शनिवार, 15 सितंबर 2007

मारेसि मोहिं कुठाँउ: गुलेरी जी का एक लेख

तीन कहानियाँ लिख कर अमर हो चुके गुलेरी जी निबन्ध लेखन में भी एक बेजोड़ अंदाज़ रखते थे, ये बात कम लोग जानते हैं। इस निबन्ध को पढ़ने के पहले मैं भी नहीं जानता था। आर्य समाज के बहाने भाषा, धर्म, इतिहास सभी पर एक टिप्पणी है यह लेख।

गुलेरी जी का जन्म १८८३ में कांगड़ा में हुआ और ३९ वर्ष की उम्र में ही काशी में वे चल बसे। इस गणित से इस लेख का रचनाकाल बीसवीं सदी के पहले या दूसरे दशक में कभी का होना चाहिये; यानी आज से तकरीबन १०० बरस पहले।


मारेसि मोहिं कुठाँउ: चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'

जब कैकेयी ने दशरथ से यह वर माँगा कि राम को बनवास दे दो तब दशरथ तिलमिला उठे, कहने लगे कि चाहे मेरा सिर माँग ले अभी दे दूँगा, किन्तु मुझे राम के विरह से मत मार। गोसाई तुलसीदासजी की भाव भरे शब्दों में राजा ने सिर धुनकर लम्बी साँस भर कर कहा 'मारेसि मोहिं कुठाँउ- मुझे बुरी जगह पर घात किया। ठीक यही शिकायत हमारी आर्यसमाज से है। आर्यसमाज ने भी हमें कुठाँव मारा है, कुश्ती में बुरे पेच से चित पटका है।

हमारे यहाँ पूँजी शब्दों की है। जिससे हमें काम पड़ा, चाहे और बातों में हमें ठगा गया पर हमारी शब्दों की गाँठ नहीं कतरी गई। राज के और धन के गठकटे यहाँ कई आए पर शब्दों की चोरी (महाभारत के ऋषियों के कमल-नाल की ताँत की चोरी की तरह) किसी ने नहीं की। यही नहीं, जो आया उससे हमने कुछ ले लिया।

पहले हमें काम असुरों से पड़ा, असीरियावालों से। उनके यहाँ असुर शब्द बड़ी शान का था। असुर माने प्राणवाला, ज़बरदस्त। हमारे यहाँ इन्द्र को भी यही उपाधि प्राप्त हुई, पीछे चाहे शब्द का अर्थ बुरा हो गया। फिर काम पड़ा पणियों से- फ़िनीशियन व्यापारियों से। उनसे हमने पण धातु पाया, जिसका अर्थ लेन-देन करना, व्यापार करना है।एक पणि उनमें ऋषि भी हो गया, जो विश्वामित्र के दादा गाधि की कुर्सी के बराबर जा बैठा। कहते हैं कि उसी का पोता पाणिनि था, जो दुनिया को चकराने वाला सर्वाङ्ग सुन्दर व्याकरण हमारे यहाँ बना गया।

पारस के पार्श्वों या पारसियों से काम पड़ा तो वे अपने सूबेदारों की उपाधि क्षत्रप या क्षत्रपावन या महाक्षत्रप हमारे यहाँ रखे गए और गुस्तास्य, विस्तास्य के वज़न के कृश्वाश्व, श्यावश्व, बृहदश्व आदि ऋषियों और राजाओं के नाम दे गए। यूनानी यवनों से काम पड़ा तो वे यवन की स्त्री यवनी तो नहीं, पर यवन की लिपि यवनानी शब्द हमारे व्याकरण को भेंट कर गए। साथ ही बारह राशियाँ मेष, वृष, मिथुन आदि भी यहाँ पहुँचा गए। इन राशियों के ये नाम तो उनकी असली ग्रीक शकलों के नामों के संस्कृत तक में हैं, पुराने ग्रंथकार तो शुद्ध यूनानी नाम आर, तार, जितुम आदि काम में लेते थे। ज्योतिष में यवन सिद्धान्त को आदर से स्थान मिला। वराहमिहिर की पत्नी यवनी रही हो या न रही हो, उसने आदर से कहा है कि म्लेच्छ यवन भी ज्योतिःशास्त्र जानने से ऋषियों की तरह पूजे जाते हैं। अब चाहे वेल्यूयेबल सिस्टम भी वेद में निकाला जाय पर पुराने हिन्दू कृतघ्न और गुरुमार नहीं थे।

सेल्यूकस निकेटर की कन्या चन्द्रगुप्त मौर्य के ज़माने में आयी, यवन-राजदूतों ने विष्णु के मंदिरों में गरुड़ध्वज बनाए और यवन राजाओं की उपाधि सोटर त्रातर का रूप लेकर हमारे राजाओं के यहाँ आने लगी। गांधार से न केवल दुर्योधन की माँ गान्धारी आई, बालवाली भेड़ों का नाम भी आया। बल्ख से केसर और हींग का नाम बाल्हीक आया। घोड़ों के नाम पारसीक, कांबोज, वनायुज, बाल्हीक आए। शको के हमले हुए तो शाकपार्थिव वैयाकरणों के हाथ लगा और शक्संवत या शाका सर्वसाधारण के। हूण वंक्षु (oxus) नदी के किनारे पर से यहाँ चढ़ आए तो कवियों को नारंगी उपमा मिली कि ताजा मुड़े हुए हूण की ठुड्डी की सी नारंगी। कल-चुरी राजाओं को हूणों की कन्या मिली।

पंजाब में वाहीक नामक जंगली जाति आ जमी तो बेवकूफ़, बौड़म के अर्थ में (गौर्वाहीकः) मुहाविरा चल गया। हाँ, रोमवालों से कोरा व्यापार ही रहा, पर रोमक सिद्धांत ज्योतिष को के कोष में आ गया। पारसी राज्य न रहा पर सोने के सिक्के निष्क और द्रम्भ (दिरहम) और दीनार (डिनारियस) हमारे भण्डार में आ गए। अरबों ने हमारे 'हिंदसे' लिए तो ताजिक, मुजका, इत्थशाल आदि दे भी गए, कश्मीरी कवियों को प्रेम अर्थ में हेवाक दे गए। मुसलमान आए तो सुलतान का सुरत्राण, हमीर का हम्मीर, मुग़ल का मुंगल, मसजिद का मसीतिः, कई शब्द आ गए।

लोग कहते हैं कि हिन्दुस्तान अब एक हो रहा है, हम कहते हैं कि पहले एक था, अब बिखर रहा है। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा वैज्ञानिक परिभाषा का कोष बनाती है। उसी की नाक के नीचे बाबू लक्ष्मीचन्द वैज्ञानिक पुस्तकों में नयी परिभाषा काम में लाते हैं। पिछवाड़े में प्रयाग की विज्ञान परिषद और ही शब्द गढ़ती है। मुसलमान आए तो कौन सी बाबू श्यामसुन्दर की कमिटी बैठी थी कि सुलतान को सुरत्राण कहो और मुग़ल को मुंगल? तो कभी कश्मीरी कवि या गुजराती कवि या राजपूताने के पंडित सब सुरत्राण कहने लग गए। एकता तब थी कि अब?
...


(शेष लेख दूसरी कड़ी में )



साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित और विद्यानिवास मिश्र द्वारा संपादित ग्रंथ 'स्तबक' में संकलित

5 टिप्‍पणियां:

अनामदास ने कहा…

पगला देने वाला निबंध है, ज्ञान के इस पात्र की पेंदी का अंदाज़ा लगाना कठिन है. मैंने सहेजकर रख लिया है, अजित वडनेरकर साहब भी बौरा रहे होंगे इसे पढ़कर. भइया अगला वाला फौरन छापिए, नहीं तो किताब ही डाक से भेज दीजिए.

अरुण ने कहा…

गुलेरी जी की कथा और बीच मे विराम, पर मजबूरी है इंतजार रहेगा कल का..:)

बोधिसत्व ने कहा…

गुलेरी जी इस बात के सबूत हैं कि अच्छी रचना और लेखक को वकील की जरूरत नहीं होती। उसके अपने पाठक और भावक होते हैं। मजा आया। मस्त है।

Gyandutt Pandey ने कहा…

भाई; गुलेरी जी विलक्षण थे - अपने समय से कहीं आगे.

माधवी शर्मा गुलेरी ने कहा…

गुलेरी जी की रचना आपके ब्लॉग पर पाकर ख़ुशी हुई. लेकिन आप शायद इस तथ्य से अवगत नहीं हैं कि गुलेरी जी ने महज़ तीन नहीं बल्कि कई कहानियाँ लिखीं थीं. दुर्भाग्यवश कुछ कहानियाँ प्रकाश में नहीं आ पाईं और कुछ बिना छपे ही रह गईं. विलक्षण प्रतिभा के धनी गुलेरी जी अगर अल्पायु में ही इस दुनिया से विदा न लेते तो साहित्य प्रेमी उनकी और कई मारक रचनाओं का लाभ ले रहे होते.

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