शुक्रवार, 23 मार्च 2007

माँ की एक और कविता

जाऊँ जहाँ वही मिल जाये,
देखूँ जिधर वही दिख जाये,
जो कुछ सुनूँ नाम हो उसका।


कर स्पर्श करे बस उसका,
चहुँ दिशि से मुझ पर छा जाये।


खोज खोज कर हारी हूँ मैं,
मुझे खोजता वह मिल जाये।


चल दूँ तो हो नूतन सर्जन,
बैठूँ तो मंदिर बन जाये।


आशा डोर कभी ना टूटे,
शाश्वत सदा नित्य हो जाये।



विमला तिवारी 'विभोर'

७ नवम्बर २००३

8 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

बहुत अच्छा लगा इस कविता को पढ़कर। फोटॊ भी बहुत प्यारी है। दोनों के लिये बधाई! आगे और कवितायें पोस्ट करें माताजी की!

Mrinal Kant (मृणाल कान्त) ने कहा…

beautiful lines and more beautiful photo (so serene and calm)

अनामदास ने कहा…

बहुत सादा, बहुत सुंदर, सौ प्रतिशत खालिस. बहुत अच्छा लगा. माताजी को मेरा सादर प्रणाम और साधुवाद पहुँचा दें.

प्रियंकर ने कहा…

बेहद अच्छी कविता . छोटी पर अपने में पूर्ण कविता . और क्यों न हो मां की कविता है .पूरा जीवन होम करने के बाद पाई है उन्होंने यह कविता .

उडन तश्तरी ने कहा…

बहुत सुंदर कविता है.आशा है आप माता जी की कविता इसी तरह पढ़वाते रहेंगे.

Beji ने कहा…

चल दूँ तो हो नूतन सर्जन,
बैठूँ तो मंदिर बन जाये।

बहुत सुन्दर.

इन कविताओं का संकलन अलग से हो...?

rachana ने कहा…

बहूत खूब!!

miredmirage ने कहा…

बहुत सुन्दर ! आपकी माताजी की अभिव्यक्ति व भाषा दोनों ही बहुत सुन्दर हैं। पढ़कर अच्छा लगा।
आई थी आपके अमरीका को गरियाने पर कुछ कहने, फ़िर देखा आपकी पिछली कुछ रचनाएँ पढ़नी छूट गयी थीं। उन दिनों यहाँ चिट्ठा जगत में आऊँ या न आऊँ निर्णय नहीं कर पा रही थी।
खैर पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।
अब पता चला कि आपमें अभिव्यक्ति व भावुकता व सहानुभूति के गुण कहाँ से आये हैं।
माँ को मेरी बधाई व प्रणाम।
घुघूती बासूती

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