शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३



सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार भारत में आज जो चार प्रकार के जन पाए जाते हैं – निषाद (औस्ट्रिक; कोल, भील, शबर), किरात (मंगोलोइड, पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले चीनी तिब्बती भाषा मूल के), द्रविड़ (दास, द्रविड़, नाग) और आर्य (भारोपीय)- उन में आदिवासी निषाद सब से पुराने हैं। किरात, द्रविड़ और आर्य जनों में लम्बे समय तक हुई वर्ण संकरता के चलते ये तीनों संस्कृतियां और जन आपस में घुल मिल गए हैं। लेकिन निषाद संस्कृति ने जंगल के जीवन में ख़ुद को सीमित कर के अपने आदिम स्वरूप को अब तक बनाए रखा है। मुख्यधारा ने उनके साथ अन्याय और अनदेखा किया है। लेकिन आज के पहले कभी ऐसा मौक़ा नहीं आया कि आदिवासी जीवन, और मुख्यधारा का समाज ‘इतना’ आमने-सामने आ गया हो। ये पूँजीवाद की विराटता के चलते हो रहा है। इतना तो तय है कि वो कटे हुए नहीं रह सकते। बाहर के समाज ने उन्हे बुरी तरह से न सिर्फ़ घेर लिया है बल्कि अपनी लड़ाई में फंसा भी लिया है। इस लड़ाई में पूँजीवाद जीते या माओवादी, आदिवासी जीवन अब पहले वाली स्थिति में बना नहीं रह सकता। वो बदल चुका है। सवाल ये है कि वो अपने पर्यावरण को कितना बचाए रख पाते हैं जिसके साथ वो एकता महसूस करते हैं?

माओवादियों के लिए आदिवासियों को उनका पर्यावरण, उनका जंगल, उनकी ज़मीन दिला देना उनका लक्ष्य नहीं है। वे इस देश में न्यू डेमोक्रेसी क़ायम करना चाहते हैं, क्योंकि यह देश अभी भी अर्ध-सामंती, अर्ध औपनिवेशिक अवस्था में फंसा हुआ है। न्यू डेमोक्रेसी के बाद वो पूँजी का विकास करके समाजवाद के रास्ते पर बढ़ चलेंगे और मार्क्स और माओ के सपने का समाज बनाएंगे। न तो उनके पास न्यू डेमोक्रेसी की बहुत कोई व्यावहारिक धारणा है और न ही पूँजी के विकास को लेकर भी कोई ठोस योजना। न जाने क्यों वे ये भी नही देख पाते कि राज्य के द्वारा पूँजी के विकास का मॉडल बुरी तरह नाकाम हो चुका है और चीन तक ने बिना लोकतंत्र लाए पूँजी के लिए खुला बाज़ार खोल दिया है। मज़े की बात ये सोचने की है अगर माओवादी चीन में होते तो क्या करते? क्योंकि वहाँ तो भारत के पासंग बराबर भी लोकतंत्र नहीं है और पूँजी के विकास के लिए जनता की यथास्थिति का दमन वहाँ जिस तरह होता है उसे जान कर सिंगूर के किसान बुद्धदेब बाबू के प्रति अपने प्रतिरोध को लेकर कुछ अपराधबोध पाल सकते हैं।

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सर्वहारा वर्ग के पक्ष से विकास करने वाली व्यवस्थाओं का रेकार्ड बहुत रक्तरंजित रहा है। और मज़े की बात ये है कि सत्तर साल तक सोवियत संघ में समाजवाद रहने के बाद जब वहां लोकतंत्र आया तो ऐसा नहीं था कि वहाँ वर्ग विभेद बिला चुके थे? वे समाज में मौजूद बने रहे, भले ही सुप्तावस्था में? ये विचित्र बात कैसे सम्भव हुई? इसका क्या अर्थ है? तो इतना सब प्रपंच किसलिए, जब मनुष्य के मिज़ाज में जब कोई परिवर्तन आना ही नहीं है?

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सलवा जुडुम को सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की एक रपट के आधार पर बन्द करने का आदेश दे दिया जिसमें उसके ऊपर व्यापक स्तर पर मानवाधिकार हनन का आरोप था। लेकिन क्या माओवादी मानवाधिकार हनन के आरोप से मुक्त हो सकते हैं? क्या वे मानवाधिकार में विश्वास करते हैं? क्या है क्या मानवाधिकार? दोषी को सज़ा देने के प्रावधान हर व्यवस्था में है। आरोपी के दोष साबित होने के पहले तक दोषी के अधिकार के इर्द-गिर्द ही मानवाधिकारों का ताना-बाना है। मगर माओवादी तो इसी बात को दोष मानते हैं कि अगर कोई उनको लेवी देने से इन्कार करे या उनकी लड़ाई में उनका साथ न दे।

मज़े की बात ये भी है कि जो लोग देश में लोकतंत्र न होने की दुहाई देते नहीं थकते वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुडुम पर बंदिश के आदेश को, राज्य और व्यवस्था के चरित्र का आकलन करते वक़्त उसे शामिल करना बिलकुल गोल कर जाते हैं। वो ये भी नहीं देखते कि माओवादियों से कैसे निबटा जाए इस बात पर भी सरकार एकमत नहीं है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, अलग-अलग मंत्री, यहाँ तक कि सेना प्रमुख भी अलग राय रखते हैं और उसे खुले मंच से बोलते हैं। ये स्वप्नदर्शियों के स्वप्नों का जनतंत्र भले न हो पर ये जनतंत्र के लक्षण नहीं है तो और किसके है?

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लेकिन शायद जब वे कहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र नहीं आया तो वे जहाँ हैं, उसको केंद्र में रखकर बोलते हैं और जब हम उसे सुनते हैं तो हम जहाँ है, उस में रहकर सुनते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। शहरों में अपेक्षाकृत लोकतंत्र काफ़ी मज़बूत है और गाँव में लोकतंत्र अभी दूर के ढोल हैं, और सुहाने वाली बात तो दीगर ही है।

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लेकिन हर समाज में हर काल में ऐसे लोग होते हैं जो हर बात का नकारात्मक पहलू ही देखते हैं, उन्हे हमेशा लगता है कि दुनिया से बद से बदतर होती जा रही है। वे बार-बार ये कहते हैं, 'सब कुछ सड़ रहा है, खोखला हो रहा है, मर रहा है'। वो कहते हैं, 'पहले का आम बड़ा मीठा होता था, अब तो आम खाने लायक नहीं रहा, आम में स्वाद ख़त्म हो रहा है'। बिना इस बात को ख़्याल में लाए कि इस देश में जनतंत्र था कब? जो सड़ कर, खोखला हो गया? अगर आदिवासियों के बीच में मैलन्यूट्रीशन है, एबजेक्ट पावर्टी है तो वो क्या अभी दस-बीस साल का परिणाम है? वो तो हज़ारों सालों से है। और इसलिए है कि वहाँ पूँजीवाद कह लीजिये, विकास कह लीजिये, जो नाम भी है उस कल्याणकारी प्रभाव का, वो नहीं पहुँचा है।

लेकिन अगर सरकार रोड बनाने जाये, मिसाल के लिए, और बिना किसानों को उचित प्रतिदान दिए कुछ खेतो को अधिग्रहीत कर ले तो वे इस का प्रतिरोध करते हुए कुछ ऐसा सुर ले लेते हैं कि जिसमें उचित प्रतिदान का आन्दोलन, रोड की मुख़ालफ़त का आन्दोलन बन जाता है। पूँजीवादी प्रगति के तमाम प्रतीक चिह्न क्रिकेट स्टेडियम, शौपिंग मौल्स, एअरपोर्ट, सब के विरुद्ध किसानी जीवन के चिह्नों को, जन संस्कृति के रूप में भिड़ा दिया जाता है। उचित मुआवज़े का आन्दोलन, पूँजीवादी विकास के विरोध का आन्दोलन बन जाता है। फिर शिकायत ये लगातार बनी रहती है कि देखिये कितना पिछड़ापन, कितनी ग़रीबी है, कितना कुपोषण है। चालीस बरस तक तो समाजवादी राह पर चलकर कहीं नहीं पहुँचने के बाद अभी कुछ विकास होना शुरु हुआ है। सब कुछ पलक झपकते सम्भव नहीं क्योंकि ये पूरा विकास ट्रिकल डाउन सिद्धान्त पर धरा हुआ है। विकास की दूसरी अवधारणा, मैं भी चाहता हूँ कि हो, कोई तो विकल्प हो जिसमें कम से कम तक्लीफ़ से अधिक से अधिक लोगों को समृद्ध किया जा सके। ऐसा कोई विकल्प बनना ज़रूर चाहिये लेकिन वो सिर्फ़ विरोध और प्रतिरोध से नहीं बनेगा, हिंसा से तो बिलकुल नहीं।

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अमरीका और योरोप में पूँजीवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध एक उन्नत स्तर का है। वहाँ पूँजी का विकास हो चुका है। वहाँ का समाज को अगले स्तर में जाने के लिए बेचैन है। लेकिन भारत जैसे देश में पूँजी का विरोध का अर्थ है विकास का विरोध, प्रगति का विरोध। इस प्रस्थापना में एक आधारभूत अड़चन है: पर्यावरण। उसका क्या हल है, मैं नहीं जानता। लेकिन जो इस बात को मुझसे बेहतर समझते हैं या समझने का दावा करते हैं, वो माओवाद के पाले में कैसे जा कर खड़े हो सकते हैं जबकि माओवाद की पर्यावरण के प्रति कोई घोषित नीति नहीं है?

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माइन का विरोध करने वालों ने पूरे जंगल को लैंडमाइनो से भर दिया है। ये जंगल की, पर्यावरण की रक्षा हो रही है या उसे युद्ध के उन्माद में एक दूसरे अफ़्ग़ानिस्तान में बदला जा रहा है? इस पर मीर तक़ी मीर का एक शेर याद आता है:

अब की जुनूँ में, फ़ासला शायद न कुछ रहे,
दामन के चाक का और गरीबाँ के चाक का।

(दामन का अर्थ कमरे के नीचे पहनने का वस्त्र होता है, आँचल नहीं जैसा कि आम समझ है, और गरीबाँ तो आप जानते ही हैं)

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अरुंधति की रपट से पता चलता है कि जब आदिवासी गाँव में लोग रेडियो पर सुनते हैं कि नितीश और गुरुजी 'नक्सल तो हमारे भटके हुए बच्चे हैं' जैसी बात कर रहे हैं तो वे हँस पड़ते हैं क्योंकि ‘वे जानते हैं कि उनके नाख़ून और दाँत निकालने के कार्यक्रम से आप घड़ियां मिला सकते हैं’। ये हैरानी की बात नहीं है कि आदिवासी ऐसे किसी नेता पर यक़ीन नहीं करते जो उनके प्रति मुलायमियत बरत रहा हो। मगर ऐसा क्यों है? क्या वे अपने अनुभव से ऐसा जानते हैं जैसे हम गहरे तौर पर जानते हैं कि सारे नेता चोर और हरामी होते हैं, या ये माओवादी की शिक्षा का अंग है जिसमें किसी भी नरमी को छिपी हुई तेज़ी का संकेत समझो ताकि लड़ने का तेवर कभी मद्धम न पड़ने पाए? अगर ऐसा है तो यह दुनिया को सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पूर्वाग्रह से ही देखने की ज़िद है, कि हम ने तो तय कर लिया है कि मुख्यधारा हमारे ख़िलाफ़ है और हमें उनसे आर-पार का युद्ध करना है। अगर आप फ़ौज भेजते हैं तो हमारी बात की पुष्टि होती है, और अगर आप फ़ौज न भेजकर अमन की बातें करते हों तो हम जानते हैं कि ये ढकोसला है और हम आप की बात पर हँसते हुए फ़ौज के आने की तैयारी करते जाते हैं।

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बहुत सारे अन्याय जो मुख्यधारा के समाज में होते रहे हैं, होते हैं, वो आदिवासी समाज में भी पाए जाते हैं- जैसे स्त्रियों के प्रति भेदभाव या मुखिया द्वारा बाक़ी लोगों के साथ अन्याय। माओवादी इन पुरातन मान्यताओं और रिवाज़ों के खि़लाफ़ भी लड़ते हैं। मज़े की बात ये है कि पूँजीवाद भी उनके ख़िलाफ़ लड़ रहा है, उसके ऊपरी संदेश पर मत जाइये, वो जो जीवन बना रहे है उसे देखिये। वो पुरानी हर चीज़ को कचरे में डाल रहा है। नए मूल्य गढ़ रहा है। पुराने को नष्ट करने के पाप के लिए माओवादी तब उसकी निन्दा करते हैं और अपने स्तर पर वही काम करते हैं। ये बड़ी अजब बात है कि माओवादी, ऐतिहासिक भौतिकवाद में विश्वास रखने के बावजूद आदिवासी-खेतिहर समाज में नए मूल्य के बीज डाल रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि बिना स्थितियां बदले ही मूल्य पक्के पेड़ बन जाएंगे और आगे तक फल देते रहेंगे। जब उत्पादन के मोड में फ़र्क़ नहीं आया है तो इस बात की क्या गारण्टी है कि माओवादी सरबराहों के हटते ही पुराने मूल्य वापस न लौट आयेंगे? सलवा जुडुम वाले माओवादियों का विरोध करते हुए उन पुरानी मान्यताओं की पुनर्स्थापना का भी नारा लगाते हैं जिन्हे माओवादियों ने रोका है, जैसे औरतों को बीज न बोने देना, उन्हे पेड़ पर न चढ़ने देना, और एक से अधिक शादी की आज़ादी लेना। वैसे ही जैसे भाजपा एक उग्र हिन्दुत्व का रूप धर कर आती है।

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पुलिस वालों द्वारा की जा रही मुठभेड़ों में किए गए फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और माओवादियों द्वारा जनअदालत के तुरत-फ़ुरत न्याय में फ़र्क ये है कि जहाँ पुलिसवालों के एन्काउन्टर को क़ानून की मान्यता नहीं मिली हुई है। और राज्य उस नृशंसता की भर्त्सना करता है और उस के लिए मौक़ा पड़ने पर अपराधी पुलिस वालों को दण्डित भी करता है। लेकिन जनता की सामूहिक शिरकत वाली जनअदालतों का न्याय उस नृशंसता को संस्थाबद्ध न्याय को चोला पहना देता है। जिसे अरुंधति इसलिए भारतीय अदालत के न्याय से ऊपर इसलिए मानती हैं क्योंकि उसमें जनता साक्षात उपस्थित है और फ़ैसले की भागीदार है। दूसरी तरफ़ उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, जनसमूह और उसकी आकांक्षाओं से बहुत पहले कट चुके हैं। इस राज्य की घिसटती हुई न्याय व्यवस्था के बारे में तो हम बहुत सुन चुके हैं लेकिन जन अदालतों पर अरुंधति की बात के सन्दर्भ में नीत्शे का एक वचन याद करने योग्य है, 'व्यक्तियों में पागलपन और वहशत एक अपवाद है लेकिन समूह में हमेशा एक नियम'। अकेला आदमी दंगा नहीं करता, दंगा एक सामूहिक व्यवहार है। इस तर्क को खींच कर यहां तक ले जाया सकता है कि सामूहिकता एक पाशविक वृत्ति है और निजता एक मानवीय गुण। यह बात पूरी तरह से भले ठीक न भी हो पर इसमें सच्चाई के अंश ज़रूर हैं।

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अरुंधति दंतेवाड़ा में माओवादियों द्वारा की गई ७६ सुरक्षाकर्मियों की हत्या की भर्त्सना करने से इंकार करती हैं। उनका तर्क है कि वे सताए हुए लोग हैं और उनके द्वारा बचाव में की गई प्रतिहिंसा की तुलना राज्य की संरचनात्मक हिंसा से नहीं की जा सकती। ये सिर्फ़ एक चतुर तर्क लगता है ताकि इस तुलना को अनैतिक बता कर इस का सामना करने से बचा जा सके क्योंकि अरुंधति के डिसकोर्स का पूरा संसार, हिंसा और अन्याय की अनैतिकता के आधार पर खड़ा किया गया है।

७६ सुरक्षाकर्मियों की ये हत्या आदिवासियों ने नहीं की, माओवादियों ने की। एक सोची-समझी नीति के तहत की। क्या है वह नीति? वो नीति है दुश्मन को एक कठोर सबक सिखाने की नीति, अपने इरादों की अटलता का सीधा संदेश देने की नीति। माओवादी दण्डकारण्य में एक पार्टी की तरह नहीं, एक समान्तर राज्य की तरह काम कर रहे हैं, जैसा कि अरुंधति ने स्वयं अपनी रपट में लिखा है। उनकी जनताना सरकारें सेना, अर्थ्व्यवस्था, कृषि, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सबसे महत्वपूर्ण न्याय, सभी मूलभूत अंगो का संचालन कर रही हैं।

ये कोई बेचारगी की, हताशा की आत्मघाती हिंसा नहीं है जैसे कि फ़िलीस्तीनी ख़ुद्कुश बम करते थे, और कुछ अभी भी करते हैं। ये सजग, सचेत, बचाव की नहीं और अपनी पहलकदमी वाली हमले के चरित्र की हिंसा है। अगर माओवादी चाहते तो उनमें से कुछ को जीवित भी छोड़ देते, गिरफ़्तार करते, मुक़द्दमा चलाते। उस न्याय का परिचय देते जिस की अपेक्षा वो भारत सरकार से करते हैं। लेकिन उन्होने ऐसा कुछ नहीं किया, उन्होने सब की हत्या की। जो बच गए वो ग़फ़लत में बच गए। क्या ये अजीब नहीं है कि अरुंधति के दो मापदण्ड हैं, एक माओवादियों के लिए और दूसरा राज्य के लिए?

(जारी)

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२

 

15 टिप्‍पणियां:

C G ने कहा…

बहुत ही उत्तम आलेख. आपकी गहरी समझ को दाद देते हुये इस मुद्दे पर अपनी समझ को भी विस्तृत करने का मौका देने का शुक्रिया.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

यात्रा पर हूँ, बिटिया के घर पहुँचते ही उस का यंत्र खाली मिल गया। तीसरी कड़ी पढ़ ली है। कुछ निष्कर्षों पर मतभेद है, किन्तु आलेख की दिशा सही है। पूरा पढ़े बिना कुछ भी कहना उचित नहीं है। वह उचित पद्धति भी नहीं है।
आप ने इस विषय पर लिखने की पहल की है यही बहुत बड़ी बात है। इस से आगे समझ को विकसित होने के मार्ग खुलेंगे।

Shiv ने कहा…

आपके नोट्स पढ़कर यह समझा जा सकता है कि व्यवहारिकता का क्या महत्व है. विषय पर आपकी समझ और पकड़ अद्भुत है.

Arvind Mishra ने कहा…

ई इन्वेर्सिटी के पुराने धुराने नोट का फायादा उठाया जा रहा है क्या अभय भाई ....मुझे कापी मिल जाय तो शून्य बटा लड्डू ....इतना लंबा कहीब्लॉग पर लिखते हैं ! परीक्षार्थी परीक्षक से कम गधा नहीं है .....

आनंद ने कहा…

आप ने इस विषय पर लिखने की पहल की है यही बहुत बड़ी बात है।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

मेरी व्यक्तिगत राय में -अरुंधति के तर्क को किसी कीमत पर मैं सही नहीं मानता बाकी आप लिख ही रहे हैं.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वे इस देश में न्यू डेमोक्रेसी क़ायम करना चाहते हैं,
न्यू या मोडीफाइड डेमोक्रेसी, कर्रेंट डेमोक्रेसी और उसके निवासिओं का बेरहमी से क़त्ल करके नहीं आ सकती यह बात मओवादिओं और उनके पिट्ठुओं को अच्छी तरह पता न हो ऐसे नादाँ नहीं हैं वे. वे सत्ता और संसाधनों पर निरंकुश एकाधिपत्य चाहते हैं और इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.

अभिषेक ओझा ने कहा…

सटीक !

अनूप शुक्ल ने कहा…

सर्वहारा वर्ग के पक्ष से विकास करने वाली व्यवस्थाओं का रेकार्ड बहुत रक्तरंजित रहा है।

सही है।

अरुंधती भी ईमानदार की तरह अड़ियल हो चुकी हैं। इसलिये इन हत्याओं की भर्त्सना नहीं कर पा रही होंगी।

पूंजीवाद और आज के समाज पर अखिलेशजी का लेख याद आता है अक्सर-कोई शराब मांगेगा, आइसक्रीम मांगेगा, स्त्री का शरीर मांगेगा, घूस मांगेगा, कुछ भी मांगेगा। उसे नहीं मिलेगा तो गोली मार देगा । कोई कहेगा कि उसका धर्म सर्वोच्च है, यदि सामने वाले ने स्वीकार नहीं किया तो उसे खत्म कर दिया जायेगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विचार उमेड़ती प्रस्तुति

Sanjeet Tripathi ने कहा…

बहुत ही बढ़िया लेखन शैली।

कितनी सरलता से आपने सभी बातों का समावेश किया है एकदम आसान तरीके से कि हर कोई समझ सके।

इस श्रृंखला को पढ़कर और भी कायल होता जा रहा हूं।

Mired Mirage ने कहा…

अभय, बहुत सही विचार रखे हैं। हम यह मान सकते हैं कि आदिवासियों या किसी भी वर्ग के साथ अन्याय हुआ है या हो रहा है, किन्तु उसकी आड़ में माओवाद या किसी भी अतिवाद जिसमें लोकतान्त्रिक मूल्य न हों, जिसमें हिंसा की स्तुति की जाती हो, भय जिसके फैलने के लिए आवश्यक सामग्री हो, को सही
नहीं ठहराया जा सकता।
घुघूती बासूती

प्रीतीश बारहठ ने कहा…

दामन !!!!

अजित वडनेरकर ने कहा…

"ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र के वो विशेष अधिकारों के विपरीत, ब्राह्मण की अवमानना पर कोई विशेष अपराध नहीं बनता जबकि दलित के सम्मान की रक्षा के लिए हर सम्भव जगह बनाई जा रही है? "

जम कर चिंतन किया है पंडित जी। ऐसी अनेक पंक्तियां कोट करता चला जाऊंगा, अगर अपनी पसंद बताने की शर्त रख दी जाए।

अजित वडनेरकर ने कहा…

“असल में ये उनकी समझ का दोष है जो राज्य के चरित्र और समाज के चरित्र में भेद नहीं कर पा रहीं।”

दरअसल ये हर उस छद्म साम्यावादी-समाजवादी की समझ का दोष है जो कभी हिन्दुओं को बख्शने के मूड़ में नहीं रहे। और तो और व्यापक हिन्दू समाज में भी अल्पसंख्य ब्राह्मण ही इनके निशाने पर रहे। इन्हें नहीं दिखता कि अपनी मातृभूमि पर आज सिर्फ तीस से पैंतीस हजार रह गए पारसी (प्रकारांतर से जोरास्ट्रीयन) भारत में फल फूल रहे हैं और एक लाख की तादाद में हैं। इनकी आबादी धीमी गति से बढ़ रही है तो सिर्फ इसलिए कि अपनी नस्ल को लेकर इनका दृष्टिकोण सनक की हद तक शुद्धतावादी है। हमलावर इस्लामी ताकतों का चरित्र सबको पता है। वे खैरात बांटते हुए यहां नहीं आए थे। इसके बावजूद यहां वे लगातार बढ़े, फले-फूले। धर्म के भरोसे बहिश्त के सुखों की चाहवालों की तुलना में वे कहीं ज्यादा बढ़े जिन्हें इस मुल्क के कानून और अमन में ज्यादा भरोसा था। गौरतलब यह भी है कि आजादी के बाद इस देश में इस्लाम खूब फलाफूला तो इसमें गलती हिन्दुओं या ब्राह्मणों की कैसे है? अगर इस्लामपरस्तों का बड़ा तबका अपने मजहब की ऐसी बढ़ती में खुद को गारत कर भी खुश है तो कोई क्या करे? अपने बाशिंदों के खुशहाल होने से कोई मजहब ज्यादा व्यापक होता है या उस तरह से जैसा इस उपमहाद्वीप में नजर आ रहा है।

जो आदिवासी माओवादी तौरतरीकों पर यकीन नहीं करते क्या वे आदिवासी नहीं? अरुंधती अंततः सरकारी अंधेरगर्दी का विरोध करते हुए माओवादी अंधेरगर्दी के पक्ष में खड़ी हैं।

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