चाहे तो भर ले अपने कमरे को किताबों से..
दुनिया भर के विचारों के बीच रहकर रचा जाय अपना एक संसार..
या रखें सिर्फ़ काम की चीज़ें..ताकि कर सकें सन्नाटे में सृजन..
या फिर इतनी भी न भरें किताबें कि उन के शोर में सुन भी न सकें आप अपनी बात..
और इतना भी खाली न कर दें कि विचार ही आना बन्द हों जाय..
ये सारे कमरे बड़े-बड़े लेखकों के हैं और मैं कईयों के नाम भी नहीं जानता.. पर उनके कमरे देखने में क्या जाता है.. इन लेखन-कक्षों के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए गार्डियन के वेब पन्ने पर जायं..



