सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की यह कविता यूँ तो बच्चो के लिए लिखी गई थी.. मगर हम बड़े भी एक स्तर पर बच्चे ही होते हैं.. कुछ ज़रा.. कुछ थोड़े.. कुछ निहायत.. खेल खेल में रूठ जाते हैं.. धमकाने लगते हैं.. कि अपने बर्थडे पर नहीं बुलाऊँगा.. अपनी साइकिल पर नहीं बैठाऊँगा.. ये बचपना जीवन भर चलता रहता है.. दाढ़ी मूँछ सफ़ेद हो जाती है.. समाज में लोग ताऊ आदि कह कर पुकारने लगते हैं.. मगर हम वही अपने बर्थडे की धमकी के आगे बढ़ ही नहीं पाते.. बिल्डिंग की सोसायटी या स्पोर्ट्ज़ क्लब के स्तर पर अपनी बाल-सुलभता बिखेरते चलते हैं.. हम सब की इन्ही अबोध वृत्तियों को अर्पित यह कविता..
इब्न बतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफ़ान में,
थोड़ी हवा नाक में घुस गई,
घुस गई थोड़ी कान में।
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्न बतूता,
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैर का जूता।
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में,
इब्न बतूता खड़े रह गए
मोची की दुकान में।
शुक्रवार, 6 जुलाई 2007
बुधवार, 4 जुलाई 2007
मोबाइल धारको से एक अपील
(और आप लोगों का एक बड़ा वर्ग है.. जो लोग ब्लॉग जैसी तक्नीक का इस्तेमाल कर के इस लेख तक पहुँचे हैं.. वे मोबाइल फोन की सीढ़ी पार कर के यहाँ तक आए हैं..)
मित्रों, मैं एक ऐसी समस्या के प्रति आप का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा जिससे मैं तब से आक्रान्त हूँ जब से मोबाइल फोन मेरे जीवन में आया है.. मेर अपराध सिर्फ़ इतना है कि मेरा नाम अभय है.. अंग्रेज़ी अल्फाबेट के पहले दो अक्षर मेरे नाम के पहले दो अक्षर होने के कारण अक्सर मेरा नाम लोगों की फोन बुक के शीर्ष पर होता है..होते होंगे पहला होने के फ़ायदे.. यहाँ कोई नहीं.. उल्टा नुक्सान है.. अकसर मेरे पास ऐसे संदेश आते हैं जिनमें या तो कुछ ऊलजलूल लिखा होता है... कुछ ऐसा.. dskjgkjfdpdjei.. या फिर कुछ भी नहीं.. और एक नहीं.. एक के बाद एक आते ही जाते हैं.. पाँच दस पन्द्रह बीस तीस पचास..
ऐसा तब होता है जब मेरे वे मित्र अपना फोन लॉक नहीं करते.. दुर्भाग्य से मेरा नाम जिनकी फोन बुक में पहला है.. और किन्ही अनजान अनदेखे कारणवश उनके फोन की कुंजियां कुछ इस तरह से दबती हैं कि मेरे नाम संदेश रवाना होना शुरु हो जाते हैं.. ऐसा जेब में पड़े पड़े.. चलते फिरते लेटे बैठे.. किसी भी अवस्था में हो सकता है.. जबकि फोन की कुंजियां दबने के लिए स्वतंत्र हो जाय (विरोधाभासी वाक्य है, माफ़ करें)..
और मुझे सिर्फ़ ऐसे संदेश ही नहीं आते.. कॉल्स भी आते हैं.. मित्र का नाम मेरे फोन के स्क्रीन पर चमकता है.. मैं उत्साह से भरकर हलो कहता हूँ.. या अति उत्साह से भरकर ये तक कह डालता हूँ कि फ़ुर्सत मिल गई हम से बात करने की.. और न जाने क्या क्या.. और दूसरी तरफ़ से अजीब साउन्डट्रैक चल रहा होता है.. कभी कार में संगीत और बाहर के ट्रैफ़िक का शोर.. कभी ट्रेन की घटर घटर.. कभी रेस्तरां का हल्ला गुल्ला.. कभी सिनेमा हॉल की ध्वनियों का संसार.. कभी मियाँ बीबी के झगड़े के बीच बच्चे की चिल्लपों.. कभी कुछ अंतरंग फ़ुसफ़ुसाहटें.. इन सब को मैंने सुनते हुए परिस्थिति के अनुरूप अलग अलग मात्रा में अपराध बोध का अनुभव किया है..
और उनके हालात के अलावा मेरे हालात भी इसी तरह से विभिन्नता लिए होते हैं..और किसी दृष्टि से सुखद नहीं होते.. तो कभी उसी वक्त और कभी बाद में, जैसे वक्त की पुकार हुई, अपने मित्र को फोन करके इस समस्या से मुझे और उसे बचाने का उपाय बताया है.. मित्रों..हो सकता है आप भी इस समस्या का शिकार होते हैं.. समस्या के किसी भी छोर पर रह कर.. तो एक मामूली सा उपाय आप की पेशेनज़र है..
अपनी फोन बुक में एक नई एन्ट्री दाखिल करें.. AAA के नाम से.. और जब नम्बर तलब किया जाय तो या तो आप उसे खाली छोड़ दें.. या फिर एक ऐसा नम्बर भरें जिसके बारे में आप निश्चित है कि वह ग़लत नम्बर है.. ऐसा करने के बाद अगर कभी आप अपने फोन को लॉक करना भूले भी तो आप को चिंता करने की ज़रूरत नहीं..
दो बातों का और ख्याल रखें..
१) कई बार फोन का कुंजीपटल लॉक करने पर भी खुल जाता है.. भाई खुलता भी तो कुंजियां दबाने से ही है.. दब गई कुंजियां.. खुल गया..
२) यह समस्या फोन बुक के शीर्ष नाम के साथ ही नहीं.. अन्तिम नाम के साथ भी हो सकती है.. मेरा खयाल है कि कोई ज़ीनत या ज़ैनब भी मेरे दर्द के साझीदार होंगे.. उनकी राहत के लिए ZZZ नाम से एक एन्ट्री दाखिल करें..
और इस तरह अपनी गाढ़ी कमाई को यूँ ज़ाये होने से और निजी जीवन को यूँ शाये होने से बचायें...
मित्रों, मैं एक ऐसी समस्या के प्रति आप का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा जिससे मैं तब से आक्रान्त हूँ जब से मोबाइल फोन मेरे जीवन में आया है.. मेर अपराध सिर्फ़ इतना है कि मेरा नाम अभय है.. अंग्रेज़ी अल्फाबेट के पहले दो अक्षर मेरे नाम के पहले दो अक्षर होने के कारण अक्सर मेरा नाम लोगों की फोन बुक के शीर्ष पर होता है..होते होंगे पहला होने के फ़ायदे.. यहाँ कोई नहीं.. उल्टा नुक्सान है.. अकसर मेरे पास ऐसे संदेश आते हैं जिनमें या तो कुछ ऊलजलूल लिखा होता है... कुछ ऐसा.. dskjgkjfdpdjei.. या फिर कुछ भी नहीं.. और एक नहीं.. एक के बाद एक आते ही जाते हैं.. पाँच दस पन्द्रह बीस तीस पचास..
ऐसा तब होता है जब मेरे वे मित्र अपना फोन लॉक नहीं करते.. दुर्भाग्य से मेरा नाम जिनकी फोन बुक में पहला है.. और किन्ही अनजान अनदेखे कारणवश उनके फोन की कुंजियां कुछ इस तरह से दबती हैं कि मेरे नाम संदेश रवाना होना शुरु हो जाते हैं.. ऐसा जेब में पड़े पड़े.. चलते फिरते लेटे बैठे.. किसी भी अवस्था में हो सकता है.. जबकि फोन की कुंजियां दबने के लिए स्वतंत्र हो जाय (विरोधाभासी वाक्य है, माफ़ करें)..
और मुझे सिर्फ़ ऐसे संदेश ही नहीं आते.. कॉल्स भी आते हैं.. मित्र का नाम मेरे फोन के स्क्रीन पर चमकता है.. मैं उत्साह से भरकर हलो कहता हूँ.. या अति उत्साह से भरकर ये तक कह डालता हूँ कि फ़ुर्सत मिल गई हम से बात करने की.. और न जाने क्या क्या.. और दूसरी तरफ़ से अजीब साउन्डट्रैक चल रहा होता है.. कभी कार में संगीत और बाहर के ट्रैफ़िक का शोर.. कभी ट्रेन की घटर घटर.. कभी रेस्तरां का हल्ला गुल्ला.. कभी सिनेमा हॉल की ध्वनियों का संसार.. कभी मियाँ बीबी के झगड़े के बीच बच्चे की चिल्लपों.. कभी कुछ अंतरंग फ़ुसफ़ुसाहटें.. इन सब को मैंने सुनते हुए परिस्थिति के अनुरूप अलग अलग मात्रा में अपराध बोध का अनुभव किया है..
और उनके हालात के अलावा मेरे हालात भी इसी तरह से विभिन्नता लिए होते हैं..और किसी दृष्टि से सुखद नहीं होते.. तो कभी उसी वक्त और कभी बाद में, जैसे वक्त की पुकार हुई, अपने मित्र को फोन करके इस समस्या से मुझे और उसे बचाने का उपाय बताया है.. मित्रों..हो सकता है आप भी इस समस्या का शिकार होते हैं.. समस्या के किसी भी छोर पर रह कर.. तो एक मामूली सा उपाय आप की पेशेनज़र है..
अपनी फोन बुक में एक नई एन्ट्री दाखिल करें.. AAA के नाम से.. और जब नम्बर तलब किया जाय तो या तो आप उसे खाली छोड़ दें.. या फिर एक ऐसा नम्बर भरें जिसके बारे में आप निश्चित है कि वह ग़लत नम्बर है.. ऐसा करने के बाद अगर कभी आप अपने फोन को लॉक करना भूले भी तो आप को चिंता करने की ज़रूरत नहीं..
दो बातों का और ख्याल रखें..
१) कई बार फोन का कुंजीपटल लॉक करने पर भी खुल जाता है.. भाई खुलता भी तो कुंजियां दबाने से ही है.. दब गई कुंजियां.. खुल गया..
२) यह समस्या फोन बुक के शीर्ष नाम के साथ ही नहीं.. अन्तिम नाम के साथ भी हो सकती है.. मेरा खयाल है कि कोई ज़ीनत या ज़ैनब भी मेरे दर्द के साझीदार होंगे.. उनकी राहत के लिए ZZZ नाम से एक एन्ट्री दाखिल करें..
और इस तरह अपनी गाढ़ी कमाई को यूँ ज़ाये होने से और निजी जीवन को यूँ शाये होने से बचायें...
मंगलवार, 3 जुलाई 2007
आयें..पढ़ें एक नया इतिहास..
पिछले दिनों डा० भीमराव अम्बेदकर की पुस्तक "अछूत: वे कौन थे और वे कैसे अछूत बन गये" के सारांश के मेरे प्रयास पर नज़र गई होगी आप की.. कुछ ने नहीं भी देखा होगा.. हर समय व्यक्ति इस तरह की भारी सामग्री पढ़ने की मनःस्थिति में नहीं होता.. तो आप सब के लिए और उन के लिए भी जिन्होने इन कड़ियों को देखा.. और सब से बढ़कर अपने लिए मैं उन निष्कर्षों को रेखांकित करना चाहूँगा जो अम्बेदकर ने अपने इस शोध के उपरांत हासिल किए..कबायली समाज और छितरे लोग
आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था.. जो आपस में लड़ते रहते..कृषि क्रांति होने से कुछ लोग गाँवों मे बस गए.. किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे और हमले करते रहे.. हारे हुए और उजड़े हुए कबीलों के बिखरे हुए लोग.. दूसरे बसे हुए कबीलों के गाँवों की सीमाओं पर रहते.. इन्हे छितरे लोग (broken men) कहा गया.. इस तरह की परिघटना दुनिया में हर जगह हुई.. और बसे लोगों में और छितरे लोगों में एक समझौता सा हुआ.. जिसके तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षाकवच का काम करेंगे.. बदलें में बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देंगे.. जिनके मांस खाल हड्डी आदि का वे उपयोग कर सकेंगे..
दूसरी जगहों पर छितरे लोग धीरे धीरे मुख्यधारा का अंग हो गए पर भारत में ऐसा नहीं हुआ.. भारत में छितरे लोग अछूत बन गए.. कैसे?
आर्य और द्रविड़

अछूत कोई अलग से पैदा हुई हारी हुई नस्ल नहीं है.. प्राचीन भारत में अधिक से अधिक दो ही वर्ग थे.. आर्य और नाग.. आर्य कोई प्रजाति थी या नहीं इस पर शक है..हाँ यह एक संस्कृति थी..जिनके अन्दर भी दो संघर्षरत वर्ग थे.. ऋग्वेदी व अथर्ववेदी.. और नाग, जिन्हे अन्यत्र दास या दस्यु भी कहा गया है.. नाग भी एक संस्कृति थी.. इनकी भाषा द्रविड़ थी.. इन के वंशज आज भी पूरे भारत में हैं.. पर भाषा सिर्फ़ दक्षिण भारत में सिमट गई है.. पहले द्रविड़ भाषा पूरे भारत में बोली जाती थी.. कश्मीर और सिंध में भी.. जिसे पैशाची कहा गया है..
आर्यों और नागों मे अन्तर्सम्बन्ध थे और वैवाहिक सम्बन्ध भी थे..
वैदिक संस्कृति और गोमांस
प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति है.. नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं.. ये बलियां ब्राह्मणों द्वारा दी जाती थीं और ये ब्राह्मण पुरोहित मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे.. ब्राह्मण पहले भयंकर मांसाहारी थे.. और गोमांस उनका प्रिय खाद्य था..रोज़ रोज़ की इस बलि से समाज ब्राहमणों से आक्रांत था..
बुद्ध की क्रांति
५५० ईसा पूर्व में बुद्ध की धार्मिक क्रांति से सब कुछ बदल गया.. बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.. ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा और रोज़गार खतरे में आ गया.. वे काफ़ी समय तक हाशिये पर चले गये.. जबकि बौद्ध धर्म का विस्तार पूरे भारत और भारत के बाहर पूरे एशिया में हो गया..
बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष में ब्राह्मणों का पलटवार
पर ब्राह्मण संघर्षशील रहे.. और बौद्ध धर्म से लड़ते रहे..विचार से और हथियार से भी..१८५ ईसा पूर्व में मौर्य शासक बृहद्रथ के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र ने उसका सर काट लिया और खुद गद्दी पर आरुढ़ हुआ.. उसके बाद से देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा.. ब्राह्मणों द्वारा किए जा रहे इस अभियान और तमाम दूसरे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नया साहित्य रचा गया.. जिसमें अग्रणी रहा मनुस्मृति..
मनु स्मृति ने ब्राह्मणवाद को मजबूत करने के तमाम कोशिशे की.. पुराने यज्ञ वाले धर्म को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की.. समाज में धीरे धीरे बौद्धों को परिहास का पात्र बनाया गया.. और उनसे घृणा की गई.. भिक्षुक भिखारी हो गया.. बुद्ध बुद्धू बन गया..
हिन्दू धर्म में बदलाव
परन्तु समय बदल गया था.. और जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था..बौद्ध धर्म जनता के लिए ब्राह्मण धर्म से कहीं अधिक आकर्षक था.. तो ब्राह्मणों ने पैंतरा बदला और बौद्धो की नकल करना शुरु किया उनके जीवन दर्शन को अपनाया.. बौद्धो की तरह मन्दिर बनाये और और मूर्ति पूजा शुरु की.. वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा का कोई स्थान न था.. और इस सब से भी बढ़कर ब्राह्मण, गोभक्षक से गोरक्षक बन गये..मगर क्यों?
शाकाहार-मांसाहार
बौद्ध पूरी तरह शाकाहारी नहीं थे... वे हिंसा के विरोधी थे मगर..मरे जानवर का और ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो.. तो बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया.. और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य..
सबसे पहले ब्राह्मणों ने गोमांस खाना छोड़ा.. कुछ ने तो मांसाहार भी छोड़ा.. फिर ब्राह्मणों की देखादेखी अब्राह्मणों ने भी गोमांस छोड़ा.. किसने नहीं छोड़ा?
अछूतों का जन्म
छितरे लोग जो गाँव के सीमाओं पर रहकर पहरुए और प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे थे.. और मृत जानवरों का मांस खाते चले आ रहे हैं.. वे चाह कर भी गोमांस खाना छोड़ नहीं सकते थे क्योंकि गाँव वालों के पास से वही जानवर प्राप्त होंगे जो वे पालते हैं यानी कि गो बैल आदि.. और इसके अलावा जीविका का कोई दूसरा साधन उनके पास नहीं था..
नई बदली हुई स्थिति में यह पाप कर्म था.. और इस महापाप को जानकर भी करते रहने के कारण छितरे लोग अस्पृश्य हो गये.. इस परिघटना की शुरुआत का काल अम्बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं..
कहाँ गए सब बौद्ध?
उक्त पुस्तक में अम्बेदकर इतने ही निष्कर्षों की चर्चा करते हैं पर सवाल और बहुत हैं.. जो अन्यत्र उठाये गये हैं.. इतना सब हो जाने के बाद भी बौद्ध पूरी तरह सत्ताहीन नहीं हो गए थे.. हर्षवर्धन बौद्धधर्म का संरक्षक था.. और न ही शंकराचार्य के बाद तक उनका वैचारिक रूप से अस्तित्व समाप्त हुआ था.. तो फिर आज हमारे देश में बौद्ध क्यों नहीं हैं..? आखिर कहाँ गए सब बौद्ध..? ये बड़ा प्रश्न है जिसका जवाब अम्बेदकर की किसी दूसरी किताब में तलाशना होगा..तस्वीरें:
सबसे ऊपर, अम्बेदकर विचार मग्न
बीच में, द्रविड़ विचारक पेरियार के साथ अम्बेदकर
सबसे नीचे, १९५६ में बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अम्बेदकर
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