मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-५

माओवादियों के पक्ष की एक बात यह है कि जिनकी लड़ाई लड़ रहे हैं, जिनके हितों की रक्षा की बात करते हैं उस जनता के साथ बिलकुल घुले-मिले हुए हैं। जनता और उनके प्रतिनिधियों में कोई बाधा नहीं है। दूसरी तरफ़ पूँजीवाद तंत्र के राज्य और जनता के बीच इतने-इतने संस्थान और उनकी जटिलताओं की इतनी दूरी है कि माओवादी व्यवस्था बड़ी सरल और सुलभ और जनतांत्रिक मालूम देती है। आदेश देने वालों लोगों और पालन करने वालों लोगों के बीच एक सीधा संवाद है, ऐसा आभास होता है। उनका यह गुण वरेण्य लगता है।

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एक तरफ़ माओवादी हैं जिनके केन्द्रीय नेतृत्व की तलाश पुलिस दिन-रात करती है, और जब वे अपना महाधिवेशन करते हैं जिसमें उनके सारे छोटे-बड़े नेता एक जगह इकट्ठा होते हैं तो किसी को कानो-कान ख़बर नहीं होती। पूरा पुलिस और गुप्तचर तंत्र बेकार है क्योंकि वे एक ऐसा आदमी भी नहीं खोज पाते जो माओवादियों की इस अधिवेशन का पता-ठिकाना उन तक पहुँचा दे। दूसरी तरफ़ हमारे संसदीय लोकतंत्र के राजनेता हैं जो निर्वाचित होने के पहले और बाद में भी जनता से दस हाथ की दूरी पर रहते हैं। एक्स, वाई, ज़ेड सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ इनकी सुरक्षा के लिए तैनात रहता है।

एक तरफ़ नेता और जनता में ज़मीनी, ठोस, गहरा रिश्ता है। दूसरी तरफ़ अब हालात ये पहुँच गए हैं कि संसदीय लोकतंत्र के नेता और जनता सिर्फ़ आभासी तल पर रूबरू हो सकते हैं। क्या पहला सम्बन्ध एक ऐसे गुज़रे ज़माने का अवशेष है जो सिर्फ़ आदिवासी इलाक़ो में ही सम्भव है जहाँ मानवीय प्रगति के चिह्न नहीं पहुँचे हैं? और दूसरा उस नए जीवन की पदचाप, जिस में वास्तविक से अधिक आभासी महत्वपूर्ण हो जाएगा?

ये कुछ माँ और बच्चे के सम्बन्ध जैसा है जिसमें माँ से बच्चा उत्तरोत्तर दूर ही होता जाता है; ये ब्रह्माण्ड की उस अवधारणा जैसा है जिस में सब पहले एक सिंगुलैरिटी में सिमटा हुआ था लेकिन अब सब कुछ, एक-दूसरे से दूर भाग रहा है; ये ईश्वर की उन कल्पनाओं जैसा है जिसमें पहले सब कुछ एक ही तत्व में सयुंक्त रहता है और फिर माया उसे जटिल, और जटिलतर बनाती जाती है।

बावजूद इन आकर्षक उपमाओं के, हमारी गहरी से गहरी कामनाओं की प्रेरणा इसी संयुक्त भाव की सरलता, इसी एकत्व, इसी तौहीद, इसी ज़मीनी, और ठोस रिश्ते की ओर होती है। मगर अजीब बात ये है कि इन आन्तरिक प्रेरणाओं और हमारे संघर्ष के बावजूद, ज़माना है कि विविधता और जटिलता और विलगाव की दिशा में भागा चला जा रहा है।

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यह पूछने पर कि क्या वे अपना आन्दोलन अहिंसा के साथ नहीं चला सकते, कौमरेड गणपति पलट कर पूछते हैं कि ये आप को राज्य से पूछना चाहिये कि वो प्रतिरोध के शांतिपूर्ण तरीक़ो का हिंसक दमन क्यों करते हैं? शांतिपूर्ण जुलूसों पर लाठीचार्ज और फ़ायरिंग क्यों करते हैं? हड़ताल करने वालों को जेलों में ठूंस कर यंत्रणा क्यों देते हैं? वे पूछते हैं कि वे क्यों पुलिस वालों को क्यों अनुमति देते हैं कि वे औरतों से बलात्कार करें? सही सवाल हैं!

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मगर दूसरी जगह गणपति साफ़ कहते हैं कि वे एक बड़े भूखण्ड को युद्ध क्षेत्र में तब्दील करना चाहते हैं- "The general direction of the Congress is to intensify the people’s war and to take the war to all fronts. Concretely it decided to take the guerrilla war to a higher level of mobile war in the areas where guerrilla war is in an advanced stage and to expand the areas of armed struggle to as many states as possible. The destruction of the enemy forces has come into the immediate agenda in these areas without which it is very difficult to consolidate our gains or to advance further. Likewise, there is an immediate need to transform a vast area into the war zone so that there is enough room for manoeuvrability for our guerrilla forces."

हालांकि इस युद्धघोष का आधार यही समझ है कि बिना लड़े अन्याय से मुक्ति नहीं है। ये एक केन्द्रीय सवाल है जो आम मध्यवर्ग को व्यथित करता है, कि क्या अन्याय से मुक्ति बिना युद्ध के सम्भव नहीं? मार्क्सवादी मानते हैं कि नहीं। मेरे ख़्याल से गाँधी के बाद से इस समझ में विश्वस्तर पर अन्तर आया ज़रूर है। लेकिन यहाँ पर यह भी याद रखना चाहिये कि हिंसा प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य के भी स्वभाव का एक अविभाज्य हिस्सा है। पर मुश्किल तब होती है जब माओवादी राज्य की आलोचना का मुख्य आधार हिंसा को ही बनाते हैं, और उसे ही ख़त्म करने के लिए युद्ध छेड़े हुए हैं। मैं यहाँ जा कर उलझता हूँ कि अगर माओवादी सफल हो भी गए तो क्या नए समाज में हिंसा का कोई स्थान न होगा? हिंसा अपने आप में कोई चीज़ तो नहीं है ना.. वो तो अन्याय करने का एक हथियार है... और अगर माओवादी समेत, कृष्ण व मोहम्मद आदि महापुरुषों को स्मरण किया जाय तो न्याय करने का भी।

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इन सारे महापुरुषों को नमन है लेकिन ये सच है कि आग से आग को नहीं बुझाया जा सकता। इस मामले में बुद्ध, ईसा, और गाँधी का मुरीद हूँ; हिंसा से हिंसा का शमन नहीं होता। न तो राज्य हिंसा से माओवाद का नाश कर सकता है और न ही माओवाद हिंसा से अन्याय का अंत कर के न्याय के युग का सूत्रपात कर सकते हैं। हिंसा से बस अल्पकालीन सत्ता का परिवर्तन मुमकिन है, जो हमने होते हुए देखा भी है। अहिंसा वाली डगर लम्बी है लेकिन उम्मीद की जाय कि पक्की है।

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कौमरेड गणपति अपने देश को साम्राज्यवाद के चंगुल से छुड़ाने के लिए सत्ता को हासिल करने के हिंसक रास्तों की वक़ालत करते हैं। हिंसक रास्तों की बात तो हम जानते हैं लेकिन जब वे देश कहते हैं तो साफ़ नहीं होता कि उनका अर्थ क्या है। क्योंकि वे राष्ट्रीयता के नाम पर चल रहे लगभग हर अलगाववादी आन्दोलन का समर्थन करते हैं। कश्मीरी राष्ट्रीयता के नाम पर कश्मीर में जो चीज़े होती रही हैं लगभग उसी स्वभाव की चीज़ें या उनकी अनुगूंज, शिवसेना और मनसे की नीतियों में देखी जा सकती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि मनसे पर कौमरेड के क्या विचार होंगे?

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अर्ध-सामन्ती परिभाषा के चलते माओवादी सिर्फ़ उन्ही इलाक़ो में सक्रिय हो पाते हैं जहाँ अभी भी सामन्ती तत्व बचे हैं। नहीं तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े इलाक़ो से भी बड़े पैमाने पर शहरों में विस्थापन हो रहा है। बीवियों और पूर्वजों के ज़रिये ही बस गाँवों से रिश्ता बच पा रहा है। लेकिन माओवादी गाँव और आदिवासी क्षेत्रों को ही क्रांति का केन्द्र मान रहे हैं। बहुत मुमकिन है वे कुछ इलाक़े आज़ाद करा भी ले जायं मगर उसके बाद क्या? क्या वे आदिवासी या कृषि समाज में ही एक उत्तम न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने लगेंगे? या पूँजी का विकास करेंगे? कैसे करेंगे अनैतिक पूँजी के बरक्स एक नैतिक पूँजी का विकास? इस पर उनके पास कोई सफ़ाई नहीं है।

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एक बात और समझने की है। सम्पन्नता बैठे-ठाले किसी समाज में नहीं आती और न किसी दूसरे के आसरे से आती है। उस समाज के लोगों को ही उद्यम करना होता है। हर समय दूसरों पर उंगुली उठा कर इल्ज़ाम लगाना काफ़ी नहीं होता कि तुम ने मेरे विकास के लिए कुछ नहीं किया। बंजर भूमि से आने वाले मारवाड़ी ज़बरदस्त उद्यमशील होते हैं जबकि मुट्ठी भर दाने फेंक कर खाने-पीने के प्रति निश्चिन्त हो जाने वाले गंगा प्रदेश के लोग शायद सबसे क़ाहिल। अगर गंगा प्रदेश में विकास नहीं हुआ है तो इसके लिए सामाजिक बेड़ियों के अलावा इस बात की भी भूमिका है। और इसके लिए उन्हे मारवाड़ियों, गुजरातियों यहाँ तक के तक़्सीम के बाद शरणार्थियों के रूप में आए और अब बेहद सम्पन्न पंजाबियों को दोषी नहीं ठहराना चाहिये; कि वे हमारा शोषण करते हैं। मुश्किल असल में ये है कि गंगा प्रदेश के लोग, या कोई और दूसरे लोग जो इस बीमारी का शिकार हैं, स्वयं अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं का ठीक से शोषण नहीं करते। यहाँ शोषण का प्रयोग भूल से नहीं जानबूझ कर किया गया है; उसके सकारात्मक अर्थ में।

भौतिक उन्नति और सांसारिक सम्पदा की आकांक्षाओ की पूर्ति, करुणा व त्याग जैसे आध्यात्मिक मूल्यों के रास्ते न होगी, स्वार्थ सिद्धि से ही होगी। सन्तोष का धन चाहिये, तो मार्क्स का नहीं गाँधी के ग्राम स्वराज का रास्ता देखिये। मगर उसके अलग हाहाकार हैं। बुद्ध की तरह मध्यमार्ग दिखाने वाला कौन है?

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क्रांतिकारियों की कार्यपद्धति में दो दौर देखने में आते हैं। एक जब कि वे स्थापित सत्ता का विरोध कर रहे होते हैं तो वे धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल से लेकर हिंसक कार्रवाइयों तक में संलग्न होते हैं और समाज में असंतोष को बढ़ावा देते हुए गृह-युद्ध की स्थिति की ओर खींचते जाते हैं। दूसरा दौर तब आता है जब वे, जिन भी कारणों के चलते, सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हैं। इस दौर में वे ये मानकर चलते हैं कि वे और सिर्फ़ वे ही, जनता और उसकी आंकाक्षाओं के सच्चे प्रतिनिधि हैं। इसलिए ऐसी किसी भी आवाज़ का वो दमन करने लगते हैं जो उनकी समझ के ख़िलाफ़ हो। धरना, प्रदर्शन, जुलूस, हड़ताल जैसी शांतिपूर्ण तरीक़ों का भी हिंसक दमन किया जाता है। इस के अनगितन उदाहरण हमारे इतिहास में मौजूद हैं। इन दोनों दौरों में एक चीज़ अलबत्ता ज़रूर समान रहती है, वो है उनके सही होने, और सब कुछ जानने का एहसास।

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म़ज़े की बात ये है कि अरुंधति स्वयं इस आशंका के प्रति सजग हैं कि जो पार्टी आज जनता के हितों की पैरोकार बनी हुई है, वही पार्टी सत्ता में आते ही अपना चरित्र बदल देगी। लेकिन वे इस भविष्य के डर को दरकिनार कर आज की लड़ाई लड़ना चाहती है। मुझे फिर लगता है कि यह समस्यामूलक है। ये अनुभव से न सीखने जैसा है। और वो भी तब जबकि माओवादी घोषित रूप से अपना उद्देश्य आदिवासी जीवन और जंगल को अक्ष्क्षुण रखना नहीं बल्कि इस देश में नवजनवादी क्रांति करना बताते हैं।

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कैसे आएगी ये नवजनवादी क्रांति? मनुष्य के इतिहास का सबसे उन्नत, सबसे न्यायपूर्ण, सबसे सभ्य समाज बनाने के लिए माओवादी किन शक्तियों को गोलबन्द कर रहे हैं? क्या वो शक्तियां आज के समाज के सबसे उन्नत उत्पादन सम्बन्धों से उपजी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं! वे तो आज की तारीख़ में जो सबसे पिछड़े, सबसे पुरातन उत्पादन सम्बन्धों वाले समाज से आने वाले आदिवासी लोग हैं, छोटे या भूमिहीन किसान हैं। तो फिर जब उन्हे इस पुरातन अवस्था से सामाजिक परिवर्तन की सबसे आगे की पाँत में ले जा कर खड़ा कर दिया जाएगा तो वो कैसे नेतृत्व करेंगे? क्योंकि आज तो आप उन्हे परिवर्तन के पक्ष में नहीं बल्कि परिवर्तन के विरुद्ध गोलबन्द कर रहे हैं?

इसके बरख़िलाफ़ शहरों में, एक नया सर्वहारा पैदा हो रहा है, जो मज़दूर की किसी भी पहचानी हुई परिभाषा में फ़िट नहीं होता। वो जींस और बेसबौल कैप पहनता है, अंगेज़ी बोलता है। वो धर्म, जाति और देश के बन्धनों से लगभग टूट चुका है। वो बीपीओज़ और मौल्स में काम करता है। अख़्बारों और मीडिया में काम करता है। उसके न तो काम के कोई नियत घण्टे हैं और न ही श्रमिक क़ानून के कोई लाभ उसे मिलते हैं। वो व़कील है, डौक्टर है, अध्यापक है, पत्रकार है, गायक है, चित्रकार है, अभिनेता है, लेखक है। अपने उत्पादन के साधनों पर उसका कोई अधिकार नहीं है, और अपने उत्पाद से वो विलगित है। उसके पास खोने के लिए वो सारी चीज़े हैं जो उस ने कर्ज़ लेकर ख़रीदी हैं। शायद उसी के लिए मियां ग़ालिब ने लिखा था:

कर्ज़ की पीते थे मय और समझते थे कि हाँ,
रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ामस्ती एक दिन।

वो नया मज़दूर है, वो नया सर्वहारा है। लेकिन न वो ये बात जानता है और न ही देश की कोई कम्यूनिस्ट पार्टी, माओवादी तो बिलकुल नहीं।

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*इस लेख में अरुंधति के हवाले आउटलुक में छपे उनके हालिया लेख 'वाकिंग विद कौमरेड्स' से हैं।
*कौमरेड गणपति के हवाले २००७ के उनके एक लम्बे साक्षात्कार से हैं।




(समाप्त)


पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-४


अरुंधति मानती हैं कि भारत एक सवर्ण हिन्दू राज्य है क्योंकि यहाँ मुसलमानों, दलितों, ईसाईयों, सिखों, आदिवासियों, कम्यूनिस्टो और प्रतिरोध करने वालों ग़रीबों पर अत्याचार होता है। ठीक है। लेकिन ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है, जिसमें सवर्णों की सत्ता की रक्षा के लिए नहीं दलितों और पिछड़ों को सत्ता में शामिल करने के लिए क़ानून बनते हैं? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक सत्ता पर दलित राजनीति का वर्चस्व है और 'सवर्ण हिन्दू राज्य' ब्राह्मणों को दलितों की जीहुज़ुरी और चरणवन्दना तक लगा देखते हुए भी निरपेक्ष बना रहता है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य जिसमें देश की अनेक समस्याओं के लिए ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों को निरन्तर न सिर्फ़ दोषी ठहराया जाता है बल्कि गरियाया भी जाता है, और हर समझदार ब्राह्मण अपनी परम्परा और जाति के प्रति अपराधबोध से ग्रस्त रहता है? ये कैसा सवर्ण हिन्दू राज्य है जिसमें मनुस्मृति और चाणक्य के अर्थशास्त्र के वो विशेष अधिकारों के विपरीत, ब्राह्मण की अवमानना पर कोई विशेष अपराध नहीं बनता जबकि दलित के सम्मान की रक्षा के लिए हर सम्भव जगह बनाई जा रही है? अरुंधति जैसी विद्वान और सचेत महिला भी इस अन्तर को देख पाने और चिह्नित करने में क्यों चूक जाती हैं कि इस राज्य में अब अगर कोई बायस है तो अब दलितों और पिछड़ों के पक्ष में

इस 'सवर्ण हिन्दू राज्य' पर अरुंधति समेत सभी माओवादी एक दूसरे आकलन से आरोप है कि इस देश को साम्राज्यवादी शक्तियां यानी अमरीका आदि और उनके दलाल यानी सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, अज़ीम प्रेम जी, अम्बानी बंधु, टाटा आदि चला रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो क्या वे मानते हैं कि इस सवर्ण हिन्दू आग्रह की जड़ अमरीका तक जाती है? और क्या अरुंधति ये मानती हैं कि टाटा, सोनिया और मनमोहन हो सकते हैं पारसी, ईसाई और सिख मगर चिंता सवर्ण हिन्दू हितों की करते हैं? और अगर अरुंधति ये मानती हैं कि अम्बानी अपनी नीतियां तय करते वक़्त हिन्दू हित की चिंता करते हैं तो मैं उन पर सिर्फ़ हँस सकता हूँ, और कुछ नहीं।

असल में ये उनकी समझ का दोष है जो राज्य के चरित्र और समाज के चरित्र में भेद नहीं कर पा रहीं। न तो यहाँ की पूँजी का कोई सवर्ण और हिन्दू चरित्र है और न ही राज्य का। लेकिन राज्य और पूँजी जिस समाज में व्यवहार कर रहे हैं वो एक लम्बे समय तक सवर्णों के प्रभुत्व में रहा है। लेकिन इस अवधि में भी मुस्लिम शासन का वह छै सौ साल का और दो सौ साल का वह काल है जब कि अंग्रेज़ प्रबल रहे। फिर भी यह सच है कि आज भारतीय समाज की मुख्यधारा में एक सवर्ण हिन्दू तबक़े की प्रबल उपस्थिति है। और अगर समाज में सवर्ण हिन्दू प्रबल हैं भी तो उसको लेकर इतना विचलित होने की क्या ज़रूरत है? सवर्ण हिन्दू भी इसी समाज का अंग हैं और उनको भी फलने-फूलने का पूरा हक़ है। हज़ारों सालों से उन्होने अपने प्रभुत्व का जो लाभ लिया उस की ख़ानापूरी एक सकारात्मक भेदभाव (आरक्षण) के ज़रिये की जा रही है जिससे एक दूसरी सूरत पैदा हो रही है। उत्तर प्रदेश के लाखों ब्राह्मण परिवार ऐसे हैं जिनमें जवान बेटी-बेटों के पास न नौकरी है न धंधा। वे अरुंधति के इस आरोप पर मुहँ बा देंगे। उनके अनुसार अगर उनको अनुसूचित जाति या जनजाति का प्रमाणपत्र मिल जाता तो उनकी समस्या हल हो जाती।

अरुंधति के आरोप का जवाब एक जवाबी आरोप हो सकता है। हो क्या सकता है, है। वो ये कि इस देश को साम्राज्यवादी देशों में बैठी चर्च और चर्च की संस्थाएं, इस देश में उनके दलालों के ज़रिये चला रही हैं। कांग्रेस और बड़े मीडिया घरानो से लेकर बड़े पूँजीपतियों में उनकी पैठ है। सोनिया गाँधी उसकी मुख्य एजेंट हैं, जिन्होने कांग्रेस पार्टी की सभी मुख्य ज़िम्मेदारियां ईसाईयों को सौंप रखी हैं। प्रणय राय और सुज़ाना अरुंधति राय उनके सेनापति हैं जो अपनी रिश्तेदारी ज़ाहिर होने देते हैं न उनकी ईसाईयत कि कहीं उनकी साज़िश खुल न जाय? मार्क्सवादी और ख़ासकर माओवादी भी इस साज़िश में शामिल हैं। ये जहाँ सक्रिय होते हैं, धर्म परिवर्तन होने लगते हैं। चर्च की एक शाखा है जो खुले तौर पर इस तरह के माओवादी आन्दोलनों की वक़ालत करती रही है। अधिकतर माओवादी नेता ईसाई हैं। इन सब तथ्यों की रौशनी में ये सिद्ध होता है कि भारतीय राज्य (और पूँजी भी, उसे भी लपेटने में क्या जाता है) एक कट्टरवादी ईसाई संस्था है। इस का क्या जवाब है? यहाँ आप चाहें तो हँस सकते हैं।

मुसलमानों पर अत्याचार की भी हर दम दुहाई देने वालों को ये समझना चाहिये इस देश के विभाजन के वक़्त मुसलमानों का अभिजात वर्ग, जो ईरान, तूरान आदि से आया था और जिसने इस देश में छै सौ सालों तक शासन किया था। अंग्रेज़ों के जाने के बाद की एक जनतांत्रिक व्यवस्था में एक अल्पसंख्यक की कम महत्व की भूमिका में धकेल दिए जाने को तैयार नहीं था। और इसीलिए उसने अपने लिए एक नए, ख़ास मुसलमानों का राष्ट्र बनाने का रास्ता चुन लिया और पूरे देश से निकल-निकल कर वहाँ चला गया। बच कौन रहा? बचे वे रहे जो किसी बाहरी देश से नहीं आए थे। इसी देश में हज़ारों सालों से रह रहे थे, शायद शूद्र या दलित रूप मे और फिर बौद्धों के रूप में। वे तब भी पिछड़े हुए थे और आज भी पिछड़े हुए हैं। वे राज्य या समाज की किसी साज़िश की तहत पिछाड़े नहीं गए हैं। मुसलमानों के अभिजात वर्ग के जिस हिस्से ने इसी देश में रहने का चुनाव किया, उसके प्रति न तो राज्य कोई भेदभाव करता है और न ही समाज। और वे किस लिहाज़ से किसी से पीछे हैं? क्या एक गहरे तौर पर सवर्ण, हिन्दू, साम्प्रदायिक समाज फ़िल्मों में ख़ानों और क्रिकेट में पठानों को लेकर इतना लड़िया सकता है?

हिन्दू-मुस्लिम तनाव की राजनीति की असफलता ही इसका सबसे बड़ा सबूत है कि तथाकथित हिन्दुत्व न तो बहुसंख्यक लोगों के मानस में है और न राज्य के चरित्र में। अगर ऐसा होता तो मस्जिद तोड़ने के लिए न इतना आन्दोलन करना पड़ता और न एक मन्दिर बनाने के लिए इतना इंतज़ार। उल्लेखनीय है कि तुर्की में पुराने गिरजाघरों को मस्जिदों में बदलने में न कोई आन्दोलन चलाना पड़ा था और न कोई देर लगी थी। यहाँ आन्दोलन करना पड़ा क्योंकि लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, उन्हे उत्तेजक भाषणों से भड़काना पड़ा। और उतने सब के बावजूद भाजपा कभी बहुमत न पा सकी और अब वापस मध्यमार्ग तलाश रही है। दंगो के हालात और परिणाम के आधार पर चरित्र आकलन करना भूल है- दंगे अस्थायी पागलपन होते हैं -टेम्परेरी मैडनेस। अपराधियों को उचित दण्ड मिलने में देर, किसी राज्य के चरित्र का द्योतक नहीं बल्कि तात्कालिक निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचार के लक्षण हैं।

समस्याए है; कमज़ोरों, अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय होता रहा है, मगर कोई भी परिवर्तन रातों-रात नहीं होता। बीमार को चंगा करने के लिए बिजली के झटके नहीं, औषधि चाहिये होती है। और पिछड़ापन सिर्फ़ शूद्रों, दलितों की सोच में ही नहीं, सवर्णों की सोच में भी है। समाज में उसकी उपस्थिति और आम जीवन में उसके व्यवहार को राज्य के चरित्र की तरह चिह्नित कर देना, मुझे तो बचकाना चिंतन लगता है। और उस पिछड़ेपन को बदलने की ताक़त किसी क्रांतिकारी पार्टी में नहीं, बल्कि सिर्फ़ पूँजीवाद में है। क्रांतिकारी दलों का हिंसक हस्तक्षेप जातीय नरसंहारों को जन्म देता है। जबकि बिना किसी बहस, किसी जनजागरण अभियान, बिना किसी धरना, जुलूस, प्रदर्शन और बिना किसी नरसंहार के शहर में विस्थापित हो कर दलित ठेकेदारी कर रहे हैं और तमाम सवर्ण उनके नीचे मज़दूरी कर रहे हैं। माओवादियों का बदलाव का रास्ता ज़बरदस्ती का रास्ता है, जबकि पूँजीवाद (भले ही दलाल) सहज रास्ता है।

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एक समय में मेरा भी ये विचार बना था कि आतंकवादी इस भ्रष्ट संसार में अकेले ऐसे लोग बचे हैं जो ईमा्न और सच्चरित्रता से अपने जीवन को निर्देशित कर रहे हैं, जबकि पूँजी उन सारे तत्वों को पोषित कर रही है जिन्हे इब्राहिमी परम्परा में सेवेन डेडली सिन्स के बतौर पहचाना गया है। हालांकि अब मेरा मानना है कि वे सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रतिगामी शक्तियां है जो ख़ून-ख़राबे के सिवा कुछ नहीं लायेंगी और न ही वे किसी और चीज़ के क़ाबिल हैं क्योंकि सिर्फ़ अपने को ही सही समझने का बोध उनके अन्दर इतना तगड़ा जमा हुआ है कि वे सारे उन लोगों को जो उनके रास्ते पर नहीं चल रहे पथभ्रष्ट और इसीलिए मारे जाने योग्य घोषित कर देते हैं। पाकिस्तान में आजकल जो मुसलमान ही मुसलमानों की हत्या कर रहे हैं, वह इसी चिन्तन का परिणाम है।

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सी पी आई, माओइस्ट के महासचिव कौमरेड गणपति भारत के शासक वर्ग को प्रतिक्रियावादी कहते हैं जो प्रगतिशील का विलोम है और जिसका अर्थ होता है आगे बढ़ने के बजाय पीछे की अवस्था में लौटने वाला। मैं समझ नहीं पाता कि किस परिभाषा से माओवादी अपने आप को प्रगतिशील और राज्य को प्रतिक्रियावादी मानते हैं। यहाँ तक कि गुजरात में मुस्लिमों के नरसंहार के आरोपी मोदी भी अपनी आर्थिक नीतियों में प्रतिक्रियावादी नहीं कहे जा सकते क्योंकि वो उस पूँजीवाद को बढ़ावा दे रही हैं जो जाति, धर्म और राष्ट्रीयता जैसे बनावटी विभाजकों को गला देता है। जबकि इस्लामी आतंकवादी जो शरिया को दुबारा लागू करने के लिए हर जगह संघर्ष कर रहे हैं, उन्हे कौमरेड प्रगतिशील शक्ति मानते हैं?

कौमरेड गणपति आतंकवादियों की पक्षधरता एक अलग नज़रिये से करते हैं.. कौमरेड मानते हैं कि तालिबान, अल क़ाएदा आदि प्रगतिशील शक्तियां हैं क्योंकि वे अमरीकी साम्राज्यवाद से संघर्ष कर रहे हैं और उसके नाश में क्रांतिकारी शक्तियों का सहयोग कर रहे हैं। भूमण्डलीय साम्राज्यवाद के विनाश से इस्लामी जनता अपनी दकियानूसी विचारधारा से जाग उठेगी और वर्गहीन समाज बनाने की ओर बढ़ चलेगी। पता नहीं कौमरेड ये क्यों भूल जाते हैं कि इस्लाम ख़ुद एक वक़्त में साम्राज्यवादी विचारधारा था और तब इस आर्थिक साम्राज्यवाद का नामोनिशां भी नहीं था। ये भूमण्डलीय साम्राज्यवाद, पुराने स्वरूप को नष्ट कर रहा है तो कौमरेड को लग रहा है कि पुराना प्रगतिशील है, क्रांतिकारी है और नया प्रतिक्रियावादी। कैसे सर के बल खड़े हैं कौमरेड?

(जारी)

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-१

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-३



सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार भारत में आज जो चार प्रकार के जन पाए जाते हैं – निषाद (औस्ट्रिक; कोल, भील, शबर), किरात (मंगोलोइड, पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले चीनी तिब्बती भाषा मूल के), द्रविड़ (दास, द्रविड़, नाग) और आर्य (भारोपीय)- उन में आदिवासी निषाद सब से पुराने हैं। किरात, द्रविड़ और आर्य जनों में लम्बे समय तक हुई वर्ण संकरता के चलते ये तीनों संस्कृतियां और जन आपस में घुल मिल गए हैं। लेकिन निषाद संस्कृति ने जंगल के जीवन में ख़ुद को सीमित कर के अपने आदिम स्वरूप को अब तक बनाए रखा है। मुख्यधारा ने उनके साथ अन्याय और अनदेखा किया है। लेकिन आज के पहले कभी ऐसा मौक़ा नहीं आया कि आदिवासी जीवन, और मुख्यधारा का समाज ‘इतना’ आमने-सामने आ गया हो। ये पूँजीवाद की विराटता के चलते हो रहा है। इतना तो तय है कि वो कटे हुए नहीं रह सकते। बाहर के समाज ने उन्हे बुरी तरह से न सिर्फ़ घेर लिया है बल्कि अपनी लड़ाई में फंसा भी लिया है। इस लड़ाई में पूँजीवाद जीते या माओवादी, आदिवासी जीवन अब पहले वाली स्थिति में बना नहीं रह सकता। वो बदल चुका है। सवाल ये है कि वो अपने पर्यावरण को कितना बचाए रख पाते हैं जिसके साथ वो एकता महसूस करते हैं?

माओवादियों के लिए आदिवासियों को उनका पर्यावरण, उनका जंगल, उनकी ज़मीन दिला देना उनका लक्ष्य नहीं है। वे इस देश में न्यू डेमोक्रेसी क़ायम करना चाहते हैं, क्योंकि यह देश अभी भी अर्ध-सामंती, अर्ध औपनिवेशिक अवस्था में फंसा हुआ है। न्यू डेमोक्रेसी के बाद वो पूँजी का विकास करके समाजवाद के रास्ते पर बढ़ चलेंगे और मार्क्स और माओ के सपने का समाज बनाएंगे। न तो उनके पास न्यू डेमोक्रेसी की बहुत कोई व्यावहारिक धारणा है और न ही पूँजी के विकास को लेकर भी कोई ठोस योजना। न जाने क्यों वे ये भी नही देख पाते कि राज्य के द्वारा पूँजी के विकास का मॉडल बुरी तरह नाकाम हो चुका है और चीन तक ने बिना लोकतंत्र लाए पूँजी के लिए खुला बाज़ार खोल दिया है। मज़े की बात ये सोचने की है अगर माओवादी चीन में होते तो क्या करते? क्योंकि वहाँ तो भारत के पासंग बराबर भी लोकतंत्र नहीं है और पूँजी के विकास के लिए जनता की यथास्थिति का दमन वहाँ जिस तरह होता है उसे जान कर सिंगूर के किसान बुद्धदेब बाबू के प्रति अपने प्रतिरोध को लेकर कुछ अपराधबोध पाल सकते हैं।

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सर्वहारा वर्ग के पक्ष से विकास करने वाली व्यवस्थाओं का रेकार्ड बहुत रक्तरंजित रहा है। और मज़े की बात ये है कि सत्तर साल तक सोवियत संघ में समाजवाद रहने के बाद जब वहां लोकतंत्र आया तो ऐसा नहीं था कि वहाँ वर्ग विभेद बिला चुके थे? वे समाज में मौजूद बने रहे, भले ही सुप्तावस्था में? ये विचित्र बात कैसे सम्भव हुई? इसका क्या अर्थ है? तो इतना सब प्रपंच किसलिए, जब मनुष्य के मिज़ाज में जब कोई परिवर्तन आना ही नहीं है?

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सलवा जुडुम को सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार आयोग की एक रपट के आधार पर बन्द करने का आदेश दे दिया जिसमें उसके ऊपर व्यापक स्तर पर मानवाधिकार हनन का आरोप था। लेकिन क्या माओवादी मानवाधिकार हनन के आरोप से मुक्त हो सकते हैं? क्या वे मानवाधिकार में विश्वास करते हैं? क्या है क्या मानवाधिकार? दोषी को सज़ा देने के प्रावधान हर व्यवस्था में है। आरोपी के दोष साबित होने के पहले तक दोषी के अधिकार के इर्द-गिर्द ही मानवाधिकारों का ताना-बाना है। मगर माओवादी तो इसी बात को दोष मानते हैं कि अगर कोई उनको लेवी देने से इन्कार करे या उनकी लड़ाई में उनका साथ न दे।

मज़े की बात ये भी है कि जो लोग देश में लोकतंत्र न होने की दुहाई देते नहीं थकते वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुडुम पर बंदिश के आदेश को, राज्य और व्यवस्था के चरित्र का आकलन करते वक़्त उसे शामिल करना बिलकुल गोल कर जाते हैं। वो ये भी नहीं देखते कि माओवादियों से कैसे निबटा जाए इस बात पर भी सरकार एकमत नहीं है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, अलग-अलग मंत्री, यहाँ तक कि सेना प्रमुख भी अलग राय रखते हैं और उसे खुले मंच से बोलते हैं। ये स्वप्नदर्शियों के स्वप्नों का जनतंत्र भले न हो पर ये जनतंत्र के लक्षण नहीं है तो और किसके है?

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लेकिन शायद जब वे कहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र नहीं आया तो वे जहाँ हैं, उसको केंद्र में रखकर बोलते हैं और जब हम उसे सुनते हैं तो हम जहाँ है, उस में रहकर सुनते हैं। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। शहरों में अपेक्षाकृत लोकतंत्र काफ़ी मज़बूत है और गाँव में लोकतंत्र अभी दूर के ढोल हैं, और सुहाने वाली बात तो दीगर ही है।

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लेकिन हर समाज में हर काल में ऐसे लोग होते हैं जो हर बात का नकारात्मक पहलू ही देखते हैं, उन्हे हमेशा लगता है कि दुनिया से बद से बदतर होती जा रही है। वे बार-बार ये कहते हैं, 'सब कुछ सड़ रहा है, खोखला हो रहा है, मर रहा है'। वो कहते हैं, 'पहले का आम बड़ा मीठा होता था, अब तो आम खाने लायक नहीं रहा, आम में स्वाद ख़त्म हो रहा है'। बिना इस बात को ख़्याल में लाए कि इस देश में जनतंत्र था कब? जो सड़ कर, खोखला हो गया? अगर आदिवासियों के बीच में मैलन्यूट्रीशन है, एबजेक्ट पावर्टी है तो वो क्या अभी दस-बीस साल का परिणाम है? वो तो हज़ारों सालों से है। और इसलिए है कि वहाँ पूँजीवाद कह लीजिये, विकास कह लीजिये, जो नाम भी है उस कल्याणकारी प्रभाव का, वो नहीं पहुँचा है।

लेकिन अगर सरकार रोड बनाने जाये, मिसाल के लिए, और बिना किसानों को उचित प्रतिदान दिए कुछ खेतो को अधिग्रहीत कर ले तो वे इस का प्रतिरोध करते हुए कुछ ऐसा सुर ले लेते हैं कि जिसमें उचित प्रतिदान का आन्दोलन, रोड की मुख़ालफ़त का आन्दोलन बन जाता है। पूँजीवादी प्रगति के तमाम प्रतीक चिह्न क्रिकेट स्टेडियम, शौपिंग मौल्स, एअरपोर्ट, सब के विरुद्ध किसानी जीवन के चिह्नों को, जन संस्कृति के रूप में भिड़ा दिया जाता है। उचित मुआवज़े का आन्दोलन, पूँजीवादी विकास के विरोध का आन्दोलन बन जाता है। फिर शिकायत ये लगातार बनी रहती है कि देखिये कितना पिछड़ापन, कितनी ग़रीबी है, कितना कुपोषण है। चालीस बरस तक तो समाजवादी राह पर चलकर कहीं नहीं पहुँचने के बाद अभी कुछ विकास होना शुरु हुआ है। सब कुछ पलक झपकते सम्भव नहीं क्योंकि ये पूरा विकास ट्रिकल डाउन सिद्धान्त पर धरा हुआ है। विकास की दूसरी अवधारणा, मैं भी चाहता हूँ कि हो, कोई तो विकल्प हो जिसमें कम से कम तक्लीफ़ से अधिक से अधिक लोगों को समृद्ध किया जा सके। ऐसा कोई विकल्प बनना ज़रूर चाहिये लेकिन वो सिर्फ़ विरोध और प्रतिरोध से नहीं बनेगा, हिंसा से तो बिलकुल नहीं।

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अमरीका और योरोप में पूँजीवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध एक उन्नत स्तर का है। वहाँ पूँजी का विकास हो चुका है। वहाँ का समाज को अगले स्तर में जाने के लिए बेचैन है। लेकिन भारत जैसे देश में पूँजी का विरोध का अर्थ है विकास का विरोध, प्रगति का विरोध। इस प्रस्थापना में एक आधारभूत अड़चन है: पर्यावरण। उसका क्या हल है, मैं नहीं जानता। लेकिन जो इस बात को मुझसे बेहतर समझते हैं या समझने का दावा करते हैं, वो माओवाद के पाले में कैसे जा कर खड़े हो सकते हैं जबकि माओवाद की पर्यावरण के प्रति कोई घोषित नीति नहीं है?

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माइन का विरोध करने वालों ने पूरे जंगल को लैंडमाइनो से भर दिया है। ये जंगल की, पर्यावरण की रक्षा हो रही है या उसे युद्ध के उन्माद में एक दूसरे अफ़्ग़ानिस्तान में बदला जा रहा है? इस पर मीर तक़ी मीर का एक शेर याद आता है:

अब की जुनूँ में, फ़ासला शायद न कुछ रहे,
दामन के चाक का और गरीबाँ के चाक का।

(दामन का अर्थ कमरे के नीचे पहनने का वस्त्र होता है, आँचल नहीं जैसा कि आम समझ है, और गरीबाँ तो आप जानते ही हैं)

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अरुंधति की रपट से पता चलता है कि जब आदिवासी गाँव में लोग रेडियो पर सुनते हैं कि नितीश और गुरुजी 'नक्सल तो हमारे भटके हुए बच्चे हैं' जैसी बात कर रहे हैं तो वे हँस पड़ते हैं क्योंकि ‘वे जानते हैं कि उनके नाख़ून और दाँत निकालने के कार्यक्रम से आप घड़ियां मिला सकते हैं’। ये हैरानी की बात नहीं है कि आदिवासी ऐसे किसी नेता पर यक़ीन नहीं करते जो उनके प्रति मुलायमियत बरत रहा हो। मगर ऐसा क्यों है? क्या वे अपने अनुभव से ऐसा जानते हैं जैसे हम गहरे तौर पर जानते हैं कि सारे नेता चोर और हरामी होते हैं, या ये माओवादी की शिक्षा का अंग है जिसमें किसी भी नरमी को छिपी हुई तेज़ी का संकेत समझो ताकि लड़ने का तेवर कभी मद्धम न पड़ने पाए? अगर ऐसा है तो यह दुनिया को सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पूर्वाग्रह से ही देखने की ज़िद है, कि हम ने तो तय कर लिया है कि मुख्यधारा हमारे ख़िलाफ़ है और हमें उनसे आर-पार का युद्ध करना है। अगर आप फ़ौज भेजते हैं तो हमारी बात की पुष्टि होती है, और अगर आप फ़ौज न भेजकर अमन की बातें करते हों तो हम जानते हैं कि ये ढकोसला है और हम आप की बात पर हँसते हुए फ़ौज के आने की तैयारी करते जाते हैं।

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बहुत सारे अन्याय जो मुख्यधारा के समाज में होते रहे हैं, होते हैं, वो आदिवासी समाज में भी पाए जाते हैं- जैसे स्त्रियों के प्रति भेदभाव या मुखिया द्वारा बाक़ी लोगों के साथ अन्याय। माओवादी इन पुरातन मान्यताओं और रिवाज़ों के खि़लाफ़ भी लड़ते हैं। मज़े की बात ये है कि पूँजीवाद भी उनके ख़िलाफ़ लड़ रहा है, उसके ऊपरी संदेश पर मत जाइये, वो जो जीवन बना रहे है उसे देखिये। वो पुरानी हर चीज़ को कचरे में डाल रहा है। नए मूल्य गढ़ रहा है। पुराने को नष्ट करने के पाप के लिए माओवादी तब उसकी निन्दा करते हैं और अपने स्तर पर वही काम करते हैं। ये बड़ी अजब बात है कि माओवादी, ऐतिहासिक भौतिकवाद में विश्वास रखने के बावजूद आदिवासी-खेतिहर समाज में नए मूल्य के बीज डाल रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि बिना स्थितियां बदले ही मूल्य पक्के पेड़ बन जाएंगे और आगे तक फल देते रहेंगे। जब उत्पादन के मोड में फ़र्क़ नहीं आया है तो इस बात की क्या गारण्टी है कि माओवादी सरबराहों के हटते ही पुराने मूल्य वापस न लौट आयेंगे? सलवा जुडुम वाले माओवादियों का विरोध करते हुए उन पुरानी मान्यताओं की पुनर्स्थापना का भी नारा लगाते हैं जिन्हे माओवादियों ने रोका है, जैसे औरतों को बीज न बोने देना, उन्हे पेड़ पर न चढ़ने देना, और एक से अधिक शादी की आज़ादी लेना। वैसे ही जैसे भाजपा एक उग्र हिन्दुत्व का रूप धर कर आती है।

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पुलिस वालों द्वारा की जा रही मुठभेड़ों में किए गए फ़र्ज़ी एनकाउन्टर और माओवादियों द्वारा जनअदालत के तुरत-फ़ुरत न्याय में फ़र्क ये है कि जहाँ पुलिसवालों के एन्काउन्टर को क़ानून की मान्यता नहीं मिली हुई है। और राज्य उस नृशंसता की भर्त्सना करता है और उस के लिए मौक़ा पड़ने पर अपराधी पुलिस वालों को दण्डित भी करता है। लेकिन जनता की सामूहिक शिरकत वाली जनअदालतों का न्याय उस नृशंसता को संस्थाबद्ध न्याय को चोला पहना देता है। जिसे अरुंधति इसलिए भारतीय अदालत के न्याय से ऊपर इसलिए मानती हैं क्योंकि उसमें जनता साक्षात उपस्थित है और फ़ैसले की भागीदार है। दूसरी तरफ़ उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, जनसमूह और उसकी आकांक्षाओं से बहुत पहले कट चुके हैं। इस राज्य की घिसटती हुई न्याय व्यवस्था के बारे में तो हम बहुत सुन चुके हैं लेकिन जन अदालतों पर अरुंधति की बात के सन्दर्भ में नीत्शे का एक वचन याद करने योग्य है, 'व्यक्तियों में पागलपन और वहशत एक अपवाद है लेकिन समूह में हमेशा एक नियम'। अकेला आदमी दंगा नहीं करता, दंगा एक सामूहिक व्यवहार है। इस तर्क को खींच कर यहां तक ले जाया सकता है कि सामूहिकता एक पाशविक वृत्ति है और निजता एक मानवीय गुण। यह बात पूरी तरह से भले ठीक न भी हो पर इसमें सच्चाई के अंश ज़रूर हैं।

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अरुंधति दंतेवाड़ा में माओवादियों द्वारा की गई ७६ सुरक्षाकर्मियों की हत्या की भर्त्सना करने से इंकार करती हैं। उनका तर्क है कि वे सताए हुए लोग हैं और उनके द्वारा बचाव में की गई प्रतिहिंसा की तुलना राज्य की संरचनात्मक हिंसा से नहीं की जा सकती। ये सिर्फ़ एक चतुर तर्क लगता है ताकि इस तुलना को अनैतिक बता कर इस का सामना करने से बचा जा सके क्योंकि अरुंधति के डिसकोर्स का पूरा संसार, हिंसा और अन्याय की अनैतिकता के आधार पर खड़ा किया गया है।

७६ सुरक्षाकर्मियों की ये हत्या आदिवासियों ने नहीं की, माओवादियों ने की। एक सोची-समझी नीति के तहत की। क्या है वह नीति? वो नीति है दुश्मन को एक कठोर सबक सिखाने की नीति, अपने इरादों की अटलता का सीधा संदेश देने की नीति। माओवादी दण्डकारण्य में एक पार्टी की तरह नहीं, एक समान्तर राज्य की तरह काम कर रहे हैं, जैसा कि अरुंधति ने स्वयं अपनी रपट में लिखा है। उनकी जनताना सरकारें सेना, अर्थ्व्यवस्था, कृषि, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सबसे महत्वपूर्ण न्याय, सभी मूलभूत अंगो का संचालन कर रही हैं।

ये कोई बेचारगी की, हताशा की आत्मघाती हिंसा नहीं है जैसे कि फ़िलीस्तीनी ख़ुद्कुश बम करते थे, और कुछ अभी भी करते हैं। ये सजग, सचेत, बचाव की नहीं और अपनी पहलकदमी वाली हमले के चरित्र की हिंसा है। अगर माओवादी चाहते तो उनमें से कुछ को जीवित भी छोड़ देते, गिरफ़्तार करते, मुक़द्दमा चलाते। उस न्याय का परिचय देते जिस की अपेक्षा वो भारत सरकार से करते हैं। लेकिन उन्होने ऐसा कुछ नहीं किया, उन्होने सब की हत्या की। जो बच गए वो ग़फ़लत में बच गए। क्या ये अजीब नहीं है कि अरुंधति के दो मापदण्ड हैं, एक माओवादियों के लिए और दूसरा राज्य के लिए?

(जारी)

पूँजीवाद-माओवाद: कुछ नोट्स-२

 
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