तीन कमीज़ें वापस पहनना शुरु कर देते हैं.. और अलमारी में हमारी कमीज़ों की संख्या इकतालिस हो जाती है...

हम सभी बाज़ार से जुड़े हैं..एक तरह से बाज़ार हमारा अन्नदाता है..और बाज़ार का प्रतिरोध करना जिस डाल पर बैठे हो उसी को काटने जैसा होगा.. बावजूद इसके कि उस ने हमारे दिलो-दिमाग़ पर कब्ज़ा कर लिया है.. हमारी सोच को अब बाज़ार नियंत्रित कर रहा है.. हम क्या खायेंगे.. क्या पहनेंगे.. क्या करेंगे.. ये हम नहीं बाज़ार तय करता है। फ़ना जैसी दो टके की फ़िल्म भी मैं देख कर आया क्योंकि आमिर खान, काजोल और इतना प्रचार.. सब तरफ़ फ़ना फ़ना फ़ना.. बेबस हो गया लाचार हो गया.. . समाज मे उठूंगा बैठूंगा कैसे.. सब देखेंगे और फिर बात करेंगे.. और मैं क्या चुप बैठे सुनूंगा..नहीं देखूंगा तो गाली कैसे दूंगा .. देखनी ही पड़ी.. और फिर जी भर के कोसा अपने आप को। बाज़ार का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है हमारे बच्चों पर। जो उनके बढ़ते शरीर और बनते चरित्र के लिये सबसे घटिया चीज़ें हैं, बाज़ार वही उनको बेच रहा है और हम अपने बच्चों के प्रेम में वो सब खरीद खरीद के उनको दिला रहे हैं। इस कच्ची उमर में ही उनको बाज़ार के अनैतिक रास्तों के हवाले कर दे रहे हैं।
कल सच्चिनान्द सिन्हा ने अपने ब्लॉग पर उपभोक्तावादी संस्कृति के खिलाफ़ एक सुन्दर लेख लिखा है.. "ऐसे लोग भी जो समाज-परिवर्तन करना चाहते हैं , समाज से गरीबी हटाना चाहते हैं और समता लाना चाहते हैं , खुद कैसे रहते हैं इस बारे में नहीं सोचते। लेकिन हमारा रहन-सहन और उपभोग का स्तर वास्तव में एक नितान्त निजी मामला नहीं है । यह एक विशेष वातावरण की उपज है और स्वयं एक वातावरण बनाता है..
..अब पश्चिम के अधिकांश वैज्ञानिक और चिन्तक भी यह मानने लगे हैं कि इस उत्पादन की एक सीमा है और हम उस सीमा के काफी करीब आ चुके हैं । इस कारण वहाँ छात्रों तथा बुद्धिजीवियों के बीच एक नया वामपंथ पैदा हो रहा है जो प्राकृतिक साधनों की सीमाओं , प्रदूषण आदि की समस्याओं के साथ वामपंथ को जोड़ने का प्रयास कर रहा है । इन लोगों ने भी यह अनुभव किया है कि मानव विकास की कल्पना प्रकृति द्वारा बांधी गयी सीमाओं के भीतर ही की जा सकती है । स्पष्ट है कि कोई भी दीर्घकालीन विकास प्राकृतिक साधनों के अपव्यय को रोक कर ही सम्भव है । हमारा उपभोग कितना और किन वस्तुओं का हो वह इससे सीधा जुड़ा हुआ है । इस तरह उपभोक्तावादी संस्कृति एक तरह से समाज के विकास के लिए सबसे प्रमुख अवरोध बन गयी है ।"
सिन्हा जी ने इस लेख मे दो बातें कही हैं एक तो ये कि समाजवादी और साम्यवादी धाराएं बाहरी तौर पर बाज़ार का विरोध करते हुये भी निजी स्तर पर उसके शिकार हो जाते हैं और दूसरी बात ये कि बाज़ार के प्रतिरोध मे एक नई धारा पैदा हो रही है जो पकृति और विकास की सीमाओं को एक साथ जोड़ कर देख रही है।
मेरा अपना विचार ये है कि वामपंथ वैचारिक रूप से बाज़ार क मुकाबला करने में खोखला है। वामपंथ के विकास के सारे मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के शोषण की बुनियाद पर खड़े हैं। खुद मार्क्स भी बाकी सारे अन्तर्विरोधों के विलीन हो जाने के बाद प्रकृति और मनुष्य के अन्तरविरोध की ही प्रमुख तौर पर निशानदेही करते हैं। और वामपंथियों के साम्यवादी समाज की कल्पना पूंजीवादी विकास की अवस्था के बाद ही सम्भव है। तो दुनिया मे इस बीच की स्थिति का मुकाबला करने के लिये साम्यवादियों ने दो तरीके अख्तियार किये हैं; एक तो रूस का रास्ता... कि एक समता मूलक समाज बनाए रखते हुये सीधे साम्यवाद में कूद जाने की कोशिश..जो कि असफल हो चुका है; दूसरा चीन का रास्ता.. बाज़ार को साम्यवादी नज़रिये के अधीन रखकर पूंजीवादी समाज की स्थापना करना...जो कि निश्चित तौर पर उपभोक्तावाद के किसी पहलू को रोकने में किसी तरह से रुचिशील नहीं है। हमारे देशी वामपंथी भी टाटा के लिये एस ई ज़ेड बनाकर उसी मार्ग पर अग्रसर दिखाई दे रहे हैं...
तो क्या जिस नए वामपंथ की ओर इशारा कर रहे हैं सिन्हा जी वह लड़ेगा बाज़ार से... यदि ऎसा वामपंथ तैयार हो सके तो मैं उसका स्वागत करता हूँ.. दुनिया भर में और हमारे अपने देश में भी ऎसे दल छोटे छोटे स्तर पर कार्यरत हैं.. पर न जाने क्यों मुझे उनका भविष्य संदिग्ध लगता है...ये बात मैं इस मनोकामना के साथ कह रह हूँ कि मेरा सन्देह ग़लत साबित हो...

लेकिन एक बात मैं जो हम साफ़ साफ़ देख सकते हैं कि दुनिया भर में अगर बाज़ार से कोई डट के मुकाबला कर रहा है तो वह है इस्लाम... मेरी यह बात पढ़कर बहुत सारे लोग बिदक जायेंगे.. लेकिन मैं ये बात बहुत सोच विचार करने के बाद लिख रहा हूँ...और यह कहते हुये मैं ज़रा भी आतंकवादियों की मासूम लोगों के खिलाफ़ की जाने वाली कार्रवाइयों का अनुमोदन नहीं कर रहा हूँ। इस्लाम अन्य कई धर्मों की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी और तापस है। फ़िज़ूलखर्ची और भोग विलास की मुखालफ़त इस्लाम के मूल में है। ये दीग़र बात है कि तमाम भूतकाल के और वर्तमान मुस्लिम शासकों के ऎश्वर्य और विलासिता के ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैं। और शायद शांति के दौर में वे तमाम मुस्लिम समाज भोगवाद की ओर झुक जायं जिनके भीतर आज कट्टर इस्लाम की प्रवृत्तियां नज़र आती हैं । ये उन समाजों का स्वाभाविक रक्षात्मक मुद्रा है...अमेरिका और बाज़ार के आक्रमण के विरुद्ध... किसी भी समाज में बाहरी प्रभाव का मुकाबला करने के दो रास्ते हो सकते हैं एक तो सम्पूर्ण समर्पण और दूसरा मुखालफ़त... अब मुखालफ़त के लिये जो वैचारिक पुख्ता आधार चाहिये जो इस्लाम प्रदान करता है...और मज़े की बात यह है कि सिर्फ़ इस्लाम ही नहीं सभी धर्म प्रदान करते हैं.. लेकिन बाज़ार बाकी सभी धर्मों को निग़ल गया है.. सिर्फ़ इस्लाम उसे नाकों चने चबवा रहा है..
हमारे यहाँ शैतान की अवधारणा नहीं है.. पर मूसा को मानने वाले धर्मों में है.. और अक्सर उन धर्मों के कुछ लोग बाज़ार और बाज़ार के सबसे बड़े पैरोकार अमेरिका पर शैतान होने का इल्जाम लगाते ही रहते हैं...और क्यों ना लगायें.. अगर आप गौर से देखें तो बाज़ार ने मूसा के दस उपदेशों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं रखी है...

लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति धर्म पर सीधा प्रहार नहीं करती... पीठ में छूरा घोंपती है.. प्रगट में बाज़ार सभी धर्मों के प्रति निरपेक्ष नज़र आता है.. मगर वह ऎसे किसी भी विचार के खिलाफ़ है जो आदमी को ज़्यादः से ज़्यादः उपभोग करने से रोकता हो.. यदि धर्म कहता हो कि अल्पभोजी दीर्घजीवी.. तो बाज़ार को इससे परेशानी होगी..वह आपको ज़्यादः खाने के लिये तरह तरह के तर्क देगा.. झूठ बोलेगा.. झूठे आँकड़े पेश करेगा..झूठे तथ्य पेश करेगा.. आपको प्रलोभन देगा..आपके ईमान को डिगाने के लिये कोई रास्ता अख्तियार करने से नहीं चूकेगा ..कुछ लोगों को मेरा ऎसा सोचना कॉन्सपिरेसी थ्योरी लगेगा.. मगर क्या हम नहीं जानते कि मार्केटिन्ग की दुनिया किस तरह की महीन चीर फाड़ करने के बाद अपनी रणनीतियां तय करती है...लेकिन सच्चाई से बराबर कन्नी काट जाती हैं..क्योंकि सच से उन्हे कोई मतलब नहीं...

कोलगेट के सफ़ेद कोट पहन कर घूमने वाले डॉक्टर किस शोध के आधार पर कोलगेट को दाँतो के लिये मुफ़ीद बताते हैं.. कभी लौंग..कभी फ़्लोराइड..कभी नमक..हज़ारों करोड़ का धन्धा करने वाले लोग एक बार मे ये तय क्यों नहीं कर लेते कि दाँतो के लिये क्या क्या अच्छी चीज़ें हैं... वो नहीं करेंगे.. क्योंकि उसमें उनकी दिलचस्पी नहीं है.. उनका ध्यान इस बात की तरफ़ नहीं है कि क्या अच्छा है.. बल्कि इस तरफ़ कि हमें क्या अच्छा लग जायेगा.. हमें.. झाग अच्छा लगेगा तो पहली वरीयता झाग पर.. फिर.. मीठा होना चाहिये.. दाँतों में कुछ सनसनाहट होनी चाहिये.. तो सारा शोध इन मसलों पर होता है.. असली फ़ायदा पहुँचाने के तत्वों पर नहीं.. रामदेव की लोकप्रियता के तुरन्त बाद नमक का तत्व हाज़िर हो जाता है.. जैसे उनके शोधकर्ताओं ने बस दो महीने पहले ही खोजा हो.. चालीस साल की तपस्या के बाद....

बाज़ारी ताक़तों के खिलाफ़ कभी यह मुकाबला इस्लाम और हिन्दू धर्म ने मिलकर करने की कोशिश की थी.. मेरा इशारा १८५७ की तरफ़ है.. संयोग से यह साल १८५७ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ का भी है..इन दो धर्मों ने मिलकर यह साझा लड़ाई ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ़ लड़ी थी..यहाँ पर मैं धर्मों का नाम जानबूझ के ले रहा हूँ क्योंकि आज हम अपने ओढ़े हुए धर्म निरपेक्ष भाव से इस लड़ाई में धर्म की भूमिका को नकारने की कोशिश कर सकते हैं, पर ऎसा शायद था नहीं.. जब से मराठों को अपदस्थ करके अंग्रेज़ो ने दिल्ली पर परोक्ष अधिकार कर लिया था, तब से ही उनके खिलाफ़ दारुल हर्ब के फ़तवे ज़ारी होना शुरू हो गये थे..१८०३ से लेकर १८५७ तक मुस्लिम समाज में अपनी संस्कृति की घटती अहमियत को लेकर व्यापक असंतोष घर कर चुका था.. जबकि हिन्दू समाज अपनी सदियों पुरानी रीति रिवाज़ के साथ ऊपर से की जा रही छेड़ छाड़ से वैसे ही आग़ बबूला बैठा था.. इस पूरे मामले में एक लोकप्रिय राय यह है कि कम्पनी और उसके अधिकारी भारतीय समाज के पिछड़ेपन और अंधविश्वासों को दूर करने की नेक नीयत से ऐसा कर रहे थे..पर जो कम्पनी ऊपर से ले कर नीचे तक भयानक भ्रष्टाचार से ग्रस्त थी और चीन को अफ़ीम में सुला देने जैसे संगीन कारनामे अंजाम दे रही थी.. उस से ऎसे सदाचार की उम्मीद करना बचकाना होगा..और हमें नहीं भूलना चाहिये कि कम्पनी एक मुनाफ़ा कमाने और मुनाफ़े के आधार पर ही अपने फ़ैसले करने वाली एक संस्था थी..और हिन्दू धर्म में इस तरह के परिवर्तन करने के पीछे उनका मक़सद सिर्फ़ शासित जनता के नैतिक मनोबल को तोड़ना था...जिसमें वो काफ़ी हद तक कामयाब रहे.. इसीलिये आज हिन्दुस्तान में बाज़ार का कोई प्रतिरोध हिन्दू समाज में नहीं दिखाई देता .. और जो मुस्लिम समाज में दिखाई देता है वह उन देशों मे चले रहे प्रतिरोध की छाया है.. जो कभी साम्राज्यवादी शक्ति द्वारा दलित नहीं हुये मग़र आज अमेरिका द्वारा बाज़ार की सीमाओं को बढ़ाने की प्रक्रिया में घुटने टेकने पर मजबूर किये जा रहे हैं... सवाल यह उठता है कि अमेरिका यह काम इस्लाम के साथ समझौता करके भी तो कर सकता है...मगर नहीं कर सकता.. क्योंकि इस्लाम और उपभोक्तावाद में कोई समझौता मुमकिन नहीं..दोनों प्रकृति से एक दूसरे के विरोधी हैं.. इस्लाम ही नहीं..धर्म और उपभोक्तावाद की प्रकृति एक दूसरे के विपरीत है..दोनों में से एक को पीछे हटना होगा... जैसे हिन्दू धर्म पीछे हटा है.. जैसे क्रिश्चिएनिटी पीछे हटी है...धर्म अगर अपनी जगह अड़ा रहा तो लड़ाई होती रहेगी...

मुसलमानों ने तो तय कर लिया है कि इस लड़ाई में वो किधर हैं.. अब हिन्दुओं को तय करना है..उन्हे बाज़ार में अपना सर्वस्व निछावर करके घरफूंक तमाशा देखना है या लौटना है अपने धर्म की तरफ़..साम्प्रदायिक धर्म की तरफ़ नहीं..सच्चे धर्म की तरफ़... संयम और नैतिक आचार की तरफ़... साम्प्रदायिकता धर्म सापेक्ष होती है.. पर धर्म, सम्प्रदाय निरपेक्ष होता है...सच्चे धर्म को फ़रक नहीं पड़ता कि सामने वाले का क्या धर्म है वह सिर्फ़ अपने धर्म का पालन करता है..

आखिर में मैं मार्क्स के प्रसिद्ध उद्धरण की चर्चा करना चाहूँगा जिसे इस्तेमाल कर कर के बहुत सस्ता बना दिया गया है- धर्म जनता की अफ़ीम है; यह उद्धरण अपने सन्दर्भ सहित नीचे कुछ इस प्रकार है..
Religion is, indeed, the self-consciousness and self-esteem of man who has either not yet won through to himself, or has already lost himself again. But man is no abstract being squatting outside the world. Man is the world of man—state, society. This state and this society produce religion, which is an inverted consciousness of the world, because they are an inverted world. Religion is the general theory of this world, its encyclopedic compendium, its logic in popular form, its spiritual point d'honneur, its enthusiasm, its moral sanction, its solemn complement, and its universal basis of consolation and justification. It is the fantastic realization of the human essence since the human essence has not acquired any true reality. The struggle against religion is, therefore, indirectly the struggle against that world whose spiritual aroma is religion.
Religious suffering is, at one and the same time, the expression of real suffering and a protest against real suffering. Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people.
The abolition of religion as the illusory happiness of the people is the demand for their real happiness. To call on them to give up their illusions about their condition is to call on them to give up a condition that requires illusions. The criticism of religion is, therefore, in embryo, the criticism of that vale of tears of which religion is the halo.
( from the introduction of Contribution to Critique of Hegel's Philosophy of Right)

अब मार्क्स के इस कथन के सम्बंध में एक दो बातें कहना चाहूँगा..पहली बात तो यह कि वे कहते हैं कि धर्म एक ऎसे व्यक्ति की आत्म चेतना और आत्म गौरव है जिसने अभी तक स्वयं को जीता ना हो या स्वयं को जीत कर फिर खो दिया हो.. मैं तो नहीं जानता कि दुनिया में धार्मिक विचार के अलावा कोई ऎसा विचार है जो व्यक्ति को स्वयं पर जीतने की शिक्षा देता हो..भौतिकवाद तो हर तरह से स्वयं को ज़रूरतोंऔर इच्छाओं के सम्मुख समर्पण के ही गीत गाता पाया जाता है..
फिर मार्क्स आगे कहते हैं कि धर्म मनुष्य के सत्व की एक नितान्त काल्पनिक उपलब्धि है..क्योंकि मनुष्य के सत्व ने अभी तक कोई वास्तविक स्वरूप ग्रहण नहीं किया है...मेरी अपनी समझ में मनुष्य के सत्व का वास्तविक स्वरूप मनुष्य स्वयं है..जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता जाता है...
फिर मार्क्स कहते हैं कि धार्मिक पीड़ा, वास्तविक पीड़ा की ही एक अभिव्यक्ति है.. और धर्म सताये हुये लोगों की एक कराह है.. हृदय हीन संसार का हृदय, आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा.. और अन्त में जनता की अफ़ीम...
अब अफ़ीम के सन्दर्भ मे एक खास बात; अचानक इतनी भावुक बातें करते करते मार्क्स अफ़ीम जैसा नशेड़ी शब्द क्यों प्रयोग कर बैठते हैं.. यहाँ पर मैं एक तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि १८४३ के यूरोप में अफ़ीम क़ानूनी तौर पर एक पीड़ानाशक के रूप में प्राप्य और लोकप्रिय थी...इसलिये इस सन्दर्भ में अफ़ीम का अर्थ "पीड़ानाशक" ज़्यादः उपयुक्त लगता है..
रही बात मार्क्स की शेष बातों की.. मैं नहीं समझता कि २५ बरस की उमर में एक भौतिकवादी के रूप में ख्याति पा रहे मार्क्स को धर्म के सही स्वरूप की कोई जानकारी थी.. और मैं धर्म पर उनकी राय को एक विशेषज्ञ की राय के बतौर तरजीह नहीं दे सकता।

4 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

अभयजी,सच्चिदानन्दजी के लेख से प्रेरित आपकी प्रविष्टि देख कर अच्छा लगा।सच्चिदाजी की पुस्तिका शायद ६-७ प्रविष्टियों मे ब्लॉग पर आएगी।उसके बाद उसे एक ब्लॉग का रूप दिया जाएगा। आशा है आप अपनी राय देते रहेंगे। आज दूसरा हिस्सा है - http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/06/consumerism-sachchidanand-sinha/

avinash ने कहा…

अभय जी, अच्‍छा लिखा है आपने। आप जैसा समझते हैं, उसकी व्‍याख्‍या भी सही कर लेते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उम्र का विशेषज्ञता से कोई संबंध नहीं है। कई धार्मिक आख्‍यानों में भी कम उम्र के ज्ञाता पाये जाते हैं। सही बात ये थी कि मार्क्‍स ने एक जीवन दृष्टि, समाज दृष्टि और राजनीतिक दृष्टि अर्जित की थी- और इतनी सारी चीज़ें जब एक आदमी के पास आ जाए, तो हमें मानना चाहिए कि वह दूसरे जीवन संदर्भों को भी अच्‍छी तरह समझ सकता है। 23 साल के भगत सिंह, 13 साल के खुदीराम और आठ साल के अष्‍टावक्र की वैचारिक विसंगतियों पर एक आलेख रचें, तो अच्‍छा लगेगा।

अभय तिवारी ने कहा…

धर्म का एक दर्शन होता है..मगर धर्म मूलतः अनुभव और व्यवहार की चीज़ है..चूंकि मार्क्स को चीज़ों को देखने और समझने का तरीक़ः एक दार्शनिक का था इसलिये मैं ऎसा कह रहा हूँ..
रूमी ने लिखा है..सेहत और दौलत दो पर्दे हैं इन्सान और भगवान के बीच..और २५ की उमर में मार्क्स दोनों से लाचार नहीं हुये थे..उन्होने धर्म को ऎसी एक परिघटना के तौर पर समझा जो दूसरों के साथ घटित होती है..उनका अपना कोई निजी अनुभव नहीं था..

indiaroad ने कहा…

उम्र कुछ मामलों में हमारे नज़रिये को भावुकता में नहलाये रख सकती है, मगर वह सबके साथ, और सभी क्षेत्रों में लागू होगा इसे स्‍वीकारने में मुझे दिक्‍कत होती है. फिर रही रुमी साहब वाली बात तो सेहत और दौलत के मेरे दोनों ही पर्दे तार-तार हो रहे हैं लेकिन कोई धार्मिक विश्‍वास मेरी चेतना के नये धरातल खोलेगा ऐसा मुझे किसी तरह से नहीं लगता. न ऐसा कोई अभाव मुझे विचलित करता है. लेकिन.. मैं जानता था इस टिप्‍पणी के साथ यह फालतू का खुरपेंच खुलेगा. मैं क्षमा चाहता हूं क्‍योंकि यह सवाल लेख का महज़ आखिरी हिस्‍सा है न कि पूरे संवाद का निचोड.

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