गुरुवार, 3 मई 2007

रवीश, अविनाश और बोधिसत्व की चुप्पी के जवाब में

शिल्पा शेट्टी और रिचर्ड गियर के चुम्बन-विवाद पर मीडिया की भूमिका पर मेरी प्रविष्टि पर ब्लॉग जगत के लगभग सभी पत्रकार कतरा कर निकल गये.. वो भी जिनके साथ मैं एक दल का सदस्य समझा जाता हूँ.. वह दल भी सन्नाटा साधे रहा .. खैर, आज एक बेनाम प्रतिक्रिया आई है.. जो इस लायक है कि उसे अलग से एक प्रविष्टि के तौर पर सम्मान दिया जाय और वो मैं दे रहा हूँ..



मैं कोई कुलवक्ती यानि होलटाइमर पत्रकार नहीं हूँ भाई इसीलिए आप द्वारा उठाए गए मुद्दे पर बोलने का अधिकारी मैं शायद नहीं हूँ । होना तो यह चाहिए था कि आप के मुद्दे पर रवीश, अविनाश, बोधिसत्व या खबरिया चैनलों में काम कर रहे अन्य पत्रकार मित्र करते पर लगता है कि इन लोगों ने न बोलने का मन बना लिया है इसलिए मैं अपनी जैसी भी समझ है कुछ कह रहा हूँ ।

खबरें किनके खिलाफ नहीं चलतीं

अ- वे लोग जिनकी पकड़ कॉरपोरेट वर्ल्ड पर हो अक्सर खबरिया चैनलों के मध्यवर्गीय संपादक ऐसे लोगों के खिलाफ खबरें नहीं चलाते ।अगर चलाते भी हैं तो ऐसी भाषा में जिनमें आक्रामकता का नामोनिशान भी न हो। खबर चलने के दौरान कोई ना कोई फोन उस समय के ऑउटपुट एडीटर को गालियाँ दे रहा होता हैऔर ऑउटपुट एडीटर माफी मांग रहा होता है ।और खबर थोड़ी ही देर में लुढ़क जाती है।

ब- बड़े औद्योगिक घरानों के खिलाफ कोई भी खबर कभी नहीं चलती। जो खबर चलेगी वो खुश करने के लिए । बड़े औद्योगिक घरानों के मुखिया की उड़ान और देवालयों की परिक्रमा का प्रसारण कभी भी छोड़ा नहीं जा सकता ।रतन टाटा और सिंहानिया की उड़ान और रिलायंस के अनिल भाई धीरूभाई अंबानी की तीर्थयात्रा हो या पारिवारिक तकरार दोनो खबरो में सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें की जाती हैं । तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालु भक्तों को दर्शन में हुई देरी के लिए सिर्फ अमिताभ बच्चन को ही निशाना बनाया जाता है । जबकि अनिल भाई भी उस मंदिर में दर्शन के लिए अमिताभ परिवार के साथ गए होते हैं । लेकिन किसी चैनल के संपादक के बस में नहीं कि वह अनिल भाई के खिलाफ कुछ भी बोल सके।

स-अक्सर शुरु के दिनों में हर पत्रकार किसी ना किसी नेता की लटकन हुआ करता है । आप चाहें तो पता कर सकते हैं कि किस पत्रकार को किस नेता ने प्रमोट किया है । बड़े पदों पर पहुंच जाने के बाद भी संपादक को अपने प्रमोटर नेता को याद रखना पड़ता है ।

द-जिन दलों के पास पाले हुए गुंडे कार्यकर्ता हों उनके खिलाफ कोई भी चैनल कोई भी खबर नहीं दिखाता । आप उदाहरण ले सकते हैं शिवसेना प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बाल ठाकरे का । उनके खिलाफ खबर दिखाने की हिम्मत कोई भी चैनल नहीं दिखाता । अभी तो स्टार को तोड़ कर रख देनेवाले धनन्जय देशाई पर भी कोई खबर नहीं चलनी है ।आप बताए कि धनन्जय के खिलाफ क्या किया पुलिस या खबरिया चैनलों ने ।

य- सूचना और प्रसारण मंत्री भी इसी तरह का एक डरावन शब्द और पद है खबरिया चैनलों के लिए।इस मंत्री के खिलाफ तो छोड़ दीजिए उसके आस-फास मडराने वालों के भी खिलाफ कोई खबर नहीं चल सकती भाई ।

र-कुछ चैनलों के संपादकों का मानना है कि राजनीतिक खबरों को कौन देखता है। यानि खबर बड़ी हो या छोटी उसमें मनोरंजन का पुट होना ही चाहिए । तभी तो अमर सिंह की भड़ैती और लालू की लंठई हमेशा चलनेवाली खबरें होती है।ल-एक राजनैतिक बयान पर चुम्मा-चाटी की खबर कफन बन कर छाएगी ही और राहुल बाबा को नाराज करने की ताकत किस संपादक में है...कल का प्रधान मंत्री है राहुल ।

ल-बाबाओं और संतों के खिलाफ भी चैनल अक्सर मौन रहते हैं । बोलते हैं तो पक्ष में । आप चाहें तो बाबा रामदेव और बृंदा कारात की भिड़त में चैनलों का चरित्र आंक सकते हैं । आखिर बृंदा कहां गलत थीं और बाबा रामदेव कहां सही था । तय है कि बाबा से कुछ मिल सकता था बृंदा से नहीं इस लिये लाइन तो फायदेवाली ही लेनी होगी । इसी तरह परमपूज्य आशाराम बापू के जमीन संबंधी खबर से चैनलों के भक्त पत्रकार कब उतर गए समझ नही आया। आशा राम बापू ने आश्रम की जमीन किसानों को सौपी या नहीं कौन पूछे ।


तो भाई अभय पत्रकार भी इंसान है और वह लोभी भी हो सकता है ।उसकी की भी तो त्रृष्णा होगी , सपने होंगे। आपकी प्रतिबद्धता के फेर में वो अपने भविष्य पर लात नहीं मार सकते । एक बात और पर्दे पर दिख रहे पत्रकार की कोई हैसियत नहीं होती। उनके कान में एक वायर लगा होता है जिसपर अपने कमरे में बैठा संपादक या उस समय का इंचार्ज अपने हिसाब से दिशा निर्देश देता रहता है। यह सवाल प्रश्न के परे है कि चल रही बड़ी खबरे बनावटी होती हैं, उन्हे सजा सवांर कर पेश करने के लिए कुछ सुंदर चेहरे और कुछ सुंदर शब्द होते हैं बस..

10 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

बेनाम क्यों रहना पड़ा, साथी ?

अभय तिवारी ने कहा…

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी..अब जैसे कि बेनाम ने सही ही इशारा किया है पत्रकार साथियों की चुप्पी की तरफ़.. और उन के लिये भी मैं यही सोच के संतोष करता हूँ कि कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी..कोई यूं ही बेवफ़ा नहीं होता..

धुरविरोधी ने कहा…

जित‌न‌ा भ‌ल‌ा आप‌क‌ा चिठ्ठ‌ा है, उत‌नी ही भ‌ली य‌ह टिप्प‌णी है

अरुण ने कहा…

सत्य वचन

Pramod Singh ने कहा…

हमने उनको बकते देखा

कदम-कदम पे दबते देखा

चौबीसइनटूसात बहते देखा
कंठी-माला जपते देखा

कहते थे बदलेंगे दुनिया

दुनिया में उनको बनते देखा।

अतुल शर्मा ने कहा…

अनाम भाई ने जो लिखा है बिलकुल खुला खाता है। इसका किंचित भी मैं नहीं सोच सकता था।

ओम ने कहा…

बेनाम जी ने मसला उठाया है वो बिलकुल सही है। कम से कम ये तो सच है कि मीडिया बाज़ार पर नज़र ऱखता है। और यहां ज़ोख़िम नहीं लेता चाहता। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई बड़ी ख़बर को दरकिनार कर दिया गया हो। अंबानी परिवार में चली खींचतान भी खुल के दिखाई गई थी। और जहां से जो हो सका ख़बरें निकाल कर लोगों के सामने रखी गई। अंबानी भाई इससे नाख़ुश ही थे। और भी मसले हैं जैसे प्रियंवदा की वसीयत या इनफोसिस के एक सीइओ का चिरपरिचित मसला (जिसके बाद उन्हें पद से हटाया भी गया)हो। इसके अलावा एक बात और कहना चाहुंगा कि लोगों के लिए ये बात मायने नहीं रखती कि किसी बड़े उद्योगपति का किसी फिल्मी कलाकार से कैसे और क्यों अच्छे रिश्ते हैं। रिश्ते अच्छे हों या बुरे इससे लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन अमिताभ और अमर सिह या अमर सिंह और किसी उद्योगपति के बीच कैसे रिश्ते हैं इस पर नज़र रखी जानी चाहिए। क्योंकि इससे फ़र्क़ पड़ता है। ये लोगों पर असर छोड़ सकता है। चाहे वो क्वात्रोकी के रिश्ते हों या धीरूभाई अंबानी के।

Rama ने कहा…

पत्रकारिता अब मिशन नहीं रह गई , पीत पत्रकारिता का दौर भी ढल गया अब जो पत्रकारिता चल रही है उसे क्या कहा जाए अभी इस पर भी खोज चल रही है. इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तो पत्रकारिता पर कालिख पोतने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सिर्फ सनसनी व टीआरपी के लिये खबर की खबर ही हटा देते है. अभी कुछ दिनों पहले अनुराग का चिट्ठा पढ़ा. वर्जीनिया टेक की घटना पर पत्रकारिता के नाम पर जो हुआ वह इतना शर्मनाक है कि कुछ कह नहीं सकते. यह अलग है कि प्रिंट मीडिया अभी भी जिंदा है. गंदगी यहां भी है लेकिन उतनी नहीं. क्योंकि मामला अक्षरों का है और अक्षर सदैव जिंदा रहते है.

प्रियंकर ने कहा…

बेनाम तुमी खूब भालो लिखेछो . तोमार काम नाम देउआर मतुन आछे . कैनो नाम दीच्छो ना .

भालो थाको!

nripendra ने कहा…

benaam ji mai naya naya media me aaya hu.bahut saare ethics le ke aaya tha.per abhi apne aap ko jaan liya hai ki hoga vahi jo malik chahega.abhi media ne tai kar liya hai shayad ki kuch bhi kah lo sanam hamj nahi sudhrenge.1 baat aur abhi electronic media ki age 1 baby ki tarah hai.chote bachhe kam umr me ye nahi pata hota ki kya bolna hai.vo kahi bhi potty kar deta hai susu kar deta hai .vahi hamara media kar raha hai.nripendra singh

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