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गुरुवार, 13 दिसंबर 2007

इन्टरनेट पर हक़ की लड़ाई

इन्टरनेट और वेब मानव इतिहास का सबसे शक्तिशाली और सबसे अधिक संवादसक्षम मंच है.. दुनिया भर में आम लोग और बड़े-बड़े कॉरपोरेशन्स इसकी शक्ति से आकर्षित हो कर इसकी और खिंच रहे हैं.. कुछ विद्वान लोगों ने अपनी काबलियत और हुनर के योगदान से इसे बनाया और सँवारा है.. हम आप जैसे लोग इसका उपयोग भर ही कर रहे हैं.. मगर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ इसका भोग करने की नीयत से तालों का और हथकड़ी-बेडि़यों का इस्तेमाल चाहते हैं.. और सरकारें भी उनके हित के अनुकूल क़ानून बनाकर लागू करने में प्रयासरत हैं.. अभी हिन्दुस्तान में चीज़ें उस मकाम तक नहीं पहुँची हैं पर अमरीका, कनाडा और यूरोप में एक संघर्ष शुरु हो चुका है..


देखिये यहाँ..

और यहाँ..

मुझे एक वीडियो भी मिला है जो अन्तरजाल पर होने वाले संघर्ष से सम्बन्धित एक कहानी कह रहा है.. देखिये.. और खुद फ़ैसला कीजिये कि आप की क्या राय इस विषय में..



शनिवार, 8 दिसंबर 2007

सत्य का निर्णय अब हुआ सरल..

जी हाँ.. तेज़ी से बदलते अपने संसार में वास्तविक से आभासी की भूमिका अधिकाधिक बढ़ती जा रही है.. और इसी को ख्याल में रखते हुए एक महाशय ने सत्य के निर्णय का यह सरल समीकरण प्रतिपादित किया है..





जबकि अन्तरजाल पर सत्य की स्थिति ऐसी विकट है कि 'मिजाज़' होता है या 'मिज़ाज' ज़रा इन्टरनेट पर खोज कर देखिये.. दोनों के बराबर मात्रा में उदाहरण मिल जाएंगे.. करते रहिये सत्य का निर्णय..

सत्य के ऐसे पैमानों पर ये एक डेड-पैन ह्यूमर का प्रयास है.. मगर क्या करें.. हम हिन्दुस्तानी गम्भीरता के ऐसे प्रेमी हैं जब तक स्माइली दिखाई न दे.. हर बात को 'सत्य' मान कर चलते हैं.. सत्य की शकल में कोई उपहास या परिहास भी हो सकता है.. यह लचीलापन हमारी आत्मा में बहुधा उपलब्ध नहीं होता..

मैं खुद इस रोग का बीमार हूँ कोई भाई अन्यथा न ले..

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