गुरुवार, 31 जनवरी 2008

इन प्रेज़ ऑफ़ अ नान-भिन्नाटी वूमन

मेरी प्यारी भाभी,

सादर चरण स्पर्श,

मैं यहाँ कुशल-मंगल से हूँ और ईश्वर से आप की और भाईसाहब की कुशलता की कामना किया करता हूँ। पिछले दिनों भाईसाहब ने आपकी बहू के हाथ की खिचड़ी खाने की इच्छा प्रकट की थी। मैंने भाईसाहब को निमंत्रण तो उसी वक्त दे दिया था पर इस कामकाजी औरत ने तो..क्या बताएं.. जिन्दगी खराब कर दी हमारी।

अगर आप की बात मानकर वो सिराथू वाली से बिआह कर लिए होते तो आज ये दिन न देख रहे होते। अशोक नगर वाला बंगले के साथ सफ़ेद एस्टीम भी गद्दी के नीचे होती और बीबी हाथ जोड़े खड़ी भी होती और घर में कोई भिन्ना रहा होता तो हम। बड़ा मिसटेक हो गया वरना आज भाईसाहब जैसा जलवा अपना भी होता.. कहा ही है.. बिहाईन्ड एव्हरी सकसेजफ़ुल मैन.. देअर इज अ वूमन। आई वुड से.. देअर इज अ नान-भिन्नाटी वूमन।

आप चिंता न करें.. भाईसाहब की खिचड़ी पक्की है। अरे मेरी इज्जत का सवाल है। सबके सामने कहा है.. अगर नहीं खिलाई तो क्या कहेंगे लोग कि देखो साला जोरू का गुलाम है बीबी इसकी खिचड़ी तक नहीं बनाती। इस मामले में भाईसाहब बड़े लकी हैं उनको आप जो मिली हैं।

अच्छा भाईसाहब का स्वास्थ्य तो ठीक-ठाक है ना.. ये अचानाक अपनी ब्लॉगरी छोड़कर आप को रसोई से निकाल कर आप के पीछे जा कर क्यों खड़े हो गए हैं? क्या उनको लगता है कि औरतों के मुँह नहीं लगना चाहिए? और औरतों के मामले में घर की औरत ज्यादा अच्छा मुँहतोड़ जवाब दे सकती है? खैर जो भी बात हो आप ने भी क्या करारा रख के दिया है.. औरतें इतनी जल्दी भिन्ना क्यों जाती हैं। जरा सी बात में ’नारी मुक्ति संगठन’ खड़ा हो जाता है। जिन्दाबाद मुर्दाबाद शुरू हो जाता है..

आप की यह बात पढ़कर तो हमारा माथा श्रद्धा से और झुक गया कहाँ मिलती हैं ऐसी औरतें आजकल जो जरूरत पड़ने पर मर्द की रक्षा कर सकें। आप महान हैं भाभी जी सचमुच महान! आप को दुर्गा की तरह कलम उठाते देख कर ही तो मेरे अन्दर भी अपनी बात कहने की प्रेरणा जाग गई।

और कहा ही क्या था भाईसाहब ने.. औरतों को किताब पढ़ने की जरूरत क्या है..? ठीक ही तो कहा था मैं तो कहता हूँ कि किताब ही पढ़ने का जरूरत क्या है। अरे इस सर्दी में किताब पढ़ने से अच्छा उसे अलाव में झोंक के थोड़ा आग ताप लो। हाँ नहीं तो.. बेकार की चिकाई चल रही है।

भाईसाहब के प्रमोशन के लिए मैंने सिद्धिविनायक के दरबार में चार आने का प्रसाद चढ़ा दिया है। बड़े प्रसन्न थे.. अपने पास मुम्बई बुलाने की बात कर रहे थे। चार आने की ये बुद्धि रामखिलावन ने दी थी- हमारा चौकीदार- उसका कहना था कि सिद्दिविनायक के दरबार में सब सौ-हजार-लाखों का चढ़ावा चढ़ाएगा, उसमें चार आने का प्रसाद गणपति बाप्पा को अपने पुरातन काल की स्वर्णिम याद दिलाएगा। बस सजल होकर इच्छा पूरन कर देंगे। है न कमाल की बुद्धि अपने रामखिलावन की.. होनी ही है किताब जो नहीं पढ़ा कोई। जैसे अपना भरतलाल .. क्य दिमाग पाया है उसने।

कभी कभी सोचता हूँ कि अगर वो न होता तो भाईसाहब इतनी बड़ी अफ़सरी सम्हालते कैसे? कॉलेज के समय जो दो चार किताब पढ़े थे, उसका असर तो आप के मिलने के बाद ठिकाने लग गया था; लेकिन फिर बीच में गीता बाँच लिए? अगर उन दिनो भरतलाल छुट्टी पर नहीं गया होता तो फिर लोग उनकी बुद्धि ऐसे थोड़ी भ्रष्ट कर पाते। ये आजकल भाईसाहब जो बीच-बीच में बहक के उलटी खोपड़ी की बात करने लगते हैं.. ये सब किताब पढ़ने की बीमारी ही है। आप को याद है न जब तक नहीं पढ़े थे.. तो कितना मीठी-मीठी बात करते थे। लो भूली (और भोली भी) दास्तां फिर याद आ गई..

अब इस याद के बोझ से कलम भारी हो गई अब आगे लिखना मुश्किल हो रहा है..

बड़ों को नमस्कार छोटों को प्यार
कम लिखा ज्यादा समझना

आशा है आप ने इस बार करौंदे का अचार डालते समय मेरा हिस्सा अलग कर दिया होगा.. मैंने यहाँ पर गोभी का अचार डाला है। पिटू मंगल को बनारस जा रहा है महानगरी से, उसके हाथ भेज रहा हूँ। भरतलाल को स्टेशन भेज कर मँगवा लीजियेगा। उसका कोच नम्बर भाईसाहब को मालूम है, उन्होने ही तो कनफ़र्म करवाया है।

आपका आज्ञाकारी देवर

और हाँ भाईसाहब को कहियेगा किताब बुरी चीज है मैं भी मानता हूँ पर कम से कम चिट्ठी की बहिष्कार तो छोड़ दें.. वो मान जायं तो उनको भी चिट्ठी लिखना शुरु करूँ फिर से..

और एक बात और.. भाईसाहब की किताब वाली वो रैक जिसके बराबर खड़े होकर पन्ने पलटते हुए मनन करते रहे हैं उसकी किताबों को रैक समेत इस जाड़े का मुकाबला करने में काम में ले आयं.. कुछ तो उपयोग हो इन कटे हुए पेड़ की रंगी हुई लुगदी का.. इस कोहरे में किसी को चमकाने के काम की भी नहीं रही..

19 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

अभय अब आप ने मन खुश कर दीया ये पोस्ट समसामयिक हैं . पहले ही लिख देते तो ऐसी बेहूदा बात सुने को ना मिलती. उनकी पारिवारिक पोस्ट है इसलिये क्या लिखना पर ब्लोग्गिंग और खास कर हिन्दी ब्लोग्गिंग क्योंकि अग्रीगाटर पर हैं इसलिये एक मंच हैं . इंसान के संस्कार उसके शब्दों मे होते हैं . और पुरुर्ष वोही होता हैं जो सामना करे पर अधिकतर पुरुष अपनी पत्नी के पीछे छूप जाते हैं और पत्निया आप की भाभी जी की तरह उनको दुलाराती रहती । अपने भाई से कहे की बहु खिचड़ी क्यो बनाए ? जब ससुर या जेठ सरे आम बहु की खिल्ली उड़ा रहे थे तब वह संस्कार कहाँ थे ?? और भाई अगली बार किसी भिन्नाति महिला के कमेन्ट का इंतज़ार ना करे सही जवाब देने के लिये ।

रचना ने कहा…

too good abhey very subtle but very nice though a little late

बेनामी ने कहा…

अभय जी आपके लेखन का सदा से प्रशंसक रहा हूँ। पर आज आपको पढकर अजीब लग रहा है। इतना सब कुछ है समाज को देने के लिये हम आपके पास पर हम आपसी खीच तान मे लगे है। कुछ समाज के लिये लिखे। आपने एक ब्लागर को अपनी कलम से नीचा दिखाया तो इससे कौन सा किला फतह कर लिया? और यह जो महिला आपके ब्लाग मे और दूसरे ब्लाग मे अंर्गल व्यव्हार करती फिरती है। उससे लगता है कि उसे किसी प्रकार का मानसिक रोग है। उसका खुद का परिवार उसे कैसे सहता होगा भगवान जाने। उसके पति को भगवान बचाये। पर सर आप तो सही राह पर रहिये। उस महिला का इतना खौफ है कि बेनामी बनकर पोस्ट कर रहा हूँ। उसको नाम पता चला तो आ जायेगी कीचड उछालने। उसकी तो है नही, हमारी तो है।

यदि आपको उचित लगे तो यह टिप्पणी छापे नही तो आपने पढ लिया एक नियमित पाठक को और क्या चाहिये।

Gyandutt Pandey ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा अभय।

Praveen ने कहा…

बस अब यही बचा था लिखने के लिए. अब सब लोग इतने विद्वान् हो गए है की हास्य का पुट लिए हुए एक ब्लॉग पर भी लोग दाना पानी ले के चढ़ बैठे. वैसे ज्ञान जी ने जो बात लिखी थी उसमे दो चीज़ थी, मेरे हिशाब से सबसे प्रमुख बात जो थी वो थी किताबे पढ़ने पर. तो मेरे विद्वान् बुजुर्ग (हां आप उमर मे मुझसे बुजुर्ग ही है ) आप यह बताइए की जो लोग किताबे नही पढ़ते थे वो क्या बेवकूफ ही थे क्या, क्या ख्याल है कबीर के बारे मे, वह कौन से बड़े लेखकों पढ़ के विद्वान् हुए थे. जरा मुझे भी बताते जाइए. दुर्भाग्य यह है की आप लोग लेखनी से बहुत प्रगतिशील बनते है लेकिन वास्तविकता मे आप लोग चारण-भाट परम्परा से बाहर नही आ पाते है. आप लोग विचार के धरातल पर नक़ल मार के जिंदा रहने वाले छद्म, बेहया, जबानी jamakharch क्रांतिकारी है. और रही बात आप के ब्लॉग पर उछलने वाले देवी जी की तो उनको समझ मे यह बात आनी चाहिए की भारत मे बहुत सारी महिलाये है, जो ज्यादे सफल है, और वो दिन रात पुरुषो को गाहे बगाहे गाली ही दे के जिंदा नही है.
आख़िर मे एक बात और यह प्रतिक्रिया एक ऐसे पाठक के तरफ से लिखा गया है जो आप लोगो को पढ़ते रहता था लेकिन आज आपने इतना हताश किया है कि दुबारा इधर आने कि इच्छा नही है. धन्यवाद ! आप कि इच्छा होगी तो छाप दीजियेगा, नही तो फेक दीजियेगा.

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

अभय भाई,

सबकुछ बढ़िया ही लिखते हैं. लिहाजा चिट्ठी भी बढ़िया लिखी है आपने. .....

वैसे, किसी को प्रेज करके आप अपनी मूल धरा से भटक तो नहीं रहे.........:-)

सटीक जवाब ने कहा…

http://mujehbhikuchkehnahaen.blogspot.com/2008/02/blog-post.html

Pramod Singh ने कहा…

अपने 'कुविचारों' से दग्‍ध हो.. या भाइयों के बुद्धि विराटत्‍व से? विवेकशून्यता, कलर ब्‍लाइंडनेस की कोई सीमा होती है या सचमुच अछोर, अघोर होता है?

बेनामी ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
बेनामी ने कहा…

abhey ji
accha likha hai.

@ Anonymous
jab kehne ko kuch na mile, to "मानसिक रोग", "खुद का परिवार उसे कैसे सहता होगा"... aadi "अंर्गल", Anonymous ban kar keh do - badiya hai - kyonki "उसकी तो है नही, हमारी तो है".
Bahut khoob sahab - samajh aa gaya, ki aapki kya hai, aur kaise hai... aur bhagwan kare, ki yoon hi bani rahe - kyonki kahin aapka sach dikh gaya, to keechad ko bhi sharam aa jayegi..

@ बाबू अरचनात्मक प्रसाद सिंह
bahut badiya.
aap spelling sudharte rahiye. aabhar.

@rachna ji
aap likhte rahiye ji. kisi ki parvah naa karein.
ummed hai apko dekh kar aur bhi mahilayein bolein.
spellings ki to bilkul mat chinta kariye.
hum sab jaante hain ki yeh takniki mamla hai, aur waise bhi aapke vichaar aache hain - spellings ke liye बाबू अरचनात्मक प्रसाद सिंह jaise bahut se prashansak mil hi jayeinge.. aap parvah naa karein keval apne vichaar likhte rahein..

NAYAN

अरुण ने कहा…

मतलब इस खिचडी के पीछे भी कुछ और ही खिचडी पक रही है क्या...?कॄपया विसतॄत रिपोर्ट पेश करे तकी सही टीपियाया जा सके..

खिचडी ने कहा…

भईया -- बाबू अरचनात्मक प्रसाद सिंह कहे अपना खून जलावत हो , तुम लिखे जाये रहे हो , अरे खाली दाल खाये रहे हो इसीलिये भन्नाये रहे हो । खिचडी खाओ प्रभु के गुण गाओ ।

नॉट ए हिन्दी ब्लागर एनीमोर. ने कहा…

Do I call it subtle?

No, it's not subtle it's effective.

It's as effective as a sledgehammer wrapped in a 1" thick sheet of foam.

Congratulations,
If I admired your disregard for the issue, I admire your new righteousness even more.

Pratyaksha ने कहा…

रचना ने कोई बात कही ..किसी को पसंद नहीं आई । अभद्र भाषा में लिख देने से उसका प्रभाव नहीं बढ़ जाता । ऐसी टिप्पणियों को कूड़े में डालनी चाहिये ।
अभय आपने बढ़िया लिखा..आत्मीय चुहलबाजी (?) का जवाबी टोन !

anitakumar ने कहा…

:) bahut badhiya...master piece

अनिल रघुराज ने कहा…

क्या बात है! व्यंग्य लिखते हैं तो धार और तेज़ हो जाती है। पढ़कर बड़े ही निर्मल आनंद की प्राप्ति हुई।

note pad ने कहा…

अभय जी अच्छा व्यंग्य । किसी ने टिप्पणी में लिख डाला है--आपके ब्लॉग पर उछलने वाली महिलाएँ ...

कहीं कहा जाता है -बेवकूफ समाजवादी महिलाएँ ...--

बहुत खूब !! यह क्रोध की उनमत्तता में बाहर आती सोच का उदाहरण है ।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

अच्छा और सटीक, पर महिलाओं पर ये नाराज़गी क्यूं

rewa ने कहा…

Kitna ghatiya baaten karte hein hindi bloggers. Kya yahi pahchan hai hindibloggers ki? Tohin hai.

Doston apa apni baaton ko agar sina tankar goli barud ko samne lakar kahkar chale jayenge to iska matlab nahi ki aap jambaaz ho balki aap sabse jyada weak ho...aapse weak duniya mein koi nahi jinhe apni baaton ko manwane ke liye aise hathiyar ki sahyata lena padta hai. Dhikkar hia aise mardon per aur unke mardangini per....chi chi....ham sab chote dost, bhai, bahan aap jaise badon se kya sikhenge? aapke bachche kaise honge wo to aapka language aur aapka vichar bata deta hai...aisa nahi hai ki sirf parents ki pahchan bachon se hota hai balki bachchon ki bhi pahchan parents se banti hai.

Yah mat bhuliye hame zanm dene wali NARI hoti hai....aur jisne bhi nari ka apman kiya usne apni maa ka apman kiya aur jisne maa ka apman kiya usse bada shaitan to koi ho nahi sakta hai jiske liye maa bhi aanshu bahane per mazboor hoti hai our apne kokh ko dhikkarti hai. Are tumsabse to achha Ravan tha jise itna to gyan tha ki sita ke liye galat shabd use nahi karenge. Ram ko poojne wale tumsab logon ka purushath mar raha hai...bachao apne purusharth ko! bus insan ke liye isara kafi hai. main aapsabse choti hun aur ho sakta ahi choti muh badi baat kah gayi...but jab chote aisi nadani karte hein to bade unhe samjhate hein but jab abde hi galti karen to unhe koun samjhaye! chaliye agar maine dil ko dukhaya hai to am sorry.


rgds.
rewa smriti
www.rewa.wordpress.com

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