शनिवार, 15 दिसंबर 2007

ब्लॉग हो ब्लॉगर मिलन न हो..

पिछले दिनों मैं ने दिलीप मंडल को अपने चिट्ठे पर तमन्ना ज़ाहिर करते हुआ पढ़ा कि हिन्दी में चिट्ठों की संख्या दस हज़ार या कुछ और हो जाय। बड़ी भली ख्वाहिश है.. वे फिर आगे लिखते हैं कि ब्लॉग मिलन बंद होना चाहिये।

"ये निहायत लिजलिजी बात है। शहरी जीवन में अकेलेपन और अपने निरर्थक होने के एहसास को तोड़ने के दूसरे तरीके निकाले जाएं। ब्लॉग एक वर्चुअल मीडियम है। इसमें रियल के घालमेल से कैसे घपले हो रहे हैं, वो हम देख रहे हैं। समान रुचि वाले ब्लॉगर्स नेट से बाहर रियल दुनिया में एक दूसरे के संपर्क में रहें तो किसी को एतराज क्यों होना चाहिए। लेकिन ब्लॉगर्स होना अपने आप में सहमति या समानता का कोई बिंदु नहीं है।"

इसी लेख में ठीक ऊपर आप ने कहा है कि 'ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो' और फिर यह बात? बात साफ़ नहीं हो रही कि आप सहमति के पक्षधर हैं या नहीं? और ब्लॉगर होना अपने आप में एक समानता का बिंदु क्यों नहीं है..? या आप की राजनीति कहती है कि मजदूर संगठित हों, किसान संगठित हों, दलित संगठित हो पर ब्लॉगर्स न हो? और ब्लॉगर्स के संगठित होने का जो मंच बन सकता है- ब्लॉगर मिलन- वो न हो?

और क्यों यह शहरी अकेलेपन को दूर करने का छ्द्म उपाय है? अपने ख्यालों की आज़ाद अभिव्यक्ति करते इतने सारे लोग एक दूसरे से मिलें, उन प्रश्नों पर चर्चा करें जिसके बारें में वे सोच रहें हैं और एक दूसरे को साक्षात मनुष्य के रूप में जानें .. इस में क्या ग़लत है? ब्लॉग तो उस साक्षात संवाद का विकल्प है जो वास्तविक जीवन में गायब हो रहा है। इसलिए हम जिसे पढ़ रहे होते हैं उसके बारे में जानने की स्वाभाविक इच्छा उमड़ती है.. जिसकी वजह से हम लोगों का प्रोफ़ाइल देखते-पढ़ते हैं.. और जिनका पढ़ा पसन्द करते हैं उनसे मिलने के लिए उत्सुक रहते है। यह मानवीय व्यवहार है.. ऐसी भावनाओं को छाँट देंगे तो मनुष्य शुष्क वैचारिक मशीन भर रह जाएगा।

मुझे लगता है दिलीप मानवीय व्यवहार के बारे में निर्णय सुनाने में हड़बड़ी कर रहे हैं.. । मेरी समझ में तो मनुष्य सामाजिक प्राणी है जहाँ रहेगा एक समाज बना कर एक दूसरे से जुड़ेगा.. वैचारिक तौर पर भावनात्मक तौर पर। ‘ये हो और ये न हो’ जैसी घोषणाएं कर के हम सिर्फ़ मनुष्य की सम्भावनाओं को सीमित करने कोशिश करते हैं। काँट-छाँट की इसी मानसिकता से सभी दमनकारी विचारधाराएं जन्म लेती हैं!

14 टिप्‍पणियां:

ghughutibasuti ने कहा…

ब्लॉगर मिलन में मिलना या न मिलना व्यक्ति की पसन्द पर निर्भर करता है । यदि कुछ लोग मिलना चाहें तो यह उनकी इच्छा है , न मिलना चाहें तो भी उनकी ही इच्छा है । मुझे नहीं लगता कि इसे बन्द करने की कोई आवश्यकता है। जब चिट्ठाकार बढ़ेंगे तो शायद केवल कुछ ही लोग एक दूसरे से मिलेंगे ।

घुघूती बासूती

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

अभय जी,
मेरे विचार से किसी से मिलना व्यक्ति की बड़ी बुनियादी भावना है. अब ये तो संयोग है कि बहुत सारे ब्लॉगर एक साथ मिल रहे हैं. जो मिल रहे हैं, अगर ब्लॉगर नहीं होते तो कुछ और होते. मिलने का जरिया कुछ और होता. लोग एक दूसरे से मिल रहे हैं, सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं, इससे अच्छा और क्या हो सकता है?

मैं तो ब्लॉगर मिलन का समर्थन करता हूँ. इसके लिए तो मैंने कलकत्ते के चिट्ठाकारों से एक अपील भी की है कि हमलोग एक बार मिलें.

समय चक्र ने कहा…

मनुष्य सामाजिक प्राणी है जहाँ रहेगा एक समाज बना कर एक दूसरे से जुड़ेगा.. वैचारिक तौर पर भावनात्मक तौर पर । इससे अच्छा और क्या हो सकता है ?

बालकिशन ने कहा…

बहुत खूब लिखा आपने.
मैं आपसे पूर्ण रूप से सहमत हूँ.
"ब्लॉग तो उस साक्षात संवाद का विकल्प है "

Anita kumar ने कहा…

अभय जी हम भी इस बात से सहमत हैं कि ब्लोगरस मिलन होना चाहिए, जिसे न मिलने की इच्छा हो न मिले कोई दवाब तो है नहीं।

Yunus Khan ने कहा…

भई शरद जोशी के एक व्‍यंग्‍य को थोड़ा सा तरमीम करके कह रहा हूं नल हो पर पानी ना हो ऐसा कैसे होगा । हम जीते जागते इंसानों ने ही ब्‍लॉग रचा है ना तो फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि मिला ना जाए , अभी तक मुंबई में जितनी बार ब्‍लॉगर मिले हैं मजा ही आया है ।

Dr Prabhat Tandon ने कहा…

अरे काहे को बन्द कर दें , भाई हम तो मिलने को तैयार हैं , चाहे कोई कैसा सोचे:) अब अभय भाई , अब आप कब मिल रहे है :)

VIMAL VERMA ने कहा…

एक बात और है कि किसी भी चिट्ठेकार के लिये तकनीकी भी ज़रूरी है,और मिल लेने से जाता क्या है,हमारा मिलन अनुभव सुखकर रहा है, और मिलने के बाद तादात्म्य और बढ़ा है,हां, मिलना ना मिलना ब्लॉगर पर निर्भर करता है,

बोधिसत्व ने कहा…

भाई हम तो मेल मिलाप के पक्ष में हैं....फोन पर बात करने और चैट पर प्यार करने से अगर काम चल पाता तो प्रेम कितना आसान हो जाता आज....कोई पूछे उन दीवानों से कि मिलने की क्या जरूरत है.....मेल से काम चला लो भाई....फोन पर सुन लो एक दूसरे को...एसएमएस पर कह लो दिल की बात....।
अगर उपर्युक्त भाई के विचारों से सहमत हुआ जाए तो सबसे पहले लेखक संघों के सम्मेलनों पर रोक लगे....फिर तमाम राजनैतिक दलों के अधिवेशनों पर फिर बारात और शादियों पर....फिर शवयात्रा पर.....फिर विरोध प्रदर्शन करनेवाले जूलूसों पर....फिर रोकने के लिए क्या बचेगा
इसलिए हम तो हर तरह के मेल मुलाकात के पक्षधर है भाई....समीर लाल से मिले हैं आलोक पुराणिक से मिलेंगे....अगर मंडल साहब मुंबई आए तो उनसे भी मिलेंगे....वे हमारा क्या कर लेंगे....हम मिलेंगे। क्योंके हम मिलने मिलाने में यकीन रखते हैं...हम ज्ञान भाई से भी मिलते....अगर वो सन्नाटा न खींच लिए होते...हम तो मनीष से न मिल पाने पर पछता रहे हैं...हम तो फुरसतिया के जन्म दिन पर केक काट कर बहुत खुश थे....
क्यों कि हम मानते हैं कि मिलने से आदमी एक दूसरे को अधिक समझ पाता है....
जो मिलने से बचता है हम उसे खोज कर मिलने में भरोसा रखते हैं....
एसे लोग अक्सर छुपे रहते हैं....और हम ऐसे लोगों को खोजते रहते हैं...क्योंकि हम मिलने में मजा पाते हैं....

आभा ने कहा…

हमें तो हर ब्लॉगर मिलन सुहाता है...हालाकि अभी तक किसी ब्लॉगर मिलन में शामिल नही हो पाई हूँ.....पर फोटू.देख कर और ब्लॉग चर्चा पढ़ कर मजा आता है...
मैं तो ब्लॉगर मिलन के फेवर में हूँ....
लेकिन न मिलनेवालों से तो दूर ही रहना चाहूँगी....क्योंकि एक हाथ से ताली बजीने में मुझे कोई रुचि नहीं...और मैं बजा भी नहीं पाऊँगी...मेरा हाथ हवा में लहराने का कोई इरादा नहीं हैं...

मीनाक्षी ने कहा…

आभासी दुनिया हो या सपनों की दुनिया हो...वास्तविक जीवन में मिलने का आनन्द ही अलग होता है... हम तो दिन गिन रहे थे कि कब देश जाना होगा और भारत भ्रमण के बहाने ब्लॉगरज़ दर्शन होगें........ यहाँ भी आपत्ति .... !
हम तो सबसे मिलना चाहेंगे...

अनिल रघुराज ने कहा…

पानी बहता है तो पता चल जाता है कि उसकी तलहटी में क्या छिपा है। ब्लॉगिंग भी क्योंकि एक प्रवाहमान माध्यम है, इसलिए यहां लोगों की असलियत फौरन सामने आ जाती है। सोचिए जो शख्स इंसानों के मिलने पर ऐतराज कर रहा है, वही खुद को मार्क्सवादी-लेनिनवादी भी कहता है। उसकी इस कथनी का सच अब सामने आ गया है।। असल में ब्लॉगिंग एक लोकतांत्रिक माध्यम है और यह लोकतंत्र-विरोधियों को चुटकी बजाते ही बेनकाब कर देता है।

अनूप शुक्ल ने कहा…

भैये, हम तो मिलने-मिलाने वाली पाल्टी के आदमी हैं।

Priyankar ने कहा…

हमहूं मिलना चाहता हूं .

प्रेम-मित्रता-सद्भाव-आशनाई तो छोडिये,बिना मिले तो भला-सा झगड़ा भी नहीं हो सकता .

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