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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2008

क्या भांग ही सोमरस है?

कल भाई विजयशंकर ने भांग पर एक रोचक पोस्ट दर्ज की.. उस से मुझे सोमरस की याद हो आई। वेदों में सोमरस यज्ञ के विशेष आकर्षण के बतौर आता है। इन्द्र को बुलाया जाता है कि आएं और सोमरस पान करें। ज़ाहिरन सोमरस वैदिक जनों के पास एक ऐसा माल था जो उनके लिए सबसे अधिक लुभावना था। उसकी बड़ी महिमा है.. पर अफ़सोस की बात यह है कि कालान्तर में सोमरस का अर्थ लोग भूल गए।

हाल के प्रगतिशील इतिहासकारों ने सोमरस का अर्थ भांग बताया है। इन इतिहासकारों के अलावा ओशो ने इसे भंग जैसा ही कुछ और मूर्धन्य कवि-कथाकार उदय प्रकाश तो भांग ही बताया है। ओशो के विचार तो यहाँ उपलब्ध हैं और उदय जी ने कृषि के इतिहास पर एक टी.वी. सीरीज़ की थी उस में यह निष्कर्ष उन्होने पेश किया था।

मेरी दुविधा यह है कि यदि भांग ही वह सोमरस है तो भांग के इतने पर्यायवाचियों में सोमरस का नाम क्यों नहीं? क्यों भांग पीने वाले कभी उसे कई नामों से बुलाने के बावजूद उसे सोमरस नहीं पुकारते.. वो भी तब जबकि उसे साफ़-साफ़ शिवजी की बूटी कहा जाता है। और सोमरस और शिवजी की बूटी में कितना अन्तर है भला? शिवजी का दिन सोमवार ही है.. और चन्द्रमा भी उनके सर पर विराजमान है.. फिर भी कोई भंगेड़ी हमें नहीं बताता कि सोमरस असल में भांग है। कौन बताता है- पश्चिमी विद्वान, प्रगतिशील इतिहासकार और धर्मनिरपेक्ष कवि और चिन्तक?

क्यों भाई.. भांग पीना यदि वैदिक काल से चला आ रहा है तो परम्परा में ऐसा कौन सा अवरोध आ गया कि लोग भूल ही गए कि सोमरस ही भांग है? भांग पीना चालू है.. वेदों का पढ़ना चालू है.. शिव की भक्ति चालू है.. शब्दों की व्युत्पत्ति का शग़ल चालू है.. फिर भी सोमरस का अर्थ बिला जाता है.. जबकि भंग के अनेकों पर्यायवाची बने रहते हैं.. विजय जी ने अपनी पोस्ट में भंग के ये पर्याय बताए हैं-

अजया, विजया, त्रिलोक्य, मातुलि, मोहिनी, शिवप्रिया, उन्मत्तिनी, कामाग्नि, शिवा आदि। बांग्ला में इसे सिद्धि कहते हैं. अरबी में किन्नव, तमिल में भंगी, तेलुलू में वांगे याकू गंज केटू और लैटिन में इसको कैनाबिस सबोपा कहते हैं.

मेरे तर्क से सोमरस भंग नहीं हो सकता। अब सवाल यह उठता है कि यदि भंग सोमरस नहीं है तो फिर सोमरस क्या था? देखते हैं.. यहाँ दो शब्द हैं.. सोम और रस.. रस का अर्थ है सार, तरल द्रव या दूध.. यानी किसी वस्तु का निचोड़ या उसका सारतत्व.. जैसे हम घर में जो तरकारी पकाते हैं उसके रस को रसा कहते हैं.. वैसे रस का एक अर्थ स्वाद भी है.. जिस से जीभ को उसका एक पर्याय मिलता है रसना। अब दूसरे शब्द सोम का विचार किया जाय.. सोम का अर्थ क्या है?

हलायुध कोष में सोम के अर्थ दिये हैं – चन्द्र, कर्पूर, वानर, कुबेर, यम वायु, जल और सोमलतौषिधि..। मोनियर विलियम्स मे सोम के अर्थ के सामने लिखा है- juice, extract, juice of soma plant, the soma plant itself (said to be the climbing plant of sarcostema viminalis or asclepias acida)

इसके आगे सोमरस बनाने की जो विधि वेदों में मिलती है उसे भी उद्धृत किया गया है – the stalks of which were pressed between stones by the priests then sprinkled with water and purified in a strainer, whence the acidic juice trinkled into jars or large vessels after which it was mixed with clarified butter, flour etc., made to derment and offered in libitious to the gods.. or drunk by the brahamanas..

इस के और आगे सोम के दूसरे अर्थ भी दिए हैं जिस में अन्य अर्थों के अलावा चावल का पानी भी दिया है। आप्टे जी के कोष में भी लगभग यही अर्थ हैं बस फ़र्क इतना है कि सोम को पौधा बताया गया है.. जबकि हलायुध कोष में चरक के हवाले से उसे लता बताया है..। आप्टे का कोष बहुत हद तक अर्थों के लिए मोनियर विलियम्स पर ही निर्भर रहता है.. और मोनियर विलियम्स ने बिना किसी हवाले के उसे प्लान्ट कहा है. फिर बाद में climbing plant..कहा है। निश्चित तौर पर हलायुध कोष ही अधिक प्राचीन और प्रामाणिक अर्थ बता रहा है।

जिन लोगों ने भांग का पौधा देखा है उन्हे बताने की ज़रूरत नहीं पर जिन्होने नहीं देखा वे ये जान लें कि भांग का पौधा कोई लता नहीं होता.. वो एक स्वतंत्र जंगली पौधा है जो अपने उगने के लिए किसी का भी सहारा नहीं लेता। अच्छे हवा-पानी मिलने पर आठ-दस फ़ीट तक भी हो जाता है.. मैंने खुद देखा है इतना बड़ा भांग का पेड़। अब ये मान लेना कि वैदिक लोग लता और पौधे में अन्तर नहीं जानते थे.. और कभी-कभी लता का अर्थ पौधे से भी करते थे.. निहायत बेवकूफ़ी होगी।

चलते-चलते यह भी विचारणीय है कि वैदिक लोग अग्निपूजक थे। आग की खोज के साथ ही मनुष्य ने खाने को पका कर खाने की तरक़ीब भी निकाली। उसके पहले मांस और फल- सब्ज़ियाँ कच्चे ही खाए जाते रहे होंगे। वैदिक यज्ञ में न सिर्फ़ पशुओं की बलि दी जाती थी बल्कि अनाज भी अर्पित किया जाता था। और ये यज्ञ आग के सामने होता था.. क्या ये यज्ञ एक खाना पकाने का वृहद अनुष्ठान ही तो नहीं है जिसमें सब्ज़ियों का रस ही सोम रस है? उल्लेखनीय है कि ज्योतिष में सब्ज़ियों पर सोम यानी चन्द्रमा का अधिकार है।

रही बात उसके मादक प्रभाव की.. तो क्या खाने का नशा नहीं होता..? जो लोग सोचते हैं कि सिर्फ़ भांग और शराब में नशा होता है तो उन्हे कभी तगड़ी भूख का एहसास नहीं हुआ है। फिर भी मैं इस सम्भावना से बिलकुल इन्कार नहीं करता कि सोम कोई ऐसी लता थी जिसका एक ओजस्वी और मादक प्रभाव होता था.. पर वो भांग ही है यह स्वीकारने में मुझे परहेज़ है क्योंकि ऐसा निष्कर्ष मुझे बचकाना लगता है।

एक और बात जो पूरी तरह सम्बन्धित नहीं तो विषयान्तर भी नहीं है- शरदपूर्णिमा को खीर को चाँदनीरात में रख कर अगले रोज़ खाने का रिवाज़ आज भी जारी है क्योंकि माना जाता है उस रात अमृत बरसता है (सोम का एक अर्थ अमृत भी है)।

और ये भी याद कर लिया जाय कि इसी शरदपूर्णिमा की रात को कृष्ण ने ब्रज में महारास रचाया था। कृष्ण जो सोलह कलाओं के स्वामी थे। सोलह कलाएं.. कौन सी सोलह कलाएं? राम तो सिर्फ़ बारह कलाओं के स्वामी थे.. पर कृष्ण सोलह के कैसे हो गए? राम सूर्यप्रधान थे और सूर्य की बारह कलाएं ही होती हैं.. आकाश में बारह राशियों में उसके भ्रमण से बने बारह मास। और कृष्ण चन्द्रमाप्रधान थे.. इसलिए उनकी चन्द्रमा की सोलह कलाएं.. प्रथमा से पूर्णमासी तक पन्द्रह और एक अमावस्या।

सोम के इतने विविध अर्थों के बीच आपको एक भांग का ही अर्थ मिला.. वो भी थोपा हुआ। पर मज़े की बात यह है कि किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति से पूछिये वो सोमरस का अर्थ आपको भांग ही बताएगा। क्यों? जैसे किसी भी पढ़े-लिखे व्यक्ति से पूछिये वो आर्य सत्य की तरह बताएगा कि सिन्धु घाटी सभ्यता को आर्य आक्रमणकारियों(!?) ने नष्ट किया। कहाँ से आ रहे हैं ये सत्य.. बिना आधार.. बिना प्रमाण के सत्य? रैशनैल्टी की क़समें खाने वाले कैसे इन झूठों पर आँख मूँद कर भरोसा करते जाते हैं?
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