मंगलवार, 3 अप्रैल 2007
सलोना शब्द है सलोना
वो मनुष्य जाति की मातायें हैं
जीवन बदल रहा है.. विशेषकर स्त्री की समाज में भूमिका को लेकर.. इस विषय पर तमाम तरह के विचार समाज में चल रहे हैं.. उन विचारों के बिल्ले भी हैं.. नारीवादी, अतिनारीवादी, प्रगतिशील, पतनशील, पुरातनपंथी, रूढ़िवादी आदि आदि.. इन विचारों में कुछ पोलिटिकली करेक्ट विचार माने जाते हैं.. और कुछ पोलिटिकली इनकरेक्ट.. मैंने भी कुछ ऐसे ही पोलिटिकली इनकरेक्ट विचार पिछले दिनों व्यक्त किये.. लोग अप्रसन्न भी हुए.. आज मैं भारत के एक मूर्धन्य कवि और विचारक और आधुनिक ऋषि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचार आपके सामने ला रहा हूँ.. स्त्री पर ये विचार उन्होने १९१६-१७ की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक भाषण में व्यक्त किये.. पाठकों से थोड़े धैर्य की अपेक्षा है.. कुछ गुरुदेव की अपनी अंग्रेज़ी की सीमायें हैं और कुछ मेरे अनुवाद की.. एक साथ पूरे भाषण को देना पढने वालों के लिये भारी हो जायेगा इसलिये तीन टुकड़े कर दिये हैं.. आज पहला टुकड़ा..स्त्री
जब नर प्राणी एक दूसरे को मारने के लिये अपनी हिंसा में लिप्त होते हैं, कुदरत इसकी अनदेखी करती है क्योंकि, तुलनात्मक रूप से, मादा उसके मक़सद में अनिवार्य हैं जबकि नर महज़ एक ज़रूरत। किफ़ायती शील की होने के कारण कुदरत उन भूखी सन्तानों को ज़्यादा तरजीह नहीं देती जो झगड़े की हद तक पेटू हैं मगर कुदरत का ऋण चुकाने के लिये योगदान बहुत ज़रा सा ही करते हैं। इसीलिये कीट जगत में हम यह संवृत्ति देखते हैं जिसमें मादायें नर जन संख्या को कम से कम रखने की ज़िम्मेदारी निभाती हैं।प्रकृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से बहुत हद तक मुक्त हो गये, मनुष्य जगत में नर को, अपने शौक और खुराफ़ातों को पूरा करने की आज़ादी मिल गई है। आदमी को परिभाषा से औज़ार बनाने वाला प्राणी कहा जाता है। ये औज़ार बनाना कुदरत के दायरे से बाहर है।
वास्तव में हम अपनी औज़ार बनाने की ताक़त के ज़रिये ही कुदरत की अवहेलना कर सके हैं। अपनी अधिकतर ऊर्जा की मुक्ति की बदौलत ही मनुष्य ने ये क्षमता पैदा की और शक्तिशाली हो गया। और इस तरह से, बावजूद इसके कि कुदरत द्वारा प्रदत्त जैविक विभाग की गद्दी अभी भी स्त्री के ही पास है, मानसिक विभाग में पुरुष ने अपना प्रभुत्व बना और बढ़ा लिया है। इस महान कार्य के लिये दिमाग़ का अलगाव और गतिविधि की स्वतंत्रता आवश्यक थे।
आदमी ने शारीरिक और भावनात्मक बेड़ियों से अपनी तुलनात्मक आज़ादी का फ़ायदा उठाया और अपने जीवन की सीमाओं को तोड़ने की दिशा में बेरोकटोक बढ़ चला। इस यात्रा में वह क्रांति और विध्वंस के खतरनाक रास्तों से होकर गुज़रा है। समय समय पर उसके संचय समूह ढहते रहे और और तरक़्क़ी की धारा अपने स्रोत से ही अदृश्य होती रही है। लाभ अच्छे खासे हुए मगर नुकसान उससे भी ज़्यादा उठाने पड़े। खासकर कि जब हम ये सोचें कि जो सम्पदा जाती रही वो अपने साथ सारे प्रमाण भी ले गई। विनाश के इन आवृत्तियों से आदमी ने ये समझा है, हालाँकि उस सत्य का पूरा लाभ अभी भी नहीं लिया है, कि उसके सभी संरचनाओं को विनाश से बचाने के लिये एक लय बनाये रखना ज़रूरी है, कि मह्ज़ शक्ति की असीमित बढोत्तरी सच्ची तरक़्क़ी नही लाती, और सच में एक सही प्रगति के लिये एक सन्तुलन होना चाहिये, संरचना का बुनियाद के साथ एक तालमेल होना चाहिये।
स्त्री के स्वभाव में स्थायित्व के गुण के लिये बड़ा मूल्य है। अंधकार के हृदय में जिज्ञासा के चंचल तीर छोड़ते रहने का महज़ चलताऊपन उसे कभी नहीं लुभाता। उसकी सारी शक्तियाँ कुदरतन चीज़ों को एक आकार एक गोलाई देने में लगी रहती हैं क्यों कि यही जीवन का नियम है। जीवन की गति में हालाँकि कुछ भी अन्तिम नहीं मगर फिर भी हर कदम में एक पूर्णता की लय है।एक कली में भी अपने आदर्श की सम्पूर्ण गोलाई है, और फल में भी। मगर एक अधूरी इमारत में सम्पूर्णता का कोई आदर्श नहीं होता। इसलिये अगर वह अपने परिमाण में बढ़ती ही जाय तो धीरे धीरे वह अपने स्थायित्व के दायरे से बाहर चली जाती है। मानसिक सभ्यता की पौरुषीय संरचनायें बेबेल की मीनारें हैं। वे अपने बुनियाद की अवहेलना की ज़ुर्रत करती हैं और बार बार भरभराकर धसक जाती हैं। मनुष्य का इतिहास अपने विध्वसों की परतों पर ही विकसित होता रहा है। ये कोई सतत जीवन विकास नहीं रहा है। अभी चल रहा युद्ध (प्रथम विश्व युद्ध) इसी की एक अभिव्यक्ति है। बुद्धि से जन्मे हुए आर्थिक और राजनैतिक संगठन जो महज़ मशीनी शक्ति के ही नुमाइन्दे हैं, जीवन के बुनियादी आयाम में अपने गुरुत्व के केन्द्रों को भूल जाने के लिये प्रवृत्त हैं। शक्ति और स्वामित्व का संचित लोभ जिसका कोई सम्पूर्णता की कोई अवस्था नहीं हो सकती, जिसका नैतिक और आध्यात्मिक पूर्णता के आदर्शों के साथ कोई तादात्म्य नहीं है, आखिरकार अपने ही उपादान के भारीपन पर एक हिंसक वार कर बैठता है ।
इतिहास के वर्तमान मकाम पर सभ्यता लगभग पूरी तरह से पौरुषीय है, एक ताक़त की सभ्यता, जिसमें स्त्रियों को एक किनारे ढकेल दिया गया है। इसलिये इस सभ्यता का सन्तुलन बिगड़ा हुआ है और ये एक युद्ध से दूसरे युद्ध में उछलते हुए सी गति कर रही है। इसकी नीयत की शक्ति विनाश की शक्ति है, और इसके अनुष्ठान मानव बलि की एक भयंकर संख्या के साथ सम्पन्न होती है। ये एकतरफ़ा सभ्यता एक ज़बरदस्त चाल से दुर्घटनाओं की एक श्रंखला से टकराती हुई चल रही है क्यों कि ये एकतरफ़ा है। और आखिरकार वो समय आ गया है जब स्त्रियों आकर इस ताक़त की इस दुस्साहसी चाल को अपने जीवन लय प्रदान करें।
क्योंकि स्त्री की भूमिका मिट्टी की ग्रहणशील, समावेशी भूमिका है जो न केवल पेड़ को बढने में मदद देती है बल्कि उसकी वृद्धि की सीमायें भी तय करती है। जीवन के जीवट के लिये पेड़ अपनी शाखाएं ऊपर की दिशा में सभी ओर फैलाता है मगर उसके सारे गहरे बन्धन ज़मीन के नीचे मिट्टी में जकड़े हुये छिपे हुए हैं और उसे जीने में सहायक होते हैं। हमारी सभ्यता के भी अपने समावेशी तत्व चौड़े, गहरे और स्थिर होने चाहिये। केवल वृद्धि नहीं, वृद्धि का एक समन्वय होना चाहिये। सिर्फ़ सुर नहीं ताल भी होना चाहिये। ताल कोई बाधा नहीं है, ये वैसे ही जैसे नदी के किनारे होते हैं, वो धारा को सततशील बनाते हैं वरना वह दलदल के अनियतता में खो जायेगी। ये लय है ताल है, जो संसार की गति को रोकती नहीं बल्कि उसे एक सत्य और सौन्दर्य प्रदान करती है।
शील, विनय, समर्पण और आत्म-बलिदान की शक्ति स्त्री को समावेशिता के ये गुण पुरुष से ज़्यादा अनुपात में मिले हैं। ये प्रकृति की समावेशिता का गुण ही है जो इस की पैशाचिक शक्ति के जंगली तत्वों को वश में करके सौम्य और कोमल बनाकर जीवन के सेवायोग्य एक सुन्दर रचना में बदल देता है। स्त्री की इसी समावेशिता की शक्ति ने उसे वह वृहद और गहरी शान्ति दी है जो स्वास्थ्य पोषण और संग्रहण के लिये अत्यावश्यक है। अगर जीवन सिर्फ़ व्यय होने का नाम होता तो वह रॉकेट की तरह एक पल ऊपर जाता और दूसरे पल राख बनकर ज़मीन पर आ गिरता। जीवन एक चिराग़ की तरह होना चाहिये जिसमें कि रौशनी की सम्भावना लपटों से कहीं ज़्यादः है। स्त्री के स्वभाव में इसी समावेशिता की गहराई में जीवन की सम्भावना संग्रहीत होती है।
मैंने पहले कहीं कहा है कि पश्चिमी दुनिया की स्त्रियों में एक खास बेचैनी देखी जाती है जो उस के स्वभाव का सामान्य पहलू नहीं हो सकता। क्योंकि जो स्त्रियां अपनी रुचियों को जीवंत बनाये रखने के लिये अपने माहौल में कुछ विशेष और हिंसक तलाश करती हैं केवल यही सिद्ध करती हैं कि उनका अपने सच्चे जगत से नाता टूट चुका है। देखा गया है कि पश्चिम में बहुत सारी स्त्रियां और पुरुष भी उन चीज़ों की भर्त्सना करते हैं जो आम हैं। और वे उन चीज़ों का पीछा करते हैं जो कुछ खास है, और अपनी सारी शक्तियों का ज़ोर एक ऐसी जाली मौलिकता पर देते हैं जो सिर्फ़ चकित करती है संतुष्ट भले ना करती हो। मगर ऐसी कोशिशें जीवंतता की सही निशानियां नहीं हैं। और ये पुरुषों से ज़्यादा स्त्रियों के लिये घातक होती होंगी क्योंकि स्त्रियों में जैविक शक्ति पुरुषों की तुलना में अधिक प्रबल होती है। वो मनुष्य जाति की मातायें हैं और अपने आस पास की दुनिया की आम चीज़ों में उनकी सच्ची अभिरुचि होती है, यदि ऐसा ना हो तो मनुष्य जाति का विनाश हो जायेगा।
जारी..
रविवार, 1 अप्रैल 2007
क्यों ना गरियायें अमेरिका को - २
यूरोप के अधिकतर देशों ने मध्ययुग में दूसरे देशों को उपनिवेश बनाने के लिये कई तरह के कॉरपोरेशन की रचना की.. जैसे कि डच ईस्ट इंडिया कम्पनी जो कि दुनिया की पहली कम्पनी थी जिसके पब्लिक शेयर्स निकाले गये.. और हमारी अपनी ईस्ट इंडिया कम्पनी. .जिसने हमारे ऊपर सौ साल तक हुकूमत की.. बरतानिया की रानी को ये कार्यभार सौंपने के पहले.. १६०० में स्थापित इस कम्पनी के व्यापारिक जीवन में एक क्रांतिकारी मोड़ तब आ गया जब कि १७५७ में कम्पनी के एक मुलाजिम रॉबर्ट क्लाइव ने एक निजी सेना, दलाली, घूसखोरी और धोखाधड़ी के ज़रिये बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को उसकी गद्दी से अपदस्थ कर दिया..(बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो भारतीय लोगों के पतनशील व्यवहार को देख के बाप दादाओं के बातों को याद करके उनके यानी के अंग्रेज़ो के ज़माने को ही बेहतर घोषित कर डालते हैं.. इस मौके पर मैं उन लोगों को ये याद दिलाने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि अंग्रेज़ों के इस साम्राज्य की नींव घूसखोरी दलाली और धोखाधड़ी के बुनियाद पर ही रखी गई थी) ..कम्पनी की सबसे कामयाब बिज़नेस डील के रूप के फल स्वरूप लन्डन में कम्पनी के शेयरों के दाम आसमान छूने लगे.. और फिर शुरु हुआ लूट का एक लम्बा सिलसिला.. जिसमें विशेष उल्लेल्खनीय है १७७० का बंगाल का दुर्भिक्ष.. जिस कम्पनी निर्मित अकाल में आधी आबादी का सफ़ाया हो गया.. मगर जंगल के जानवर बचे रहे.. उसकी इन्ही सफलताओं के बदौलत कम्पनी ने अगले सौ साल और रानी ने उसके बाद के नब्बे साल हिन्दुस्तान पर राज किया.. और यहाँ से होने वाली आय के ज़रिये अपने साम्राज्य को इतना फैलाया कि उनके राज में सूरज कभी डूबता ही नहीं था.. नेहरू जी ने एक बोध की बात लिखी अपनी पुस्तक भारत की खोज में.. ग़ौर तलब है ये बात कि अंग्रेज़ी भाषा में शामिल हो गये हिन्दुस्तानी शब्दों में एक शब्द लूट है.. .
कम्पनी की इस कहानी से एक बात तो ज़ाहिर है कि मल्टीनेशनल कम्पनी, कॉरपोरेशन्स, या मोटे तौर पर बाज़ार.. सिर्फ़ धंधा ही नहीं करना चाहते वे शक्ति का केन्द्र भी बनना चाहते हैं.. आज़ादी के बाद हम नेहरू युग में कम्पनी और बाज़ार से थोड़ा बच बच कर चलते रहे मगर अब वो राज की स्मृतियां मद्धिम पड़ गई हैं.. और अपना देशी पूँजी पति भी इतना तगड़ा हो गया है कि अब इस तरह के विज्ञापन देखते हुये आप हैरान नहीं होंगे कि एक देशी व्यापारी रजनी गंधा खाते हुये ईस्ट इंडिया कम्पनी को खरीदने की बात करे .. २०० साल तक उन्होने राज किया अब हमारी बारी है.. आज हमारे देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि लोग सब कुछ भूल कर इसी बात पर नाज़ करें कि टाटा ने कोरस को खरीद लिया.. जैसे कि टाटा के भारतीय मूल का होने से कोई बहुत क्रांतिकारी अन्तर आ जाने वाला है.. कोई अन्तर नहीं आयेगा.. क्योंकि कॉरपोरेशन का चरित्र ही ऐसा है.. क्या है कॉरपोरेशन.. एक ऐसी वैधिक हस्ती है..जिसे व्यक्ति के रूप में क़ानून मान्यता देता है.. जो ऐसे वैधिक हस्तियों के द्वारा मिल कर बनी होती है जो कुदरतन व्यक्ति हैं.. इनको क़ानून से जो अधिकार हासिल हैं वो इस प्रकार हैं..
१]ये मुकदमा कर सकते हैं और इन पर मुकदमा किया जा सकता है..
२] ये अपने सदस्यों से स्वतंत्र.. सम्पत्ति इकठ्ठा कर स्कते हैं..
३]ये कर्मचारी, वकील और प्रतिनिधि आदि को काम पर रख सकते हैं..
४]ये अनुबंध आदि पर अपनी मोहर लगा के हस्ताक्षर भी कर सकते हैं..
५]और अपने मामलों में खुद मुख्तार होने के लिये नियम क़ानून खुद तय कर सकते हैं..
इनके तीन और वैधिक गुण हैं.. १] शेयर्स को स्थानांतरित किया जा सकता है..२]कोई आये जाये उस से कॉर्पोरेशन के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता.. कॉरपोरेशन शाश्वत रूप से जीवित रह सकता है.. ३]और कॉरपोरेशन के पापो से उसके सदस्य गण यानी कि शेयर होल्डर्स मुक्त रहेंगे.. इन अधिकारों के अलावा कुछ अधिकार अभी ऐसे हैं जो कॉरपोरेशन्स के पास नहीं है जैसे धर्म के पालन का अधिकार.. जो सिर्फ़ उन व्यक्तियों के पास है जो कुदरतन व्यक्ति हैं..और जिनके पास आस्था, विश्वास और अध्यात्म की क्षमतायें हैं..अब इस कॉरपोरेट के व्यक्ति को समझने के लिये शुरुआत करते हैं इसके सामजिक व्यवहार से.. कोई भी व्यक्ति समाज का हिस्सा होता है.. जिन लोगों के साथ उठता बैठता है उनसे एक रिश्ता क़ायम करता है जब से आदमी ने अपने आपको समझा है तब से ये एक बात अचल है.. आदमी तो छोड़िये..आदमी कुत्ते बिल्लियों पेड़ पौधों खेत मिट्टी तक से रिश्ता बना लेता है.. लेकिन कॉरपोरेट नाम का ये व्यक्ति मानवीय सम्बन्ध बनाने में क़तई नाकामयाब है.. वे लोग जो इस व्यक्ति के सबसे करीबी सम्पर्क में आते हैं जैसे कि मज़दूर आदि.. उनके प्रति इसका रवैया बेहद मशीनी होता है.. उनको रखना निकालना उनकी यूनियन तोड़ना , दुर्घटना आदि में क़तई उनके प्रति कोई सम्वेदना ना रखना और बेहद बेरहमी से पेश आना .. दुनिया भर में स्वीकृत ये इसका ऐसा आम व्यवहार है कि अब कोई इसके बारे में चर्चा भी नहीं करना चाहता..
किसी भी व्यक्ति के सामाजिक दायरे में आस पास के लोगों के बाद वे लोग आते हैं जिनको वो जानता पहचानता नहीं मगर उनके मानव मात्र होने से उनके प्रति सम्वेदना रखता है.. किसी दूसरे मनुष्य को दुख विपदा में देख कर दुखी हो जाना सामान्य मानवीय गुण है.. पर कॉरपोरेट नाम का यह शख्स ना सिर्फ़ ऐसे खतरनाक हथियार आदि माल बनाता बेचता है जो आदमी के जीवन के लिये खतरा हैं बल्कि उनके लिये सचेत रूप से एक बाज़ार तैयार करता है.. विनाशकारी प्रभाव वाले पेट्रोलियम पदार्थों और कृत्रिम खादों कीटनाशकों आदि के उत्पादन को जारी रखता है बावजूद इसके कि ये तमाम स्रोतों से सिद्ध किया जा चुका है वे पदार्थ एक बड़े स्तर पर लोगों के जान और स्वास्थ्य की हानि कर रहे हैं.. और आने वाली नस्लों में भी उस नुकसान के लक्षण मिलते रहेंगे.. वातावरण में विषैला कचरा फेंकता रहता है.. जबकि उसके खिलाफ़ नियम हैं क़ानून हैं.. उन सब की अवहेलना करके भी यह शख्स अपने निजी लाभ के लिये मानवता का और दूसरे मनुष्यों की हानि में अनवरत संलग्न रहता है.. मानव इतिहास में उदाहरण हैं कि क्रूर से क्रूर व्यक्ति के अन्दर प्रायश्चित का भाव जागता है.. अशोक जैसे योद्धा का भी हृदय परिवर्तन होता है.. महामानव की संकल्पना करने वाले नीत्शे जैसे दार्शनिक के जीवन में भी एक ऐसा पल आता है जब उसे एक घोड़े तक को चाबुक मारे जाने से भी पीड़ा होती है.. लेकिन इस कॉरपोरेट नामक व्यक्ति के भीतर ऐसी किसी मानवीय सम्भावना का पता अभी तक नहीं चला है..
जब मनुष्यों के प्रति इस का ये रवैया है तो आपको सोच ही लेना चाहिये कि जानवरों के प्रति ये किस दृष्टि से देखता होगा.. अमेरिका के व्यावसायिक तबेलों में गायों को गाय नहीं प्रॉड्क्शन युनिट कहा जाता है.. दूध की मात्रा को बढ़ाने के लिये उनको ऐसे इन्जेक्शन्स दिये जाते हैं जिनकी वज़ह से गायों में तरह के तरह के रोग और पीड़ायें जन्म लेती हैं.. और गायें तो बोल भी नहीं सकती युनियन बनाने और प्रतिरोध करना तो दूर की बात है.. और पृथ्वी जिसे सनातन धर्मी गाय का ही एक दूसरा रूप मानते हैं..और जो सहनशीलता की अति मानी गई है.. ये शख्स उसके इस गुण का भरपूर शोषण कर रहा है.. नदियां का इस्तेमाल नालों की तरह से.. विषैले बाई प्रॉडक्ट्स को बहाने के लिये .. हवा का इस्तेमाल गैसों का रिसाव करने के लिये.. आशा है हम लोग यूनियन कार्बाईड अभी भूले नहीं होंगे.. .. पहाड़ भी उसके शोषक स्रामाज्य का एक हिस्सा हैं.. खनिज पदार्थ के उत्खनन के लिये वो लगातार उनकी जड़ काट रहा है.. जंगलों की अंधाधुंध कटाई भी हो ही रही है.. आज आपको साफ़ पानी बेचा जा रहा है कल को साफ़ हवा और साफ़ वातावरण भी बेचा जायेगा.. किसी चीज़ के बारे में ये शख्स तब तक विचार नहीं करता जब तक कि उसमें से कोई लाभ ना लिया जा सके.. और थोड़े लाभ से संतुष्ट नहीं होता ये व्यक्ति.. इसके लोभ की सीमा नहीं है.. इसके पेट में आप कितना भी डाल दीजिये ये सदैव असंतुष्ट रहता है.. क्योंकि इसके जीवन का इसके अस्तित्व की एक ही शर्त है.. लाभ.. ये जो करता है लाभ के लिये करता है.. और लाभ का अर्थ इसके लिये सिर्फ़ मुद्रा में होता है.. और किसी रूप में नहीं.. मनुष्यों में अक्सर देखा जाता है कि वो तमाम मामूली चीज़ों के लिये बहुत सारे पैसों की बलि दे देते हैं.. इस शख्स में ऐसी कोई कमज़ोरी नहीं पाई जाती..
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिटिश कोलंबिया के क़ानून के प्रोफ़ेसर जोयल बेकन कहते हैं कि कॉरपोरेशन एक संस्थागत साइकोपैथ है.. उनके अनुसार अगर कॉरपोरेशन सचमुच कोई जीवित व्यक्ति होता तो उसके सारे व्यवहार एक असामाजिक तत्व और साइकोपैथ के होते.. अगर इसके मुख्य गुणों की सूची बनाई जाये तो वह कुछ इस तरह की दिखेगी..
१]दूसरों की भावनाओं और हितों के प्रति सम्पूर्ण बेरुखी२]दूसरे मनुष्यो के साथ लम्बे और दीर्घकालिक रिश्ते बनाने में पूर्ण असफलता
३]दूसरों के सुरक्षा के प्रति पूरी उपेक्षा और सिर्फ़ अपने हित की चिन्ता
४]किसी भी प्रकार के अपराध भाव को महसूस करने के एकदम परे
५]अपने लाभ के लिये बार बार झूठ बोलने और धोखा देने में महारत
६]क़ानून और सामाजिक नियमों का पालन करने में नितान्त अक्षम
ये सारे लक्षण एक मानसिक और सामाजिक रूप से बीमार साइको पैथ के ही है.. जिसे पहचान लिये जाने के बाद समाज उसे मनुष्यों के बीच स्वतंत्र रूप से घूमने फिरने तक की आज़ादी नहीं देता.. मगर मज़े की बात ये है कि ऊपर बताये गये लक्षण में से ज़्यादातर न सिर्फ़ हम जानते हैं बल्कि ये स्वीकार भी करते हैं कि समाज के प्रगति और विकास के लिये उसके पीछे पीछे चलने में ही मानवता की भलाई है.. और कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो ये भी मानते हैं कि ये रास्ता गड्ढे की तरफ़ जा रहा है फिर भी प्रतिरोध नहीं करते.. एक पिछले कुछ सालों मे हवा पानी और वातावरण जितना दूषित हो चुका है उतना शायद पृथ्वी के इतिहास में कभी नहीं हुआ होगा. फिर भी हमे में ज़्यादातर लोग एक सुनियोजित प्रचार के तहत ये सोचते हैं कि मनुष्य प्रगति की राह पर है.. क्या टीवी, एसी, लैपटॉप, सेलफ़ोन यही प्रगति के सच्चे मानक हैं,, या मन की शांति आपसी सौहार्द प्रेम सामाजिक शांति.. खुशहाली.. वातावरण की शुद्धता प्रकृति के साथ एक तादात्म्य इन मानकों का भी कोई अर्थ है..? पृथ्वी के खिलाफ़ ये सब अपराध हो रहे हैं क्यों कि पृथ्वी सहनशील है.. और वो चुप रहती है.. हम बोल सकते हैं पर वो हमें ना तो बोलने का समय देता है ना अवसर .. अपने मीडिया तंत्र के द्वारा उसने २४ घंटे हमारे विचारों पर छा जाने की एक मुहिम चला रखी है.. हम या तो उनकी नौकरी बजा रहे होते हैं.. या उनका माल खरीद रहे होते हैं.. या उनके माल को खरीदने के बारे में सोच रहे होते हैं.. या उनके माल को खरीदने के लिये आवश्यक मनोभावों को अपने अन्दर चला रहे होते हैं.. लोभ ईर्ष्या स्पृहा आदि.. मानव मस्तिष्क बड़ा विचित्र है और हर चीज़ के परे जा कर उसकी काट सोचने और कार्यान्वित करने में सक्षम हैं.. मगर फ़िलहाल मात खा रहा है.. एक ऐसे साइकोपैथ के हाथों जो ना सिर्फ़ समाज में छुट्टा घूम रहा है बल्कि उसके शीर्ष पर बैठ कर हमारे वर्तमान और भविष्य को तय कर रहा है..
प्रसिद्ध विचारक नोअम चोम्स्की का कहना है कि अगर कॉरपोरेशन की एक राजनैतिक स्वरूप की कल्पना की जाय तो उसके शीर्ष में बेहद तीखे केन्द्रीकरण.. नीचे के हर स्तर पर कठोर आदेश पालन.. आपसी लेन देन की ना के बराबर गुंज़ाइश..के फलस्वरूप जो केन्द्रीकृत सत्ता उभरती है वह इतिहास में तानाशाही फ़ासीवाद के रूप से जानी जाती है.. सोचने की बात सिर्फ़ इसका तानाशाही स्वरूप ही नहीं बल्कि वर्तमान राजनीति पर इसका मजबूत पकड़ है.. अमेरिका इस कॉरपोरेट का सबसे बड़ा राजनैतिक प्रतिनिधि है.. जो दुनिया भर में अपने आक़ा की आर्थिक सत्ता के लिये लगातार कहीं न कहीं युद्धरत है.. और ऐसे साइकोपैथ के पाले हुये गुंडे अमेरिका को क्यों ना गरियायें हम सब मिल के.. जब तक वो हमारा गला नहीं टीप देता..