शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

कमज़ोर शरीर में क़ैद इच्छाएं

बचपन में चालीस की उमर वाले लोग किसी और ही दुनिया के प्राणी लगते थे। अब चालीस पर खड़े होकर मैं अपने को उसी दुनिया में पाता हूँ जिस में पन्द्रह, बीस और पचीस में था। जवानी और बुढ़ापे के बीच खड़े होकर एक बात मैंने ग़ौर की है कि जवान आदमी ज़्यादा कोमल, आदर्शवादी और श्रेष्ठता-बोध से ओतप्रोत होता है। जबकि बूढ़ा आदमी कहीं कठोर, उपयोगितावादी और स्वार्थ-बोध में लिप्त होता है।

जवानी में आदमी शक्ति से, ओज से भरा होता है और बुढ़ापे में कमज़ोर। कुछ लोगों को यह बात अनैतिक लग सकती है मगर मुझे आज यह ठीक लगती है कि शक्ति से शुभता और कमज़ोरी से पाप उपजता है। इस समीकरण को 'कमज़ोर को प्यार करने' की ईसा की शिक्षा के विरुद्ध न समझा जाय। बल्कि सच तो यह है कि ईसा की शिक्षा में भी कमज़ोर और पाप के रिश्ते का स्वीकार है।

यहाँ पर मैं शक्ति को सत्ता के पर्यायवाची के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहा। बल्कि अक्सर सत्ता में बैठा व्यक्ति बेहद कमज़ोर होता है। और कोई भी व्यक्ति हमेशा शक्तिशाली और कोई दूसरा हमेशा कमज़ोर नहीं रहता। ज्योतिष में भी मानवीय गुणों के बल और शुभता के इस सम्बन्ध को ग्रहों के उच्च और नीच के विशेषणों से परिभाषित किया है।

आम तौर बूढ़े आदमी को बाबा मानकर आदर और सम्मान का पात्र समझा जाता है.. यह मान लिया जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ उसके अनुभव में भी वृद्धि हो गई होगी। पर हमेशा ऐसा होता नहीं। शनि जो स्वयं बुढ़ापे का प्रतीक है दुःख का कारक है ज्ञान का नहीं। ज्ञान का कारक राहु है जो आदमी को अपने शासन काल में दर-दर भटका देता है। तो शायद चरैवेति चरैवेति का ही एक दूसरा रूप राहु में देखा जा सकता है। शंकराचार्य अगर परम ज्ञानी थे तो वे परम घुमक्कड़ होकर दर-दर भटके भी थे; और ये भटकना कुछ लोग मानसिक धरातल पर कर लेते हैं।

अनुभवजन्य ज्ञान और वय का सम्बन्ध है पर सीधा बिलकुल नहीं। और आम तौर पर होता है ये कि लोग बस बूढ़े हो जाते हैं.. इच्छाएं, अरमान, समझ और अनुभव जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं और सिर्फ़ शरीर बुढ़ा जाता है। असल में बूढ़े लोग एक शिथिल और कमज़ोर शरीर में क़ैद अतृप्त इच्छाएं हैं। झुर्रियों वाली खाल के भीतर वह किसी भी अन्य आदमी जैसे ही होते है। ऐसे बूढ़ों को ज्ञानी बाबा समझने की ग़लती कर के मैं बहुत झेला हूँ और उनके हाथों क्लेश पाकर ही इस समझ पर पहुँचा हूँ।

11 टिप्‍पणियां:

swapandarshi ने कहा…

very good. I realize I am not alone in the line of thought.

Kakesh ने कहा…

आप भी कैसे बूढ़ों सी बात करने लगे.अभी तो आप जवान , स्मार्ट और भी ना जाने क्या क्या हैं.यह सब तो हम जैसे लोगों को सोचना चाहिये.

Beji ने कहा…

बाकी सब तो ठीक है पर आप कहीं हम सभी चालीस की तरफ अग्रसर लोगों को बूढ़ा वूढ़ा तो नहीं कह रहे....अरन्ट वी ऑल सो यंग?!!

Neelima ने कहा…

क्या कहें हमें तो बुढापे के विचार मात्र से डर लगता है !

Pratyaksha ने कहा…

मन अपने किसी ऑप्टिमम उम्र पर आकर रुक जाता है , शरीर की उम्र बढ़ती जाती है और ये जैसे जैसे बढ़ती है मन की उम्र धीरे धीरे घटती जाती है तभी बुढ़ापे में हम बच्चों सा व्यवहार करने लगते हैं ।

Indra ने कहा…

bilkul sahi kaha apne. maine bhi kai buddhon ko apne papa ki age ka samajh kar kafi maan aur izzat di par dheery dheery pata laga ki ye sab log sirf bude huen hai. aur kabhi kabhi man karta hai ki in logo se abe tabe kar ke baat karoon. aksar sochata tha ki papa ka hangover mujhpe kuchh jyada hai isiliye main compare karta hoon. par apka anubhav dekh kar lagta hai ki meri opinion in logo ke bare main sahi hai.

ILA ने कहा…

This debate can go on and on, but yes u r rite to some extent. Most old people exhibit only external symptoms of old age like greying hair and wrinkles. But what about the wrinkleson their thought process, that refuse to be washed away.

Pramod Singh ने कहा…

ओह, सो पॉंपस एंड एंटि-ओल्डिस्‍ट स्‍टांस! बुड्ढों के प्रति सारी ममता मर गई? सिर्फ़ कहने को निर्मल निर्मल हैं? वैसे पचपन साल के अनामदास के सिवा यहां कौन बूढ़ा है जिसके खिलाफ़ यह ज़हर उगलदान सजाया जा रहा है?

Sanjeet Tripathi ने कहा…

अमां बड़े भैया, काहे बुढ़ापे की ओर सरक रहे हो आप, 18 till Die बने रहने का ना!!!

ये राहु का लोचा, हमरी कुंडली में सप्तम भाव मे विराज कर लग्न भाव को घूरे जा रहे हैं राहु साहब तो। पता नई क्या लोचा करने का है इन्हे ;)

Mired Mirage ने कहा…

आपकी बात से सहमत हूँ । आजतक कुछ अपराधबोध के साथ ही सही परन्तु ठीक यही सोचती थी । अपनी उम्र को भी नहीं नकार रही । ५२ वर्ष ५ महीने ३ सप्ताह की हूँ । आज भी स्वयं के अन्दर उसी तरूणी को पाती हूँ जो बहुत पहले थी । परन्तु यह भी जानती हूँ कि जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाएगी व समाज में हमारा रुतबा घटता जाएगा , जो सेवानिवृत्ति के बाद होगा ही , हम उतने तार्किक व स्वार्थहीन ना रह जाएँगे जितने आज हैं । तब शायद युवाओं की खुशी में हमें खुशी ना मिले । अपने बीते दिनों व अपूर्ण इच्छाओं के रहते, शायद जाने अनजाने, हम जिन युवाओं की इच्छाएँ कुचल सकते हैं, अवश्य कुचलने की कोशिश करेंगे । इसलिए अभी से बच्चों को कह रखा है, जब भी हमें स्वार्थी बनते देखो, या खड़ूस सा व्यवहार करते देखो, अवश्य टोक देना । एक बार यह आदत पड़ गई और बच्चों ने शह दे दी तो फिर यह छूटेगी नहीं ।
आपने इस विषय पर लिखा , मुझे बहुत खुशी है ।
घुघूती बासूती

मनीषा पांडेय ने कहा…

अरे अभय, कोई और ये कहता तो समझ में भी आता। लेकिन आप ? आप, जो हिंदी के सबसे यंग, स्‍मार्ट, डैशिंग ब्‍लॉगर माने जाते हैं। :)
वैसे, शक्ति और शुभता और पाप और कमजोरी सं जुड़ी आपकी प्रस्‍थापना से मैं सहमत हूं। ये होता है। आप 40 में ये महसूस रहे हैं, मुझे 27 की उम्र में ही लगने लगा है। एक ढलान का-सा एहसास।

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