जनरल साहब को धकिया-धकेल के वर्दी से वंचित कर दिया गया। बेचारों को इस ग़म से राहत देने को दहशतगर्दों (?) ने बीबी साहिबा का क़त्ल कर डाला। इन्तिखाब टालने पड़े। जनरल साहिब (रिटायर्ड) थोड़े सुकुन से हैं पर लोग बड़ी गालियाँ दे रहे हैं उन्हे। बेनज़ीर का खून तो उनके कपड़ों पर मल ही रहे हैं और पाकिस्तान की सारी मुसीबतों का ज़िम्मेवार भी मान रहे हैं उन्हे।
माना बुरे हैं पर अब इतने भी बुरे नहीं जनरल (रिटायर्ड) साहिब। कुछ तो आज़ादी का माहौल बनाया था उन्होने पाकिस्तान में। वरना एक अली सलीम, बेगम नवाज़िश अली बनकर क्यूंकर सबकी खिल्ली उड़ा सकता था ? वो भी नेशनल टेलेविज़न पर? कुछ लोग कहते हैं कि उनकी ही फ़ौज के एक कर्नल के बेटे अली को उन्हे खून के घूँट पी कर बरदाश्त करना पड़ा।
वजह जो भी रही हो लेकिन इतना क्रेडिट तो देना पड़ेगा आप को कि बरदाश्त करने की क़ुव्वत है जनरल साहिब में। और इसी जज़्बे को तो डेमोक्रेसी कहते हैं। वैसे बेगम नवाज़िश अली को अब आप भी देख सकेंगे 9X पर हर शनिवार रात दस बजे। कुछ लोग अली को होमोसेक्चुअल कहते हैं कुछ लोग बाइसेक्चुअल.. मैंने उन्हे एक इन्टरव्यू में खुद को ट्राइ(try)सेक्चुअल बताते हुए सुना है।
देखिये महेश भट्ट के साथ उनके प्रोग्राम की यह क्लिप..
सोमवार, 14 जनवरी 2008
शनिवार, 12 जनवरी 2008
बुड़ुम.. बुड़ुम.. बुड़ुम..
आज सुबह एक पोस्ट लिख कर वापस सोने चला गया। जब जागा तो बाहर के कमरे से कुछ आवाज़ आ रही थी। भली सी, सुखद, तसल्ली देने वाली आवाज़। एक पल के बाद याद आ गया कि यह आवाज़ एक कम्प्यूटर गेम से आ रही थी जो तनु खेल रही थी। आम तौर पर वीडियो गेम्स, कम्प्यूटर गेम्स से धाँय धूम, धाड़ भाड़, शाँय शूँ, भींऽऽऽ ईंऽऽऽऽ तरह की आवाज़े आती हैं पर इस गेम से टुड़ुम-टुड़ुम-टुड़ुम, बुड़ुम-बुड़ुम, टुपुक, छपाक जैसी आवाज़े आ रही थीं। थोड़ी देर इन्हे सुनते रहने के बाद समझ आया कि ये सारी आवाज़े बूँद के जलराशि में मिलने की आवाज़े हैं।
और फिर इस ख्याल के साथ एक गूढ़ बात में उलझ गया। पुराना मुहावरा है बूँद के सागर में मिलने का- आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को परिभाषित करता। और ख्याल आया अपनी मृत्यु और मृत्यु जनित अपने भय का.. अपने अस्तित्व के विखण्डन का। कोई अनोखा भय नहीं है मेरा। सभी डरते हैं मरने से। क्या यह जानकारी इस भय को भगाने के लिए काफ़ी नहीं कि मर कर हम बूँद के बदले सागर का अस्तित्व ग्रहण करेंगे? शायद नहीं.. या बिलकुल नहीं.. अगर काफ़ी होती तो हम डरते ही क्यों?
क्या हम डरते हैं क्योंकि हम अज्ञान के अँधेरे में हैं या हम डरते हैं क्योंकि हमें पता है कि सचमुच विखण्डन हो ही जाएगा? भारतीय अध्यात्म कहता है कि हमारा डर सिर्फ़ अज्ञान से उपज रहा है और विज्ञान मानता है कि सचमुच विखण्डन होना ही नियति है।
हिन्दू लोग अपनी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार इसीलिए मृत्यु के हर अवसर पर मोह-शोक—दुःख से ग्रस्त होने पर गीता-पाठ करते हैं कि आत्मा तो अजर-अमर है कपड़े बदलती है आदि आदि। पर वही लोग जो गीता-पाठ करते-कराते हैं गरुड़ पुराण का प्रेतकल्प पढ़ने और उसके अनुष्ठानों को करने की सलाह भी देते हैं। उस प्रेतकल्प के अनुसार शरीर को जला देने के बाद जो बचता है वह आत्मा नहीं अँगूठे के आकार का प्रेत है। कहीं और पढ़ेंगे तो आप को कुछ और मान्यता मिल जाएगी।
अध्यात्म के भीतर आत्मा सम्बन्धी विचार कोई एक नहीं है कि सीधे सीधे कपड़ने बदलने जैसी बात हो। मामला ज़रा जटिल है और आप उसमें जितना बूड़ियेगा उसका रंग उज्जवल होने के बजाय श्याम की ओर गहराता जाएगा। फिर भी यह मान्यता ठोस रूप में बनी रहती है कि आप चाहे, न चाहें, मानें, न मानें, मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। शरीर से स्वतंत्र अस्तित्व!
तो फिर चेतना क्या है? विज्ञान के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है पर हाँ वह इसे भौतिक पदार्थ के जटिल सरंचना का साइड इफ़ेक्ट सा मानता है। आत्मा की अनादि अनन्त स्वभाव पर अध्यात्म का ज़ोर है और पदार्थ की अखण्डता, शाश्वतता को विज्ञान मानता है.. कहीं ये एक ही सिक्के के दो पहलू तो नहीं? पर किस तरह.. ?
अब वापस लौटते हैं मूल बूँद और सागर की बात पर.. यदि वैज्ञानिक मान्यता से इस बात को देखें तो ठीक और तार्किक मालूम होती है। सिवाय एक पहलू के कि व्यष्टि के समष्टि में विलीन होने पर चेतना के स्तर पर कुछ भी घटित नहीं होगा क्योंकि शरीर की जटिल सरंचना का विखण्डन होते ही चेतना नष्ट हो जाएगी।
यदि आध्यात्मिक मान्यता से भी चला जाय तो बूँद सागर में मिल भी गई तो भी उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है प्रेत के रूप में जो कर्म-बन्धन के चलते बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहने के लिए बाध्य है। मगर प्रेत के रूप में और बारम्बार शरीर के रूप में उसे अनन्त दुःखों का भागी-भोगी होना ही पड़ता है। इसीलिए बुद्ध ने इस दुःख से निवृत्ति का मार्ग बताया.. जो गीता के मार्ग से सैद्धान्तिक रूप से अलग नहीं है। गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो।
शरीर के भीतर चेतना की यह अलख वाली बात ध्यान देने योग्य है। बुद्ध अपने साधकों को वैचारिक मारा-मारी से दूर रहकर विपश्यना करने की सलाह देते हैं। वि-पश्य-ना.. वि माने विशेष और पश्य माने देखना। विपश्यना माने शरीर को खास तरह से देखना। ऐसे कि शरीर के एक-एक अणु को आप स्वतंत्र अस्तित्व के बतौर पहचान सकें, जान सकें और देख सकें।
अगर इस आध्यात्मिक परिघटना को विज्ञान से समझने की कोशिश करें तो शायद यह कहना अनुचित न होगा कि चेतना का जो साइड इफ़ेक्ट, जो चेतन व्यवहार, पदार्थ का जो आधिभौतिक पहलू, पदार्थ की जटिल संरचना के चलते पदार्थ के भीतर फ़ौरी तौर पर पाया गया था वो साइड इफ़ेक्ट जटिलता के नष्ट होने पर भी पदार्थ के सरल स्वरूप में भी पदार्थ संचित कर ले जाता है। और एक महाचेतना का अंग बन जाता है। कैसे?
क्या माया के परदे से बाहर निकल अँधेरे को हटा कर पदार्थ सीख जाता है, जान जाता है.. क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ? या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्नत स्वभाव- चित को प्राप्त हो जाता है ? और अगर ऐसी कोई परिघटना अगर सचमुच सम्भव है तो क्या इसीलिए बड़े-बूढ़े बार-बार चेताते हैं कि मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती इसका सदुपयोग कर लो..? .. ह्म्म ! कुछ कहानी बनती है क्या?
और फिर इस ख्याल के साथ एक गूढ़ बात में उलझ गया। पुराना मुहावरा है बूँद के सागर में मिलने का- आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को परिभाषित करता। और ख्याल आया अपनी मृत्यु और मृत्यु जनित अपने भय का.. अपने अस्तित्व के विखण्डन का। कोई अनोखा भय नहीं है मेरा। सभी डरते हैं मरने से। क्या यह जानकारी इस भय को भगाने के लिए काफ़ी नहीं कि मर कर हम बूँद के बदले सागर का अस्तित्व ग्रहण करेंगे? शायद नहीं.. या बिलकुल नहीं.. अगर काफ़ी होती तो हम डरते ही क्यों?क्या हम डरते हैं क्योंकि हम अज्ञान के अँधेरे में हैं या हम डरते हैं क्योंकि हमें पता है कि सचमुच विखण्डन हो ही जाएगा? भारतीय अध्यात्म कहता है कि हमारा डर सिर्फ़ अज्ञान से उपज रहा है और विज्ञान मानता है कि सचमुच विखण्डन होना ही नियति है।
हिन्दू लोग अपनी आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार इसीलिए मृत्यु के हर अवसर पर मोह-शोक—दुःख से ग्रस्त होने पर गीता-पाठ करते हैं कि आत्मा तो अजर-अमर है कपड़े बदलती है आदि आदि। पर वही लोग जो गीता-पाठ करते-कराते हैं गरुड़ पुराण का प्रेतकल्प पढ़ने और उसके अनुष्ठानों को करने की सलाह भी देते हैं। उस प्रेतकल्प के अनुसार शरीर को जला देने के बाद जो बचता है वह आत्मा नहीं अँगूठे के आकार का प्रेत है। कहीं और पढ़ेंगे तो आप को कुछ और मान्यता मिल जाएगी।
अध्यात्म के भीतर आत्मा सम्बन्धी विचार कोई एक नहीं है कि सीधे सीधे कपड़ने बदलने जैसी बात हो। मामला ज़रा जटिल है और आप उसमें जितना बूड़ियेगा उसका रंग उज्जवल होने के बजाय श्याम की ओर गहराता जाएगा। फिर भी यह मान्यता ठोस रूप में बनी रहती है कि आप चाहे, न चाहें, मानें, न मानें, मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। शरीर से स्वतंत्र अस्तित्व!
गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो..
विज्ञान ऐसा नहीं मानता। विज्ञान कहता है कि सबसे जटिल भौतिक संरचना और सबसे उन्नत चेतना वाला प्राणी मनुष्य है.. पर साथ ही मानता है कि शरीर के साथ ही चेतना का भी विखण्डन हो जाता है- मृत्यु के बाद चेतना (आत्मा) के स्वतंत्र अस्तित्व जैसी धारणा अतार्किक है। ग़ौरतलब है कि विज्ञान चेतना के अस्तित्व को नहीं नकारता.. सिर्फ़ उसके स्वतंत्र अस्तित्व को नकारता है।तो फिर चेतना क्या है? विज्ञान के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है पर हाँ वह इसे भौतिक पदार्थ के जटिल सरंचना का साइड इफ़ेक्ट सा मानता है। आत्मा की अनादि अनन्त स्वभाव पर अध्यात्म का ज़ोर है और पदार्थ की अखण्डता, शाश्वतता को विज्ञान मानता है.. कहीं ये एक ही सिक्के के दो पहलू तो नहीं? पर किस तरह.. ?
अब वापस लौटते हैं मूल बूँद और सागर की बात पर.. यदि वैज्ञानिक मान्यता से इस बात को देखें तो ठीक और तार्किक मालूम होती है। सिवाय एक पहलू के कि व्यष्टि के समष्टि में विलीन होने पर चेतना के स्तर पर कुछ भी घटित नहीं होगा क्योंकि शरीर की जटिल सरंचना का विखण्डन होते ही चेतना नष्ट हो जाएगी।
यदि आध्यात्मिक मान्यता से भी चला जाय तो बूँद सागर में मिल भी गई तो भी उसका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहता है प्रेत के रूप में जो कर्म-बन्धन के चलते बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में घूमते रहने के लिए बाध्य है। मगर प्रेत के रूप में और बारम्बार शरीर के रूप में उसे अनन्त दुःखों का भागी-भोगी होना ही पड़ता है। इसीलिए बुद्ध ने इस दुःख से निवृत्ति का मार्ग बताया.. जो गीता के मार्ग से सैद्धान्तिक रूप से अलग नहीं है। गीता कहती है निष्काम कर्म करो! और बुद्ध कहते हैं कि कर्म बन्धन से कूद कर अलग हो जाओ और शरीर के भीतर चेतना की ऐसी अलख जगाओ कि पोर-पोर को जान लो।शरीर के भीतर चेतना की यह अलख वाली बात ध्यान देने योग्य है। बुद्ध अपने साधकों को वैचारिक मारा-मारी से दूर रहकर विपश्यना करने की सलाह देते हैं। वि-पश्य-ना.. वि माने विशेष और पश्य माने देखना। विपश्यना माने शरीर को खास तरह से देखना। ऐसे कि शरीर के एक-एक अणु को आप स्वतंत्र अस्तित्व के बतौर पहचान सकें, जान सकें और देख सकें।
क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ?या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्न्त स्वभाव चित को प्राप्त हो जाता है ..?
जब कोई ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं तो इसे बोध हो जाना कहते हैं या दूसरे शब्दों में पूरी तरह से चेतन हो जाना। इस अवस्था को प्राप्त हुआ व्यक्ति फिर जन्म नहीं लेता वह महाबोधि को, कैवल्य को, मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। मतलब कि फिर बूँद का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहता। बूँद सागर में मिलने से घबराती नहीं क्योंकि कुछ खोता नहीं बहुत कुछ, सब कुछ मिल जाता है।अगर इस आध्यात्मिक परिघटना को विज्ञान से समझने की कोशिश करें तो शायद यह कहना अनुचित न होगा कि चेतना का जो साइड इफ़ेक्ट, जो चेतन व्यवहार, पदार्थ का जो आधिभौतिक पहलू, पदार्थ की जटिल संरचना के चलते पदार्थ के भीतर फ़ौरी तौर पर पाया गया था वो साइड इफ़ेक्ट जटिलता के नष्ट होने पर भी पदार्थ के सरल स्वरूप में भी पदार्थ संचित कर ले जाता है। और एक महाचेतना का अंग बन जाता है। कैसे?
क्या माया के परदे से बाहर निकल अँधेरे को हटा कर पदार्थ सीख जाता है, जान जाता है.. क्या उसे बोध हो जाता है कि उसका मूल स्वभाव चित है ? या फिर अपने मूल स्वभाव अज्ञान को त्याग एक नए उन्नत स्वभाव- चित को प्राप्त हो जाता है ? और अगर ऐसी कोई परिघटना अगर सचमुच सम्भव है तो क्या इसीलिए बड़े-बूढ़े बार-बार चेताते हैं कि मनुष्य योनि बार-बार नहीं मिलती इसका सदुपयोग कर लो..? .. ह्म्म ! कुछ कहानी बनती है क्या?
इन वन वर्ड इमोशन!
'तारे ज़मीन पर' देखते समय मैं तमाम मौकों पर फुक्का फाड़ कर रो देने की स्थिति में बना रहा..दो तीन जगह फट भी गया फुक्का। निश्चित ही ये आमिर खान की निर्देशकीय कौशल का सूचक है।इस तरह से रुलाने वाली फ़िल्म को कौन बुरा कह सकता है। कानपुर से मुम्बई के सफ़र में मैंने कुछ नौजवानों को इस फ़िल्म की चर्चा करते सुना- पूछ मत कैसी है बस देख तू! शायद नौजवान सरे आम अपने रोने की बात खोलने से क़तरा रहा था पर उस रुलाई के आनन्द को बाँटने के लिए हुड़क भी रहा था।
किसी भी फ़िल्म की यह सबसे बड़ी ताक़त होती है। ज्याँ लुक गोदार की फ़िल्म 'पियरे ला फ़ू' में जब सैमुअल फ़ुलर से पूछा गया कि सिनेमा क्या होता है तो उन्होने कहा कि फ़िल्म इज़ लाइक ए बैटलग्राउण्ड… लव, हेट, एक्शन, वायलेन्स, डेथ.. इन वन वर्ड इमोशन ! और इमोशन तारे ज़मीन में भरपूर है। आमिर खान ने अपनी पहली फ़िल्म में ही दिखा दिया कि जिन निर्देशकों की फ़िल्मों में वे काम करते रहे हैं उनके प्रति उनकी तथाकथित हिकारत यदि थी.. तो बेबुनियाद नहीं थी!
फिर भी फ़िल्म के एक दो बिन्दु ऐसे रहे जो मेरी छिद्रान्वषेक दृष्टि से बच नहीं सके। जैसे इन्टरवल के बाद आमिर के निजी जीवन में फ़िल्म की दखलन्दाज़ी उबाऊ लगने लगती है। जैसे बच्चे की त्वरित प्रगति थोड़ी नाटकीय हो जाती है।
जैसे जो बच्चा अपने परिवार से बिछुड़ जाने के दुख से एक खतरनाक स्थिति में पहुँच जाता है वो वापस अपने परिवार से मिलने पर परिवार के प्रति उदासीन नज़र आता है क्या इसलिए कि आमिर स्वयं के महत्व को हीरो के आकार के रखने का मोह संवरण नहीं कर पाए। जैसे कि बच्चे के चरित्र का इतना गहरा चित्रण करने के बावजूद आमिर माँ-बाप के चरित्र को बहु-आयामी बनाने से चूक गए।आम तौर पर हिन्दी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट पर चर्चा करने लायक कुछ नहीं रहता वो अधिकतर गानों, चुटकुलों और भावुक मसालों की एक लड़ी होती है। दोष किसी व्यकित का नहीं धंधे का है- एक (फ़िल्मी) कवि ने सही कहा है.. गंदा है पर धंधा है ये! मगर 'तारे ज़मीन पर' अलग है। इन छोटी-छोटी कमियों के बावजूद 'तारे ज़मीन पर' एक पैसावसूल अनुभव रहा जो आप को बच्चों की विशेषताओं के प्रति हमेशा के लिए संवेदनशील बना जाता है।
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