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शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

लेखक का कमरा

हम में से कम ही लोग हैं जो खुले आसमान के नीचे बैठ कर लिखते हैं.. अधिकतर कमरों में बैठ कर लिखते हैं.. अधिक उचित होगा कहना- कमरों के कोनों में बैठ कर.. दो-ढाई कमरों के मकान में एक लिखने का भी कमरा चाहना, औक़ात से बढ़कर बात करना है क्या..? शायद हाँ.. मगर उसके सपने देखना कोई जुर्म तो नहीं.. कम से कम सपनों में तो कंगाली नहीं होनी चाहिये.. आइये देखिये इन तस्वीरों को और सजोइये सपने अपनी निजी स्टडी/ लेखन-अध्ययन कक्ष के..
चाहे तो भर ले अपने कमरे को किताबों से.. दुनिया भर के विचारों के बीच रहकर रचा जाय अपना एक संसार.. या रखें सिर्फ़ काम की चीज़ें..ताकि कर सकें सन्नाटे में सृजन.. या फिर इतनी भी न भरें किताबें कि उन के शोर में सुन भी न सकें आप अपनी बात.. और इतना भी खाली न कर दें कि विचार ही आना बन्द हों जाय..

ये सारे कमरे बड़े-बड़े लेखकों के हैं और मैं कईयों के नाम भी नहीं जानता.. पर उनके कमरे देखने में क्या जाता है.. इन लेखन-कक्षों के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए गार्डियन के वेब पन्ने पर जायं..

शनिवार, 8 सितंबर 2007

राहुल गाँधी की गहन मुद्राएं

सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी का विश्वास है कि राहुल गाँधी के सक्षम नेतृत्व में ही देश प्रगति कर सकता है.. आइये देखें उनकी छबीली छवि की कुछ अनूठी मुद्राएं..















मुद्रा नम्बर एक..
गम्भीर विषयों पर गहन चिंता से पड़ी माथे पर त्योरियाँ..


















मुद्रा नम्बर दो...
लगता है गहन समस्या का कुछ सरल हल मिला है..


















मुद्रा नम्बर तीन...
उबासी..!!?? ह्म्म्म...



कुछ भी कहिये.. समस्या कितनी ही गहन क्यों न हो.. हल तो सरल है..

ये सारी मुद्राएं राहुल गाँधी ने मैगासेसे पुरुस्कार विजेता पी साईनाथ के एक लेक्चर के दौरान प्रदर्शित की। लेक्चर संसद भवन के पुस्तकालय में आयोजित किया गया था। और विषय था - 'खेती का संकट: पिछले दशक में क्यों की एक लाख किसानों ने आत्महत्या?'

अब ऐसे उबाऊ विषय पर और ऐसी उबाऊ जगह पर लेक्चर हो तो क्यों न आए किसी को उबासी! और राहुल भी तो हमारी आप की तरह आम आदमी ही हैं। उन्होने क्या ठेका लिया है समाज-सुधार का?

स्रोत: डी एन ए, मुम्बई, ७ सितम्बर २००७


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