गुरुवार, 27 सितंबर 2007

पराजय का मूल्य

सफल आदमी के चेहरे पर एक चमक होती है। दिल में एक गुदगुदी होती है। अपनी जीत का एहसास होता है। जब वह नज़र उठा के देखता है तो उसे हारे हुए लोगों की भीड़ दिखती है। उनके लटके हुए उदास चेहरों को देख वह थोड़ा और अकड़ जाता है। वो जो कुछ भी सोच रहा होता है उसे अपनी जीत का मूलमंत्र मानकर उस में और जकड़ जाता है। जब वह मुँह खोलता है तो अपने बारे में बोलता है। वह सामने वाले को नहीं देखता उस के सन्दर्भ में सिर्फ़ अपने को ही देखता है। वह बताता है कि उसके आस-पास दुनिया कितनी प्रतिभाहीन है। ऐसा कहकर वह जतलाता है कि सारी गुणवत्ता उसी में आसीन है।

उसकी जगह हम होते तो हम कुछ अलग बरताव करते इसमें संदेह है। माना गया है कि जीवन में सफलता बड़ा मूल्य है। मगर कई पाठ ऐसे भी हैं जो पराजय के गुणगान करते हैं। जैसे हराल्ड हेट्ज़ेल की किताब ‘बुद्धाज़ लास्ट सरमन – इन हेल’ .. देखिये उसका एक अंश:

हर सच्ची साधक एक बेलौस और बाशौक़ जंगजू है। उसे जंग से कोई खौफ़ नहीं। वह जीत की प्यास से बेचैन है और लगातार तलाशती है अपनी मुक्ति को – अपनी आखिरी शिकस्त।

इस आखिरी शिकस्त- उसकी गुरु- में ही वह शक्ति है जो इस दुनिया में सीखी हुई हुशियारी और दुनियादारी के उस बेहद मजबूती से जकड़े हुए बख्तरबंद को छिन्न-भिन्न कर सकती है, जो पहले ही पुराना हो चला है। यह आखिरी शिकस्त सब कुछ मांगती है, पूरी और समूची ताक़त, साहस, इरादा, हुशियारी, दर्द, तमन्ना, शौक़, समर्पण, इल्म और उम्मीद। इस आखिरी शिकस्त से हासिल होता है अन्तहीन शून्य- सम्पूर्ण पराजय, मगर सिर्फ़ फ़ौरी तौर पर।

इस आखिरी और समूची शिकस्त से ही सुधर कर और पूरी तरह बदल कर उपजती है सच्ची (रूमानी नहीं) साधक और जंगजू, जैसे एक नया जन्म लेकर। यह नई शख्सियत बुज़ुर्ग है, शालीन है; यह गहराई से करती है सवाल और समझती है, यह शख्सियत ज़्यादा गम्भीर है और ज़्यादा शांत है। ज़िन्दगी और लोगों से पहचान की आदत को त्याग दिया गया है या कहें कि बदल लिया गया है। और क्योंकि यह शख्सियत आनन्दरहित नहीं है- बिलकुल भी नहीं- यह एक अलग जीवन जीती है एक नई मासूमियत के साथ।

बुधवार, 26 सितंबर 2007

एक दिन दिल्ली में दोस्तों के साथ

आजकल दिल्ली में हूँ। प्रमोद भाई पहले से ही दिल्ली में हैं। दिल्ली सालों मेरा घर रहा है-१९८४ से १९९६ तक। जिस बीच मैं इलाहाबाद और मुम्बई रहते हुए भी बार-बार दिल्ली लौटता रहा। मेरे बड़े भाई का घर आज भी यहीं है। इसलिए कानपुर- जहाँ अब मेरा दूसरा भाई और माँ रहतीं हैं- जाने का रास्ता दिल्ली हो कर ही बना हुआ है। इस बार लगभग दो बरस बाद मुम्बई से निकला है। बोधि तो मुझे हमेशा ही कहते रहते हैं कि तुम तो कभी भी आश्रम बना लो क्योंकि तुम ने तो क्षेत्र-सन्यास लिया ही हुआ है। तो इस सन्यासाश्रम से घबरा कर मैं भागा हुआ हूँ। इस पलायित अवस्था में अचानक ढेर सारे दोस्तों के साथ एक पूरा दिन बिताना एक सुखद अनुभव रहा। वैसे तो हम जिस दौर में हैं जहाँ साये भी साथ छोड़ जाते हैं दोस्तों का तो कहना क्या! बावजूद उसके मुझे दोस्तों की कमी कभी खली नहीं। मेरे पुराने दोस्त मेजर संजय और प्रमोद जी से मिलने की बात थी, जगह तय हुई श्रीराम सेंटर का पुस्तक बिक्री केंद्र की, जिसे लोग दिल्ली की एकमात्र हिन्दी किताबों की दुकान मानते हैं(बाकी प्रकाशन घर हैं या वितरण के अड्डे)। इरफ़ान मियाँ, प्रमोद भाई और अविनाश को वहाँ छोड़ अपनी नौकरी बजाने चल दिये। भूपेन अलग दिशा से आए। मैं पहुँचा। मेजर संजय चतुर्वेदी पधारे। रवीश कुमार किसी कहानी की पीछा करते हुए कुछ देर यहाँ भी उसकी बू लेते रहे।


मसिजीवी सुबह की पारी की अध्यापकी करने के बाद घर लौटने के बजाय पुरानी अड्डेबाजी का लुत्फ़ लेने यहाँ ऐसा रुके कि शाम तक रुके रहे। जब सुजाता आईं। उनके आने के पहले जमशेदपुर की रश्मि आईं, कार्टूनिस्ट पवन आए, हिन्दुस्तान के पत्रकार धर्मेन्द्र आए। और सबसे आखिर में सैय्यद मुहम्मद इरफ़ान आए।
कुछ दोस्तों से तो सचमुच पहली ही बार मिला। लेकिन अधिकतर से तो आभासी दुनिया का अंतरंग नाता बना ही हुआ है। लगा ही नहीं कि नए दोस्तों से मिल रहा था। बात करते रहे बैठे हुए, चलते हुए, घूमते हुए। श्रीराम सेंटर की कैंटीन में बतकही, बाहर पेड़ के नीचे चाय के अड्डे की चाय। वापस किताबों की दुकान से किताबों की खरीद और कैंटीन की कॉफ़ी। फिर बंगाली मार्केट की ओर टहलते हुए फ़्रूट मार्ट से केले और बंगाली से मिठाई और दोसा और लौटते में वापस पेड़ के नीचे बैठकी। और आखिर में साहित्य अकादमी की हरी घास पर क्षण भर से ज़्यादा।
देश-दुनिया, टीवी-अखबार, साहित्य-समाज और एक दूसरे के निजी प्रसंगो पर बातों का सिलसिला अबाध चलता ही रहा। शाम ढल गई। अँधेरा हो गया। मेरी भाभी ने फोन पर घर लौटने की बात उठाई और मुझे अपने आजकल के अनुशासित जीवन की याद दिलाई। लोभ तो था कि रमा रहता इस दोस्ताने में देर रात तक पर दोस्ती से भरे दिल में थोड़ी जगह संतोष को भी दी। और अपने भाई के साथ लिफ़्ट ले कर वापस लौट आया।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

लेखक का कमरा

हम में से कम ही लोग हैं जो खुले आसमान के नीचे बैठ कर लिखते हैं.. अधिकतर कमरों में बैठ कर लिखते हैं.. अधिक उचित होगा कहना- कमरों के कोनों में बैठ कर.. दो-ढाई कमरों के मकान में एक लिखने का भी कमरा चाहना, औक़ात से बढ़कर बात करना है क्या..? शायद हाँ.. मगर उसके सपने देखना कोई जुर्म तो नहीं.. कम से कम सपनों में तो कंगाली नहीं होनी चाहिये.. आइये देखिये इन तस्वीरों को और सजोइये सपने अपनी निजी स्टडी/ लेखन-अध्ययन कक्ष के..
चाहे तो भर ले अपने कमरे को किताबों से.. दुनिया भर के विचारों के बीच रहकर रचा जाय अपना एक संसार.. या रखें सिर्फ़ काम की चीज़ें..ताकि कर सकें सन्नाटे में सृजन.. या फिर इतनी भी न भरें किताबें कि उन के शोर में सुन भी न सकें आप अपनी बात.. और इतना भी खाली न कर दें कि विचार ही आना बन्द हों जाय..

ये सारे कमरे बड़े-बड़े लेखकों के हैं और मैं कईयों के नाम भी नहीं जानता.. पर उनके कमरे देखने में क्या जाता है.. इन लेखन-कक्षों के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए गार्डियन के वेब पन्ने पर जायं..
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