पिछले दिनो न मन निर्मल रहा और न उसमें कोई आनन्द.. ये मुगा़ल्ता कभी नहीं रहा कि मैं सच्चे निर्मल आनन्द को प्राप्त हो गया हूँ.. उसकी कामना ज़रूर है हृदय में.. कि मैं खुद एक ऐसी शांति और आनन्द को प्राप्त हो जाऊँ.. जहाँ सांसारिक प्रलाप मुझे व्यर्थ विचलित न कर सकें.. और मेरी कामना यहीं नहीं रुकती वो मोक्ष भी चाहती है..
यहां पर मैं यह भी साफ़ करना चाहूँगा कि ऐसी शांति मानव कल्याण की विरोधी नहीं होती वरन मानव कल्याण का उद्देश्य ही उस शांतिमय करूणा के मूल में स्थित होता है.. ऐसा पढ़ा है महापुरुषों की वाणियों में.. ऐसी शांति को प्राप्त हो कर ही बुद्ध, मुह़म्मद और कबीर मानवीय शोषण के विरुद्ध एक विराट मोर्चा खोल सके.. शैतान से लड़ने के लिये आपका खुद शैतान होना न सिर्फ़ गै़रज़रूरी है.. बल्कि ग़लत भी है.. अन्याय और अशांति से लड़ने के लिये खुद अशांत हो जाना भी कोई बुद्धिमानी नहीं मूर्खता है..
पर पिछले दिनों मैं इस मूर्खता से ग्रस्त रहा.. ये मूर्खताएं मेरी पुरानी साथी हैं.. लोगों से उम्मीदें रखना.. और उनकी चारित्रिक सीमाओं को जानते-बूझते हुए भी भावुक किस्म की बेडि़यों को ढोने लगना.. ये सब इस मूर्खता का बाहरी संस्कार है.. पर मूल विषय वस्तु इसकी मेरे भीतर ही विराजती रही है.. और समय समय पर अलग अलग लोग इसका निमित्त बनते रहे हैं.. जिसके चलते मैं इस बार भी एक आम प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से ग्रस्त रहा.. और एक विशेष प्रकार की हिंसा का संचार भी अनुभव करता रहा अपने भीतर.. और शरीर के अलग अलग अंगों में इसका असर भी महसूस करता रहा..
यदि दुनिया आभासी नहीं होती तो शायद इस हिंसा का असर सामने वाले पर होता.. हिंसा मानसिक धरातल से निकल कर भौतिक धरातल पर आती.. कुछ चोट उसे आती थोड़ी मुझे आती.. पर आभासी दुनिया में वह मुझे मारे.. या मैं उसे.. हिंसा मेरे ही मानसिक संसार में होती है.. दोनों वार मेरे ही मन पर होते हैं.. जिस प्रकार की विचित्र बीमारियों का शिकार हम शहरी लोग होते हैं.. वह इसी प्रकार की हिंसा और क्लेशों का परिणाम नहीं है, कौन ठीक ठीक कह सकता है..
मैं स्वार्थी आदमी हूँ.. लम्बा जीवन जीना चाहता हूँ.. और रोग मुक्त रहना चाहता हूँ.. इसीलिये शांति तलाशता हूँ.. अपने लिये.. फिर दूसरों के लिये भी.. जिन मित्रों के प्रति मैं नकारात्मकता और हिंसा पालता रहा वे माफ़ करें मुझे.. मैं उन्हे माफ़ करता हूँ.. वे न भी माफ़ करें तो वे स्वतंत्र है मुझे और गालियां देने के लिये.. मुझ पर सीधे और छिपे.. और हमले करने के लिये.. मैं उन्हे सह कर शांत रहने का प्रयत्न करूँगा..
मैं इस दुष्चक्र से बाहर आना चाहता हूँ.. निर्मल आनन्द को प्राप्त होना चाहता हूँ.. लेकिन.. बहुत कठिन है डगर पनघट की..
मंगलवार, 29 मई 2007
शनिवार, 26 मई 2007
आइये करें 'अच्छी-अच्छी बातें'
"पंडिज्जी, आपको क्या हो रहा है, बिल्लू और गोलाइयों से दाल-भात में घुस जाते हैं। फिर घी का छौंक लगाकर कुछ बापू आसाराम की प्रवचनाईयों में घुस जाते हैं। प्लीज कुछ इंटरेस्टिंग सी घटिया बातें करें , अच्छी-अच्छी बातें तो हम श्रद्धा, आस्था चैनल पर सुन ही रहे हैं ना।"
'बस करुणा' पर आई बेनाम की इस टिप्पणी से मुझे लगा कि शायद मुझे अपनी बात को और सफ़ाई से कहने की ज़रूरत है.. और जवाब इतना लम्बा भी हो गया कि उसे अलग से एक प्रविष्टि के तौर पर छाप रहा हूँ..
मित्र बेनाम आप चाहते हैं कि मैं अच्छी-अच्छी बातों को ऐसे बहरुपियों के हवाले कर के छोड़ दूँ.. जो तरह तरह के भेस बना कर अपने भक्तों को महापुरुषों की झांकी दिखाते हैं.. और जिसके फलस्वरुप हमारे देश की आशु-आहत जनता कई रोज़ तक एक प्रदेश को हिलाये रखती है.. ऐसे ही लोग आश्रमों के नाम पर ज़मीन हड़पते हैं और फिर ऐसे घोटालों का समाचार भी दबवा देते हैं.. भक्ति योग के प्रवचन देते हैं, जगतगुरु कहलाते हैं और बलात्कार के आरोप में त्रिनिदाद में पकड़े जाते हैं.. ऐसी महापुरुषों के श्री मुख से अच्छी-अच्छी बातों को सुनने से अच्छा है.. हम आप ही उसकी आपस में चर्चा करें.. हमें पता है कि न आप महापुरुष है न मैं.. तो हम बात को उसके तत्व से तौलेंगे.. बोलने वाले के क़द से नहीं..
मेरा सुझाव है कि आप भी कुछ गोलाइयों जैसी घटिया बातों के साथ साथ कुछ अच्छी अच्छी बाते भी करें.. देश तो दलालों के हाथ जा ही चुका है.. संसद(सत्ता) में प्रवेश करने का रास्ता बन्दूक की नली से हो के जाता है.. चेयरमैन माओ की इस बात को आजकल सभी लोग मानते हैं.. धर्म का ठेका मवालियों के हाथ में है.. नैतिकता पाखण्डियों की रखैल है.. कलाकार सनसनी बेचकर बिक जाने वालों का दूसरा नाम है.. और आम आदमी आम खाने लायक भी नहीं रह गया है.. आप मुझसे क्या उम्मीद करते हैं.. मैं हमेशा अपना संतुलन बनाये रखूँ और एक ही सुर में बात करूँ? ..मैं आपको बरदाश्त करने की करुणा अपने भीतर जगाना चाहता हूँ.. आप मुझे सहने की करूणा उगाइये..
शायद 'बस करूणा' में मेरी बात साफ़ तौर पर आप तक पहुँची नहीं.. मौलाना रूमी कृत मसनवी में मौजूद एक क़िस्से को वारसी बन्धुओं ने अपनी 'अल्ला हू' नामक क़व्वाली के भीतर जगह दी है.. ये अनुवाद किस शायर ने अंजाम दिया है यह जानकारी मेरे पास नहीं है..आप क़िस्से का लुत्फ़ उठाइये..
एक चरवाहा किसी जंगल में था
या महेकामिल कोई बादल में था( पूरा चाँद)
यादे मौला में हमेशा मस्त था
आस्मां उसकी ज़मीं पर बस्त था ( बसता था)
याद करते करते थक जाता था जब
काँप उठता दर्द से बाज़याफ़्ता तब(फिर से याद कर)
सर उठा कर अपना सू ए आस्मां
अर्ज़ की मालिक खुदा ए दो जहां
तू मेरी कुटिया में क्यों आता नहीं
क्या मेरा जंगल तुझे भाता नहीं
आ उतर आ अर्श से घर में मेरे(आसमां से)
पाँव धो धो कर पियूँगा मैं तेरे
रात दिन झूला झुलाउँगा तेरा
सुबह उठ कर मुँह धुलाउँगा तेरा
भीख दर दर माँग कर मैं लाउँगा
मैं तुझे पहले खिला कर खाउँगा
तो कर रहा था वो यूँ ही शोरोफ़ुगां(दुहाई)
हज़रते मूसा भी आ निकले वहाँ
डाँट कर बोले अरे बकता है क्या
नूरे मतलफ़ को मुक़य्यद कर दिया( असीम ईश्वरीय सत्ता को शर्तों में क़ैद कर दिया)
किस क़दर कमबख्त तू नादान है
क्या खुदा तेरी तरह इंसान है
तू ज़ुरूर इस कुफ़्र का फल पायेगा
गै़रत ए हक़ से अभी जल जायेगा
कर चुके मूसा जब उसको दिलहज़ीन
वहीं आई हज़रते हक़ से वहई( आकाशवाणी)
क्या किया मूसा तूने ये क्या किया
कर दिया बंदे को मौला से जुदा
तुझको भेजा जोड़ने के वास्ते
तू नहीं था तोड़ने के वास्ते
अरे होश वालों का तरीक़ा और है
दिलजलों का और ही कुछ तौर है
करुणा का अभाव मूसा जैसे ईश्वरीय संदेश के वाहक को भी बहका सकता है.. हम आप तो क्या है..
कुछ लोग का करुण भाव अपने तक ही सीमित होता है..उनके बारे में क्या कहूँ.. कुछ की करुणा सिर्फ़ सधर्मियों यानी जिनसे उनकी वैचारिक एकता है.. उनके प्रति रहती है.. शेष का वो गला काट लेना चाहते हैं.. पर वो करुणा नहीं साम्प्रदायिकता है.. विधर्मियों के प्रति, जिनसे आपका वैचारिक वैषम्य है.. उनके प्रति करुणा ही सच्ची करुणा है.. उनके साथ एकता के सूत्र जोड़ पाना ही सच्चा धर्म..
शुक्रवार, 25 मई 2007
बस करुणा
कुछ मायने नहीं रखता कि आप ने कितनी किताबे पढ़ी हैं.. आप कितने प्रगतिशील/ रूढि़वादी/ क्रांतिकारी/ धर्म निरपेक्ष/ साम्प्रदायिक हिन्दू/ मुसलमान/ मनुवादी/ ब्राहमणवादी/ सहजवृत्तिवादी/ विवादी जो भी हैं.. अगर आप के हदय में करुणा नहीं है.. तो सब वृथा है..
अच्छे से अच्छा सिस्टम दमनकारी हो जाता है.. दुनिया का सबसे समता मूलक सबसे जनतांत्रिक विचार भी जनविरोधी बन जाता है..मनुष्य द्वारा मनुष्य के ही दमन का हथियार बन जाता है.. बना है और बनता रहेगा यदि मनुष्य मात्र के प्रति करूणा व्यक्ति के हृदय में ना हो.. और एक अकेली करूणा भर के होने से सबसे दमनकारी तंत्र भी हितकारी बन सकता है.. और अंगुलिमाल भी अरहंत बन सकता है..
सुन्दर भावों के बिना सुन्दर विचार कूड़ा है.. चाहे वो जिस किसी का भी हो.. इसीलिये मुझे बार बार यही लगता है कि आज ज़रूरत धर्म को उखाड़ फेंकने की नहीं सच्चे धर्म को जानने, सच्चे धर्म में वापस लौटने की है.. धर्म में.. सम्प्रदाय में नहीं.. एक ऐसा धर्म जो आप के भीतर करुणा का दीप जला सके..
अच्छे से अच्छा सिस्टम दमनकारी हो जाता है.. दुनिया का सबसे समता मूलक सबसे जनतांत्रिक विचार भी जनविरोधी बन जाता है..मनुष्य द्वारा मनुष्य के ही दमन का हथियार बन जाता है.. बना है और बनता रहेगा यदि मनुष्य मात्र के प्रति करूणा व्यक्ति के हृदय में ना हो.. और एक अकेली करूणा भर के होने से सबसे दमनकारी तंत्र भी हितकारी बन सकता है.. और अंगुलिमाल भी अरहंत बन सकता है..
सुन्दर भावों के बिना सुन्दर विचार कूड़ा है.. चाहे वो जिस किसी का भी हो.. इसीलिये मुझे बार बार यही लगता है कि आज ज़रूरत धर्म को उखाड़ फेंकने की नहीं सच्चे धर्म को जानने, सच्चे धर्म में वापस लौटने की है.. धर्म में.. सम्प्रदाय में नहीं.. एक ऐसा धर्म जो आप के भीतर करुणा का दीप जला सके..
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