चलायमान हो जाता है सारा आस-पास, एक स्पंदन में धड़कने लगता है, जैसे जो गोशे चुपचाप अनजाने भाव में सिमटे-लिपटे पड़े थे अचानक एक परिचय की बयार में फड़कने लगे हों। खेलते हुए ये सारी भौतिक इकाईयाँ भी जैसे हमारे साथ एक खेल में शामिल हो जातीं हैं। जब इस खेल भाव से मैं उनके सम्पर्क में आता हूँ तो न तो बहुत गम्भीर होता हूँ न बहुत आह्लादित, न उनसे कुछ लेना चाह रहा होता हूँ और न कुछ देना। किसी मक़्सद किसी मंशा से उन भौतिक इकाईयों के सम्पर्क में नहीं आता; अपनी मौज में उनके क़रीब आता-जाता हूँ। जो आम तौर पर एक गेंद की शक्ल में यहाँ से वहाँ उछल-कूद कर रही होती है।ये आम अनुभव है, सभी को होता है बचपन में और मेरे जिसे कुछ लोग जो बचपन में मनन के मारे जम के खेलने से रह गए, उन को अब भी होता है- खेलने के बचे हुए घण्टे पूरे करते हुए। इस सिलसिले के दौरान हम आस-पास के सभी पेड़, पत्थर, झाड़ी, दीवार, नाली, स्कूटर, साइकिल सभी के सम्पर्क में आते हैं।
मेरी ये बात उनको भी हवाई लग सकती है जिनके जीवन का मक़सद कुर्सी-बिस्तर और मकान-गाड़ी ही है। लेकिन जिन लोगों ने बचपन में अपनी न जाने कितनी गेंदे इस तरह से गँवाई हैं, वे मेरी बात समझेंगे। मैं तो आज तक गँवा रहा हूँ.. एक तो कल शाम को ही लील ली गई नाली द्वारा। जिस से खीज कर यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा हुई। और पोस्ट लिखते-लिखते ये समझ आई कि असल में क्या होती है लीला!