मेरा अपना आकलन है कि हिन्दी की दुनिया में ऐसी बहुत सी बातें बहुत से विषय जो अंग्रेज़ी की दुनिया में इसी देश-काल में ‘पासे’ हो चले हैं, उनको लेकर हिन्दी का संसार बेहद संवेदनशील बना रहता है। जैसे उदाहरण के लिए मैं इस वीडियो का लिंक यहाँ दे ज़रूर रहा हूँ लेकिन शंकाओं से घिरकर.. पता नहीं लोग क्या कहेंगे..!
वीनी मायने कैसे कहूँ क्या.. आप समझ जाइये न.. वीनी के बारे में फ़्रायड महाराज का सिद्धान्त है कि स्त्रियाँ वीनी-ईर्ष्या से न केवल ग्रस्त होती है वरन संचालित भी होती हैं।
सोमवार, 11 फ़रवरी 2008
शनिवार, 9 फ़रवरी 2008
चला गया आखिरी गाँधीवादी
बाबा आम्टे नहीं रहे। और उनके साथ गाँधीवादी विचारधारा की शायद वह आखिरी शख्सियत नहीं रही, जिन्होने जीवन की गुणवत्ता को कभी भौतिक पैमानों से नहीं तौला।बाबा आम्टे गाँधी जी के अनुगामी थे और आज़ादी के आन्दोलन में गिरफ़्तार होने वाले नेताओं की तरफ़ से वकील की भूमिका भी उन्होने अदा की थी। पर जिस काम के लिए उन्हे हमेशा याद किया जाता रहेगा वह उनका आनन्दवन है।
वो कुष्ठ रोगी जो इस आश्रम के बाहर एक आम घृणा का शिकार होते हैं, बाबा आम्टे के इस आश्रम में बिना किसी दुत्कार और धिक्कार की नज़र की एक सम्मान का जीवन बिता सकते हैं। इस आश्रम का सारा कामकाज ये रोगी स्वयं सम्हालते हैं। आनन्दवन एक ऐसा आत्मनिर्भर गाँव है जिसकी कल्पना गाँधी जी ने अपने भारत के हर गाँव के लिए की थी पर उनके राजनैतिक उत्तराधिकारी पण्डित नेहरू ने उसे औद्यौगिक मन्दिरों की राह पर धकेल दिया।
बाबा आम्टे की तस्वीर को जब भी मैं देखता तो उनके कानों को देखता रह जाता; हाथी के जैसे बड़े-बड़े भारी और लम्बे थे उनके कान। पारम्परिक ज्ञान कहता है कि लम्बे और बड़े कान लम्बी उमर और ज्ञान का प्रतीक होते हैं। बाबा आम्टे इस बात को पूरी तरह से सत्यापित करते हैं।
बस यही कामना करता हूँ अपने छुद्र स्वार्थों के स्तर से ऊपर उठकर कभी उनकी तरह विराट पुरुष की संवेदना से प्रेरित होकर जीवन का संचालन कर सकूँ। बाबा को मेरा शत-शत प्रणाम।
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008
पूर्वग्रह की राजनीति
मेरी माँ और दूसरे शहरों में बैठे मित्र परेशान हैं कि मुम्बई में क्या हो रहा है? पहली बात तो यह कि यह पूरा मामला जितना बड़ा है उस से कई गुना बढ़ा-चढ़ा कर इसे पेश किया जा रहा है। और इसमें मीडिया की खबरखोरी का लोभ एक बड़ा कारण है। मगर ज़्यादा दुःखद इसमें राज्य सरकार की भूमिका है.. जो अराजक तत्वों को बेक़सूर लोगों को सताने दे रही हैं?
अब वो दिन नहीं रहे जब जनता नेता के पीछे चलती थी.. अब नेता जनता के पीछे चलता है। कोई भी बात कहने से पहले वो देख लेता है कि हवा का रुख क्या है। ऐसे में राजनीति का सबसे आसान रास्ता आम जन में व्याप्त पूर्वग्रहों की गली से होकर जाता है.. क्योंकि वहाँ असंतोष भी होता है और एक बना-बनाया दुश्मन भी।
अधिकाधिक पार्टी इस क़िस्म की राजनीति कर रही हैं.. अकेले मुम्बई ही नहीं, दुनिया के हर कोने में आप को इस तरह के पूर्वग्रह मिल जाएंगे.. जर्मनी में तुर्कों के खिलाफ़, फ़्रांस में नार्थ अफ़्रीकी मुस्लिम विस्थापितों के खिलाफ़, इंगलैण्ड में इण्डियन्स और पाकीज़ के खिलाफ़ और पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया में और खासकर अमरीका में, मुसलमानों के खिलाफ़ एक बनी बनाई सोच मौजूद होती है।
आदमी को जानने के पहले ही उसकी भाषा और चेहरे-मोहरे से उसके बारे में एक राय क़ायम कर ली जाती है। आम तौर पर इन पूर्वग्रह का एक भौतिक आधार भी होता है। मुस्लिमों के बारे में पूर्वग्रह की जड़ आतंकवाद से जुड़ा हुआ है मगर अन्य मामलों में यह विस्थापित मज़दूर के कम दामों में बिकने को तैयार हो जाने की वजह से स्थानीय मजदूर में पैदा हुए क्षोभ के चलते होता है। और भूमण्डलीकरण के इस दौर में इस तरह की राजनीति का भविष्य अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य पर निर्भर करेगा काफ़ी कुछ।
मुम्बई के इस मामले में विडम्बना की बात यह है कि यहाँ पर जिन विस्थापितों के खिलाफ़ मुहिम चलाया जा रहा है वो किसी दूसरे देश में नहीं अपने ही देश में नफ़रत का निशाना बन रहे हैं। मुम्बई में एक निम्न वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय मराठी के मन में यह क्षोभ है कि यूपी बिहार के मज़दूरों के रेट गिरा कर उनके रोज़गार के अवसरों में सेंध लगाते हैं। राज ठाकरे इसी सोच का राजनैतिक फ़ायदा उठाना चाहते हैं। इस तरह की राजनीति बेहद खतरनाक है और चिंता का विषय है।
और चिंता का विषय यह भी है कि एक के बाद एक हर राज्य में यह तस्वीर उभर कर आ रही है कि क़ानून लागू किया जाएगा या नहीं इसका फ़ैसला इस बात को ध्यान में रख कर किया जा रहा है कि बहुसंख्यक राय क्या है? अगर बहुसंख्यक राह यह कि मुसलमानों को पिटना चाहिये तो हत्यारों को गिरफ़्तार करने से बचती रहेगी पुलिस। अगर सिवान की जनता भारी वोटों से शहाबुद्दीन को जिताती है तो वे बीसियों क़त्ल और कई नॉन बेलेबल वारन्ट के बावजूद पूरे भारत को अपना अभयारण्य समझ सकते हैं और केन्द्रीय मंत्रियों के गले में हाथ डाल कर संसद में घूम सकते हैं ।
अगर बहुसंख्यक राय यह है कि आधी रात को शराब पी कर होटल से बाहर निकलने वाली औरत परोक्ष रूप से बलात्कार आमंत्रित कर रही है तो उस पर हमला करने वालों को पुलिस सहानुभूति की दृष्टि से देखेगी। मेरा ख्याल है कि वही मानसिकता विलासराव देशमुख को राज ठाकरे को गिरफ़्तार करने से रोके हुए है। वे अभी तौल रहे हैं कि आम राय कितनी राज ठाकरे के साथ है?
राज ठाकरे साहब अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते शिवसेना से अलग हो गए। शिवसेना की सीमाओं को समझते हुए उन्होने एक धर्म निरपेक्ष छवि बनाने की कोशिश में अपने झण्डे में एक हरी पट्टी भी डाली पर चुनाव में उनको दो-ढाई प्रतिशत वोट भी नहीं मिला। बजाय एक लम्बी राजनैतिक पारी के लिए धीरज पैदा करने के वे हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में अपने चाचा के पुराने हथकण्डों को दोहरा रहे हैं। ये हथकण्डे उस समय थोड़े चल भी गए थे अब अपने दुहराव में चलेंगे, इसमें मुझे शक़ है।
मैं मुम्बई में पन्द्रह साल से हूँ और मैंने मराठियों को बहुत सरल, शांतिप्रिय और अपने काम से काम रखने वाले समुदाय के रूप में जाना है। आम मराठी शिवसैनिक नहीं है। शिव सेना बनने के चालीस साल के इतिहास में शिवसेना को अभी तक सिर्फ़ एक बार ही राज्य में सरकार बनाने का मौका़ मिला है- १९९२-९३ के साम्प्रदायिक दंगो के बाद वाले चुनाव में.. वो भी भाजपा के साथ गठबन्धन बना कर ही।
टीवी क्लिप्स में ठेले का सामान गिराने वाले युवकों की चेष्टा में मुझे जज़बात की गर्मी नहीं एक सोची समझी ठण्डे दिमाग की कार्रवाई दिखी। पहले से तय कर के आए थे कि दो चार टैक्सी वालों को पीटेंगे और दो चार ठेले उलटा देंगे। ज़ाहिर है कि इसमें कोई ऐसी भावना नहीं है जो जुनून बन के कोई हंगामा बरपा कर सके। मेरी समझ में यह मामला अपनी राजनैतिक ज़मीन बनाने की या शिवसेना की राजनैतिक ज़मीन हथियाने की एक ऐसी चाल है.. जिसके जाल में मीडिया तो फँस गया पर मराठी माणूस फँसेगा या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा।
अब वो दिन नहीं रहे जब जनता नेता के पीछे चलती थी.. अब नेता जनता के पीछे चलता है। कोई भी बात कहने से पहले वो देख लेता है कि हवा का रुख क्या है। ऐसे में राजनीति का सबसे आसान रास्ता आम जन में व्याप्त पूर्वग्रहों की गली से होकर जाता है.. क्योंकि वहाँ असंतोष भी होता है और एक बना-बनाया दुश्मन भी।
अधिकाधिक पार्टी इस क़िस्म की राजनीति कर रही हैं.. अकेले मुम्बई ही नहीं, दुनिया के हर कोने में आप को इस तरह के पूर्वग्रह मिल जाएंगे.. जर्मनी में तुर्कों के खिलाफ़, फ़्रांस में नार्थ अफ़्रीकी मुस्लिम विस्थापितों के खिलाफ़, इंगलैण्ड में इण्डियन्स और पाकीज़ के खिलाफ़ और पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया में और खासकर अमरीका में, मुसलमानों के खिलाफ़ एक बनी बनाई सोच मौजूद होती है।
आदमी को जानने के पहले ही उसकी भाषा और चेहरे-मोहरे से उसके बारे में एक राय क़ायम कर ली जाती है। आम तौर पर इन पूर्वग्रह का एक भौतिक आधार भी होता है। मुस्लिमों के बारे में पूर्वग्रह की जड़ आतंकवाद से जुड़ा हुआ है मगर अन्य मामलों में यह विस्थापित मज़दूर के कम दामों में बिकने को तैयार हो जाने की वजह से स्थानीय मजदूर में पैदा हुए क्षोभ के चलते होता है। और भूमण्डलीकरण के इस दौर में इस तरह की राजनीति का भविष्य अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य पर निर्भर करेगा काफ़ी कुछ।
मुम्बई के इस मामले में विडम्बना की बात यह है कि यहाँ पर जिन विस्थापितों के खिलाफ़ मुहिम चलाया जा रहा है वो किसी दूसरे देश में नहीं अपने ही देश में नफ़रत का निशाना बन रहे हैं। मुम्बई में एक निम्न वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय मराठी के मन में यह क्षोभ है कि यूपी बिहार के मज़दूरों के रेट गिरा कर उनके रोज़गार के अवसरों में सेंध लगाते हैं। राज ठाकरे इसी सोच का राजनैतिक फ़ायदा उठाना चाहते हैं। इस तरह की राजनीति बेहद खतरनाक है और चिंता का विषय है।
और चिंता का विषय यह भी है कि एक के बाद एक हर राज्य में यह तस्वीर उभर कर आ रही है कि क़ानून लागू किया जाएगा या नहीं इसका फ़ैसला इस बात को ध्यान में रख कर किया जा रहा है कि बहुसंख्यक राय क्या है? अगर बहुसंख्यक राह यह कि मुसलमानों को पिटना चाहिये तो हत्यारों को गिरफ़्तार करने से बचती रहेगी पुलिस। अगर सिवान की जनता भारी वोटों से शहाबुद्दीन को जिताती है तो वे बीसियों क़त्ल और कई नॉन बेलेबल वारन्ट के बावजूद पूरे भारत को अपना अभयारण्य समझ सकते हैं और केन्द्रीय मंत्रियों के गले में हाथ डाल कर संसद में घूम सकते हैं ।
अगर बहुसंख्यक राय यह है कि आधी रात को शराब पी कर होटल से बाहर निकलने वाली औरत परोक्ष रूप से बलात्कार आमंत्रित कर रही है तो उस पर हमला करने वालों को पुलिस सहानुभूति की दृष्टि से देखेगी। मेरा ख्याल है कि वही मानसिकता विलासराव देशमुख को राज ठाकरे को गिरफ़्तार करने से रोके हुए है। वे अभी तौल रहे हैं कि आम राय कितनी राज ठाकरे के साथ है?
राज ठाकरे साहब अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते शिवसेना से अलग हो गए। शिवसेना की सीमाओं को समझते हुए उन्होने एक धर्म निरपेक्ष छवि बनाने की कोशिश में अपने झण्डे में एक हरी पट्टी भी डाली पर चुनाव में उनको दो-ढाई प्रतिशत वोट भी नहीं मिला। बजाय एक लम्बी राजनैतिक पारी के लिए धीरज पैदा करने के वे हड़बड़ी और जल्दबाज़ी में अपने चाचा के पुराने हथकण्डों को दोहरा रहे हैं। ये हथकण्डे उस समय थोड़े चल भी गए थे अब अपने दुहराव में चलेंगे, इसमें मुझे शक़ है।
मैं मुम्बई में पन्द्रह साल से हूँ और मैंने मराठियों को बहुत सरल, शांतिप्रिय और अपने काम से काम रखने वाले समुदाय के रूप में जाना है। आम मराठी शिवसैनिक नहीं है। शिव सेना बनने के चालीस साल के इतिहास में शिवसेना को अभी तक सिर्फ़ एक बार ही राज्य में सरकार बनाने का मौका़ मिला है- १९९२-९३ के साम्प्रदायिक दंगो के बाद वाले चुनाव में.. वो भी भाजपा के साथ गठबन्धन बना कर ही।
टीवी क्लिप्स में ठेले का सामान गिराने वाले युवकों की चेष्टा में मुझे जज़बात की गर्मी नहीं एक सोची समझी ठण्डे दिमाग की कार्रवाई दिखी। पहले से तय कर के आए थे कि दो चार टैक्सी वालों को पीटेंगे और दो चार ठेले उलटा देंगे। ज़ाहिर है कि इसमें कोई ऐसी भावना नहीं है जो जुनून बन के कोई हंगामा बरपा कर सके। मेरी समझ में यह मामला अपनी राजनैतिक ज़मीन बनाने की या शिवसेना की राजनैतिक ज़मीन हथियाने की एक ऐसी चाल है.. जिसके जाल में मीडिया तो फँस गया पर मराठी माणूस फँसेगा या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा।
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