..अपनी जवानी में मैं कभी खुश नहीं रहा.. हमेशा लड़कपन की लतों और आदतों में फँसकर बरबाद रहा.. उमर बढ़ने पर मुझे अपनी गलतियों का एहसास हुआ और दिखने लगा कि मेरा क्या अंत होगा अगर मैंने अपने आप को नहीं सुधारा.. तो मैंने दुनिया से अपने को काट लिया और सोचने लगा कि आदमी के शरीर पर उमर चढ़ने के साथ बेस्वाद क्यों होती जाती है ज़िन्दगी...
क्या आप बता सकते हैं कि इतना सब सोचने के बाद मुझे क्या पता चला? ..यही कि ‘हाँ’ से बेहतर जवाब ‘नहीं’ है..
उस वक्त जब मैं इस संजीदा सवालों से जूझ रहा था तो मैंने अपने सारे पाप निकाल कर मेज़ पर रख दिये..अपने पापों को रखने के लिए मुझे एक काफ़ी बड़ी मेज़ की ज़रूरत पड़ी थी.. मैंने उन सब को ग़ौर से जाँचा, उन्हे तौला, ऊपर नीचे सब कोनों से देखा. फिर अपने आप से पूछा कि कैसे मैंने उन पापों को किया.. मैं कहाँ था, किसके साथ था, जब मैं उन्हे कर रहा था..
मैंने देखा कि जो भी हम करते हैं वो अन्दर या बाहर की किसी आवाज़ के उकसावे पर होता है.. कभी कभी ये आवाज़ अच्छी भी होती हैं मगर ज़्यादातर बुरी, बिल्कुल बुरी.. पाप की आवाज़े होती हैं.. आप समझ रहे हैं न?
अच्छी और बुरी आवाज़ों का अनुपात मेरे ख्याल से.. तीन बुरी पर एक अच्छी.. नहीं और भी कम.. छै बुरी पर एक अच्छी.. और इसीलिए मैंने हर आवाज़ पर ‘हाँ’ कहने के बजाय ‘नहीं’ कहना बेहतर समझा.. मुश्किल था.. कलेजा चाहिये था.. पर किसी तरह कर लिया मैंने.. अब हर सवाल के जवाब में मेरे मुँह से ‘नहीं’ ही निकलता है.. ‘हाँ’ बोले कई साल हो गए..
-फ़्लैन ओ'ब्रायन की किताब थर्ड पुलिसमैन पर आधारित एक टुकड़ा-
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बुधवार, 12 दिसंबर 2007
मंगलवार, 11 दिसंबर 2007
निरन्तरता एक भ्रांति है..
स्वामी जी ने अनेको अद्भुत बाते कही हैं मगर सफ़र को नज़र का धोखा कहने की जो चुनौती उन्होने ली है वह सबसे शानदार है..
आदमी के जीवन को स्वामी जी ने बेहद नन्हे-नन्हे ठहरे हुए अनुभवों के एक सिलसिले के बतौर परिभाषित किया है. बताया जाता है कि इस खयाल पर पहुँचने के पहले वे एक पुरानी सिनेमेटोग्राफ़ी रील का मुआइना कर रहे थे. इस प्रस्थान बिंदु से वे जीवन में किसी भी तरह के निरन्तरता या प्रगति की सच्चाई को नकारते हैं. वे ये मानने से इंकार करते हैं कि समय वैसे ही चलता है जैसे कि आम राय है.. और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा में या आम जीवन में भी जो प्रगति या निरन्तरता का रोज़मर्रा का अनुभव होता है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक भ्रम है और कुछ नहीं..
अगर कोई व्यक्ति किसी एक बिन्दु ‘क’ पर विश्राम में है और वह किसी दूसरे बिन्दु ‘ख’ पर जा कर विश्राम में होना चाहता है तो ऐसा करने का एक ही तरीका है.. क और ख के बीच के अनगिनत स्थानों पर अनगिनत अन्तरालों पर विश्राम करते हुए ही वह ऐसा कर सकता है..
निरन्तरता के धोखे की जड़ वह मानव मस्तिष्क की अक्षमता में मानते हैं..जो इन अनगिनत विश्रामों के सत्य को देख नहीं पाता.. और उन सबको संगठित रूप में गति का नाम दे देता है.. गति नज़र का एक धोखा है.. और यह बात किसी भी फोटो से सिद्ध की जा सकती है..
-फ़्लैन ओ'ब्रायन की किताब थर्ड पुलिसमैन का एक टुकड़ा-
आदमी के जीवन को स्वामी जी ने बेहद नन्हे-नन्हे ठहरे हुए अनुभवों के एक सिलसिले के बतौर परिभाषित किया है. बताया जाता है कि इस खयाल पर पहुँचने के पहले वे एक पुरानी सिनेमेटोग्राफ़ी रील का मुआइना कर रहे थे. इस प्रस्थान बिंदु से वे जीवन में किसी भी तरह के निरन्तरता या प्रगति की सच्चाई को नकारते हैं. वे ये मानने से इंकार करते हैं कि समय वैसे ही चलता है जैसे कि आम राय है.. और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा में या आम जीवन में भी जो प्रगति या निरन्तरता का रोज़मर्रा का अनुभव होता है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक भ्रम है और कुछ नहीं..
अगर कोई व्यक्ति किसी एक बिन्दु ‘क’ पर विश्राम में है और वह किसी दूसरे बिन्दु ‘ख’ पर जा कर विश्राम में होना चाहता है तो ऐसा करने का एक ही तरीका है.. क और ख के बीच के अनगिनत स्थानों पर अनगिनत अन्तरालों पर विश्राम करते हुए ही वह ऐसा कर सकता है..
निरन्तरता के धोखे की जड़ वह मानव मस्तिष्क की अक्षमता में मानते हैं..जो इन अनगिनत विश्रामों के सत्य को देख नहीं पाता.. और उन सबको संगठित रूप में गति का नाम दे देता है.. गति नज़र का एक धोखा है.. और यह बात किसी भी फोटो से सिद्ध की जा सकती है..
-फ़्लैन ओ'ब्रायन की किताब थर्ड पुलिसमैन का एक टुकड़ा-
शनिवार, 3 नवंबर 2007
विभ्रम का अनोखा संसार
आइरिश लेखक ब्रायन ओ'नोलन की फ़्लैन ओ’ब्रायन छद्म नाम से लिखी पुस्तक दि थर्ड पुलिसमैन एक ऐसे फँसे हुए आदमी की कहानी है जिसकी जीवन की साध तो अपने पूज्य दार्शनिक पर किए गए शोधकार्य को प्रकाशित कराना है मगर हालात ऐसे बनते हैं कि वह इस काम को अंजाम देने के लिए पैसा जुटाने की जुगत में अपने गाँव के एक बूढ़े की हत्या में सहभागी हो जाता है। और जब लूट के माल को हासिल करने का वक़्त आता है तो एक अजीब सी दूसरी दुनिया में फ़िसल जाता है जो लगती तो सामान्य ही है मगर जहाँ सामान्य दुनिया के कोई नियम काम नहीं करते। जिसमें इमारतें दो-आयामी हैं, सूरज जहाँ से उगता है वहीं से वापस लौट कर डूब भी सकता है, आदमी के परमाणु साइकिल में जा सकते हैं और साइकिल के आदमी में। साइकिल और आदमी प्रेम और विवाह करने के लिए भाग भी सकते हैं।
उपन्यास में एक अनोखी तरलता है जिस पर आप सहजता से विश्वास भी कर सकते हैं और साथ-साथ चकित भी होते चलते हैं। मेरी नज़र में यह एक सफल सर्रियल संसार है बनाम उस असफल सर्रियल संसार के जिसे अनुराग नो स्मोकिंग में रचते पाए गए। खैर! उपन्यास अभी पढ़ ही रहा हूँ इसलिए किसी अन्तिम निष्कर्ष की घोषणा नहीं कर सकता।
एक और खास बात है उपन्यास में – फ़्लैन ओ’ब्रायन लगातार नायक के पूज्य दार्शनिक के विचारों की चर्चा करते चलते हैं जिनका नाम हैं डि सेल्बी। ये पूरी तरह से काल्पनिक चरित्र हैं मगर जिस तरह से इनका ज़िक्र आता है, आप को उनके अस्तित्व पर वैसे ही यक़ीन हो जाता है जैसे किसी भौतिकी की पाठ्य पुस्तक पढ़ते हुए आप को न्यूटन या हाइज़नबर्ग पर। आप उन महानुभावों से मिलते नहीं मगर पूरी किताब में उनका ज़िक्र यहाँ वहाँ और नीचे फ़ुटनोट्स में पढ़ते रहते हैं। उसी तरह डि सेल्बी जनाब के फ़ुटनोट्स भरे पड़े हैं। लेकिन वे दिमाग़ पच्ची नहीं करते, आप को हैरत से भरते हैं। जैसे कि यह विचार कि अगर दर्पणों के एक संजाल का समीचीनता से संरेखण किया जाय तो सतत परावर्तन के ज़रिये भूतकाल में देखा जा सकता है। या यह टुकड़ा..मनुष्य का अस्तित्व एक विभ्रम है जिसके भीतर दिन व रात का अनुषंगी विभ्रम है, जो श्याम वायु के अभिवर्धन से उत्पन्न वातावरण की एक अशौच स्थिति है। किसी भी सचेत व्यक्ति के लिए उचित है कि वह उस महाविभ्रम के मायावी स्वरूप के प्रति जाग्रत हो जाय जिसे मृत्यु कहते हैं।
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