राजनीति नाम से यह आभास होता है कि फ़िल्म भारत की समकालीन राजनीतिक सच्चाईयों पर आधारित कोई फ़िल्म है। और बहुत से लोग इस धोखे का शिकार हो भी गए हैं जिसमें प्रखर राजनैतिक टिप्पणीकार पुण्य प्रसून बाजपेयी भी शामिल हैं।
फ़िल्म के कथ्य पर वापस लौटते हुए यही कहूँगा कि यह फ़िल्म वास्तविकता का एक अच्छा भ्रम पैदा करती है लेकिन है वह भ्रम ही, वास्तविकता नहीं है। प्रकाश झा ने महाभारत और गौडफ़ादर की कहानी का इस्तेमाल किया है एक सफल फ़िल्म बनाने के लिए और सफल हुए हैं। कर्ण को दलित बना कर दलित राजनीति का कोई नया पहलू उजागर नहीं हुआ, कर्ण तो पहले भी सूतपुत्र ही था। बी एस पी जैसी परिघटना को तो अपनी पटकथा में क्यों नहीं सजा पाए झा जी? क्योंकि उनका ज़ोर समकालीन भारतीय सच्चाई को दिखाना नहीं, समकालीन भारतीय सच्चाईयों का इस्तेमाल कर के एक कामयाब यानी बिकाऊ माल बनाने पर है।
इसलिए 'राजनीति' को बिलकुल भी उस नए सिनेमा की श्रेणी में रखने की ग़लती मत करें जिसकी पताका दिबाकर बैनरजी और अनुराग कश्यप लहरा रहे हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ी पूंजी का दखल, मूल मुद्दे, नक़्ली भावनात्मक मुद्दे, जनता की विविध आकांक्षाएं, सड़क, पानी और बिजली के साथ जंगल, ज़मीन और पर्यावरण के सवालों को घेरे में लिए बिना कोई कैसे भारत की राजनीति की सच्ची तस्वीर बना सकता है?
प्रकाश झा की 'राजनीति' सिर्फ़ सामंती आपराधिक राजनीति की एक अतिरंजित तस्वीर बन गई है जो एक बीती हुई दुनिया का अवाञ्छित अवशेष है। आज की असली राजनीति में अपराध, शुद्ध सामन्ती सत्ता के लिए नहीं आर्थिक सत्ता के लिए होते हैं। सत्ता की राजनीति, अपनी अहम-तुष्टि के लिए गद्दी हासिल करने की राजनीति नहीं है। गद्दी हासिल कर के अर्थव्यवस्था को अपने अनुकूल करने की राजनीति है जिसकी एक भोथरी झलक कर्णाटक के रेड्डी बन्धुओं में और उसका महीन वितान अम्बानियों में मिलता है।