शनिवार, 8 दिसंबर 2007

सत्य का निर्णय अब हुआ सरल..

जी हाँ.. तेज़ी से बदलते अपने संसार में वास्तविक से आभासी की भूमिका अधिकाधिक बढ़ती जा रही है.. और इसी को ख्याल में रखते हुए एक महाशय ने सत्य के निर्णय का यह सरल समीकरण प्रतिपादित किया है..





जबकि अन्तरजाल पर सत्य की स्थिति ऐसी विकट है कि 'मिजाज़' होता है या 'मिज़ाज' ज़रा इन्टरनेट पर खोज कर देखिये.. दोनों के बराबर मात्रा में उदाहरण मिल जाएंगे.. करते रहिये सत्य का निर्णय..

सत्य के ऐसे पैमानों पर ये एक डेड-पैन ह्यूमर का प्रयास है.. मगर क्या करें.. हम हिन्दुस्तानी गम्भीरता के ऐसे प्रेमी हैं जब तक स्माइली दिखाई न दे.. हर बात को 'सत्य' मान कर चलते हैं.. सत्य की शकल में कोई उपहास या परिहास भी हो सकता है.. यह लचीलापन हमारी आत्मा में बहुधा उपलब्ध नहीं होता..

मैं खुद इस रोग का बीमार हूँ कोई भाई अन्यथा न ले..

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

मुझे दंगाईयों से परेशानी है

अभी कल छै दिसम्बर था. मुझे यह तारीख दो कारणों से याद रहती है. एक तो बाबरी मस्जिद को गिराये जाने की बरसी इसी दिन पड़ती है और दूसरे यह तारीख मेरी सास की पुण्यतिथि भी होती है. लेकिन कल मेरी हाउसकीपर सीमा के बच्चे उसके घर पर ही थे, पूछने पर पता चला कि छुट्टी है. मैं सोच में पड़ गया कि कौन सी छुट्टी हो सकती है. मुझे बताया गया कि बाबा साहेब अंबेडकर की बरसी है. मुझे अपने ऊपर थोड़ी कोफ़्त हुई कि ये बात मुझे याद होती थी मगर भूल गया. बाद में जब सीमा आई तो उसने उजली सफ़ेद साड़ी पहनी हुई थी बाबा साहेब के सम्मान में.

शाम को मैं और प्रमोद भाई यूँ ही टहलते हुए आरे में छोटा कश्मीर नामक एक पिकनिक स्थल पर निकल गए तो वहाँ भी हम ने कई परिवारों को छुट्टी मनाते पाया. उनमें से कुछ ने सफ़ेद परिधान धारण किए थे. देश के एक बहुसंख्यक समुदाय के लिए छै दिसम्बर के जो मायने हैं हम (सवर्ण जन) उस से अपरिचित हैं. दिलीप मण्डल आज कल इन्ही मुद्दो पर एक ज़बरदस्त बहस छेड़े हुए हैं.

मगर शिवसेना वाले मेरे मित्र के समर्थक नहीं निकले. ये समझते ही कि डॉक्टर साब उत्तर भारतीय हैं उनके गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया गया...
पर आज देख रहा हूँ कि हमारा हिन्दी ब्लॉग संसार इतना बड़ा हो गया है कि कल हुई एक दूसरी गरमागरम बहस की हमें कुछ हवा भी नहीं हुई. मैं उस बहस का ज़िक्र कर रहा हूँ जिसके केन्द्र में अनुनाद सिंह है. वो हैरान हैं कि राही मासूम रज़ा बाबरी मस्जिद के गिराए जाने पर खुश क्यों न हुए. उधर भूमण्डलीकरण के खिलाफ़ आवाज़ बुलन्द करने वाले हमारे जुझारु मित्र संजय तिवारी भी कुछ ऐसी ही भावनाओं में उतरा रहे थे. और वे अकेले नहीं हैं जो इस मन्दिर-मस्जिद विवाद के नाम से ही भावुक हो जाते हैं. सर्वप्रिय और अतिसंवेदनशील बड़े भाई ज्ञानदत्त जी भी इस विषय पर अपनी बेबाक राय रखते हैं.

ये आज की स्थिति है.. मुझे याद है १९९२ के साल के उन अन्तिम दिनों में मैं दिल्ली में था. पूरा देश अडवाणी जी की रथयात्रा के चलते एक अनोखे बुखार में तप रहा था. इस बुखार में लोग अपने आम व्यवहार को भूल कर कुछ का कुछ हो जा रहे थे. हमारी मित्र मण्डली में हिन्दू-मुस्लिम सभी तरह के लड़के-लड़कियाँ थे. और हमें इस बात का एहसास भी न था कि कौन हिन्दू और कौन मुस्लिम है. मगर अन्दर-अन्दर भावनाएं और विचार एक भयावह शकल में गड्ड-मड्ड हो चुके थे. एक मौका ऐसा भी आया कि एक सामान्य बातचीत एक ऐसी गन्दी बहस में तब्दील हो गई जिसके अन्त में मेरी एक मुस्लिम सहेली आहत हो कर रोते हुए वहाँ से चली गई. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था.

सच तो ये है नरसिंहराव ने भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता गिरवा लिया. जिसकी वजह से आज उनकी हालत ये है कि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है...
कड़वी बात कहने वाला मित्र कोई अनपढ़ मूर्ख नहीं ऎम्स में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा एक डॉक्टर था. उसके चले जाने के बाद बचे हुए दोस्तों में बहस में गरमी और बढ़ गई और होते-होते बात शब्दों से उतर कर हाथ-पैरों तक पहुँच गई. ऐसा भी पहले कभी नहीं हुआ था.

कुछ रोज़ बाद बाबरी मस्जिद गिर गई. दोस्तों से साथ धीरे-धीरे छूट गया. मैं काम की तलाश में मुम्बई आ गया. जब मैं आया तो मुम्बई में पहले दौर के दंगे हो चुके थे और दूसरे दौर के दंगे मेरे आने के बाद हुए. शहर में ज़बरदस्त तनाव रहता. दिन में ये तनाव दोपहर की नमाज़ के वक़्त अपने चरम पर पहुँचता. जब बड़ी संख्या में नमाज़ियों के मस्जिद के आगे जुट जाने से रास्ता जाम हो जाता. शिवसेना ने इसके जवाब में महाआरती का अभियान चलाया हुआ था. दिन का ये तनाव कम होता भी न था कि शाम ढलते ही लोग घर लौटने के लिए हड़बड़ाने लगते. सब तरफ़ शिवसेना के लोग गश्त लगाते रहते.

हम मुम्बई में नए-नए आए थे.. सुनते थे कि मुम्बई में नाइटलाइफ़ होती है. हमारा वह डॉक्टर दोस्त भी उन दिनों मुम्बई में मौजूद था. एक दिन ऐसे ही किसी दोस्ताना जश्न का हिस्सा होने के बाद लौटते हुए हमें शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने रोक लिया. डॉक्टर साब ने थोड़ी पी रखी थी और हिन्दू होने के नाते वे शिवसेना के समर्थक भी थे इसलिए निर्भीकता से रिक्शे से उतरे मगर शिवसेना वाले मेरे मित्र के समर्थक नहीं निकले.

ये समझते ही कि डॉक्टर साब उत्तर भारतीय हैं उनके गाल पर एक करारा तमाचा जड़ दिया गया. एक ही झटके में हम सब का नशा हिरन हो गया. हमें छोड़ तो दिया गया मगर उस रोज़ के बाद से मेरे अन्दर हमेशा एक डर सा बना रहता.. अपनी दाढ़ी के चलते मुसलमान समझ लिए जाने का डर. वो दाढ़ी मैंने सिर्फ़ इसी डर के चलते निकाल दी. लेकिन वह डर मुझे हमेशा याद दिलाता रहा कि उन दिनों मुम्बई में सचमुच एक मुसलमान होने का मतलब मन में कैसा भाव पैदा करता होगा..

मस्जिद गिरे और मन्दिर बने, मन्दिर गिरे और मस्जिद बने.. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता..
मुम्बई में ही क्यों अडवाणी साहब ने तो पूरे देश को इस डर में डुबो देने की साज़िश की थी. सच तो ये है कि उन्हे मन्दिर बनाने और मस्जिद गिराने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उन्हे सिर्फ़ एक जज़्बाती माहौल बनाने में रुचि थी जिसमें वह अपनी चुनावी फ़सल काट सकें.

वैसे तो मुस्लिम समुदाय नरसिंहराव को अपना बड़ा दुश्मन मानते हैं मगर मुझे कभी-कभी लगने लगता है कि वह आदमी मुस्लिम समुदाय और इस देश का हितचिंतक था. क्योंकि अगर वह बाबरी मस्जिद को बचा लेता.. तो आज भी देश को बार-बार उसी मस्जिद का वास्ता देकर भावनाओं के ज्वार में झोंका जाता और जिस मरगिल्ली हालत में आज भाजपा पहुँच रही है वह नहीं होने पाता. सच तो ये है नरसिंहराव ने भाजपा के हाथ से तुरुप का पत्ता गिरवा लिया. जिसकी वजह से आज उनकी हालत ये है कि उनके पास कोई मुद्दा नहीं है.

कुछ लोग मानते हैं कि मस्जिद गिर जाने से पुरातत्व और विज्ञान के बड़ी हानि हुई. मैं ऐसा नहीं सोचता. मैं भाजपा का विरोधी हूँ इसलिए नहीं कि उन्होने बाबरी मस्जिद गिराई. मस्जिद गिरे और मन्दिर बने, मन्दिर गिरे और मस्जिद बने.. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरी आस्था पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता, मेरे भगवान पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. ईंट-पत्थर गारा है.. और क्या है.

पर भाजपा ने अडवाणी के नेतृत्व में इस देश में जो हिन्दुओं और मुसलमानों को एक दूसरे के खिलाफ़ खड़ा किया मुझे उस से परेशानी है. जिस नफ़रत, गुस्से और डर का संचार किया गया मुझे उस से तक़्लीफ़ है. इस बेबात के मुद्दे को लेकर आपसी हिंसा में जो सैकड़ो निर्दोष लोगों का खून बहाया गया मुझे उस से दर्द होता है.

और दर्द इस बात से होता है कि बहुत सारे मित्र धोखे में हैं कि ये मामला राम मन्दिर बनाने का है.. अगर उन्हे मन्दिर बनाना होता तो वो बातचीत के रास्ते से कब का बन गया होता.. पर वे मन्दिर नहीं चाहते, धर्म नहीं चाहते, शांति नहीं चाहते.. वे बातचीत नहीं चाहते.. वे लड़ाई चाहते हैं.. दंगा चाहते हैं.. और मुझे दंगाईयों से परेशानी है..

अच्छे लेखक बनने के दो नुस्खे

नोबेल पुरुस्कार विजेता मशहूर लेखक वी एस नइपॉल ने कभी नए लेखकों को अच्छा लिखने के लिए कुछ सूत्र बताए थे, जिसका ज़िक़्र अमित वर्मा ने अपने ब्लॉग पर किया था.. सूत्र कुछ यूँ हैं:

१. लम्बे वाक्य न लिखें. एक वाक्य में दस या बारह से अधिक शब्द नहीं होने चाहिये.

२. हर वाक्य एक सीधा बयान होना चाहिये. पिछले वाक्य में इस वाक्य को कुछ जोड़ना चाहिये. एक अच्छा पैराग्राफ़ सिलसिलेवार बयानों की एक कड़ी है.

३. बड़े शब्द ना इस्तेमाल करें. अगर आप का कॅम्प्यूटर बताता है कि आप का औसत शब्द पाँच अक्षरों से अधिक लम्बा है, तो ठीक नहीं है. छोटे शब्दों का इस्तेमाल आप को आप के विषय के बारे में सोचने को मजबूर करता है. कठिन शब्दों को भी छोटे शब्दों में तोड़ा जा सकता है.

४. ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कभी न करें जिनके अर्थ के बारे में आप को पक्का नहीं पता. अगर आप यह नियम तोड़ते हैं तो आप कोई और धंधा तलाश लें.

५. नए लेखक को रंग, मात्रा और अंक को छोड़ विशेषणों के इस्तेमाल से बचना चाहिये. क्रियाविशेषणों का कम से कम इस्तेमाल करें.

६. अमूर्तन से बचें. ठोस बातें करें.

७. कम से कम छै माह तक रोज़ इस तरह लिखने का अभ्यास करें. छोटे शब्द; छोटे, सीधे, ठोस वाक्य. थोड़ा तक़्लीफ़ होगी , पर इस से आप भाषा के उपयोग में अभ्यस्त हो जायेंगे. हो सकता है विश्वविद्यालय में आप ने लेखन की जो बुरी आदतें विकसित कर लीं थीं, उन से भी छुटकारा मिल जाय. एक बार इन नियमों को अच्छी तरह समझ लेने और अधिकार पा लेने के बाद आप इन्हे पार कर आगे बढ़ सकते हैं.

गल्प लेखन के लिए कुछ ऐसे ही सूत्र अमरीकी लेखन कर्ट वॉनेगट ने सुझाए हैं, ये सूत्र भी अमित वर्मा के ब्लॉग से साभार हैं:

१.एक सम्पूर्ण अजनबी के वक़्त का ऐसे इस्तेमाल करें कि उसे यह न लगे कि समय बरबाद हुआ.

२. अपने पाठक को कम से कम एक ऐसा चरित्र दें जिस के साथ वे जुड़ाव महसूस कर सके.

३. हर चरित्र की कुछ चाहत हो, भले ही वह एक गिलास पानी ही क्यों न हो.

४. हर वाक्य दो में से एक मक़सद ज़रूर पूरा करे- चरित्र को खोले या कहानी को बढ़ाए.

५. कहानी को अन्त के जितने करीब से मुमकिन हो उतने करीब से शुरु करें.

६. पत्थरदिल बनें. आप के चरित्र कितने भी मासूम और अच्छे क्यों न हो, उन्हे भयानक घटनाओं के बीच धकेल दें- ताकि आप के पाठक देख सकें कि वे किस मिट्टी के बने हैं.

७. सिर्फ़ एक व्यक्ति को खुश करने के लिए लिखें. अगर आप खिड़की खोल कर पूरी दुनिया के साथ प्रेम करेंगे, तो आप की कहानी को न्यूमोनिया हो जाएगा. (हमारी परिस्थितियों में लू लगने की भी सम्भावना है)

८. अपने पाठकों को जितनी जल्दी हो सके अधिक से अधिक सूचना दे दें. रहस्य गया तेल लेने. पाठक को पूरी जानकारी होनी चाहिये कि क्या हो रहा है, कहाँ हो रहा है और क्यों हो रहा है और अगर आखिर के कुछ पन्ने कीड़े खा भी जायँ तो पाठक स्वयं कहानी को पूरा कर सकें.
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