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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

दिल्ली में देखें सरपत

अक्सर दोस्तों की शिकायत रहती है किस तरह से मेरी लघु फ़िल्म 'सरपत' देखना मुमकिन हो.. सत्ताइस फ़रवरी को नई दिल्ली के इन्डिया इन्टरनेशनल सेन्टर में दिन के डेढ़ बजे कोई भी टहलते हुए जा कर सरपत देख सकता है। यह प्रदर्शन मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन के द्वारा आयोजित फ़िल्म फ़ेस्टिवल 'पर्सिस्टेन्स रेज़िसटेन्स के तहत हो रहा है। देश-दुनिया की चिन्ताओं से दो-चार होती और तमाम फ़िल्में भी इस फ़ेस्टिवल में दिखाईं जा रही है। फ़िल्म प्रेमी ज़रूर जायें और आनन्द लें।

पूरा कार्यक्रम इस पते पर देखें!

रविवार, 6 सितंबर 2009

मैजिक लैन्टर्न में सरपत

मेरी छोटी सी फ़िल्म को कोई मुम्बईया डिस्ट्रीब्यूटर किसी थियेटर, सिनेमा हॉल में तो रिलीज़ करने से रहा। अधिक से अधिक उसकी कि़स्मत छोटे-मोटे समूहों में प्रदर्शन की है- चाहे वे मंच किसी फ़िल्मोत्सव के हों या अन्य किसी संगठन के।

पिछले सालों में इस देश में डाक्यूमेन्टरी वितरित करने के लिए एक संस्था का विकास हुआ है जिसका नाम है अन्डर कन्स्ट्रक्शन जो मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन के तहत यह कार्य सम्पादित कर रही है। भारत के लगभग सभी स्वतंत्र डाक्यूमेन्टरी फ़िल्म मेकर्स की फ़िल्में अन्डर कन्सट्रक्शन ही वितरित कर रहे हैं, जिनमें मधुश्री दत्ता, पारोमिता वोहरा, अमर कँवर, पंकज बुटालिया, रीना मोहन, संजय काक, सुप्रियो सेन, अरुण खोपकर ओर्घ्यो बोसु, राजुला शाह जैसे नाम शामिल हैं। और विदेशों के भी तमाम ख्यातिलब्ध फ़िल्ममेकर्स की फ़िल्में उनके अधिकार में हैं।

अच्छी बात ये हुई है कि पहली बार उन्होने एक शॉर्ट फ़िक्शन का वितरण अपने हाथ में लिया है – मेरी फ़िल्म सरपत का।

वे सभी दोस्त जो मेरी फ़िल्म देखना चाहते हैं मगर मैं अभी तक उन तक पहुँचने में असमर्थ रहा हूँ, अब मैजिक लैन्टर्न के माध्यम से वे मेरी फ़िल्म की प्रति हासिल कर सकते हैं। यह सौदा एक आर्थिक प्रतिदान के बदले होगा। यूँ तो यह आर्थिक विनिमय मेरी तबियत के बहुत माकूल नहीं है - मैं अभी तक अपनी फ़िल्म की प्रतियाँ दोस्तो- परिचितों को मुफ़्त ही बाँटता आया हूँ- मगर एक फ़िल्ममेकर के अस्तित्व के लिए यह आदत बेजा है। उम्मीद है मित्रगण इस योगदान को लेकर एक अनुकूल राय रखेंगे क्योंकि इस धन राशि का एक हिस्सा मुझ तक आएगा और जो मुझे आगे इस तरह के स्वतंत्र काम करने के लिए हिम्मत बढ़ाएगा।

फ़िल्म मँगाने के लिए इस पते पर लिखें –

मैजिक लैन्टर्न फ़ाउन्डेशन
जे १८८१, चित्तरंजन पार्क, नई दिल्ली – ११००१९
फोन: +९१ ११ ४१६०५२३९, २६२७३२४४
ईमेल: underconstruction@magiclanternfoundation.org / magiclantern.foundation@gmail.com / magiclf@vsnl.com
वेब पेज: http://www.magiclanternfoundation.org

मूल्य:
भारत


व्यक्तिगत
वी सी डी: २५० रुपये
डी वी डी: ४०० रुपये
संस्थागत:
डी वी डी: ७०० रुपये
(४% वैट व डाक शुल्क अतिरिक्त)

अन्तर्राष्ट्रीय

व्यक्तिगत:
डी वी डी: २० य़ूएस डॉलर
संस्थागत:
डी वी डी: ३२० यू एस डॉलर
(डाक शुल्क अतिरिक्त)


मुम्बई के मित्रो के लिए एक अन्य सूचना यह भी है कि ९ सितम्बर, बुधवार को सरपत, कमला रहेजा इन्स्टीट्यूट ऑफ़ आर्कीटेक्चर, जुहु में दिखाई जा रही है। सुबह पौने ग्यारह बजे। यह संस्थान अपने विद्यार्थियों के लाभार्थ हर बुधवार को एनकाउन्टर नाम से एक लेक्चर सीरीज़ चलाते हैं उसी के तहत इस फ़िल्म का भी आयोजन है। फ़िल्म के बाद कुछ वार्तालाप की भी गुंज़ाईश होगी। जो मित्र आना चाहें स्वागत है। फ़िल्म की अवधि है अठारह मिनट।

गुरुवार, 14 मई 2009

एफ़ टी आई आई में सरपत

पिछले हफ़्ते मेरी लघु फ़िल्म सरपत का फ़िल्म एण्ड टेलेविज़न इन्स्टीट्यूट में प्रदर्शन हुआ। भाई कमल स्वरूप दूसरे वर्ष के छात्रों के लिए एक वर्कशॉप का संयोजन कर रहे थे, उसी के एक हिस्से के बतौर सरपत भी छात्रों को दिखाई गई।

अभी तक सरपत दोस्तों-यारों को ही दिखाई गई थी। फ़िल्म का पहला सार्वजनिक मंच एफ़ टी आई आई जैसा प्रतिष्ठित संस्थान बना, यह मेरे लिए गर्व की बात है। दर्शकों की संख्या कोई बहुत बड़ी नहीं थी मगर फिर भी अनुभव सुखद था।




















फ़िल्म के बाद छात्रों से कुछ परिचर्चा भी हुई जिसमें उनकी तरफ़ से कुछ सार्थक प्रश्न आए और मैंने उनका सन्तोषजनक समाधान किया। एक चीज़ मेरे लिए ज़रूर सीखने का सबब बनी – मेरा परिचय। हमेशा से ही मैं अपने प्रति कुछ हिचिकिचाया, शर्माया रहता आया हूँ। यह दिक़्क़त मुझे वहाँ भी पेश आई।

मुझे हमेशा लगता आया है कि मैंने जीवन में कुछ भी बतलाने योग्य तो नहीं किया अब तक। इस फ़िल्म को बनाने के बाद से वह एहसास कुछ जाता रहा है। और इसलिए अब सोचा है कि इस शर्मिन्दगी से छुटकारा पा कर इसे अलविदा कहा जाय। क्योंकि सार्वजनिक जीवन में लोग आप के बारे में सहज रूप से उत्सुक होते हैं और उस का सरल समाधान करना आप की ज़िम्मेदारी है उसमें शर्मिन्दगी की बाधा नहीं होनी चाहिये।

आजकल तमाम फ़िल्म-उत्सवों में सरपत को भेजने की क़वायद भी चल रही है। वे भी एक डाइरेक्टर्ज़ बायग्राफ़ी की तलब करते हैं- लगभग १०० शब्दों में। यह एक अच्छी कसरत है अगर कोई करना चाहे- अपने जीवन को सौ शब्दों में समेटना। वैसे मेरे जैसे व्यक्ति के लिए कुछ मुश्किल नहीं था जिसे लगता रहा हो कि जीवन में कुछ नहीं किया – सिवाय इस फ़िल्म के।

वैसे तो किसी भी चीज़ के बनने में तमाम चीज़ों का योगदान होता है। कुछ ऐसी जिनके प्रति व्यक्ति सजग होता है और तमाम ऐसी जो अनजाने ही मनुष्य को प्रभावित करती चलती हैं। मेरी इस रचना यात्रा में भी अनेकानेक चीज़ों की भूमिका रही है, अनजानी चीज़ों की तो बात कैसे कहूँ, पर जानी हुई चीज़ों में इस ब्लॉग की भूमिका प्रमुख है।

इस ब्लॉग पर लिखते हुए मैंने अपने सरोकारों को पहचाना, समझा, विकसित किया और अपनी अभिव्यक्ति को निखारा है। अकेले बैठे हुए सोचने और ब्लॉग पर लिखने में बहुत बड़ा अन्तर हो जाता है- पाठक का।

पाठक के अस्तित्व में आते ही फिर आप जो लिखते हैं – अपने मन की ही लिखते हैं – मगर पाठक को केन्द्र में रखकर लिखते हैं। वह आप के भीतर एक उद्देश्य की रचना करता है और एक ऊर्जा का संचार करता है। अपनी पुरातन परम्परा के अनुसार पाठक भी एक देवता हो सकता है- जो आप के भीतर एक सकारात्मक परिवर्तन कराने में सक्षम है।

अपने इस नन्हे से क़दम को उठा पाने में सफल होने के लिए मैं आप सब की भूमिका का सत्कार करता हूँ और आप का धन्यवाद करता हूँ।


* तस्वीर में संस्थान के प्राध्यापक व मेरे मित्र अजय रैना सूचना पट्ट पर लिखते हुए।

सोमवार, 9 मार्च 2009

सरपत... तलवार से तेज़ घास

पिछले कुछ माह से जिस लघु फ़िल्म के निर्माण में व्यस्त था, आखिरकार वह सम्पन्न हुई। फ़िल्म की पटकथा मैंने पिछले बरस मई में ही लिख ली थी मगर शूटिंग दिसम्बर में मुमकिन हुई। तमाम दोस्तों और शुभचिन्तकों ने उदार मन से इस फ़िल्म के निर्माण में सहयोग किया, तब जा कर ये लघु फ़िल्म तैयार हो सकी। जनवरी और फ़रवरी माह फ़िल्म के पोस्ट-प्रोडक्शन में गए।
अब यह फ़िल्म एक डी वी डी की शक़ल में एक स्वतंत्र अस्तित्व अख्तियार कर चुकी है। इरादा रखता हूँ कि अधिक से अधिक मंचो पर इस फ़िल्म का प्रदर्शन कर सकूँ।

दस से पन्द्रह मार्च तक मैं दिल्ली में हूँ; दिल्ली के मित्र अगर मेरे इस लघु प्रयास को अपना समय देंगे तो मुझे खुशी होगी।
फ़िल्म की अवधि है लगभग अठारह मिनट। कैमरा किया है सुधीर पलसाने ने और मुख्य कलाकार हैं प्रशान्त नारायनन, रचना शाह और गरिमा श्रीवास्तव।
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