शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स - २


हमारे समाज में पूँजीवाद के सकारात्मक पहलू की समझ ग़ैर-मौजूद है। हम हमेशा पूँजीवाद को पिछले समाज के या वर्तमान समाज के नज़रिये से देखते हैं और हो रही उथल-पुथल के लिए उसे ज़िम्मेदार मानते हैं, और गरियाते हैं। जैसे हम हमेशा ये दुहाई देते हैं कि पूँजीवाद यहाँ पर सामन्ती तत्वों से समझौता कर रहा है, उस से लड़ नहीं रहा। पूँजीवाद किसी से लड़ना नहीं चाहता। वो बाज़ार को, वस्तुओं को, सुविधाओं को दूर-दूर तक फैलाना चाहता है। और इस के लिए वह सबसे सरल रास्ता पकड़ता है। भ्रष्टाचार आसान राह है, ईमानदारी बड़ी कठिन है। ईमानदारी अड़ियल है, बेलोच है, भ्रष्टाचार बड़ा लचीला है। ईमानदार आदमी सिर्फ़ अपने आदर्शों की सोचता है, भ्रष्ट आदमी समझौते का, बीच का रास्ता तलाशता है। पूँजीवाद भ्रष्ट है क्योंकि पूँजीवाद अपनी प्रकृति में ही समझौतापरस्त है।

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पूँजी क्या है? मार्क्स के ही शब्दों में, पूँजी सरप्लस लेबर है। यानी मज़दूर की उचित मज़दूरी का ना दिया गया हिस्सा, जो पूँजीपति मज़दूर को न देकर अपने पास रख लेता है, वही पूँजी है। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि पूँजीपति पूँजी को अपने पलंग के नीचे ज़मीन में गाड़ कर नहीं रखता, जैसे कि मध्ययुग में सभी लोग रखते थे। वह पूँजी को समाज में वापस निवेश कर देता है। इस निवेश के ज़रिये समाज में नई सम्पदा और नई नौकरियों की सृष्टि होती है। यह सम्पदा कही जाती है कि किसी अम्बानी या टाटा की सम्पत्ति है मगर असल में वो एक पब्लिक प्रापर्टी परोक्ष रूप से बन चुकी है। क्योंकि उसका मालिकाना आज की तारीख़ में प्राइवेट लिमिटेड नहीं बल्कि पब्लिक लिमिटेड है। ये सही है कि उस संस्थान से होने वाले मुनाफ़े का सबसे बड़ा हिस्सा उस अम्बानी की जेब में जा रहा है लेकिन वह अहम नहीं है। अहम है क्रिएशन ऑफ़ वेल्थ। तर्क यह दिया जाता है कि पूँजीवाद, जो प्राकृतिक सम्पदा पहले से मौजूद है उस का कमोडिफ़िकेशन करता है। ठीक है, पानी और ज़मीन जैसी चीज़ों के साथ यही हो रहा है। लेकिन बिजली, सड़क और टेलेकाम, इन्टरनेट जैसी सुविधाओं के बारे में क्या कहा जाएगा? ये सचमुच क्रिएशन ऑफ़ वेल्थ है।

इस पर सवाल यह आता है कि अगर यह है भी तो क्या ऐसा सम्भव नहीं हो सकता कि इस सम्पदा की रचना के काम को सरकार अपने हाथ में ले ले और उसे इस तरह से अंजाम दे जिसमें आदमी का शोषण कम से कम हो। मेरा मानना है कि ये नहीं हो सकता। इसके प्रयोग किए गए और असफल हो गए। इसलिए असफल हो गए क्योंकि सरकार द्वारा उसे अंजाम देने के लिए उसके लिए एक नीति होनी पड़ेगी और एक योजना होनी पड़ेगी और उसका कार्यान्वन होना पड़ेगा। ये सब तभी हो सकता है कि जब आप ठीक-ठीक जानते हो कि पहुँचना कहाँ है? पूँजीवादी व्यवस्था एक विकसित होती हुई हस्ती है। उसके विकास का पूर्वानुमान किया जा सकता है लेकिन उसमें ग़लतियां होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाएगी। किसी पेड़ के विकास का पथ हम जानते हैं लेकिन अगर हम उसके विकास को नियोजित करने लगें तो हमें बजाय उसे मदद करने के उसमें बाधा बन जायेंगे। लेकिन पेड़ सिर्फ़ उपमा है और पूँजीवाद अपनी गति में बहुत तोड़-फोड़ करता है, इसलिए अलग-अलग मौक़ो पर कभी ढीली, कभी कठोर नीति की ज़रूरत होती है।

यहाँ पर यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि पूँजीवाद कोई आसमान से लाई गई और दुनिया पर थोपी गई व्यवस्था नहीं है। वो मनुष्य के हज़ारों साल के स्वाभाविक विकास की एक मंज़िल है। मनुष्य की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। किसी एक आदमी और किसी एक समाज और किसी एक देश की नहीं, पूरी मनुष्यता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति। पूँजीवाद कैसे विकसित होगा इसका निर्धारण करने और उसकी पूर्वयोजना करने की कोशिश सोशलिस्ट सरकारें ही नहीं, दुनिया का हर कारपोरेशन करता है, हर निवेशक करता है। वो अपने निजी मुनाफ़े के लिए शोषण की किसी भी हद तक जाता है, और भ्रष्टाचार के मार्फ़त लोकतांत्रिक सरकारों में बैठे अपने पिट्ठुओं से दमनकारी नीतियां और क़ानून बनवाता है।

लेकिन इन निजी मुनाफ़ों के पार पूँजीवाद की वृहत्तर गति को भी देखना चाहिये। वो कर क्या कर रहा है? वो अधिक से अधिक लोगों तक अधिक से अधिक सुविधाएं और उत्पाद पहुँचाने की तरफ़ उन्मुख है। और ये एक ऐसी शै है जो हर कारपोरेट, हर निवेशक और हर सरकार की खींचतान की हर सम्भव कोशिश के बावजूद, स्वतंत्र है। इसका एक अपनी चाल है, एक अपनी गति है, एक अपना चरित्र है। क्योंकि करोड़ों-करोड़ो लोग जो इस तंत्र का हिस्सा है, इसे प्रभावित कर रहे हैं। जो लोग माल बना रहे हैं, जो ढो रहे हैं, जो प्रचार कर रहे हैं, जो बेच रहे हैं, जो ख़रीद रहे हैं, सब। सब की मिली जुली अभिव्यक्ति है यह पूँजीवाद। उनके रंग-ढंग, पसन्द-नापसन्द, चाहतों और आंकाक्षाओं से बनता है उसका चरित्र, और तय होती है उसकी गति। एक सरकार उसे तय नहीं कर सकती, करेगी तो ग़लती कर बैठेगी, जैसी करती रहीं है। इसी अर्थ में पूँजीवाद लोकतंत्र का जुड़वां भाई है। इस बात को एक उदाहरण से समझें- फ़्रांस में सरकोज़ी ने बुर्क़े पर बैन लगाया लेकिन वहाँ के स्टोर्स डिज़ाइनर बुर्क़ा बना और बेच रहे हैं। आम चुनावों में मुसलमानों की नापसन्दगी का यह मुद्दा एक प्रेशर ग्रुप की तरह पार्टियों के बीच महत्वपूर्ण हो जाएगा और बड़े दलों की हार-जीत में निर्णायक भी हो जाएगा, सम्भवतः।

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ये समझने की ज़रूरत है कि आदिवासी इलाक़े जो पृथ्वी पर जीवन के तैयार हो रहे उस नए कलेवर की हद के बाहर रह गए सुदूरतम इलाक़े बने हुए थे जिसे पूँजीवाद या औद्योगीकरण कहा जाता है। उन इलाक़ो में इस तरह का संघर्ष उभरना दो तरह के संकेत देता है: एक तो यह कि यह कि विश्वस्तरीय बदलाव हर कोने अंतरे में घुसे कर उसे प्रभावित किए बिना नहीं रहने वाला, दूसरे यह कि मानवाधिकार और पर्यावरण के सवालों से रगड़कर पूँजीवाद का दमनकारी चरित्र सुधर सकता है। पूरी तरह न भी सही तो आम जन के बीच में ये सवाल एक जनमत रचेंगे और फिर उसके प्रत्युत्तर में पूँजीवाद को अपनी नीतियां बदलनी ही पड़ेंगी, क्योंकि जनमत ही पूँजीवाद की वो ईंट है जिस के सहारे से वो अपना पेट भरता है। और ठीक इसी वजह से वह लगातार उसे निंयत्रण करने की कोशिशें करता है। किसी सामन्त या बादशाह को कभी ये परवाह नहीं करनी पड़ी कि लोग क्या सोचते हैं। सच तो ये है कि आज तक अल्पमत ही बहुमत पर राज करता आया है, ये पहली बार है कि बहुमत अल्पमत पर हावी हो रहा है। वो अलग मसला है कि अल्पकालिक मुनाफ़े के लिए पूँजीवाद अल्पमत को भी तोड़-मरोड़ कर बहुमत के चोले में बेचने की तरक़ीबें करता रहता है।

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राज्य के ख़िलाफ़ मोटे तौर पर एक शिकायत तो ये है कि वो जंगल और ज़मीन को पूँजीवादियों के हवाले कर देना चाहती है जो आदिवासियों को बेदख़ल कर के जंगल को उजाड़ देंगे और पहले से ख़तरे में पड़े पर्यावरण का संकट और गहरायेंगे। इस का एक अलग जवाब बनता है, जो नीतिगत है। लेकिन इसके अलावा जितनी भी शिकायतें हैं वो किसी आदिवासी समाज के विरुद्ध किसी विशेष पूर्वाग्रह से नहीं उपजती हैं, जैसा कि दिखाने की कोशिश की जाती हैं। अत्याचारो की अनदेखी, दमन, बलात्कार और भ्रष्टाचार जैसी घटनाएं सिर्फ़ इसलिए होती हैं क्योंकि उन इलाक़ों में न सिर्फ़ आर्थिक पिछड़ापन है बल्कि सामाजिक पिछड़ापन भी है। लोकतांत्रिक और मानवधिकार की चेतना इस देश में जनमी हुई नहीं है। योरोप जिस नवजागरण की सन्तान है, जिसने मानवाधिकार आदि की चेतना को जन्म दिया, नवजागरणहीन समाज, बुढ़ाए हुए बीमार समाज से उस चेतना की उम्मीद करना कुछ ज़्यादती है। मुझे लगता है हमारी सरकार को थोड़ी कड़ाई और मुस्तैदी और मध्यवर्ग के सचेत तबक़े को थोड़ा धीरज अपनाने की ज़रूरत है।

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माओवादी आन्दोलन के साथ समस्या ये नहीं है कि वे आदिवासियों के मुद्दे उठा रहे हैं, और पूँजीवाद की मुख़ालफ़त कर रहे हैं। सरकार को सबसे अख़रने वाली बात ये है कि वे राज्य को चुनौती दे रहे हैं। वे एक समान्तर सत्ता बन कर उभर रहे हैं। वे न सिर्फ़ आदिवासियों के राजनीतिक, और सामाजिक जीवन के सभी पहलू सम्हाल रहे हैं बल्कि लोकतांत्रिक/पूँजीवादी राज्य की ही तरह अपने अस्तित्व की राह में आने वाले किसी भी रोड़े को हटाने में उसी क्रूरता का प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके लिए परम्परागत राज्य जाना जाता है। चूंकि दोनों एक ही जैसे हैं, एक ही चरित्र के हैं, और एक दूसरे की प्रतिबिम्ब हैं, इसीलिए दोनों एक दूसरे को मिटा देने के लिए इस तरह आमादा हैं। एक जंगल में एक ही सी प्रबल हिंसा वाले दो शेर नहीं रह सकते। एक को दूसरे को मारना होगा या अपने इलाक़े से बाहर करना होगा। इस लिहाज़ से दोनों ही प्रकृति के पुराने क़ानून का पालन कर रहे हैं।

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सुना गया है कि माओवादी आदिवासी गाँवों में बड़ा अच्छा प्रशासन चला रहे हैं। मगर जो उन की बात न माने उसे गोली मार देते हैं। इस दुनिया का जितना नुक़्सान सच्चे और आदर्शवादी लोगों ने किया है उतना किसी ने नहीं किया। सच्चाई, आदर्श इन सब में एक तरह की शुद्धता है। हिटलर भी एक शुद्धतावादी था वह एक शुद्ध आर्य प्रजाति तैयार करना चाहता था। वह मानता था कि चूंकि वह शुद्ध व सही है इसलिए ग़लत और अशुद्ध लोगों को गोली मार देने का उसे हक़ है। माओवादी कोई काम करने से पहले बहुमत की राय थोड़ी पूछते हैं, जिस को सही-सही ग़लत समझते हैं गोली मार देते हैं।

कुछ लोग, जिनमे सुदर्शिनी और सुतर्किणी अरुंधति भी हैं, वो बार-बार इन्ही लोगों के हवाले से पूछते हैं कि क्या यही मासूम आन्तरिक सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं? जब अरुंधति कंधे पर बंदूक लटकाये मासूमों को देखती हैं तो उनका मोहित हो जाना स्वाभाविक है। उनकी जगह मैं होता तो मैं भी मोहित हो गया होता। हिंसा में एक शुद्धता है, एक सरलता है जो शहर के लोगों की भ्रष्ट समझौते की ज़िन्दगी जीने से विरूप हो गए उनके चरित्र और चेहरे में नहीं मिलती। ऐसी सुन्दरता आप को बाघ में भी देख सकते हैं। बाघ जब हिंसा करता है तो अपनी ज़रूरत, अपने अस्तित्व के लिए करता है। जिस का उसे कोई पाप नहीं लगता, बाघ का चेहरा निर्दोष बना रहता है और सम्भवतः आत्मा भी निर्मल बनी रहती होगी। इसी तर्क से अपने अस्तित्व की रक्षा कर रहे आदिवासियों को भी पाप न लगना चाहिये। और इसी वजह से उनके चेहरे और आत्मा में कोई मैल न पा कर अरुंधति सम्मोहित हो चली होंगी।

इस देश में एक बड़ा आन्दोलन 'सेव टाइगर' का भी चल रहा है। अक्सर कुछ लोग अरुंधति पर यह आरोप भी लगाते हैं कि वो टाइगर की ही तरह आदिवासियों को भी, संकट ग्रस्त प्रजाति की तरह, उनके जंगलो में संरक्षित देखना चाहती हैं। मैं उन से सहमत नहीं हूँ, बावजूद उन दोनों – टाइगर और आदिवासी- के बीच आदिम सौन्दर्य की एकरूपता के। मेरे अनुसार अरुंधति आदमी और जानवर में अन्तर करना जानती हैं।

मुश्किल सिर्फ़ इतनी है कि जब आदिवासी सी आर पी एफ़ के ७५ नौजवानों की हत्या करते है, जिन्होने अभी तक उनके गाँवों को नहीं जलाया था और उनकी औरतों का बलात्कार नहीं किया था, और जो बन्दूक लेकर आदिवासियों से लड़ने का काम सिर्फ़ इसलिए कर रहे थे कि उनका अपना अस्तित्व संकट में था और पुलिस की नौकरी उसकी रक्षार्थ ही थी, तो क्या तब चित्रगुप्त के लिए इन हत्याओं को पाप के खाते से दूर रखने में दुविधा का सामना न करना होता होगा?

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आज कल टीवी पर नक्सली बहसों की अगुवाई करते हुए अर्णब गोस्वामी दलील देते हैं कि उन हमदर्दों को भी ग्रीनहण्ट के दायरे में लाना चाहिये जो इन माओवादियों से मिलते-जुलते और उन के बारे में लेखादि लिखते हैं। निश्चित ही उनका इशारा अरुंधति राय की ओर होता है। मध्यवर्ग में माओवादियों के विरोधियों का एक बड़ा तबक़ा उन से लगभग नफ़रत करने लगा है और शायद इसीलिए कैपीटलिस्ट मीडिया ने अरुंधति का लगभग बॉयकाट कर रखा है। अर्णव गोस्वामी जैसे लोगों में यह नफ़रत सबसे घिनौने तरीक़े से बाहर आती है जो लगभग फ़ासिस्टी सीमा पर है। मैं अरुंधति से सहमत नहीं हूँ लेकिन मैं अरुंधति के बोलने से सहमत हूँ। उन्हे बोलना चाहिये और पूरे ज़ोर से बोलना चाहिये, और हम सब को चाहिये कि उनको सुनें। भले न सहमत हों। हमारा लोकतंत्र उनकी नकार की आवाज़ से मज़बूत होता है। और जो वो बोलती हैं वो एक कड़वी सच्चाई है। आदिवासी इस देश और समाज के मुख्यधारा से बाहर हाशिये पर पड़े लोग हैं जिनकी आवाज़ को मुख्यधारा में जगह नहीं है; अरुंधति उनकी आवाज़ हैं।

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अरुंधति कितनी सुन्दर है और कितना अच्छा बोलती हैं! भाषा और भावों पर उनका कैसा एकाधिकार है! उनके चेहरे पर उच्च नैतिक बोध की एक आध्यात्मिक चमक है। अपने मधुर स्वर में वे जो बोलती हैं, लगता है कोई देवी बोल रही है। उन के जैसी कोई दूसरी स्त्री सामाजिक जीवन में नहीं है। मैं लगभग उनसे प्रेम करता हूँ और उनकी हर बात से सहमत होना चाहता हूँ। लेकिन मेरे भीतर प्रेम की, रूमान की नदी सूख चुकी है। काश मैं उन पर आँख मूँद कर भरोसा कर सकता; मेरा शुष्क विवेक, मेरे रुक्ष तर्क मुझे उस देवी से उलझा रहे हैं, मेरा ईश्वर मुझे क्षमा करे!


पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३

17 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

पढ़ रहा हूँ।

मिहिरभोज ने कहा…

बहुत अच्छा लिखते हैं आप......पर कुछ बातें हैं जो ध्याने करने लायक हैं....माओवादियों की चीन की सरकार का समर्थन प्राप्त है.....जो गाहे बगाहै कई बार जाहिर हो चुका है...तो एक तरह से ये विदेशी सहायता प्राप्त किसी आतंकवाद से कम नहीं....ये लोग विकास के विरोधी हैं और आदिवासियों को नीम अंधेरे मैं रखने के हिमायती है.....स्कूल,पुल,बिजली घर ,पंचायत घर इन सब को ये लोग खत्म कर देते हैं.....यदि ये आदिवासियों के हितैषी हैं तो इन सब को क्यों नष्ट करने पर तुले हैं.....या जहां सरकार कुछ विकास करना चाहती है उन इलाकों को ये लोग क्यो नहीं छोङ देते हैं.....पर इनका उद्देश्य आदिवासी हितों की रक्षा से कहीं आगै हैं...ये देश की सरकार के खिलाफ लङ रहे हैं...लोकतांत्रिक सत्ता को चुनौती दे रहे हैं ....अब आपके शब्दों मैं इन्हें क्या कहना चाहिये आप जाने.मैं कोई प्रोफेशनल लेखक नहीं पर मेरे शब्दों को आप समझ पायेंगे.....

स्वप्नदर्शी ने कहा…

Democracy kee bharteey roots ko janane ke liye lage hatho Rahul Sankrtyayan ko bhee padh lein

अभय तिवारी ने कहा…

स्वप्नदर्शी जी, आप का इशारा राहुल जी की किस पुस्तक की ओर है। उन्होने बहुत कुछ लिखा है, ऐसे पलटना मुमकिन नहीं।
अगर आप का इशारा प्राचीन भारत के गणतंत्रो की तरफ़ है, तो वो तो बहुत पुरानी बात हो गई और उनकी चेतना की कोई परम्परा नहीं बनी।

डॉ .अनुराग ने कहा…

मुझे लगता है सारे वाद नैतिकता को छोड़ चुके है ...लोग सरकार सरकार चिल्लाते है अरुंधती भी...सरकार कौन है ....लोग ...लोग याने .....हाड मांस के इन्सान ....यानी के पूरा एक सिस्टम .....एक क्लर्क है जिसे कहा गया है के एक गाय को एक आदिवासी को देना है .....पता नहीं कौन सी शक्ति उस गाय को बूढ़ा कर देती है ..क्लर्क कौन है ..करोडपति पूंजीवादी ?वन माफिया के गुंडे है ..ठेकेदार...माल पहुंचाने वाले ड्राइवर .आस पास के लोग.....हवलदार जिसकी तनख्वाह कितनी है ?मुझे इसमें कोई पूंजीवादी नजर नहीं आता ....सब बराबर के भागीदार है .....यानी शोषण की इस चेन में मुख्या पात्र वे लोग है जो लगभग उस तबके से थोडा ऊपर है .....पर ...केवल ..संवेदनशील होने भर से काम नहीं चलता उसको व्योवहार में लाने के लिए हम ओर आप क्या करते है वो महत्वपूर्ण है ........
अरुंधती बड़ी अच्छी महिला है .....पर सारी अच्छी महिलायों की सारी बाते मुझे हज़म नहीं होती ....वे कहती है बन्दूक उठाना जरूरी है ....पर बन्दूक उठत्ते ही सारी विचार धारा हाईजेक हो जाती है सारे बुद्दिजीवी दुबक जाते है ......शायद वे सी आर पी ऍफ़ के उस जवान के बूढ़े मोतियाबिंद से चोंधियाये हुए बाप से उस क्रान्ति के बारे में बात करना चाहे ?.....मोहरे दोनों ओर है .....बस खेलने वाले कई चेहरे है ....

Sanjeet Tripathi ने कहा…

काफी सरल-तरल भाषा में लिखा है आपने।
इस से मुझ जैसे मूढ़ बालक को भी समझने में आसानी होती है। शुक्रिया।
भाग और यह भाग दो, दोनों को पढ़कर कुछ और बातें समझ में आई हैं।

मिहिरभोज जी की बातों के जवाब मैं भी अक्सर तलाशने की कोशिश करता हूं। चूंकि नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में ही रहता हूं और आए दिन इन्ही सब तरह की खबरें यहां सामने आती है।

स्कूल उड़ा दिए जाते हैं क्योंकि वहां फोर्स रुकती है।
नक्सली बच्चों की भी भर्ती करते हैं जो उनके लिए मैसेंजर का काम करते हैं।
बीच में खबर आई कि राजनांदगांव के नक्सल प्रभावित इलाकों में हर घर से एक लड़का/लड़की की मांग नक्सलियों द्वारा की गई। न देने पर…

और अब तो यह भी खबरें आ रही हैं कि बकायदा सैलरी देकर भर्ती……?
"वाद" रहा होगा, निश्चित ही था पर अब नहीं क्योंकि ये बातें किसी "वाद" के माध्यम से लक्ष्य तलाशने की नहीं लगती.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

लिखने में,बहुत मेहनत की है....बधाई..

अभिषेक ओझा ने कहा…

पढ़ रहा हूँ, आज के आलेख में कई बातें अच्छी लगी. अरुंधती की एक किताब 'पॉवर पोलिटिक्स' बहुत पसंद आई थी कभी. अब उनकी किसी बात को सुनने का ही मन नहीं होता ! जहाँ तक मेरी समझ जाती है उस हिसाब से... मैं उस किसी विचारधारा का समर्थन नहीं कर सकता जो एक लकीर को पकड़ कर चले. जो समय जे साथ ना बदले, जो खुले दिमाग से ना सोचे. माओवादी मुझे ऐसे ही लगते हैं. ऐसा नहीं है कि वो पूंजीवाद समझ ही नहीं सकते, पर वो समझाना ही नहीं चाहते... सदियों पहले किसी की कही बातों को अब भी उसी तरह मानना. विचारधारा के नाम पर 'कुछ भी' करना? शायद... मैं पूंजीवाद का घोर समर्थक होता जा रहा हूँ. नहीं... हो गया हूँ.

AK ने कहा…

abhishek ji
jin wadion me khade hokar branded shirt or ye hat lagakar jo photo khichayan hai na usme to punjiwad ka samarthan karna hi hoga.kabhi jharkhand or chattishgarh ke adivashion ke bich berojgar bankar 2 mahina rah lije aap bhi naxal ke samarthak na bane to kahiyaga

अभिषेक ओझा ने कहा…

@AKji: हाँ मैं ब्रांडेड शर्ट पहनता हूँ... पर मैं उन ब्रांडेड टी शर्ट पहनने वालों में से हूँ जिनके लिए कभी एक चवन्नी की कीमत आज के किसी भी ब्रांडेड शर्ट्स से ज्यादा होती थी... मैं जानता हूँ आप नहीं समझेंगे मेरी बात. पर हाँ मुझे पता है जमीनी हकीकत. उन्हीं झारखण्ड की गलियों में मेरा स्कूल था औरक्लास में कम भी तो ८०% छात्र आदिवासी ही थे. यकीन मानिए जो आप सोच रहे हैं 'ये साले क्या जाने दुनिया क्या है' यही विचार मैं आपसे कहीं ज्यादा बाकी हिन्दुस्तान के लिए सोचता हूँ.
खैर... कुछ विचारधारा वालों को समझाने का कोई फायदा नहीं होता पर आप सोचिये तो सही... अगर पूंजीवाद से हल नहीं हो सकता तो फिर जो हो रहा है उससे आज तक हुआ है क्या कुछ इतिहास में? अनगिनत हत्याओं और खूब खराबे के अलावा? आप जिसे सही ठहरा रहे हो वो एक सैद्धांतिक बेवकूफ बनाने वाले आदर्श के अलावा कुछ भी नहीं.

योगेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा…

बहुत अच्छा लिख रहे हैं, जारी रखिये, पढ़ रहे हैं, आपकी अंतरबहस इतनी भरा हुयी है की कुछ बाकी नहीं रहा बोलने-लिखने को |

युवा क्रांति का अंत सुधीर मिश्रा ने "हजारों ख्वाहिशें ऐसी" में के. के मेनन के रोल में बढ़िया प्रस्तुत कर दिया है जो आपने भी कहा है |

परन्तु मानव के जो गुण-दुर्गुण पिछले लेख में कहे हैं, मेरा मानना है की वो मानव के स्वभावगत गुण ही हैं, परसाई जी की पहला पापी कहानी इस सम्बन्ध में बहुत अच्छी है |

बस एक छोटा सवाल |
अपने सपनो की पूर्ति के जंगलियों या औरों को अपने हिसाब तैयार कर लेने की परिभाषा को देखते हुए, क्या आप प्रभाकरन (LTTE) को माओवाद के दायरे में रखते हैं ?

अभय तिवारी ने कहा…

प्रभाकरन की एल टी टी ई माओवादी भले न हों पर आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न तो थे ही। एक पूरी पीढ़ी को युद्ध की विभीषिका में झोंक दिया, जितने दूसरे तरह के प्रतिरोध की अभिव्यक्तियां थीं उन सब के नेतृत्व की चुन-चुन कर हत्या की गई। और अब ऐसा ख़ालीपन हो गया है कि तमिल जन की न्यायोचित माँगों को लेकर आगे बढ़ने के लिए भी कोई नेता नहीं बचा। हथियारों पर इतना निर्भर रहने वाले तानाशाह हो ही जाते हैं..

मानव ने कहा…

beautiful hai:-)

अनूप शुक्ल ने कहा…

अच्छा लिखा है। और आखिरी में अरुन्धती से प्यार करने लगे। जय हो।

....सरकार को सबसे अख़रने वाली बात ये है कि वे राज्य को चुनौती दे रहे हैं। वे एक समान्तर सत्ता बन कर उभर रहे हैं।

ये बात सही लगती है! आगे वाला लेख देखते हैं अब!

AK ने कहा…

iS 60 SAAL KE PUNJIWAD NE MERE OFFICE ME 5000 LOGO ME 1 ADIVASHI NAHI DIYA.APKE CLASS KE 80% KE BICH SE BHI OR UNKE BAHAR SE BHI JINKE BARE ME BAAT KAR RAHE HAI UNKI EK BHI TIPPANI NAHI.MAOVADI HAMARE HATH ME HATHIYAR NAHI DE SAKTE SIR.YAH HAMARA PUNJIWAD HAI JO UNHE MAOWADI BANNE KE LIYE KAH RAHA HAI. WARNA 30 SAAL PAHLE GALTI SE HATHIYAR KAHI PADA MIL BHI JAYE TO USE UTHATE BHI NAHI THE

अजित वडनेरकर ने कहा…

बहस से हटकर लिख रहा हूं-

अरुंधती को सुदर्शिनी लिखा पढ़ना अखर गया। ऐसी तो वे कभी नहीं थीं। आपके सौन्दर्यबोध को क्या हो गया?

प्रीतीश बारहठ ने कहा…

पढ़ा।

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