कवि कवितायें पढ़ते हैं। पत्रकार अख़बार पढ़ते हैं। ब्लॉग वाले ब्लॉग पढ़ते हैं। कुछ लोग कथा-कहानी भी पढ़ते हैं। कहानी- कविता–अख़बार से बा़की दुनिया में इल्म की जो किताबें हैं वो कौन पढ़ता है?
अगर कोई है तो उन से गुज़ारिश है कि किताब की दुकान में जाने की ज़हमत न उठायें। घर बैठे फ़्लिपकार्ट से किताब मँगायें और डिस्काउन्ट भी पायें। किताबों से यहाँ मेरा मतलब अंग्रेज़ी की किताबों से ही है। हिन्दी की किताबों की दुकाने हैं ही कहाँ? ऐसा माना जाता है कि हिन्दी किताबों के पाठक ही नहीं हैं और अगर हैं भी तो प्रकाशकों को उनकी फ़िक्र नहीं उनके लिए तो सरकारी अधिकारियों की सिफ़ारिश ही काफ़ी है किताब के धंधे में बने रहने के लिए और मोटा मुनाफ़ा बनाते रहने के लिए। सुना तो ये भी जाता है कि हिन्दी के प्रकाशक लेखकों को पैसे देते नहीं बल्कि लेते हैं: किताब छापने का एहसान करने के लिए। ख़ैर।
मैंने पिछले दिनों कुछ किताबों की ज़रूरत पड़ने पर उनको बुकशॉप्स में खोजा; कहीं न पाया तो फिर नेट पर खोजा। अमेज़न में थी लेकिन डॉलर्स में और किताब की क़ीमत से ज़्यादा उनके शिपिंग चारजेज़। उसी खोज में फ़्लिपकार्ट भी नज़र आया। जो किताब चाहिये थी वो थी, उसके अलावा दूसरी कई किताबें और भी दिखीं जो दिलचस्प थीं और मेरी जानकारी में नहीं थीं। किताब का मूल्य रुपये में, कोई शिपिंग शुल्क नहीं क्योंकि इसका संचालन बेंगालूरु से ही होता है, और उलटे डिसकाउंट!! चार-पाँच किताबे मँगवाई। तीन तो तीसरे दिन आ गई। और शेष भी जल्दी। पेमेन्ट बस आप को नेटबैंकिंग से या क्रेडिटकार्ड से या डेबिट कार्ड से करना होगा। सुरक्षित है।
फ़्लिपकार्ट चलाने वाले हैं सचिन बंसल और बिन्नी बंसल जो २००५ बैच के आई आई टी दिल्ली के कम्प्यूटर साइंस के स्नातक हैं। अमेज़न इंडिया में आठ मास नौकरी करने के बाद उन्होने अक्तूबर २००७ में यह काम वेबसाइट शुरु की। होनहार बच्चे आगे बढ़ेंगे ऐसी उम्मीद है!
देसी-विदेसी सभी तरह की किताबें उनके पास उपलब्ध हैं। कुछ हिन्दी के भी टाइटिल्स हैं मगर उस प्रकार के नहीं जो आम तौर पर हिन्दी साहित्य के नाम से जाने जाते हैं। देखिये दूसरे प्रकार की हिन्दी किताबों तक वो पहुँच गए लेकिन हिन्दी साहित्य (कविता-कहानी जी, और क्या?) को न जाने कौन सा संक्रामक रोग है, कोई छूना ही नहीं चाहता। आह.. रोगी चंगा हो जाय ऐसी कामना है।
पश्चलेख: बेंगालूरु से पूजा उपाध्याय ने बताया है कि फ़्लिपकार्ट पर हिन्दी की किताबें भी उपलब्ध हैं। मैं ने फिर से खोज के देखा; पहले देवनागरी में, तो कोई परिणाम नहीं आए, लेकिन रोमन में खोज करने से सुखद नतीजे दिख रहे हैं। हिन्दी किताबें भी उपलब्ध है। शायद मैंने पहले भी रोमन में कोशिश नहीं की होगी। ख़ैर, इस मसले में लिपि महत्वपूर्ण नहीं है, महत्व इस बात का है कि हिन्दी किताबें भी घर बैठे मँगाई जा सकती हैं। पूजा जी को धन्यवाद!
और रोगी का हाल इतना भी बुरा नहीं है। शायद बुरा लगता इसलिए है कि लेखक को किताब लिखने के लिए पैसे मिलते नहीं देने पड़ते हैं।