गुरुवार, 17 जनवरी 2008

व्यसन का विरोध?

सिगरेट छोड़े हुए लगभग एक साल हुआ जा रहा है और आजकल बरसो की पुरानी सहेली की याद बहुत सता रही है। पुरानी लत है शायद अभी भी उसके अवशेष अवचेतन में कहीं दबे पड़े हैं। कितना नसेड़ी होता है आदमी क्या-क्या नशे पाले रहता है.. चाय कॉफ़ी, पान, तम्बाकू, सुपाड़ी, सिगरेट, शराब, भांग, चरस, गांजा, अफ़ीम, कोकेन। एक बार पिया इनको और गए.. शरीर फिर-फिर माँगता है इनका सेवन। सब के साथ एक ही बार में ही बेड़ी पड़ जाती हो ऐसा नहीं है- कुछ थोड़ा ज़्यादा समय लेते हैं।

होता क्या है एडिक्शन..? किसी पदार्थ के सेवन की बार-बार तलब, चाहत, हुड़क ही तो लत पड़ जाना है। एक अनुभव के अनन्त काल तक पुनरुत्पादन की इच्छा। आप को कुछ जानी-पहचानी बात नहीं लग रही ये..? जीवित जगत का हर जीव-जन्तु अपने पुनरुत्पादन के ही काम में तो निरन्तर लगा हुआ है। कुछ जड़ पदार्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर इस स्वभाव की अभिव्यक्ति करें तो यह चकित करने वाली बात ज़रूर है लेकिन प्रकृति के स्वभाव के अनुकूल ही है।

अस्तित्वात्मक दुविधा यह है कि आदमी इन पदार्थों के सेवन का प्रतिरोध कर के जीवन का समर्थन कर रहा है या प्राकृतिक स्वभाव का विरोध?

14 टिप्‍पणियां:

Beji ने कहा…

"जीवित जगत का हर जीव-जन्तु अपने पुनरुत्पादन के ही काम में तो निरन्तर लगा हुआ है।"

आपका विचार सही है। एक और पहलू भी है इसके साथ जुड़ा हुआ। सरवाइवेल ऑफ द फिटेस्ट। प्रकृति हर तरह से फिट को चुनती है...मानसिक,शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से जो बलवान होता है उसकी पुनरुत्पादक शक्ति तीव्र रहती है।
व्यसन तो व्यसन है....जो व्यसन कमज़ोर करती है....वह भले ही प्राकृतिक लगे आपको क्षीण करती है। पुनरुत्पादन के वरदान को भी क्षीण करती है।

टिपिकल स्मोकर्स की तरह वापस जाने के बौद्धिक बहाने मत ढूँढिये।

आशीष महर्षि ने कहा…

खास मेरी भी यह लत छूट जाए

अनिल रघुराज ने कहा…

पहले हम बाहरी लोगों और वस्तुओं से जुड़ते हैं। फिर यही बाहरी चीजें हमें बांध लेती हैं। यही तो मोह है। जो मोह को तोड़ सकता है, वही वीर है। बाकी तो लोग कायरों की ज़िंदगी जीते ही रहते हैं। कुछ ज्यादा तो नहीं हो गई??

Kakesh ने कहा…

चलिये हम तो अभी तक बचे हुए हैं.

चंद्रभूषण ने कहा…

अभय बाबू, तंबाकू पर हाल में काफी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक काम हुआ है। इनमें एक यह है कि इसे महसूस करने का संवेदक (सेंसर) इन्सानी दिमाग में प्राकृतिक रूप से नहीं होता। इसका बेस केमिकल निकोटिन बाकायदा दिमाग में अपने लिए एक सेंसर जोन जेनरेट करता है। यह दिमागी जगह यौन संवेदना वाली जगह के आसपास ही कहीं पड़ती है लिहाजा जल्द ही निकोटिन की भूमिका एक यौन विकल्प जैसी बनने लगती है। एक तरह से यह शरीर में एक नया अंग बनने जैसा होता है, जो एक बार बन जाए तो उसे मिटाने का कोई उपाय नहीं है। विकल्प सीमित हैं। आपने या तो कभी निकोटिन ली है, या नहीं ली है। एक बार दिमाग में सेंसर डेवलप हो गया तो इस भूल में कभी न रहिए कि आपने तंबाकू का सेवन हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिया है। आप दुबारा जब भी शुरू करेंगे, लत ठीक वहीं से जारी हो जाएगी, जहां आप उसे खत्म कर देने का भ्रम पाल बैठे थे।

Pratyaksha ने कहा…

दिखा दीजिये दुनिया को आपकी इच्छशक्ति कितनी मजबूत है ,( आईदर वे )

Sanjeet Tripathi ने कहा…

क्या लग रहे हो फोटू मे

mamta ने कहा…

ऐसे समय मे खुद को कण्ट्रोल करके ही आप इससे दूर रह सकते है।

एक पेपर पर आप लिखिए इस व्यसन के कितने फायदे और नुकसान है । अगर नुकसान फायदे से ज्यादा है तो आप दुबारा इस को शुरू नही करेंगे।

मनीषा पांडेय ने कहा…

अभय, वापस लौटने का बौद्धिक तर्क तो नहीं गढ़ रहे हैं आप, चंद्रभूषण की बातों में दम है, लेकिन फिर भी न लौटें तो बेहतर होगा। एक साल का समय कम नहीं होता। तलब फिर से न लगने पाए तो अच्‍छा है।

Pramod Singh ने कहा…

बाजीग़र, ओ बाजीग़र?..

Pramod Singh ने कहा…

और हां, चंद्रभूषण के मुंह में कीड़े-फतिंगे.. उसके पढ़ने की मेज़ पर चूहे आयें, किताबों के बीच छिपकिली निकले! बात करते हैं!

सागर नाहर ने कहा…

सबसे बढ़िया बात बेजी ने कही
टिपिकल स्मोकर्स की तरह वापस जाने के बौद्धिक बहाने मत ढूँढिये।

ILA ने कहा…

pleaze do not try to tread on the path discarded by u. Do not succumb to intellectual reasons to start smoking. I congratulate u for coming this far, and wish that u set an example for people struggling to give up smoking.

Mired Mirage ने कहा…

नहीं सागर जी, हमें तो प्रमोद जी की बात अधिक रचनात्मक लगी । :) :D
घुघूती बासूती

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